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	<title>Adiparva Adhyaya 42 (आदिपर्वणि अध्यायः ४२) - Revision history</title>
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	<updated>2026-04-22T09:01:07Z</updated>
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		<title>P16459: new pg</title>
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		<updated>2019-10-16T11:42:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;new pg&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;शृङ्ग्युवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्येतत्साहसं तात यदि वा दुष्कृतं कृतम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रियं वाप्यप्रियं वा ते वागुक्ता न मृषा भवेत्॥ 1-42-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नैवान्यथेदं भविता पितरेष ब्रवीमि ते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाहं मृषा ब्रवीम्ये[वं]व स्वैरेष्वपि कुतः शपन्॥ 1-42-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शमीक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जानाम्युग्रप्रभावं त्वां तात सत्यगिरं तथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नानृतं चोक्तपूर्वं ते नैतन्मिथ्या भविष्यति॥ 1-42-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पित्रा पुत्रो वयःस्थोऽपि सततं वाच्य एव तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा स्याद्गुणसंयुक्तः प्राप्नुयाच्च महद्यशः॥ 1-42-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं पुनर्बाल एव त्वं तपसा भावितः सदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्धते च प्रभवतां कोपोऽतीव महात्मनाम्॥ 1-42-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽहं पश्यामि वक्तव्यं त्वयि धर्मभृतां वर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुत्रत्वं बालतां चैव त[वावेक्ष्य च]दावैक्ष्यैव साहसम्॥ 1-42-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चर क्रोधमिमं हृ[ह]त्वा नैवं धर्मं प्रहास्यसि॥ 1-42-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रोधो हि धर्मं हरति यतीनां दुःखसंचितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते॥ 1-42-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शम एव यतीनां हि क्षमिणां सिद्धिकारकः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम्॥ 1-42-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्माच्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षमया प्राप्स्यसे लोकान्ब्रह्मणः समनन्तरान्॥ 1-42-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मया तु शममास्थाय यच्छक्यं कर्तुमद्य वै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्करिष्याम्यहं तात प्रेषयिष्ये नृपाय वै॥ 1-42-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मम पुत्रेण शप्तोऽसि बाले[न कृश]नाऽकृतबुद्धिना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ममेमां धर्षणां त्वत्तः प्रेक्ष्य राजन्नमर्षिणा॥ 1-42-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूत उवाच [सौतिरुवाच]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमादिश्य शिष्यं स प्रेषयामास सुव्रतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प[रि]रीक्षिते नृपतये दयापन्नो महातपाः॥ 1-42-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संदिश्य कुशलप्रश्नं कार्यवृत्तान्तमेव च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं समाहितम्॥ 1-42-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽभिगम्य ततः शीघ्रं नरेन्द्रं कुरुवर्धनम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवेश भवनं राज्ञः पूर्वं द्वाःस्थैर्निवेदितः॥ 1-42-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूजितस्तु नरेन्द्रेण द्विजो गौरमुखस्तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचख्यौ च परिश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शमीक वचनं घोरं यथोक्तं मन्त्रिसन्निधौ॥ 1-42-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गौरमुख उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शमीको नाम राजेन्द्र विषये वर्तते [वर्तते विषये] तव।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषिः परमधर्मात्मा दान्तः शान्तो महातपाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य त्वया नरव्याघ्र सर्पः प्राणैर्वियोजितः॥ 1-42-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवसक्तो धनुष्कोट्या स्कन्धे मौनान्वितस्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षान्तवांस्तव तत्कर्म पुत्रस्तस्य च न [न च]क्षमे॥ 1-42-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेन शप्तोऽसि राजेन्द्र पितुरज्ञातमद्य वै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षकः सप्तरात्रेण मृत्युस्तव भविष्यति॥ 1-42-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्र रक्षां कुरुष्वेति पुनः पुनरथाब्रवीत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदन्यथा न शक्यं च कर्तुं केनचिदप्युत॥ 1-42-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि शक्नोति तं यन्तुं पुत्रं कोपसमन्वितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽहं प्रेषितस्तेन तव राजन्हितार्थिना॥ 1-42-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूत उवाच [सौतिरुवाच]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रुत्वा वचो घोरं स राजा कुरुनन्दनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्यतप्यत तत्पापं कृत्वा राजा महातपाः॥ 1-42-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं च मौनव्रतं श्रुत्वा वने मुनिवरं तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूय एवाभवद्राजा शोकसंतप्तमानसः॥ 1-42-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुक्रोशात्मतां तस्य शमीकस्यावधार्य च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्यतप्यत भूयोऽपि कृत्वा तत्किल्बिषं मुनेः॥ 1-42-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि मृत्युं तथा राजा श्रुत्वा वै सोऽन्वतप्यत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशोचदमरप्रख्यो यथा कृत्वेह कर्म तत्॥ 1-42-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततस्तं प्रेषयामास राजा गौरमुखं तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूयः प्रसादं भगवान्करोत्विह ममेति वै॥ 1-42-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुत्वा तद्वचनं राज्ञो मुनिर्गौरमुखस्तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमनुज्ञाप्य वेगेन प्रजगाश्रमं गुरोः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्मिंश्च गतमात्रेऽथ राजा गौरमुखे तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्रिभिर्मन्त्रयामास सह संविग्नमानसः॥ 1-42-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्मन्त्र्य मन्त्रिभिश्चैव स तथा मन्त्रतत्त्ववित्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रासादं कारयामास एकस्तम्भं सुरक्षितम्॥ 1-42-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रक्षां च विदधे तत्र भिषजश्चौषधानि च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्राह्मणान्मन्त्रसिद्धांश्च सर्वतो वै न्ययोजयत्॥ 1-42-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजकार्याणि तत्रस्थः सर्वाण्येवाकरोच्च सः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्रिभिः सह धर्मज्ञः समन्तात्परिरक्षितः॥ 1-42-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न चैनं कश्चिदारूढं लभते राजसत्तमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वातोऽपि निश्चरंस्तत्र प्रवेशे विनिवार्यते॥ 1-42-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राप्ते च दिवसे तस्मिन्सप्तमे द्विजसत्तमः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काश्यपोऽभ्यागमद्विद्वांस्तं राजानं चिकित्सितुम्॥ 1-42-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रुतं हि तेन तदभूद्यथा तं राजसत्तमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षकः पन्नगश्रेष्ठो नेष्यते यमसादनम्॥ 1-42-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण करिष्येऽहमपज्वरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तत्र मेऽर्थश्च धर्मश्च भवितेति विचिन्तयन्॥ 1-42-34&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं ददर्श स नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं पथि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गच्छन्तमेकमनसं द्विजो भूत्वा वयोऽतिगः॥ 1-42-35&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमब्रवीत्पन्नगेन्द्रः काश्यपं मुनिपुङ्गवम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्यं चिकीर्षति॥ 1-42-36&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काश्यप उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नृपं कुरुकुलोत्पन्नं प[रि]रीक्षितमरिन्दमम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षकः पन्नगश्रेष्ठस्तेजसाद्य प्रधक्ष्यति॥ 1-42-37&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण तेनाग्निसमतेजसा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाण्डवानां कुलकरं राजानममितौजसम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गच्छामि त्वरितं सौम्य सद्यः कर्तुमपज्वरम्॥ 1-42-38&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहं स तक्षको ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवर्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम्॥ 1-42-39&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काश्यप उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहं तं नृपतिं गत्वा त्वया दष्टमपज्वरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
करिष्यामीति मे बुद्धिर्विद्याबलसमन्वितः॥ 1-42-40&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि काश्यपागमने द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 42 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>P16459</name></author>
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