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	<title>Dharmawiki - User contributions [en-gb]</title>
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	<updated>2026-05-12T22:40:43Z</updated>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Jeevan_Ka_Pratiman-Part_1_(%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97_%E0%A5%A7)&amp;diff=122217</id>
		<title>Jeevan Ka Pratiman-Part 1 (जीवन का प्रतिमान-भाग १)</title>
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		<updated>2020-01-05T00:34:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: /* भारतीय तत्वज्ञान और जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्र */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
== '''जीवन का प्रतिमान''' ==&lt;br /&gt;
* जीते तो सभी हैं। लेकिन हर समाज का जीने का तरीका होता है। उस समाज की समझ के अनुसार यह तरीका अन्य समाजों से श्रेष्ठ जीने का तरीका होता है। इस जीवन जीने के तरीके को '''जीवनशैली''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जीवनशैली का आधार उस समाज की जीवन जीने के संबंध में कुछ मान्यताएं होती हैं। इन मान्यताओं को उस समाज की '''जीवनदृष्टि''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
* यह मान्यताएं या जीवनदृष्टि और जीवनशैली उस समाज की '''विश्वदृष्टि''' पर आधारित होते हैं। विश्वदृष्टि का अर्थ है उस समाज की विश्व या चर-अचर सृष्टि के निर्माण से संबंधित मान्यताएं। इन्हीं को उस समाज का तत्वज्ञान भी कहते हैं। यह मान्यताएं या विश्व दृष्टि ही व्यक्ति के अन्य मानवों से संबंध और व्यक्ति के और अन्यों के चर-अचर सृष्टि के साथ संबंध तय करती है। &lt;br /&gt;
* अपनी विश्व दृष्टि और उस पर आधारित जीवनदृष्टि के अनुसार समाज जीवन चले इस लिये वह समाज कुछ व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। ये व्यवस्थाएं समान मान्यताओं को आधार मान कर निर्माण की जातीं हैं। इस लिये ये व्यवस्थाएं एक दूसरे की पूरक भी होतीं हैं और मददरूप भी होतीं हैं। इस व्यवस्था समूह को ही उस समाज की विश्वदृष्टि यानी जीवन दृष्टि और जीवनशैली के साथ मिला कर उस समाज के '''जीवन का प्रतिमान''' कहते हैं। अंग्रेजी में इसे पॅरेडिम (paradigm) कहते हैं। &lt;br /&gt;
वर्तमान शिक्षा वर्तमान अभारतीय जीवन के प्रतिमान का ही एक हिस्सा है। इस शिक्षा का जिन पर गहरा प्रभाव है उन्हें लगता है कि मानव जाति अष्म या पाषाण युग से निरंतर श्रेष्ठ बन रही है। वर्तमान मानव और मानव जाति से भविष्य की मानव और मानव जाति अधिक श्रेष्ठ होंगे। किन्तु जो इस शिक्षा से प्रभावित नहीं हुए हैं, या जो भारतीय काल गणना की समझ रखते हैं उन्हें अपने अनुभवों से भी और भारतीय शास्त्रों के कथन के अनुसार भी लगता है कि मानव जाति का निरंतर ह्रास हो रहा है। सत्ययुग का मानव और मानव जाति अत्यंत श्रेष्ठ थे। काम और मोह से मुक्त थे। त्रेता युग में सत्ययुग के मानव का ह्रास हुआ। द्वापर में उस से भी अधिक ह्रास हुआ। कलियुग में द्वापर से भी स्थिति और बिगडी और निरंतर बिगड रही है। किसे क्या लगता है इस का संबंध वह मानव या मानव समाज, किस प्रतिमान को ठीक मानता है इस से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में जयचंद को तो देशद्रोही माना जाता है लेकिन विभीषण को नहीं। इस का संबंध जीवन के भारतीय प्रतिमान को ठीक मानने से है। सिकंदर, चंगेज खान आदि जैसे लोग जो अपने कौशल की विधा के क्षेत्र में अत्यंत श्रेष्ठ थे उन्हें, जिन में ये जन्मे थे वे अभारतीय समाज अपने महापुरूष मानते हैं। अनुकरणीय मानते हैं। किन्तु भारतीय दृष्टि में बडप्पन का या अनुकरणीयता का प्राथमिक निकष उस का चारित्र्य माना जाता है। बुध्दिमत्ता, पराक्रम, कौशल आदि दूसरे और गौण स्थान पर आते हैं। रावण महा पराक्रमी था। बुध्दिमान था। राजनीति विशेषज्ञ था। किन्तु हम कभी उसे बडा या अनुकरणीय नहीं मानते। हम किसी बच्चे को 'तुम रावण जैसे महान बनो' ऐसा आशिर्वाद नहीं देते। इस का कारण वह अन्य अनेक गुण होने पर भी हीन चरित्र का था, यह है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक गणित के प्रस्तोता जगद्गुरू शंकराचार्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ कहते थे,'भारतीय और अभारतीय यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं'। (दीज आर टू डिफ्रंट एव्हरीथिंग्ज)। उन के इस कथन का संदर्भ जीवन जीने के तत्वज्ञान, व्यवहार और व्यवस्था समूह से बने भारतीय और अभारतीय प्रतिमानों से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगे अब हम तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि, जीवनशैली (व्यवहार), और व्यवस्था समूहों से बनने वाले प्रतिमानों को समझने का प्रयास करेंगे। देशिक शास्त्र में इसी तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि को उस समाज का 'स्वभाव' या 'चिति' कहा है। इस जीवनदृष्टि के अनुरूप वह समाज सर्व मान्य ऐसे कुछ व्यवहार सूत्र तय करता है और उन के अनुसार प्रत्यक्ष व्यवहार करता है। ऐसा व्यवहार सर्व सामान्य मनुष्य भी कर सके इस लिये वह व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। समाज के इस प्रकार अपनी जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करने और  व्यवस्था समूह निर्माण कर आगे बढने को ही देशिक शास्त्र में उस समाज के विराट का जागरण होता है ऐसा कहा गया है। चिति और विराट मिलाकर उस समाज के जीवन का प्रतिमान बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व प्रथम हम अभारतीय विश्व दृष्टि (वर्ल्ड व्ह्यू) या तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि और उस के अनुसार निर्माण किये व्यवहार सूत्र (जीवनशैली) और आगे इन के लिये उपयुक्त व्यवस्था समूह को भी समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अधार्मिक (अभारतीय) तत्वज्ञान, जीवनदृष्टि और इन पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
वर्तमान विश्व में प्रमुख रूप से जीवन के दो प्रतिमान अस्तित्व में हैं। एक है '''भारतीय प्रतिमान'''। यह अभी सुप्त अवस्था में है। जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है।  दूसरा है '''यूरो-अमरिकी प्रतिमान'''। यहूदी, ईसाई और मुस्लिम समाज इस दूसरे प्रतिमान को मानने वाले हैं। इस प्रतिमान ने भारतीय समाज के साथ ही विश्व के अन्य सभी समाजों को गहराई से प्रभावित किया है। भारतीय समाज छोड कर अन्य सभी समाजों ने इसे सर्वार्थ से या तो अपना लिया है या तेजी से अपना रहे हैं। केवल भारतीय समाज ही अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर पुन: जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है। इस यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मानने वाले दो तबके हैं। यूरो-अमरिकी मजहबी दृष्टि के अनुसार विश्व के निर्माण की मान्यता एक जैसी ही है। &lt;br /&gt;
* एक तबका है ईसाईयत के तत्वज्ञान को आधार मानने वाला। इन का तत्वज्ञान निम्न है: येहोवा/गॉड/ अल्ला ने पाँच दिन सृष्टि का निर्माण किया और छठे दिन मानव का निर्माण कर मानव से कहा कि ' यह चर-अचर सृष्टि तुम्हारे उपभोग के लिये है'। यूरो अमरिकी समाज पर फ्रांसिस बेकन और रेने देकार्ते इन दो फिलॉसॉफरों की फिलॉसॉफिी का गहरा प्रभाव है। इन का तत्वज्ञान कहता है कि प्रकृति मानव की दासी है। इसे कस कर अपनी जकड में रखना चाहिये। मानव जम कर इस का शोषण कर सके इसी लिये इस का निर्माण हुआ है। इस लिये प्रकृतिे का मानव ने जम कर (टू द हिल्ट) शोषण करना चाहिये।&lt;br /&gt;
* और दूसरा है यूरो-अमरिकी और उन का अनुसरण करने वाले दार्शनिकों का और साईंटिस्टों का। वैसे तो आधुनिक साईंस ने ईसाईयत के कई गंभीर सिध्दांतों की धज्जियाँ उडा दी है, लेकिन फिर भी मोटा-मोटी दोनों तबकों का तत्वज्ञान एक ही है। इस लिये जीवन का प्रतिमान भी एक ही है।  यूरो-अमरिकी साईंटिस्टों और उन का अनुसरण करने वाले भारतीय समेत विश्व के सभी साईंटिस्टों की विश्वदृष्टि का आधार '''डार्विन की 'विकास वाद' और मिलर की 'जड से रासायनिक प्रक्रिया से जीव निर्माण'''' की परिकल्पनाएं ही हैं। मानव इन रासायनिक प्रक्रियाओं के पुलिंदों में सर्वश्रेष्ठ है। इस लिये इसे अपने स्वार्थ के लिये अन्य रासायनिक प्रक्रियाएं नष्ट करने का पूरा अधिकार है।&lt;br /&gt;
मजहब या रिलीजन, फिलॉऑफरों की फिलॉसॉफि और साईंटिस्टों के ऐसे तीनों के प्रभाव के कारण जो अभारतीय जीवन दृष्टि बनीं है उस के तीन मुख्य पहलू हैं:&lt;br /&gt;
#व्यक्तिवादिता : सारी सृष्टि केवल मेरे उपभोग के लिये बनीं है।&lt;br /&gt;
# जडवादिता : सृष्टि में सब जड ही है। चेतनावान कुछ भी नहीं है।&lt;br /&gt;
# इहवादिता : जो कुछ है यही जन्म है। इस से नहीं तो पहले कुछ था और ना ही आगे कुछ है।  &lt;br /&gt;
इस जीवनदृष्टि के अनुसार जो व्यवहार सूत्र बने वे निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# अनिर्बाध व्यक्तिस्वातंत्र्य (अनलिमिटेड इंडिव्हिज्युल लिबर्टी - unlimited individual liberty)।&lt;br /&gt;
# बलवान ही जीने का अधिकारी (सर्वायवल ऑफ द फिटेस्ट - survival of the fittest)।&lt;br /&gt;
# दुर्बल का शोषण (एक्स्प्लॉयटेशन ऑफ द वीक - exploitation of the weak)।&lt;br /&gt;
# सारी चराचर सृष्टि मेरे अनिर्बाध उपभोग के लिये बनी है। इस पर मेरा अधिकार है। इस के प्रति मेरा कोई कर्तव्य नहीं है। (राईट्स् बट नो डयूटीज- Rights but no duties)।&lt;br /&gt;
# अन्य मानव भी सृष्टि का उपभोग अपना अनिर्बाध अधिकार मानते हैं। इस लिये मुझे अपने उपभोग (जीने) के लिये अन्यों से संघर्ष करना होगा। (फाईट फॉर सर्व्हायव्हल -fight for survival)।&lt;br /&gt;
# उपभोग के लिये मुझे केवल यही जीवन मिला है। इस जीवन से पहले मै नहीं था और इस जीवन के समाप्त होने के बाद भी मै नहीं रहूंग़ा। इस लिये जितना उपभोग कर सकूँ, कर लूँ। (कंझ्यूमेरिझम् - consumerism)।&lt;br /&gt;
# इहवादिता (धिस इज द ओन्ली लाईफ। देयर वॉज नथिंग बिफोर एँड देयर शॅल बी नथिंग बियाँड धिस लाईफ - This is the only life. There was nothing before and there shall be nothing beyond this life)।&lt;br /&gt;
# मेरी रासायनिक प्रक्रिया (जीवन) अच्छी चले (स्वार्थ) यह महत्वपूर्ण है। इस लिये किसी अन्य रासायनिक प्रक्रिया में बाधा आती है (परपीडा होती है) तो भले आये। अन्य कोई रासायनिक प्रक्रिया बंद होती है (जीवन नष्ट होता है) तो भले हो जाये।&lt;br /&gt;
# चैतन्य को नकारने के कारण सृष्टि के विभिन्न अस्तित्वों में स्थित अंतर्निहित एकात्मता को अमान्य करने के कारण टुकडों में विचार करने की सोच। (पीसमील एॅप्रोच - piecemeal approach) ।&lt;br /&gt;
# सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों का आधार स्वार्थ ही है। सामाजिक संबंधों का आधार इसी लिये 'काँट्रॅक्ट' या करार या समझौता या एॅग्रीमेंट होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
# &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धार्मिक (भारतीय) तत्वज्ञान और जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
भारतीय मान्यता के अनुसार कण कण, चर अचर सब परमात्मा के ही रूप हैं : &amp;lt;blockquote&amp;gt;'''एकाकी न रमते'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;', '&amp;lt;nowiki/&amp;gt;'''सो कामयत्'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;',  ''''एकोऽहं बहुस्याम:'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;' ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सारी सृष्टि यह उस परमात्त्व तत्व का ही विस्तार मात्र है। इस लिये सृष्टि के सारे घटक एक दूसरे से 'आत्मीयता' के भाव से जुडे हैं। समाज निर्माण और परस्पर सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के बारे में श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भगवद्गीता, 3.10 एवं 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''अनेन प्रसविश्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक ॥ 3.10 ॥'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ ( अन्यों के हित के काम) के साथ प्रजा को निर्माण किया और कहा कि परस्पर हित साधते हुए उत्कर्ष (प्रगति) करो। यह है परस्पर सामाजिक संबंधों का आधार। आगे कहा है&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ ॥ 3.11 ॥'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - देवताओं ( वायू, वरुण, अग्नि, पृथ्वी आदि यानी पर्यावरण) का पोषण करते हुए नि:स्वार्थ भाव से परस्पर हित साधते हुए परम कल्याण को प्राप्त करो। यह है पर्यावरण से संबंधों का आधार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त तत्वज्ञान पर आधारित भारतीय जीवन दृष्टि के सूत्र निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# सारी सृष्टि आत्म तत्व का ही विस्तार है। मनुष्य परमात्मा का ही सर्वश्रेष्ठ रूप है। एकात्मता सृष्टि के सभी व्यवहारों का आधारभूत सिध्दांत है। परस्पर संबंधों का आधार पारिवारिक भावना है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि चेतन से बनीं है जड से नहीं।&lt;br /&gt;
# जीवन स्थल (वर्तमान चर-अचर सृष्टि को प्रभावित करने वाला और उस से प्रभावित होने वाला) और काल (सृष्टि के निर्माण से लेकर सृष्टि के अंत तक) के संदर्भ में अखंड है। पुनर्जन्म ही काल के संदर्भ में अखंडता है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि की रचना परस्पर पूरक और चक्रीय है।&lt;br /&gt;
# कर्म ही मानव जीवन को नियमन करते हैं। कर्मसिध्दांत इसे समझने का साधन है। अच्छे (परोपकार या पुण्य) कर्म जीवन को अच्छा और बुरे (परपीडा या पाप) कर्म जीवन को बुरा बनाते हैं।&lt;br /&gt;
# मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष है। सामाजिक जीवन का लक्ष्य 'स्वतंत्रता' है। उपर्युक्त जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्रों की चर्चा हमने [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यहाँ]] की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== यूरो-अमरिकी व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
यूरो-अमरिकी समाज ने अपनी विश्व दृष्टि ( वर्ल्ड व्हू world view) के अनुसार जीवन जीने के जो व्यवहार सूत्र बनाए उन्हें व्यवहार में लाना संभव हो इस लिये व्यवस्थाओं का एक समूह भी निर्माण किया। ये व्यवस्थाएं एक ओर तो उन की जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करना संभव बनातीं हैं तो दूसरी ओर प्रतिमान की अन्य व्यवस्थाओं को भी पुष्ट बनातीं हैं। इन सभी का आधार व्यक्तिवाद, इहवाद और जडवाद ही है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यवस्थाओं से दो प्रकार की आवश्यकता पूर्ण होती है।  &lt;br /&gt;
# पहली आवश्यकता यह होती है कि समाज के घटकों को समाज का तत्वज्ञान और व्यवहार सिखाना।  &lt;br /&gt;
# और दूसरी आवश्यकता होती है वह समाज अपने तत्वज्ञान और व्यवहार के अनुसार जी सके इस लिये। &lt;br /&gt;
'''यूरो अमरिकी प्रतिमान की सोच यह है कि समाज की सभी व्यवथाओं का स्वरूप तय करना और व्यवस्थाओं का निर्माण करना यह शासन का कर्तव्य भी है और जिम्मेदारी भी है।''' इस मान्यता का शासन के स्वरूप से, यानी शासन किंग का है या लोकतंत्रात्मक है इस से कोई संबंध नहीं है। इस यूरो अमरिकी प्रतिमान में '''शासक सर्वसत्ताधीश''' होता है। सर्वोपरि होता है। शासन अपनी योग्यता और क्षमताओं के आधार पर समाज को निर्देशित, नियंत्रित और नियमित करता है। व्यक्तिवादी समाज में इस व्यवस्था समूह को बदलना लगभग असंभव होता है। शासन बदल जाता है किन्तु उसका 'स्व'रूप या स्वभाव नहीं बदलता। इसी लिये किंग के काल में भी और लोकतंत्र के काल में भी शासन सर्वोपरि ही रहा। इस व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न स्वरूप का होगा: &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+&lt;br /&gt;
! colspan=&amp;quot;5&amp;quot; |शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|प्रशासन&lt;br /&gt;
|सुरक्षा&lt;br /&gt;
|अर्थ&lt;br /&gt;
|न्याय&lt;br /&gt;
|शिक्षा&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
प्रसिध्द भारतीय चिंतक और विद्वान डॉ. देवेन्द्र स्वरूप प्रतिमान का और शिक्षा व्यवस्था का संबंध विषद करते हैं&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ. देवेन्द्र स्वरूप, ' भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति का विकास' पृष्ठ 7&amp;lt;/ref&amp;gt;। 'शिक्षा प्रणाली के संबंध में विचार करने से पूर्व हमें यह विचार करना होगा कि हम राष्ट्र में कैसा मनुष्य बनाना चाहते हैं, उसकी जीवनशैली क्या होगी, उसका पारिवारिक और सामाजिक परिवेष कैसा होगा? अर्थात् राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रचना कैसी होगी? &lt;br /&gt;
इसी पृष्ठ पर देवेन्द्रस्वरूपजी लिखते हैं-  &lt;br /&gt;
 प्रारंभ में उन्होंने (अंग्रेजों ने) भारत की पुरानी राजस्व, न्याय, प्रशासन प्रणाली से ही काम चलाना चाहा और साथ ही अपने साम्राज्य के चिर स्थायित्व के लिये अंग्रेजी शिक्षा का आरोपण करने की कोशिश भी की; किन्तु ये कोशिशें बेकार गयीं। तब उन्होंने अनुभव किया कि शिक्षा प्रणाली का किसी देश की राजस्व, न्याय, प्रशासन और अर्थव्यवस्था से गहरा संबंध होता है।&lt;br /&gt;
ऐसा होने के कारण इन सभी व्यवस्थाओं का आधार उस समाज के जीवन के प्रतिमान की साझी जीवनदृष्टि और उस पर आधारित व्यवहार सूत्र होते हैं। इस कारण ''किसी प्रतिमान के व्यवस्था समूह में से केवल एक व्यवस्था को जो भिन्न जीवन दृष्टि पर आधारित है, बदलना संभव नहीं होता''। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
भारतीय प्रतिमान के व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न प्रकार का है। &lt;br /&gt;
ऐसा ढांचे का चित्र या ऐसे ढाँचे का विवरण भी अन्य किसी शास्त्रीय ग्रन्थ में से नहीं लिया गया है। यह तो लेखक ने अपनी समझ के अनुसार यह ढांचा कैसा हो सकता है उसकी रूपरेखा अपनी कल्पना से ही बनाई है। &lt;br /&gt;
[[File:Part 1 Last Chapter Table Bhartiya Jeevan Pratiman.jpg|center|thumb|969x969px|भारतीय व्यवस्था समूह]]&lt;br /&gt;
 भारत में कभी भी '''सामाजिक व्यवस्थाओं के स्वरूप को तय करने की जिम्मेदारी राजा या शासक की नहीं रही'''। धर्मसत्ता द्वारा प्रस्तुत '''व्यवस्थाओं को स्थापित करने की जिम्मेदारी राजा की या शासन की होती थी'''। रघुवंशम् में कालिदास इस की पुष्टि करते हैं। &lt;br /&gt;
राजा की या कभी गणतंत्रात्मक शासन रहा तब भी शासन की जिम्मेदारी धर्माचार्यों द्वारा निर्मित धर्मशास्त्र या समाजशास्त्र के अनुपालन करने की और करवाने की ही रही। धर्म का अनुपालन करने वाला समाज निर्माण करने और उसे धर्माचरणी बनाए रखने के लिये हमारे पूर्वजों ने एक व्यवस्था समूह निर्माण किया था।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक कारणों से ये व्यवस्थाएं दुर्बल हुईं। काल के प्रवाह में इन में कुछ दोष भी निर्माण हुए। लेकिन फिर भी यह व्यवस्था समूह अंग्रेज शासन भारत में स्थापित हुआ तब तक प्रत्यक्ष अस्तित्व में रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस व्यवस्था समूह की व्यवस्था के तीन पहलू थे। '''पोषक''' व्यवस्था, '''रक्षक''' व्यवस्था और '''प्रेरक''' व्यवस्था। इन में प्रेरक व्यवस्था तब ही ठीक से काम कर सकती है जब उस के साथ में पोषक और रक्षक व्यवस्था भी काम करती है। इस लिये समाज की सभी व्यवस्थाओं में यह तीनों पहलू विकेंद्रित स्वरूप में ढाले गये थे। प्रेरक यानी शिक्षा व्यवस्था का काम समाज को धर्माचरण सिखाने का था। भारतीय प्रतिमान में प्रेरक व्यवस्थाओं को अत्यंत श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी बनाना शिक्षा व्यवस्था का काम है। जो ५-१० प्रतिशत लोग इस प्रेरक व्यवस्था के प्रयासों के उपरांत भी अधर्माचरण करते थे, उन के लिये ही शासन व्यवस्था यानी दण्ड विधान की आवश्यकता होती है। यदि प्रेरक और पोषक व्यवस्थाओं के माध्यम से समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी नहीं बनाया गया तो रक्षक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर सकती। यूरो अमरिकी शिक्षा की दस पीढियाँ बीतने के बाद भी यदि अब भी काफी मात्रा में यूरोप या अमरिकी समाजों की तुलना में हम 'पारिवारिक भावना' को अभी तक बचा पाए हैं तो वह अभी भी अपना अस्तित्व बनाए रखने वाली समानान्तर '''शिक्षा व्यवस्था''', '''परिवार व्यवस्था''' और '''समाज व्यवस्था''' आदि के कारण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त ढाँचा भारतीय प्रतिमान की मोटी मोटी अभिव्यक्ति है।  &lt;br /&gt;
* इस में '''धर्म''' व्यवस्था सामाजिक नीति नियम अर्थात् धर्माचरण के व्यावहारिक सूत्र तय करने का और अधर्माचरण के व्यवहार के लिये दण्ड विधान बनाने का काम करती है। अर्थात् शास्त्रीय भाषा में '''श्रृति के आधार पर 'स्मृति' निर्माण करने का काम''' करती है। इस प्रकार प्रेरक, पोषक तथा निवारक/रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का मार्गदर्शन करती है।  &lt;br /&gt;
* इस मार्गदर्शन का माध्यम '''शिक्षा''' व्यवस्था होती है। इस लिये शिक्षा का या ज्ञानसत्ता का स्थान धर्मसत्ता से नीचे किन्तु शासन की अन्य सत्ताओं से ऊपर का होता है। ब्रह्मचर्य आश्रम, गुरूकुल या विद्याकेन्द्र और कुछ प्रमाण में परिवारों में भी वर्णानुसारी और जीवन के लिये उपयुक्त ऐसे सभी पहलुओं की शिक्षा दी जाती है।  &lt;br /&gt;
* लोग जब '''वर्ण''' के अनुसार व्यवहार करते हैं तब समाज '''सुसंस्कृत''' बनता है।  और जब लोग अपनी अपनी '''जाति''' के अनुसार व्यवसाय करते हैं समाज '''समृध्द''' बनता है।  &lt;br /&gt;
* '''रक्षक''' या निवारक व्यवस्थाएं समाज और व्यक्तियों की संस्कृति और समृध्दि की रक्षा के लिये होती हैं।  &lt;br /&gt;
* वर्ण और आश्रम यह व्यवस्थाएं समाज की रचना की व्यवस्थाएं हैं।   &lt;br /&gt;
* परिवार व्यवस्था श्रेष्ठ मानव को जन्म देकर उसे वर्णानुसार संस्कारित करने की व्यवस्था है। यह व्यवस्था पारिवारिक भावना के विकास की भी व्यवस्था है। यह समाज व्यवस्था का लघु-रूप है। सामाजिकता की शिक्षा की नींव डालना परिवार व्यवस्था का काम है। इस कारण इस में पोषक, प्रेरक और रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का समावेश होता है। इसी प्रकार से जन्म से लेकर मृत्यू पर्यंत तक मनुष्य की बढती और घटती क्षमताओं और योग्यताओं के समायोजन की भी व्यवस्था परिवार में होती है।  &lt;br /&gt;
* जाति व्यवस्था, परिवार और ग्रामकुल यह तीनों मिल कर '''अर्थ''' व्यवस्था यानी समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली व्यवस्था बनती है।  &lt;br /&gt;
* रक्षक व्यवस्था भी इन तीनों व्यवस्थाओं में और चौथे शासन व्यवस्था में विकेन्द्रित रूप में स्थापित होती है। परिवार के जाति के या ग्राम के स्तर पर जब प्रेरक, पोषक और रक्षक व्यवस्था अव्यवस्थित हो जाती है या उस का हल नहीं निकल पाता है तब ही केवल शासन व्यवस्था की भूमिका शुरू होती है।  &lt;br /&gt;
जाति व्यवस्था, कौटुंबिक उद्योग और ग्रामकुल में आवश्यकताओं और उत्पादन का समायोजन ठीक से होने से समाज की प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति समाज आप ही कर लेता है। ऐसा समाज कभी अन्य समाजों की लूट करने के लिये आक्रमण नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान में अर्थसत्ता सर्वोपरि बनी हुई है। राजसत्ता उस के निर्देशन में चलती है। शिक्षा अर्थात् ज्ञानसत्ता शासन के नियंत्रण में है। और धर्मसत्ता का तो कहीं नामोनिशान तक दिखाई नहीं देता। प्रतिमान के व्यवस्था समूह की यह एकदम उलटी स्थिती है। धर्म सत्ता के निर्देशन में जब ज्ञानसत्ता शासन और अर्थव्यवस्था को निर्देशित करती है तब समाज ठीक दिशा में सोचता भी है और आगे भी बढता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ण व्यवस्था का एक काम तो वर्णों की निश्चिती करने का था। बालक के वर्ण के अनुसार उसके लिये संस्कार और शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था करने का था। ऐसा करने से उस बालक को भी लाभ होता है और समाज को भी लाभ होता था। दूसरा काम था वर्ण संकर के कारण निर्माण हुई जातियों के नाम, काम (व्यावसायिक कौशल का क्षेत्र) और जातिधर्म को तय करना। जातिव्यवस्था के काम जातिगत अनुशासन, व्यवसाय कौशलों में वृध्दि की व्यवस्था, जातिगत व्यावसायिक ज्ञान का विकास करना और जाति बांधवों को सदाचारी और सर्वहितकारी बनाए रखना, यह थे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवारक यानी शासन व्यवस्था भी विकेन्द्रित थी। जातिगत अनुशासन के बारे में जाति पंचायतों का अपना दण्डविधान होता था। इसी प्रकार से ग्रामकुल की अपनी अनुशासन पालन करवाने की और सुरक्षा व्यवस्था होती थी। इन दोनों के स्तर पर जब मामला हल नहीं होता था तब ही वह शासक के पास जाता था। इस लिये न्याय भी अच्छा होता था, अल्पतम समय में होता था और शासन के पास आने वाले मुकदमों की संख्या अत्यल्प होती थी।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी व्यवस्थाओं का आधार पारिवारिक भावना होती थी। गुरू और शिष्य के संबंध (शिक्षा क्षेत्र) मानस पिता-पुत्र जैसे होते थे। विद्याकेन्द्र (गुरू) कुल होते थे। एक ही व्यवसाय करने वाले स्पर्धक नहीं जाति बांधव होते थे। गाँव के किसी की भी बेटी गाँव के प्रत्येक की बहन-बेटी होती थी। न्यायाधीश भी आप्तोप्त (अपराधी जैसे अपना आप्त हो) इस भावना से दण्ड देते थे। पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त का दण्डविधान में विशेष महत्व था। प्रजा (अर्थ है संतान) और राजा का संबंध संतान और पिता का सा होता था। हमारे बाजार भी परिवार भावना से चलते थे। वर्तमान प्रतिमान के कारण हमारे परिवार भी बाजार भावना से चलने लग गये हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप गुरूकुल का था। अर्थात् पारिवारिक था। इस में वर्ण भी सुनिश्चित किये जाते थे। आगे वर्णानुसारी शिक्षा भी दी जाती थी। समाज के सभी बच्चों के लिये यह व्यवस्था उपलब्ध थी। जनसंख्या के बढने से गुरुकुल शिक्षा केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण के बच्चों तक सिमट गई। वैश्य बच्चे अपने परिवारों में और जातिगत व्यवस्थाओं में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने लगे। बर्बर आक्रमणों ने और आक्रांताओं ने शिक्षा व्यवस्था को और तोडा। फिर भी एकल विद्यालयों के रूप में अंग्रेज शासन के पूर्व काल तक ५ लाख से भी अधिक संख्या में यह विद्यालय चलते थे। समाज के सभी बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था इन में थी। शिक्षकों में भी सभी जाति के शिक्षक थे। किन्तु वे सब श्रीमद्बगवद्गीता में वर्णित ब्राह्मण का सा व्यवहार करनेवाले थे। नि;स्वार्थ भाव से नि:शुल्क शिक्षा देते थे। यानी ज्ञानदान करते थे। इस पूरे काल में शिक्षा का आधार, सभी विषयों की विषयवस्तू का आधार परिवार भावना या परस्पर आत्मीयता के संबंध यही रहा। सर्वे भवन्तु सुखिन: यही रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपसंहार ==&lt;br /&gt;
वर्तमान व्यवस्था समूह या पूरे मानव जीवन का प्रतिमान यूरो-अमरिकी बन गया है। विश्व के अन्य समाजों के पास इसे अपनाने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इस प्रतिमान के कारण कई संकट निर्माण हो रहे हैं यह जानते हुए भी सभी समाज, जो औरों का होगा वह हमारा भी होगा यह मान रहे हैं। एक भारत के पास ही इस प्रतिमान से श्रेष्ठ प्रतिमान देने के लिये विकल्प है। इसके कुछ अवशेष समाज जीवन में मुसलमानों ने नष्ट और अंग्रेजों ने भ्रष्ट करने के उपरांत भी बचे हुए साहित्य में उपलब्ध हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान प्रतिमान में धीरे धीरे भारतीय प्रतिमान के कुछ बिन्दू जोड कर इसे भारतीय बनाने का प्रयास करने वाले व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन लाखों की संख्या में हैं। ये सभी व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन पूरी श्रध्दा, समर्पण भाव, और प्रामाणिकता से प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों के कारण भारतीय प्रतिमान को रौंदने की गति कुछ कम भी हुई है, लेकिन बंद नहीं हुई है। ऐसे प्रयासों का प्रारंभ तो १९ वीं सदी के मध्य से ही हो गया था। इन प्रयासों की गति और शक्ति भी निरंतर बढ रही है। लेकिन यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मिलने वाली समाज की मान्यता भी इन प्रयासों की अपेक्षाओं के विपरीत, बढती ही जा रही है। अतएव ऐसे प्रयासों से मिलने वाले तात्कालिक और अत्यंत सीमित लाभ के लालच को छोड कर शुध्द रूप से भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के प्रयास करने होंगे। इस परिवर्तन के लिये प्रचंड इच्छाशक्ति, वैचारिक मंथन, और प्रेरक और निवारक शक्ति की आवश्यकता होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस प्रकार अपनी शिक्षा प्रणाली को भारत में स्थापित करने के लिये अंग्रेजों ने यहाँ की शासन प्रणाली, कर प्रणाली, अर्थ व्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि को नष्ट कर भारतीय समाज में वैकल्पिक व्यवस्थाओं की माँग निर्माण की। शायद ऐसा ही कुछ हमें भी करना होगा। विनोबा भावे ने शिक्षा को भारतीय बनाने की दृष्टि से ऐसे ही प्रयोग का सुझाव दिया था। उन की सूचना को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। &lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. भारतीय शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, प्रकाशक पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान - भाग १)]]&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<title>Jeevan Ka Pratiman-Part 1 (जीवन का प्रतिमान-भाग १)</title>
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		<updated>2020-01-05T00:33:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: /* अभारतीय तत्वज्ञान, जीवनदृष्टि और इन पर आधारित व्यवहार सूत्र */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
== '''जीवन का प्रतिमान''' ==&lt;br /&gt;
* जीते तो सभी हैं। लेकिन हर समाज का जीने का तरीका होता है। उस समाज की समझ के अनुसार यह तरीका अन्य समाजों से श्रेष्ठ जीने का तरीका होता है। इस जीवन जीने के तरीके को '''जीवनशैली''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जीवनशैली का आधार उस समाज की जीवन जीने के संबंध में कुछ मान्यताएं होती हैं। इन मान्यताओं को उस समाज की '''जीवनदृष्टि''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
* यह मान्यताएं या जीवनदृष्टि और जीवनशैली उस समाज की '''विश्वदृष्टि''' पर आधारित होते हैं। विश्वदृष्टि का अर्थ है उस समाज की विश्व या चर-अचर सृष्टि के निर्माण से संबंधित मान्यताएं। इन्हीं को उस समाज का तत्वज्ञान भी कहते हैं। यह मान्यताएं या विश्व दृष्टि ही व्यक्ति के अन्य मानवों से संबंध और व्यक्ति के और अन्यों के चर-अचर सृष्टि के साथ संबंध तय करती है। &lt;br /&gt;
* अपनी विश्व दृष्टि और उस पर आधारित जीवनदृष्टि के अनुसार समाज जीवन चले इस लिये वह समाज कुछ व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। ये व्यवस्थाएं समान मान्यताओं को आधार मान कर निर्माण की जातीं हैं। इस लिये ये व्यवस्थाएं एक दूसरे की पूरक भी होतीं हैं और मददरूप भी होतीं हैं। इस व्यवस्था समूह को ही उस समाज की विश्वदृष्टि यानी जीवन दृष्टि और जीवनशैली के साथ मिला कर उस समाज के '''जीवन का प्रतिमान''' कहते हैं। अंग्रेजी में इसे पॅरेडिम (paradigm) कहते हैं। &lt;br /&gt;
वर्तमान शिक्षा वर्तमान अभारतीय जीवन के प्रतिमान का ही एक हिस्सा है। इस शिक्षा का जिन पर गहरा प्रभाव है उन्हें लगता है कि मानव जाति अष्म या पाषाण युग से निरंतर श्रेष्ठ बन रही है। वर्तमान मानव और मानव जाति से भविष्य की मानव और मानव जाति अधिक श्रेष्ठ होंगे। किन्तु जो इस शिक्षा से प्रभावित नहीं हुए हैं, या जो भारतीय काल गणना की समझ रखते हैं उन्हें अपने अनुभवों से भी और भारतीय शास्त्रों के कथन के अनुसार भी लगता है कि मानव जाति का निरंतर ह्रास हो रहा है। सत्ययुग का मानव और मानव जाति अत्यंत श्रेष्ठ थे। काम और मोह से मुक्त थे। त्रेता युग में सत्ययुग के मानव का ह्रास हुआ। द्वापर में उस से भी अधिक ह्रास हुआ। कलियुग में द्वापर से भी स्थिति और बिगडी और निरंतर बिगड रही है। किसे क्या लगता है इस का संबंध वह मानव या मानव समाज, किस प्रतिमान को ठीक मानता है इस से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में जयचंद को तो देशद्रोही माना जाता है लेकिन विभीषण को नहीं। इस का संबंध जीवन के भारतीय प्रतिमान को ठीक मानने से है। सिकंदर, चंगेज खान आदि जैसे लोग जो अपने कौशल की विधा के क्षेत्र में अत्यंत श्रेष्ठ थे उन्हें, जिन में ये जन्मे थे वे अभारतीय समाज अपने महापुरूष मानते हैं। अनुकरणीय मानते हैं। किन्तु भारतीय दृष्टि में बडप्पन का या अनुकरणीयता का प्राथमिक निकष उस का चारित्र्य माना जाता है। बुध्दिमत्ता, पराक्रम, कौशल आदि दूसरे और गौण स्थान पर आते हैं। रावण महा पराक्रमी था। बुध्दिमान था। राजनीति विशेषज्ञ था। किन्तु हम कभी उसे बडा या अनुकरणीय नहीं मानते। हम किसी बच्चे को 'तुम रावण जैसे महान बनो' ऐसा आशिर्वाद नहीं देते। इस का कारण वह अन्य अनेक गुण होने पर भी हीन चरित्र का था, यह है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक गणित के प्रस्तोता जगद्गुरू शंकराचार्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ कहते थे,'भारतीय और अभारतीय यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं'। (दीज आर टू डिफ्रंट एव्हरीथिंग्ज)। उन के इस कथन का संदर्भ जीवन जीने के तत्वज्ञान, व्यवहार और व्यवस्था समूह से बने भारतीय और अभारतीय प्रतिमानों से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगे अब हम तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि, जीवनशैली (व्यवहार), और व्यवस्था समूहों से बनने वाले प्रतिमानों को समझने का प्रयास करेंगे। देशिक शास्त्र में इसी तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि को उस समाज का 'स्वभाव' या 'चिति' कहा है। इस जीवनदृष्टि के अनुरूप वह समाज सर्व मान्य ऐसे कुछ व्यवहार सूत्र तय करता है और उन के अनुसार प्रत्यक्ष व्यवहार करता है। ऐसा व्यवहार सर्व सामान्य मनुष्य भी कर सके इस लिये वह व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। समाज के इस प्रकार अपनी जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करने और  व्यवस्था समूह निर्माण कर आगे बढने को ही देशिक शास्त्र में उस समाज के विराट का जागरण होता है ऐसा कहा गया है। चिति और विराट मिलाकर उस समाज के जीवन का प्रतिमान बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व प्रथम हम अभारतीय विश्व दृष्टि (वर्ल्ड व्ह्यू) या तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि और उस के अनुसार निर्माण किये व्यवहार सूत्र (जीवनशैली) और आगे इन के लिये उपयुक्त व्यवस्था समूह को भी समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अधार्मिक (अभारतीय) तत्वज्ञान, जीवनदृष्टि और इन पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
वर्तमान विश्व में प्रमुख रूप से जीवन के दो प्रतिमान अस्तित्व में हैं। एक है '''भारतीय प्रतिमान'''। यह अभी सुप्त अवस्था में है। जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है।  दूसरा है '''यूरो-अमरिकी प्रतिमान'''। यहूदी, ईसाई और मुस्लिम समाज इस दूसरे प्रतिमान को मानने वाले हैं। इस प्रतिमान ने भारतीय समाज के साथ ही विश्व के अन्य सभी समाजों को गहराई से प्रभावित किया है। भारतीय समाज छोड कर अन्य सभी समाजों ने इसे सर्वार्थ से या तो अपना लिया है या तेजी से अपना रहे हैं। केवल भारतीय समाज ही अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर पुन: जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है। इस यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मानने वाले दो तबके हैं। यूरो-अमरिकी मजहबी दृष्टि के अनुसार विश्व के निर्माण की मान्यता एक जैसी ही है। &lt;br /&gt;
* एक तबका है ईसाईयत के तत्वज्ञान को आधार मानने वाला। इन का तत्वज्ञान निम्न है: येहोवा/गॉड/ अल्ला ने पाँच दिन सृष्टि का निर्माण किया और छठे दिन मानव का निर्माण कर मानव से कहा कि ' यह चर-अचर सृष्टि तुम्हारे उपभोग के लिये है'। यूरो अमरिकी समाज पर फ्रांसिस बेकन और रेने देकार्ते इन दो फिलॉसॉफरों की फिलॉसॉफिी का गहरा प्रभाव है। इन का तत्वज्ञान कहता है कि प्रकृति मानव की दासी है। इसे कस कर अपनी जकड में रखना चाहिये। मानव जम कर इस का शोषण कर सके इसी लिये इस का निर्माण हुआ है। इस लिये प्रकृतिे का मानव ने जम कर (टू द हिल्ट) शोषण करना चाहिये।&lt;br /&gt;
* और दूसरा है यूरो-अमरिकी और उन का अनुसरण करने वाले दार्शनिकों का और साईंटिस्टों का। वैसे तो आधुनिक साईंस ने ईसाईयत के कई गंभीर सिध्दांतों की धज्जियाँ उडा दी है, लेकिन फिर भी मोटा-मोटी दोनों तबकों का तत्वज्ञान एक ही है। इस लिये जीवन का प्रतिमान भी एक ही है।  यूरो-अमरिकी साईंटिस्टों और उन का अनुसरण करने वाले भारतीय समेत विश्व के सभी साईंटिस्टों की विश्वदृष्टि का आधार '''डार्विन की 'विकास वाद' और मिलर की 'जड से रासायनिक प्रक्रिया से जीव निर्माण'''' की परिकल्पनाएं ही हैं। मानव इन रासायनिक प्रक्रियाओं के पुलिंदों में सर्वश्रेष्ठ है। इस लिये इसे अपने स्वार्थ के लिये अन्य रासायनिक प्रक्रियाएं नष्ट करने का पूरा अधिकार है।&lt;br /&gt;
मजहब या रिलीजन, फिलॉऑफरों की फिलॉसॉफि और साईंटिस्टों के ऐसे तीनों के प्रभाव के कारण जो अभारतीय जीवन दृष्टि बनीं है उस के तीन मुख्य पहलू हैं:&lt;br /&gt;
#व्यक्तिवादिता : सारी सृष्टि केवल मेरे उपभोग के लिये बनीं है।&lt;br /&gt;
# जडवादिता : सृष्टि में सब जड ही है। चेतनावान कुछ भी नहीं है।&lt;br /&gt;
# इहवादिता : जो कुछ है यही जन्म है। इस से नहीं तो पहले कुछ था और ना ही आगे कुछ है।  &lt;br /&gt;
इस जीवनदृष्टि के अनुसार जो व्यवहार सूत्र बने वे निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# अनिर्बाध व्यक्तिस्वातंत्र्य (अनलिमिटेड इंडिव्हिज्युल लिबर्टी - unlimited individual liberty)।&lt;br /&gt;
# बलवान ही जीने का अधिकारी (सर्वायवल ऑफ द फिटेस्ट - survival of the fittest)।&lt;br /&gt;
# दुर्बल का शोषण (एक्स्प्लॉयटेशन ऑफ द वीक - exploitation of the weak)।&lt;br /&gt;
# सारी चराचर सृष्टि मेरे अनिर्बाध उपभोग के लिये बनी है। इस पर मेरा अधिकार है। इस के प्रति मेरा कोई कर्तव्य नहीं है। (राईट्स् बट नो डयूटीज- Rights but no duties)।&lt;br /&gt;
# अन्य मानव भी सृष्टि का उपभोग अपना अनिर्बाध अधिकार मानते हैं। इस लिये मुझे अपने उपभोग (जीने) के लिये अन्यों से संघर्ष करना होगा। (फाईट फॉर सर्व्हायव्हल -fight for survival)।&lt;br /&gt;
# उपभोग के लिये मुझे केवल यही जीवन मिला है। इस जीवन से पहले मै नहीं था और इस जीवन के समाप्त होने के बाद भी मै नहीं रहूंग़ा। इस लिये जितना उपभोग कर सकूँ, कर लूँ। (कंझ्यूमेरिझम् - consumerism)।&lt;br /&gt;
# इहवादिता (धिस इज द ओन्ली लाईफ। देयर वॉज नथिंग बिफोर एँड देयर शॅल बी नथिंग बियाँड धिस लाईफ - This is the only life. There was nothing before and there shall be nothing beyond this life)।&lt;br /&gt;
# मेरी रासायनिक प्रक्रिया (जीवन) अच्छी चले (स्वार्थ) यह महत्वपूर्ण है। इस लिये किसी अन्य रासायनिक प्रक्रिया में बाधा आती है (परपीडा होती है) तो भले आये। अन्य कोई रासायनिक प्रक्रिया बंद होती है (जीवन नष्ट होता है) तो भले हो जाये।&lt;br /&gt;
# चैतन्य को नकारने के कारण सृष्टि के विभिन्न अस्तित्वों में स्थित अंतर्निहित एकात्मता को अमान्य करने के कारण टुकडों में विचार करने की सोच। (पीसमील एॅप्रोच - piecemeal approach) ।&lt;br /&gt;
# सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों का आधार स्वार्थ ही है। सामाजिक संबंधों का आधार इसी लिये 'काँट्रॅक्ट' या करार या समझौता या एॅग्रीमेंट होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
# &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय तत्वज्ञान और जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
भारतीय मान्यता के अनुसार कण कण, चर अचर सब परमात्मा के ही रूप हैं : &amp;lt;blockquote&amp;gt;'''एकाकी न रमते'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;', '&amp;lt;nowiki/&amp;gt;'''सो कामयत्'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;',  ''''एकोऽहं बहुस्याम:'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;' ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सारी सृष्टि यह उस परमात्त्व तत्व का ही विस्तार मात्र है। इस लिये सृष्टि के सारे घटक एक दूसरे से 'आत्मीयता' के भाव से जुडे हैं। समाज निर्माण और परस्पर सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के बारे में श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भगवद्गीता, 3.10 एवं 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''अनेन प्रसविश्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक ॥ 3.10 ॥'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ ( अन्यों के हित के काम) के साथ प्रजा को निर्माण किया और कहा कि परस्पर हित साधते हुए उत्कर्ष (प्रगति) करो। यह है परस्पर सामाजिक संबंधों का आधार। आगे कहा है&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ ॥ 3.11 ॥'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - देवताओं ( वायू, वरुण, अग्नि, पृथ्वी आदि यानी पर्यावरण) का पोषण करते हुए नि:स्वार्थ भाव से परस्पर हित साधते हुए परम कल्याण को प्राप्त करो। यह है पर्यावरण से संबंधों का आधार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त तत्वज्ञान पर आधारित भारतीय जीवन दृष्टि के सूत्र निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# सारी सृष्टि आत्म तत्व का ही विस्तार है। मनुष्य परमात्मा का ही सर्वश्रेष्ठ रूप है। एकात्मता सृष्टि के सभी व्यवहारों का आधारभूत सिध्दांत है। परस्पर संबंधों का आधार पारिवारिक भावना है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि चेतन से बनीं है जड से नहीं।&lt;br /&gt;
# जीवन स्थल (वर्तमान चर-अचर सृष्टि को प्रभावित करने वाला और उस से प्रभावित होने वाला) और काल (सृष्टि के निर्माण से लेकर सृष्टि के अंत तक) के संदर्भ में अखंड है। पुनर्जन्म ही काल के संदर्भ में अखंडता है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि की रचना परस्पर पूरक और चक्रीय है।&lt;br /&gt;
# कर्म ही मानव जीवन को नियमन करते हैं। कर्मसिध्दांत इसे समझने का साधन है। अच्छे (परोपकार या पुण्य) कर्म जीवन को अच्छा और बुरे (परपीडा या पाप) कर्म जीवन को बुरा बनाते हैं।&lt;br /&gt;
# मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष है। सामाजिक जीवन का लक्ष्य 'स्वतंत्रता' है। उपर्युक्त जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्रों की चर्चा हमने [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यहाँ]] की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== यूरो-अमरिकी व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
यूरो-अमरिकी समाज ने अपनी विश्व दृष्टि ( वर्ल्ड व्हू world view) के अनुसार जीवन जीने के जो व्यवहार सूत्र बनाए उन्हें व्यवहार में लाना संभव हो इस लिये व्यवस्थाओं का एक समूह भी निर्माण किया। ये व्यवस्थाएं एक ओर तो उन की जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करना संभव बनातीं हैं तो दूसरी ओर प्रतिमान की अन्य व्यवस्थाओं को भी पुष्ट बनातीं हैं। इन सभी का आधार व्यक्तिवाद, इहवाद और जडवाद ही है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यवस्थाओं से दो प्रकार की आवश्यकता पूर्ण होती है।  &lt;br /&gt;
# पहली आवश्यकता यह होती है कि समाज के घटकों को समाज का तत्वज्ञान और व्यवहार सिखाना।  &lt;br /&gt;
# और दूसरी आवश्यकता होती है वह समाज अपने तत्वज्ञान और व्यवहार के अनुसार जी सके इस लिये। &lt;br /&gt;
'''यूरो अमरिकी प्रतिमान की सोच यह है कि समाज की सभी व्यवथाओं का स्वरूप तय करना और व्यवस्थाओं का निर्माण करना यह शासन का कर्तव्य भी है और जिम्मेदारी भी है।''' इस मान्यता का शासन के स्वरूप से, यानी शासन किंग का है या लोकतंत्रात्मक है इस से कोई संबंध नहीं है। इस यूरो अमरिकी प्रतिमान में '''शासक सर्वसत्ताधीश''' होता है। सर्वोपरि होता है। शासन अपनी योग्यता और क्षमताओं के आधार पर समाज को निर्देशित, नियंत्रित और नियमित करता है। व्यक्तिवादी समाज में इस व्यवस्था समूह को बदलना लगभग असंभव होता है। शासन बदल जाता है किन्तु उसका 'स्व'रूप या स्वभाव नहीं बदलता। इसी लिये किंग के काल में भी और लोकतंत्र के काल में भी शासन सर्वोपरि ही रहा। इस व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न स्वरूप का होगा: &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+&lt;br /&gt;
