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	<title>Adiparva Adhyaya 43 (आदिपर्वणि अध्यायः ४३) - Revision history</title>
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	<updated>2026-04-12T05:33:29Z</updated>
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		<title>P16459: NEW PG</title>
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		<updated>2019-10-16T11:43:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;NEW PG&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;तक्षक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि दष्टो मयेह त्वं शक्तः किंचिच्चिकित्सितुम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो वृक्षं मया दष्टमिमं जीवय काश्यप॥ 1-43-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परं मन्त्रबलं यत्ते तद्दर्शय यतस्व च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्यग्रोधमेनं धक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम॥ 1-43-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काश्यप उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दश नागेन्द्र वृक्षं त्वं यद्येतदभिमन्यसे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहमेनं त्वया दष्टं जीवयिष्ये भुजङ्गम॥ 1-43-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तः स नागेन्द्रः काश्यपेन महात्मना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अदशद्वृक्षमभ्येत्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तमः॥ 1-43-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स वृक्षस्तेन दष्टस्तु पन्नगेन महात्मना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशीविषविषोपेतः प्रजज्वाल समन्ततः॥ 1-43-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं दग्ध्वा स नगं नागः काश्यपं पुनरब्रवीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरु यत्नं द्विजश्रेष्ठ जीवयैनं वनस्पतिम्॥ 1-43-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भस्मीभूतं ततो वृक्षं पन्नगेन्द्रस्य तेजसा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भस्म सर्वं समाहृत्य काश्यपो वाक्यमब्रवीत्॥ 1-43-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्याबलं पन्नगेन्द्र पश्य मेऽद्य वनस्पतौ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहं संजीवयाम्येनं पश्यतस्ते भुजङ्गम॥ 1-43-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततः स भगवान्विद्वान्काश्यपो द्विजसत्तमः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भस्मराशीकृतं वृक्षं विद्यया समजीवयत्॥ 1-43-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अङ्कुरं कृतवांस्तत्र ततः पर्णद्वयान्वितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पलाशिनं शाखिनं च तथा विटपिनं पुनः॥ 1-43-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं दृष्ट्वा जीवितं वृक्षं काश्यपेन महात्मना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उवाच तक्षको ब्रह्मन्नैतदत्यद्भुतं त्वयि॥ 1-43-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्विजेन्द्र यद्विषं हन्या मम वा मद्विधस्य वा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कं त्वमर्थमभिप्रेप्सुर्यासि तत्र तपोधन॥ 1-43-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्तेऽभिलषितं प्राप्तुं फलं तस्मान्नृपोत्तमात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहमेव प्रदास्यामि तत्ते यद्यपि दुर्लभम्॥ 1-43-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विप्रशापाभिभूते च क्षीणायुषि नराधिपे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घटमानस्य ते विप्र सिद्धिः संशयिता भवेत्॥ 1-43-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो यशः प्रदीप्तं ते त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निरंशुरिव घर्मांशुरन्तर्धानमितो [व्रजेत्]ऽब्रवीच्॥ 1-43-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काश्यप उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनार्थी याम्यहं तत्र तन्मे देहि भुजङ्गम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽहं विनिवर्तिष्ये स्वापतेयं प्रगृह्य वै॥ 1-43-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यावद्धनं प्रार्थयसे तस्माद्राज्ञस्ततोऽधिकम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहमेव प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम॥ 1-43-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षकस्य वचः श्रुत्वा काश्यपो द्विजसत्तमः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रदध्यौ सुमहातेजा राजानं प्रति बुद्धिमान्॥ 1-43-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिव्यज्ञानः स तेजस्वी ज्ञात्वा तं नृपतिं तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षीणायुषं पाण्डवेयमपावर्तत काश्यपः॥ 1-43-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लब्ध्वा वित्तं मुनिवरस्तक्षकाद्यावदीप्सितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवृत्ते काश्यपे तस्मिन्समयेन महात्मनि॥ 1-43-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जगाम तक्षकस्तूर्णं नगरं नागसाह्वयम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथ शुश्राव गच्छन्स तक्षको जगतीपतिम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्रैर्गदैर्विषहरै रक्ष्यमाणं प्रयत्नतः॥ 1-43-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूत उवाच [सौतिरुवाच]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स चिन्तयामास तदा मायायोगेन पार्थिवः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मया वञ्चयितव्योऽसौ क उपायो भवेदिति॥ 1-43-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततस्तापसरूपेण प्राहिणोत्स भुजङ्गमान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फलदर्भोदकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः॥ 1-43-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गच्छध्वं यूयमव्यग्रा राजानं कार्यवत्तया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फलपुष्पोदकं नाम प्रतिग्राहयितुं नृपम्॥ 1-43-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते तक्षकसमादिष्टास्तथा चक्रुर्भुजङ्गमाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपनिन्युस्तथा राज्ञे दर्भानापः फलानि च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तच्च सर्वं स राजेन्द्रः प्रतिजग्राह वीर्यवान्॥ 1-43-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृत्वा तेषां च कार्याणि गम्यतामित्युवाच तान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गतेषु तेषु नागेषु तापसच्छद्मरूपिषु॥ 1-43-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमात्यान्सुहृदश्चैव प्रोवाच स नराधिपः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भक्षयन्तु भवन्तो वै स्वादूनीमानि सर्वशः॥ 1-43-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तापसैरुपनीतानि फलानि सहिता मया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो राजा ससचिवः फलान्यादातुमैच्छत॥ 1-43-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विधिना सम्प्रयुक्तो वै ऋषिवाक्येन तेन तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्मिन्नेव पले नागस्तमेवाभक्षयत्स्वयम्॥ 1-43-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो भक्षयतस्तस्य फलात्कृमिरभूदणुः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ह्रस्वकः कृष्णनयनस्ताम्रवर्णोऽथ शौनक॥ 1-43-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तं गृह्य्नृपश्रेष्ठः सचिवानिदमब्रवीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम्॥ 1-43-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्यवागस्तु स मुनिः कृमिर्मां दशतामयम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षको नाम भूत्वा वै तथा परिहृतं भवेत्॥ 1-43-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ते चैनमन्ववर्तन्त मन्त्रिणः कालचोदिताः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संनिवेश्य ह॥ 1-43-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृमिकं प्राहसत्तूर्णं मुमूर्षुर्नष्टचेतनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रहसन्नेव भोगेन तक्षकेण त्ववेष्ट्यत॥ 1-43-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मात्फलाद्विनिष्क्रम्य [यत्तद्] तदा राज्ञे निवेदितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेष्टयित्वा च वेगेन विनद्य च महास्वनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अदशत्पृथिवीपालं तक्षकः पन्नगेश्वरः॥ 1-43-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि तक्षकदंशे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 43 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>P16459</name></author>
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