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	<title>Adiparva Adhyaya 40 (आदिपर्वणि अध्यायः ४०) - Revision history</title>
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	<updated>2026-05-05T23:44:15Z</updated>
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		<title>P16459: new pg</title>
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		<updated>2019-10-16T11:38:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;new pg&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;शौनक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जरत्कारुरिति ख्यातो यस्त्वया सूतनन्दन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इच्छामि तदहं श्रोतुं ऋषेस्तस्य महात्मनः॥ 1-40-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किं कारणं जरत्कारोर्नामैतत्प्रथितं भुवि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जरत्कारुनिरुक्तिं त्वं यथावद्वक्तुमर्हसि॥ 1-40-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जरेति क्षयमाहुर्वै दारुणं कारुसंज्ञितम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शरीरं कारु तस्यासीत्तत्स धीमाञ्छनैः शनैः॥ 1-40-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षपयामास तीव्रेण तपसेत्यत उच्यते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जरत्कारुरिति ब्रह्मन्वासुकेर्भगिनी तथा॥ 1-40-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा शौनकः प्राहसत्तदा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उग्रश्रवसमामन्त्र्य उपपन्नमिति ब्रुवन्॥ 1-40-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शौनक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उक्तं नाम यथापूर्वं सर्वं तच्छ्रुतवानहम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा तु जातो ह्यास्तीक एतदिच्छामि वेदितुम्॥ 1-40-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सौतिः प्रोवाच शास्त्रतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संदिश्य पन्नगान्सर्वान्वासुकिः सुसमाहितः॥ 1-40-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृषिं प्रति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथ कालस्य महतः स मुनिः संशितव्रतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपस्यभिरतो धीमान्स दारान्नाभ्यकाङ्क्षत॥ 1-40-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तूर्ध्वरेतास्तपसि प्रसक्तः स्वाध्यायवान्वीतभयः कृतात्मा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चचार सर्वां पृथिवीं महात्मा न चापि दारान्मनसाध्यकाङ्क्षत॥ 1-40-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽपरस्मिन्सम्प्राप्ते काले कस्मिंश्चिदेव तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिक्षिन्नाम राजासीद्ब्रह्मन्कौरववंशजः॥ 1-40-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा पाण्डुर्महाबाहुर्धनुर्धरवरो युधि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा विख्यातवाँल्लोके परीक्षिदभिमन्युजः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बभूव मृगयाशीलः पुरास्य प्रपितामहः॥ 1-40-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृगान्विध्यन्वराहांश्च तरक्षून्महिषांस्तथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्यांश्च विविधान्वन्यांश्चचार पृथिवीपतिः॥ 1-40-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा बाणेनानतपर्वणा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृष्ठतो धनुरादाय ससार गहने वने॥ 1-40-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथैव भगवान्रुद्रो विद्ध्वा यज्ञमृगं दिवि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्वगच्छद्धनुष्पाणिः पर्यन्वेष्टुमितस्ततः॥ 1-40-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि तेन मृगो विद्धो जीवन्गच्छति वै वने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्वरूपं तु तत्तूर्णं सोऽगात्स्वर्गगतिं प्रति॥ 1-40-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिक्षितो नरेन्द्रस्य विद्धो यन्नष्टवान्मृगः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूरं चापहृतस्तेन मृगेण स महीपतिः॥ 1-40-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिश्रान्तः पिपासार्त आससाद मुनिं वने।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गवां प्रचारेष्वासीनं वत्सानां मुखनिःसृतम्॥ 1-40-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूयिष्ठमुपयुञ्जानं फेनमापिबतां पयः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमभिद्रुत्य वेगेन स राजा संशितव्रतम्॥ 1-40-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपृच्छद्धनुरुद्यम्य तं मुनिं क्षुच्छ्रमान्वितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भो भो ब्रह्मन्नहं राजा परीक्षिदभिमन्युजः॥ 1-40-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मया विद्धो मृगो नष्टः कच्चित्तं दृष्टवानसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स मुनिस्तं तु नोवाच किञ्चिन्मौनव्रते स्थितः॥ 1-40-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तस्य स्कन्धे मृतं सर्पं क्रुद्धो राजा समा[स]सृजत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समुत्क्षिप्य धनुष्कोट्या स चैनं समुपैक्षत॥ 1-40-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न स किञ्चिदुवाचैनं शुभं वा यदि वाशुभम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स राजा क्रोधमुत्सृज्य व्यथितस्तं तथागतम्॥ 1-40-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृष्ट्वा जगाम नगरमृषिस्त्वासीत्तथैव सः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि तं राजशार्दूलं क्षमाशीलो महामुनिः॥ 1-40-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वधर्मनिरतं भूपं समाक्षिप्तोऽप्यधर्षयत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न हि तं राजशार्दूलस्तथा धर्मपरायणम्॥ 1-40-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जानाति भरतश्रेष्ठस्तत एनमधर्षयत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तरुणस्तस्य पुत्रोऽभूत्तिग्मतेजा महातपाः॥ 1-40-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शृङ्गी नाम महाक्रोधो दुष्प्रसादो महाव्रतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सीदरं [स देवं] परमासीनं सर्वभूतहिते रतम्॥ 1-40-26&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्माणमुपतस्थे वै काले काले सुसंयतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स तेन समनुज्ञातो ब्रह्मणा गृहमेयिवान्॥ 1-40-27&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सख्योक्तः क्रीडमानेन स तत्र हसता किल।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संरम्भात्कोपनोऽतीव विषकल्पो मुनेः सुतः॥ 1-40-28&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद्दिश्य पितरं तस्य यच्छ्रुत्वा रोषमाहरत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋषिपुत्रेण न[ध]र्मार्थे कृशेन द्विजसत्तम॥ 1-40-29&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृश उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेजस्विनस्तव पिता तथैव च तपस्विनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शवं स्कन्धेन वहति मा शृङ्गिन्गर्वितो भव॥ 1-40-30&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्याहरत्स्वृषिपुत्रेषु मा स्म कॢञ्चिद्वचो वद।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्मद्विधेषु सिद्धेषु ब्रह्मवित्सु तपस्विषु॥ 1-40-31&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्व ते पुरुषमानित्वं क्व ते वाचस्तथाविधाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दर्पजाः पितरं द्र[ष्टा]ष्ट्वा यस्त्वं शवधरं तथा॥ 1-40-32&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पित्रा च तव तत्कर्म नानुरूपमिवात्मनः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतं मुनिजनश्रेष्ठ येनाहं भृशदुःखितः॥ 1-40-33&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परिक्षिदुपाख्याने चत्वारिंशोऽध्यायः॥ 40 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>P16459</name></author>
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