! colspan=&amp;quot;5&amp;quot; |शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|प्रशासन&lt;br /&gt;
|सुरक्षा&lt;br /&gt;
|अर्थ&lt;br /&gt;
|न्याय&lt;br /&gt;
|शिक्षा&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
प्रसिध्द भारतीय चिंतक और विद्वान डॉ. देवेन्द्र स्वरूप प्रतिमान का और शिक्षा व्यवस्था का संबंध विषद करते हैं&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ. देवेन्द्र स्वरूप, ' भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति का विकास' पृष्ठ 7&amp;lt;/ref&amp;gt;। 'शिक्षा प्रणाली के संबंध में विचार करने से पूर्व हमें यह विचार करना होगा कि हम राष्ट्र में कैसा मनुष्य बनाना चाहते हैं, उसकी जीवनशैली क्या होगी, उसका पारिवारिक और सामाजिक परिवेष कैसा होगा? अर्थात् राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रचना कैसी होगी? &lt;br /&gt;
इसी पृष्ठ पर देवेन्द्रस्वरूपजी लिखते हैं-  &lt;br /&gt;
 प्रारंभ में उन्होंने (अंग्रेजों ने) भारत की पुरानी राजस्व, न्याय, प्रशासन प्रणाली से ही काम चलाना चाहा और साथ ही अपने साम्राज्य के चिर स्थायित्व के लिये अंग्रेजी शिक्षा का आरोपण करने की कोशिश भी की; किन्तु ये कोशिशें बेकार गयीं। तब उन्होंने अनुभव किया कि शिक्षा प्रणाली का किसी देश की राजस्व, न्याय, प्रशासन और अर्थव्यवस्था से गहरा संबंध होता है।&lt;br /&gt;
ऐसा होने के कारण इन सभी व्यवस्थाओं का आधार उस समाज के जीवन के प्रतिमान की साझी जीवनदृष्टि और उस पर आधारित व्यवहार सूत्र होते हैं। इस कारण ''किसी प्रतिमान के व्यवस्था समूह में से केवल एक व्यवस्था को जो भिन्न जीवन दृष्टि पर आधारित है, बदलना संभव नहीं होता''। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
भारतीय प्रतिमान के व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न प्रकार का है। &lt;br /&gt;
ऐसा ढांचे का चित्र या ऐसे ढाँचे का विवरण भी अन्य किसी शास्त्रीय ग्रन्थ में से नहीं लिया गया है। यह तो लेखक ने अपनी समझ के अनुसार यह ढांचा कैसा हो सकता है उसकी रूपरेखा अपनी कल्पना से ही बनाई है। &lt;br /&gt;
[[File:Part 1 Last Chapter Table Bhartiya Jeevan Pratiman.jpg|center|thumb|969x969px|भारतीय व्यवस्था समूह]]&lt;br /&gt;
 भारत में कभी भी '''सामाजिक व्यवस्थाओं के स्वरूप को तय करने की जिम्मेदारी राजा या शासक की नहीं रही'''। धर्मसत्ता द्वारा प्रस्तुत '''व्यवस्थाओं को स्थापित करने की जिम्मेदारी राजा की या शासन की होती थी'''। रघुवंशम् में कालिदास इस की पुष्टि करते हैं। &lt;br /&gt;
राजा की या कभी गणतंत्रात्मक शासन रहा तब भी शासन की जिम्मेदारी धर्माचार्यों द्वारा निर्मित धर्मशास्त्र या समाजशास्त्र के अनुपालन करने की और करवाने की ही रही। धर्म का अनुपालन करने वाला समाज निर्माण करने और उसे धर्माचरणी बनाए रखने के लिये हमारे पूर्वजों ने एक व्यवस्था समूह निर्माण किया था।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक कारणों से ये व्यवस्थाएं दुर्बल हुईं। काल के प्रवाह में इन में कुछ दोष भी निर्माण हुए। लेकिन फिर भी यह व्यवस्था समूह अंग्रेज शासन भारत में स्थापित हुआ तब तक प्रत्यक्ष अस्तित्व में रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस व्यवस्था समूह की व्यवस्था के तीन पहलू थे। '''पोषक''' व्यवस्था, '''रक्षक''' व्यवस्था और '''प्रेरक''' व्यवस्था। इन में प्रेरक व्यवस्था तब ही ठीक से काम कर सकती है जब उस के साथ में पोषक और रक्षक व्यवस्था भी काम करती है। इस लिये समाज की सभी व्यवस्थाओं में यह तीनों पहलू विकेंद्रित स्वरूप में ढाले गये थे। प्रेरक यानी शिक्षा व्यवस्था का काम समाज को धर्माचरण सिखाने का था। भारतीय प्रतिमान में प्रेरक व्यवस्थाओं को अत्यंत श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी बनाना शिक्षा व्यवस्था का काम है। जो ५-१० प्रतिशत लोग इस प्रेरक व्यवस्था के प्रयासों के उपरांत भी अधर्माचरण करते थे, उन के लिये ही शासन व्यवस्था यानी दण्ड विधान की आवश्यकता होती है। यदि प्रेरक और पोषक व्यवस्थाओं के माध्यम से समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी नहीं बनाया गया तो रक्षक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर सकती। यूरो अमरिकी शिक्षा की दस पीढियाँ बीतने के बाद भी यदि अब भी काफी मात्रा में यूरोप या अमरिकी समाजों की तुलना में हम 'पारिवारिक भावना' को अभी तक बचा पाए हैं तो वह अभी भी अपना अस्तित्व बनाए रखने वाली समानान्तर '''शिक्षा व्यवस्था''', '''परिवार व्यवस्था''' और '''समाज व्यवस्था''' आदि के कारण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त ढाँचा भारतीय प्रतिमान की मोटी मोटी अभिव्यक्ति है।  &lt;br /&gt;
* इस में '''धर्म''' व्यवस्था सामाजिक नीति नियम अर्थात् धर्माचरण के व्यावहारिक सूत्र तय करने का और अधर्माचरण के व्यवहार के लिये दण्ड विधान बनाने का काम करती है। अर्थात् शास्त्रीय भाषा में '''श्रृति के आधार पर 'स्मृति' निर्माण करने का काम''' करती है। इस प्रकार प्रेरक, पोषक तथा निवारक/रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का मार्गदर्शन करती है।  &lt;br /&gt;
* इस मार्गदर्शन का माध्यम '''शिक्षा''' व्यवस्था होती है। इस लिये शिक्षा का या ज्ञानसत्ता का स्थान धर्मसत्ता से नीचे किन्तु शासन की अन्य सत्ताओं से ऊपर का होता है। ब्रह्मचर्य आश्रम, गुरूकुल या विद्याकेन्द्र और कुछ प्रमाण में परिवारों में भी वर्णानुसारी और जीवन के लिये उपयुक्त ऐसे सभी पहलुओं की शिक्षा दी जाती है।  &lt;br /&gt;
* लोग जब '''वर्ण''' के अनुसार व्यवहार करते हैं तब समाज '''सुसंस्कृत''' बनता है।  और जब लोग अपनी अपनी '''जाति''' के अनुसार व्यवसाय करते हैं समाज '''समृध्द''' बनता है।  &lt;br /&gt;
* '''रक्षक''' या निवारक व्यवस्थाएं समाज और व्यक्तियों की संस्कृति और समृध्दि की रक्षा के लिये होती हैं।  &lt;br /&gt;
* वर्ण और आश्रम यह व्यवस्थाएं समाज की रचना की व्यवस्थाएं हैं।   &lt;br /&gt;
* परिवार व्यवस्था श्रेष्ठ मानव को जन्म देकर उसे वर्णानुसार संस्कारित करने की व्यवस्था है। यह व्यवस्था पारिवारिक भावना के विकास की भी व्यवस्था है। यह समाज व्यवस्था का लघु-रूप है। सामाजिकता की शिक्षा की नींव डालना परिवार व्यवस्था का काम है। इस कारण इस में पोषक, प्रेरक और रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का समावेश होता है। इसी प्रकार से जन्म से लेकर मृत्यू पर्यंत तक मनुष्य की बढती और घटती क्षमताओं और योग्यताओं के समायोजन की भी व्यवस्था परिवार में होती है।  &lt;br /&gt;
* जाति व्यवस्था, परिवार और ग्रामकुल यह तीनों मिल कर '''अर्थ''' व्यवस्था यानी समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली व्यवस्था बनती है।  &lt;br /&gt;
* रक्षक व्यवस्था भी इन तीनों व्यवस्थाओं में और चौथे शासन व्यवस्था में विकेन्द्रित रूप में स्थापित होती है। परिवार के जाति के या ग्राम के स्तर पर जब प्रेरक, पोषक और रक्षक व्यवस्था अव्यवस्थित हो जाती है या उस का हल नहीं निकल पाता है तब ही केवल शासन व्यवस्था की भूमिका शुरू होती है।  &lt;br /&gt;
जाति व्यवस्था, कौटुंबिक उद्योग और ग्रामकुल में आवश्यकताओं और उत्पादन का समायोजन ठीक से होने से समाज की प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति समाज आप ही कर लेता है। ऐसा समाज कभी अन्य समाजों की लूट करने के लिये आक्रमण नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान में अर्थसत्ता सर्वोपरि बनी हुई है। राजसत्ता उस के निर्देशन में चलती है। शिक्षा अर्थात् ज्ञानसत्ता शासन के नियंत्रण में है। और धर्मसत्ता का तो कहीं नामोनिशान तक दिखाई नहीं देता। प्रतिमान के व्यवस्था समूह की यह एकदम उलटी स्थिती है। धर्म सत्ता के निर्देशन में जब ज्ञानसत्ता शासन और अर्थव्यवस्था को निर्देशित करती है तब समाज ठीक दिशा में सोचता भी है और आगे भी बढता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ण व्यवस्था का एक काम तो वर्णों की निश्चिती करने का था। बालक के वर्ण के अनुसार उसके लिये संस्कार और शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था करने का था। ऐसा करने से उस बालक को भी लाभ होता है और समाज को भी लाभ होता था। दूसरा काम था वर्ण संकर के कारण निर्माण हुई जातियों के नाम, काम (व्यावसायिक कौशल का क्षेत्र) और जातिधर्म को तय करना। जातिव्यवस्था के काम जातिगत अनुशासन, व्यवसाय कौशलों में वृध्दि की व्यवस्था, जातिगत व्यावसायिक ज्ञान का विकास करना और जाति बांधवों को सदाचारी और सर्वहितकारी बनाए रखना, यह थे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवारक यानी शासन व्यवस्था भी विकेन्द्रित थी। जातिगत अनुशासन के बारे में जाति पंचायतों का अपना दण्डविधान होता था। इसी प्रकार से ग्रामकुल की अपनी अनुशासन पालन करवाने की और सुरक्षा व्यवस्था होती थी। इन दोनों के स्तर पर जब मामला हल नहीं होता था तब ही वह शासक के पास जाता था। इस लिये न्याय भी अच्छा होता था, अल्पतम समय में होता था और शासन के पास आने वाले मुकदमों की संख्या अत्यल्प होती थी।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी व्यवस्थाओं का आधार पारिवारिक भावना होती थी। गुरू और शिष्य के संबंध (शिक्षा क्षेत्र) मानस पिता-पुत्र जैसे होते थे। विद्याकेन्द्र (गुरू) कुल होते थे। एक ही व्यवसाय करने वाले स्पर्धक नहीं जाति बांधव होते थे। गाँव के किसी की भी बेटी गाँव के प्रत्येक की बहन-बेटी होती थी। न्यायाधीश भी आप्तोप्त (अपराधी जैसे अपना आप्त हो) इस भावना से दण्ड देते थे। पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त का दण्डविधान में विशेष महत्व था। प्रजा (अर्थ है संतान) और राजा का संबंध संतान और पिता का सा होता था। हमारे बाजार भी परिवार भावना से चलते थे। वर्तमान प्रतिमान के कारण हमारे परिवार भी बाजार भावना से चलने लग गये हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप गुरूकुल का था। अर्थात् पारिवारिक था। इस में वर्ण भी सुनिश्चित किये जाते थे। आगे वर्णानुसारी शिक्षा भी दी जाती थी। समाज के सभी बच्चों के लिये यह व्यवस्था उपलब्ध थी। जनसंख्या के बढने से गुरुकुल शिक्षा केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण के बच्चों तक सिमट गई। वैश्य बच्चे अपने परिवारों में और जातिगत व्यवस्थाओं में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने लगे। बर्बर आक्रमणों ने और आक्रांताओं ने शिक्षा व्यवस्था को और तोडा। फिर भी एकल विद्यालयों के रूप में अंग्रेज शासन के पूर्व काल तक ५ लाख से भी अधिक संख्या में यह विद्यालय चलते थे। समाज के सभी बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था इन में थी। शिक्षकों में भी सभी जाति के शिक्षक थे। किन्तु वे सब श्रीमद्बगवद्गीता में वर्णित ब्राह्मण का सा व्यवहार करनेवाले थे। नि;स्वार्थ भाव से नि:शुल्क शिक्षा देते थे। यानी ज्ञानदान करते थे। इस पूरे काल में शिक्षा का आधार, सभी विषयों की विषयवस्तू का आधार परिवार भावना या परस्पर आत्मीयता के संबंध यही रहा। सर्वे भवन्तु सुखिन: यही रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपसंहार ==&lt;br /&gt;
वर्तमान व्यवस्था समूह या पूरे मानव जीवन का प्रतिमान यूरो-अमरिकी बन गया है। विश्व के अन्य समाजों के पास इसे अपनाने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इस प्रतिमान के कारण कई संकट निर्माण हो रहे हैं यह जानते हुए भी सभी समाज, जो औरों का होगा वह हमारा भी होगा यह मान रहे हैं। एक भारत के पास ही इस प्रतिमान से श्रेष्ठ प्रतिमान देने के लिये विकल्प है। इसके कुछ अवशेष समाज जीवन में मुसलमानों ने नष्ट और अंग्रेजों ने भ्रष्ट करने के उपरांत भी बचे हुए साहित्य में उपलब्ध हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान प्रतिमान में धीरे धीरे भारतीय प्रतिमान के कुछ बिन्दू जोड कर इसे भारतीय बनाने का प्रयास करने वाले व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन लाखों की संख्या में हैं। ये सभी व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन पूरी श्रध्दा, समर्पण भाव, और प्रामाणिकता से प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों के कारण भारतीय प्रतिमान को रौंदने की गति कुछ कम भी हुई है, लेकिन बंद नहीं हुई है। ऐसे प्रयासों का प्रारंभ तो १९ वीं सदी के मध्य से ही हो गया था। इन प्रयासों की गति और शक्ति भी निरंतर बढ रही है। लेकिन यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मिलने वाली समाज की मान्यता भी इन प्रयासों की अपेक्षाओं के विपरीत, बढती ही जा रही है। अतएव ऐसे प्रयासों से मिलने वाले तात्कालिक और अत्यंत सीमित लाभ के लालच को छोड कर शुध्द रूप से भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के प्रयास करने होंगे। इस परिवर्तन के लिये प्रचंड इच्छाशक्ति, वैचारिक मंथन, और प्रेरक और निवारक शक्ति की आवश्यकता होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस प्रकार अपनी शिक्षा प्रणाली को भारत में स्थापित करने के लिये अंग्रेजों ने यहाँ की शासन प्रणाली, कर प्रणाली, अर्थ व्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि को नष्ट कर भारतीय समाज में वैकल्पिक व्यवस्थाओं की माँग निर्माण की। शायद ऐसा ही कुछ हमें भी करना होगा। विनोबा भावे ने शिक्षा को भारतीय बनाने की दृष्टि से ऐसे ही प्रयोग का सुझाव दिया था। उन की सूचना को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। &lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. भारतीय शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, प्रकाशक पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान - भाग १)]]&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Jeevan_Ka_Pratiman-Part_1_(%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97_%E0%A5%A7)&amp;diff=122141</id>
		<title>Jeevan Ka Pratiman-Part 1 (जीवन का प्रतिमान-भाग १)</title>
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		<updated>2020-01-02T13:49:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: /* भारतीय व्यवस्था समूह */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
== '''जीवन का प्रतिमान''' ==&lt;br /&gt;
* जीते तो सभी हैं। लेकिन हर समाज का जीने का तरीका होता है। उस समाज की समझ के अनुसार यह तरीका अन्य समाजों से श्रेष्ठ जीने का तरीका होता है। इस जीवन जीने के तरीके को '''जीवनशैली''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जीवनशैली का आधार उस समाज की जीवन जीने के संबंध में कुछ मान्यताएं होती हैं। इन मान्यताओं को उस समाज की '''जीवनदृष्टि''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
* यह मान्यताएं या जीवनदृष्टि और जीवनशैली उस समाज की '''विश्वदृष्टि''' पर आधारित होते हैं। विश्वदृष्टि का अर्थ है उस समाज की विश्व या चर-अचर सृष्टि के निर्माण से संबंधित मान्यताएं। इन्हीं को उस समाज का तत्वज्ञान भी कहते हैं। यह मान्यताएं या विश्व दृष्टि ही व्यक्ति के अन्य मानवों से संबंध और व्यक्ति के और अन्यों के चर-अचर सृष्टि के साथ संबंध तय करती है। &lt;br /&gt;
* अपनी विश्व दृष्टि और उस पर आधारित जीवनदृष्टि के अनुसार समाज जीवन चले इस लिये वह समाज कुछ व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। ये व्यवस्थाएं समान मान्यताओं को आधार मान कर निर्माण की जातीं हैं। इस लिये ये व्यवस्थाएं एक दूसरे की पूरक भी होतीं हैं और मददरूप भी होतीं हैं। इस व्यवस्था समूह को ही उस समाज की विश्वदृष्टि यानी जीवन दृष्टि और जीवनशैली के साथ मिला कर उस समाज के '''जीवन का प्रतिमान''' कहते हैं। अंग्रेजी में इसे पॅरेडिम (paradigm) कहते हैं। &lt;br /&gt;
वर्तमान शिक्षा वर्तमान अभारतीय जीवन के प्रतिमान का ही एक हिस्सा है। इस शिक्षा का जिन पर गहरा प्रभाव है उन्हें लगता है कि मानव जाति अष्म या पाषाण युग से निरंतर श्रेष्ठ बन रही है। वर्तमान मानव और मानव जाति से भविष्य की मानव और मानव जाति अधिक श्रेष्ठ होंगे। किन्तु जो इस शिक्षा से प्रभावित नहीं हुए हैं, या जो भारतीय काल गणना की समझ रखते हैं उन्हें अपने अनुभवों से भी और भारतीय शास्त्रों के कथन के अनुसार भी लगता है कि मानव जाति का निरंतर ह्रास हो रहा है। सत्ययुग का मानव और मानव जाति अत्यंत श्रेष्ठ थे। काम और मोह से मुक्त थे। त्रेता युग में सत्ययुग के मानव का ह्रास हुआ। द्वापर में उस से भी अधिक ह्रास हुआ। कलियुग में द्वापर से भी स्थिति और बिगडी और निरंतर बिगड रही है। किसे क्या लगता है इस का संबंध वह मानव या मानव समाज, किस प्रतिमान को ठीक मानता है इस से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में जयचंद को तो देशद्रोही माना जाता है लेकिन विभीषण को नहीं। इस का संबंध जीवन के भारतीय प्रतिमान को ठीक मानने से है। सिकंदर, चंगेज खान आदि जैसे लोग जो अपने कौशल की विधा के क्षेत्र में अत्यंत श्रेष्ठ थे उन्हें, जिन में ये जन्मे थे वे अभारतीय समाज अपने महापुरूष मानते हैं। अनुकरणीय मानते हैं। किन्तु भारतीय दृष्टि में बडप्पन का या अनुकरणीयता का प्राथमिक निकष उस का चारित्र्य माना जाता है। बुध्दिमत्ता, पराक्रम, कौशल आदि दूसरे और गौण स्थान पर आते हैं। रावण महा पराक्रमी था। बुध्दिमान था। राजनीति विशेषज्ञ था। किन्तु हम कभी उसे बडा या अनुकरणीय नहीं मानते। हम किसी बच्चे को 'तुम रावण जैसे महान बनो' ऐसा आशिर्वाद नहीं देते। इस का कारण वह अन्य अनेक गुण होने पर भी हीन चरित्र का था, यह है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक गणित के प्रस्तोता जगद्गुरू शंकराचार्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ कहते थे,'भारतीय और अभारतीय यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं'। (दीज आर टू डिफ्रंट एव्हरीथिंग्ज)। उन के इस कथन का संदर्भ जीवन जीने के तत्वज्ञान, व्यवहार और व्यवस्था समूह से बने भारतीय और अभारतीय प्रतिमानों से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगे अब हम तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि, जीवनशैली (व्यवहार), और व्यवस्था समूहों से बनने वाले प्रतिमानों को समझने का प्रयास करेंगे। देशिक शास्त्र में इसी तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि को उस समाज का 'स्वभाव' या 'चिति' कहा है। इस जीवनदृष्टि के अनुरूप वह समाज सर्व मान्य ऐसे कुछ व्यवहार सूत्र तय करता है और उन के अनुसार प्रत्यक्ष व्यवहार करता है। ऐसा व्यवहार सर्व सामान्य मनुष्य भी कर सके इस लिये वह व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। समाज के इस प्रकार अपनी जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करने और  व्यवस्था समूह निर्माण कर आगे बढने को ही देशिक शास्त्र में उस समाज के विराट का जागरण होता है ऐसा कहा गया है। चिति और विराट मिलाकर उस समाज के जीवन का प्रतिमान बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व प्रथम हम अभारतीय विश्व दृष्टि (वर्ल्ड व्ह्यू) या तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि और उस के अनुसार निर्माण किये व्यवहार सूत्र (जीवनशैली) और आगे इन के लिये उपयुक्त व्यवस्था समूह को भी समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अभारतीय तत्वज्ञान, जीवनदृष्टि और इन पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
वर्तमान विश्व में प्रमुख रूप से जीवन के दो प्रतिमान अस्तित्व में हैं। एक है '''भारतीय प्रतिमान'''। यह अभी सुप्त अवस्था में है। जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है।  दूसरा है '''यूरो-अमरिकी प्रतिमान'''। यहूदी, ईसाई और मुस्लिम समाज इस दूसरे प्रतिमान को मानने वाले हैं। इस प्रतिमान ने भारतीय समाज के साथ ही विश्व के अन्य सभी समाजों को गहराई से प्रभावित किया है। भारतीय समाज छोड कर अन्य सभी समाजों ने इसे सर्वार्थ से या तो अपना लिया है या तेजी से अपना रहे हैं। केवल भारतीय समाज ही अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर पुन: जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है। इस यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मानने वाले दो तबके हैं। यूरो-अमरिकी मजहबी दृष्टि के अनुसार विश्व के निर्माण की मान्यता एक जैसी ही है। &lt;br /&gt;
* एक तबका है ईसाईयत के तत्वज्ञान को आधार मानने वाला। इन का तत्वज्ञान निम्न है: येहोवा/गॉड/ अल्ला ने पाँच दिन सृष्टि का निर्माण किया और छठे दिन मानव का निर्माण कर मानव से कहा कि ' यह चर-अचर सृष्टि तुम्हारे उपभोग के लिये है'। यूरो अमरिकी समाज पर फ्रांसिस बेकन और रेने देकार्ते इन दो फिलॉसॉफरों की फिलॉसॉफिी का गहरा प्रभाव है। इन का तत्वज्ञान कहता है कि प्रकृति मानव की दासी है। इसे कस कर अपनी जकड में रखना चाहिये। मानव जम कर इस का शोषण कर सके इसी लिये इस का निर्माण हुआ है। इस लिये प्रकृतिे का मानव ने जम कर (टू द हिल्ट) शोषण करना चाहिये।&lt;br /&gt;
* और दूसरा है यूरो-अमरिकी और उन का अनुसरण करने वाले दार्शनिकों का और साईंटिस्टों का। वैसे तो आधुनिक साईंस ने ईसाईयत के कई गंभीर सिध्दांतों की धज्जियाँ उडा दी है, लेकिन फिर भी मोटा-मोटी दोनों तबकों का तत्वज्ञान एक ही है। इस लिये जीवन का प्रतिमान भी एक ही है।  यूरो-अमरिकी साईंटिस्टों और उन का अनुसरण करने वाले भारतीय समेत विश्व के सभी साईंटिस्टों की विश्वदृष्टि का आधार '''डार्विन की 'विकास वाद' और मिलर की 'जड से रासायनिक प्रक्रिया से जीव निर्माण'''' की परिकल्पनाएं ही हैं। मानव इन रासायनिक प्रक्रियाओं के पुलिंदों में सर्वश्रेष्ठ है। इस लिये इसे अपने स्वार्थ के लिये अन्य रासायनिक प्रक्रियाएं नष्ट करने का पूरा अधिकार है।&lt;br /&gt;
मजहब या रिलीजन, फिलॉऑफरों की फिलॉसॉफि और साईंटिस्टों के ऐसे तीनों के प्रभाव के कारण जो अभारतीय जीवन दृष्टि बनीं है उस के तीन मुख्य पहलू हैं:&lt;br /&gt;
#व्यक्तिवादिता : सारी सृष्टि केवल मेरे उपभोग के लिये बनीं है।&lt;br /&gt;
# जडवादिता : सृष्टि में सब जड ही है। चेतनावान कुछ भी नहीं है।&lt;br /&gt;
# इहवादिता : जो कुछ है यही जन्म है। इस से नहीं तो पहले कुछ था और ना ही आगे कुछ है।  &lt;br /&gt;
इस जीवनदृष्टि के अनुसार जो व्यवहार सूत्र बने वे निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# अनिर्बाध व्यक्तिस्वातंत्र्य (अनलिमिटेड इंडिव्हिज्युल लिबर्टी - unlimited individual liberty)।&lt;br /&gt;
# बलवान ही जीने का अधिकारी (सर्वायवल ऑफ द फिटेस्ट - survival of the fittest)।&lt;br /&gt;
# दुर्बल का शोषण (एक्स्प्लॉयटेशन ऑफ द वीक - exploitation of the weak)।&lt;br /&gt;
# सारी चराचर सृष्टि मेरे अनिर्बाध उपभोग के लिये बनी है। इस पर मेरा अधिकार है। इस के प्रति मेरा कोई कर्तव्य नहीं है। (राईट्स् बट नो डयूटीज- Rights but no duties)।&lt;br /&gt;
# अन्य मानव भी सृष्टि का उपभोग अपना अनिर्बाध अधिकार मानते हैं। इस लिये मुझे अपने उपभोग (जीने) के लिये अन्यों से संघर्ष करना होगा। (फाईट फॉर सर्व्हायव्हल -fight for survival)।&lt;br /&gt;
# उपभोग के लिये मुझे केवल यही जीवन मिला है। इस जीवन से पहले मै नहीं था और इस जीवन के समाप्त होने के बाद भी मै नहीं रहूंग़ा। इस लिये जितना उपभोग कर सकूँ, कर लूँ। (कंझ्यूमेरिझम् - consumerism)।&lt;br /&gt;
# इहवादिता (धिस इज द ओन्ली लाईफ। देयर वॉज नथिंग बिफोर एँड देयर शॅल बी नथिंग बियाँड धिस लाईफ - This is the only life. There was nothing before and there shall be nothing beyond this life)।&lt;br /&gt;
# मेरी रासायनिक प्रक्रिया (जीवन) अच्छी चले (स्वार्थ) यह महत्वपूर्ण है। इस लिये किसी अन्य रासायनिक प्रक्रिया में बाधा आती है (परपीडा होती है) तो भले आये। अन्य कोई रासायनिक प्रक्रिया बंद होती है (जीवन नष्ट होता है) तो भले हो जाये।&lt;br /&gt;
# चैतन्य को नकारने के कारण सृष्टि के विभिन्न अस्तित्वों में स्थित अंतर्निहित एकात्मता को अमान्य करने के कारण टुकडों में विचार करने की सोच। (पीसमील एॅप्रोच - piecemeal approach) ।&lt;br /&gt;
# सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों का आधार स्वार्थ ही है। सामाजिक संबंधों का आधार इसी लिये 'काँट्रॅक्ट' या करार या समझौता या एॅग्रीमेंट होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
# &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय तत्वज्ञान और जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
भारतीय मान्यता के अनुसार कण कण, चर अचर सब परमात्मा के ही रूप हैं : &amp;lt;blockquote&amp;gt;'''एकाकी न रमते'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;', '&amp;lt;nowiki/&amp;gt;'''सो कामयत्'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;',  ''''एकोऽहं बहुस्याम:'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;' ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सारी सृष्टि यह उस परमात्त्व तत्व का ही विस्तार मात्र है। इस लिये सृष्टि के सारे घटक एक दूसरे से 'आत्मीयता' के भाव से जुडे हैं। समाज निर्माण और परस्पर सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के बारे में श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भगवद्गीता, 3.10 एवं 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''अनेन प्रसविश्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक ॥ 3.10 ॥'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ ( अन्यों के हित के काम) के साथ प्रजा को निर्माण किया और कहा कि परस्पर हित साधते हुए उत्कर्ष (प्रगति) करो। यह है परस्पर सामाजिक संबंधों का आधार। आगे कहा है&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ ॥ 3.11 ॥'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - देवताओं ( वायू, वरुण, अग्नि, पृथ्वी आदि यानी पर्यावरण) का पोषण करते हुए नि:स्वार्थ भाव से परस्पर हित साधते हुए परम कल्याण को प्राप्त करो। यह है पर्यावरण से संबंधों का आधार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त तत्वज्ञान पर आधारित भारतीय जीवन दृष्टि के सूत्र निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# सारी सृष्टि आत्म तत्व का ही विस्तार है। मनुष्य परमात्मा का ही सर्वश्रेष्ठ रूप है। एकात्मता सृष्टि के सभी व्यवहारों का आधारभूत सिध्दांत है। परस्पर संबंधों का आधार पारिवारिक भावना है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि चेतन से बनीं है जड से नहीं।&lt;br /&gt;
# जीवन स्थल (वर्तमान चर-अचर सृष्टि को प्रभावित करने वाला और उस से प्रभावित होने वाला) और काल (सृष्टि के निर्माण से लेकर सृष्टि के अंत तक) के संदर्भ में अखंड है। पुनर्जन्म ही काल के संदर्भ में अखंडता है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि की रचना परस्पर पूरक और चक्रीय है।&lt;br /&gt;
# कर्म ही मानव जीवन को नियमन करते हैं। कर्मसिध्दांत इसे समझने का साधन है। अच्छे (परोपकार या पुण्य) कर्म जीवन को अच्छा और बुरे (परपीडा या पाप) कर्म जीवन को बुरा बनाते हैं।&lt;br /&gt;
# मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष है। सामाजिक जीवन का लक्ष्य 'स्वतंत्रता' है। उपर्युक्त जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्रों की चर्चा हमने [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यहाँ]] की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== यूरो-अमरिकी व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
यूरो-अमरिकी समाज ने अपनी विश्व दृष्टि ( वर्ल्ड व्हू world view) के अनुसार जीवन जीने के जो व्यवहार सूत्र बनाए उन्हें व्यवहार में लाना संभव हो इस लिये व्यवस्थाओं का एक समूह भी निर्माण किया। ये व्यवस्थाएं एक ओर तो उन की जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करना संभव बनातीं हैं तो दूसरी ओर प्रतिमान की अन्य व्यवस्थाओं को भी पुष्ट बनातीं हैं। इन सभी का आधार व्यक्तिवाद, इहवाद और जडवाद ही है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यवस्थाओं से दो प्रकार की आवश्यकता पूर्ण होती है।  &lt;br /&gt;
# पहली आवश्यकता यह होती है कि समाज के घटकों को समाज का तत्वज्ञान और व्यवहार सिखाना।  &lt;br /&gt;
# और दूसरी आवश्यकता होती है वह समाज अपने तत्वज्ञान और व्यवहार के अनुसार जी सके इस लिये। &lt;br /&gt;
'''यूरो अमरिकी प्रतिमान की सोच यह है कि समाज की सभी व्यवथाओं का स्वरूप तय करना और व्यवस्थाओं का निर्माण करना यह शासन का कर्तव्य भी है और जिम्मेदारी भी है।''' इस मान्यता का शासन के स्वरूप से, यानी शासन किंग का है या लोकतंत्रात्मक है इस से कोई संबंध नहीं है। इस यूरो अमरिकी प्रतिमान में '''शासक सर्वसत्ताधीश''' होता है। सर्वोपरि होता है। शासन अपनी योग्यता और क्षमताओं के आधार पर समाज को निर्देशित, नियंत्रित और नियमित करता है। व्यक्तिवादी समाज में इस व्यवस्था समूह को बदलना लगभग असंभव होता है। शासन बदल जाता है किन्तु उसका 'स्व'रूप या स्वभाव नहीं बदलता। इसी लिये किंग के काल में भी और लोकतंत्र के काल में भी शासन सर्वोपरि ही रहा। इस व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न स्वरूप का होगा: &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+&lt;br /&gt;
! colspan=&amp;quot;5&amp;quot; |शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|प्रशासन&lt;br /&gt;
|सुरक्षा&lt;br /&gt;
|अर्थ&lt;br /&gt;
|न्याय&lt;br /&gt;
|शिक्षा&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
प्रसिध्द भारतीय चिंतक और विद्वान डॉ. देवेन्द्र स्वरूप प्रतिमान का और शिक्षा व्यवस्था का संबंध विषद करते हैं&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ. देवेन्द्र स्वरूप, ' भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति का विकास' पृष्ठ 7&amp;lt;/ref&amp;gt;। 'शिक्षा प्रणाली के संबंध में विचार करने से पूर्व हमें यह विचार करना होगा कि हम राष्ट्र में कैसा मनुष्य बनाना चाहते हैं, उसकी जीवनशैली क्या होगी, उसका पारिवारिक और सामाजिक परिवेष कैसा होगा? अर्थात् राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रचना कैसी होगी? &lt;br /&gt;
इसी पृष्ठ पर देवेन्द्रस्वरूपजी लिखते हैं-  &lt;br /&gt;
 प्रारंभ में उन्होंने (अंग्रेजों ने) भारत की पुरानी राजस्व, न्याय, प्रशासन प्रणाली से ही काम चलाना चाहा और साथ ही अपने साम्राज्य के चिर स्थायित्व के लिये अंग्रेजी शिक्षा का आरोपण करने की कोशिश भी की; किन्तु ये कोशिशें बेकार गयीं। तब उन्होंने अनुभव किया कि शिक्षा प्रणाली का किसी देश की राजस्व, न्याय, प्रशासन और अर्थव्यवस्था से गहरा संबंध होता है।&lt;br /&gt;
ऐसा होने के कारण इन सभी व्यवस्थाओं का आधार उस समाज के जीवन के प्रतिमान की साझी जीवनदृष्टि और उस पर आधारित व्यवहार सूत्र होते हैं। इस कारण ''किसी प्रतिमान के व्यवस्था समूह में से केवल एक व्यवस्था को जो भिन्न जीवन दृष्टि पर आधारित है, बदलना संभव नहीं होता''। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
भारतीय प्रतिमान के व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न प्रकार का है। &lt;br /&gt;
ऐसा ढांचे का चित्र या ऐसे ढाँचे का विवरण भी अन्य किसी शास्त्रीय ग्रन्थ में से नहीं लिया गया है। यह तो लेखक ने अपनी समझ के अनुसार यह ढांचा कैसा हो सकता है उसकी रूपरेखा अपनी कल्पना से ही बनाई है। &lt;br /&gt;
[[File:Part 1 Last Chapter Table Bhartiya Jeevan Pratiman.jpg|center|thumb|969x969px|भारतीय व्यवस्था समूह]]&lt;br /&gt;
 भारत में कभी भी '''सामाजिक व्यवस्थाओं के स्वरूप को तय करने की जिम्मेदारी राजा या शासक की नहीं रही'''। धर्मसत्ता द्वारा प्रस्तुत '''व्यवस्थाओं को स्थापित करने की जिम्मेदारी राजा की या शासन की होती थी'''। रघुवंशम् में कालिदास इस की पुष्टि करते हैं। &lt;br /&gt;
राजा की या कभी गणतंत्रात्मक शासन रहा तब भी शासन की जिम्मेदारी धर्माचार्यों द्वारा निर्मित धर्मशास्त्र या समाजशास्त्र के अनुपालन करने की और करवाने की ही रही। धर्म का अनुपालन करने वाला समाज निर्माण करने और उसे धर्माचरणी बनाए रखने के लिये हमारे पूर्वजों ने एक व्यवस्था समूह निर्माण किया था।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक कारणों से ये व्यवस्थाएं दुर्बल हुईं। काल के प्रवाह में इन में कुछ दोष भी निर्माण हुए। लेकिन फिर भी यह व्यवस्था समूह अंग्रेज शासन भारत में स्थापित हुआ तब तक प्रत्यक्ष अस्तित्व में रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस व्यवस्था समूह की व्यवस्था के तीन पहलू थे। '''पोषक''' व्यवस्था, '''रक्षक''' व्यवस्था और '''प्रेरक''' व्यवस्था। इन में प्रेरक व्यवस्था तब ही ठीक से काम कर सकती है जब उस के साथ में पोषक और रक्षक व्यवस्था भी काम करती है। इस लिये समाज की सभी व्यवस्थाओं में यह तीनों पहलू विकेंद्रित स्वरूप में ढाले गये थे। प्रेरक यानी शिक्षा व्यवस्था का काम समाज को धर्माचरण सिखाने का था। भारतीय प्रतिमान में प्रेरक व्यवस्थाओं को अत्यंत श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी बनाना शिक्षा व्यवस्था का काम है। जो ५-१० प्रतिशत लोग इस प्रेरक व्यवस्था के प्रयासों के उपरांत भी अधर्माचरण करते थे, उन के लिये ही शासन व्यवस्था यानी दण्ड विधान की आवश्यकता होती है। यदि प्रेरक और पोषक व्यवस्थाओं के माध्यम से समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी नहीं बनाया गया तो रक्षक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर सकती। यूरो अमरिकी शिक्षा की दस पीढियाँ बीतने के बाद भी यदि अब भी काफी मात्रा में यूरोप या अमरिकी समाजों की तुलना में हम 'पारिवारिक भावना' को अभी तक बचा पाए हैं तो वह अभी भी अपना अस्तित्व बनाए रखने वाली समानान्तर '''शिक्षा व्यवस्था''', '''परिवार व्यवस्था''' और '''समाज व्यवस्था''' आदि के कारण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त ढाँचा भारतीय प्रतिमान की मोटी मोटी अभिव्यक्ति है।  &lt;br /&gt;
* इस में '''धर्म''' व्यवस्था सामाजिक नीति नियम अर्थात् धर्माचरण के व्यावहारिक सूत्र तय करने का और अधर्माचरण के व्यवहार के लिये दण्ड विधान बनाने का काम करती है। अर्थात् शास्त्रीय भाषा में '''श्रृति के आधार पर 'स्मृति' निर्माण करने का काम''' करती है। इस प्रकार प्रेरक, पोषक तथा निवारक/रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का मार्गदर्शन करती है।  &lt;br /&gt;
* इस मार्गदर्शन का माध्यम '''शिक्षा''' व्यवस्था होती है। इस लिये शिक्षा का या ज्ञानसत्ता का स्थान धर्मसत्ता से नीचे किन्तु शासन की अन्य सत्ताओं से ऊपर का होता है। ब्रह्मचर्य आश्रम, गुरूकुल या विद्याकेन्द्र और कुछ प्रमाण में परिवारों में भी वर्णानुसारी और जीवन के लिये उपयुक्त ऐसे सभी पहलुओं की शिक्षा दी जाती है।  &lt;br /&gt;
* लोग जब '''वर्ण''' के अनुसार व्यवहार करते हैं तब समाज '''सुसंस्कृत''' बनता है।  और जब लोग अपनी अपनी '''जाति''' के अनुसार व्यवसाय करते हैं समाज '''समृध्द''' बनता है।  &lt;br /&gt;
* '''रक्षक''' या निवारक व्यवस्थाएं समाज और व्यक्तियों की संस्कृति और समृध्दि की रक्षा के लिये होती हैं।  &lt;br /&gt;
* वर्ण और आश्रम यह व्यवस्थाएं समाज की रचना की व्यवस्थाएं हैं।   &lt;br /&gt;
* परिवार व्यवस्था श्रेष्ठ मानव को जन्म देकर उसे वर्णानुसार संस्कारित करने की व्यवस्था है। यह व्यवस्था पारिवारिक भावना के विकास की भी व्यवस्था है। यह समाज व्यवस्था का लघु-रूप है। सामाजिकता की शिक्षा की नींव डालना परिवार व्यवस्था का काम है। इस कारण इस में पोषक, प्रेरक और रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का समावेश होता है। इसी प्रकार से जन्म से लेकर मृत्यू पर्यंत तक मनुष्य की बढती और घटती क्षमताओं और योग्यताओं के समायोजन की भी व्यवस्था परिवार में होती है।  &lt;br /&gt;
* जाति व्यवस्था, परिवार और ग्रामकुल यह तीनों मिल कर '''अर्थ''' व्यवस्था यानी समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली व्यवस्था बनती है।  &lt;br /&gt;
* रक्षक व्यवस्था भी इन तीनों व्यवस्थाओं में और चौथे शासन व्यवस्था में विकेन्द्रित रूप में स्थापित होती है। परिवार के जाति के या ग्राम के स्तर पर जब प्रेरक, पोषक और रक्षक व्यवस्था अव्यवस्थित हो जाती है या उस का हल नहीं निकल पाता है तब ही केवल शासन व्यवस्था की भूमिका शुरू होती है।  &lt;br /&gt;
जाति व्यवस्था, कौटुंबिक उद्योग और ग्रामकुल में आवश्यकताओं और उत्पादन का समायोजन ठीक से होने से समाज की प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति समाज आप ही कर लेता है। ऐसा समाज कभी अन्य समाजों की लूट करने के लिये आक्रमण नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान में अर्थसत्ता सर्वोपरि बनी हुई है। राजसत्ता उस के निर्देशन में चलती है। शिक्षा अर्थात् ज्ञानसत्ता शासन के नियंत्रण में है। और धर्मसत्ता का तो कहीं नामोनिशान तक दिखाई नहीं देता। प्रतिमान के व्यवस्था समूह की यह एकदम उलटी स्थिती है। धर्म सत्ता के निर्देशन में जब ज्ञानसत्ता शासन और अर्थव्यवस्था को निर्देशित करती है तब समाज ठीक दिशा में सोचता भी है और आगे भी बढता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ण व्यवस्था का एक काम तो वर्णों की निश्चिती करने का था। बालक के वर्ण के अनुसार उसके लिये संस्कार और शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था करने का था। ऐसा करने से उस बालक को भी लाभ होता है और समाज को भी लाभ होता था। दूसरा काम था वर्ण संकर के कारण निर्माण हुई जातियों के नाम, काम (व्यावसायिक कौशल का क्षेत्र) और जातिधर्म को तय करना। जातिव्यवस्था के काम जातिगत अनुशासन, व्यवसाय कौशलों में वृध्दि की व्यवस्था, जातिगत व्यावसायिक ज्ञान का विकास करना और जाति बांधवों को सदाचारी और सर्वहितकारी बनाए रखना, यह थे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवारक यानी शासन व्यवस्था भी विकेन्द्रित थी। जातिगत अनुशासन के बारे में जाति पंचायतों का अपना दण्डविधान होता था। इसी प्रकार से ग्रामकुल की अपनी अनुशासन पालन करवाने की और सुरक्षा व्यवस्था होती थी। इन दोनों के स्तर पर जब मामला हल नहीं होता था तब ही वह शासक के पास जाता था। इस लिये न्याय भी अच्छा होता था, अल्पतम समय में होता था और शासन के पास आने वाले मुकदमों की संख्या अत्यल्प होती थी।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी व्यवस्थाओं का आधार पारिवारिक भावना होती थी। गुरू और शिष्य के संबंध (शिक्षा क्षेत्र) मानस पिता-पुत्र जैसे होते थे। विद्याकेन्द्र (गुरू) कुल होते थे। एक ही व्यवसाय करने वाले स्पर्धक नहीं जाति बांधव होते थे। गाँव के किसी की भी बेटी गाँव के प्रत्येक की बहन-बेटी होती थी। न्यायाधीश भी आप्तोप्त (अपराधी जैसे अपना आप्त हो) इस भावना से दण्ड देते थे। पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त का दण्डविधान में विशेष महत्व था। प्रजा (अर्थ है संतान) और राजा का संबंध संतान और पिता का सा होता था। हमारे बाजार भी परिवार भावना से चलते थे। वर्तमान प्रतिमान के कारण हमारे परिवार भी बाजार भावना से चलने लग गये हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप गुरूकुल का था। अर्थात् पारिवारिक था। इस में वर्ण भी सुनिश्चित किये जाते थे। आगे वर्णानुसारी शिक्षा भी दी जाती थी। समाज के सभी बच्चों के लिये यह व्यवस्था उपलब्ध थी। जनसंख्या के बढने से गुरुकुल शिक्षा केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण के बच्चों तक सिमट गई। वैश्य बच्चे अपने परिवारों में और जातिगत व्यवस्थाओं में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने लगे। बर्बर आक्रमणों ने और आक्रांताओं ने शिक्षा व्यवस्था को और तोडा। फिर भी एकल विद्यालयों के रूप में अंग्रेज शासन के पूर्व काल तक ५ लाख से भी अधिक संख्या में यह विद्यालय चलते थे। समाज के सभी बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था इन में थी। शिक्षकों में भी सभी जाति के शिक्षक थे। किन्तु वे सब श्रीमद्बगवद्गीता में वर्णित ब्राह्मण का सा व्यवहार करनेवाले थे। नि;स्वार्थ भाव से नि:शुल्क शिक्षा देते थे। यानी ज्ञानदान करते थे। इस पूरे काल में शिक्षा का आधार, सभी विषयों की विषयवस्तू का आधार परिवार भावना या परस्पर आत्मीयता के संबंध यही रहा। सर्वे भवन्तु सुखिन: यही रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपसंहार ==&lt;br /&gt;
वर्तमान व्यवस्था समूह या पूरे मानव जीवन का प्रतिमान यूरो-अमरिकी बन गया है। विश्व के अन्य समाजों के पास इसे अपनाने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इस प्रतिमान के कारण कई संकट निर्माण हो रहे हैं यह जानते हुए भी सभी समाज, जो औरों का होगा वह हमारा भी होगा यह मान रहे हैं। एक भारत के पास ही इस प्रतिमान से श्रेष्ठ प्रतिमान देने के लिये विकल्प है। इसके कुछ अवशेष समाज जीवन में मुसलमानों ने नष्ट और अंग्रेजों ने भ्रष्ट करने के उपरांत भी बचे हुए साहित्य में उपलब्ध हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान प्रतिमान में धीरे धीरे भारतीय प्रतिमान के कुछ बिन्दू जोड कर इसे भारतीय बनाने का प्रयास करने वाले व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन लाखों की संख्या में हैं। ये सभी व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन पूरी श्रध्दा, समर्पण भाव, और प्रामाणिकता से प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों के कारण भारतीय प्रतिमान को रौंदने की गति कुछ कम भी हुई है, लेकिन बंद नहीं हुई है। ऐसे प्रयासों का प्रारंभ तो १९ वीं सदी के मध्य से ही हो गया था। इन प्रयासों की गति और शक्ति भी निरंतर बढ रही है। लेकिन यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मिलने वाली समाज की मान्यता भी इन प्रयासों की अपेक्षाओं के विपरीत, बढती ही जा रही है। अतएव ऐसे प्रयासों से मिलने वाले तात्कालिक और अत्यंत सीमित लाभ के लालच को छोड कर शुध्द रूप से भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के प्रयास करने होंगे। इस परिवर्तन के लिये प्रचंड इच्छाशक्ति, वैचारिक मंथन, और प्रेरक और निवारक शक्ति की आवश्यकता होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस प्रकार अपनी शिक्षा प्रणाली को भारत में स्थापित करने के लिये अंग्रेजों ने यहाँ की शासन प्रणाली, कर प्रणाली, अर्थ व्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि को नष्ट कर भारतीय समाज में वैकल्पिक व्यवस्थाओं की माँग निर्माण की। शायद ऐसा ही कुछ हमें भी करना होगा। विनोबा भावे ने शिक्षा को भारतीय बनाने की दृष्टि से ऐसे ही प्रयोग का सुझाव दिया था। उन की सूचना को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। &lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. भारतीय शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, प्रकाशक पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान - भाग १)]]&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<title>Jeevan Ka Pratiman-Part 1 (जीवन का प्रतिमान-भाग १)</title>
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		<updated>2020-01-02T13:37:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: /* अभारतीय तत्वज्ञान, जीवनदृष्टि और इन पर आधारित व्यवहार सूत्र */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
== '''जीवन का प्रतिमान''' ==&lt;br /&gt;
* जीते तो सभी हैं। लेकिन हर समाज का जीने का तरीका होता है। उस समाज की समझ के अनुसार यह तरीका अन्य समाजों से श्रेष्ठ जीने का तरीका होता है। इस जीवन जीने के तरीके को '''जीवनशैली''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जीवनशैली का आधार उस समाज की जीवन जीने के संबंध में कुछ मान्यताएं होती हैं। इन मान्यताओं को उस समाज की '''जीवनदृष्टि''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
