<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="en-GB">
	<id>http://dharmawiki.org/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=Adiparva_Adhyaya_36_%28%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9%E0%A5%AC%29</id>
	<title>Adiparva Adhyaya 36 (आदिपर्वणि अध्यायः ३६) - Revision history</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="http://dharmawiki.org/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=Adiparva_Adhyaya_36_%28%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9%E0%A5%AC%29"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="http://dharmawiki.org/index.php?title=Adiparva_Adhyaya_36_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9%E0%A5%AC)&amp;action=history"/>
	<updated>2026-05-05T23:43:04Z</updated>
	<subtitle>Revision history for this page on the wiki</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.35.4</generator>
	<entry>
		<id>http://dharmawiki.org/index.php?title=Adiparva_Adhyaya_36_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9%E0%A5%AC)&amp;diff=120705&amp;oldid=prev</id>
		<title>P16459: new pg</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://dharmawiki.org/index.php?title=Adiparva_Adhyaya_36_(%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A3%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9%E0%A5%AC)&amp;diff=120705&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2019-10-16T11:32:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;new pg&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;New page&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;शौनक उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आख्याता भुजगास्तात वीर्यवन्तो दुरासदाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शापं तं तेऽभिविज्ञाय कृतवन्तः किमुत्तरम्॥ 1-36-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूत उवाच [सौतिरुवाच]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषां तु भगवाञ्च्छेषः कद्रूं त्यक्त्वा महायशाः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उग्रं तपः समातस्थे वायुभक्षो यतव्रतः॥ 1-36-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गन्धमादनमासाद्य बदर्यां च तपोरतः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोकर्णे पुष्करारण्ये तथा हिमवतस्तटे॥ 1-36-3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषु तेषु च पुण्येषु तीर्थष्वायतनेषु च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकान्तशीलो नियतः सततं विजितेन्द्रियः॥ 1-36-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तप्यमानं तपो घोरं तं ददर्श पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संशुष्कमांसत्वक्स्नायुं जटाचीरधरं मुनिम्॥ 1-36-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमब्रवीत्सत्यधृतिं तप्यमानं पितामहः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किमिदं कुरुषे शेष प्रजानां स्वस्ति वै कुरु॥ 1-36-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं हि तीव्रेण तपसा प्रजास्तापयसेऽनघ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रूहि कामं च मे शेष यस्ते हृदि व्यवस्थितः॥ 1-36-7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शेष उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोदर्या मम सर्वे हि भ्रातरो मन्दचेतसः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सह तैर्नोत्सहे वस्तुं तद्भवाननुमन्यताम्॥ 1-36-8&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभ्यसूयन्ति सततं परस्परममित्रवत्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ततोऽहं तप आतिष्ठं नैतान्पश्येयमित्युत॥ 1-36-9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न मर्षयन्ति ससुतां सततं विनतां च ते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्माकं चापरो भ्राता वैनतेयोऽन्तरिक्षगः॥ 1-36-10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तं च द्विषन्ति सततं स चापि बलवत्तरः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वरप्रदानात्स पितुः कश्यपस्य महात्मनः॥ 1-36-11&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोऽहं तपः समास्थाय मोक्ष्यामीदं कलेवरम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथं मे प्रेत्यभावेऽपि न तैः स्यात्सह संगमः॥ 1-36-12&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तमेवंवादिनं शेषं पितामह उवाच ह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जानामि शेष सर्वेषां भ्रातॄणां ते विचेष्टितम्॥ 1-36-13&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मातुश्चाप्यपराधाद्वै भ्रातॄणां ते महद्भयम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतोऽत्र परिहारश्च पूर्वमेव भुजङ्गम॥ 1-36-14&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रातॄणां तव सर्वेषां न शोकं कर्तुमर्हसि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शापादस्मान्महाघोरादुक्तान्मात्रा महाबल।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वृणीष्व च वरं मत्तः शेष यत्तेऽभिकाङ्क्षितम्॥ 1-36-15&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दास्यामि हि वरं तेऽद्य प्रीतिर्मे परमा त्वयि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिष्ट्या बुद्धिश्च ते धर्मे निविष्टा पन्नगोत्तम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूयो भूयश्च ते बुद्धिर्धर्मे भवतु सुस्थिरा॥ 1-36-16&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शेष उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष एव वरो देव काङ्क्षितो मे पितामह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मे मे रमतां बुद्धिः शमे तपसि चेश्वर॥ 1-36-17&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मोवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रीतोऽस्म्यनेन ते शेष दमेन प्रश्रयोण च [च शमेन च]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वया त्विदं वचः कार्यं मन्नियोगात्प्रजाहितम्॥ 1-36-18&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमां महीं शैलवनोपपन्नां ससागरग्रामविहारपत्तनाम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्वं शेष सम्यक्चलितां यथावत्संगृह्य तिष्ठस्व यथाचला स्यात्॥ 1-36-19&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शेष उवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथाह देवो वरदः प्रजापतिर्महीपतिर्भूतपतिर्जगत्पतिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा महीं धारयितास्मि निश्चलां प्रयच्छतां मे शिरसि प्रजापते॥ 1-36-20&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मोवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधो महीं गच्छ भुजङ्गमोत्तम स्वयं तवैषा विवरं प्रदास्यति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इमां धरां धारयता त्वया हि मे महत्प्रियं शेष कृतं भविष्यति॥ 1-36-21&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथैव कृत्वा विवरं प्रविश्य स प्रभुर्भुवो भुजगवराग्रजः स्थितः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिभर्ति देवीं शिरसा महीमिमां समुद्रनेमिं परिगृह्य सर्वतः॥ 1-36-22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मोवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शेषोऽसि नागोत्तम धर्मदेवो महीमिमां धारयसे यदेकः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनन्तभोगैः परिगृह्य सर्वां यथाहमेवं बलभिद्यथा वा॥ 1-36-23&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौतिरुवाच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधोभूमौ वसत्येवं नागोऽनन्तः प्रतापवान्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धारयन्वसुधामेकः शासनाद्ब्रह्मणो विभुः॥ 1-36-24&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुपर्णं च सहायं वै भगवानमरोत्तमः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रादादनन्ताय तदा वैनतेयं पितामहः॥ 1-36-25&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(अनन्ते च प्रयाते तु वासुकिः सुमहाबलः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभ्यषिच्यत नागैस्तु दैवतैरिव वासवः॥)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि शेषवृत्तकथने षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ 36 ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>P16459</name></author>
	</entry>
</feed>