<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="en-GB">
	<id>http://dharmawiki.org/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=Adiparva_Adhyaya_45_%28%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA%E0%A5%AB%29</id>
	<title>Adiparva Adhyaya 45 (आदिपर्वणि अध्यायः ४५) - Revision history</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://dharmawiki.org/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=Adiparva_Adhyaya_45_%28%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA%E0%A5%AB%29"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="http://dharmawiki.org/index.php?title=Adiparva_Adhyaya_45_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA%E0%A5%AB)&amp;action=history"/>
	<updated>2026-05-05T23:43:04Z</updated>
	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.35.4</generator>
	<entry>
		<id>http://dharmawiki.org/index.php?title=Adiparva_Adhyaya_45_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA%E0%A5%AB)&amp;diff=120714&amp;oldid=prev</id>
		<title>P16459: new pg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://dharmawiki.org/index.php?title=Adiparva_Adhyaya_45_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA%E0%A5%AB)&amp;diff=120714&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2019-10-16T11:45:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;new pg&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;सूत उवाच [सौतिरुवाच]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतस्मिन्नेव काले तु जरत्कारुर्महातपाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चचार पृथिवीं कृत्स्नां यत्रसायंगृहो मुनिः॥ 1-45-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चरन्दीक्षां महातेजा दुश्चरामकृतात्मभिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीर्थेष्वाप्लवनं कृत्वा पुण्येषु विचचार ह॥ 1-45-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वायुभक्षो निराहारः शुष्यन्नहरहर्मुनिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स ददर्श पितॄन्गर्ते लम्बमानानधोमुखान्॥ 1-45-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकतन्त्ववशिष्टं वै वीरणस्तम्बमाश्रितान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं तन्तुं [च श]दशनैराखुमाददानं बिलेशयम्॥ 1-45-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निराहारान्कृशान्दीनान्गर्ते स्वत्राणमिच्छतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपसृत्य स तान्दीनान्दीनरूपोऽभ्यभाषत॥ 1-45-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भवन्तोऽवलम्बन्ते वीरणस्तम्बमाश्रिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्बलं खादितैर्मूलैराखुना बिलवासिना॥ 1-45-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीरणस्तम्बके मूलं यदप्येकमिह स्थितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदप्ययं शनैराखुरादत्ते दशनैः शितैः॥ 1-45-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छेत्स्यतेऽल्पावशिष्टत्वादेतदप्यचिरादिव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततस्तु पतितारोऽत्र गर्ते व्यक्तमधोमुखाः॥ 1-45-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य मे दुःखमुत्पन्नं दृष्ट्वा युष्मानधोमुखान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृच्छ्रमापदमापन्नान्प्रियं किं करवाणि वः॥ 1-45-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपसोऽस्य चतुर्थेन तृतीयेनाथवा पुनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्धेन वापि निस्तर्तुमापदं ब्रूत मा चिरम्॥ 1-45-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवापि समग्रेण तरन्तु तपसा मम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवन्तः सर्व एवेह काममेवं विधीयताम्॥ 1-45-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितर ऊचुः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वृद्धो भवान्ब्रह्मचारी यो नस्त्रातुमिहेच्छसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तु विप्राग्र्य तपसा शक्यते तद्व्यपोहितुम्॥ 1-45-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्ति नस्तात तपसः फलं प्रवदतां वर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संतानप्रक्षयाद्ब्रह्मन्पताम निरयेऽशुचौ॥ 1-45-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संतानं हि परो धर्म एवमाह पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लम्बतामिह नस्तात न ज्ञानं प्रतिभाति वै॥ 1-45-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येन त्वा नाभिजानीमो लोके विख्यातपौरुषम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वृद्धो भवान्महाभागो यो नः शोच्यान्सुदुःखितान्॥ 1-45-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोचते चैव कारुण्याच्छृणु ये वै वयं द्विज।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यायावरा नाम वयमृषयः संशितव्रताः॥ 1-45-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोकात्पुण्यादिह भ्रष्टाः संतानप्रक्षयान्मुने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रणष्टं नस्तपस्तीव्रं न हि नस्तन्तुरस्ति वै॥ 1-45-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्तित्वेकोऽद्यनस्तन्तुः सोऽपि नास्ति यथा तथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्दभाग्योऽल्पभाग्यानां तप एकं समास्थितः॥ 1-45-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जरत्कारुरिति ख्यातो वेदवेदाङ्गपारगः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नियतात्मा महात्मा च सुव्रतः सुमहातपाः॥ 1-45-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेन स्म तपसो लोभात्कृच्छ्रमापादिता वयम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न तस्य भार्या पुत्रो वा बान्धवो वास्ति कश्चन॥ 1-45-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्माल्लम्बामहे गर्ते नष्टसंज्ञा ह्यनाथवत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स वक्तव्यस्त्वया दृ[ष्टो]ष्ट्वा ह्यस्माकं नाथवत्तया॥ 1-45-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितरस्तेऽवलम्बन्ते गर्ते दीना अधोमुखाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साधु दारान्कुरुष्वेति प्रजामुत्पादयेति च॥ 1-45-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुलतन्तुर्हि नः शिष्टस्त्वमेवैकस्तपोधन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्त्वं पश्यसि नो ब्रह्मन्वीरणस्तम्बमाश्रितान्॥ 1-45-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एषोऽस्माकं कुलस्तम्ब आस्ते स्वकुलवर्धनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यानि पश्यसि वै ब्रह्मन्मूलानीहास्य वीरुधः॥ 1-45-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एते नस्तन्तवस्तात कालेन परिभक्षिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्त्वेतत्पश्यसि ब्रह्मन्मूलमस्यार्धभक्षितम्॥ 1-45-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्र लम्बामहे गर्ते सोऽप्येकस्तप आस्थितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यमाखुं पश्यसि ब्रह्मन्काल एष महाबलः॥ 1-45-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तं तपोरतं मन्दं शनैः क्षपयते तुदन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जरत्कारुं तपो[ल]लुब्धं मन्दात्मानमचेतसम्॥ 1-45-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि नस्तत्तपस्तस्य तारयिष्यति सत्तम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिन्नमूलान्परिभ्रष्टान्कालोपहतचेतसः॥ 1-45-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधःप्रविष्टान्पश्यास्मान्यथा दुष्कृतिनस्तथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्मासु पतितेष्वत्र सह सर्वैः सबान्धवैः॥ 1-45-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिन्नः कालेन सोऽप्यत्र गन्ता वै नरकं ततः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपो वाप्यथवा यज्ञो यच्चान्यत्पावनं महत्॥ 1-45-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्सर्वमपरं तात न संतत्या समं मतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तात दृष्ट्वा ब्रूयास्तं जरत्कारुं तपोधन॥ 1-45-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा दृष्टमिदं चात्र त्वयाख्येयमशेषतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा दारान्प्रकुर्यात्स पुत्रानुत्पादयेद्यथा॥ 1-45-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा ब्रह्मं स्त्वया वाच्यः सोऽस्माकं नाथवत्तया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बान्धवानां [हितस्येह] हि तस्येह यथा चात्मकुलं तथा॥ 1-45-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्त्वं बन्धुमिवास्माकमनुशोचसि सत्तम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रोतुमिच्छाम सर्वेषां को भवानिह तिष्ठति॥ 1-45-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कारुपितृदर्शने पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 45 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>P16459</name></author>
	</entry>
</feed>