* यह मान्यताएं या जीवनदृष्टि और जीवनशैली उस समाज की '''विश्वदृष्टि''' पर आधारित होते हैं। विश्वदृष्टि का अर्थ है उस समाज की विश्व या चर-अचर सृष्टि के निर्माण से संबंधित मान्यताएं। इन्हीं को उस समाज का तत्वज्ञान भी कहते हैं। यह मान्यताएं या विश्व दृष्टि ही व्यक्ति के अन्य मानवों से संबंध और व्यक्ति के और अन्यों के चर-अचर सृष्टि के साथ संबंध तय करती है। &lt;br /&gt;
* अपनी विश्व दृष्टि और उस पर आधारित जीवनदृष्टि के अनुसार समाज जीवन चले इस लिये वह समाज कुछ व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। ये व्यवस्थाएं समान मान्यताओं को आधार मान कर निर्माण की जातीं हैं। इस लिये ये व्यवस्थाएं एक दूसरे की पूरक भी होतीं हैं और मददरूप भी होतीं हैं। इस व्यवस्था समूह को ही उस समाज की विश्वदृष्टि यानी जीवन दृष्टि और जीवनशैली के साथ मिला कर उस समाज के '''जीवन का प्रतिमान''' कहते हैं। अंग्रेजी में इसे पॅरेडिम (paradigm) कहते हैं। &lt;br /&gt;
वर्तमान शिक्षा वर्तमान अभारतीय जीवन के प्रतिमान का ही एक हिस्सा है। इस शिक्षा का जिन पर गहरा प्रभाव है उन्हें लगता है कि मानव जाति अष्म या पाषाण युग से निरंतर श्रेष्ठ बन रही है। वर्तमान मानव और मानव जाति से भविष्य की मानव और मानव जाति अधिक श्रेष्ठ होंगे। किन्तु जो इस शिक्षा से प्रभावित नहीं हुए हैं, या जो भारतीय काल गणना की समझ रखते हैं उन्हें अपने अनुभवों से भी और भारतीय शास्त्रों के कथन के अनुसार भी लगता है कि मानव जाति का निरंतर ह्रास हो रहा है। सत्ययुग का मानव और मानव जाति अत्यंत श्रेष्ठ थे। काम और मोह से मुक्त थे। त्रेता युग में सत्ययुग के मानव का ह्रास हुआ। द्वापर में उस से भी अधिक ह्रास हुआ। कलियुग में द्वापर से भी स्थिति और बिगडी और निरंतर बिगड रही है। किसे क्या लगता है इस का संबंध वह मानव या मानव समाज, किस प्रतिमान को ठीक मानता है इस से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में जयचंद को तो देशद्रोही माना जाता है लेकिन विभीषण को नहीं। इस का संबंध जीवन के भारतीय प्रतिमान को ठीक मानने से है। सिकंदर, चंगेज खान आदि जैसे लोग जो अपने कौशल की विधा के क्षेत्र में अत्यंत श्रेष्ठ थे उन्हें, जिन में ये जन्मे थे वे अभारतीय समाज अपने महापुरूष मानते हैं। अनुकरणीय मानते हैं। किन्तु भारतीय दृष्टि में बडप्पन का या अनुकरणीयता का प्राथमिक निकष उस का चारित्र्य माना जाता है। बुध्दिमत्ता, पराक्रम, कौशल आदि दूसरे और गौण स्थान पर आते हैं। रावण महा पराक्रमी था। बुध्दिमान था। राजनीति विशेषज्ञ था। किन्तु हम कभी उसे बडा या अनुकरणीय नहीं मानते। हम किसी बच्चे को 'तुम रावण जैसे महान बनो' ऐसा आशिर्वाद नहीं देते। इस का कारण वह अन्य अनेक गुण होने पर भी हीन चरित्र का था, यह है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक गणित के प्रस्तोता जगद्गुरू शंकराचार्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ कहते थे,'भारतीय और अभारतीय यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं'। (दीज आर टू डिफ्रंट एव्हरीथिंग्ज)। उन के इस कथन का संदर्भ जीवन जीने के तत्वज्ञान, व्यवहार और व्यवस्था समूह से बने भारतीय और अभारतीय प्रतिमानों से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगे अब हम तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि, जीवनशैली (व्यवहार), और व्यवस्था समूहों से बनने वाले प्रतिमानों को समझने का प्रयास करेंगे। देशिक शास्त्र में इसी तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि को उस समाज का 'स्वभाव' या 'चिति' कहा है। इस जीवनदृष्टि के अनुरूप वह समाज सर्व मान्य ऐसे कुछ व्यवहार सूत्र तय करता है और उन के अनुसार प्रत्यक्ष व्यवहार करता है। ऐसा व्यवहार सर्व सामान्य मनुष्य भी कर सके इस लिये वह व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। समाज के इस प्रकार अपनी जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करने और  व्यवस्था समूह निर्माण कर आगे बढने को ही देशिक शास्त्र में उस समाज के विराट का जागरण होता है ऐसा कहा गया है। चिति और विराट मिलाकर उस समाज के जीवन का प्रतिमान बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व प्रथम हम अभारतीय विश्व दृष्टि (वर्ल्ड व्ह्यू) या तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि और उस के अनुसार निर्माण किये व्यवहार सूत्र (जीवनशैली) और आगे इन के लिये उपयुक्त व्यवस्था समूह को भी समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अभारतीय तत्वज्ञान, जीवनदृष्टि और इन पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
वर्तमान विश्व में प्रमुख रूप से जीवन के दो प्रतिमान अस्तित्व में हैं। एक है '''भारतीय प्रतिमान'''। यह अभी सुप्त अवस्था में है। जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है।  दूसरा है '''यूरो-अमरिकी प्रतिमान'''। यहूदी, ईसाई और मुस्लिम समाज इस दूसरे प्रतिमान को मानने वाले हैं। इस प्रतिमान ने भारतीय समाज के साथ ही विश्व के अन्य सभी समाजों को गहराई से प्रभावित किया है। भारतीय समाज छोड कर अन्य सभी समाजों ने इसे सर्वार्थ से या तो अपना लिया है या तेजी से अपना रहे हैं। केवल भारतीय समाज ही अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर पुन: जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है। इस यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मानने वाले दो तबके हैं। यूरो-अमरिकी मजहबी दृष्टि के अनुसार विश्व के निर्माण की मान्यता एक जैसी ही है। &lt;br /&gt;
* एक तबका है ईसाईयत के तत्वज्ञान को आधार मानने वाला। इन का तत्वज्ञान निम्न है: येहोवा/गॉड/ अल्ला ने पाँच दिन सृष्टि का निर्माण किया और छठे दिन मानव का निर्माण कर मानव से कहा कि ' यह चर-अचर सृष्टि तुम्हारे उपभोग के लिये है'। यूरो अमरिकी समाज पर फ्रांसिस बेकन और रेने देकार्ते इन दो फिलॉसॉफरों की फिलॉसॉफिी का गहरा प्रभाव है। इन का तत्वज्ञान कहता है कि प्रकृति मानव की दासी है। इसे कस कर अपनी जकड में रखना चाहिये। मानव जम कर इस का शोषण कर सके इसी लिये इस का निर्माण हुआ है। इस लिये प्रकृतिे का मानव ने जम कर (टू द हिल्ट) शोषण करना चाहिये।&lt;br /&gt;
* और दूसरा है यूरो-अमरिकी और उन का अनुसरण करने वाले दार्शनिकों का और साईंटिस्टों का। वैसे तो आधुनिक साईंस ने ईसाईयत के कई गंभीर सिध्दांतों की धज्जियाँ उडा दी है, लेकिन फिर भी मोटा-मोटी दोनों तबकों का तत्वज्ञान एक ही है। इस लिये जीवन का प्रतिमान भी एक ही है।  यूरो-अमरिकी साईंटिस्टों और उन का अनुसरण करने वाले भारतीय समेत विश्व के सभी साईंटिस्टों की विश्वदृष्टि का आधार '''डार्विन की 'विकास वाद' और मिलर की 'जड से रासायनिक प्रक्रिया से जीव निर्माण'''' की परिकल्पनाएं ही हैं। मानव इन रासायनिक प्रक्रियाओं के पुलिंदों में सर्वश्रेष्ठ है। इस लिये इसे अपने स्वार्थ के लिये अन्य रासायनिक प्रक्रियाएं नष्ट करने का पूरा अधिकार है।&lt;br /&gt;
मजहब या रिलीजन, फिलॉऑफरों की फिलॉसॉफि और साईंटिस्टों के ऐसे तीनों के प्रभाव के कारण जो अभारतीय जीवन दृष्टि बनीं है उस के तीन मुख्य पहलू हैं:&lt;br /&gt;
#व्यक्तिवादिता : सारी सृष्टि केवल मेरे उपभोग के लिये बनीं है।&lt;br /&gt;
# जडवादिता : सृष्टि में सब जड ही है। चेतनावान कुछ भी नहीं है।&lt;br /&gt;
# इहवादिता : जो कुछ है यही जन्म है। इस से नहीं तो पहले कुछ था और ना ही आगे कुछ है।  &lt;br /&gt;
इस जीवनदृष्टि के अनुसार जो व्यवहार सूत्र बने वे निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# अनिर्बाध व्यक्तिस्वातंत्र्य (अनलिमिटेड इंडिव्हिज्युल लिबर्टी - unlimited individual liberty)।&lt;br /&gt;
# बलवान ही जीने का अधिकारी (सर्वायवल ऑफ द फिटेस्ट - survival of the fittest)।&lt;br /&gt;
# दुर्बल का शोषण (एक्स्प्लॉयटेशन ऑफ द वीक - exploitation of the weak)।&lt;br /&gt;
# सारी चराचर सृष्टि मेरे अनिर्बाध उपभोग के लिये बनी है। इस पर मेरा अधिकार है। इस के प्रति मेरा कोई कर्तव्य नहीं है। (राईट्स् बट नो डयूटीज- Rights but no duties)।&lt;br /&gt;
# अन्य मानव भी सृष्टि का उपभोग अपना अनिर्बाध अधिकार मानते हैं। इस लिये मुझे अपने उपभोग (जीने) के लिये अन्यों से संघर्ष करना होगा। (फाईट फॉर सर्व्हायव्हल -fight for survival)।&lt;br /&gt;
# उपभोग के लिये मुझे केवल यही जीवन मिला है। इस जीवन से पहले मै नहीं था और इस जीवन के समाप्त होने के बाद भी मै नहीं रहूंग़ा। इस लिये जितना उपभोग कर सकूँ, कर लूँ। (कंझ्यूमेरिझम् - consumerism)।&lt;br /&gt;
# इहवादिता (धिस इज द ओन्ली लाईफ। देयर वॉज नथिंग बिफोर एँड देयर शॅल बी नथिंग बियाँड धिस लाईफ - This is the only life. There was nothing before and there shall be nothing beyond this life)।&lt;br /&gt;
# मेरी रासायनिक प्रक्रिया (जीवन) अच्छी चले (स्वार्थ) यह महत्वपूर्ण है। इस लिये किसी अन्य रासायनिक प्रक्रिया में बाधा आती है (परपीडा होती है) तो भले आये। अन्य कोई रासायनिक प्रक्रिया बंद होती है (जीवन नष्ट होता है) तो भले हो जाये।&lt;br /&gt;
# चैतन्य को नकारने के कारण सृष्टि के विभिन्न अस्तित्वों में स्थित अंतर्निहित एकात्मता को अमान्य करने के कारण टुकडों में विचार करने की सोच। (पीसमील एॅप्रोच - piecemeal approach) ।&lt;br /&gt;
# सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों का आधार स्वार्थ ही है। सामाजिक संबंधों का आधार इसी लिये 'काँट्रॅक्ट' या करार या समझौता या एॅग्रीमेंट होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
# &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय तत्वज्ञान और जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
भारतीय मान्यता के अनुसार कण कण, चर अचर सब परमात्मा के ही रूप हैं : &amp;lt;blockquote&amp;gt;'''एकाकी न रमते'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;', '&amp;lt;nowiki/&amp;gt;'''सो कामयत्'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;',  ''''एकोऽहं बहुस्याम:'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;' । &amp;lt;/blockquote&amp;gt;सारी सृष्टि यह उस परमात्त्व तत्व का ही विस्तार मात्र है। इस लिये सृष्टि के सारे घटक एक दूसरे से 'आत्मीयता' के भाव से जुडे हैं। समाज निर्माण और परस्पर सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के बारे में श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भगवद्गीता, 3.10 एवं 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''अनेन प्रसविश्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक ॥ 3.10 ॥'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ ( अन्यों के हित के काम) के साथ प्रजा को निर्माण किया और कहा कि परस्पर हित साधते हुए उत्कर्ष (प्रगति) करो। यह है परस्पर सामाजिक संबंधों का आधार। आगे कहा है&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ ॥ 3.11 ॥'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - देवताओं ( वायू, वरुण, अग्नि, पृथ्वी आदि यानी पर्यावरण) का पोषण करते हुए नि:स्वार्थ भाव से परस्पर हित साधते हुए परम कल्याण को प्राप्त करो। यह है पर्यावरण से संबंधों का आधार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त तत्वज्ञान पर आधारित भारतीय जीवन दृष्टि के सूत्र निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# सारी सृष्टि आत्म तत्व का ही विस्तार है। मनुष्य परमात्मा का ही सर्वश्रेष्ठ रूप है। एकात्मता सृष्टि के सभी व्यवहारों का आधारभूत सिध्दांत है। परस्पर संबंधों का आधार पारिवारिक भावना है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि चेतन से बनीं है जड से नहीं।&lt;br /&gt;
# जीवन स्थल (वर्तमान चर-अचर सृष्टि को प्रभावित करने वाला और उस से प्रभावित होने वाला) और काल (सृष्टि के निर्माण से लेकर सृष्टि के अंत तक) के संदर्भ में अखंड है। पुनर्जन्म ही काल के संदर्भ में अखंडता है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि की रचना परस्पर पूरक और चक्रीय है।&lt;br /&gt;
# कर्म ही मानव जीवन को नियमन करते हैं। कर्मसिध्दांत इसे समझने का साधन है। अच्छे (परोपकार या पुण्य) कर्म जीवन को अच्छा और बुरे (परपीडा या पाप) कर्म जीवन को बुरा बनाते हैं।&lt;br /&gt;
# मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष है। सामाजिक जीवन का लक्ष्य 'स्वतंत्रता' है। उपर्युक्त जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्रों की चर्चा हमने [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यहाँ]] की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== यूरो-अमरिकी व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
यूरो-अमरिकी समाज ने अपनी विश्व दृष्टि ( वर्ल्ड व्हू world view) के अनुसार जीवन जीने के जो व्यवहार सूत्र बनाए उन्हें व्यवहार में लाना संभव हो इस लिये व्यवस्थाओं का एक समूह भी निर्माण किया। ये व्यवस्थाएं एक ओर तो उन की जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करना संभव बनातीं हैं तो दूसरी ओर प्रतिमान की अन्य व्यवस्थाओं को भी पुष्ट बनातीं हैं। इन सभी का आधार व्यक्तिवाद, इहवाद और जडवाद ही है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यवस्थाओं से दो प्रकार की आवश्यकता पूर्ण होती है।  &lt;br /&gt;
# पहली आवश्यकता यह होती है कि समाज के घटकों को समाज का तत्वज्ञान और व्यवहार सिखाना।  &lt;br /&gt;
# और दूसरी आवश्यकता होती है वह समाज अपने तत्वज्ञान और व्यवहार के अनुसार जी सके इस लिये। &lt;br /&gt;
'''यूरो अमरिकी प्रतिमान की सोच यह है कि समाज की सभी व्यवथाओं का स्वरूप तय करना और व्यवस्थाओं का निर्माण करना यह शासन का कर्तव्य भी है और जिम्मेदारी भी है।''' इस मान्यता का शासन के स्वरूप से, यानी शासन किंग का है या लोकतंत्रात्मक है इस से कोई संबंध नहीं है। इस यूरो अमरिकी प्रतिमान में '''शासक सर्वसत्ताधीश''' होता है। सर्वोपरि होता है। शासन अपनी योग्यता और क्षमताओं के आधार पर समाज को निर्देशित, नियंत्रित और नियमित करता है। व्यक्तिवादी समाज में इस व्यवस्था समूह को बदलना लगभग असंभव होता है। शासन बदल जाता है किन्तु उसका 'स्व'रूप या स्वभाव नहीं बदलता। इसी लिये किंग के काल में भी और लोकतंत्र के काल में भी शासन सर्वोपरि ही रहा। इस व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न स्वरूप का होगा: &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+&lt;br /&gt;
! colspan=&amp;quot;5&amp;quot; |शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|प्रशासन&lt;br /&gt;
|सुरक्षा&lt;br /&gt;
|अर्थ&lt;br /&gt;
|न्याय&lt;br /&gt;
|शिक्षा&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
प्रसिध्द भारतीय चिंतक और विद्वान डॉ. देवेन्द्र स्वरूप प्रतिमान का और शिक्षा व्यवस्था का संबंध विषद करते हैं&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ. देवेन्द्र स्वरूप, ' भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति का विकास' पृष्ठ 7&amp;lt;/ref&amp;gt;। 'शिक्षा प्रणाली के संबंध में विचार करने से पूर्व हमें यह विचार करना होगा कि हम राष्ट्र में कैसा मनुष्य बनाना चाहते हैं, उसकी जीवनशैली क्या होगी, उसका पारिवारिक और सामाजिक परिवेष कैसा होगा? अर्थात् राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रचना कैसी होगी? &lt;br /&gt;
इसी पृष्ठ पर देवेन्द्रस्वरूपजी लिखते हैं-  &lt;br /&gt;
 प्रारंभ में उन्होंने (अंग्रेजों ने) भारत की पुरानी राजस्व, न्याय, प्रशासन प्रणाली से ही काम चलाना चाहा और साथ ही अपने साम्राज्य के चिर स्थायित्व के लिये अंग्रेजी शिक्षा का आरोपण करने की कोशिश भी की; किन्तु ये कोशिशें बेकार गयीं। तब उन्होंने अनुभव किया कि शिक्षा प्रणाली का किसी देश की राजस्व, न्याय, प्रशासन और अर्थव्यवस्था से गहरा संबंध होता है।&lt;br /&gt;
ऐसा होने के कारण इन सभी व्यवस्थाओं का आधार उस समाज के जीवन के प्रतिमान की साझी जीवनदृष्टि और उस पर आधारित व्यवहार सूत्र होते हैं। इस कारण ''किसी प्रतिमान के व्यवस्था समूह में से केवल एक व्यवस्था को जो भिन्न जीवन दृष्टि पर आधारित है, बदलना संभव नहीं होता''। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
भारतीय प्रतिमान के व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न प्रकार का है। &lt;br /&gt;
ऐसा ढांचे का चित्र या ऐसे ढाँचे का विवरण भी अन्य किसी शास्त्रीय ग्रन्थ में से नहीं लिया गया है। यह तो लेखक ने अपनी समझ के अनुसार यह ढांचा कैसा हो सकता है उसकी रूपरेखा अपनी कल्पना से ही बनाई है। &lt;br /&gt;
[[File:Part 1 Last Chapter Table Bhartiya Jeevan Pratiman.jpg|center|thumb|969x969px|भारतीय व्यवस्था समूह]]&lt;br /&gt;
 भारत में कभी भी '''सामाजिक व्यवस्थाओं के स्वरूप को तय करने की जिम्मेदारी राजा या शासक की नहीं रही'''। धर्मसत्ता द्वारा प्रस्तुत '''व्यवस्थाओं को स्थापित करने की जिम्मेदारी राजा की या शासन की होती थी'''। रघुवंशम् में कालिदास इस की पुष्टि करते हैं। &lt;br /&gt;
राजा की या कभी गणतंत्रात्मक शासन रहा तब भी शासन की जिम्मेदारी धर्माचार्यों द्वारा निर्मित धर्मशास्त्र या समाजशास्त्र के अनुपालन करने की और करवाने की ही रही। धर्म का अनुपालन करने वाला समाज निर्माण करने और उसे धर्माचरणी बनाए रखने के लिये हमारे पूर्वजों ने एक व्यवस्था समूह निर्माण किया था।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक कारणों से ये व्यवस्थाएं दुर्बल हुईं। काल के प्रवाह में इन में कुछ दोष भी निर्माण हुए। लेकिन फिर भी यह व्यवस्था समूह अंग्रेज शासन भारत में स्थापित हुआ तब तक प्रत्यक्ष अस्तित्व में रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस व्यवस्था समूह की व्यवस्था के तीन पहलू थे। '''पोषक''' व्यवस्था, '''रक्षक''' व्यवस्था और '''प्रेरक''' व्यवस्था। इन में प्रेरक व्यवस्था तब ही ठीक से काम कर सकती है जब उस के साथ में पोषक और रक्षक व्यवस्था भी काम करती है। इस लिये समाज की सभी व्यवस्थाओं में यह तीनों पहलू विकेंद्रित स्वरूप में ढाले गये थे। प्रेरक यानी शिक्षा व्यवस्था का काम समाज को धर्माचरण सिखाने का था। भारतीय प्रतिमान में प्रेरक व्यवस्थाओं को अत्यंत श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी बनाना शिक्षा व्यवस्था का काम है। जो ५-१० प्रतिशत लोग इस प्रेरक व्यवस्था के प्रयासों के उपरांत भी अधर्माचरण करते थे, उन के लिये ही शासन व्यवस्था यानी दण्ड विधान की आवश्यकता होती है। यदि प्रेरक और पोषक व्यवस्थाओं के माध्यम से समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी नहीं बनाया गया तो रक्षक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर सकती। यूरो अमरिकी शिक्षा की दस पीढियाँ बीतने के बाद भी यदि अब भी काफी मात्रा में यूरोप या अमरिकी समाजों की तुलना में हम 'पारिवारिक भावना' को अभी तक बचा पाए हैं तो वह अभी भी अपना अस्तित्व बनाए रखने वाली समानान्तर '''शिक्षा व्यवस्था''', '''परिवार व्यवस्था''' और '''समाज व्यवस्था''' आदि के कारण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त ढाँचा भारतीय प्रतिमान की मोटी मोटी अभिव्यक्ति है। इस में धर्म व्यवस्था सामाजिक नीति नियम अर्थात् धर्माचरण के व्यावहारिक सूत्र तय करने का और अधर्माचरण के व्यवहार के लिये दण्ड विधान बनाने का काम करती है। अर्थात् शास्त्रीय भाषा में '''श्रृति के आधार पर 'स्मृति' निर्माण करने का काम''' करती है। इस प्रकार प्रेरक, पोषक तथा निवारक/रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का मार्गदर्शन करती है। इस मार्गदर्शन का माध्यम शिक्षा व्यवस्था होती है। इस लिये शिक्षा का या ज्ञानसत्ता का स्थान धर्मसत्ता से नीचे किन्तु शासन की अन्य सत्ताओं से ऊपर का होता है। ब्रह्मचर्य आश्रम, गुरूकुल या विद्याकेन्द्र और कुछ प्रमाण में परिवारों में भी वर्णानुसारी और जीवन के लिये उपयुक्त ऐसे सभी पहलुओं की शिक्षा दी जाती है। लोग जब वर्ण के अनुसार व्यवहार करते हैं तब समाज सुसंस्कृत बनता है। और जब लोग अपनी अपनी जाति के अनुसार व्यवसाय करते हैं समाज समृध्द बनता है। रक्षक या निवारक व्यवस्थाएं समाज और व्यक्तियों की संस्कृति और समृध्दि की रक्षा के लिये होती हैं। वर्ण और आश्रम यह व्यवस्थाएं समाज की रचना की व्यवस्थाएं हैं। परिवार व्यवस्था श्रेष्ठ मानव को जन्म देकर उसे वर्णानुसार संस्कारित करने की व्यवस्था है। यह व्यवस्था पारिवारिक भावना के विकास की भी व्यवस्था है। यह समाज व्यवस्था का लघु-रूप है। सामाजिकता की शिक्षा की नींव डालना परिवार व्यवस्था का काम है। इस कारण इस में पोषक, प्रेरक और रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का समावेश होता है। इसी प्रकार से जन्म से लेकर मृत्यू पर्यंत तक मनुष्य की बढती और घटती क्षमताओं और योग्यताओं के समायोजन की भी व्यवस्था परिवार में होती है। जाति व्यवस्था, परिवार और ग्रामकुल यह तीनों मिल कर अर्थ व्यवस्था यानी समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली व्यवस्था बनती है। रक्षक व्यवस्था भी इन तीनों व्यवस्थाओं में और चौथे शासन व्यवस्था में विकेन्द्रित रूप में स्थापित होती है। परिवार के जाति के या ग्राम के स्तर पर जब प्रेरक, पोषक और रक्षक व्यवस्था अव्यवस्थित हो जाती है या उस का हल नहीं निकल पाता है तब ही केवल शासन व्यवस्था की भूमिका शुरू होती है। जाति व्यवस्था, कौटुंबिक उद्योग और ग्रामकुल में आवश्यकताओं और उत्पादन का समायोजन ठीक से होने से समाज की प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति समाज आप ही कर लेता है। ऐसा समाज कभी अन्य समाजों की लूट करने के लिये आक्रमण नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान में अर्थसत्ता सर्वोपरि बनी हुई है। राजसत्ता उस के निर्देशन में चलती है। शिक्षा अर्थात् ज्ञानसत्ता शासन के नियंत्रण में है। और धर्मसत्ता का तो कहीं नामोनिशान तक दिखाई नहीं देता। प्रतिमान के व्यवस्था समूह की यह एकदम उलटी स्थिती है। धर्म सत्ता के निर्देशन में जब ज्ञानसत्ता शासन और अर्थव्यवस्था को निर्देशित करती है तब समाज ठीक दिशा में सोचता भी है और आगे भी बढता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ण व्यवस्था का एक काम तो वर्णों की निश्चिती करने का था। बालक के वर्ण के अनुसार उसके लिये संस्कार और शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था करने का था। ऐसा करने से उस बालक को भी लाभ होता है और समाज को भी लाभ होता था। दूसरा काम था वर्ण संकर के कारण निर्माण हुई जातियों के नाम, काम (व्यावसायिक कौशल का क्षेत्र) और जातिधर्म को तय करना। जातिव्यवस्था के काम जातिगत अनुशासन, व्यवसाय कौशलों में वृध्दि की व्यवस्था, जातिगत व्यावसायिक ज्ञान का विकास करना और जाति बांधवों को सदाचारी और सर्वहितकारी बनाए रखना, यह थे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवारक यानी शासन व्यवस्था भी विकेन्द्रित थी। जातिगत अनुशासन के बारे में जाति पंचायतों का अपना दण्डविधान होता था। इसी प्रकार से ग्रामकुल की अपनी अनुशासन पालन करवाने की और सुरक्षा व्यवस्था होती थी। इन दोनों के स्तर पर जब मामला हल नहीं होता था तब ही वह शासक के पास जाता था। इस लिये न्याय भी अच्छा होता था, अल्पतम समय में होता था और शासन के पास आने वाले मुकदमों की संख्या अत्यल्प होती थी।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी व्यवस्थाओं का आधार पारिवारिक भावना होती थी। गुरू और शिष्य के संबंध (शिक्षा क्षेत्र) मानस पिता-पुत्र जैसे होते थे। विद्याकेन्द्र (गुरू) कुल होते थे। एक ही व्यवसाय करने वाले स्पर्धक नहीं जाति बांधव होते थे। गाँव के किसी की भी बेटी गाँव के प्रत्येक की बहन-बेटी होती थी। न्यायाधीश भी आप्तोप्त (अपराधी जैसे अपना आप्त हो) इस भावना से दण्ड देते थे। पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त का दण्डविधान में विशेष महत्व था। प्रजा (अर्थ है संतान) और राजा का संबंध संतान और पिता का सा होता था। हमारे बाजार भी परिवार भावना से चलते थे। वर्तमान प्रतिमान के कारण हमारे परिवार भी बाजार भावना से चलने लग गये हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप गुरूकुल का था। अर्थात् पारिवारिक था। इस में वर्ण भी सुनिश्चित किये जाते थे। आगे वर्णानुसारी शिक्षा भी दी जाती थी। समाज के सभी बच्चों के लिये यह व्यवस्था उपलब्ध थी। जनसंख्या के बढने से गुरुकुल शिक्षा केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण के बच्चों तक सिमट गई। वैश्य बच्चे अपने परिवारों में और जातिगत व्यवस्थाओं में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने लगे। बर्बर आक्रमणों ने और आक्रांताओं ने शिक्षा व्यवस्था को और तोडा। फिर भी एकल विद्यालयों के रूप में अंग्रेज शासन के पूर्व काल तक ५ लाख से भी अधिक संख्या में यह विद्यालय चलते थे। समाज के सभी बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था इन में थी। शिक्षकों में भी सभी जाति के शिक्षक थे। किन्तु वे सब श्रीमद्बगवद्गीता में वर्णित ब्राह्मण का सा व्यवहार करनेवाले थे। नि;स्वार्थ भाव से नि:शुल्क शिक्षा देते थे। यानी ज्ञानदान करते थे। इस पूरे काल में शिक्षा का आधार, सभी विषयों की विषयवस्तू का आधार परिवार भावना या परस्पर आत्मीयता के संबंध यही रहा। सर्वे भवन्तु सुखिन: यही रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपसंहार ==&lt;br /&gt;
वर्तमान व्यवस्था समूह या पूरे मानव जीवन का प्रतिमान यूरो-अमरिकी बन गया है। विश्व के अन्य समाजों के पास इसे अपनाने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इस प्रतिमान के कारण कई संकट निर्माण हो रहे हैं यह जानते हुए भी सभी समाज, जो औरों का होगा वह हमारा भी होगा यह मान रहे हैं। एक भारत के पास ही इस प्रतिमान से श्रेष्ठ प्रतिमान देने के लिये विकल्प है। इसके कुछ अवशेष समाज जीवन में मुसलमानों ने नष्ट और अंग्रेजों ने भ्रष्ट करने के उपरांत भी बचे हुए साहित्य में उपलब्ध हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान प्रतिमान में धीरे धीरे भारतीय प्रतिमान के कुछ बिन्दू जोड कर इसे भारतीय बनाने का प्रयास करने वाले व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन लाखों की संख्या में हैं। ये सभी व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन पूरी श्रध्दा, समर्पण भाव, और प्रामाणिकता से प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों के कारण भारतीय प्रतिमान को रौंदने की गति कुछ कम भी हुई है, लेकिन बंद नहीं हुई है। ऐसे प्रयासों का प्रारंभ तो १९ वीं सदी के मध्य से ही हो गया था। इन प्रयासों की गति और शक्ति भी निरंतर बढ रही है। लेकिन यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मिलने वाली समाज की मान्यता भी इन प्रयासों की अपेक्षाओं के विपरीत, बढती ही जा रही है। अतएव ऐसे प्रयासों से मिलने वाले तात्कालिक और अत्यंत सीमित लाभ के लालच को छोड कर शुध्द रूप से भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के प्रयास करने होंगे। इस परिवर्तन के लिये प्रचंड इच्छाशक्ति, वैचारिक मंथन, और प्रेरक और निवारक शक्ति की आवश्यकता होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस प्रकार अपनी शिक्षा प्रणाली को भारत में स्थापित करने के लिये अंग्रेजों ने यहाँ की शासन प्रणाली, कर प्रणाली, अर्थ व्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि को नष्ट कर भारतीय समाज में वैकल्पिक व्यवस्थाओं की माँग निर्माण की। शायद ऐसा ही कुछ हमें भी करना होगा। विनोबा भावे ने शिक्षा को भारतीय बनाने की दृष्टि से ऐसे ही प्रयोग का सुझाव दिया था। उन की सूचना को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। &lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. भारतीय शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, प्रकाशक पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान - भाग १)]]&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<title>Jeevan Ka Pratiman-Part 1 (जीवन का प्रतिमान-भाग १)</title>
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		<updated>2020-01-02T13:08:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: /* अभारतीय तत्वज्ञान, जीवनदृष्टि और इन पर आधारित व्यवहार सूत्र */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
== '''जीवन का प्रतिमान''' ==&lt;br /&gt;
* जीते तो सभी हैं। लेकिन हर समाज का जीने का तरीका होता है। उस समाज की समझ के अनुसार यह तरीका अन्य समाजों से श्रेष्ठ जीने का तरीका होता है। इस जीवन जीने के तरीके को '''जीवनशैली''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जीवनशैली का आधार उस समाज की जीवन जीने के संबंध में कुछ मान्यताएं होती हैं। इन मान्यताओं को उस समाज की '''जीवनदृष्टि''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
* यह मान्यताएं या जीवनदृष्टि और जीवनशैली उस समाज की '''विश्वदृष्टि''' पर आधारित होते हैं। विश्वदृष्टि का अर्थ है उस समाज की विश्व या चर-अचर सृष्टि के निर्माण से संबंधित मान्यताएं। इन्हीं को उस समाज का तत्वज्ञान भी कहते हैं। यह मान्यताएं या विश्व दृष्टि ही व्यक्ति के अन्य मानवों से संबंध और व्यक्ति के और अन्यों के चर-अचर सृष्टि के साथ संबंध तय करती है। &lt;br /&gt;
* अपनी विश्व दृष्टि और उस पर आधारित जीवनदृष्टि के अनुसार समाज जीवन चले इस लिये वह समाज कुछ व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। ये व्यवस्थाएं समान मान्यताओं को आधार मान कर निर्माण की जातीं हैं। इस लिये ये व्यवस्थाएं एक दूसरे की पूरक भी होतीं हैं और मददरूप भी होतीं हैं। इस व्यवस्था समूह को ही उस समाज की विश्वदृष्टि यानी जीवन दृष्टि और जीवनशैली के साथ मिला कर उस समाज के '''जीवन का प्रतिमान''' कहते हैं। अंग्रेजी में इसे पॅरेडिम (paradigm) कहते हैं। &lt;br /&gt;
वर्तमान शिक्षा वर्तमान अभारतीय जीवन के प्रतिमान का ही एक हिस्सा है। इस शिक्षा का जिन पर गहरा प्रभाव है उन्हें लगता है कि मानव जाति अष्म या पाषाण युग से निरंतर श्रेष्ठ बन रही है। वर्तमान मानव और मानव जाति से भविष्य की मानव और मानव जाति अधिक श्रेष्ठ होंगे। किन्तु जो इस शिक्षा से प्रभावित नहीं हुए हैं, या जो भारतीय काल गणना की समझ रखते हैं उन्हें अपने अनुभवों से भी और भारतीय शास्त्रों के कथन के अनुसार भी लगता है कि मानव जाति का निरंतर ह्रास हो रहा है। सत्ययुग का मानव और मानव जाति अत्यंत श्रेष्ठ थे। काम और मोह से मुक्त थे। त्रेता युग में सत्ययुग के मानव का ह्रास हुआ। द्वापर में उस से भी अधिक ह्रास हुआ। कलियुग में द्वापर से भी स्थिति और बिगडी और निरंतर बिगड रही है। किसे क्या लगता है इस का संबंध वह मानव या मानव समाज, किस प्रतिमान को ठीक मानता है इस से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में जयचंद को तो देशद्रोही माना जाता है लेकिन विभीषण को नहीं। इस का संबंध जीवन के भारतीय प्रतिमान को ठीक मानने से है। सिकंदर, चंगेज खान आदि जैसे लोग जो अपने कौशल की विधा के क्षेत्र में अत्यंत श्रेष्ठ थे उन्हें, जिन में ये जन्मे थे वे अभारतीय समाज अपने महापुरूष मानते हैं। अनुकरणीय मानते हैं। किन्तु भारतीय दृष्टि में बडप्पन का या अनुकरणीयता का प्राथमिक निकष उस का चारित्र्य माना जाता है। बुध्दिमत्ता, पराक्रम, कौशल आदि दूसरे और गौण स्थान पर आते हैं। रावण महा पराक्रमी था। बुध्दिमान था। राजनीति विशेषज्ञ था। किन्तु हम कभी उसे बडा या अनुकरणीय नहीं मानते। हम किसी बच्चे को 'तुम रावण जैसे महान बनो' ऐसा आशिर्वाद नहीं देते। इस का कारण वह अन्य अनेक गुण होने पर भी हीन चरित्र का था, यह है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक गणित के प्रस्तोता जगद्गुरू शंकराचार्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ कहते थे,'भारतीय और अभारतीय यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं'। (दीज आर टू डिफ्रंट एव्हरीथिंग्ज)। उन के इस कथन का संदर्भ जीवन जीने के तत्वज्ञान, व्यवहार और व्यवस्था समूह से बने भारतीय और अभारतीय प्रतिमानों से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगे अब हम तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि, जीवनशैली (व्यवहार), और व्यवस्था समूहों से बनने वाले प्रतिमानों को समझने का प्रयास करेंगे। देशिक शास्त्र में इसी तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि को उस समाज का 'स्वभाव' या 'चिति' कहा है। इस जीवनदृष्टि के अनुरूप वह समाज सर्व मान्य ऐसे कुछ व्यवहार सूत्र तय करता है और उन के अनुसार प्रत्यक्ष व्यवहार करता है। ऐसा व्यवहार सर्व सामान्य मनुष्य भी कर सके इस लिये वह व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। समाज के इस प्रकार अपनी जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करने और  व्यवस्था समूह निर्माण कर आगे बढने को ही देशिक शास्त्र में उस समाज के विराट का जागरण होता है ऐसा कहा गया है। चिति और विराट मिलाकर उस समाज के जीवन का प्रतिमान बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व प्रथम हम अभारतीय विश्व दृष्टि (वर्ल्ड व्ह्यू) या तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि और उस के अनुसार निर्माण किये व्यवहार सूत्र (जीवनशैली) और आगे इन के लिये उपयुक्त व्यवस्था समूह को भी समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अभारतीय तत्वज्ञान, जीवनदृष्टि और इन पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
वर्तमान विश्व में प्रमुख रूप से जीवन के दो प्रतिमान अस्तित्व में हैं। एक है '''भारतीय प्रतिमान'''। यह अभी सुप्त अवस्था में है। जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है।  दूसरा है '''यूरो-अमरिकी प्रतिमान'''। यहूदी, ईसाई और मुस्लिम समाज इस दूसरे प्रतिमान को मानने वाले हैं। इस प्रतिमान ने भारतीय समाज के साथ ही विश्व के अन्य सभी समाजों को गहराई से प्रभावित किया है। भारतीय समाज छोड कर अन्य सभी समाजों ने इसे सर्वार्थ से या तो अपना लिया है या तेजी से अपना रहे हैं। केवल भारतीय समाज ही अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर पुन: जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है। इस यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मानने वाले दो तबके हैं। यूरो-अमरिकी मजहबी दृष्टि के अनुसार विश्व के निर्माण की मान्यता एक जैसी ही है। मजहब या रिलीजन, फिलॉऑफरों की फिलॉसॉफि और साईंटिस्टों के ऐसे तीनों के प्रभाव के कारण जो अभारतीय जीवन दृष्टि बनीं है उस के तीन मुख्य पहलू हैं:&lt;br /&gt;
## व्यक्तिवादिता : सारी सृष्टि केवल मेरे उपभोग के लिये बनीं है।&lt;br /&gt;
## जडवादिता : सृष्टि में सब जड ही है। चेतनावान कुछ भी नहीं है।&lt;br /&gt;
## इहवादिता : जो कुछ है यही जन्म है। इस से नहीं तो पहले कुछ था और ना ही आगे कुछ है।  इस जीवनदृष्टि के अनुसार जो व्यवहार सूत्र बने वे निम्न हैं:&lt;br /&gt;
## अनिर्बाध व्यक्तिस्वातंत्र्य (अनलिमिटेड इंडिव्हिज्युल लिबर्टी - unlimited individual liberty)।&lt;br /&gt;
## बलवान ही जीने का अधिकारी (सर्वायवल ऑफ द फिटेस्ट - survival of the fittest)।&lt;br /&gt;
## दुर्बल का शोषण (एक्स्प्लॉयटेशन ऑफ द वीक - exploitation of the weak)।&lt;br /&gt;
## सारी चराचर सृष्टि मेरे अनिर्बाध उपभोग के लिये बनी है। इस पर मेरा अधिकार है। इस के प्रति मेरा कोई कर्तव्य नहीं है। (राईट्स् बट नो डयूटीज- Rights but no duties)।&lt;br /&gt;
## अन्य मानव भी सृष्टि का उपभोग अपना अनिर्बाध अधिकार मानते हैं। इस लिये मुझे अपने उपभोग (जीने) के लिये अन्यों से संघर्ष करना होगा। (फाईट फॉर सर्व्हायव्हल -fight for survival)।&lt;br /&gt;
## उपभोग के लिये मुझे केवल यही जीवन मिला है। इस जीवन से पहले मै नहीं था और इस जीवन के समाप्त होने के बाद भी मै नहीं रहूंग़ा। इस लिये जितना उपभोग कर सकूँ, कर लूँ। (कंझ्यूमेरिझम् - consumerism)।&lt;br /&gt;
## इहवादिता (धिस इज द ओन्ली लाईफ। देयर वॉज नथिंग बिफोर एँड देयर शॅल बी नथिंग बियाँड धिस लाईफ - This is the only life. There was nothing before and there shall be nothing beyond this life)।&lt;br /&gt;
## मेरी रासायनिक प्रक्रिया (जीवन) अच्छी चले (स्वार्थ) यह महत्वपूर्ण है। इस लिये किसी अन्य रासायनिक प्रक्रिया में बाधा आती है (परपीडा होती है) तो भले आये। अन्य कोई रासायनिक प्रक्रिया बंद होती है (जीवन नष्ट होता है) तो भले हो जाये।&lt;br /&gt;
## चैतन्य को नकारने के कारण सृष्टि के विभिन्न अस्तित्वों में स्थित अंतर्निहित एकात्मता को अमान्य करने के कारण टुकडों में विचार करने की सोच। (पीसमील एॅप्रोच - piecemeal approach) ।&lt;br /&gt;
## सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों का आधार स्वार्थ ही है। सामाजिक संबंधों का आधार इसी लिये 'काँट्रॅक्ट' या करार या समझौता या एॅग्रीमेंट होता है।&lt;br /&gt;
#* एक तबका है ईसाईयत के तत्वज्ञान को आधार मानने वाला। इन का तत्वज्ञान निम्न है: येहोवा/गॉड/ अल्ला ने पाँच दिन सृष्टि का निर्माण किया और छठे दिन मानव का निर्माण कर मानव से कहा कि ' यह चर-अचर सृष्टि तुम्हारे उपभोग के लिये है'। यूरो अमरिकी समाज पर फ्रांसिस बेकन और रेने देकार्ते इन दो फिलॉसॉफरों की फिलॉसॉफिी का गहरा प्रभाव है। इन का तत्वज्ञान कहता है कि प्रकृति मानव की दासी है। इसे कस कर अपनी जकड में रखना चाहिये। मानव जम कर इस का शोषण कर सके इसी लिये इस का निर्माण हुआ है। इस लिये प्रकृतिे का मानव ने जम कर (टू द हिल्ट) शोषण करना चाहिये।&lt;br /&gt;
#* और दूसरा है यूरो-अमरिकी और उन का अनुसरण करने वाले दार्शनिकों का और साईंटिस्टों का। वैसे तो आधुनिक साईंस ने ईसाईयत के कई गंभीर सिध्दांतों की धज्जियाँ उडा दी है, लेकिन फिर भी मोटा-मोटी दोनों तबकों का तत्वज्ञान एक ही है। इस लिये जीवन का प्रतिमान भी एक ही है।  यूरो-अमरिकी साईंटिस्टों और उन का अनुसरण करने वाले भारतीय समेत विश्व के सभी साईंटिस्टों की विश्वदृष्टि का आधार '''डार्विन की 'विकास वाद' और मिलर की 'जड से रासायनिक प्रक्रिया से जीव निर्माण'''' की परिकल्पनाएं ही हैं। मानव इन रासायनिक प्रक्रियाओं के पुलिंदों में सर्वश्रेष्ठ है। इस लिये इसे अपने स्वार्थ के लिये अन्य रासायनिक प्रक्रियाएं नष्ट करने का पूरा अधिकार है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
# &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय तत्वज्ञान और जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
भारतीय मान्यता के अनुसार परमात्मा अकेला था। उसे लगा 'एकाकी न रमते' यानी उसे अकेलापन खलने लगा। 'सो कामयत्' यानी उसने सोचा  'एकोऽहं बहुस्याम:' यानी एक हूँ अनेक हो जाऊं। उसने तप किया। अपने में से ही सारी सृष्टि का निर्माण किया। इस लिये कण कण, चर अचर सब परमात्मा के ही रूप हैं। सारी सृष्टि यह उस परमात्त्व तत्व का ही विस्तार मात्र है। इस लिये सृष्टि के सारे घटक एक दूसरे से 'आत्मीयता' के भाव से जुडे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाज निर्माण और परस्पर सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के बारे में श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भगवद्गीता, 3.10 एवं 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अनेन प्रसविश्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक ॥ 3.10 ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ है - प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ ( अन्यों के हित के काम) के साथ प्रजा को निर्माण किया और कहा कि परस्पर हित साधते हुए उत्कर्ष (प्रगति) करो। यह है परस्पर सामाजिक संबंधों का आधार। आगे कहा है&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ ॥ 3.11 ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ है - देवताओं ( वायू, वरुण, अग्नि, पृथ्वी आदि यानी पर्यावरण) का पोषण करते हुए नि:स्वार्थ भाव से परस्पर हित साधते हुए परम कल्याण को प्राप्त करो। यह है पर्यावरण से संबंधों का आधार।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपर्युक्त तत्वज्ञान पर आधारित भारतीय जीवन दृष्टि के सूत्र निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# सारी सृष्टि आत्म तत्व का ही विस्तार है। मनुष्य परमात्मा का ही सर्वश्रेष्ठ रूप है। एकात्मता सृष्टि के सभी व्यवहारों का आधारभूत सिध्दांत है। परस्पर संबंधों का आधार पारिवारिक भावना है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि चेतन से बनीं है जड से नहीं।&lt;br /&gt;
# जीवन स्थल (वर्तमान चर-अचर सृष्टि को प्रभावित करने वाला और उस से प्रभावित होने वाला) और काल (सृष्टि के निर्माण से लेकर सृष्टि के अंत तक) के संदर्भ में अखंड है। पुनर्जन्म ही काल के संदर्भ में अखंडता है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि की रचना परस्पर पूरक और चक्रीय है।&lt;br /&gt;
# कर्म ही मानव जीवन का नियमन करते हैं। कर्मसिध्दांत इसे समझने का साधन है। अच्छे (परोपकार या पुण्य) कर्म जीवन को अच्छा और बुरे (परपीडा या पाप) कर्म जीवन को बुरा बनाते हैं।&lt;br /&gt;
# मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष है। सामाजिक जीवन का लक्ष्य 'स्वतंत्रता' है। उपर्युक्त जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्रों की चर्चा हमने [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यहाँ]] की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== यूरो-अमरिकी व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
यूरो-अमरिकी समाज ने अपनी विश्व दृष्टि ( वर्ल्ड व्हू world view) के अनुसार जीवन जीने के जो व्यवहार सूत्र बनाए उन्हें व्यवहार में लाना संभव हो इस लिये व्यवस्थाओं का एक समूह भी निर्माण किया। ये व्यवस्थाएं एक और तो उन की जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करन संभव बनातीं हैं तो दूसरी और प्रतिमान की अन्य व्यवस्थाओं को भी पुष्ट बनातीं हैं। इन सभी का आधार व्यक्तिवाद, इहवाद और जडवाद ही है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यवस्थाओं से दो प्रकार की आवश्यकता पूर्ण होती है। पहली आवश्यकता यह होती है कि समाज के घटकों को समाज का तत्वज्ञान और व्यवहार सिखाना। और दूसरी आवश्यकता होती है वह समाज अपने तत्वज्ञान और व्यवहार के अनुसार जी सके इस लिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूरो अमरिकी प्रतिमान की सोच यह है कि समाज की सभी व्यवथाओं का स्वरूप तय करना और व्यवस्थाओं का निर्माण करना यह शासन का कर्तव्य भी है और जिम्मेदारी भी है। इस मान्यता का शासन के स्वरूप से, यानी शासन किंग का है या लोकतंत्रात्मक है इस से कोई संबंध नहीं है। इस यूरो अमरिकी प्रतिमान में शासक सर्वसत्ताधीश होता है। सर्वोपरि होता है। शासन अपनी योग्यता और क्षमताओं के आधार पर समाज को निर्देशित, नियंत्रित और नियमित करता है। व्यक्तिवादी समाज में इस व्यवस्था समूह को बदलना लगभग असंभव होता है। शासन बदल जाता है किन्तु उसका 'स्व'रूप या स्वभाव नहीं बदलता। इसी लिये किंग के काल में भी और लोकतंत्र के काल में भी शासन सर्वोपरि ही रहा। इस व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न स्वरूप का होगा: &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+&lt;br /&gt;
! colspan=&amp;quot;5&amp;quot; |शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|प्रशासन&lt;br /&gt;
|सुरक्षा&lt;br /&gt;
|अर्थ&lt;br /&gt;
|न्याय&lt;br /&gt;
|शिक्षा&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
प्रसिध्द भारतीय चिंतक और विद्वान डॉ. देवेन्द्र स्वरूप प्रतिमान का और शिक्षा व्यवस्था का संबंध विषद करते हैं&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ. देवेन्द्र स्वरूप, ' भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति का विकास' पृष्ठ 7&amp;lt;/ref&amp;gt;। 'शिक्षा प्रणाली के संबंध में विचार करने से पूर्व हमें यह विचार करना ओगा कि हम राष्ट्र में कैसा मनुष्य बनाना चाहते हैं, उसकी जीवनशैली क्या होगी, उसका पारिवारिक और सामाजिक परिवेष कैसा होगा? अर्थात् राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रचना कैसी होगी? &lt;br /&gt;
इसी पृष्ठ पर देवेन्द्रस्वरूपजी लिखते हैं- प्रारंभ में उन्होंने (अंग्रेजों ने) भारत की पुरानी राजस्व, न्याय, प्रशासन प्रणाली से ही काम चलाना चाहा और साथ ही अपने साम्राज्य के चिर स्थायित्व के लिये अंग्रेजी शिक्षा का आरोपण करने की कोशिश भी की; किन्तु ये कोशिशें बेकार गयीं। तब उन्होंने अनुभव किया कि शिक्षा प्रणाली का किसी देश की राजस्व, न्याय, प्रशासन और अर्थव्यवस्था से गहरा संबंध होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा होने के कारण इन सभी व्यवस्थाओं का आधार उस समाज के जीवन के प्रतिमान की साझी जीवनदृष्टि और उस पर आधारित व्यवहार सूत्र होते हैं। इस कारण किसी प्रतिमान के व्यवस्था समूह में से केवल एक व्यवस्था को जो भिन्न जीवन दृष्टि पर आधारित है, बदलना संभव नहीं होता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
भारतीय प्रतिमान के व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न प्रकार का है। &lt;br /&gt;
ऐसा ढांचे का चित्र या ऐसे ढाँचे का विवरण भी अन्य किसी शास्त्रीय ग्रन्थ में से नहीं लिया गया है। यह तो लेखक ने अपनी समझ के अनुसार यह ढांचा कैसा हो सकता है उसकी रूपरेखा अपनी कल्पना से ही बनाई है। &lt;br /&gt;
[[File:Part 1 Last Chapter Table Bhartiya Jeevan Pratiman.jpg|center|thumb|969x969px|भारतीय व्यवस्था समूह]] &lt;br /&gt;
भारत में कभी भी सामाजिक व्यवस्थाओं के स्वरूप को तय करने की जिम्मेदारी राजा या शासक की नहीं रही। धर्मसत्ता द्वारा प्रस्तुत व्यवस्थाओं को स्थापित करने की जिम्मेदारी राजा की या शासन की होती थी। रघुवंशम् में कालिदास इस की पुष्टि करते हैं। राजा की या कभी गणतंत्रात्मक शासन रहा तब भी शासन की जिम्मेदारी धर्माचार्यों द्वारा निर्मित धर्मशास्त्र या समाजशास्त्र के अनुपालन करने की और करवाने की ही रही। धर्म का अनुपालन करने वाला समाज निर्माण करने और उसे धर्माचरणी बनाए रखने के लिये हमारे पूर्वजों ने एक व्यवस्था समूह निर्माण किया था। ऐतिहासिक कारणों से ये व्यवस्थाएं दुर्बल हुईं। काल के प्रवाह में इन में कुछ दोष भी निर्माण हुए। लेकिन फिर भी यह व्यवस्था समूह अंग्रेज शासन भारत में स्थापित हुआ तब तक प्रत्यक्ष अस्तित्व में रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस व्यवस्था समूह की व्यवस्था के तीन पहलू थे। पोषक व्यवस्था, रक्षक व्यवस्था और प्रेरक व्यवस्था। इन में प्रेरक व्यवस्था तब ही ठीक से काम कर सकती है जब उस के साथ में पोषक और रक्षक व्यवस्था भी काम करती है। इस लिये समाज की सभी व्यवस्थाओं में यह तीनों पहलू विकेंद्रित स्वरूप में ढाले गये थे। प्रेरक यानी शिक्षा व्यवस्था का काम समाज को धर्माचरण सिखाने का था। भारतीय प्रतिमान में प्रेरक व्यवस्थाओं को अत्यंत श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी बनाना शिक्षा व्यवस्था का काम है। जो ५-१० प्रतिशत लोग इस प्रेरक व्यवस्था के प्रयासों के उपरांत भी अधर्माचरण करते थे, उन के लिये ही शासन व्यवस्था यानी दण्ड विधान की आवश्यकता होती है। यदि प्रेरक और पोषक व्यवस्थाओं के माध्यम से समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी नहीं बनाया गया तो रक्षक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर सकती। यूरो अमरिकी शिक्षा की दस पीढियाँ बीतने के बाद भी यदि अब भी काफी मात्रा में यूरोप या अमरिकी समाजों की तुलना में हम 'पारिवारिक भावना' को अभी तक बचा पाए हैं तो वह अभी भी अपना अस्तित्व बनाए रखने वाली समानान्तर शिक्षा व्यवस्था, परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था आदि के कारण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त ढाँचा भारतीय प्रतिमान की मोटी मोटी अभिव्यक्ति है। इस में धर्म व्यवस्था सामाजिक नीति नियम अर्थात् धर्माचरण के व्यावहारिक सूत्र तय करने का और अधर्माचरण के व्यवहार के लिये दण्ड विधान बनाने का काम करती है। अर्थात् शास्त्रीय भाषा में श्रृति के आधार पर 'स्मृति' निर्माण करने का काम करती है। इस प्रकार प्रेरक, पोषक तथा निवारक/रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का मार्गदर्शन करती है। इस मार्गदर्शन का माध्यम शिक्षा व्यवस्था होती है। इस लिये शिक्षा का या ज्ञानसत्ता का स्थान धर्मसत्ता से नीचे किन्तु शासन की अन्य सत्ताओं से ऊपर का होता है। ब्रह्मचर्य आश्रम, गुरूकुल या विद्याकेन्द्र और कुछ प्रमाण में परिवारों में भी वर्णानुसारी और जीवन के लिये उपयुक्त ऐसे सभी पहलुओं की शिक्षा दी जाती है। लोग जब वर्ण के अनुसार व्यवहार करते हैं तब समाज सुसंस्कृत बनता है। और जब लोग अपनी अपनी जाति के अनुसार व्यवसाय करते हैं समाज समृध्द बनता है। रक्षक या निवारक व्यवस्थाएं समाज और व्यक्तियों की संस्कृति और समृध्दि की रक्षा के लिये होती हैं। वर्ण और आश्रम यह व्यवस्थाएं समाज की रचना की व्यवस्थाएं हैं। परिवार व्यवस्था श्रेष्ठ मानव को जन्म देकर उसे वर्णानुसार संस्कारित करने की व्यवस्था है। यह व्यवस्था पारिवारिक भावना के विकास की भी व्यवस्था है। यह समाज व्यवस्था का लघु-रूप है। सामाजिकता की शिक्षा की नींव डालना परिवार व्यवस्था का काम है। इस कारण इस में पोषक, प्रेरक और रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का समावेश होता है। इसी प्रकार से जन्म से लेकर मृत्यू पर्यंत तक मनुष्य की बढती और घटती क्षमताओं और योग्यताओं के समायोजन की भी व्यवस्था परिवार में होती है। जाति व्यवस्था, परिवार और ग्रामकुल यह तीनों मिल कर अर्थ व्यवस्था यानी समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली व्यवस्था बनती है। रक्षक व्यवस्था भी इन तीनों व्यवस्थाओं में और चौथे शासन व्यवस्था में विकेन्द्रित रूप में स्थापित होती है। परिवार के जाति के या ग्राम के स्तर पर जब प्रेरक, पोषक और रक्षक व्यवस्था अव्यवस्थित हो जाती है या उस का हल नहीं निकल पाता है तब ही केवल शासन व्यवस्था की भूमिका शुरू होती है। जाति व्यवस्था, कौटुंबिक उद्योग और ग्रामकुल में आवश्यकताओं और उत्पादन का समायोजन ठीक से होने से समाज की प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति समाज आप ही कर लेता है। ऐसा समाज कभी अन्य समाजों की लूट करने के लिये आक्रमण नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान में अर्थसत्ता सर्वोपरि बनी हुई है। राजसत्ता उस के निर्देशन में चलती है। शिक्षा अर्थात् ज्ञानसत्ता शासन के नियंत्रण में है। और धर्मसत्ता का तो कहीं नामोनिशान तक दिखाई नहीं देता। प्रतिमान के व्यवस्था समूह की यह एकदम उलटी स्थिती है। धर्म सत्ता के निर्देशन में जब ज्ञानसत्ता शासन और अर्थव्यवस्था को निर्देशित करती है तब समाज ठीक दिशा में सोचता भी है और आगे भी बढता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ण व्यवस्था का एक काम तो वर्णों की निश्चिती करने का था। बालक के वर्ण के अनुसार उसके लिये संस्कार और शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था करने का था। ऐसा करने से उस बालक को भी लाभ होता है और समाज को भी लाभ होता था। दूसरा काम था वर्ण संकर के कारण निर्माण हुई जातियों के नाम, काम (व्यावसायिक कौशल का क्षेत्र) और जातिधर्म को तय करना। जातिव्यवस्था के काम जातिगत अनुशासन, व्यवसाय कौशलों में वृध्दि की व्यवस्था, जातिगत व्यावसायिक ज्ञान का विकास करना और जाति बांधवों को सदाचारी और सर्वहितकारी बनाए रखना, यह थे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवारक यानी शासन व्यवस्था भी विकेन्द्रित थी। जातिगत अनुशासन के बारे में जाति पंचायतों का अपना दण्डविधान होता था। इसी प्रकार से ग्रामकुल की अपनी अनुशासन पालन करवाने की और सुरक्षा व्यवस्था होती थी। इन दोनों के स्तर पर जब मामला हल नहीं होता था तब ही वह शासक के पास जाता था। इस लिये न्याय भी अच्छा होता था, अल्पतम समय में होता था और शासन के पास आने वाले मुकदमों की संख्या अत्यल्प होती थी।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी व्यवस्थाओं का आधार पारिवारिक भावना होती थी। गुरू और शिष्य के संबंध (शिक्षा क्षेत्र) मानस पिता-पुत्र जैसे होते थे। विद्याकेन्द्र (गुरू) कुल होते थे। एक ही व्यवसाय करने वाले स्पर्धक नहीं जाति बांधव होते थे। गाँव के किसी की भी बेटी गाँव के प्रत्येक की बहन-बेटी होती थी। न्यायाधीश भी आप्तोप्त (अपराधी जैसे अपना आप्त हो) इस भावना से दण्ड देते थे। पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त का दण्डविधान में विशेष महत्व था। प्रजा (अर्थ है संतान) और राजा का संबंध संतान और पिता का सा होता था। हमारे बाजार भी परिवार भावना से चलते थे। वर्तमान प्रतिमान के कारण हमारे परिवार भी बाजार भावना से चलने लग गये हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप गुरूकुल का था। अर्थात् पारिवारिक था। इस में वर्ण भी सुनिश्चित किये जाते थे। आगे वर्णानुसारी शिक्षा भी दी जाती थी। समाज के सभी बच्चों के लिये यह व्यवस्था उपलब्ध थी। जनसंख्या के बढने से गुरुकुल शिक्षा केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण के बच्चों तक सिमट गई। वैश्य बच्चे अपने परिवारों में और जातिगत व्यवस्थाओं में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने लगे। बर्बर आक्रमणों ने और आक्रांताओं ने शिक्षा व्यवस्था को और तोडा। फिर भी एकल विद्यालयों के रूप में अंग्रेज शासन के पूर्व काल तक ५ लाख से भी अधिक संख्या में यह विद्यालय चलते थे। समाज के सभी बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था इन में थी। शिक्षकों में भी सभी जाति के शिक्षक थे। किन्तु वे सब श्रीमद्बगवद्गीता में वर्णित ब्राह्मण का सा व्यवहार करनेवाले थे। नि;स्वार्थ भाव से नि:शुल्क शिक्षा देते थे। यानी ज्ञानदान करते थे। इस पूरे काल में शिक्षा का आधार, सभी विषयों की विषयवस्तू का आधार परिवार भावना या परस्पर आत्मीयता के संबंध यही रहा। सर्वे भवन्तु सुखिन: यही रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपसंहार ==&lt;br /&gt;
वर्तमान व्यवस्था समूह या पूरे मानव जीवन का प्रतिमान यूरो-अमरिकी बन गया है। विश्व के अन्य समाजों के पास इसे अपनाने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इस प्रतिमान के कारण कई संकट निर्माण हो रहे हैं यह जानते हुए भी सभी समाज, जो औरों का होगा वह हमारा भी होगा यह मान रहे हैं। एक भारत के पास ही इस प्रतिमान से श्रेष्ठ प्रतिमान देने के लिये विकल्प है। इसके कुछ अवशेष समाज जीवन में मुसलमानों ने नष्ट और अंग्रेजों ने भ्रष्ट करने के उपरांत भी बचे हुए साहित्य में उपलब्ध हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान प्रतिमान में धीरे धीरे भारतीय प्रतिमान के कुछ बिन्दू जोड कर इसे भारतीय बनाने का प्रयास करने वाले व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन लाखों की संख्या में हैं। ये सभी व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन पूरी श्रध्दा, समर्पण भाव, और प्रामाणिकता से प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों के कारण भारतीय प्रतिमान को रौंदने की गति कुछ कम भी हुई है, लेकिन बंद नहीं हुई है। ऐसे प्रयासों का प्रारंभ तो १९ वीं सदी के मध्य से ही हो गया था। इन प्रयासों की गति और शक्ति भी निरंतर बढ रही है। लेकिन यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मिलने वाली समाज की मान्यता भी इन प्रयासों की अपेक्षाओं के विपरीत, बढती ही जा रही है। अतएव ऐसे प्रयासों से मिलने वाले तात्कालिक और अत्यंत सीमित लाभ के लालच को छोड कर शुध्द रूप से भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के प्रयास करने होंगे। इस परिवर्तन के लिये प्रचंड इच्छाशक्ति, वैचारिक मंथन, और प्रेरक और निवारक शक्ति की आवश्यकता होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस प्रकार अपनी शिक्षा प्रणाली को भारत में स्थापित करने के लिये अंग्रेजों ने यहाँ की शासन प्रणाली, कर प्रणाली, अर्थ व्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि को नष्ट कर भारतीय समाज में वैकल्पिक व्यवस्थाओं की माँग निर्माण की। शायद ऐसा ही कुछ हमें भी करना होगा। विनोबा भावे ने शिक्षा को भारतीय बनाने की दृष्टि से ऐसे ही प्रयोग का सुझाव दिया था। उन की सूचना को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। &lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. भारतीय शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, प्रकाशक पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान - भाग १)]]&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<title>Jeevan Ka Pratiman-Part 1 (जीवन का प्रतिमान-भाग १)</title>
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		<updated>2020-01-02T12:52:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: /* प्राक्कथन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{One source|date=January 2019}}&lt;br /&gt;
== '''जीवन का प्रतिमान''' ==&lt;br /&gt;
* जीते तो सभी हैं। लेकिन हर समाज का जीने का तरीका होता है। उस समाज की समझ के अनुसार यह तरीका अन्य समाजों से श्रेष्ठ जीने का तरीका होता है। इस जीवन जीने के तरीके को '''जीवनशैली''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जीवनशैली का आधार उस समाज की जीवन जीने के संबंध में कुछ मान्यताएं होती हैं। इन मान्यताओं को उस समाज की '''जीवनदृष्टि''' कहते हैं।  &lt;br /&gt;
* यह मान्यताएं या जीवनदृष्टि और जीवनशैली उस समाज की '''विश्वदृष्टि''' पर आधारित होते हैं। विश्वदृष्टि का अर्थ है उस समाज की विश्व या चर-अचर सृष्टि के निर्माण से संबंधित मान्यताएं। इन्हीं को उस समाज का तत्वज्ञान भी कहते हैं। यह मान्यताएं या विश्व दृष्टि ही व्यक्ति के अन्य मानवों से संबंध और व्यक्ति के और अन्यों के चर-अचर सृष्टि के साथ संबंध तय करती है। &lt;br /&gt;
* अपनी विश्व दृष्टि और उस पर आधारित जीवनदृष्टि के अनुसार समाज जीवन चले इस लिये वह समाज कुछ व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। ये व्यवस्थाएं समान मान्यताओं को आधार मान कर निर्माण की जातीं हैं। इस लिये ये व्यवस्थाएं एक दूसरे की पूरक भी होतीं हैं और मददरूप भी होतीं हैं। इस व्यवस्था समूह को ही उस समाज की विश्वदृष्टि यानी जीवन दृष्टि और जीवनशैली के साथ मिला कर उस समाज के '''जीवन का प्रतिमान''' कहते हैं। अंग्रेजी में इसे पॅरेडिम (paradigm) कहते हैं। &lt;br /&gt;
वर्तमान शिक्षा वर्तमान अभारतीय जीवन के प्रतिमान का ही एक हिस्सा है। इस शिक्षा का जिन पर गहरा प्रभाव है उन्हें लगता है कि मानव जाति अष्म या पाषाण युग से निरंतर श्रेष्ठ बन रही है। वर्तमान मानव और मानव जाति से भविष्य की मानव और मानव जाति अधिक श्रेष्ठ होंगे। किन्तु जो इस शिक्षा से प्रभावित नहीं हुए हैं, या जो भारतीय काल गणना की समझ रखते हैं उन्हें अपने अनुभवों से भी और भारतीय शास्त्रों के कथन के अनुसार भी लगता है कि मानव जाति का निरंतर ह्रास हो रहा है। सत्ययुग का मानव और मानव जाति अत्यंत श्रेष्ठ थे। काम और मोह से मुक्त थे। त्रेता युग में सत्ययुग के मानव का ह्रास हुआ। द्वापर में उस से भी अधिक ह्रास हुआ। कलियुग में द्वापर से भी स्थिति और बिगडी और निरंतर बिगड रही है। किसे क्या लगता है इस का संबंध वह मानव या मानव समाज, किस प्रतिमान को ठीक मानता है इस से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में जयचंद को तो देशद्रोही माना जाता है लेकिन विभीषण को नहीं। इस का संबंध जीवन के भारतीय प्रतिमान को ठीक मानने से है। सिकंदर, चंगेज खान आदि जैसे लोग जो अपने कौशल की विधा के क्षेत्र में अत्यंत श्रेष्ठ थे उन्हें, जिन में ये जन्मे थे वे अभारतीय समाज अपने महापुरूष मानते हैं। अनुकरणीय मानते हैं। किन्तु भारतीय दृष्टि में बडप्पन का या अनुकरणीयता का प्राथमिक निकष उस का चारित्र्य माना जाता है। बुध्दिमत्ता, पराक्रम, कौशल आदि दूसरे और गौण स्थान पर आते हैं। रावण महा पराक्रमी था। बुध्दिमान था। राजनीति विशेषज्ञ था। किन्तु हम कभी उसे बडा या अनुकरणीय नहीं मानते। हम किसी बच्चे को 'तुम रावण जैसे महान बनो' ऐसा आशिर्वाद नहीं देते। इस का कारण वह अन्य अनेक गुण होने पर भी हीन चरित्र का था, यह है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक गणित के प्रस्तोता जगद्गुरू शंकराचार्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ कहते थे,'भारतीय और अभारतीय यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं'। (दीज आर टू डिफ्रंट एव्हरीथिंग्ज)। उन के इस कथन का संदर्भ जीवन जीने के तत्वज्ञान, व्यवहार और व्यवस्था समूह से बने भारतीय और अभारतीय प्रतिमानों से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगे अब हम तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि, जीवनशैली (व्यवहार), और व्यवस्था समूहों से बनने वाले प्रतिमानों को समझने का प्रयास करेंगे। देशिक शास्त्र में इसी तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि को उस समाज का 'स्वभाव' या 'चिति' कहा है। इस जीवनदृष्टि के अनुरूप वह समाज सर्व मान्य ऐसे कुछ व्यवहार सूत्र तय करता है और उन के अनुसार प्रत्यक्ष व्यवहार करता है। ऐसा व्यवहार सर्व सामान्य मनुष्य भी कर सके इस लिये वह व्यवस्थाओं का समूह निर्माण करता है। समाज के इस प्रकार अपनी जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करने और  व्यवस्था समूह निर्माण कर आगे बढने को ही देशिक शास्त्र में उस समाज के विराट का जागरण होता है ऐसा कहा गया है। चिति और विराट मिलाकर उस समाज के जीवन का प्रतिमान बनता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्व प्रथम हम अभारतीय विश्व दृष्टि (वर्ल्ड व्ह्यू) या तत्वज्ञान पर आधारित जीवनदृष्टि और उस के अनुसार निर्माण किये व्यवहार सूत्र (जीवनशैली) और आगे इन के लिये उपयुक्त व्यवस्था समूह को भी समझने का प्रयास करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अभारतीय तत्वज्ञान, जीवनदृष्टि और इन पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
वर्तमान विश्व में प्रमुख रूप से जीवन के दो प्रतिमान अस्तित्व में हैं। एक है भारतीय प्रतिमान। यह अभी सुप्त अवस्था में है। जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है। दूसरा है यूरो-अमरिकी प्रतिमान। यहूदी, ईसाई और मुस्लिम समाज इस दूसरे प्रतिमान को मानने वाले हैं। इस प्रतिमान ने भारतीय समाज के साथ ही विश्व के अन्य सभी समाजों को गहराई से प्रभावित किया है। भारतीय समाज छोड कर अन्य सभी समाजों ने इसे सर्वार्थ से या तो अपना लिया है या तेजी से अपना रहे हैं। केवल भारतीय समाज ही अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर पुन: जागृत होने के लिये प्रयत्नशील है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मानने वाले दो तबके हैं। एक तबका है ईसाईयत के तत्वज्ञान को आधार मानने वाला। और दूसरा है यूरो-अमरिकी और उन का अनुसरण करने वाले दार्शनिकों का और साईंटिस्टों का। वैसे तो आधुनिक साईंस ने ईसाईयत के कई गंभीर सिध्दांतों की धज्जियाँ उडा दी है, लेकिन फिर भी मोटा-मोटी दोनों तबकों का तत्वज्ञान एक ही है। इस लिये जीवन का प्रतिमान भी एक ही है। इन का तत्वज्ञान निम्न है:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूरो-अमरिकी मजहबी दृष्टि के अनुसार विश्व के निर्माण की मान्यता एक जैसी ही है। येहोवा/गॉड/ अल्ला ने पाँच दिन सृष्टि का निर्माण किया और छठे दिन मानव का निर्माण कर मानव से कहा कि ' यह चर-अचर सृष्टि तुम्हारे उपभोग के लिये है'।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूरो अमरिकी समाज पर फ्रांसिस बेकन और रेने देकार्ते इन दो फिलॉसॉफरों की फिलॉसॉफिी का गहरा प्रभाव है। इन का तत्वज्ञान कहता है कि प्रकृति मानव की दासी है। इसे कस कर अपनी जकड में रखना चाहिये। मानव जम कर इस का शोषण कर सके इसी लिये इस का निर्माण हुआ है। इस लिये प्रकृतिे का मानव ने जम कर (टू द हिल्ट) शोषण करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूरो-अमरिकी साईंटिस्टों और उन का अनुसरण करने वाले भारतीय समेत विश्व के सभी साईंटिस्टों की विश्वदृष्टि का आधार डार्विन की 'विकास वाद' और मिलर की 'जड से रासायनिक प्रक्रिया से जीव निर्माण' की परिकल्पनाएं ही हैं। मानव इन रासायनिक प्रक्रियाओं के पुलिंदों में सर्वश्रेष्ठ है। इस लिये इसे अपने स्वार्थ के लिये अन्य रासायनिक प्रक्रियाएं नष्ट करने का पूरा अधिकार है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मजहब या रिलीजन, फिलॉऑफरों की फिलॉसॉफि और साईंटिस्टों के ऐसे तीनों के प्रभाव के कारण जो अभारतीय जीवन दृष्टि बनीं है उस के तीन मुख्य पहलू हैं:&lt;br /&gt;
# व्यक्तिवादिता : सारी सृष्टि केवल मेरे उपभोग के लिये बनीं है।&lt;br /&gt;
# जडवादिता : सृष्टि में सब जड ही है। चेतनावान कुछ भी नहीं है।&lt;br /&gt;
# इहवादिता : जो कुछ है यही जन्म है। इस से नहीं तो पहले कुछ था और ना ही आगे कुछ है। &lt;br /&gt;
इस जीवनदृष्टि के अनुसार जो व्यवहार सूत्र बने वे निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# अनिर्बाध व्यक्तिस्वातंत्र्य (अनलिमिटेड इंडिव्हिज्युल लिबर्टी - unlimited individual liberty)।&lt;br /&gt;
# बलवान ही जीने का अधिकारी (सर्वायवल ऑफ द फिटेस्ट - survival of the fittest)।&lt;br /&gt;
# दुर्बल का शोषण (एक्स्प्लॉयटेशन ऑफ द वीक - exploitation of the weak)।&lt;br /&gt;
# सारी चराचर सृष्टि मेरे अनिर्बाध उपभोग के लिये बनी है। इस पर मेरा अधिकार है। इस के प्रति मेरा कोई कर्तव्य नहीं है। (राईट्स् बट नो डयूटीज- Rights but no duties)।&lt;br /&gt;
# अन्य मानव भी सृष्टि का उपभोग अपना अनिर्बाध अधिकार मानते हैं। इस लिये मुझे अपने उपभोग (जीने) के लिये अन्यों से संघर्ष करना होगा। (फाईट फॉर सर्व्हायव्हल -fight for survival)।&lt;br /&gt;
# उपभोग के लिये मुझे केवल यही जीवन मिला है। इस जीवन से पहले मै नहीं था और इस जीवन के समाप्त होने के बाद भी मै नहीं रहूंग़ा। इस लिये जितना उपभोग कर सकूँ, कर लूँ। (कंझ्यूमेरिझम् - consumerism)।&lt;br /&gt;
# इहवादिता (धिस इज द ओन्ली लाईफ। देयर वॉज नथिंग बिफोर एँड देयर शॅल बी नथिंग बियाँड धिस लाईफ - This is the only life. There was nothing before and there shall be nothing beyond this life)।&lt;br /&gt;
# मेरी रासायनिक प्रक्रिया (जीवन) अच्छी चले (स्वार्थ) यह महत्वपूर्ण है। इस लिये किसी अन्य रासायनिक प्रक्रिया में बाधा आती है (परपीडा होती है) तो भले आये। अन्य कोई रासायनिक प्रक्रिया बंद होती है (जीवन नष्ट होता है) तो भले हो जाये।&lt;br /&gt;
# चैतन्य को नकारने के कारण सृष्टि के विभिन्न अस्तित्वों में स्थित अंतर्निहित एकात्मता को अमान्य करने के कारण टुकडों में विचार करने की सोच। (पीसमील एॅप्रोच - piecemeal approach) ।&lt;br /&gt;
# सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों का आधार स्वार्थ ही है। सामाजिक संबंधों का आधार इसी लिये 'काँट्रॅक्ट' या करार या समझौता या एॅग्रीमेंट होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय तत्वज्ञान और जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्र ==&lt;br /&gt;
भारतीय मान्यता के अनुसार परमात्मा अकेला था। उसे लगा 'एकाकी न रमते' यानी उसे अकेलापन खलने लगा। 'सो कामयत्' यानी उसने सोचा  'एकोऽहं बहुस्याम:' यानी एक हूँ अनेक हो जाऊं। उसने तप किया। अपने में से ही सारी सृष्टि का निर्माण किया। इस लिये कण कण, चर अचर सब परमात्मा के ही रूप हैं। सारी सृष्टि यह उस परमात्त्व तत्व का ही विस्तार मात्र है। इस लिये सृष्टि के सारे घटक एक दूसरे से 'आत्मीयता' के भाव से जुडे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाज निर्माण और परस्पर सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के बारे में श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भगवद्गीता, 3.10 एवं 3.11&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अनेन प्रसविश्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक ॥ 3.10 ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ है - प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ ( अन्यों के हित के काम) के साथ प्रजा को निर्माण किया और कहा कि परस्पर हित साधते हुए उत्कर्ष (प्रगति) करो। यह है परस्पर सामाजिक संबंधों का आधार। आगे कहा है&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ ॥ 3.11 ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ है - देवताओं ( वायू, वरुण, अग्नि, पृथ्वी आदि यानी पर्यावरण) का पोषण करते हुए नि:स्वार्थ भाव से परस्पर हित साधते हुए परम कल्याण को प्राप्त करो। यह है पर्यावरण से संबंधों का आधार।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपर्युक्त तत्वज्ञान पर आधारित भारतीय जीवन दृष्टि के सूत्र निम्न हैं:&lt;br /&gt;
# सारी सृष्टि आत्म तत्व का ही विस्तार है। मनुष्य परमात्मा का ही सर्वश्रेष्ठ रूप है। एकात्मता सृष्टि के सभी व्यवहारों का आधारभूत सिध्दांत है। परस्पर संबंधों का आधार पारिवारिक भावना है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि चेतन से बनीं है जड से नहीं।&lt;br /&gt;
# जीवन स्थल (वर्तमान चर-अचर सृष्टि को प्रभावित करने वाला और उस से प्रभावित होने वाला) और काल (सृष्टि के निर्माण से लेकर सृष्टि के अंत तक) के संदर्भ में अखंड है। पुनर्जन्म ही काल के संदर्भ में अखंडता है।&lt;br /&gt;
# सृष्टि की रचना परस्पर पूरक और चक्रीय है।&lt;br /&gt;
# कर्म ही मानव जीवन का नियमन करते हैं। कर्मसिध्दांत इसे समझने का साधन है। अच्छे (परोपकार या पुण्य) कर्म जीवन को अच्छा और बुरे (परपीडा या पाप) कर्म जीवन को बुरा बनाते हैं।&lt;br /&gt;
# मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष है। सामाजिक जीवन का लक्ष्य 'स्वतंत्रता' है। उपर्युक्त जीवन दृष्टि पर आधारित व्यवहार सूत्रों की चर्चा हमने [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|यहाँ]] की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== यूरो-अमरिकी व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
यूरो-अमरिकी समाज ने अपनी विश्व दृष्टि ( वर्ल्ड व्हू world view) के अनुसार जीवन जीने के जो व्यवहार सूत्र बनाए उन्हें व्यवहार में लाना संभव हो इस लिये व्यवस्थाओं का एक समूह भी निर्माण किया। ये व्यवस्थाएं एक और तो उन की जीवनदृष्टि के अनुसार व्यवहार करन संभव बनातीं हैं तो दूसरी और प्रतिमान की अन्य व्यवस्थाओं को भी पुष्ट बनातीं हैं। इन सभी का आधार व्यक्तिवाद, इहवाद और जडवाद ही है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यवस्थाओं से दो प्रकार की आवश्यकता पूर्ण होती है। पहली आवश्यकता यह होती है कि समाज के घटकों को समाज का तत्वज्ञान और व्यवहार सिखाना। और दूसरी आवश्यकता होती है वह समाज अपने तत्वज्ञान और व्यवहार के अनुसार जी सके इस लिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूरो अमरिकी प्रतिमान की सोच यह है कि समाज की सभी व्यवथाओं का स्वरूप तय करना और व्यवस्थाओं का निर्माण करना यह शासन का कर्तव्य भी है और जिम्मेदारी भी है। इस मान्यता का शासन के स्वरूप से, यानी शासन किंग का है या लोकतंत्रात्मक है इस से कोई संबंध नहीं है। इस यूरो अमरिकी प्रतिमान में शासक सर्वसत्ताधीश होता है। सर्वोपरि होता है। शासन अपनी योग्यता और क्षमताओं के आधार पर समाज को निर्देशित, नियंत्रित और नियमित करता है। व्यक्तिवादी समाज में इस व्यवस्था समूह को बदलना लगभग असंभव होता है। शासन बदल जाता है किन्तु उसका 'स्व'रूप या स्वभाव नहीं बदलता। इसी लिये किंग के काल में भी और लोकतंत्र के काल में भी शासन सर्वोपरि ही रहा। इस व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न स्वरूप का होगा: &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+&lt;br /&gt;
! colspan=&amp;quot;5&amp;quot; |शासन व्यवस्था&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|प्रशासन&lt;br /&gt;
|सुरक्षा&lt;br /&gt;
|अर्थ&lt;br /&gt;
|न्याय&lt;br /&gt;
|शिक्षा&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
प्रसिध्द भारतीय चिंतक और विद्वान डॉ. देवेन्द्र स्वरूप प्रतिमान का और शिक्षा व्यवस्था का संबंध विषद करते हैं&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ. देवेन्द्र स्वरूप, ' भारत में ब्रिटिश शिक्षा नीति का विकास' पृष्ठ 7&amp;lt;/ref&amp;gt;। 'शिक्षा प्रणाली के संबंध में विचार करने से पूर्व हमें यह विचार करना ओगा कि हम राष्ट्र में कैसा मनुष्य बनाना चाहते हैं, उसकी जीवनशैली क्या होगी, उसका पारिवारिक और सामाजिक परिवेष कैसा होगा? अर्थात् राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रचना कैसी होगी? &lt;br /&gt;
इसी पृष्ठ पर देवेन्द्रस्वरूपजी लिखते हैं- प्रारंभ में उन्होंने (अंग्रेजों ने) भारत की पुरानी राजस्व, न्याय, प्रशासन प्रणाली से ही काम चलाना चाहा और साथ ही अपने साम्राज्य के चिर स्थायित्व के लिये अंग्रेजी शिक्षा का आरोपण करने की कोशिश भी की; किन्तु ये कोशिशें बेकार गयीं। तब उन्होंने अनुभव किया कि शिक्षा प्रणाली का किसी देश की राजस्व, न्याय, प्रशासन और अर्थव्यवस्था से गहरा संबंध होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा होने के कारण इन सभी व्यवस्थाओं का आधार उस समाज के जीवन के प्रतिमान की साझी जीवनदृष्टि और उस पर आधारित व्यवहार सूत्र होते हैं। इस कारण किसी प्रतिमान के व्यवस्था समूह में से केवल एक व्यवस्था को जो भिन्न जीवन दृष्टि पर आधारित है, बदलना संभव नहीं होता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय व्यवस्था समूह ==&lt;br /&gt;
भारतीय प्रतिमान के व्यवस्था समूह का ढाँचा निम्न प्रकार का है। &lt;br /&gt;
ऐसा ढांचे का चित्र या ऐसे ढाँचे का विवरण भी अन्य किसी शास्त्रीय ग्रन्थ में से नहीं लिया गया है। यह तो लेखक ने अपनी समझ के अनुसार यह ढांचा कैसा हो सकता है उसकी रूपरेखा अपनी कल्पना से ही बनाई है। &lt;br /&gt;
[[File:Part 1 Last Chapter Table Bhartiya Jeevan Pratiman.jpg|center|thumb|969x969px|भारतीय व्यवस्था समूह]] &lt;br /&gt;
भारत में कभी भी सामाजिक व्यवस्थाओं के स्वरूप को तय करने की जिम्मेदारी राजा या शासक की नहीं रही। धर्मसत्ता द्वारा प्रस्तुत व्यवस्थाओं को स्थापित करने की जिम्मेदारी राजा की या शासन की होती थी। रघुवंशम् में कालिदास इस की पुष्टि करते हैं। राजा की या कभी गणतंत्रात्मक शासन रहा तब भी शासन की जिम्मेदारी धर्माचार्यों द्वारा निर्मित धर्मशास्त्र या समाजशास्त्र के अनुपालन करने की और करवाने की ही रही। धर्म का अनुपालन करने वाला समाज निर्माण करने और उसे धर्माचरणी बनाए रखने के लिये हमारे पूर्वजों ने एक व्यवस्था समूह निर्माण किया था। ऐतिहासिक कारणों से ये व्यवस्थाएं दुर्बल हुईं। काल के प्रवाह में इन में कुछ दोष भी निर्माण हुए। लेकिन फिर भी यह व्यवस्था समूह अंग्रेज शासन भारत में स्थापित हुआ तब तक प्रत्यक्ष अस्तित्व में रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस व्यवस्था समूह की व्यवस्था के तीन पहलू थे। पोषक व्यवस्था, रक्षक व्यवस्था और प्रेरक व्यवस्था। इन में प्रेरक व्यवस्था तब ही ठीक से काम कर सकती है जब उस के साथ में पोषक और रक्षक व्यवस्था भी काम करती है। इस लिये समाज की सभी व्यवस्थाओं में यह तीनों पहलू विकेंद्रित स्वरूप में ढाले गये थे। प्रेरक यानी शिक्षा व्यवस्था का काम समाज को धर्माचरण सिखाने का था। भारतीय प्रतिमान में प्रेरक व्यवस्थाओं को अत्यंत श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी बनाना शिक्षा व्यवस्था का काम है। जो ५-१० प्रतिशत लोग इस प्रेरक व्यवस्था के प्रयासों के उपरांत भी अधर्माचरण करते थे, उन के लिये ही शासन व्यवस्था यानी दण्ड विधान की आवश्यकता होती है। यदि प्रेरक और पोषक व्यवस्थाओं के माध्यम से समाज के ९०-९५ प्रतिशत लोगों को धर्माचरणी नहीं बनाया गया तो रक्षक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर सकती। यूरो अमरिकी शिक्षा की दस पीढियाँ बीतने के बाद भी यदि अब भी काफी मात्रा में यूरोप या अमरिकी समाजों की तुलना में हम 'पारिवारिक भावना' को अभी तक बचा पाए हैं तो वह अभी भी अपना अस्तित्व बनाए रखने वाली समानान्तर शिक्षा व्यवस्था, परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था आदि के कारण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त ढाँचा भारतीय प्रतिमान की मोटी मोटी अभिव्यक्ति है। इस में धर्म व्यवस्था सामाजिक नीति नियम अर्थात् धर्माचरण के व्यावहारिक सूत्र तय करने का और अधर्माचरण के व्यवहार के लिये दण्ड विधान बनाने का काम करती है। अर्थात् शास्त्रीय भाषा में श्रृति के आधार पर 'स्मृति' निर्माण करने का काम करती है। इस प्रकार प्रेरक, पोषक तथा निवारक/रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का मार्गदर्शन करती है। इस मार्गदर्शन का माध्यम शिक्षा व्यवस्था होती है। इस लिये शिक्षा का या ज्ञानसत्ता का स्थान धर्मसत्ता से नीचे किन्तु शासन की अन्य सत्ताओं से ऊपर का होता है। ब्रह्मचर्य आश्रम, गुरूकुल या विद्याकेन्द्र और कुछ प्रमाण में परिवारों में भी वर्णानुसारी और जीवन के लिये उपयुक्त ऐसे सभी पहलुओं की शिक्षा दी जाती है। लोग जब वर्ण के अनुसार व्यवहार करते हैं तब समाज सुसंस्कृत बनता है। और जब लोग अपनी अपनी जाति के अनुसार व्यवसाय करते हैं समाज समृध्द बनता है। रक्षक या निवारक व्यवस्थाएं समाज और व्यक्तियों की संस्कृति और समृध्दि की रक्षा के लिये होती हैं। वर्ण और आश्रम यह व्यवस्थाएं समाज की रचना की व्यवस्थाएं हैं। परिवार व्यवस्था श्रेष्ठ मानव को जन्म देकर उसे वर्णानुसार संस्कारित करने की व्यवस्था है। यह व्यवस्था पारिवारिक भावना के विकास की भी व्यवस्था है। यह समाज व्यवस्था का लघु-रूप है। सामाजिकता की शिक्षा की नींव डालना परिवार व्यवस्था का काम है। इस कारण इस में पोषक, प्रेरक और रक्षक ऐसी तीनों व्यवस्थाओं का समावेश होता है। इसी प्रकार से जन्म से लेकर मृत्यू पर्यंत तक मनुष्य की बढती और घटती क्षमताओं और योग्यताओं के समायोजन की भी व्यवस्था परिवार में होती है। जाति व्यवस्था, परिवार और ग्रामकुल यह तीनों मिल कर अर्थ व्यवस्था यानी समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली व्यवस्था बनती है। रक्षक व्यवस्था भी इन तीनों व्यवस्थाओं में और चौथे शासन व्यवस्था में विकेन्द्रित रूप में स्थापित होती है। परिवार के जाति के या ग्राम के स्तर पर जब प्रेरक, पोषक और रक्षक व्यवस्था अव्यवस्थित हो जाती है या उस का हल नहीं निकल पाता है तब ही केवल शासन व्यवस्था की भूमिका शुरू होती है। जाति व्यवस्था, कौटुंबिक उद्योग और ग्रामकुल में आवश्यकताओं और उत्पादन का समायोजन ठीक से होने से समाज की प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति समाज आप ही कर लेता है। ऐसा समाज कभी अन्य समाजों की लूट करने के लिये आक्रमण नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान में अर्थसत्ता सर्वोपरि बनी हुई है। राजसत्ता उस के निर्देशन में चलती है। शिक्षा अर्थात् ज्ञानसत्ता शासन के नियंत्रण में है। और धर्मसत्ता का तो कहीं नामोनिशान तक दिखाई नहीं देता। प्रतिमान के व्यवस्था समूह की यह एकदम उलटी स्थिती है। धर्म सत्ता के निर्देशन में जब ज्ञानसत्ता शासन और अर्थव्यवस्था को निर्देशित करती है तब समाज ठीक दिशा में सोचता भी है और आगे भी बढता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ण व्यवस्था का एक काम तो वर्णों की निश्चिती करने का था। बालक के वर्ण के अनुसार उसके लिये संस्कार और शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था करने का था। ऐसा करने से उस बालक को भी लाभ होता है और समाज को भी लाभ होता था। दूसरा काम था वर्ण संकर के कारण निर्माण हुई जातियों के नाम, काम (व्यावसायिक कौशल का क्षेत्र) और जातिधर्म को तय करना। जातिव्यवस्था के काम जातिगत अनुशासन, व्यवसाय कौशलों में वृध्दि की व्यवस्था, जातिगत व्यावसायिक ज्ञान का विकास करना और जाति बांधवों को सदाचारी और सर्वहितकारी बनाए रखना, यह थे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निवारक यानी शासन व्यवस्था भी विकेन्द्रित थी। जातिगत अनुशासन के बारे में जाति पंचायतों का अपना दण्डविधान होता था। इसी प्रकार से ग्रामकुल की अपनी अनुशासन पालन करवाने की और सुरक्षा व्यवस्था होती थी। इन दोनों के स्तर पर जब मामला हल नहीं होता था तब ही वह शासक के पास जाता था। इस लिये न्याय भी अच्छा होता था, अल्पतम समय में होता था और शासन के पास आने वाले मुकदमों की संख्या अत्यल्प होती थी।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी व्यवस्थाओं का आधार पारिवारिक भावना होती थी। गुरू और शिष्य के संबंध (शिक्षा क्षेत्र) मानस पिता-पुत्र जैसे होते थे। विद्याकेन्द्र (गुरू) कुल होते थे। एक ही व्यवसाय करने वाले स्पर्धक नहीं जाति बांधव होते थे। गाँव के किसी की भी बेटी गाँव के प्रत्येक की बहन-बेटी होती थी। न्यायाधीश भी आप्तोप्त (अपराधी जैसे अपना आप्त हो) इस भावना से दण्ड देते थे। पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त का दण्डविधान में विशेष महत्व था। प्रजा (अर्थ है संतान) और राजा का संबंध संतान और पिता का सा होता था। हमारे बाजार भी परिवार भावना से चलते थे। वर्तमान प्रतिमान के कारण हमारे परिवार भी बाजार भावना से चलने लग गये हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप गुरूकुल का था। अर्थात् पारिवारिक था। इस में वर्ण भी सुनिश्चित किये जाते थे। आगे वर्णानुसारी शिक्षा भी दी जाती थी। समाज के सभी बच्चों के लिये यह व्यवस्था उपलब्ध थी। जनसंख्या के बढने से गुरुकुल शिक्षा केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण के बच्चों तक सिमट गई। वैश्य बच्चे अपने परिवारों में और जातिगत व्यवस्थाओं में व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने लगे। बर्बर आक्रमणों ने और आक्रांताओं ने शिक्षा व्यवस्था को और तोडा। फिर भी एकल विद्यालयों के रूप में अंग्रेज शासन के पूर्व काल तक ५ लाख से भी अधिक संख्या में यह विद्यालय चलते थे। समाज के सभी बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था इन में थी। शिक्षकों में भी सभी जाति के शिक्षक थे। किन्तु वे सब श्रीमद्बगवद्गीता में वर्णित ब्राह्मण का सा व्यवहार करनेवाले थे। नि;स्वार्थ भाव से नि:शुल्क शिक्षा देते थे। यानी ज्ञानदान करते थे। इस पूरे काल में शिक्षा का आधार, सभी विषयों की विषयवस्तू का आधार परिवार भावना या परस्पर आत्मीयता के संबंध यही रहा। सर्वे भवन्तु सुखिन: यही रहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपसंहार ==&lt;br /&gt;
वर्तमान व्यवस्था समूह या पूरे मानव जीवन का प्रतिमान यूरो-अमरिकी बन गया है। विश्व के अन्य समाजों के पास इसे अपनाने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इस प्रतिमान के कारण कई संकट निर्माण हो रहे हैं यह जानते हुए भी सभी समाज, जो औरों का होगा वह हमारा भी होगा यह मान रहे हैं। एक भारत के पास ही इस प्रतिमान से श्रेष्ठ प्रतिमान देने के लिये विकल्प है। इसके कुछ अवशेष समाज जीवन में मुसलमानों ने नष्ट और अंग्रेजों ने भ्रष्ट करने के उपरांत भी बचे हुए साहित्य में उपलब्ध हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान प्रतिमान में धीरे धीरे भारतीय प्रतिमान के कुछ बिन्दू जोड कर इसे भारतीय बनाने का प्रयास करने वाले व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन लाखों की संख्या में हैं। ये सभी व्यक्ति, संस्थाएं और संगठन पूरी श्रध्दा, समर्पण भाव, और प्रामाणिकता से प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों के कारण भारतीय प्रतिमान को रौंदने की गति कुछ कम भी हुई है, लेकिन बंद नहीं हुई है। ऐसे प्रयासों का प्रारंभ तो १९ वीं सदी के मध्य से ही हो गया था। इन प्रयासों की गति और शक्ति भी निरंतर बढ रही है। लेकिन यूरो-अमरिकी प्रतिमान को मिलने वाली समाज की मान्यता भी इन प्रयासों की अपेक्षाओं के विपरीत, बढती ही जा रही है। अतएव ऐसे प्रयासों से मिलने वाले तात्कालिक और अत्यंत सीमित लाभ के लालच को छोड कर शुध्द रूप से भारतीय प्रतिमान की प्रतिष्ठापना के प्रयास करने होंगे। इस परिवर्तन के लिये प्रचंड इच्छाशक्ति, वैचारिक मंथन, और प्रेरक और निवारक शक्ति की आवश्यकता होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस प्रकार अपनी शिक्षा प्रणाली को भारत में स्थापित करने के लिये अंग्रेजों ने यहाँ की शासन प्रणाली, कर प्रणाली, अर्थ व्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि को नष्ट कर भारतीय समाज में वैकल्पिक व्यवस्थाओं की माँग निर्माण की। शायद ऐसा ही कुछ हमें भी करना होगा। विनोबा भावे ने शिक्षा को भारतीय बनाने की दृष्टि से ऐसे ही प्रयोग का सुझाव दिया था। उन की सूचना को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। &lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य स्रोत: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. भारतीय शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, प्रकाशक पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान - भाग १)]]&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<title>Vyaktitva (व्यक्तित्व)</title>
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		<updated>2018-11-09T12:21:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: /* समाज में कामों का वर्गीकरण */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;भारत में शिक्षा का लक्ष्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है ऐसा कुछ लोग मानते हैं तो कुछ लोग समग्र विकास को मानते हैं। यूरो अमरीकी सोच के अनुसार सोचनेवाले ‘ओल राऊंड डेव्हलपमेंट ऑफ पर्सनालिटी’ को शिक्षा का लक्ष्य मानते हैं। किन्तु ‘सर्वांगीण’, ‘समग्र’ और ओल राऊंड इन के अर्थों में बहुत अंतर है। ‘समग्र” के अर्थ सर्वांगीण से भी अधिक व्यापक और सटीक हैं। अंग्रेजी में जिसे पर्सनॅलिटी कहते है वह और भारतीय व्यक्तित्व की संकल्पना यह भिन्न बातें  है । पर्सनॅलिटी शब्द लॅटीन शब्द ‘पर्सोना’ से बना है । पर्सोना का अर्थ है मुखौटा। अर्थात् मनुष्य का वास्तविक स्वरूप नहीं। मनुष्य ने धारण किया मुखौटा। याने बाहर से दिखनेवाला रूप । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व और पर्सनालिटी में ‘होना’ और ‘बनाया’ जाना का अंतर है। इनमें होना स्वाभाविक होता है। बनाना कृत्रिम होता है। स्वाभाविक का अर्थ है जो स्वभाव के अनुकूल है। भारतीय या हिन्दू जन्म से ही होता है। जैसे बाप्तिस्मा से ईसाई बनता है, सुन्नत से मुसलमान बनता है, भारतीय या हिन्दू बनने के लिए इन जैसी कोई विधि नहीं होती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वांगीण विकास को जो लोग लक्ष्य मानते हैं उनके अनुसार अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय ऐसे पाँच कोशों का विकास ही मनुष्य का विकास होता है। समग्र विकास की व्याप्ति इससे अधिक है। उसका विचार हम आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे पंचमहाभौतिक शरीर में से हम में विद्यमान उस परमात्म तत्व की जो सहज अभिव्यक्ति होती है उसे भारतीय सोच में व्यक्तित्व कहते है । यह मुखौटे जैसी कृत्रिम नहीं होती । और ना ही किसी को बताने के लिये धारण की हुई होती है। इसलिये हम ऑल राऊंड पर्सनॅलिटी डेव्हलपमेंट का विचार नहीं करेंगे । हम विचार करेंगे अष्टधा प्रकृति के सभी अंगों के सर्वांगीण विकास से भी अधिक व्यापक ऐसे व्यक्तित्व के समग्र विकास का। लेकिन उससे पहले व्यक्तित्व क्या है इसे समझना आवश्यक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तित्व का अर्थ ==&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व एक बहुत व्यापक अर्थवाला शब्द है। संसार में अनगिनत अस्तित्व हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ७ में कहा है:  &amp;lt;blockquote&amp;gt;भूमिराप: अनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा  । ।   7.5 । ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अपरेयमितस्त्वन्याम् प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्  । &amp;lt;/blockquote&amp;gt;आगे और कहा है  &amp;lt;blockquote&amp;gt;एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ : यह सब परमात्मा के ही भिन्न भिन्न रूप हैं। ये दो तत्वों से बनें हैं। एक है भूमि, आप, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे आठ घटकों की अचेतन याने अपरा प्रकृति। और दूसरी है जीवरूप परा प्रकृति याने जीवात्मा। परा और अपरा दोनों ही परमात्मा के ही अंशों से बनें हैं। संसार में जितने भी भूतमात्र हैं वे सब मेरी इन दो प्रकृतियों से ही बनें हैं। मैं ही संसार की उत्पत्ति और प्रलय का मूल कारण हूँ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सभी अस्तित्वों की भिन्नता उनमें उपस्थित अष्टधा प्रकृति के आठों घटकों के अनगिनत भिन्न भिन्न प्रमाणों में संयोग (कोंबिनेशन) के कारण है। परमात्मा की अष्टधा प्रकृति के जिस संयोग-विशेष के साथ परमात्मा का अंश याने परा प्रकृति याने आत्मतत्व जुड़ता है उन्हें जीव कहते हैं, और परमात्मा के उस अंश को उस जीव का जीवात्मा। परमात्मा का अंश अस्तित्व में से अपने को अभिव्यक्त करता है, अपने गुण-लक्षण प्रकट करता है इसलिये उसे ‘व्यक्ति’ कहा जाता है। हर अस्तित्व की अभिव्यक्ति अष्टधा प्रकृति के भिन्न मेल-विशेष के कारण अन्य अस्तित्वों से भिन्न होती है। इसे ही उस अस्तित्व का ‘व्यक्तित्व‘ कहा जाता है। मनुष्य के संबंध में जब इस शब्द का प्रयोग किया जाता है तब व्यक्तित्व से तात्पर्य है उस मनुष्य की अष्टधा प्रकृतिके मेल-विशेष के कारण होनेवाली जीवात्मा की अभिव्यक्ति।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तित्व का समग्र विकास ही पूर्णत्व ==&lt;br /&gt;
स्वामी विवेकानंदजी ने शिक्षा की व्याख्या की है। वे बताते हैं – ‘मनुष्य में पहले से ही विद्यमान ‘पूर्णत्व’ के प्रकटीकरण को ही शिक्षा कहते हैं।’ इस पूर्णत्व शब्द को ठीक समझना होगा। पूर्णत्व का अर्थ है हर बात में पूर्णत्व। यह तो केवल परमात्मा में ही होता है। अन्य किसी में नहीं। स्वामीजी के कथन का अर्थ है की परमात्मपद प्राप्ति ही शिक्षा का लक्ष्य है। यही तो भारत की सहस्रकों से चली आ रही मान्यता है।   &amp;lt;blockquote&amp;gt;सा विद्या या विमुक्तये &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थात जो मुक्ति दिलाए, मोक्ष की प्राप्ति जिससे हो, जिससे प्रमात्मपद प्राप्त हो वही शिक्षा है।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;एकात्म मानव दर्शन में इसी समग्र विकास की व्याख्या पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी ने सरल शब्दों में प्रस्तुत की। वे बताते हैं कि व्यक्तित्व का समग्र विकास उसके शरीर, मन, बुद्धि इन अंगों के विकास के साथ ही समष्टीगत और सृष्टिगत विकास होने से होता है। मनुष्य समाज और सृष्टि के बिना जी नहीं सकता। इन दोनों के साथ समायोजन अनिवार्य है। इसलिए इन के साथ समायोजन आवश्यक है।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह समायोजन भी दो प्रकार से होता है। एक होता है अपने स्वार्थ के लिए और दूसरा होता है इन के साथ अपना संबंध आत्मीयता का है ऐसा मानने से। चिरकाल से मनुष्य के सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के पीछे ‘स्वार्थ’ और ‘आत्मीयता’ यही दो कारण रहे हैं। इन संबंधों का आधार स्वार्थ है ऐसा माननेवाले लोगों को ‘असुर’ स्वभाव और संबंधों का आधार आत्मीयता है ऐसा माननेवालों को ‘सुर’ स्वभाव कहा गया है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत हमेशा से ही सुर स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता रहा है। समग्र विकास की संकल्पना में अन्नमय से लेकर आनंदमय के विकास को ‘व्यक्तिगत’ विकास कहा जाता है। इससे आगे जब उस व्यक्ति को समाज के बारे में आत्मीयता का अनुभव होता है। तब इसे '''समष्टीगत विकास''' कहते हैं। जैसे बालक माता के साथ परिवार के सदस्यों के साथ जब आत्मीयता का व्यवहार करने लगता है, उसमें कुटुंब भावना का विकास होता है तो यह उस बालक के समष्टीगत विकास है। '''समूचे मानव समाज के साथ जब मनुष्य आत्मीयता अनुभव करता है तब समष्टीगत विकास पूरा होता है'''।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी तरह सृष्टि के मानवेतर सभी अस्तित्वों के साथ जब वह आत्मीयता या परिवार भावना अनुभव करता है तो उसका '''सृष्टिगत विकास''' होता है। व्यक्तिगत, समष्टीगत और सृष्टिगत ऐसे तीनों प्रकार के विकास के समुच्चय को ही ‘समग्र विकास’ कहते हैं। ऐसे समग्र विकसित मनुष्य को संसार में उपस्थित सभी अस्तित्वों के साथ आत्मीयता की अनुभूति होती है। ये सभी अस्तित्व परमात्मा के ही रूप होने से इन के साथ जो एकात्मता अनुभव करता है उसमें और परमात्मा में कोई अंतर नहीं रह जाता। यही मोक्ष की अवस्था है। यही मुक्ति है। यही पूर्णत्व की प्राप्ति है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय सोच के अनुसार व्यक्तित्व विकास के चार आयाम है । वे है व्यक्तिगत् विकास, समष्टिगत् विकास, सृष्टिगत् विकास और परमेष्ठीगत् विकास। पहले तीन के विकास से चौथे का विकास अपने आप हो जाता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्यक्तिगत् विकास''' से अर्थ है, शरीर, प्राण, मन, बुध्दि, चित्त इन पाँच घटकों का विकास । ये पाँच घटक हर व्यक्ति के भिन्न होते है । इन्ही पाँच बातों को पंचकोश विकास भी कहा जाता है । शरीर अर्थात् अन्नमय कोश, प्राण अर्थात् प्राणमय कोष, मन अर्थात् मनोमय कोश, बुद्धि याने विज्ञानमय कोश और चित्त अर्थात् आनंदमय कोश का विकास । शरीर एक यंत्र जैसा है । पंच कर्मेन्द्रिय और पंच ज्ञानेन्द्रिय तथा शरीर मे काम करनेवाली चेतातंत्र, रक्ताभिसरण, पाचनतंत्र आदि विभिन्न प्रणालियाँ प्राण शक्ति के कारण चलती है । प्राण इस शरीर रूपी यंत्र को चलानेवाला इंधन है । प्राण शरीर और इंन्द्रियों से अधिक सूक्ष्म है । इसलिये अधिक बलवान है । तीसरा घटक है  मन । मनोमय का संबंध मन से होता है । मन के विकास का अर्थ है चंचलता मुक्त, स्थिर, एकाग्र, अलिप्त, निर्द्वंद्व, और विकार रहित मन । इंन्द्रियोंपर नियंत्रण करने वाले और बुध्दि के नियंत्रण में रहने वाला मन । ग्रहणशक्ति, धारणाशक्ति, स्मृति, निरीक्षण, परीक्षण, तर्क, अन्मान, विश्लेषण, संश्लेषण  और कल्पनाशक्ति का विकास ही बुध्दि का विकास होता है ।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनंदमय कोश के विकास का अर्थ है, चित्त का विकास । अपने शरीर में स्थित उस परमात्वतत्व को जैसा वह है वैसा ही जानने की क्षमता, सहजता, स्वतंत्रता, सौंदर्यबोध यह चित्त के विकास के लक्षण है ।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्य और समाज  - इन का परस्पर संबंध अन्योन्याश्रित है । समाज के बिना मनुष्य जी नही सकता । इस समाज के संबंध में आत्मीयता की, एकात्मता की भावना का विकास ही समष्टिगत् विकास कहलाता है । समाज के हर घटक के दुख में दुख की अनुभूति होना इसका लक्षण है । इसी तरह मनुष्य और समाज सृष्टि के बिना जीवित नही रह सकते। इस चराचर सृष्टि के साथ आत्मीयता की, एकात्मता की भावना का विकास ही सृष्टिगत् विकास है । उपर्युक्त तीनों प्रकार से विकास होने से परमेष्ठिगत् विकास अपने आप हो जाता है ।   &amp;lt;blockquote&amp;gt;अहं ब्रह्मास्मि&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;तत् त्वं असि &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;सर्वं खल्विदं ब्रह्मं&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् मैं ही वह परमात्मतत्व हूं, तुम भी वह परमात्वत्व ही हो और चराचर में वह परमात्मतत्व ही व्याप्त है इस की अनुभूति होना ही परमेष्ठिगत् विकास है । यही पूर्णत्व है । यही मोक्ष है । यही नर का नारायण बनाना है। यही अहंकार विजय है। यही मानव जीवन का लक्ष्य है ।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मानव जीवन का लक्ष्य ==&lt;br /&gt;
अभारतीय और भारतीय विचार प्रवाह में सबसे पहला अंतर है मानव जीवन के लक्ष्य का । विश्व में यहूदी, ईसाई, मुसलमान समाजों की जनसंख्या विशाल और लक्षणीय है। इन सभी का लक्ष्य हेवन या जन्नत माना गया है। हेवन या जन्नत यह संकल्पनाएं मोक्ष से एकदम भिन्न हैं। मोक्ष का अर्थ है परमात्मपद की प्राप्ति । अर्थात् सुख और दुख की सीमा से परे चले जाना । सर्वं खल्विदं ब्रह्मं अर्थात् चराचर में एकत्व की या एक ही आत्मतत्व की अनूभूति करना । कई लोग ईसाई सॅल्व्हेशन या इस्लामी कयामत (आखिरत) की तुलना मोक्ष से करते हैं। किन्तु यह गलत है। यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं।                                                                                            &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सॅल्व्हेशन या आखिरत यह तो हेवन और जन्नत तथा हेल और दोजख की संकल्पनाओं से जुडी संकल्पनाएं ही हैं। भारतीय विचार में स्वर्ग और नरक की संकल्पनाएं भी हेवन और जन्नत और हेल और दोजख की संकल्पनाओं से भिन्न है। ईसाईयत की सॅल्व्हेशन और इस्लाम की कयामत (आखिरत) की कल्पना और मोक्ष में कोई साम्य नहीं है। अभारतीय (ईसाई और इस्लाम की) मान्यता है कि मनुष्य मरने के बाद अपनी दफनभूमि में पडा रहता है। डे ऑफ सॅल्व्हेशन या कयामत के दिन को गॉड या अल्लाह अपने प्रेषित के माध्यम से सब को उठाते हैं। प्रेषित के कहे अनुसार जिसने ईसाईयत पर श्रध्दा रखी थी उसे गॉड हमेशा के लिये स्वर्ग भेज देता है। और जिन्होंने गॉड पर श्रध्दा नहीं रखी थी उन सबको हेल में भेज देता है। इसी प्रकार से प्रेषित के कहने से अल्लाहताला प्रत्येक मनुष्य की रूह का क्या होगा यह निर्णय करता है। जिसने अल्लाहताला में निष्ठा रखी थी उन सब को हमेशा के लिये जन्नत में भेज देता है। और जिसने अल्लताला पर निष्ठा नहीं रखी थी उन सब को हमेशा के लिये दोजख में भेज देता है। वास्तव में इन दोनों मजहबों की प्रक्रिया में गॉड या अल्लाहताला तो बस नाममात्र हैं। सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी तो उनके प्रेषित ही हैं गॉड और अल्लाहताला का काम तो बस अपने प्रेषित द्वारा बताये अनुसार लोगों को हेवन और हेल या जन्नत और दोजख में भेजने का ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय स्वर्ग और नरक की कल्पना भी इन से पूर्णत: भिन्न है। स्वर्ग या नरक की प्राप्ति में परमात्मा सीधा न्याय करता है। उसे किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं होती। वह सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी होने से वह प्रत्येक द्वारा किये सत्कर्म और दुष्कर्म जानता है। प्रत्येक मनुष्य द्वारा किये इन सत्कर्मों के अनुसार ही परमात्मा उस के लिये स्वर्ग सुख या नरक यातनाओं की व्यवस्था करता है। जैसे ही स्वर्ग सुख या नरक यातनाओं के भोग पूरे हो जाते हैं, मनुष्य स्वर्ग सुख से वंचित और नरक यातनाओं से मुक्त हो जाता है। यह भोग हर मनुष्य अपने वर्तमान जन्म में और आगामी जन्मों में प्राप्त करता है। भारतीय सोच में तो सीधा सीधा गणित है। जितना सत्कर्म उतना सुख जितना दुष्कर्म उतना दु:ख। अभारतीय समाजों में सत्कर्म और दुष्कर्म की कोई संकल्पना ही नहीं है। हेवन या जन्नत का अर्थ है सदैव सुखी रहने की स्थिति और हेल और दोजख का अर्थ है हमेशा दुखी रहने की स्थिति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभारतीय समाज तो मोक्ष की कल्पना तक नहीं कर सके हैं। भारतीय मोक्ष की कल्पना भारतीय सोच को आध्यात्मिक बना देती है। '''देहभाव से मुक्ति ही मोक्ष है'''। जीवात्मा जब देह-भाव से ग्रस्त होता है तब उसमें करता भाव, भोक्ता भाव और ज्ञाताभाव आ जाते हैं। इन के अभाव में जीवात्मा अपने देहभाव से मुक्त हो जाता है। फिर उसमें और परमात्मा में अंतर नहीं रहा जाता। अधि का अर्थ है श्रेष्ठ या उत्तम। श्रीमदभगवदगीता १५ वें अध्याय के १७ में परमात्मा को उत्तम पुरूष कहा है। अर्थात् अधि-आत्मा ही परमात्मा होता है। देहभाव से मुक्त होकर परमात्मा से तादात्म्य की दिशा में बढ़ना ही जीवन है। ऐसी भारतीय मान्यता के कारण सम्पूर्ण जीवन और जीवन का हर पहलू अध्यात्म से ओतप्रोत होता है।  भारतीय समाज ने अपने सम्मुख व्यक्तिगत, सामाजिक और सृष्टिगत ऐसे तीन प्रकार के एक दूसरे से सुसंगत ऐसे लक्ष्य रखे हैं। लक्ष्य का निर्धारण करते समय वे ‘स्वभावज’ हों इसका ध्यान रखा गया है। व्यक्तिगत स्तर का लक्ष्य और सामाजिक स्तर का लक्ष्य परस्पर पूरक और पोषक होना आवश्यक है। इसी तरह सृष्टिगत लक्ष्य, व्यक्तिगत और समष्टिगत लक्ष्य ये तीनों परस्पर पूरक पोषक होना आवश्यक हैं।  व्यक्तिगत स्तर का लक्ष्य मोक्ष या त्रिवर्ग के माध्यम से अभ्युदय है। यह सामाजिक लक्ष्य स्वतंत्रता को बाधक नहीं होना चाहिये। इसीलिये हमारे पूर्वजों ने कहा है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;आत्मनो मोक्षार्थं जगत् हिताय च।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;मुझे मोक्ष मिले लेकिन जगत् का हित करते हुए मिले। और त्रिवर्ग में तो मूलत: धर्म का ही अधिष्ठान है और धर्माचरण सृष्टिगत लक्ष्य है। तीनों स्तरों के लक्ष्यों का नियामक धर्म ही है। इसलिये तीनों स्तरों के लक्ष्य परस्पर पूरक और पोषक बनें रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मानव के व्यक्तित्व से संबंधित महत्वपूर्ण बातें ==&lt;br /&gt;
# मानव यह परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना है। सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। परमात्मा की सभी शक्तियाँ मनुष्य के पास विद्यमान होतीं हैं। केवल मात्रा का अंतर होता है। मानव की शक्तियाँ मर्यादित हैं। परमात्मा की अमर्याद हैं। किंतु भारतीय मान्यता और इतिहास के अनुसार नर करनी करे तो नारायण तक विकास कर सकता है। &lt;br /&gt;
# मानव जीवन का नियमन उसके कर्म ही करते हैं। भारतीय मान्यता है कि जीवों की ८४ लक्ष योनियाँ हैं। इनमें केवल मानव योनि ही कर्मयोनि है। अन्य सभी प्राणियों की योनियाँ भोग योनियाँ हैं। प्राणि उन्हें कहते हैं जो प्राण के यानि आहार, निद्रा, भय और मैथुन इन प्राणिक आवेगों के स्तरपर जीते हैं। इन अर्थों में मानव एक प्राणि भी है।  जन्म से तो मानव भी अन्य प्राणियों जैसा प्राण के स्तर पर जीनेवाला जीव ही होता है। संस्कार और शिक्षा से वह मन के स्तर पर जीने लगता है। &lt;br /&gt;
'''मन के स्तर पर जीनेवाले को मानव कहते हैं'''। बुध्दि के स्तर पर जीनेवाले को महामानव और चित्त या आत्मिक स्तर पर जीनेवाले को और भी अधिक श्रेष्ठ मानव या नरोत्तम कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानवेतर योनियों के प्राणियों को अपने स्वाभाविक प्राणिक आवेगों के अनुसार चलने मात्र की बुध्दि और मन मिला है। इसलिये सामान्यत: ये प्राणि स्वतंत्र कर्म नहीं कर सकते। केवल मानव को विशेष मन, बुध्दि, स्मृति आदि मिले हैं इस कारण वह अन्य प्राणियों से भिन्न, प्राणिक आवेगों से भिन्न और प्राणिक आवेगों के विपरीत भी कर्म करने की स्वतंत्रता ले सकता है। मानव व्यवहार की इस स्वतंत्रता का नियमन उस के कर्मों से होता है। यह नियमन कर्मसिध्दांत के आधार पर होता है। कर्मसिध्दांत की अधिक जानकारी के लिये ‘[[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|जीवनशैली के सूत्र]]‘ अध्याय में देखें। ऋणसिद्धांत का आधार भी कर्मसिद्धांत ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३. सृष्टि में मानव निर्माण तो सब से अंत में हुआ था। उससे पहले सृष्टि थी। सृष्टि के विलय की प्रक्रिया में भी मानव जाति नष्ट होने के उपरांत भी सृष्टि होगी।  सृष्टि को मानव की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मानव सृष्टि के बगैर जी नहीं सकता। इसलिये मानव के लिये यह अनिवार्य है कि वह सृष्टि के साथ अपने को समायोजित करे। अपने सभी व्यवहार प्रकृति सुसंगत रखे। प्रकृति का संतुलन नहीं बिगाडे। सृष्टि चक्र को अबाधित रखे। वैसे भी सृष्टि या प्रकृति के साथ जब मानव खिलवाड़ करता है, एक सीमा तक तो प्रकृति उसे सहन कर लेती है। इस सीमा को लाँघने के बाद प्रकृति भी उसकी प्रतिक्रया देती है। इस प्रतिक्रया से मानव का ही नुकसान होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४.  श्रेष्ठता के साथ दायित्व आता है। दायित्व बोध आना चाहिये। मानव को जो श्रेष्ठता परमात्मा से मिली है उस के कारण मानव का यह दायित्व बनता है कि वह विवेक से काम ले। प्रकृति नहीं बिगाडे। जीवश्रृंखला को नहीं तोडे। प्रकृति के साथ खिलवाड नहीं करे। दुर्बलों की सहायता करे। मानव को मिली श्रेष्ठ स्मृति के कारण ‘कृतज्ञता’, उपकार से उतराई होना यह मानव का अनिवार्य लक्षण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५.  भारतीय दृष्टि से मानव जीवन का लक्ष्य मोक्षप्राप्ति या मुक्ति है। व्यक्तिगत से ऊपर परमेष्ठीगत विकास है। इसी तरह मानव का सामाजिक स्तर पर लक्ष्य ‘स्वतंत्रता’ है। और सृष्टि के स्तरपर ‘धर्माचरण’ है। सृष्टि के नियमों के अनुकूल व्यवहार भी धर्म ही होता है। स्वतंत्रता का अर्थ स्वैराचार नहीं होता। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारियाँ आतीं हैं। दायित्व आते हैं। धर्म के विषय में अधिक जानकारी के लिये अध्याय ३ ‘[[Dharma: Bhartiya Jeevan Drishti (धर्म:भारतीय जीवन दृष्टि)|धर्म]]’ में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६.  मानव सदैव सुख की खोज करता रहता है। मानव के सारे प्रयास मूलत: सुखप्राप्ति के लिये होते हैं। सुख का अर्थ अनुकूल संवेदना है। सुख प्राप्ति के लिये निम्न बातें अनिवार्य होती हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- सुसाध्य आजीविका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- स्वतंत्रता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- शांति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- पौरुष&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन चारों बातों का समष्टीगत होना व्यक्ति के सुख के लिये आवश्यक है। जितने प्रमाण में ये समष्टिगत होंगी उतने प्रमाण में ही व्यक्ति को भी सुख मिल सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुख के भी भिन्न भिन्न प्रकार होते हैं। '''दैवी, मानवी और पाशवी'''। दैवी सुख आत्मिक सुख को कहते हैं। इस में ममता, सहानुभूति, आत्मीयता, परोपकार, प्रेम आदि के कारण मिले सुखों का समावेश होता है। मानवी सुख मन का सुख होता है। यह मन को प्रसन्न करनेवाला सुख होता है। पाशवी सुख में शरीर और इंद्रियों का सुख आता है। यह स्तर प्राणिक आवेगों में अनुकूल अनुभवों का स्तर है। सुख के भिन्न भिन्न स्तर भी होते हैं। इंद्रिय सुख का स्तर सबसे नीचे होता है। मन का सुख उससे ऊपर, बुध्दि का सुख उससे ऊपर, चित्त का सुख या आनंद उससे ऊपर और परमानंद का या परम कल्याण का सुख (आत्मीय) सब से ऊपर होता है। इस परम सुख का नाम ही मोक्ष है। आत्मिक सुख की प्राप्ति के लिये अन्य तीनों के न्यूनतम सुख की प्राप्ति की आवश्यकता होती है। यह मन-बुध्दि में स्थापित करने के लिये ही धर्मशिक्षा की व्यवस्था की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७.  मानवेतर प्राणियों में नवजात बच्चे बहुत शीघ्र स्वावलंबी बन जाते हैं। मानव में व्यक्तित्व विकास यह लंबी चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इसलिये मानव परिवार की रचना और पशूओं के परिवार की रचना में और प्रवर्तन में अंतर होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८.  मानव का व्यक्तित्व पाँच पहलुओं से बना है। तैत्तिरीय उपनिषद् में इन्हें पञ्चविध पुरूष कहा है। आदि जगदगुरु शंकराचार्य इन पहलुओं को पंचकोश कहते हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय - ऐसे उन पञ्चविध पुरूषों के या पाँच कोशों के नाम हैं। सामान्य लोगों की भाषा में इन्हें शरीर (इंद्रियाँ), प्राण, मन, बुध्दि और चित्त कहा जा सकता है। जन्म के समय इन सभी का स्वरूप अविकसित होता है। ये सब बातें वैसे तो हर प्राणि के पास भी होतीं ही हैं। किंतु मानवेतर प्राणियों में मन, बुध्दि और चित्त या तो अक्रिय होते हैं या अत्यंत निम्न स्तर के होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हर मानव के पंचकोशीय स्वरूप में से स्वयं परमात्मा अभिव्यक्त होता है इसीलिये मानव को व्यक्ति कहते हैं। इन कोशों के साथ तादात्म्य हो जाने से उस व्यक्ति में उपस्थित आत्म तत्व अपने को व्यक्ति मानने लग जाता है। जब मानव इन पंचकोशों के परे जाता है तब ही उस का साक्षात्कार परमात्मा से होता है। हर मानव का व्यक्तित्व अन्य मानवों से भिन्न होता है। इसलिये उसके विकास का रास्ता भी अन्यों से भिन्न होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९.  मानव व्यक्तित्व के पहलुओं का विकास भी एकसाथ नहीं होता। गर्भधारणा के बाद सर्वप्रथम चित्त सक्रिय होता है। इस काल में गर्भ अपनी माँ से भी कहीं अधिक संवेदनशील होता है। अब तक इंद्रियों का विकास नहीं होने से शब्द, स्पर्श, रूप रस और गंध के सूक्ष्म से सूक्ष्म संस्कार वह ग्रहण कर लेता है। जब इंद्रियों का निर्माण शुरू होता है तब फिर संस्कार क्षमता उस इंद्रिय की क्षमता जितनी कम हो जाती है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिशू अवस्था में बालक के इंद्रियों के विकास का काल होता है। पूर्वबाल्यावस्था में मन का या विचार शक्ति का, उत्तर बाल्यावस्था और पूर्व किशोरावस्था में बुध्दि, तर्क आदि का और उत्तर किशोरवस्था में तथा यौवन में अहंकार का यानी 'मै' का यानी कर्ता भाव (मैं करता हूँ), ज्ञाता भाव (मैं जानता हूँ) और भोक्ता भाव (मैं उपभोग करता हूँ) का विकास होता है। इसलिये व्यक्तित्व विकास के लिये संस्कारों का और शिक्षा का स्वरूप आयु की अवस्था के अनुसार बदलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०. हर मानव जन्म लेते समय अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार विकास की कुछ संभाव्य सीमाएँ लेकर जन्म लेता है। अच्छा संगोपन मिलने से वह पूरी संभावनाओं तक विकास कर सकता है। कुछ विशेष इच्छाशक्ति रखने वाले बच्चे अपनी संभावनाओं से भी अधिक विकास कर लेते हैं। लेकिन ऐसे बच्चे अल्प संख्या में ही होते हैं। अपवाद स्वरूप ही होते हैं। अपवाद स्वरूप बच्चों के विकास के लिये सामान्य बच्चों के नियम और पद्धतियाँ पर्याप्त नहीं होतीं। सामान्य बच्चों के साथ भी विशेष प्रतिभा रखनेवाले बच्चों जैसा व्यवहार करने से सामान्य बच्चों की हानि होती है। समाज के सभी लोग प्रतिभावान या जिन्हें श्रीमद्भगवद्गीता ‘श्रेष्ठ’ कहती है या जिन्हें ‘महाजनो येन गत: स: पंथ:’ में ‘महाजन’ कहा गया है ऐसे नहीं होते हैं। इनका समाज में प्रमाण ५-१० प्रतिशत से अधिक नहीं होता है।  इसीलिये भारतीय समाज के पतन के कालखण्ड छोड दें तो सामान्यत: भारतीय न्याय व्यवस्था में एक ही प्रकार के अपराध के लिये ब्राह्मण को क्षत्रिय से अधिक, क्षत्रिय को वैश्य से अधिक और वैश्य को शूद्र से अधिक दण्ड का विधान था। इस विषय में चीनी प्रवासी द्वारा लिखी विक्रमादित्य की कथा ध्यान देने योग्य है। कुछ स्मृतियों में ब्राह्मण को अवध्य कहा गया है। अवध्यता से तात्पर्य है शारीरिक अवध्यता। ब्राह्मण का अपराधी सिध्द होना उसके सम्मान की समाप्ति होती है। और  ब्राह्मण का सम्मान छिन जाना मृत्यू से अधिक बडा दंड माना जाता था। ब्राह्मणों में क्षत्रियों में और वैश्यों में भी महाजन होते हैं। इनका प्रमाण ५-१० % से कम ही होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११. आवश्यकता और इच्छा एक नहीं हैं। आवश्यकताएँ शरीर और प्राण के लिये होती हैं। इसलिये वे मर्यादित होतीं हैं। इच्छाएँ मन करता है। मन की शक्ति असीम होती है। इसीलिये इच्छाएँ अमर्याद होतीं हैं। इच्छाओं की पूर्ति से मन तृप्त नहीं होता। वह और इच्छा करने लग जाता है। इसी का वर्णन किया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;न जातु काम: कामानाम् उपभोगेन शाम्यम् ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;हविषा कृष्णवर्त्वेम् भूयं एवाभिवर्धते ॥ &amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रत्येक मानव को उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार और सामर्थ्य होती है। लेकिन साथ ही में इच्छाओं को नियंत्रण में रखने का दायित्व भी होता है। इसलिए मन के संयम की शिक्षा, शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू है। स्वाद संयम, वाणी संयम ऐसे सभी इन्द्रियों की तन्मात्राओं याने स्पर्श, रूप, रस, गंध और शब्द इन के विषय में संयम रखना चाहिए । सामान्यत: बुद्धि, जब तक कि इन्द्रिय नियंत्रित मन उसे प्रभावित नहीं करता, ठीक ही काम करती है। इसलिए हम ऐसा भी कह सकते हैं कि इन्द्रियों को मन के नियंत्रण में रखने की और मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखने की शिक्षा भी शिक्षा का आवश्यक पहलू है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२. मानव अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति में उपलब्ध पदार्थों से या तो सीधे या समाज के अन्य सदस्यों के माध्यम से करता है। इसलिये यह मानव के ही हित में है कि वह प्रकृति के साथ कोई खिलवाड नहीं करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३. श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार चारों वर्ण परमात्मा द्वारा निर्मित हैं । इन में अंतर गुणों का और कर्मों का है। गुण का अर्थ है सत्व, रज और तम गुण। वैसे तो प्रत्येक मनुष्य में तीनों गुण कम अधिक मात्रा में होते ही हैं,  लेकिन जिस वर्ण की प्रधानता होगी उसी वर्ण का वह व्यक्ति माना जाता है। वर्णश: गुणों का संबंध निम्न है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;ब्राह्मण वर्ण	- सत्व प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर रज या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;क्षत्रिय वर्ण	- रज प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;वैश्य वर्ण	- रज प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;शूद्र वर्ण		- तम प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या रज&amp;lt;/blockquote&amp;gt;समाज सुखी बनें इसलिये विप्र वर्ण स्वतंत्रता के लिये, क्षत्रिय वर्ण सुरक्षा के लिये, वैश्य वर्ण सुसाध्य आजीविका के लिये और शूद्र वर्ण शांति के लिये जिम्मेदार है। ब्राह्मण वर्ण की जिम्मेदारी स्वाभाविक स्वतंत्रता की प्रस्थापना, क्षत्रिय वर्ण की जिम्मेदारी शासनिक स्वतंत्रता की प्रस्थापना, वैश्य वर्ण की जिम्मेदारी आर्थिक स्वतंत्रता की प्रस्थापना की है। देशिक शास्त्र इन स्वतंत्रताओं की व्याख्या निम्न रूप में करता है:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.१ स्वाभाविक स्वतंत्रता : जो काम किसी के प्राकृतिक हित के प्रतिकूल नहीं हो उस काम को करने में किसी का और किसी भी प्रकारका हस्तक्षेप नहीं होने को स्वाभाविक स्वतंत्रता कहते हैं। शासनिक और आर्थिक स्वतंत्रता स्वाभाविक स्वतंत्रता में साविष्ट हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.२ शासनिक स्वतंत्रता : शासक के अथवा प्रजा के प्राकृतिक हित में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होकर सदा प्रजा के हित के अनुकूल होने को ही शासनिक स्वतंत्रता कहते हैं। आथिक स्वतंत्रता भी इस में समाविष्ट है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.३ आर्थिक स्वतंत्रता : अर्थ के अभाव या प्रभाव के कारण मनुष्य के प्राकृतिक हित में कोई बाधा निर्माण नहीं होने की स्थिति को आर्थिक स्वतंत्रता कहते हैं। उपर्युक्त व्याख्याओं से यह समझ में आएगा कि स्वाभाविक स्वतंत्रता में अन्य दोनों स्वतंत्रताओं का समावेश हो जाता है। इसी प्रकार से शासनिक स्वतंत्रता में आर्थिक स्वतंत्रता का समावेष हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसीलिये ब्राह्मण वर्ण को सर्वोच्च जिम्मेदारी के अनुसार सर्वोच्च प्रतिष्ठा और क्षत्रिय को दूसरे क्रमांक की प्रातिष्ठा समाज में प्राप्त होनी चाहिये। इन स्वतंत्रताओं की प्राप्ति ही सामाजिक दृष्टि से मानव का लक्ष्य है । ऐसा देशिक शास्त्र का कहना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमद्भगवद्गीता कर्म का महत्व विषद करती है। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने ‘स्वभावज’ कर्म अनिवार्यता से करने चाहिये। स्वभावज का अर्थ है जन्म से ही जैसा स्वभाव है उस के अनुरूप। श्रीमद्भगवद्गीता में शब्दप्रयोग हैं '''ब्रह्मकर्मस्वभावजम्''', '''वैश्यकर्मस्वभावजम्''' आदि। साथ में यह भी कहा है कि अपने वर्ण का काम भले ही अच्छा नहीं लगता हो तब भी वही करना चाहिये। सामान्य मानव को तो इसी तरह व्यवहार करना चाहिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो प्रतिभावान हैं उन्हें शायद सामान्य नियम नहीं लगाये जाते। जैसे गुरू के बिना भवसागर तर नहीं सकते ऐसा कहते हैं। लेकिन जो विशेष प्रतिभावान हैं उन्हें यह बात अनिवार्य नहीं है। वे तो आप ही बिना गुरू के मोक्षगामी हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्णों में परस्पर पूरकता और परस्पर अनुकूलता होती है। इसीलिये वेद कहते हैं कि चारों वर्ण एक शरीर के चार अंगों के समान हैं। जब ज्ञान का विषय होगा, स्वाभाविक स्ववतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तो ब्राह्मण का, जब सुरक्षा का प्रश्न होगा,शासनिक स्वतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तब क्षत्रिय का, जब उदरभरण का, आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तो वैश्य का और जब कला, कारीगरी, परिचर्या, मनोरंजन आदि का विषय होगा तो शूद्र का महत्व होगा।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रेष्ठ और हीन का विवेक समझाने का, अभ्युदय के साथ नि:श्रेयस की प्राप्ति का मार्गदर्शन करने का काम ब्राह्मण का होने से वह समाज का शिक्षक बन जाता है। स्वाभाविक स्वतंत्रता में शासनिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता दोनों का समावेश होता है। पूरे समाज की स्वाभाविक स्वतंत्रता की रक्षा का दायित्व उठाने के कारण शिक्षक सर्वोच्च आदर प्राप्ति का अधिकारी होता है। मोक्ष - इस परम लक्ष्य के कारण शिक्षक या गुरू का सम्मान सबसे अधिक होना उचित ही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे क्रमांक पर शासनिक स्वतंत्रता याने सुरक्षा का विषय आता है। शासनिक स्वतंत्रता की जिम्मेदारी लेने के कारण शासक या क्षत्रिय वर्ग का सम्मान होना भी स्वाभाविक ही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंतु अपने वर्ण के अनुसार व्यवहार नहीं करना और अपने ब्राह्मण या क्षत्रिय होने का दंभ भरना यह समाज के पतन की आश्वस्ति है। ऐसे लोग कठोर दण्ड के अधिकारी हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४. संस्कारों के तीन प्रकार होते हैं। सहज, कृत्रिम और अन्वयागत। सहज में फिर तीन संस्कार होते हैं। योनि संस्कार (मानव योनि के), वर्ण संस्कार और राष्ट्रीयता के संस्कार । कृत्रिम में १६ या कुछ लोगों के अनुसार ४९ संस्कार होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितरों और माता-पिता की ओर से प्राप्त संस्कारों को अन्वयागत संस्कार कहते हैं। अन्वयागत में माता-पिता और पूर्वजों के सहज संस्कार और तीव्र कृत्रिम संस्कार होते हैं। तीव्र कृत्रिम संस्कार दीर्घ अभ्यास के कारण बनीं आदतों के कारण होते हैं। इन संस्कारों में माता की ओर से पाँच पीढ़ियों के मन से संबंधित और पिता की ओर से १४ पीढ़ियों के शरीर से संबंधित संस्कार होते हैं। करीब की पीढ़ी के संस्कार अधिक और दूर की पीढ़ी के संस्कार कम होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१५. हर मानव सुर और असुर प्रवृत्तियों से भरा होता है। इसी प्रकार से समाज में भी सुर और असुर दोनों प्रवृत्तियों के लोग होते हैं। भर्तृहरि के अनुसार अपना कोई हित नहीं होते हुए भी औरों के अहित में आनंद लेने वाले असुर से भी गये गुजरे लोग भी समाज में होते है। इन सभी के लिये सदाचार की शिक्षा की व्यवस्था करना समाज का दायित्व है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जो बात अपने को प्रिय होती है उसे प्रेय कहते हैं। और जो अंतिमत: कल्याणकारी बात होती है उसे श्रेय कहते हैं।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने प्रेय के लिये अन्यों का अहित करनेवाले को असुर कहते हैं। ऐसे मानव को भी श्रेय ही प्रेय लगने लग जाए इसलिये शिक्षा होती है। कुल मिलाकर शिक्षा का स्वरूप धर्मशिक्षा का होता है। पुरूषार्थ चतुष्ट्य की शिक्षा का होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६. मानव अच्छा डॉक्टर बनता है, अच्छा व्यावसायिक आदि बनता है यह समाज के लिये महत्वपूर्ण बात होती है। किंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात हर बालक के लिये यह है कि वह एक अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा देशभक्त और अच्छा मानव बने। इसी तरह हर बालिका अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी देशभक्त और अच्छी मानव बनें यह अधिक महत्वपूर्ण होता है।  इसे सुनिश्चित करने के लिये सब से अधिक अवसर माता को होता है इसलिए सबसे अधिक जिम्मेदारी माता की होती है। दूसरे स्थान पर पिता जिम्मेदार होता है। कहा गया है ‘माता प्रथमो गुरू: पिता द्वितीयो’। इस में माता पिता समान घर के सब ज्येष्ठ लोगों का भी योगदान होता है। तीसरी जिम्मेदारी शिक्षक की होती है। ऐसी मान्यता है कि बालक के विकास में २५ प्रतिशत हिस्सा उसके पूर्वजन्मों के कर्मों का होता है। दूसरा २५ प्रतिशत उसे प्राप्त संस्कार और शिक्षा का होता है। तीसरा २५ प्रतिशत उसे मिले वातावरण, संगत, मित्र आदि का होता है। चौथा २५ प्रतिशत उसके अपने प्रयासों का होता है। इन हिस्सों का महत्वक्रम भी इसी क्रम से होता है। पूर्व कर्मों का प्रभाव सबसे अधिक, उसके उपरांत संस्कार और शिक्षा का आदि।  अन्य एक वर्गीकरण के अनुसार श्रेष्ठ मानव निर्माण के दो मुख्य पहलू हैं। पहला श्रेष्ठ जीवात्मा होना। और दूसरा है उसे अच्छी शिक्षा और संस्कार प्राप्त होना। इस दृष्टि से श्रेष्ठ मानव निर्माण में ५० प्रतिशत हिस्सा तो जन्म देनेवाले माता पिता का है। संस्कारों का काम भी घर में ही मुख्यत: चलता है। इसलिए संस्कारों का २५ प्रतिशत हिस्सा कुटुंब का होता है। शेष २५ प्रतिशत शिक्षा का जिसमें विद्यालयीन शिक्षा और लोकशिक्षा के माध्यमों का सहभाग होता है। समाज में यदि समस्याएँ हैं और बढ रहीं हैं तो माता, पिता और शिक्षक ये तीन लोग क्रम से इस के जिम्मेदार होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१७. मानव के लिये कुछ बातें जन्मजात और कुछ समाज से प्राप्त होनेवाली होतीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार आने वाली बातें - दस इंद्रिय, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार, श्रेष्ठ जीवात्मा, प्रारब्ध (पूर्व कर्मों का फल) जो जन्म कुंडली में दिखाई देता है, त्रिगुणयुक्त व्यक्तित्व, त्रिदोषयुक्त शरीर, माता पिता आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माता-पिता से जन्म से प्राप्त होने वाली बातें : पितर और उन की विरासत- सामाजिक प्रतिष्ठा, नाम, भौतिक समृध्दि,  शारीरिक स्वास्थ्य, जाति और आनुवांशिकता से आनेवाली बातें जैसे वर्ण, (त्रिदोषात्मक) शारीरिक स्वास्थ्य, व्यावसायिक और अन्य कुशलताएँ, परम्पराएँ आदि परिवार में और समाज में प्राप्त होनेवाली बातें : नाम, प्यार, आत्मीयता, रक्षण, पोषण, संस्कार, शिक्षण, आदतें, आर्थिक और पारिवारिक विरासत और परंपराएँ, सामाजिकता, सामाजिक प्रतिष्ठा, कुलधर्म, कुलाचार, विविध पारिवारिक यानी रक्तसंबंध के रिश्ते, विविध सामाजिक रिश्ते, सदाचार, धर्म आदि की शिक्षा आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८. मानव के जन्म, जीवन और मृत्यू के चक्र में आयू की अवस्था के अनुसार निम्न बातें बदलतीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- प्यार-दुलार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- रक्षण/पोषण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- संस्कार और शिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- क्षमताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- योग्यताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- भावनाएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- आवश्यकताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- इच्छाएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- जिम्मेदारियाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- कर्तव्य/बोध &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- अधिकार/बोध&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन का समायोजन सामाजिक संगठन और व्यवस्थाओं में होना आवश्यक है। इस हेतु से समाज भिन्न भिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं को चलाता है, भिन्न भिन्न संगठन और व्यवस्थाएँ निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९. सामान्यत: गृहस्थ के लिये चारों आश्रमों के लोगों तथा अन्य जीव जगत के योगक्षेम की जिम्मेदारी के अलावा दो और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ होतीं हैं। पहली यह है कि वह धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों के योगक्षेम की व्यवस्था करे। दूसरी है समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सार्थक योगदान दे। धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों की संख्या का समाज की कुल आबादी के साथ संतुलन भी महत्वपूर्ण है। धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों के योगक्षेम की व्यवस्था करने से वह नि:श्रेयस को और भौतिक वस्तुओं के उत्पादन से वह व्यक्तिगत और सामाजिक स्तरपर अभ्युदय को प्राप्त करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०. भारतीय समाज में गृहस्थ के लिये तीन बातें आवश्यक मानीं गईं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहली बात यह है कि वह केवल धर्म की कमाई करे, दूसरे व्यय भी धर्मानुसार ही करे और तीसरे आवश्यकता से अतिरिक्त कमाई यथासंभव अधिक से अधिक दान में दे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१. सुख और सुविधा में अंतर होता है। सुविधा से सुख बढेगा यह आवश्यक नहीं है। जब सुविधा मानव को पंगु बना देती है, उसकी स्वाभाविक क्षमताओं को कुंठित कर देती है या स्वाभाविक क्षमताओं का क्षरण करती है तब वह दुख का कारण बनती है। इसलिये कितना सुविधाभोगी बनना यह विवेक महत्वपूर्ण है। सुविधाओं के विकास में दो बातें ध्यान में रखना चाहिये। पहली यह कि सुविधा अक्षम लोगों की मदद के लिये होती है। दूसरी बात यह है कि उससे मानव की प्राकृतिक क्षमताओं में और सामाजिकता यानी पारिवारिक भावना और व्यवहार में वृध्दि हो। कम से कम हानि तो नहीं हो।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२२. कोई भी वस्तु खरीदते समय उस वस्तु की पर्यावरण सुसंगतता, सामाजिकता से सुसंगतता, उपयोगिता, सौंदर्यबोध और सबसे अंत में उसकी कीमत को महत्व देना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२३. हर गृहस्थ को लोकहितकारी उत्पादक व्यवसाय करना चाहिये। इससे एक ओर तो वह अपनी सामजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करता है तो दूसरी ओर वह (अधम गति से विपरीत) श्रेष्ठ गति को प्राप्त कर लेता है। २४. मनुष्य के शरीर की रचना शाकाहारी प्राणि के अनुसार है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२५. हर मनुष्य शरीर, प्राण, मन, बुध्दि और चित्त का स्वामी होता है। ये पाँचों बातें हर मनुष्य की भिन्न होतीं हैं। परमात्व तत्व भी इन पाँच घटकों के माध्यम से ही अभि‘व्यक्त’ होता है। इसीलिये मनुष्य को व्यक्ति कहते हैं। और व्यक्ति के स्वभाव, क्षमताएँ, प्रभाव आदि को व्यक्तित्व कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व से संबंधित कुछ बातें निम्न हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राणिक आवेग : आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये चार प्राणिक आवेग हैं। ये मनुष्य और पशू दोनों में समान हैं। इसलिये मनुष्य भी प्राणि होता ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक व्यक्ति को सुख, दु:ख, ममता, प्रेम, आत्मीयता, तथा द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर जैसे षड्विकार यानी मन की भावनाएँ होतीं हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवश्यकताएँ और इच्छाएँ : प्राणिक आवेगों की पूर्ति को आवश्यकता और मन की चाहतों को इच्छा कहते हैं। आवश्यकताएँ मर्यादित और इच्छाएँ अमर्याद होतीं हैं। -  कर्म योनि : प्राणिक आवेगों की पूर्ति के लिये और इच्छाओं की पूर्ति के लिये जो बातें की जातीं हैं उन्हें कर्म कहते हैं। उसे प्राप्त मन और बुध्दि की श्रेष्ठता के कारण मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र होता है। यह कर्म ही मनुष्य के जीवन का नियमन करते हैं। इस नियमन को कर्म सिध्दांत के माध्यम से समझा जा सकता है। कर्मसिध्दांत की जानकारी के लिये कृपया ‘ [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|भारतीय जीवन दृष्टि और जीवन शैली]] ‘ अध्याय में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२६. समाज में व्यक्ति के दो प्रकार हैं। स्त्री और पुरूष। परमात्मा ने इन्हें जैसे ये आज हैं इसी स्वरूप में निर्माण किया था। समाज धारणा के लिये यानि समाज बना रहने के लिये के लिये स्त्री और पुरूष दोनों की आवश्यकता होती है। एक की अनुपस्थिति में समाज जी नहीं सकता। स्त्री और पुरूष एक दूसरे के पूरक होते हैं। बच्चे को जन्म देने का काम दोनों मिलकर करते हैं। अन्य एक भी ऐसा काम नहीं है जो स्त्री नहीं कर सकती या पुरूष नहीं कर सकता। किंतु इनको एक दूसरे से कई बातों में भिन्न बनाने में परमात्मा का कुछ प्रयोजन अवश्य है। इस प्रयोजन के अनुसार इनमें कार्य विभाजन होने से समाज ठीक चलता है। सुखी, समृध्द और चिरंजीवी बनता है। स्त्री-पुरूष संबंधों के विषय में थोड़ा अधिक गहराई से अब हम विचार करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== स्त्री और पुरूष संबंधी भारतीय सोच ==&lt;br /&gt;
भारतीय सोच के अनुसार स्त्री और पुरूष दोनों एकसाथ ही निर्माण हुए थे। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 3 के श्लोक 10 में कहा है &amp;lt;blockquote&amp;gt;सहयज्ञा: प्रजा सृष्ट:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रजा अर्थात् स्त्री और पुरूष साथ ही पैदा हुए थे। स्त्री और पुरूष की भिन्नता का बुध्दियुक्त सोच के आधार पर भारतीय मनीषियों ने मूल्यांकन किया है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा ने सृष्टि को एक संतुलन के साथ बनाया है। स्त्री और पुरूष दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे होते है । दोनों की पूर्ण बनने की चाह ही स्त्री और पुरूष में परस्पर आकर्षण निर्माण करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसार में प्रत्येक वस्तु के निर्माण में परमात्मा का कोई प्रयोजन होता है। स्त्री की और पुरूष की शारीरिक और मानसिक भिन्नता का भी कुछ प्रयोजन है। दोनों की भूमिकाएं भिन्न किंतु परस्पर पूरक होंगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा से ही बना होने के कारण, परमात्मपद ( पूर्णत्व ) प्राप्ति की दिशा में आगे बढना ही प्रत्येक मानव के जीवन का लक्ष्य है। लेकिन शारीरिक रचना के कारण, सुरक्षा की आवश्यकता के कारण स्त्री के पूर्णत्व की दिशा में विकास का मार्ग अधिक कठिन होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारीवारिक मामलों में स्त्री को निर्णय का अधिकार और सामाजिक मामलों में जहाँ परिवार से बाहर के वातावरण का संबंध होता है, स्त्री के लिये सुरक्षा की समस्या निर्माण हो सकती है, उस में पुरूष को निर्णय का अधिकार भारतीय परिवार और समाज व्यवस्था की विशेषता रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंदू शास्त्र बताते है: &amp;lt;blockquote&amp;gt;'आत्मवत् सर्वभूतेषू'  या 'आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् '&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - जो बात अपने लिये अयोग्य या प्रतिकूल समझते हो उसे औरों के लिये भी अयोग्य और प्रतिकूल समझो और उसे मत करो। इसी का विस्तार है ' मातृवत् परदारेषू '। अपनी बहन, बेटी, माता और पत्नि के साथ अन्य पुरूष अभद्र व्यवहार न करें, सम्मान का व्यवहार करें ऐसी यदि आप औरों से अपेक्षा करते है तो आप भी किसी अन्य की बहन, बेटी, पत्नि या माता के साथ अभद्र व्यवहार न करें, उन्हे सम्मान दें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। अपनी पत्नि को छोडकर अन्य सभी स्त्रियों के प्रति माता की भावना को सुसंस्कार कहा गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। यह भी कहा गया कि &amp;lt;blockquote&amp;gt;यत्र नार्यस्तु पुज्यंते रमंते तर देवता: &amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ : जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता रहते है अर्थात् वह समाज देवता स्वरूप बन जाता है। सुख समृध्दि से भर जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय स्त्री विषयक दृष्टि - तत्व और व्यवहार ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त स्त्री विषयक भारतीय दृष्टि से सब परिचित है। फिर प्रश्न उठता है कि वर्तमान में भारतीय समाज में स्त्री की दुरवस्था क्यों है? इस के लिये थोडा इतिहास देखना पडेगा। दो बडे कारण समझ में आते है। एक तो बौद्ध काल में महात्मा गौतम बुध्द के निर्वाण के पश्चात् कई बौद्ध विहार अनैतिकता के अड्डे बन गये थे। बौद्ध मत को राजाश्रय मिला हुआ था। यौवन में स्त्री का पुरूषों के प्रति और पुरूष का स्त्री के प्रति यौन आकर्षण अत्यंत स्वाभाविक बात है। फिर यौवन में विवेक और अनुभव भी कुछ कम ही होते है। ऐसी युवतियाँ इस स्वाभाविक आकर्षण के कारण विहारों में शरण लेतीं थीं। उन्हें वापस लाना असंभव हो जाता था। इसलिये सावधानी के तौर पर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद नहीं हुआ तो भी बहुत कम हो गया। दूसरे मुस्लिम आक्रांताओं ने जो अत्याचार स्त्रियों पर किये, स्त्रियों को जबरन उठाकर अरब देशों में बेचा इस से आतंकित होकर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद हो गया। स्त्री शिक्षा के मामले में और इसलिये अन्य सभी मामलों में भी बहुत पिछड गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वाधीनता के पश्चात यह अपेक्षा थी कि शिक्षा राष्ट्रीय बनेगी, भारतीय बनेगी, सेमेटिक मजहबों के प्रभाव से बाहर निकलेगी । दो तीन पीढ़ियों में स्त्री को योग्य स्थान दिलाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान में भारतीय स्त्री, जिस में अभी कुछ भारतीयता शेष है, वह बहुत संभ्रम में है। उस के विरासत में मिले संस्कार उस की शिक्षा से मेल नहीं खाते। वर्तमान शिक्षा की झंझा उसे पश्चिमी रहन सहन की ओर घसीटती रहती है। जो पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित है ऐसी स्त्रियाँ भी अपेक्षा तो यह करतीं है कि हर अन्य पुरूष उन की ओर ध्यान अवश्य दे किन्तु उनकी तय की हुई मर्यादा को नहीं लांघे। उन से आदर से व्यवहार करे। किन्तु इस के लिये वह अपने बच्चों पर ऐसे संस्कार करने के लिये न तो तैयार है और न ही सक्षम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समाज में कामों का वर्गीकरण ==&lt;br /&gt;
पारिवारिक और सामाजिक काम निम्न है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारिवारिक काम वे है जो केवल परिवार में किये जाते है, और सामाजिक काम वे है जो समाज ( परिवार भी समाज का ही हिस्सा होता है ) में किये जाते है। कुछ प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं: &lt;br /&gt;
# प्रजा का निर्माण&lt;br /&gt;
# संस्कार और शिक्षा&lt;br /&gt;
# सामाजिक व्यवस्थाओं को चलाना।&lt;br /&gt;
जीने के लिये या मनोरंजन के लिये आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन में प्रजा का निर्माण यह तो शुध्द पारिवारिक काम है। इस से आगे पाँच वर्ष तक की शिक्षा का अर्थात् इंद्रिय, मन और संस्कारों की शिक्षा का काम भी मोटे तौर पर परिवार में ही होता है। इस के बाद जब बालक विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तब वह जिम्मेदारी समाज की होती है।  जीवन की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भिन्न भिन्न प्रकार के उद्योग चलाये जाते है। यह सामाजिक प्रयासों का ही क्षेत्र होता है। समाज ठीक चले इस दृष्टि से विभिन्न व्यवस्थाओं का निर्माण भी किया जाता है। जैसे सडक बनाना, कुए बनाना, धर्मशालाएं बनाना, मंदिर बनाना, विद्यालय बनाना आदि। यह व्यवस्थाएं अच्छीं चलें इस के लिये भी ध्यान देना पडता है। सामाजिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक कार्यों की सूची में आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुरूष और स्त्री की विशेषताएं ==&lt;br /&gt;
पुरूष और स्त्री को परमात्मा ने मूलत: ही भिन्न बनाया है। फिर भी यदि ठीक से देखा जाये तो बच्चे को जन्म देना, जो दोनों का साझा काम है, उसे छोडकर दूसरा ऐसा कोई भी काम नहीं है जो स्त्री या पुरूष नहीं कर सकता। किंतु केवल ' कर सकना ' के आधार पर स्त्री और पुरूष दोनों जो काम वर्तमान में स्त्रियाँ करतीं है वही करने लग जाएं तो जीना हराम हो जाएगा। इसीलिये सामान्यत: विभिन्न कामों का स्त्री सुलभ और पुरूष सुलभ कामों में बँटवारा किया जाता है और स्त्री के काम कौन से है और पुरूष के कौन से है यह निश्चय किया जाता है। वैसे तो कई काम ऐसे है जो सीमा रेखा पर होते है। जो स्त्री भी और पुरूष भी सहजता से कर सकते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री में इस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन नाम के लैंगिक अंत:स्त्राव (हार्मोन) होते है। इन के कारण स्त्री के शरीर और अवयवों की रचना भिन्न और कोमल बनती है। पुरूष में ऍंड्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन नाम के स्त्राव (हार्मोन) होते है। इन के कारण पुरूष के शरीर और अवयवों की रचना भिन्न और मजबूत बनती है। वैसे तो स्त्री और पुरूष दोनों में इस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन दोनों हार्मोन होते ही है। लेकिन पुरूष में टेस्टोस्टेरॉन का प्रमाण स्त्री से १५ से २० गुना अधिक होता है। इसी प्रकार से स्त्री के शरीर में २६ प्रतिशत चरबी (फॅट्) और २० प्रतिशत प्रथिन (प्रोटीन) होते है तो पुरूष के शरीर में १५ प्रतिशत चरबी और ४५ प्रतिशत प्रथिन होते है। इन्हीं घटकों के कारण स्त्री और पुरूष में शारीरिक और मानसिक भिन्नता होती है। स्त्री में स्त्रीत्व और पुरूष में पुरूषत्व होता है। स्त्री का स्त्रीत्व और पुरूष का पुरूषत्व तीव्र होने से संतति अधिक तेजस्वी और ओजस्वी बनती है। सामाजिक संस्कारों के माध्यम से स्त्री के स्त्रीत्व को और पुरूष के पुरूषत्व को अधिक तीव्र बनाया जा सकता है। अधिजनन शास्त्र के माध्यम से भारतीय परंपराओं में ऐसा बनाया जाता रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री का स्वभाव भावना प्रधान होता है तो पुरूष का स्वभाव वस्तुनिष्ठ और तर्कनिष्ठ होता है। दिशा, गणित, विज्ञान, समय आदि विश्लेषण और संश्लेषण के विषय पुरूष के लिये अधिक सरल होते है। स्त्री के लिये कला, कौशल, कोमलता से करने के विषय सरल होते है। स्त्री की त्वचा भी पुरूष की त्वचा से महीन और इसलिये अधिक संवेदनशील होती है। स्पर्श ही नही तो स्पर्श के पीछे छुपी इच्छाओं को भी समझने की सामर्थ्य स्त्री में होती है। स्त्री में संवाद कुशलता अधिक अच्छी होती है। अन्यों के भाव स्त्री आसानी से समझ जाती है। पुरूष को उस के लिये प्रयास करने पडते है। पुरूष मेहनत के काम दीर्घ काल तक कर सकता है। स्त्री, उस के स्नायू कोमल होने के कारण शारीरिक दृष्टि से अधिक सहनशील होती है जब की पुरूष मानसिक आघातों को अधिक अच्छी तरह सहन कर लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-१३ वर्ष की अर्थात् माहवारी शुरू होने की आयु में स्त्री के शरीर में इस्ट्रोजन का प्रमाण और इस कारण प्रभाव बढ जाता है। यह स्त्री में लैंगिक आकर्षण निर्माण करता है। माहवारी के काल में स्त्री के अंत:स्त्रावों के असंतुलन के कारण स्त्री का स्वभाव चिडचिडा बन जाता है। पुरूषों में यह आयु १५-१६ वर्ष की होती है। इस आयु में पुरूषों में टेस्टोस्टेरॉन का प्रमाण बढता है। उस के स्नायू कठोर बनने लगते है। वह मदमस्त बन किसी को टकराने की इच्छा करने लगता है। आजकल लैंगिक  स्वैराचार और खुलापन बढ़ने से यह आयु कम हो रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्भ धारणा से लेकर संतान के पाँच वर्ष का होने तक के लिये स्त्री को किसी अन्य की मदद की आवश्यकता होती है। स्त्री में काम वासना से वात्सल्य की भावना अधिक प्रबल होती है। इसीलिये कहा गया है कि स्त्री क्षण काल की पत्नि और अनंत काल की माता होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री का स्वभाव बचत का होता है। उस के लिये प्रतिष्ठा से बचत का मूल्य अधिक होता है। इस लिये वह नि:संकोच होकर बीच बाजार में भी रुपये दो रुपयों के लिये भाव ताव करती दिखाई देती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री को अंतर्मुख होना कठिन होता है। त्रयस्थ वृत्ति से वह अपने व्यवहार का विश्लेषण नहीं कर सकती। स्त्री शारीरिक दृष्टि से पुरूष से दुर्बल तो होती ही है, गर्भावस्था में वह और भी परावलंबी बन जाती है। &lt;br /&gt;
इस दुर्बलता के कारण ही मनु ने कहा है&amp;lt;blockquote&amp;gt;पिता रक्षति कौमार्ये, भर्ता रक्षति यौवने, स्थवीरे रक्षति पुत्र:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् कौमार्यावस्था में स्त्री को पिता का यौवन में पति का और वार्धक्य में पुत्र का संरक्षण मिलना आवश्यक होता है। इस से उस स्त्री का और समाज का भी भला होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सब विश्लेषण का हेतु पुरूष और स्त्री में परमात्मा प्रदत्त अंतर होता है यह बताने का है। इस अंतर के कारण स्त्रियों के और पुरूषों के बल स्थान और दुर्बल स्थान भिन्न होते है, यह बताने का है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपसंहार ==&lt;br /&gt;
मनुष्य एक स्खलनशील जीव है। स्खलन यह प्रकृति का नियम है। जैसे पानी हमेशा नीचे की ओर प्रवाहित होता है उसी तरह मनुष्य की प्रेरणाएँ भी उसे स्वभावत: निन्म स्तर की दिशा में आगे बढातीं हैं। इस कारण मानव व्यवस्थाओं को और संस्कारों को बिगाडता रहता है। मानव जीवन और समाज जीवन सुचारू रूप से चलने के लिये मानव को तीव्र संस्कारों और शिक्षा की तथा दंण्ड व्यवस्था की आवश्यकता होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानव जीवन को मोक्षगामी बनाने का साधन धर्म है। अपनी इच्छाओं (काम) को और उन इच्छाओं की पूर्ति के लिये किये गये प्रयासों तथा उपयोग में लाए गये धन, साधन और संसाधनों (तीनों मिलाकर अर्थ) को धर्मानुकूल रखने से मनुष्य मोक्षगामी बनता है। इसलिये काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखने की शिक्षा ही वास्तव में शिक्षा होती है। जो मोक्षगामी नहीं बनना चाहते उन के लिये भी काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखना उतना ही आवश्यक और महत्वपूर्ण है जितना मोक्षगामी लोगों के लिये। काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखने से ही समाज सुखी, समृध्द और सुसंस्कृत बनता है। जब मानव के व्यवहारों को यानि इच्छाओं की पूर्ति के प्रयासों को धर्म के दायरे में रखा जाता है तब 'सर्वे भवन्तु सुखिन: की प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मनुष्य पैदा होता है उस समय उसके कोई कर्तव्य नहीं होते। केवल अधिकार ही होते हैं। ऐसे केवल अधिकार लेकर जिन्होंने जन्म लिया है उन बच्चों को अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिये जीनेवाले मनुष्य नहीं बनाया गया तो मानव का समाज जीवन नरक बन जाएगा। उसे कर्तव्यों के लिए जीनेवाला मनुष्य बनाना यह परिवार का काम है। और ऐसा विकास ही व्यक्ति का विकास है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१. शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, लेखक सुश्री इंदुमती काटदरे, पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन (प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vyaktitva_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B5)&amp;diff=14638</id>
		<title>Vyaktitva (व्यक्तित्व)</title>
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		<updated>2018-11-09T12:19:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: /* व्यक्तित्व का अर्थ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;भारत में शिक्षा का लक्ष्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है ऐसा कुछ लोग मानते हैं तो कुछ लोग समग्र विकास को मानते हैं। यूरो अमरीकी सोच के अनुसार सोचनेवाले ‘ओल राऊंड डेव्हलपमेंट ऑफ पर्सनालिटी’ को शिक्षा का लक्ष्य मानते हैं। किन्तु ‘सर्वांगीण’, ‘समग्र’ और ओल राऊंड इन के अर्थों में बहुत अंतर है। ‘समग्र” के अर्थ सर्वांगीण से भी अधिक व्यापक और सटीक हैं। अंग्रेजी में जिसे पर्सनॅलिटी कहते है वह और भारतीय व्यक्तित्व की संकल्पना यह भिन्न बातें  है । पर्सनॅलिटी शब्द लॅटीन शब्द ‘पर्सोना’ से बना है । पर्सोना का अर्थ है मुखौटा। अर्थात् मनुष्य का वास्तविक स्वरूप नहीं। मनुष्य ने धारण किया मुखौटा। याने बाहर से दिखनेवाला रूप । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व और पर्सनालिटी में ‘होना’ और ‘बनाया’ जाना का अंतर है। इनमें होना स्वाभाविक होता है। बनाना कृत्रिम होता है। स्वाभाविक का अर्थ है जो स्वभाव के अनुकूल है। भारतीय या हिन्दू जन्म से ही होता है। जैसे बाप्तिस्मा से ईसाई बनता है, सुन्नत से मुसलमान बनता है, भारतीय या हिन्दू बनने के लिए इन जैसी कोई विधि नहीं होती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वांगीण विकास को जो लोग लक्ष्य मानते हैं उनके अनुसार अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय ऐसे पाँच कोशों का विकास ही मनुष्य का विकास होता है। समग्र विकास की व्याप्ति इससे अधिक है। उसका विचार हम आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे पंचमहाभौतिक शरीर में से हम में विद्यमान उस परमात्म तत्व की जो सहज अभिव्यक्ति होती है उसे भारतीय सोच में व्यक्तित्व कहते है । यह मुखौटे जैसी कृत्रिम नहीं होती । और ना ही किसी को बताने के लिये धारण की हुई होती है। इसलिये हम ऑल राऊंड पर्सनॅलिटी डेव्हलपमेंट का विचार नहीं करेंगे । हम विचार करेंगे अष्टधा प्रकृति के सभी अंगों के सर्वांगीण विकास से भी अधिक व्यापक ऐसे व्यक्तित्व के समग्र विकास का। लेकिन उससे पहले व्यक्तित्व क्या है इसे समझना आवश्यक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तित्व का अर्थ ==&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व एक बहुत व्यापक अर्थवाला शब्द है। संसार में अनगिनत अस्तित्व हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ७ में कहा है:  &amp;lt;blockquote&amp;gt;भूमिराप: अनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा  । ।   7.5 । ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अपरेयमितस्त्वन्याम् प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्  । &amp;lt;/blockquote&amp;gt;आगे और कहा है  &amp;lt;blockquote&amp;gt;एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ : यह सब परमात्मा के ही भिन्न भिन्न रूप हैं। ये दो तत्वों से बनें हैं। एक है भूमि, आप, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे आठ घटकों की अचेतन याने अपरा प्रकृति। और दूसरी है जीवरूप परा प्रकृति याने जीवात्मा। परा और अपरा दोनों ही परमात्मा के ही अंशों से बनें हैं। संसार में जितने भी भूतमात्र हैं वे सब मेरी इन दो प्रकृतियों से ही बनें हैं। मैं ही संसार की उत्पत्ति और प्रलय का मूल कारण हूँ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सभी अस्तित्वों की भिन्नता उनमें उपस्थित अष्टधा प्रकृति के आठों घटकों के अनगिनत भिन्न भिन्न प्रमाणों में संयोग (कोंबिनेशन) के कारण है। परमात्मा की अष्टधा प्रकृति के जिस संयोग-विशेष के साथ परमात्मा का अंश याने परा प्रकृति याने आत्मतत्व जुड़ता है उन्हें जीव कहते हैं, और परमात्मा के उस अंश को उस जीव का जीवात्मा। परमात्मा का अंश अस्तित्व में से अपने को अभिव्यक्त करता है, अपने गुण-लक्षण प्रकट करता है इसलिये उसे ‘व्यक्ति’ कहा जाता है। हर अस्तित्व की अभिव्यक्ति अष्टधा प्रकृति के भिन्न मेल-विशेष के कारण अन्य अस्तित्वों से भिन्न होती है। इसे ही उस अस्तित्व का ‘व्यक्तित्व‘ कहा जाता है। मनुष्य के संबंध में जब इस शब्द का प्रयोग किया जाता है तब व्यक्तित्व से तात्पर्य है उस मनुष्य की अष्टधा प्रकृतिके मेल-विशेष के कारण होनेवाली जीवात्मा की अभिव्यक्ति।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तित्व का समग्र विकास ही पूर्णत्व ==&lt;br /&gt;
स्वामी विवेकानंदजी ने शिक्षा की व्याख्या की है। वे बताते हैं – ‘मनुष्य में पहले से ही विद्यमान ‘पूर्णत्व’ के प्रकटीकरण को ही शिक्षा कहते हैं।’ इस पूर्णत्व शब्द को ठीक समझना होगा। पूर्णत्व का अर्थ है हर बात में पूर्णत्व। यह तो केवल परमात्मा में ही होता है। अन्य किसी में नहीं। स्वामीजी के कथन का अर्थ है की परमात्मपद प्राप्ति ही शिक्षा का लक्ष्य है। यही तो भारत की सहस्रकों से चली आ रही मान्यता है।   &amp;lt;blockquote&amp;gt;सा विद्या या विमुक्तये &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थात जो मुक्ति दिलाए, मोक्ष की प्राप्ति जिससे हो, जिससे प्रमात्मपद प्राप्त हो वही शिक्षा है।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;एकात्म मानव दर्शन में इसी समग्र विकास की व्याख्या पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी ने सरल शब्दों में प्रस्तुत की। वे बताते हैं कि व्यक्तित्व का समग्र विकास उसके शरीर, मन, बुद्धि इन अंगों के विकास के साथ ही समष्टीगत और सृष्टिगत विकास होने से होता है। मनुष्य समाज और सृष्टि के बिना जी नहीं सकता। इन दोनों के साथ समायोजन अनिवार्य है। इसलिए इन के साथ समायोजन आवश्यक है।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह समायोजन भी दो प्रकार से होता है। एक होता है अपने स्वार्थ के लिए और दूसरा होता है इन के साथ अपना संबंध आत्मीयता का है ऐसा मानने से। चिरकाल से मनुष्य के सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के पीछे ‘स्वार्थ’ और ‘आत्मीयता’ यही दो कारण रहे हैं। इन संबंधों का आधार स्वार्थ है ऐसा माननेवाले लोगों को ‘असुर’ स्वभाव और संबंधों का आधार आत्मीयता है ऐसा माननेवालों को ‘सुर’ स्वभाव कहा गया है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत हमेशा से ही सुर स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता रहा है। समग्र विकास की संकल्पना में अन्नमय से लेकर आनंदमय के विकास को ‘व्यक्तिगत’ विकास कहा जाता है। इससे आगे जब उस व्यक्ति को समाज के बारे में आत्मीयता का अनुभव होता है। तब इसे '''समष्टीगत विकास''' कहते हैं। जैसे बालक माता के साथ परिवार के सदस्यों के साथ जब आत्मीयता का व्यवहार करने लगता है, उसमें कुटुंब भावना का विकास होता है तो यह उस बालक के समष्टीगत विकास है। '''समूचे मानव समाज के साथ जब मनुष्य आत्मीयता अनुभव करता है तब समष्टीगत विकास पूरा होता है'''।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी तरह सृष्टि के मानवेतर सभी अस्तित्वों के साथ जब वह आत्मीयता या परिवार भावना अनुभव करता है तो उसका '''सृष्टिगत विकास''' होता है। व्यक्तिगत, समष्टीगत और सृष्टिगत ऐसे तीनों प्रकार के विकास के समुच्चय को ही ‘समग्र विकास’ कहते हैं। ऐसे समग्र विकसित मनुष्य को संसार में उपस्थित सभी अस्तित्वों के साथ आत्मीयता की अनुभूति होती है। ये सभी अस्तित्व परमात्मा के ही रूप होने से इन के साथ जो एकात्मता अनुभव करता है उसमें और परमात्मा में कोई अंतर नहीं रह जाता। यही मोक्ष की अवस्था है। यही मुक्ति है। यही पूर्णत्व की प्राप्ति है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय सोच के अनुसार व्यक्तित्व विकास के चार आयाम है । वे है व्यक्तिगत् विकास, समष्टिगत् विकास, सृष्टिगत् विकास और परमेष्ठीगत् विकास। पहले तीन के विकास से चौथे का विकास अपने आप हो जाता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्यक्तिगत् विकास''' से अर्थ है, शरीर, प्राण, मन, बुध्दि, चित्त इन पाँच घटकों का विकास । ये पाँच घटक हर व्यक्ति के भिन्न होते है । इन्ही पाँच बातों को पंचकोश विकास भी कहा जाता है । शरीर अर्थात् अन्नमय कोश, प्राण अर्थात् प्राणमय कोष, मन अर्थात् मनोमय कोश, बुद्धि याने विज्ञानमय कोश और चित्त अर्थात् आनंदमय कोश का विकास । शरीर एक यंत्र जैसा है । पंच कर्मेन्द्रिय और पंच ज्ञानेन्द्रिय तथा शरीर मे काम करनेवाली चेतातंत्र, रक्ताभिसरण, पाचनतंत्र आदि विभिन्न प्रणालियाँ प्राण शक्ति के कारण चलती है । प्राण इस शरीर रूपी यंत्र को चलानेवाला इंधन है । प्राण शरीर और इंन्द्रियों से अधिक सूक्ष्म है । इसलिये अधिक बलवान है । तीसरा घटक है  मन । मनोमय का संबंध मन से होता है । मन के विकास का अर्थ है चंचलता मुक्त, स्थिर, एकाग्र, अलिप्त, निर्द्वंद्व, और विकार रहित मन । इंन्द्रियोंपर नियंत्रण करने वाले और बुध्दि के नियंत्रण में रहने वाला मन । ग्रहणशक्ति, धारणाशक्ति, स्मृति, निरीक्षण, परीक्षण, तर्क, अन्मान, विश्लेषण, संश्लेषण  और कल्पनाशक्ति का विकास ही बुध्दि का विकास होता है ।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनंदमय कोश के विकास का अर्थ है, चित्त का विकास । अपने शरीर में स्थित उस परमात्वतत्व को जैसा वह है वैसा ही जानने की क्षमता, सहजता, स्वतंत्रता, सौंदर्यबोध यह चित्त के विकास के लक्षण है ।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्य और समाज  - इन का परस्पर संबंध अन्योन्याश्रित है । समाज के बिना मनुष्य जी नही सकता । इस समाज के संबंध में आत्मीयता की, एकात्मता की भावना का विकास ही समष्टिगत् विकास कहलाता है । समाज के हर घटक के दुख में दुख की अनुभूति होना इसका लक्षण है । इसी तरह मनुष्य और समाज सृष्टि के बिना जीवित नही रह सकते। इस चराचर सृष्टि के साथ आत्मीयता की, एकात्मता की भावना का विकास ही सृष्टिगत् विकास है । उपर्युक्त तीनों प्रकार से विकास होने से परमेष्ठिगत् विकास अपने आप हो जाता है ।   &amp;lt;blockquote&amp;gt;अहं ब्रह्मास्मि&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;तत् त्वं असि &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;सर्वं खल्विदं ब्रह्मं&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् मैं ही वह परमात्मतत्व हूं, तुम भी वह परमात्वत्व ही हो और चराचर में वह परमात्मतत्व ही व्याप्त है इस की अनुभूति होना ही परमेष्ठिगत् विकास है । यही पूर्णत्व है । यही मोक्ष है । यही नर का नारायण बनाना है। यही अहंकार विजय है। यही मानव जीवन का लक्ष्य है ।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मानव जीवन का लक्ष्य ==&lt;br /&gt;
अभारतीय और भारतीय विचार प्रवाह में सबसे पहला अंतर है मानव जीवन के लक्ष्य का । विश्व में यहूदी, ईसाई, मुसलमान समाजों की जनसंख्या विशाल और लक्षणीय है। इन सभी का लक्ष्य हेवन या जन्नत माना गया है। हेवन या जन्नत यह संकल्पनाएं मोक्ष से एकदम भिन्न हैं। मोक्ष का अर्थ है परमात्मपद की प्राप्ति । अर्थात् सुख और दुख की सीमा से परे चले जाना । सर्वं खल्विदं ब्रह्मं अर्थात् चराचर में एकत्व की या एक ही आत्मतत्व की अनूभूति करना । कई लोग ईसाई सॅल्व्हेशन या इस्लामी कयामत (आखिरत) की तुलना मोक्ष से करते हैं। किन्तु यह गलत है। यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं।                                                                                            &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सॅल्व्हेशन या आखिरत यह तो हेवन और जन्नत तथा हेल और दोजख की संकल्पनाओं से जुडी संकल्पनाएं ही हैं। भारतीय विचार में स्वर्ग और नरक की संकल्पनाएं भी हेवन और जन्नत और हेल और दोजख की संकल्पनाओं से भिन्न है। ईसाईयत की सॅल्व्हेशन और इस्लाम की कयामत (आखिरत) की कल्पना और मोक्ष में कोई साम्य नहीं है। अभारतीय (ईसाई और इस्लाम की) मान्यता है कि मनुष्य मरने के बाद अपनी दफनभूमि में पडा रहता है। डे ऑफ सॅल्व्हेशन या कयामत के दिन को गॉड या अल्लाह अपने प्रेषित के माध्यम से सब को उठाते हैं। प्रेषित के कहे अनुसार जिसने ईसाईयत पर श्रध्दा रखी थी उसे गॉड हमेशा के लिये स्वर्ग भेज देता है। और जिन्होंने गॉड पर श्रध्दा नहीं रखी थी उन सबको हेल में भेज देता है। इसी प्रकार से प्रेषित के कहने से अल्लाहताला प्रत्येक मनुष्य की रूह का क्या होगा यह निर्णय करता है। जिसने अल्लाहताला में निष्ठा रखी थी उन सब को हमेशा के लिये जन्नत में भेज देता है। और जिसने अल्लताला पर निष्ठा नहीं रखी थी उन सब को हमेशा के लिये दोजख में भेज देता है। वास्तव में इन दोनों मजहबों की प्रक्रिया में गॉड या अल्लाहताला तो बस नाममात्र हैं। सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी तो उनके प्रेषित ही हैं गॉड और अल्लाहताला का काम तो बस अपने प्रेषित द्वारा बताये अनुसार लोगों को हेवन और हेल या जन्नत और दोजख में भेजने का ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय स्वर्ग और नरक की कल्पना भी इन से पूर्णत: भिन्न है। स्वर्ग या नरक की प्राप्ति में परमात्मा सीधा न्याय करता है। उसे किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं होती। वह सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी होने से वह प्रत्येक द्वारा किये सत्कर्म और दुष्कर्म जानता है। प्रत्येक मनुष्य द्वारा किये इन सत्कर्मों के अनुसार ही परमात्मा उस के लिये स्वर्ग सुख या नरक यातनाओं की व्यवस्था करता है। जैसे ही स्वर्ग सुख या नरक यातनाओं के भोग पूरे हो जाते हैं, मनुष्य स्वर्ग सुख से वंचित और नरक यातनाओं से मुक्त हो जाता है। यह भोग हर मनुष्य अपने वर्तमान जन्म में और आगामी जन्मों में प्राप्त करता है। भारतीय सोच में तो सीधा सीधा गणित है। जितना सत्कर्म उतना सुख जितना दुष्कर्म उतना दु:ख। अभारतीय समाजों में सत्कर्म और दुष्कर्म की कोई संकल्पना ही नहीं है। हेवन या जन्नत का अर्थ है सदैव सुखी रहने की स्थिति और हेल और दोजख का अर्थ है हमेशा दुखी रहने की स्थिति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभारतीय समाज तो मोक्ष की कल्पना तक नहीं कर सके हैं। भारतीय मोक्ष की कल्पना भारतीय सोच को आध्यात्मिक बना देती है। '''देहभाव से मुक्ति ही मोक्ष है'''। जीवात्मा जब देह-भाव से ग्रस्त होता है तब उसमें करता भाव, भोक्ता भाव और ज्ञाताभाव आ जाते हैं। इन के अभाव में जीवात्मा अपने देहभाव से मुक्त हो जाता है। फिर उसमें और परमात्मा में अंतर नहीं रहा जाता। अधि का अर्थ है श्रेष्ठ या उत्तम। श्रीमदभगवदगीता १५ वें अध्याय के १७ में परमात्मा को उत्तम पुरूष कहा है। अर्थात् अधि-आत्मा ही परमात्मा होता है। देहभाव से मुक्त होकर परमात्मा से तादात्म्य की दिशा में बढ़ना ही जीवन है। ऐसी भारतीय मान्यता के कारण सम्पूर्ण जीवन और जीवन का हर पहलू अध्यात्म से ओतप्रोत होता है।  भारतीय समाज ने अपने सम्मुख व्यक्तिगत, सामाजिक और सृष्टिगत ऐसे तीन प्रकार के एक दूसरे से सुसंगत ऐसे लक्ष्य रखे हैं। लक्ष्य का निर्धारण करते समय वे ‘स्वभावज’ हों इसका ध्यान रखा गया है। व्यक्तिगत स्तर का लक्ष्य और सामाजिक स्तर का लक्ष्य परस्पर पूरक और पोषक होना आवश्यक है। इसी तरह सृष्टिगत लक्ष्य, व्यक्तिगत और समष्टिगत लक्ष्य ये तीनों परस्पर पूरक पोषक होना आवश्यक हैं।  व्यक्तिगत स्तर का लक्ष्य मोक्ष या त्रिवर्ग के माध्यम से अभ्युदय है। यह सामाजिक लक्ष्य स्वतंत्रता को बाधक नहीं होना चाहिये। इसीलिये हमारे पूर्वजों ने कहा है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;आत्मनो मोक्षार्थं जगत् हिताय च।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;मुझे मोक्ष मिले लेकिन जगत् का हित करते हुए मिले। और त्रिवर्ग में तो मूलत: धर्म का ही अधिष्ठान है और धर्माचरण सृष्टिगत लक्ष्य है। तीनों स्तरों के लक्ष्यों का नियामक धर्म ही है। इसलिये तीनों स्तरों के लक्ष्य परस्पर पूरक और पोषक बनें रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मानव के व्यक्तित्व से संबंधित महत्वपूर्ण बातें ==&lt;br /&gt;
# मानव यह परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना है। सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। परमात्मा की सभी शक्तियाँ मनुष्य के पास विद्यमान होतीं हैं। केवल मात्रा का अंतर होता है। मानव की शक्तियाँ मर्यादित हैं। परमात्मा की अमर्याद हैं। किंतु भारतीय मान्यता और इतिहास के अनुसार नर करनी करे तो नारायण तक विकास कर सकता है। &lt;br /&gt;
# मानव जीवन का नियमन उसके कर्म ही करते हैं। भारतीय मान्यता है कि जीवों की ८४ लक्ष योनियाँ हैं। इनमें केवल मानव योनि ही कर्मयोनि है। अन्य सभी प्राणियों की योनियाँ भोग योनियाँ हैं। प्राणि उन्हें कहते हैं जो प्राण के यानि आहार, निद्रा, भय और मैथुन इन प्राणिक आवेगों के स्तरपर जीते हैं। इन अर्थों में मानव एक प्राणि भी है।  जन्म से तो मानव भी अन्य प्राणियों जैसा प्राण के स्तर पर जीनेवाला जीव ही होता है। संस्कार और शिक्षा से वह मन के स्तर पर जीने लगता है। &lt;br /&gt;
'''मन के स्तर पर जीनेवाले को मानव कहते हैं'''। बुध्दि के स्तर पर जीनेवाले को महामानव और चित्त या आत्मिक स्तर पर जीनेवाले को और भी अधिक श्रेष्ठ मानव या नरोत्तम कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानवेतर योनियों के प्राणियों को अपने स्वाभाविक प्राणिक आवेगों के अनुसार चलने मात्र की बुध्दि और मन मिला है। इसलिये सामान्यत: ये प्राणि स्वतंत्र कर्म नहीं कर सकते। केवल मानव को विशेष मन, बुध्दि, स्मृति आदि मिले हैं इस कारण वह अन्य प्राणियों से भिन्न, प्राणिक आवेगों से भिन्न और प्राणिक आवेगों के विपरीत भी कर्म करने की स्वतंत्रता ले सकता है। मानव व्यवहार की इस स्वतंत्रता का नियमन उस के कर्मों से होता है। यह नियमन कर्मसिध्दांत के आधार पर होता है। कर्मसिध्दांत की अधिक जानकारी के लिये ‘[[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|जीवनशैली के सूत्र]]‘ अध्याय में देखें। ऋणसिद्धांत का आधार भी कर्मसिद्धांत ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३. सृष्टि में मानव निर्माण तो सब से अंत में हुआ था। उससे पहले सृष्टि थी। सृष्टि के विलय की प्रक्रिया में भी मानव जाति नष्ट होने के उपरांत भी सृष्टि होगी।  सृष्टि को मानव की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मानव सृष्टि के बगैर जी नहीं सकता। इसलिये मानव के लिये यह अनिवार्य है कि वह सृष्टि के साथ अपने को समायोजित करे। अपने सभी व्यवहार प्रकृति सुसंगत रखे। प्रकृति का संतुलन नहीं बिगाडे। सृष्टि चक्र को अबाधित रखे। वैसे भी सृष्टि या प्रकृति के साथ जब मानव खिलवाड़ करता है, एक सीमा तक तो प्रकृति उसे सहन कर लेती है। इस सीमा को लाँघने के बाद प्रकृति भी उसकी प्रतिक्रया देती है। इस प्रतिक्रया से मानव का ही नुकसान होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४.  श्रेष्ठता के साथ दायित्व आता है। दायित्व बोध आना चाहिये। मानव को जो श्रेष्ठता परमात्मा से मिली है उस के कारण मानव का यह दायित्व बनता है कि वह विवेक से काम ले। प्रकृति नहीं बिगाडे। जीवश्रृंखला को नहीं तोडे। प्रकृति के साथ खिलवाड नहीं करे। दुर्बलों की सहायता करे। मानव को मिली श्रेष्ठ स्मृति के कारण ‘कृतज्ञता’, उपकार से उतराई होना यह मानव का अनिवार्य लक्षण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५.  भारतीय दृष्टि से मानव जीवन का लक्ष्य मोक्षप्राप्ति या मुक्ति है। व्यक्तिगत से ऊपर परमेष्ठीगत विकास है। इसी तरह मानव का सामाजिक स्तर पर लक्ष्य ‘स्वतंत्रता’ है। और सृष्टि के स्तरपर ‘धर्माचरण’ है। सृष्टि के नियमों के अनुकूल व्यवहार भी धर्म ही होता है। स्वतंत्रता का अर्थ स्वैराचार नहीं होता। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारियाँ आतीं हैं। दायित्व आते हैं। धर्म के विषय में अधिक जानकारी के लिये अध्याय ३ ‘[[Dharma: Bhartiya Jeevan Drishti (धर्म:भारतीय जीवन दृष्टि)|धर्म]]’ में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६.  मानव सदैव सुख की खोज करता रहता है। मानव के सारे प्रयास मूलत: सुखप्राप्ति के लिये होते हैं। सुख का अर्थ अनुकूल संवेदना है। सुख प्राप्ति के लिये निम्न बातें अनिवार्य होती हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- सुसाध्य आजीविका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- स्वतंत्रता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- शांति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- पौरुष&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन चारों बातों का समष्टीगत होना व्यक्ति के सुख के लिये आवश्यक है। जितने प्रमाण में ये समष्टिगत होंगी उतने प्रमाण में ही व्यक्ति को भी सुख मिल सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुख के भी भिन्न भिन्न प्रकार होते हैं। '''दैवी, मानवी और पाशवी'''। दैवी सुख आत्मिक सुख को कहते हैं। इस में ममता, सहानुभूति, आत्मीयता, परोपकार, प्रेम आदि के कारण मिले सुखों का समावेश होता है। मानवी सुख मन का सुख होता है। यह मन को प्रसन्न करनेवाला सुख होता है। पाशवी सुख में शरीर और इंद्रियों का सुख आता है। यह स्तर प्राणिक आवेगों में अनुकूल अनुभवों का स्तर है। सुख के भिन्न भिन्न स्तर भी होते हैं। इंद्रिय सुख का स्तर सबसे नीचे होता है। मन का सुख उससे ऊपर, बुध्दि का सुख उससे ऊपर, चित्त का सुख या आनंद उससे ऊपर और परमानंद का या परम कल्याण का सुख (आत्मीय) सब से ऊपर होता है। इस परम सुख का नाम ही मोक्ष है। आत्मिक सुख की प्राप्ति के लिये अन्य तीनों के न्यूनतम सुख की प्राप्ति की आवश्यकता होती है। यह मन-बुध्दि में स्थापित करने के लिये ही धर्मशिक्षा की व्यवस्था की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७.  मानवेतर प्राणियों में नवजात बच्चे बहुत शीघ्र स्वावलंबी बन जाते हैं। मानव में व्यक्तित्व विकास यह लंबी चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इसलिये मानव परिवार की रचना और पशूओं के परिवार की रचना में और प्रवर्तन में अंतर होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८.  मानव का व्यक्तित्व पाँच पहलुओं से बना है। तैत्तिरीय उपनिषद् में इन्हें पञ्चविध पुरूष कहा है। आदि जगदगुरु शंकराचार्य इन पहलुओं को पंचकोश कहते हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय - ऐसे उन पञ्चविध पुरूषों के या पाँच कोशों के नाम हैं। सामान्य लोगों की भाषा में इन्हें शरीर (इंद्रियाँ), प्राण, मन, बुध्दि और चित्त कहा जा सकता है। जन्म के समय इन सभी का स्वरूप अविकसित होता है। ये सब बातें वैसे तो हर प्राणि के पास भी होतीं ही हैं। किंतु मानवेतर प्राणियों में मन, बुध्दि और चित्त या तो अक्रिय होते हैं या अत्यंत निम्न स्तर के होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हर मानव के पंचकोशीय स्वरूप में से स्वयं परमात्मा अभिव्यक्त होता है इसीलिये मानव को व्यक्ति कहते हैं। इन कोशों के साथ तादात्म्य हो जाने से उस व्यक्ति में उपस्थित आत्म तत्व अपने को व्यक्ति मानने लग जाता है। जब मानव इन पंचकोशों के परे जाता है तब ही उस का साक्षात्कार परमात्मा से होता है। हर मानव का व्यक्तित्व अन्य मानवों से भिन्न होता है। इसलिये उसके विकास का रास्ता भी अन्यों से भिन्न होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९.  मानव व्यक्तित्व के पहलुओं का विकास भी एकसाथ नहीं होता। गर्भधारणा के बाद सर्वप्रथम चित्त सक्रिय होता है। इस काल में गर्भ अपनी माँ से भी कहीं अधिक संवेदनशील होता है। अब तक इंद्रियों का विकास नहीं होने से शब्द, स्पर्श, रूप रस और गंध के सूक्ष्म से सूक्ष्म संस्कार वह ग्रहण कर लेता है। जब इंद्रियों का निर्माण शुरू होता है तब फिर संस्कार क्षमता उस इंद्रिय की क्षमता जितनी कम हो जाती है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिशू अवस्था में बालक के इंद्रियों के विकास का काल होता है। पूर्वबाल्यावस्था में मन का या विचार शक्ति का, उत्तर बाल्यावस्था और पूर्व किशोरावस्था में बुध्दि, तर्क आदि का और उत्तर किशोरवस्था में तथा यौवन में अहंकार का यानी 'मै' का यानी कर्ता भाव (मैं करता हूँ), ज्ञाता भाव (मैं जानता हूँ) और भोक्ता भाव (मैं उपभोग करता हूँ) का विकास होता है। इसलिये व्यक्तित्व विकास के लिये संस्कारों का और शिक्षा का स्वरूप आयु की अवस्था के अनुसार बदलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०. हर मानव जन्म लेते समय अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार विकास की कुछ संभाव्य सीमाएँ लेकर जन्म लेता है। अच्छा संगोपन मिलने से वह पूरी संभावनाओं तक विकास कर सकता है। कुछ विशेष इच्छाशक्ति रखने वाले बच्चे अपनी संभावनाओं से भी अधिक विकास कर लेते हैं। लेकिन ऐसे बच्चे अल्प संख्या में ही होते हैं। अपवाद स्वरूप ही होते हैं। अपवाद स्वरूप बच्चों के विकास के लिये सामान्य बच्चों के नियम और पद्धतियाँ पर्याप्त नहीं होतीं। सामान्य बच्चों के साथ भी विशेष प्रतिभा रखनेवाले बच्चों जैसा व्यवहार करने से सामान्य बच्चों की हानि होती है। समाज के सभी लोग प्रतिभावान या जिन्हें श्रीमद्भगवद्गीता ‘श्रेष्ठ’ कहती है या जिन्हें ‘महाजनो येन गत: स: पंथ:’ में ‘महाजन’ कहा गया है ऐसे नहीं होते हैं। इनका समाज में प्रमाण ५-१० प्रतिशत से अधिक नहीं होता है।  इसीलिये भारतीय समाज के पतन के कालखण्ड छोड दें तो सामान्यत: भारतीय न्याय व्यवस्था में एक ही प्रकार के अपराध के लिये ब्राह्मण को क्षत्रिय से अधिक, क्षत्रिय को वैश्य से अधिक और वैश्य को शूद्र से अधिक दण्ड का विधान था। इस विषय में चीनी प्रवासी द्वारा लिखी विक्रमादित्य की कथा ध्यान देने योग्य है। कुछ स्मृतियों में ब्राह्मण को अवध्य कहा गया है। अवध्यता से तात्पर्य है शारीरिक अवध्यता। ब्राह्मण का अपराधी सिध्द होना उसके सम्मान की समाप्ति होती है। और  ब्राह्मण का सम्मान छिन जाना मृत्यू से अधिक बडा दंड माना जाता था। ब्राह्मणों में क्षत्रियों में और वैश्यों में भी महाजन होते हैं। इनका प्रमाण ५-१० % से कम ही होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११. आवश्यकता और इच्छा एक नहीं हैं। आवश्यकताएँ शरीर और प्राण के लिये होती हैं। इसलिये वे मर्यादित होतीं हैं। इच्छाएँ मन करता है। मन की शक्ति असीम होती है। इसीलिये इच्छाएँ अमर्याद होतीं हैं। इच्छाओं की पूर्ति से मन तृप्त नहीं होता। वह और इच्छा करने लग जाता है। इसी का वर्णन किया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;न जातु काम: कामानाम् उपभोगेन शाम्यम् ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;हविषा कृष्णवर्त्वेम् भूयं एवाभिवर्धते ॥ &amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रत्येक मानव को उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार और सामर्थ्य होती है। लेकिन साथ ही में इच्छाओं को नियंत्रण में रखने का दायित्व भी होता है। इसलिए मन के संयम की शिक्षा, शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू है। स्वाद संयम, वाणी संयम ऐसे सभी इन्द्रियों की तन्मात्राओं याने स्पर्श, रूप, रस, गंध और शब्द इन के विषय में संयम रखना चाहिए । सामान्यत: बुद्धि, जब तक कि इन्द्रिय नियंत्रित मन उसे प्रभावित नहीं करता, ठीक ही काम करती है। इसलिए हम ऐसा भी कह सकते हैं कि इन्द्रियों को मन के नियंत्रण में रखने की और मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखने की शिक्षा भी शिक्षा का आवश्यक पहलू है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२. मानव अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति में उपलब्ध पदार्थों से या तो सीधे या समाज के अन्य सदस्यों के माध्यम से करता है। इसलिये यह मानव के ही हित में है कि वह प्रकृति के साथ कोई खिलवाड नहीं करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३. श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार चारों वर्ण परमात्मा द्वारा निर्मित हैं । इन में अंतर गुणों का और कर्मों का है। गुण का अर्थ है सत्व, रज और तम गुण। वैसे तो प्रत्येक मनुष्य में तीनों गुण कम अधिक मात्रा में होते ही हैं,  लेकिन जिस वर्ण की प्रधानता होगी उसी वर्ण का वह व्यक्ति माना जाता है। वर्णश: गुणों का संबंध निम्न है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;ब्राह्मण वर्ण	- सत्व प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर रज या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;क्षत्रिय वर्ण	- रज प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;वैश्य वर्ण	- रज प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;शूद्र वर्ण		- तम प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या रज&amp;lt;/blockquote&amp;gt;समाज सुखी बनें इसलिये विप्र वर्ण स्वतंत्रता के लिये, क्षत्रिय वर्ण सुरक्षा के लिये, वैश्य वर्ण सुसाध्य आजीविका के लिये और शूद्र वर्ण शांति के लिये जिम्मेदार है। ब्राह्मण वर्ण की जिम्मेदारी स्वाभाविक स्वतंत्रता की प्रस्थापना, क्षत्रिय वर्ण की जिम्मेदारी शासनिक स्वतंत्रता की प्रस्थापना, वैश्य वर्ण की जिम्मेदारी आर्थिक स्वतंत्रता की प्रस्थापना की है। देशिक शास्त्र इन स्वतंत्रताओं की व्याख्या निम्न रूप में करता है:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.१ स्वाभाविक स्वतंत्रता : जो काम किसी के प्राकृतिक हित के प्रतिकूल नहीं हो उस काम को करने में किसी का और किसी भी प्रकारका हस्तक्षेप नहीं होने को स्वाभाविक स्वतंत्रता कहते हैं। शासनिक और आर्थिक स्वतंत्रता स्वाभाविक स्वतंत्रता में साविष्ट हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.२ शासनिक स्वतंत्रता : शासक के अथवा प्रजा के प्राकृतिक हित में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होकर सदा प्रजा के हित के अनुकूल होने को ही शासनिक स्वतंत्रता कहते हैं। आथिक स्वतंत्रता भी इस में समाविष्ट है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.३ आर्थिक स्वतंत्रता : अर्थ के अभाव या प्रभाव के कारण मनुष्य के प्राकृतिक हित में कोई बाधा निर्माण नहीं होने की स्थिति को आर्थिक स्वतंत्रता कहते हैं। उपर्युक्त व्याख्याओं से यह समझ में आएगा कि स्वाभाविक स्वतंत्रता में अन्य दोनों स्वतंत्रताओं का समावेश हो जाता है। इसी प्रकार से शासनिक स्वतंत्रता में आर्थिक स्वतंत्रता का समावेष हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसीलिये ब्राह्मण वर्ण को सर्वोच्च जिम्मेदारी के अनुसार सर्वोच्च प्रतिष्ठा और क्षत्रिय को दूसरे क्रमांक की प्रातिष्ठा समाज में प्राप्त होनी चाहिये। इन स्वतंत्रताओं की प्राप्ति ही सामाजिक दृष्टि से मानव का लक्ष्य है । ऐसा देशिक शास्त्र का कहना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमद्भगवद्गीता कर्म का महत्व विषद करती है। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने ‘स्वभावज’ कर्म अनिवार्यता से करने चाहिये। स्वभावज का अर्थ है जन्म से ही जैसा स्वभाव है उस के अनुरूप। श्रीमद्भगवद्गीता में शब्दप्रयोग हैं '''ब्रह्मकर्मस्वभावजम्''', '''वैश्यकर्मस्वभावजम्''' आदि। साथ में यह भी कहा है कि अपने वर्ण का काम भले ही अच्छा नहीं लगता हो तब भी वही करना चाहिये। सामान्य मानव को तो इसी तरह व्यवहार करना चाहिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो प्रतिभावान हैं उन्हें शायद सामान्य नियम नहीं लगाये जाते। जैसे गुरू के बिना भवसागर तर नहीं सकते ऐसा कहते हैं। लेकिन जो विशेष प्रतिभावान हैं उन्हें यह बात अनिवार्य नहीं है। वे तो आप ही बिना गुरू के मोक्षगामी हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्णों में परस्पर पूरकता और परस्पर अनुकूलता होती है। इसीलिये वेद कहते हैं कि चारों वर्ण एक शरीर के चार अंगों के समान हैं। जब ज्ञान का विषय होगा, स्वाभाविक स्ववतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तो ब्राह्मण का, जब सुरक्षा का प्रश्न होगा,शासनिक स्वतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तब क्षत्रिय का, जब उदरभरण का, आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तो वैश्य का और जब कला, कारीगरी, परिचर्या, मनोरंजन आदि का विषय होगा तो शूद्र का महत्व होगा।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रेष्ठ और हीन का विवेक समझाने का, अभ्युदय के साथ नि:श्रेयस की प्राप्ति का मार्गदर्शन करने का काम ब्राह्मण का होने से वह समाज का शिक्षक बन जाता है। स्वाभाविक स्वतंत्रता में शासनिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता दोनों का समावेश होता है। पूरे समाज की स्वाभाविक स्वतंत्रता की रक्षा का दायित्व उठाने के कारण शिक्षक सर्वोच्च आदर प्राप्ति का अधिकारी होता है। मोक्ष - इस परम लक्ष्य के कारण शिक्षक या गुरू का सम्मान सबसे अधिक होना उचित ही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे क्रमांक पर शासनिक स्वतंत्रता याने सुरक्षा का विषय आता है। शासनिक स्वतंत्रता की जिम्मेदारी लेने के कारण शासक या क्षत्रिय वर्ग का सम्मान होना भी स्वाभाविक ही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंतु अपने वर्ण के अनुसार व्यवहार नहीं करना और अपने ब्राह्मण या क्षत्रिय होने का दंभ भरना यह समाज के पतन की आश्वस्ति है। ऐसे लोग कठोर दण्ड के अधिकारी हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४. संस्कारों के तीन प्रकार होते हैं। सहज, कृत्रिम और अन्वयागत। सहज में फिर तीन संस्कार होते हैं। योनि संस्कार (मानव योनि के), वर्ण संस्कार और राष्ट्रीयता के संस्कार । कृत्रिम में १६ या कुछ लोगों के अनुसार ४९ संस्कार होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितरों और माता-पिता की ओर से प्राप्त संस्कारों को अन्वयागत संस्कार कहते हैं। अन्वयागत में माता-पिता और पूर्वजों के सहज संस्कार और तीव्र कृत्रिम संस्कार होते हैं। तीव्र कृत्रिम संस्कार दीर्घ अभ्यास के कारण बनीं आदतों के कारण होते हैं। इन संस्कारों में माता की ओर से पाँच पीढ़ियों के मन से संबंधित और पिता की ओर से १४ पीढ़ियों के शरीर से संबंधित संस्कार होते हैं। करीब की पीढ़ी के संस्कार अधिक और दूर की पीढ़ी के संस्कार कम होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१५. हर मानव सुर और असुर प्रवृत्तियों से भरा होता है। इसी प्रकार से समाज में भी सुर और असुर दोनों प्रवृत्तियों के लोग होते हैं। भर्तृहरि के अनुसार अपना कोई हित नहीं होते हुए भी औरों के अहित में आनंद लेने वाले असुर से भी गये गुजरे लोग भी समाज में होते है। इन सभी के लिये सदाचार की शिक्षा की व्यवस्था करना समाज का दायित्व है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जो बात अपने को प्रिय होती है उसे प्रेय कहते हैं। और जो अंतिमत: कल्याणकारी बात होती है उसे श्रेय कहते हैं।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने प्रेय के लिये अन्यों का अहित करनेवाले को असुर कहते हैं। ऐसे मानव को भी श्रेय ही प्रेय लगने लग जाए इसलिये शिक्षा होती है। कुल मिलाकर शिक्षा का स्वरूप धर्मशिक्षा का होता है। पुरूषार्थ चतुष्ट्य की शिक्षा का होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६. मानव अच्छा डॉक्टर बनता है, अच्छा व्यावसायिक आदि बनता है यह समाज के लिये महत्वपूर्ण बात होती है। किंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात हर बालक के लिये यह है कि वह एक अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा देशभक्त और अच्छा मानव बने। इसी तरह हर बालिका अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी देशभक्त और अच्छी मानव बनें यह अधिक महत्वपूर्ण होता है।  इसे सुनिश्चित करने के लिये सब से अधिक अवसर माता को होता है इसलिए सबसे अधिक जिम्मेदारी माता की होती है। दूसरे स्थान पर पिता जिम्मेदार होता है। कहा गया है ‘माता प्रथमो गुरू: पिता द्वितीयो’। इस में माता पिता समान घर के सब ज्येष्ठ लोगों का भी योगदान होता है। तीसरी जिम्मेदारी शिक्षक की होती है। ऐसी मान्यता है कि बालक के विकास में २५ प्रतिशत हिस्सा उसके पूर्वजन्मों के कर्मों का होता है। दूसरा २५ प्रतिशत उसे प्राप्त संस्कार और शिक्षा का होता है। तीसरा २५ प्रतिशत उसे मिले वातावरण, संगत, मित्र आदि का होता है। चौथा २५ प्रतिशत उसके अपने प्रयासों का होता है। इन हिस्सों का महत्वक्रम भी इसी क्रम से होता है। पूर्व कर्मों का प्रभाव सबसे अधिक, उसके उपरांत संस्कार और शिक्षा का आदि।  अन्य एक वर्गीकरण के अनुसार श्रेष्ठ मानव निर्माण के दो मुख्य पहलू हैं। पहला श्रेष्ठ जीवात्मा होना। और दूसरा है उसे अच्छी शिक्षा और संस्कार प्राप्त होना। इस दृष्टि से श्रेष्ठ मानव निर्माण में ५० प्रतिशत हिस्सा तो जन्म देनेवाले माता पिता का है। संस्कारों का काम भी घर में ही मुख्यत: चलता है। इसलिए संस्कारों का २५ प्रतिशत हिस्सा कुटुंब का होता है। शेष २५ प्रतिशत शिक्षा का जिसमें विद्यालयीन शिक्षा और लोकशिक्षा के माध्यमों का सहभाग होता है। समाज में यदि समस्याएँ हैं और बढ रहीं हैं तो माता, पिता और शिक्षक ये तीन लोग क्रम से इस के जिम्मेदार होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१७. मानव के लिये कुछ बातें जन्मजात और कुछ समाज से प्राप्त होनेवाली होतीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार आने वाली बातें - दस इंद्रिय, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार, श्रेष्ठ जीवात्मा, प्रारब्ध (पूर्व कर्मों का फल) जो जन्म कुंडली में दिखाई देता है, त्रिगुणयुक्त व्यक्तित्व, त्रिदोषयुक्त शरीर, माता पिता आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माता-पिता से जन्म से प्राप्त होने वाली बातें : पितर और उन की विरासत- सामाजिक प्रतिष्ठा, नाम, भौतिक समृध्दि,  शारीरिक स्वास्थ्य, जाति और आनुवांशिकता से आनेवाली बातें जैसे वर्ण, (त्रिदोषात्मक) शारीरिक स्वास्थ्य, व्यावसायिक और अन्य कुशलताएँ, परम्पराएँ आदि परिवार में और समाज में प्राप्त होनेवाली बातें : नाम, प्यार, आत्मीयता, रक्षण, पोषण, संस्कार, शिक्षण, आदतें, आर्थिक और पारिवारिक विरासत और परंपराएँ, सामाजिकता, सामाजिक प्रतिष्ठा, कुलधर्म, कुलाचार, विविध पारिवारिक यानी रक्तसंबंध के रिश्ते, विविध सामाजिक रिश्ते, सदाचार, धर्म आदि की शिक्षा आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८. मानव के जन्म, जीवन और मृत्यू के चक्र में आयू की अवस्था के अनुसार निम्न बातें बदलतीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- प्यार-दुलार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- रक्षण/पोषण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- संस्कार और शिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- क्षमताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- योग्यताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- भावनाएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- आवश्यकताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- इच्छाएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- जिम्मेदारियाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- कर्तव्य/बोध &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- अधिकार/बोध&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन का समायोजन सामाजिक संगठन और व्यवस्थाओं में होना आवश्यक है। इस हेतु से समाज भिन्न भिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं को चलाता है, भिन्न भिन्न संगठन और व्यवस्थाएँ निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९. सामान्यत: गृहस्थ के लिये चारों आश्रमों के लोगों तथा अन्य जीव जगत के योगक्षेम की जिम्मेदारी के अलावा दो और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ होतीं हैं। पहली यह है कि वह धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों के योगक्षेम की व्यवस्था करे। दूसरी है समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सार्थक योगदान दे। धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों की संख्या का समाज की कुल आबादी के साथ संतुलन भी महत्वपूर्ण है। धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों के योगक्षेम की व्यवस्था करने से वह नि:श्रेयस को और भौतिक वस्तुओं के उत्पादन से वह व्यक्तिगत और सामाजिक स्तरपर अभ्युदय को प्राप्त करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०. भारतीय समाज में गृहस्थ के लिये तीन बातें आवश्यक मानीं गईं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहली बात यह है कि वह केवल धर्म की कमाई करे, दूसरे व्यय भी धर्मानुसार ही करे और तीसरे आवश्यकता से अतिरिक्त कमाई यथासंभव अधिक से अधिक दान में दे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१. सुख और सुविधा में अंतर होता है। सुविधा से सुख बढेगा यह आवश्यक नहीं है। जब सुविधा मानव को पंगु बना देती है, उसकी स्वाभाविक क्षमताओं को कुंठित कर देती है या स्वाभाविक क्षमताओं का क्षरण करती है तब वह दुख का कारण बनती है। इसलिये कितना सुविधाभोगी बनना यह विवेक महत्वपूर्ण है। सुविधाओं के विकास में दो बातें ध्यान में रखना चाहिये। पहली यह कि सुविधा अक्षम लोगों की मदद के लिये होती है। दूसरी बात यह है कि उससे मानव की प्राकृतिक क्षमताओं में और सामाजिकता यानी पारिवारिक भावना और व्यवहार में वृध्दि हो। कम से कम हानि तो नहीं हो।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२२. कोई भी वस्तु खरीदते समय उस वस्तु की पर्यावरण सुसंगतता, सामाजिकता से सुसंगतता, उपयोगिता, सौंदर्यबोध और सबसे अंत में उसकी कीमत को महत्व देना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२३. हर गृहस्थ को लोकहितकारी उत्पादक व्यवसाय करना चाहिये। इससे एक ओर तो वह अपनी सामजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करता है तो दूसरी ओर वह (अधम गति से विपरीत) श्रेष्ठ गति को प्राप्त कर लेता है। २४. मनुष्य के शरीर की रचना शाकाहारी प्राणि के अनुसार है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२५. हर मनुष्य शरीर, प्राण, मन, बुध्दि और चित्त का स्वामी होता है। ये पाँचों बातें हर मनुष्य की भिन्न होतीं हैं। परमात्व तत्व भी इन पाँच घटकों के माध्यम से ही अभि‘व्यक्त’ होता है। इसीलिये मनुष्य को व्यक्ति कहते हैं। और व्यक्ति के स्वभाव, क्षमताएँ, प्रभाव आदि को व्यक्तित्व कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व से संबंधित कुछ बातें निम्न हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राणिक आवेग : आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये चार प्राणिक आवेग हैं। ये मनुष्य और पशू दोनों में समान हैं। इसलिये मनुष्य भी प्राणि होता ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक व्यक्ति को सुख, दु:ख, ममता, प्रेम, आत्मीयता, तथा द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर जैसे षड्विकार यानी मन की भावनाएँ होतीं हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवश्यकताएँ और इच्छाएँ : प्राणिक आवेगों की पूर्ति को आवश्यकता और मन की चाहतों को इच्छा कहते हैं। आवश्यकताएँ मर्यादित और इच्छाएँ अमर्याद होतीं हैं। -  कर्म योनि : प्राणिक आवेगों की पूर्ति के लिये और इच्छाओं की पूर्ति के लिये जो बातें की जातीं हैं उन्हें कर्म कहते हैं। उसे प्राप्त मन और बुध्दि की श्रेष्ठता के कारण मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र होता है। यह कर्म ही मनुष्य के जीवन का नियमन करते हैं। इस नियमन को कर्म सिध्दांत के माध्यम से समझा जा सकता है। कर्मसिध्दांत की जानकारी के लिये कृपया ‘ [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|भारतीय जीवन दृष्टि और जीवन शैली]] ‘ अध्याय में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२६. समाज में व्यक्ति के दो प्रकार हैं। स्त्री और पुरूष। परमात्मा ने इन्हें जैसे ये आज हैं इसी स्वरूप में निर्माण किया था। समाज धारणा के लिये यानि समाज बना रहने के लिये के लिये स्त्री और पुरूष दोनों की आवश्यकता होती है। एक की अनुपस्थिति में समाज जी नहीं सकता। स्त्री और पुरूष एक दूसरे के पूरक होते हैं। बच्चे को जन्म देने का काम दोनों मिलकर करते हैं। अन्य एक भी ऐसा काम नहीं है जो स्त्री नहीं कर सकती या पुरूष नहीं कर सकता। किंतु इनको एक दूसरे से कई बातों में भिन्न बनाने में परमात्मा का कुछ प्रयोजन अवश्य है। इस प्रयोजन के अनुसार इनमें कार्य विभाजन होने से समाज ठीक चलता है। सुखी, समृध्द और चिरंजीवी बनता है। स्त्री-पुरूष संबंधों के विषय में थोड़ा अधिक गहराई से अब हम विचार करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== स्त्री और पुरूष संबंधी भारतीय सोच ==&lt;br /&gt;
भारतीय सोच के अनुसार स्त्री और पुरूष दोनों एकसाथ ही निर्माण हुए थे। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 3 के श्लोक 10 में कहा है &amp;lt;blockquote&amp;gt;सहयज्ञा: प्रजा सृष्ट:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रजा अर्थात् स्त्री और पुरूष साथ ही पैदा हुए थे। स्त्री और पुरूष की भिन्नता का बुध्दियुक्त सोच के आधार पर भारतीय मनीषियों ने मूल्यांकन किया है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा ने सृष्टि को एक संतुलन के साथ बनाया है। स्त्री और पुरूष दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे होते है । दोनों की पूर्ण बनने की चाह ही स्त्री और पुरूष में परस्पर आकर्षण निर्माण करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसार में प्रत्येक वस्तु के निर्माण में परमात्मा का कोई प्रयोजन होता है। स्त्री की और पुरूष की शारीरिक और मानसिक भिन्नता का भी कुछ प्रयोजन है। दोनों की भूमिकाएं भिन्न किंतु परस्पर पूरक होंगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा से ही बना होने के कारण, परमात्मपद ( पूर्णत्व ) प्राप्ति की दिशा में आगे बढना ही प्रत्येक मानव के जीवन का लक्ष्य है। लेकिन शारीरिक रचना के कारण, सुरक्षा की आवश्यकता के कारण स्त्री के पूर्णत्व की दिशा में विकास का मार्ग अधिक कठिन होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारीवारिक मामलों में स्त्री को निर्णय का अधिकार और सामाजिक मामलों में जहाँ परिवार से बाहर के वातावरण का संबंध होता है, स्त्री के लिये सुरक्षा की समस्या निर्माण हो सकती है, उस में पुरूष को निर्णय का अधिकार भारतीय परिवार और समाज व्यवस्था की विशेषता रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंदू शास्त्र बताते है: &amp;lt;blockquote&amp;gt;'आत्मवत् सर्वभूतेषू'  या 'आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् '&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - जो बात अपने लिये अयोग्य या प्रतिकूल समझते हो उसे औरों के लिये भी अयोग्य और प्रतिकूल समझो और उसे मत करो। इसी का विस्तार है ' मातृवत् परदारेषू '। अपनी बहन, बेटी, माता और पत्नि के साथ अन्य पुरूष अभद्र व्यवहार न करें, सम्मान का व्यवहार करें ऐसी यदि आप औरों से अपेक्षा करते है तो आप भी किसी अन्य की बहन, बेटी, पत्नि या माता के साथ अभद्र व्यवहार न करें, उन्हे सम्मान दें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। अपनी पत्नि को छोडकर अन्य सभी स्त्रियों के प्रति माता की भावना को सुसंस्कार कहा गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। यह भी कहा गया कि &amp;lt;blockquote&amp;gt;यत्र नार्यस्तु पुज्यंते रमंते तर देवता: &amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ : जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता रहते है अर्थात् वह समाज देवता स्वरूप बन जाता है। सुख समृध्दि से भर जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय स्त्री विषयक दृष्टि - तत्व और व्यवहार ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त स्त्री विषयक भारतीय दृष्टि से सब परिचित है। फिर प्रश्न उठता है कि वर्तमान में भारतीय समाज में स्त्री की दुरवस्था क्यों है? इस के लिये थोडा इतिहास देखना पडेगा। दो बडे कारण समझ में आते है। एक तो बौद्ध काल में महात्मा गौतम बुध्द के निर्वाण के पश्चात् कई बौद्ध विहार अनैतिकता के अड्डे बन गये थे। बौद्ध मत को राजाश्रय मिला हुआ था। यौवन में स्त्री का पुरूषों के प्रति और पुरूष का स्त्री के प्रति यौन आकर्षण अत्यंत स्वाभाविक बात है। फिर यौवन में विवेक और अनुभव भी कुछ कम ही होते है। ऐसी युवतियाँ इस स्वाभाविक आकर्षण के कारण विहारों में शरण लेतीं थीं। उन्हें वापस लाना असंभव हो जाता था। इसलिये सावधानी के तौर पर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद नहीं हुआ तो भी बहुत कम हो गया। दूसरे मुस्लिम आक्रांताओं ने जो अत्याचार स्त्रियों पर किये, स्त्रियों को जबरन उठाकर अरब देशों में बेचा इस से आतंकित होकर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद हो गया। स्त्री शिक्षा के मामले में और इसलिये अन्य सभी मामलों में भी बहुत पिछड गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वाधीनता के पश्चात यह अपेक्षा थी कि शिक्षा राष्ट्रीय बनेगी, भारतीय बनेगी, सेमेटिक मजहबों के प्रभाव से बाहर निकलेगी । दो तीन पीढ़ियों में स्त्री को योग्य स्थान दिलाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान में भारतीय स्त्री, जिस में अभी कुछ भारतीयता शेष है, वह बहुत संभ्रम में है। उस के विरासत में मिले संस्कार उस की शिक्षा से मेल नहीं खाते। वर्तमान शिक्षा की झंझा उसे पश्चिमी रहन सहन की ओर घसीटती रहती है। जो पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित है ऐसी स्त्रियाँ भी अपेक्षा तो यह करतीं है कि हर अन्य पुरूष उन की ओर ध्यान अवश्य दे किन्तु उनकी तय की हुई मर्यादा को नहीं लांघे। उन से आदर से व्यवहार करे। किन्तु इस के लिये वह अपने बच्चों पर ऐसे संस्कार करने के लिये न तो तैयार है और न ही सक्षम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समाज में कामों का वर्गीकरण ==&lt;br /&gt;
पारिवारिक और सामाजिक काम निम्न है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारिवारिक काम वे है जो केवल परिवार में किये जाते है, और सामाजिक काम वे है जो समाज ( परिवार भी समाज का ही हिस्सा होता है ) में किये जाते है। कुछ प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१.  प्रजा का निर्माण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२.  संस्कार और शिक्षा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३.  सामाजिक व्यवस्थाओं को चलाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४.  जीने के लिये या मनोरंजन के लिये आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन में प्रजा का निर्माण यह तो शुध्द पारिवारिक काम है। इस से आगे पाँच वर्ष तक की शिक्षा का अर्थात् इंद्रिय, मन और संस्कारों की शिक्षा का काम भी मोटे तौर पर परिवार में ही होता है। इस के बाद जब बालक विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तब वह जिम्मेदारी समाज की होती है।  जीवन की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भिन्न भिन्न प्रकार के उद्योग चलाये जाते है। यह सामाजिक प्रयासों का ही क्षेत्र होता है। समाज ठीक चले इस दृष्टि से विभिन्न व्यवस्थाओं का निर्माण भी किया जाता है। जैसे सडक बनाना, कुए बनाना, धर्मशालाएं बनाना, मंदिर बनाना, विद्यालय बनाना आदि। यह व्यवस्थाएं अच्छीं चलें इस के लिये भी ध्यान देना पडता है। सामाजिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक कार्यों की सूची में आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुरूष और स्त्री की विशेषताएं ==&lt;br /&gt;
पुरूष और स्त्री को परमात्मा ने मूलत: ही भिन्न बनाया है। फिर भी यदि ठीक से देखा जाये तो बच्चे को जन्म देना, जो दोनों का साझा काम है, उसे छोडकर दूसरा ऐसा कोई भी काम नहीं है जो स्त्री या पुरूष नहीं कर सकता। किंतु केवल ' कर सकना ' के आधार पर स्त्री और पुरूष दोनों जो काम वर्तमान में स्त्रियाँ करतीं है वही करने लग जाएं तो जीना हराम हो जाएगा। इसीलिये सामान्यत: विभिन्न कामों का स्त्री सुलभ और पुरूष सुलभ कामों में बँटवारा किया जाता है और स्त्री के काम कौन से है और पुरूष के कौन से है यह निश्चय किया जाता है। वैसे तो कई काम ऐसे है जो सीमा रेखा पर होते है। जो स्त्री भी और पुरूष भी सहजता से कर सकते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री में इस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन नाम के लैंगिक अंत:स्त्राव (हार्मोन) होते है। इन के कारण स्त्री के शरीर और अवयवों की रचना भिन्न और कोमल बनती है। पुरूष में ऍंड्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन नाम के स्त्राव (हार्मोन) होते है। इन के कारण पुरूष के शरीर और अवयवों की रचना भिन्न और मजबूत बनती है। वैसे तो स्त्री और पुरूष दोनों में इस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन दोनों हार्मोन होते ही है। लेकिन पुरूष में टेस्टोस्टेरॉन का प्रमाण स्त्री से १५ से २० गुना अधिक होता है। इसी प्रकार से स्त्री के शरीर में २६ प्रतिशत चरबी (फॅट्) और २० प्रतिशत प्रथिन (प्रोटीन) होते है तो पुरूष के शरीर में १५ प्रतिशत चरबी और ४५ प्रतिशत प्रथिन होते है। इन्हीं घटकों के कारण स्त्री और पुरूष में शारीरिक और मानसिक भिन्नता होती है। स्त्री में स्त्रीत्व और पुरूष में पुरूषत्व होता है। स्त्री का स्त्रीत्व और पुरूष का पुरूषत्व तीव्र होने से संतति अधिक तेजस्वी और ओजस्वी बनती है। सामाजिक संस्कारों के माध्यम से स्त्री के स्त्रीत्व को और पुरूष के पुरूषत्व को अधिक तीव्र बनाया जा सकता है। अधिजनन शास्त्र के माध्यम से भारतीय परंपराओं में ऐसा बनाया जाता रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री का स्वभाव भावना प्रधान होता है तो पुरूष का स्वभाव वस्तुनिष्ठ और तर्कनिष्ठ होता है। दिशा, गणित, विज्ञान, समय आदि विश्लेषण और संश्लेषण के विषय पुरूष के लिये अधिक सरल होते है। स्त्री के लिये कला, कौशल, कोमलता से करने के विषय सरल होते है। स्त्री की त्वचा भी पुरूष की त्वचा से महीन और इसलिये अधिक संवेदनशील होती है। स्पर्श ही नही तो स्पर्श के पीछे छुपी इच्छाओं को भी समझने की सामर्थ्य स्त्री में होती है। स्त्री में संवाद कुशलता अधिक अच्छी होती है। अन्यों के भाव स्त्री आसानी से समझ जाती है। पुरूष को उस के लिये प्रयास करने पडते है। पुरूष मेहनत के काम दीर्घ काल तक कर सकता है। स्त्री, उस के स्नायू कोमल होने के कारण शारीरिक दृष्टि से अधिक सहनशील होती है जब की पुरूष मानसिक आघातों को अधिक अच्छी तरह सहन कर लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-१३ वर्ष की अर्थात् माहवारी शुरू होने की आयु में स्त्री के शरीर में इस्ट्रोजन का प्रमाण और इस कारण प्रभाव बढ जाता है। यह स्त्री में लैंगिक आकर्षण निर्माण करता है। माहवारी के काल में स्त्री के अंत:स्त्रावों के असंतुलन के कारण स्त्री का स्वभाव चिडचिडा बन जाता है। पुरूषों में यह आयु १५-१६ वर्ष की होती है। इस आयु में पुरूषों में टेस्टोस्टेरॉन का प्रमाण बढता है। उस के स्नायू कठोर बनने लगते है। वह मदमस्त बन किसी को टकराने की इच्छा करने लगता है। आजकल लैंगिक  स्वैराचार और खुलापन बढ़ने से यह आयु कम हो रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्भ धारणा से लेकर संतान के पाँच वर्ष का होने तक के लिये स्त्री को किसी अन्य की मदद की आवश्यकता होती है। स्त्री में काम वासना से वात्सल्य की भावना अधिक प्रबल होती है। इसीलिये कहा गया है कि स्त्री क्षण काल की पत्नि और अनंत काल की माता होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री का स्वभाव बचत का होता है। उस के लिये प्रतिष्ठा से बचत का मूल्य अधिक होता है। इस लिये वह नि:संकोच होकर बीच बाजार में भी रुपये दो रुपयों के लिये भाव ताव करती दिखाई देती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री को अंतर्मुख होना कठिन होता है। त्रयस्थ वृत्ति से वह अपने व्यवहार का विश्लेषण नहीं कर सकती। स्त्री शारीरिक दृष्टि से पुरूष से दुर्बल तो होती ही है, गर्भावस्था में वह और भी परावलंबी बन जाती है। &lt;br /&gt;
इस दुर्बलता के कारण ही मनु ने कहा है&amp;lt;blockquote&amp;gt;पिता रक्षति कौमार्ये, भर्ता रक्षति यौवने, स्थवीरे रक्षति पुत्र:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् कौमार्यावस्था में स्त्री को पिता का यौवन में पति का और वार्धक्य में पुत्र का संरक्षण मिलना आवश्यक होता है। इस से उस स्त्री का और समाज का भी भला होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सब विश्लेषण का हेतु पुरूष और स्त्री में परमात्मा प्रदत्त अंतर होता है यह बताने का है। इस अंतर के कारण स्त्रियों के और पुरूषों के बल स्थान और दुर्बल स्थान भिन्न होते है, यह बताने का है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपसंहार ==&lt;br /&gt;
मनुष्य एक स्खलनशील जीव है। स्खलन यह प्रकृति का नियम है। जैसे पानी हमेशा नीचे की ओर प्रवाहित होता है उसी तरह मनुष्य की प्रेरणाएँ भी उसे स्वभावत: निन्म स्तर की दिशा में आगे बढातीं हैं। इस कारण मानव व्यवस्थाओं को और संस्कारों को बिगाडता रहता है। मानव जीवन और समाज जीवन सुचारू रूप से चलने के लिये मानव को तीव्र संस्कारों और शिक्षा की तथा दंण्ड व्यवस्था की आवश्यकता होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानव जीवन को मोक्षगामी बनाने का साधन धर्म है। अपनी इच्छाओं (काम) को और उन इच्छाओं की पूर्ति के लिये किये गये प्रयासों तथा उपयोग में लाए गये धन, साधन और संसाधनों (तीनों मिलाकर अर्थ) को धर्मानुकूल रखने से मनुष्य मोक्षगामी बनता है। इसलिये काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखने की शिक्षा ही वास्तव में शिक्षा होती है। जो मोक्षगामी नहीं बनना चाहते उन के लिये भी काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखना उतना ही आवश्यक और महत्वपूर्ण है जितना मोक्षगामी लोगों के लिये। काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखने से ही समाज सुखी, समृध्द और सुसंस्कृत बनता है। जब मानव के व्यवहारों को यानि इच्छाओं की पूर्ति के प्रयासों को धर्म के दायरे में रखा जाता है तब 'सर्वे भवन्तु सुखिन: की प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मनुष्य पैदा होता है उस समय उसके कोई कर्तव्य नहीं होते। केवल अधिकार ही होते हैं। ऐसे केवल अधिकार लेकर जिन्होंने जन्म लिया है उन बच्चों को अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिये जीनेवाले मनुष्य नहीं बनाया गया तो मानव का समाज जीवन नरक बन जाएगा। उसे कर्तव्यों के लिए जीनेवाला मनुष्य बनाना यह परिवार का काम है। और ऐसा विकास ही व्यक्ति का विकास है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१. शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, लेखक सुश्री इंदुमती काटदरे, पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन (प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<title>Vyaktitva (व्यक्तित्व)</title>
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		<updated>2018-11-09T12:14:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: /* व्यक्तित्व का अर्थ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;भारत में शिक्षा का लक्ष्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है ऐसा कुछ लोग मानते हैं तो कुछ लोग समग्र विकास को मानते हैं। यूरो अमरीकी सोच के अनुसार सोचनेवाले ‘ओल राऊंड डेव्हलपमेंट ऑफ पर्सनालिटी’ को शिक्षा का लक्ष्य मानते हैं। किन्तु ‘सर्वांगीण’, ‘समग्र’ और ओल राऊंड इन के अर्थों में बहुत अंतर है। ‘समग्र” के अर्थ सर्वांगीण से भी अधिक व्यापक और सटीक हैं। अंग्रेजी में जिसे पर्सनॅलिटी कहते है वह और भारतीय व्यक्तित्व की संकल्पना यह भिन्न बातें  है । पर्सनॅलिटी शब्द लॅटीन शब्द ‘पर्सोना’ से बना है । पर्सोना का अर्थ है मुखौटा। अर्थात् मनुष्य का वास्तविक स्वरूप नहीं। मनुष्य ने धारण किया मुखौटा। याने बाहर से दिखनेवाला रूप । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व और पर्सनालिटी में ‘होना’ और ‘बनाया’ जाना का अंतर है। इनमें होना स्वाभाविक होता है। बनाना कृत्रिम होता है। स्वाभाविक का अर्थ है जो स्वभाव के अनुकूल है। भारतीय या हिन्दू जन्म से ही होता है। जैसे बाप्तिस्मा से ईसाई बनता है, सुन्नत से मुसलमान बनता है, भारतीय या हिन्दू बनने के लिए इन जैसी कोई विधि नहीं होती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वांगीण विकास को जो लोग लक्ष्य मानते हैं उनके अनुसार अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय ऐसे पाँच कोशों का विकास ही मनुष्य का विकास होता है। समग्र विकास की व्याप्ति इससे अधिक है। उसका विचार हम आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे पंचमहाभौतिक शरीर में से हम में विद्यमान उस परमात्म तत्व की जो सहज अभिव्यक्ति होती है उसे भारतीय सोच में व्यक्तित्व कहते है । यह मुखौटे जैसी कृत्रिम नहीं होती । और ना ही किसी को बताने के लिये धारण की हुई होती है। इसलिये हम ऑल राऊंड पर्सनॅलिटी डेव्हलपमेंट का विचार नहीं करेंगे । हम विचार करेंगे अष्टधा प्रकृति के सभी अंगों के सर्वांगीण विकास से भी अधिक व्यापक ऐसे व्यक्तित्व के समग्र विकास का। लेकिन उससे पहले व्यक्तित्व क्या है इसे समझना आवश्यक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तित्व का अर्थ ==&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व एक बहुत व्यापक अर्थवाला शब्द है। संसार में अनगिनत अस्तित्व हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ७ में कहा है:  &amp;lt;blockquote&amp;gt;भूमिराप: अनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा  । ।   ७.५  । ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अपरेयमितस्त्वन्याम् प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्  । &amp;lt;/blockquote&amp;gt;आगे और कहा है  &amp;lt;blockquote&amp;gt;एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ : यह सब परमात्मा के ही भिन्न भिन्न रूप हैं। ये दो तत्वों से बनें हैं। एक है भूमि, आप, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे आठ घटकों की अचेतन याने अपरा प्रकृति। और दूसरी है जीवरूप परा प्रकृति याने जीवात्मा। परा और अपरा दोनों ही परमात्मा के ही अंशों से बनें हैं। संसार में जितने भी भूतमात्र हैं वे सब मेरी इन दो प्रकृतियों से ही बनें हैं। मैं ही संसार की उत्पत्ति और प्रलय का मूल कारण हूँ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सभी अस्तित्वों की भिन्नता उनमें उपस्थित अष्टधा प्रकृति के आठों घटकों के अनगिनत भिन्न भिन्न प्रमाणों में संयोग (कोंबिनेशन) के कारण है। परमात्मा की अष्टधा प्रकृति के जिस संयोग-विशेष के साथ परमात्मा का अंश याने परा प्रकृति याने आत्मतत्व जुड़ता है उन्हें जीव कहते हैं, और परमात्मा के उस अंश को उस जीव का जीवात्मा। परमात्मा का अंश अस्तित्व में से अपने को अभिव्यक्त करता है, अपने गुण-लक्षण प्रकट करता है इसलिये उसे ‘व्यक्ति’ कहा जाता है। हर अस्तित्व की अभिव्यक्ति अष्टधा प्रकृति के भिन्न मेल-विशेष के कारण अन्य अस्तित्वों से भिन्न होती है। इसे ही उस अस्तित्व का ‘व्यक्तित्व‘ कहा जाता है। मनुष्य के संबंध में जब इस शब्द का प्रयोग किया जाता है तब व्यक्तित्व से तात्पर्य है उस मनुष्य की अष्टधा प्रकृतिके मेल-विशेष के कारण होनेवाली जीवात्मा की अभिव्यक्ति।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तित्व का समग्र विकास ही पूर्णत्व ==&lt;br /&gt;
स्वामी विवेकानंदजी ने शिक्षा की व्याख्या की है। वे बताते हैं – ‘मनुष्य में पहले से ही विद्यमान ‘पूर्णत्व’ के प्रकटीकरण को ही शिक्षा कहते हैं।’ इस पूर्णत्व शब्द को ठीक समझना होगा। पूर्णत्व का अर्थ है हर बात में पूर्णत्व। यह तो केवल परमात्मा में ही होता है। अन्य किसी में नहीं। स्वामीजी के कथन का अर्थ है की परमात्मपद प्राप्ति ही शिक्षा का लक्ष्य है। यही तो भारत की सहस्रकों से चली आ रही मान्यता है।   &amp;lt;blockquote&amp;gt;सा विद्या या विमुक्तये &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थात जो मुक्ति दिलाए, मोक्ष की प्राप्ति जिससे हो, जिससे प्रमात्मपद प्राप्त हो वही शिक्षा है।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;एकात्म मानव दर्शन में इसी समग्र विकास की व्याख्या पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी ने सरल शब्दों में प्रस्तुत की। वे बताते हैं कि व्यक्तित्व का समग्र विकास उसके शरीर, मन, बुद्धि इन अंगों के विकास के साथ ही समष्टीगत और सृष्टिगत विकास होने से होता है। मनुष्य समाज और सृष्टि के बिना जी नहीं सकता। इन दोनों के साथ समायोजन अनिवार्य है। इसलिए इन के साथ समायोजन आवश्यक है।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह समायोजन भी दो प्रकार से होता है। एक होता है अपने स्वार्थ के लिए और दूसरा होता है इन के साथ अपना संबंध आत्मीयता का है ऐसा मानने से। चिरकाल से मनुष्य के सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के पीछे ‘स्वार्थ’ और ‘आत्मीयता’ यही दो कारण रहे हैं। इन संबंधों का आधार स्वार्थ है ऐसा माननेवाले लोगों को ‘असुर’ स्वभाव और संबंधों का आधार आत्मीयता है ऐसा माननेवालों को ‘सुर’ स्वभाव कहा गया है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत हमेशा से ही सुर स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता रहा है। समग्र विकास की संकल्पना में अन्नमय से लेकर आनंदमय के विकास को ‘व्यक्तिगत’ विकास कहा जाता है। इससे आगे जब उस व्यक्ति को समाज के बारे में आत्मीयता का अनुभव होता है। तब इसे '''समष्टीगत विकास''' कहते हैं। जैसे बालक माता के साथ परिवार के सदस्यों के साथ जब आत्मीयता का व्यवहार करने लगता है, उसमें कुटुंब भावना का विकास होता है तो यह उस बालक के समष्टीगत विकास है। '''समूचे मानव समाज के साथ जब मनुष्य आत्मीयता अनुभव करता है तब समष्टीगत विकास पूरा होता है'''।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी तरह सृष्टि के मानवेतर सभी अस्तित्वों के साथ जब वह आत्मीयता या परिवार भावना अनुभव करता है तो उसका '''सृष्टिगत विकास''' होता है। व्यक्तिगत, समष्टीगत और सृष्टिगत ऐसे तीनों प्रकार के विकास के समुच्चय को ही ‘समग्र विकास’ कहते हैं। ऐसे समग्र विकसित मनुष्य को संसार में उपस्थित सभी अस्तित्वों के साथ आत्मीयता की अनुभूति होती है। ये सभी अस्तित्व परमात्मा के ही रूप होने से इन के साथ जो एकात्मता अनुभव करता है उसमें और परमात्मा में कोई अंतर नहीं रह जाता। यही मोक्ष की अवस्था है। यही मुक्ति है। यही पूर्णत्व की प्राप्ति है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय सोच के अनुसार व्यक्तित्व विकास के चार आयाम है । वे है व्यक्तिगत् विकास, समष्टिगत् विकास, सृष्टिगत् विकास और परमेष्ठीगत् विकास। पहले तीन के विकास से चौथे का विकास अपने आप हो जाता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्यक्तिगत् विकास''' से अर्थ है, शरीर, प्राण, मन, बुध्दि, चित्त इन पाँच घटकों का विकास । ये पाँच घटक हर व्यक्ति के भिन्न होते है । इन्ही पाँच बातों को पंचकोश विकास भी कहा जाता है । शरीर अर्थात् अन्नमय कोश, प्राण अर्थात् प्राणमय कोष, मन अर्थात् मनोमय कोश, बुद्धि याने विज्ञानमय कोश और चित्त अर्थात् आनंदमय कोश का विकास । शरीर एक यंत्र जैसा है । पंच कर्मेन्द्रिय और पंच ज्ञानेन्द्रिय तथा शरीर मे काम करनेवाली चेतातंत्र, रक्ताभिसरण, पाचनतंत्र आदि विभिन्न प्रणालियाँ प्राण शक्ति के कारण चलती है । प्राण इस शरीर रूपी यंत्र को चलानेवाला इंधन है । प्राण शरीर और इंन्द्रियों से अधिक सूक्ष्म है । इसलिये अधिक बलवान है । तीसरा घटक है  मन । मनोमय का संबंध मन से होता है । मन के विकास का अर्थ है चंचलता मुक्त, स्थिर, एकाग्र, अलिप्त, निर्द्वंद्व, और विकार रहित मन । इंन्द्रियोंपर नियंत्रण करने वाले और बुध्दि के नियंत्रण में रहने वाला मन । ग्रहणशक्ति, धारणाशक्ति, स्मृति, निरीक्षण, परीक्षण, तर्क, अन्मान, विश्लेषण, संश्लेषण  और कल्पनाशक्ति का विकास ही बुध्दि का विकास होता है ।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनंदमय कोश के विकास का अर्थ है, चित्त का विकास । अपने शरीर में स्थित उस परमात्वतत्व को जैसा वह है वैसा ही जानने की क्षमता, सहजता, स्वतंत्रता, सौंदर्यबोध यह चित्त के विकास के लक्षण है ।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्य और समाज  - इन का परस्पर संबंध अन्योन्याश्रित है । समाज के बिना मनुष्य जी नही सकता । इस समाज के संबंध में आत्मीयता की, एकात्मता की भावना का विकास ही समष्टिगत् विकास कहलाता है । समाज के हर घटक के दुख में दुख की अनुभूति होना इसका लक्षण है । इसी तरह मनुष्य और समाज सृष्टि के बिना जीवित नही रह सकते। इस चराचर सृष्टि के साथ आत्मीयता की, एकात्मता की भावना का विकास ही सृष्टिगत् विकास है । उपर्युक्त तीनों प्रकार से विकास होने से परमेष्ठिगत् विकास अपने आप हो जाता है ।   &amp;lt;blockquote&amp;gt;अहं ब्रह्मास्मि&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;तत् त्वं असि &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;सर्वं खल्विदं ब्रह्मं&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् मैं ही वह परमात्मतत्व हूं, तुम भी वह परमात्वत्व ही हो और चराचर में वह परमात्मतत्व ही व्याप्त है इस की अनुभूति होना ही परमेष्ठिगत् विकास है । यही पूर्णत्व है । यही मोक्ष है । यही नर का नारायण बनाना है। यही अहंकार विजय है। यही मानव जीवन का लक्ष्य है ।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मानव जीवन का लक्ष्य ==&lt;br /&gt;
अभारतीय और भारतीय विचार प्रवाह में सबसे पहला अंतर है मानव जीवन के लक्ष्य का । विश्व में यहूदी, ईसाई, मुसलमान समाजों की जनसंख्या विशाल और लक्षणीय है। इन सभी का लक्ष्य हेवन या जन्नत माना गया है। हेवन या जन्नत यह संकल्पनाएं मोक्ष से एकदम भिन्न हैं। मोक्ष का अर्थ है परमात्मपद की प्राप्ति । अर्थात् सुख और दुख की सीमा से परे चले जाना । सर्वं खल्विदं ब्रह्मं अर्थात् चराचर में एकत्व की या एक ही आत्मतत्व की अनूभूति करना । कई लोग ईसाई सॅल्व्हेशन या इस्लामी कयामत (आखिरत) की तुलना मोक्ष से करते हैं। किन्तु यह गलत है। यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं।                                                                                            &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सॅल्व्हेशन या आखिरत यह तो हेवन और जन्नत तथा हेल और दोजख की संकल्पनाओं से जुडी संकल्पनाएं ही हैं। भारतीय विचार में स्वर्ग और नरक की संकल्पनाएं भी हेवन और जन्नत और हेल और दोजख की संकल्पनाओं से भिन्न है। ईसाईयत की सॅल्व्हेशन और इस्लाम की कयामत (आखिरत) की कल्पना और मोक्ष में कोई साम्य नहीं है। अभारतीय (ईसाई और इस्लाम की) मान्यता है कि मनुष्य मरने के बाद अपनी दफनभूमि में पडा रहता है। डे ऑफ सॅल्व्हेशन या कयामत के दिन को गॉड या अल्लाह अपने प्रेषित के माध्यम से सब को उठाते हैं। प्रेषित के कहे अनुसार जिसने ईसाईयत पर श्रध्दा रखी थी उसे गॉड हमेशा के लिये स्वर्ग भेज देता है। और जिन्होंने गॉड पर श्रध्दा नहीं रखी थी उन सबको हेल में भेज देता है। इसी प्रकार से प्रेषित के कहने से अल्लाहताला प्रत्येक मनुष्य की रूह का क्या होगा यह निर्णय करता है। जिसने अल्लाहताला में निष्ठा रखी थी उन सब को हमेशा के लिये जन्नत में भेज देता है। और जिसने अल्लताला पर निष्ठा नहीं रखी थी उन सब को हमेशा के लिये दोजख में भेज देता है। वास्तव में इन दोनों मजहबों की प्रक्रिया में गॉड या अल्लाहताला तो बस नाममात्र हैं। सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी तो उनके प्रेषित ही हैं गॉड और अल्लाहताला का काम तो बस अपने प्रेषित द्वारा बताये अनुसार लोगों को हेवन और हेल या जन्नत और दोजख में भेजने का ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय स्वर्ग और नरक की कल्पना भी इन से पूर्णत: भिन्न है। स्वर्ग या नरक की प्राप्ति में परमात्मा सीधा न्याय करता है। उसे किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं होती। वह सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी होने से वह प्रत्येक द्वारा किये सत्कर्म और दुष्कर्म जानता है। प्रत्येक मनुष्य द्वारा किये इन सत्कर्मों के अनुसार ही परमात्मा उस के लिये स्वर्ग सुख या नरक यातनाओं की व्यवस्था करता है। जैसे ही स्वर्ग सुख या नरक यातनाओं के भोग पूरे हो जाते हैं, मनुष्य स्वर्ग सुख से वंचित और नरक यातनाओं से मुक्त हो जाता है। यह भोग हर मनुष्य अपने वर्तमान जन्म में और आगामी जन्मों में प्राप्त करता है। भारतीय सोच में तो सीधा सीधा गणित है। जितना सत्कर्म उतना सुख जितना दुष्कर्म उतना दु:ख। अभारतीय समाजों में सत्कर्म और दुष्कर्म की कोई संकल्पना ही नहीं है। हेवन या जन्नत का अर्थ है सदैव सुखी रहने की स्थिति और हेल और दोजख का अर्थ है हमेशा दुखी रहने की स्थिति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभारतीय समाज तो मोक्ष की कल्पना तक नहीं कर सके हैं। भारतीय मोक्ष की कल्पना भारतीय सोच को आध्यात्मिक बना देती है। '''देहभाव से मुक्ति ही मोक्ष है'''। जीवात्मा जब देह-भाव से ग्रस्त होता है तब उसमें करता भाव, भोक्ता भाव और ज्ञाताभाव आ जाते हैं। इन के अभाव में जीवात्मा अपने देहभाव से मुक्त हो जाता है। फिर उसमें और परमात्मा में अंतर नहीं रहा जाता। अधि का अर्थ है श्रेष्ठ या उत्तम। श्रीमदभगवदगीता १५ वें अध्याय के १७ में परमात्मा को उत्तम पुरूष कहा है। अर्थात् अधि-आत्मा ही परमात्मा होता है। देहभाव से मुक्त होकर परमात्मा से तादात्म्य की दिशा में बढ़ना ही जीवन है। ऐसी भारतीय मान्यता के कारण सम्पूर्ण जीवन और जीवन का हर पहलू अध्यात्म से ओतप्रोत होता है।  भारतीय समाज ने अपने सम्मुख व्यक्तिगत, सामाजिक और सृष्टिगत ऐसे तीन प्रकार के एक दूसरे से सुसंगत ऐसे लक्ष्य रखे हैं। लक्ष्य का निर्धारण करते समय वे ‘स्वभावज’ हों इसका ध्यान रखा गया है। व्यक्तिगत स्तर का लक्ष्य और सामाजिक स्तर का लक्ष्य परस्पर पूरक और पोषक होना आवश्यक है। इसी तरह सृष्टिगत लक्ष्य, व्यक्तिगत और समष्टिगत लक्ष्य ये तीनों परस्पर पूरक पोषक होना आवश्यक हैं।  व्यक्तिगत स्तर का लक्ष्य मोक्ष या त्रिवर्ग के माध्यम से अभ्युदय है। यह सामाजिक लक्ष्य स्वतंत्रता को बाधक नहीं होना चाहिये। इसीलिये हमारे पूर्वजों ने कहा है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;आत्मनो मोक्षार्थं जगत् हिताय च।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;मुझे मोक्ष मिले लेकिन जगत् का हित करते हुए मिले। और त्रिवर्ग में तो मूलत: धर्म का ही अधिष्ठान है और धर्माचरण सृष्टिगत लक्ष्य है। तीनों स्तरों के लक्ष्यों का नियामक धर्म ही है। इसलिये तीनों स्तरों के लक्ष्य परस्पर पूरक और पोषक बनें रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मानव के व्यक्तित्व से संबंधित महत्वपूर्ण बातें ==&lt;br /&gt;
# मानव यह परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना है। सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। परमात्मा की सभी शक्तियाँ मनुष्य के पास विद्यमान होतीं हैं। केवल मात्रा का अंतर होता है। मानव की शक्तियाँ मर्यादित हैं। परमात्मा की अमर्याद हैं। किंतु भारतीय मान्यता और इतिहास के अनुसार नर करनी करे तो नारायण तक विकास कर सकता है। &lt;br /&gt;
# मानव जीवन का नियमन उसके कर्म ही करते हैं। भारतीय मान्यता है कि जीवों की ८४ लक्ष योनियाँ हैं। इनमें केवल मानव योनि ही कर्मयोनि है। अन्य सभी प्राणियों की योनियाँ भोग योनियाँ हैं। प्राणि उन्हें कहते हैं जो प्राण के यानि आहार, निद्रा, भय और मैथुन इन प्राणिक आवेगों के स्तरपर जीते हैं। इन अर्थों में मानव एक प्राणि भी है।  जन्म से तो मानव भी अन्य प्राणियों जैसा प्राण के स्तर पर जीनेवाला जीव ही होता है। संस्कार और शिक्षा से वह मन के स्तर पर जीने लगता है। &lt;br /&gt;
'''मन के स्तर पर जीनेवाले को मानव कहते हैं'''। बुध्दि के स्तर पर जीनेवाले को महामानव और चित्त या आत्मिक स्तर पर जीनेवाले को और भी अधिक श्रेष्ठ मानव या नरोत्तम कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानवेतर योनियों के प्राणियों को अपने स्वाभाविक प्राणिक आवेगों के अनुसार चलने मात्र की बुध्दि और मन मिला है। इसलिये सामान्यत: ये प्राणि स्वतंत्र कर्म नहीं कर सकते। केवल मानव को विशेष मन, बुध्दि, स्मृति आदि मिले हैं इस कारण वह अन्य प्राणियों से भिन्न, प्राणिक आवेगों से भिन्न और प्राणिक आवेगों के विपरीत भी कर्म करने की स्वतंत्रता ले सकता है। मानव व्यवहार की इस स्वतंत्रता का नियमन उस के कर्मों से होता है। यह नियमन कर्मसिध्दांत के आधार पर होता है। कर्मसिध्दांत की अधिक जानकारी के लिये ‘[[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|जीवनशैली के सूत्र]]‘ अध्याय में देखें। ऋणसिद्धांत का आधार भी कर्मसिद्धांत ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३. सृष्टि में मानव निर्माण तो सब से अंत में हुआ था। उससे पहले सृष्टि थी। सृष्टि के विलय की प्रक्रिया में भी मानव जाति नष्ट होने के उपरांत भी सृष्टि होगी।  सृष्टि को मानव की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मानव सृष्टि के बगैर जी नहीं सकता। इसलिये मानव के लिये यह अनिवार्य है कि वह सृष्टि के साथ अपने को समायोजित करे। अपने सभी व्यवहार प्रकृति सुसंगत रखे। प्रकृति का संतुलन नहीं बिगाडे। सृष्टि चक्र को अबाधित रखे। वैसे भी सृष्टि या प्रकृति के साथ जब मानव खिलवाड़ करता है, एक सीमा तक तो प्रकृति उसे सहन कर लेती है। इस सीमा को लाँघने के बाद प्रकृति भी उसकी प्रतिक्रया देती है। इस प्रतिक्रया से मानव का ही नुकसान होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४.  श्रेष्ठता के साथ दायित्व आता है। दायित्व बोध आना चाहिये। मानव को जो श्रेष्ठता परमात्मा से मिली है उस के कारण मानव का यह दायित्व बनता है कि वह विवेक से काम ले। प्रकृति नहीं बिगाडे। जीवश्रृंखला को नहीं तोडे। प्रकृति के साथ खिलवाड नहीं करे। दुर्बलों की सहायता करे। मानव को मिली श्रेष्ठ स्मृति के कारण ‘कृतज्ञता’, उपकार से उतराई होना यह मानव का अनिवार्य लक्षण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५.  भारतीय दृष्टि से मानव जीवन का लक्ष्य मोक्षप्राप्ति या मुक्ति है। व्यक्तिगत से ऊपर परमेष्ठीगत विकास है। इसी तरह मानव का सामाजिक स्तर पर लक्ष्य ‘स्वतंत्रता’ है। और सृष्टि के स्तरपर ‘धर्माचरण’ है। सृष्टि के नियमों के अनुकूल व्यवहार भी धर्म ही होता है। स्वतंत्रता का अर्थ स्वैराचार नहीं होता। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारियाँ आतीं हैं। दायित्व आते हैं। धर्म के विषय में अधिक जानकारी के लिये अध्याय ३ ‘[[Dharma: Bhartiya Jeevan Drishti (धर्म:भारतीय जीवन दृष्टि)|धर्म]]’ में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६.  मानव सदैव सुख की खोज करता रहता है। मानव के सारे प्रयास मूलत: सुखप्राप्ति के लिये होते हैं। सुख का अर्थ अनुकूल संवेदना है। सुख प्राप्ति के लिये निम्न बातें अनिवार्य होती हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- सुसाध्य आजीविका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- स्वतंत्रता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- शांति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- पौरुष&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन चारों बातों का समष्टीगत होना व्यक्ति के सुख के लिये आवश्यक है। जितने प्रमाण में ये समष्टिगत होंगी उतने प्रमाण में ही व्यक्ति को भी सुख मिल सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुख के भी भिन्न भिन्न प्रकार होते हैं। '''दैवी, मानवी और पाशवी'''। दैवी सुख आत्मिक सुख को कहते हैं। इस में ममता, सहानुभूति, आत्मीयता, परोपकार, प्रेम आदि के कारण मिले सुखों का समावेश होता है। मानवी सुख मन का सुख होता है। यह मन को प्रसन्न करनेवाला सुख होता है। पाशवी सुख में शरीर और इंद्रियों का सुख आता है। यह स्तर प्राणिक आवेगों में अनुकूल अनुभवों का स्तर है। सुख के भिन्न भिन्न स्तर भी होते हैं। इंद्रिय सुख का स्तर सबसे नीचे होता है। मन का सुख उससे ऊपर, बुध्दि का सुख उससे ऊपर, चित्त का सुख या आनंद उससे ऊपर और परमानंद का या परम कल्याण का सुख (आत्मीय) सब से ऊपर होता है। इस परम सुख का नाम ही मोक्ष है। आत्मिक सुख की प्राप्ति के लिये अन्य तीनों के न्यूनतम सुख की प्राप्ति की आवश्यकता होती है। यह मन-बुध्दि में स्थापित करने के लिये ही धर्मशिक्षा की व्यवस्था की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७.  मानवेतर प्राणियों में नवजात बच्चे बहुत शीघ्र स्वावलंबी बन जाते हैं। मानव में व्यक्तित्व विकास यह लंबी चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इसलिये मानव परिवार की रचना और पशूओं के परिवार की रचना में और प्रवर्तन में अंतर होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८.  मानव का व्यक्तित्व पाँच पहलुओं से बना है। तैत्तिरीय उपनिषद् में इन्हें पञ्चविध पुरूष कहा है। आदि जगदगुरु शंकराचार्य इन पहलुओं को पंचकोश कहते हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय - ऐसे उन पञ्चविध पुरूषों के या पाँच कोशों के नाम हैं। सामान्य लोगों की भाषा में इन्हें शरीर (इंद्रियाँ), प्राण, मन, बुध्दि और चित्त कहा जा सकता है। जन्म के समय इन सभी का स्वरूप अविकसित होता है। ये सब बातें वैसे तो हर प्राणि के पास भी होतीं ही हैं। किंतु मानवेतर प्राणियों में मन, बुध्दि और चित्त या तो अक्रिय होते हैं या अत्यंत निम्न स्तर के होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हर मानव के पंचकोशीय स्वरूप में से स्वयं परमात्मा अभिव्यक्त होता है इसीलिये मानव को व्यक्ति कहते हैं। इन कोशों के साथ तादात्म्य हो जाने से उस व्यक्ति में उपस्थित आत्म तत्व अपने को व्यक्ति मानने लग जाता है। जब मानव इन पंचकोशों के परे जाता है तब ही उस का साक्षात्कार परमात्मा से होता है। हर मानव का व्यक्तित्व अन्य मानवों से भिन्न होता है। इसलिये उसके विकास का रास्ता भी अन्यों से भिन्न होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९.  मानव व्यक्तित्व के पहलुओं का विकास भी एकसाथ नहीं होता। गर्भधारणा के बाद सर्वप्रथम चित्त सक्रिय होता है। इस काल में गर्भ अपनी माँ से भी कहीं अधिक संवेदनशील होता है। अब तक इंद्रियों का विकास नहीं होने से शब्द, स्पर्श, रूप रस और गंध के सूक्ष्म से सूक्ष्म संस्कार वह ग्रहण कर लेता है। जब इंद्रियों का निर्माण शुरू होता है तब फिर संस्कार क्षमता उस इंद्रिय की क्षमता जितनी कम हो जाती है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिशू अवस्था में बालक के इंद्रियों के विकास का काल होता है। पूर्वबाल्यावस्था में मन का या विचार शक्ति का, उत्तर बाल्यावस्था और पूर्व किशोरावस्था में बुध्दि, तर्क आदि का और उत्तर किशोरवस्था में तथा यौवन में अहंकार का यानी 'मै' का यानी कर्ता भाव (मैं करता हूँ), ज्ञाता भाव (मैं जानता हूँ) और भोक्ता भाव (मैं उपभोग करता हूँ) का विकास होता है। इसलिये व्यक्तित्व विकास के लिये संस्कारों का और शिक्षा का स्वरूप आयु की अवस्था के अनुसार बदलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०. हर मानव जन्म लेते समय अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार विकास की कुछ संभाव्य सीमाएँ लेकर जन्म लेता है। अच्छा संगोपन मिलने से वह पूरी संभावनाओं तक विकास कर सकता है। कुछ विशेष इच्छाशक्ति रखने वाले बच्चे अपनी संभावनाओं से भी अधिक विकास कर लेते हैं। लेकिन ऐसे बच्चे अल्प संख्या में ही होते हैं। अपवाद स्वरूप ही होते हैं। अपवाद स्वरूप बच्चों के विकास के लिये सामान्य बच्चों के नियम और पद्धतियाँ पर्याप्त नहीं होतीं। सामान्य बच्चों के साथ भी विशेष प्रतिभा रखनेवाले बच्चों जैसा व्यवहार करने से सामान्य बच्चों की हानि होती है। समाज के सभी लोग प्रतिभावान या जिन्हें श्रीमद्भगवद्गीता ‘श्रेष्ठ’ कहती है या जिन्हें ‘महाजनो येन गत: स: पंथ:’ में ‘महाजन’ कहा गया है ऐसे नहीं होते हैं। इनका समाज में प्रमाण ५-१० प्रतिशत से अधिक नहीं होता है।  इसीलिये भारतीय समाज के पतन के कालखण्ड छोड दें तो सामान्यत: भारतीय न्याय व्यवस्था में एक ही प्रकार के अपराध के लिये ब्राह्मण को क्षत्रिय से अधिक, क्षत्रिय को वैश्य से अधिक और वैश्य को शूद्र से अधिक दण्ड का विधान था। इस विषय में चीनी प्रवासी द्वारा लिखी विक्रमादित्य की कथा ध्यान देने योग्य है। कुछ स्मृतियों में ब्राह्मण को अवध्य कहा गया है। अवध्यता से तात्पर्य है शारीरिक अवध्यता। ब्राह्मण का अपराधी सिध्द होना उसके सम्मान की समाप्ति होती है। और  ब्राह्मण का सम्मान छिन जाना मृत्यू से अधिक बडा दंड माना जाता था। ब्राह्मणों में क्षत्रियों में और वैश्यों में भी महाजन होते हैं। इनका प्रमाण ५-१० % से कम ही होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११. आवश्यकता और इच्छा एक नहीं हैं। आवश्यकताएँ शरीर और प्राण के लिये होती हैं। इसलिये वे मर्यादित होतीं हैं। इच्छाएँ मन करता है। मन की शक्ति असीम होती है। इसीलिये इच्छाएँ अमर्याद होतीं हैं। इच्छाओं की पूर्ति से मन तृप्त नहीं होता। वह और इच्छा करने लग जाता है। इसी का वर्णन किया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;न जातु काम: कामानाम् उपभोगेन शाम्यम् ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;हविषा कृष्णवर्त्वेम् भूयं एवाभिवर्धते ॥ &amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रत्येक मानव को उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार और सामर्थ्य होती है। लेकिन साथ ही में इच्छाओं को नियंत्रण में रखने का दायित्व भी होता है। इसलिए मन के संयम की शिक्षा, शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू है। स्वाद संयम, वाणी संयम ऐसे सभी इन्द्रियों की तन्मात्राओं याने स्पर्श, रूप, रस, गंध और शब्द इन के विषय में संयम रखना चाहिए । सामान्यत: बुद्धि, जब तक कि इन्द्रिय नियंत्रित मन उसे प्रभावित नहीं करता, ठीक ही काम करती है। इसलिए हम ऐसा भी कह सकते हैं कि इन्द्रियों को मन के नियंत्रण में रखने की और मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखने की शिक्षा भी शिक्षा का आवश्यक पहलू है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२. मानव अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति में उपलब्ध पदार्थों से या तो सीधे या समाज के अन्य सदस्यों के माध्यम से करता है। इसलिये यह मानव के ही हित में है कि वह प्रकृति के साथ कोई खिलवाड नहीं करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३. श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार चारों वर्ण परमात्मा द्वारा निर्मित हैं । इन में अंतर गुणों का और कर्मों का है। गुण का अर्थ है सत्व, रज और तम गुण। वैसे तो प्रत्येक मनुष्य में तीनों गुण कम अधिक मात्रा में होते ही हैं,  लेकिन जिस वर्ण की प्रधानता होगी उसी वर्ण का वह व्यक्ति माना जाता है। वर्णश: गुणों का संबंध निम्न है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;ब्राह्मण वर्ण	- सत्व प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर रज या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;क्षत्रिय वर्ण	- रज प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;वैश्य वर्ण	- रज प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;शूद्र वर्ण		- तम प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या रज&amp;lt;/blockquote&amp;gt;समाज सुखी बनें इसलिये विप्र वर्ण स्वतंत्रता के लिये, क्षत्रिय वर्ण सुरक्षा के लिये, वैश्य वर्ण सुसाध्य आजीविका के लिये और शूद्र वर्ण शांति के लिये जिम्मेदार है। ब्राह्मण वर्ण की जिम्मेदारी स्वाभाविक स्वतंत्रता की प्रस्थापना, क्षत्रिय वर्ण की जिम्मेदारी शासनिक स्वतंत्रता की प्रस्थापना, वैश्य वर्ण की जिम्मेदारी आर्थिक स्वतंत्रता की प्रस्थापना की है। देशिक शास्त्र इन स्वतंत्रताओं की व्याख्या निम्न रूप में करता है:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.१ स्वाभाविक स्वतंत्रता : जो काम किसी के प्राकृतिक हित के प्रतिकूल नहीं हो उस काम को करने में किसी का और किसी भी प्रकारका हस्तक्षेप नहीं होने को स्वाभाविक स्वतंत्रता कहते हैं। शासनिक और आर्थिक स्वतंत्रता स्वाभाविक स्वतंत्रता में साविष्ट हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.२ शासनिक स्वतंत्रता : शासक के अथवा प्रजा के प्राकृतिक हित में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होकर सदा प्रजा के हित के अनुकूल होने को ही शासनिक स्वतंत्रता कहते हैं। आथिक स्वतंत्रता भी इस में समाविष्ट है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.३ आर्थिक स्वतंत्रता : अर्थ के अभाव या प्रभाव के कारण मनुष्य के प्राकृतिक हित में कोई बाधा निर्माण नहीं होने की स्थिति को आर्थिक स्वतंत्रता कहते हैं। उपर्युक्त व्याख्याओं से यह समझ में आएगा कि स्वाभाविक स्वतंत्रता में अन्य दोनों स्वतंत्रताओं का समावेश हो जाता है। इसी प्रकार से शासनिक स्वतंत्रता में आर्थिक स्वतंत्रता का समावेष हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसीलिये ब्राह्मण वर्ण को सर्वोच्च जिम्मेदारी के अनुसार सर्वोच्च प्रतिष्ठा और क्षत्रिय को दूसरे क्रमांक की प्रातिष्ठा समाज में प्राप्त होनी चाहिये। इन स्वतंत्रताओं की प्राप्ति ही सामाजिक दृष्टि से मानव का लक्ष्य है । ऐसा देशिक शास्त्र का कहना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमद्भगवद्गीता कर्म का महत्व विषद करती है। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने ‘स्वभावज’ कर्म अनिवार्यता से करने चाहिये। स्वभावज का अर्थ है जन्म से ही जैसा स्वभाव है उस के अनुरूप। श्रीमद्भगवद्गीता में शब्दप्रयोग हैं '''ब्रह्मकर्मस्वभावजम्''', '''वैश्यकर्मस्वभावजम्''' आदि। साथ में यह भी कहा है कि अपने वर्ण का काम भले ही अच्छा नहीं लगता हो तब भी वही करना चाहिये। सामान्य मानव को तो इसी तरह व्यवहार करना चाहिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो प्रतिभावान हैं उन्हें शायद सामान्य नियम नहीं लगाये जाते। जैसे गुरू के बिना भवसागर तर नहीं सकते ऐसा कहते हैं। लेकिन जो विशेष प्रतिभावान हैं उन्हें यह बात अनिवार्य नहीं है। वे तो आप ही बिना गुरू के मोक्षगामी हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्णों में परस्पर पूरकता और परस्पर अनुकूलता होती है। इसीलिये वेद कहते हैं कि चारों वर्ण एक शरीर के चार अंगों के समान हैं। जब ज्ञान का विषय होगा, स्वाभाविक स्ववतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तो ब्राह्मण का, जब सुरक्षा का प्रश्न होगा,शासनिक स्वतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तब क्षत्रिय का, जब उदरभरण का, आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तो वैश्य का और जब कला, कारीगरी, परिचर्या, मनोरंजन आदि का विषय होगा तो शूद्र का महत्व होगा।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रेष्ठ और हीन का विवेक समझाने का, अभ्युदय के साथ नि:श्रेयस की प्राप्ति का मार्गदर्शन करने का काम ब्राह्मण का होने से वह समाज का शिक्षक बन जाता है। स्वाभाविक स्वतंत्रता में शासनिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता दोनों का समावेश होता है। पूरे समाज की स्वाभाविक स्वतंत्रता की रक्षा का दायित्व उठाने के कारण शिक्षक सर्वोच्च आदर प्राप्ति का अधिकारी होता है। मोक्ष - इस परम लक्ष्य के कारण शिक्षक या गुरू का सम्मान सबसे अधिक होना उचित ही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे क्रमांक पर शासनिक स्वतंत्रता याने सुरक्षा का विषय आता है। शासनिक स्वतंत्रता की जिम्मेदारी लेने के कारण शासक या क्षत्रिय वर्ग का सम्मान होना भी स्वाभाविक ही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंतु अपने वर्ण के अनुसार व्यवहार नहीं करना और अपने ब्राह्मण या क्षत्रिय होने का दंभ भरना यह समाज के पतन की आश्वस्ति है। ऐसे लोग कठोर दण्ड के अधिकारी हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४. संस्कारों के तीन प्रकार होते हैं। सहज, कृत्रिम और अन्वयागत। सहज में फिर तीन संस्कार होते हैं। योनि संस्कार (मानव योनि के), वर्ण संस्कार और राष्ट्रीयता के संस्कार । कृत्रिम में १६ या कुछ लोगों के अनुसार ४९ संस्कार होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितरों और माता-पिता की ओर से प्राप्त संस्कारों को अन्वयागत संस्कार कहते हैं। अन्वयागत में माता-पिता और पूर्वजों के सहज संस्कार और तीव्र कृत्रिम संस्कार होते हैं। तीव्र कृत्रिम संस्कार दीर्घ अभ्यास के कारण बनीं आदतों के कारण होते हैं। इन संस्कारों में माता की ओर से पाँच पीढ़ियों के मन से संबंधित और पिता की ओर से १४ पीढ़ियों के शरीर से संबंधित संस्कार होते हैं। करीब की पीढ़ी के संस्कार अधिक और दूर की पीढ़ी के संस्कार कम होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१५. हर मानव सुर और असुर प्रवृत्तियों से भरा होता है। इसी प्रकार से समाज में भी सुर और असुर दोनों प्रवृत्तियों के लोग होते हैं। भर्तृहरि के अनुसार अपना कोई हित नहीं होते हुए भी औरों के अहित में आनंद लेने वाले असुर से भी गये गुजरे लोग भी समाज में होते है। इन सभी के लिये सदाचार की शिक्षा की व्यवस्था करना समाज का दायित्व है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जो बात अपने को प्रिय होती है उसे प्रेय कहते हैं। और जो अंतिमत: कल्याणकारी बात होती है उसे श्रेय कहते हैं।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने प्रेय के लिये अन्यों का अहित करनेवाले को असुर कहते हैं। ऐसे मानव को भी श्रेय ही प्रेय लगने लग जाए इसलिये शिक्षा होती है। कुल मिलाकर शिक्षा का स्वरूप धर्मशिक्षा का होता है। पुरूषार्थ चतुष्ट्य की शिक्षा का होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६. मानव अच्छा डॉक्टर बनता है, अच्छा व्यावसायिक आदि बनता है यह समाज के लिये महत्वपूर्ण बात होती है। किंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात हर बालक के लिये यह है कि वह एक अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा देशभक्त और अच्छा मानव बने। इसी तरह हर बालिका अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी देशभक्त और अच्छी मानव बनें यह अधिक महत्वपूर्ण होता है।  इसे सुनिश्चित करने के लिये सब से अधिक अवसर माता को होता है इसलिए सबसे अधिक जिम्मेदारी माता की होती है। दूसरे स्थान पर पिता जिम्मेदार होता है। कहा गया है ‘माता प्रथमो गुरू: पिता द्वितीयो’। इस में माता पिता समान घर के सब ज्येष्ठ लोगों का भी योगदान होता है। तीसरी जिम्मेदारी शिक्षक की होती है। ऐसी मान्यता है कि बालक के विकास में २५ प्रतिशत हिस्सा उसके पूर्वजन्मों के कर्मों का होता है। दूसरा २५ प्रतिशत उसे प्राप्त संस्कार और शिक्षा का होता है। तीसरा २५ प्रतिशत उसे मिले वातावरण, संगत, मित्र आदि का होता है। चौथा २५ प्रतिशत उसके अपने प्रयासों का होता है। इन हिस्सों का महत्वक्रम भी इसी क्रम से होता है। पूर्व कर्मों का प्रभाव सबसे अधिक, उसके उपरांत संस्कार और शिक्षा का आदि।  अन्य एक वर्गीकरण के अनुसार श्रेष्ठ मानव निर्माण के दो मुख्य पहलू हैं। पहला श्रेष्ठ जीवात्मा होना। और दूसरा है उसे अच्छी शिक्षा और संस्कार प्राप्त होना। इस दृष्टि से श्रेष्ठ मानव निर्माण में ५० प्रतिशत हिस्सा तो जन्म देनेवाले माता पिता का है। संस्कारों का काम भी घर में ही मुख्यत: चलता है। इसलिए संस्कारों का २५ प्रतिशत हिस्सा कुटुंब का होता है। शेष २५ प्रतिशत शिक्षा का जिसमें विद्यालयीन शिक्षा और लोकशिक्षा के माध्यमों का सहभाग होता है। समाज में यदि समस्याएँ हैं और बढ रहीं हैं तो माता, पिता और शिक्षक ये तीन लोग क्रम से इस के जिम्मेदार होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१७. मानव के लिये कुछ बातें जन्मजात और कुछ समाज से प्राप्त होनेवाली होतीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार आने वाली बातें - दस इंद्रिय, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार, श्रेष्ठ जीवात्मा, प्रारब्ध (पूर्व कर्मों का फल) जो जन्म कुंडली में दिखाई देता है, त्रिगुणयुक्त व्यक्तित्व, त्रिदोषयुक्त शरीर, माता पिता आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माता-पिता से जन्म से प्राप्त होने वाली बातें : पितर और उन की विरासत- सामाजिक प्रतिष्ठा, नाम, भौतिक समृध्दि,  शारीरिक स्वास्थ्य, जाति और आनुवांशिकता से आनेवाली बातें जैसे वर्ण, (त्रिदोषात्मक) शारीरिक स्वास्थ्य, व्यावसायिक और अन्य कुशलताएँ, परम्पराएँ आदि परिवार में और समाज में प्राप्त होनेवाली बातें : नाम, प्यार, आत्मीयता, रक्षण, पोषण, संस्कार, शिक्षण, आदतें, आर्थिक और पारिवारिक विरासत और परंपराएँ, सामाजिकता, सामाजिक प्रतिष्ठा, कुलधर्म, कुलाचार, विविध पारिवारिक यानी रक्तसंबंध के रिश्ते, विविध सामाजिक रिश्ते, सदाचार, धर्म आदि की शिक्षा आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८. मानव के जन्म, जीवन और मृत्यू के चक्र में आयू की अवस्था के अनुसार निम्न बातें बदलतीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- प्यार-दुलार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- रक्षण/पोषण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- संस्कार और शिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- क्षमताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- योग्यताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- भावनाएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- आवश्यकताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- इच्छाएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- जिम्मेदारियाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- कर्तव्य/बोध &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- अधिकार/बोध&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन का समायोजन सामाजिक संगठन और व्यवस्थाओं में होना आवश्यक है। इस हेतु से समाज भिन्न भिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं को चलाता है, भिन्न भिन्न संगठन और व्यवस्थाएँ निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९. सामान्यत: गृहस्थ के लिये चारों आश्रमों के लोगों तथा अन्य जीव जगत के योगक्षेम की जिम्मेदारी के अलावा दो और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ होतीं हैं। पहली यह है कि वह धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों के योगक्षेम की व्यवस्था करे। दूसरी है समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सार्थक योगदान दे। धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों की संख्या का समाज की कुल आबादी के साथ संतुलन भी महत्वपूर्ण है। धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों के योगक्षेम की व्यवस्था करने से वह नि:श्रेयस को और भौतिक वस्तुओं के उत्पादन से वह व्यक्तिगत और सामाजिक स्तरपर अभ्युदय को प्राप्त करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०. भारतीय समाज में गृहस्थ के लिये तीन बातें आवश्यक मानीं गईं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहली बात यह है कि वह केवल धर्म की कमाई करे, दूसरे व्यय भी धर्मानुसार ही करे और तीसरे आवश्यकता से अतिरिक्त कमाई यथासंभव अधिक से अधिक दान में दे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१. सुख और सुविधा में अंतर होता है। सुविधा से सुख बढेगा यह आवश्यक नहीं है। जब सुविधा मानव को पंगु बना देती है, उसकी स्वाभाविक क्षमताओं को कुंठित कर देती है या स्वाभाविक क्षमताओं का क्षरण करती है तब वह दुख का कारण बनती है। इसलिये कितना सुविधाभोगी बनना यह विवेक महत्वपूर्ण है। सुविधाओं के विकास में दो बातें ध्यान में रखना चाहिये। पहली यह कि सुविधा अक्षम लोगों की मदद के लिये होती है। दूसरी बात यह है कि उससे मानव की प्राकृतिक क्षमताओं में और सामाजिकता यानी पारिवारिक भावना और व्यवहार में वृध्दि हो। कम से कम हानि तो नहीं हो।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२२. कोई भी वस्तु खरीदते समय उस वस्तु की पर्यावरण सुसंगतता, सामाजिकता से सुसंगतता, उपयोगिता, सौंदर्यबोध और सबसे अंत में उसकी कीमत को महत्व देना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२३. हर गृहस्थ को लोकहितकारी उत्पादक व्यवसाय करना चाहिये। इससे एक ओर तो वह अपनी सामजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करता है तो दूसरी ओर वह (अधम गति से विपरीत) श्रेष्ठ गति को प्राप्त कर लेता है। २४. मनुष्य के शरीर की रचना शाकाहारी प्राणि के अनुसार है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२५. हर मनुष्य शरीर, प्राण, मन, बुध्दि और चित्त का स्वामी होता है। ये पाँचों बातें हर मनुष्य की भिन्न होतीं हैं। परमात्व तत्व भी इन पाँच घटकों के माध्यम से ही अभि‘व्यक्त’ होता है। इसीलिये मनुष्य को व्यक्ति कहते हैं। और व्यक्ति के स्वभाव, क्षमताएँ, प्रभाव आदि को व्यक्तित्व कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व से संबंधित कुछ बातें निम्न हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राणिक आवेग : आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये चार प्राणिक आवेग हैं। ये मनुष्य और पशू दोनों में समान हैं। इसलिये मनुष्य भी प्राणि होता ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक व्यक्ति को सुख, दु:ख, ममता, प्रेम, आत्मीयता, तथा द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर जैसे षड्विकार यानी मन की भावनाएँ होतीं हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवश्यकताएँ और इच्छाएँ : प्राणिक आवेगों की पूर्ति को आवश्यकता और मन की चाहतों को इच्छा कहते हैं। आवश्यकताएँ मर्यादित और इच्छाएँ अमर्याद होतीं हैं। -  कर्म योनि : प्राणिक आवेगों की पूर्ति के लिये और इच्छाओं की पूर्ति के लिये जो बातें की जातीं हैं उन्हें कर्म कहते हैं। उसे प्राप्त मन और बुध्दि की श्रेष्ठता के कारण मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र होता है। यह कर्म ही मनुष्य के जीवन का नियमन करते हैं। इस नियमन को कर्म सिध्दांत के माध्यम से समझा जा सकता है। कर्मसिध्दांत की जानकारी के लिये कृपया ‘ [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|भारतीय जीवन दृष्टि और जीवन शैली]] ‘ अध्याय में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२६. समाज में व्यक्ति के दो प्रकार हैं। स्त्री और पुरूष। परमात्मा ने इन्हें जैसे ये आज हैं इसी स्वरूप में निर्माण किया था। समाज धारणा के लिये यानि समाज बना रहने के लिये के लिये स्त्री और पुरूष दोनों की आवश्यकता होती है। एक की अनुपस्थिति में समाज जी नहीं सकता। स्त्री और पुरूष एक दूसरे के पूरक होते हैं। बच्चे को जन्म देने का काम दोनों मिलकर करते हैं। अन्य एक भी ऐसा काम नहीं है जो स्त्री नहीं कर सकती या पुरूष नहीं कर सकता। किंतु इनको एक दूसरे से कई बातों में भिन्न बनाने में परमात्मा का कुछ प्रयोजन अवश्य है। इस प्रयोजन के अनुसार इनमें कार्य विभाजन होने से समाज ठीक चलता है। सुखी, समृध्द और चिरंजीवी बनता है। स्त्री-पुरूष संबंधों के विषय में थोड़ा अधिक गहराई से अब हम विचार करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== स्त्री और पुरूष संबंधी भारतीय सोच ==&lt;br /&gt;
भारतीय सोच के अनुसार स्त्री और पुरूष दोनों एकसाथ ही निर्माण हुए थे। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 3 के श्लोक 10 में कहा है &amp;lt;blockquote&amp;gt;सहयज्ञा: प्रजा सृष्ट:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रजा अर्थात् स्त्री और पुरूष साथ ही पैदा हुए थे। स्त्री और पुरूष की भिन्नता का बुध्दियुक्त सोच के आधार पर भारतीय मनीषियों ने मूल्यांकन किया है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा ने सृष्टि को एक संतुलन के साथ बनाया है। स्त्री और पुरूष दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे होते है । दोनों की पूर्ण बनने की चाह ही स्त्री और पुरूष में परस्पर आकर्षण निर्माण करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसार में प्रत्येक वस्तु के निर्माण में परमात्मा का कोई प्रयोजन होता है। स्त्री की और पुरूष की शारीरिक और मानसिक भिन्नता का भी कुछ प्रयोजन है। दोनों की भूमिकाएं भिन्न किंतु परस्पर पूरक होंगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा से ही बना होने के कारण, परमात्मपद ( पूर्णत्व ) प्राप्ति की दिशा में आगे बढना ही प्रत्येक मानव के जीवन का लक्ष्य है। लेकिन शारीरिक रचना के कारण, सुरक्षा की आवश्यकता के कारण स्त्री के पूर्णत्व की दिशा में विकास का मार्ग अधिक कठिन होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारीवारिक मामलों में स्त्री को निर्णय का अधिकार और सामाजिक मामलों में जहाँ परिवार से बाहर के वातावरण का संबंध होता है, स्त्री के लिये सुरक्षा की समस्या निर्माण हो सकती है, उस में पुरूष को निर्णय का अधिकार भारतीय परिवार और समाज व्यवस्था की विशेषता रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंदू शास्त्र बताते है: &amp;lt;blockquote&amp;gt;'आत्मवत् सर्वभूतेषू'  या 'आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् '&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - जो बात अपने लिये अयोग्य या प्रतिकूल समझते हो उसे औरों के लिये भी अयोग्य और प्रतिकूल समझो और उसे मत करो। इसी का विस्तार है ' मातृवत् परदारेषू '। अपनी बहन, बेटी, माता और पत्नि के साथ अन्य पुरूष अभद्र व्यवहार न करें, सम्मान का व्यवहार करें ऐसी यदि आप औरों से अपेक्षा करते है तो आप भी किसी अन्य की बहन, बेटी, पत्नि या माता के साथ अभद्र व्यवहार न करें, उन्हे सम्मान दें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। अपनी पत्नि को छोडकर अन्य सभी स्त्रियों के प्रति माता की भावना को सुसंस्कार कहा गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। यह भी कहा गया कि &amp;lt;blockquote&amp;gt;यत्र नार्यस्तु पुज्यंते रमंते तर देवता: &amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ : जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता रहते है अर्थात् वह समाज देवता स्वरूप बन जाता है। सुख समृध्दि से भर जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय स्त्री विषयक दृष्टि - तत्व और व्यवहार ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त स्त्री विषयक भारतीय दृष्टि से सब परिचित है। फिर प्रश्न उठता है कि वर्तमान में भारतीय समाज में स्त्री की दुरवस्था क्यों है? इस के लिये थोडा इतिहास देखना पडेगा। दो बडे कारण समझ में आते है। एक तो बौद्ध काल में महात्मा गौतम बुध्द के निर्वाण के पश्चात् कई बौद्ध विहार अनैतिकता के अड्डे बन गये थे। बौद्ध मत को राजाश्रय मिला हुआ था। यौवन में स्त्री का पुरूषों के प्रति और पुरूष का स्त्री के प्रति यौन आकर्षण अत्यंत स्वाभाविक बात है। फिर यौवन में विवेक और अनुभव भी कुछ कम ही होते है। ऐसी युवतियाँ इस स्वाभाविक आकर्षण के कारण विहारों में शरण लेतीं थीं। उन्हें वापस लाना असंभव हो जाता था। इसलिये सावधानी के तौर पर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद नहीं हुआ तो भी बहुत कम हो गया। दूसरे मुस्लिम आक्रांताओं ने जो अत्याचार स्त्रियों पर किये, स्त्रियों को जबरन उठाकर अरब देशों में बेचा इस से आतंकित होकर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद हो गया। स्त्री शिक्षा के मामले में और इसलिये अन्य सभी मामलों में भी बहुत पिछड गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वाधीनता के पश्चात यह अपेक्षा थी कि शिक्षा राष्ट्रीय बनेगी, भारतीय बनेगी, सेमेटिक मजहबों के प्रभाव से बाहर निकलेगी । दो तीन पीढ़ियों में स्त्री को योग्य स्थान दिलाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान में भारतीय स्त्री, जिस में अभी कुछ भारतीयता शेष है, वह बहुत संभ्रम में है। उस के विरासत में मिले संस्कार उस की शिक्षा से मेल नहीं खाते। वर्तमान शिक्षा की झंझा उसे पश्चिमी रहन सहन की ओर घसीटती रहती है। जो पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित है ऐसी स्त्रियाँ भी अपेक्षा तो यह करतीं है कि हर अन्य पुरूष उन की ओर ध्यान अवश्य दे किन्तु उनकी तय की हुई मर्यादा को नहीं लांघे। उन से आदर से व्यवहार करे। किन्तु इस के लिये वह अपने बच्चों पर ऐसे संस्कार करने के लिये न तो तैयार है और न ही सक्षम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समाज में कामों का वर्गीकरण ==&lt;br /&gt;
पारिवारिक और सामाजिक काम निम्न है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारिवारिक काम वे है जो केवल परिवार में किये जाते है, और सामाजिक काम वे है जो समाज ( परिवार भी समाज का ही हिस्सा होता है ) में किये जाते है। कुछ प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१.  प्रजा का निर्माण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२.  संस्कार और शिक्षा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३.  सामाजिक व्यवस्थाओं को चलाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४.  जीने के लिये या मनोरंजन के लिये आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन में प्रजा का निर्माण यह तो शुध्द पारिवारिक काम है। इस से आगे पाँच वर्ष तक की शिक्षा का अर्थात् इंद्रिय, मन और संस्कारों की शिक्षा का काम भी मोटे तौर पर परिवार में ही होता है। इस के बाद जब बालक विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तब वह जिम्मेदारी समाज की होती है।  जीवन की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भिन्न भिन्न प्रकार के उद्योग चलाये जाते है। यह सामाजिक प्रयासों का ही क्षेत्र होता है। समाज ठीक चले इस दृष्टि से विभिन्न व्यवस्थाओं का निर्माण भी किया जाता है। जैसे सडक बनाना, कुए बनाना, धर्मशालाएं बनाना, मंदिर बनाना, विद्यालय बनाना आदि। यह व्यवस्थाएं अच्छीं चलें इस के लिये भी ध्यान देना पडता है। सामाजिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक कार्यों की सूची में आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुरूष और स्त्री की विशेषताएं ==&lt;br /&gt;
पुरूष और स्त्री को परमात्मा ने मूलत: ही भिन्न बनाया है। फिर भी यदि ठीक से देखा जाये तो बच्चे को जन्म देना, जो दोनों का साझा काम है, उसे छोडकर दूसरा ऐसा कोई भी काम नहीं है जो स्त्री या पुरूष नहीं कर सकता। किंतु केवल ' कर सकना ' के आधार पर स्त्री और पुरूष दोनों जो काम वर्तमान में स्त्रियाँ करतीं है वही करने लग जाएं तो जीना हराम हो जाएगा। इसीलिये सामान्यत: विभिन्न कामों का स्त्री सुलभ और पुरूष सुलभ कामों में बँटवारा किया जाता है और स्त्री के काम कौन से है और पुरूष के कौन से है यह निश्चय किया जाता है। वैसे तो कई काम ऐसे है जो सीमा रेखा पर होते है। जो स्त्री भी और पुरूष भी सहजता से कर सकते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री में इस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन नाम के लैंगिक अंत:स्त्राव (हार्मोन) होते है। इन के कारण स्त्री के शरीर और अवयवों की रचना भिन्न और कोमल बनती है। पुरूष में ऍंड्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन नाम के स्त्राव (हार्मोन) होते है। इन के कारण पुरूष के शरीर और अवयवों की रचना भिन्न और मजबूत बनती है। वैसे तो स्त्री और पुरूष दोनों में इस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन दोनों हार्मोन होते ही है। लेकिन पुरूष में टेस्टोस्टेरॉन का प्रमाण स्त्री से १५ से २० गुना अधिक होता है। इसी प्रकार से स्त्री के शरीर में २६ प्रतिशत चरबी (फॅट्) और २० प्रतिशत प्रथिन (प्रोटीन) होते है तो पुरूष के शरीर में १५ प्रतिशत चरबी और ४५ प्रतिशत प्रथिन होते है। इन्हीं घटकों के कारण स्त्री और पुरूष में शारीरिक और मानसिक भिन्नता होती है। स्त्री में स्त्रीत्व और पुरूष में पुरूषत्व होता है। स्त्री का स्त्रीत्व और पुरूष का पुरूषत्व तीव्र होने से संतति अधिक तेजस्वी और ओजस्वी बनती है। सामाजिक संस्कारों के माध्यम से स्त्री के स्त्रीत्व को और पुरूष के पुरूषत्व को अधिक तीव्र बनाया जा सकता है। अधिजनन शास्त्र के माध्यम से भारतीय परंपराओं में ऐसा बनाया जाता रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री का स्वभाव भावना प्रधान होता है तो पुरूष का स्वभाव वस्तुनिष्ठ और तर्कनिष्ठ होता है। दिशा, गणित, विज्ञान, समय आदि विश्लेषण और संश्लेषण के विषय पुरूष के लिये अधिक सरल होते है। स्त्री के लिये कला, कौशल, कोमलता से करने के विषय सरल होते है। स्त्री की त्वचा भी पुरूष की त्वचा से महीन और इसलिये अधिक संवेदनशील होती है। स्पर्श ही नही तो स्पर्श के पीछे छुपी इच्छाओं को भी समझने की सामर्थ्य स्त्री में होती है। स्त्री में संवाद कुशलता अधिक अच्छी होती है। अन्यों के भाव स्त्री आसानी से समझ जाती है। पुरूष को उस के लिये प्रयास करने पडते है। पुरूष मेहनत के काम दीर्घ काल तक कर सकता है। स्त्री, उस के स्नायू कोमल होने के कारण शारीरिक दृष्टि से अधिक सहनशील होती है जब की पुरूष मानसिक आघातों को अधिक अच्छी तरह सहन कर लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-१३ वर्ष की अर्थात् माहवारी शुरू होने की आयु में स्त्री के शरीर में इस्ट्रोजन का प्रमाण और इस कारण प्रभाव बढ जाता है। यह स्त्री में लैंगिक आकर्षण निर्माण करता है। माहवारी के काल में स्त्री के अंत:स्त्रावों के असंतुलन के कारण स्त्री का स्वभाव चिडचिडा बन जाता है। पुरूषों में यह आयु १५-१६ वर्ष की होती है। इस आयु में पुरूषों में टेस्टोस्टेरॉन का प्रमाण बढता है। उस के स्नायू कठोर बनने लगते है। वह मदमस्त बन किसी को टकराने की इच्छा करने लगता है। आजकल लैंगिक  स्वैराचार और खुलापन बढ़ने से यह आयु कम हो रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्भ धारणा से लेकर संतान के पाँच वर्ष का होने तक के लिये स्त्री को किसी अन्य की मदद की आवश्यकता होती है। स्त्री में काम वासना से वात्सल्य की भावना अधिक प्रबल होती है। इसीलिये कहा गया है कि स्त्री क्षण काल की पत्नि और अनंत काल की माता होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री का स्वभाव बचत का होता है। उस के लिये प्रतिष्ठा से बचत का मूल्य अधिक होता है। इस लिये वह नि:संकोच होकर बीच बाजार में भी रुपये दो रुपयों के लिये भाव ताव करती दिखाई देती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री को अंतर्मुख होना कठिन होता है। त्रयस्थ वृत्ति से वह अपने व्यवहार का विश्लेषण नहीं कर सकती। स्त्री शारीरिक दृष्टि से पुरूष से दुर्बल तो होती ही है, गर्भावस्था में वह और भी परावलंबी बन जाती है। &lt;br /&gt;
इस दुर्बलता के कारण ही मनु ने कहा है&amp;lt;blockquote&amp;gt;पिता रक्षति कौमार्ये, भर्ता रक्षति यौवने, स्थवीरे रक्षति पुत्र:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् कौमार्यावस्था में स्त्री को पिता का यौवन में पति का और वार्धक्य में पुत्र का संरक्षण मिलना आवश्यक होता है। इस से उस स्त्री का और समाज का भी भला होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सब विश्लेषण का हेतु पुरूष और स्त्री में परमात्मा प्रदत्त अंतर होता है यह बताने का है। इस अंतर के कारण स्त्रियों के और पुरूषों के बल स्थान और दुर्बल स्थान भिन्न होते है, यह बताने का है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपसंहार ==&lt;br /&gt;
मनुष्य एक स्खलनशील जीव है। स्खलन यह प्रकृति का नियम है। जैसे पानी हमेशा नीचे की ओर प्रवाहित होता है उसी तरह मनुष्य की प्रेरणाएँ भी उसे स्वभावत: निन्म स्तर की दिशा में आगे बढातीं हैं। इस कारण मानव व्यवस्थाओं को और संस्कारों को बिगाडता रहता है। मानव जीवन और समाज जीवन सुचारू रूप से चलने के लिये मानव को तीव्र संस्कारों और शिक्षा की तथा दंण्ड व्यवस्था की आवश्यकता होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानव जीवन को मोक्षगामी बनाने का साधन धर्म है। अपनी इच्छाओं (काम) को और उन इच्छाओं की पूर्ति के लिये किये गये प्रयासों तथा उपयोग में लाए गये धन, साधन और संसाधनों (तीनों मिलाकर अर्थ) को धर्मानुकूल रखने से मनुष्य मोक्षगामी बनता है। इसलिये काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखने की शिक्षा ही वास्तव में शिक्षा होती है। जो मोक्षगामी नहीं बनना चाहते उन के लिये भी काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखना उतना ही आवश्यक और महत्वपूर्ण है जितना मोक्षगामी लोगों के लिये। काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखने से ही समाज सुखी, समृध्द और सुसंस्कृत बनता है। जब मानव के व्यवहारों को यानि इच्छाओं की पूर्ति के प्रयासों को धर्म के दायरे में रखा जाता है तब 'सर्वे भवन्तु सुखिन: की प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मनुष्य पैदा होता है उस समय उसके कोई कर्तव्य नहीं होते। केवल अधिकार ही होते हैं। ऐसे केवल अधिकार लेकर जिन्होंने जन्म लिया है उन बच्चों को अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिये जीनेवाले मनुष्य नहीं बनाया गया तो मानव का समाज जीवन नरक बन जाएगा। उसे कर्तव्यों के लिए जीनेवाला मनुष्य बनाना यह परिवार का काम है। और ऐसा विकास ही व्यक्ति का विकास है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१. शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, लेखक सुश्री इंदुमती काटदरे, पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन (प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<title>Vyaktitva (व्यक्तित्व)</title>
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		<updated>2018-11-09T12:08:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: /* मानव के व्यक्तित्व से संबंधित महत्वपूर्ण बातें */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;भारत में शिक्षा का लक्ष्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है ऐसा कुछ लोग मानते हैं तो कुछ लोग समग्र विकास को मानते हैं। यूरो अमरीकी सोच के अनुसार सोचनेवाले ‘ओल राऊंड डेव्हलपमेंट ऑफ पर्सनालिटी’ को शिक्षा का लक्ष्य मानते हैं। किन्तु ‘सर्वांगीण’, ‘समग्र’ और ओल राऊंड इन के अर्थों में बहुत अंतर है। ‘समग्र” के अर्थ सर्वांगीण से भी अधिक व्यापक और सटीक हैं। अंग्रेजी में जिसे पर्सनॅलिटी कहते है वह और भारतीय व्यक्तित्व की संकल्पना यह भिन्न बातें  है । पर्सनॅलिटी शब्द लॅटीन शब्द ‘पर्सोना’ से बना है । पर्सोना का अर्थ है मुखौटा। अर्थात् मनुष्य का वास्तविक स्वरूप नहीं। मनुष्य ने धारण किया मुखौटा। याने बाहर से दिखनेवाला रूप । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व और पर्सनालिटी में ‘होना’ और ‘बनाया’ जाना का अंतर है। इनमें होना स्वाभाविक होता है। बनाना कृत्रिम होता है। स्वाभाविक का अर्थ है जो स्वभाव के अनुकूल है। भारतीय या हिन्दू जन्म से ही होता है। जैसे बाप्तिस्मा से ईसाई बनता है, सुन्नत से मुसलमान बनता है, भारतीय या हिन्दू बनने के लिए इन जैसी कोई विधि नहीं होती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वांगीण विकास को जो लोग लक्ष्य मानते हैं उनके अनुसार अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय ऐसे पाँच कोशों का विकास ही मनुष्य का विकास होता है। समग्र विकास की व्याप्ति इससे अधिक है। उसका विचार हम आगे करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे पंचमहाभौतिक शरीर में से हम में विद्यमान उस परमात्म तत्व की जो सहज अभिव्यक्ति होती है उसे भारतीय सोच में व्यक्तित्व कहते है । यह मुखौटे जैसी कृत्रिम नहीं होती । और ना ही किसी को बताने के लिये धारण की हुई होती है। इसलिये हम ऑल राऊंड पर्सनॅलिटी डेव्हलपमेंट का विचार नहीं करेंगे । हम विचार करेंगे अष्टधा प्रकृति के सभी अंगों के सर्वांगीण विकास से भी अधिक व्यापक ऐसे व्यक्तित्व के समग्र विकास का। लेकिन उससे पहले व्यक्तित्व क्या है इसे समझना आवश्यक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तित्व का अर्थ ==&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व एक बहुत व्यापक अर्थवाला शब्द है। संसार में अनगिनत अस्तित्व हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ७ में कहा है:  &amp;lt;blockquote&amp;gt;भूमिराप: अनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अपरेयमितस्त्वन्याम् प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्  ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आगे और कहा है  &amp;lt;blockquote&amp;gt;एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा ।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थ : यह सब परमात्मा के ही भिन्न भिन्न रूप हैं। ये दो तत्वों से बनें हैं। एक है भूमि, आप, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे आठ घटकों की अचेतन याने अपरा प्रकृति। और दूसरी है जीवरूप परा प्रकृति याने जीवात्मा। परा और अपरा दोनों ही परमात्मा के ही अंशों से बनें हैं। संसार में जितने भी भूतमात्र हैं वे सब मेरी इन दो प्रकृतियों से ही बनें हैं। मैं ही संसार की उत्पत्ति और प्रलय का मूल कारण हूँ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सभी अस्तित्वों की भिन्नता उनमें उपस्थित अष्टधा प्रकृति के आठों घटकों के अनगिनत भिन्न भिन्न प्रमाणों में संयोग (कोंबिनेशन) के कारण है। परमात्मा की अष्टधा प्रकृति के जिस संयोग-विशेष के साथ परमात्मा का अंश याने परा प्रकृति याने आत्मतत्व जुड़ता है उन्हें जीव कहते हैं, और परमात्मा के उस अंश को उस जीव का जीवात्मा। परमात्मा का अंश अस्तित्व में से अपने को अभिव्यक्त करता है, अपने गुण-लक्षण प्रकट करता है इसलिये उसे ‘व्यक्ति’ कहा जाता है। हर अस्तित्व की अभिव्यक्ति अष्टधा प्रकृति के भिन्न मेल-विशेष के कारण अन्य अस्तित्वों से भिन्न होती है। इसे ही उस अस्तित्व का ‘व्यक्तित्व‘ कहा जाता है। मनुष्य के संबंध में जब इस शब्द का प्रयोग किया जाता है तब व्यक्तित्व से तात्पर्य है उस मनुष्य की अष्टधा प्रकृतिके मेल-विशेष के कारण होनेवाली जीवात्मा की अभिव्यक्ति।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्यक्तित्व का समग्र विकास ही पूर्णत्व ==&lt;br /&gt;
स्वामी विवेकानंदजी ने शिक्षा की व्याख्या की है। वे बताते हैं – ‘मनुष्य में पहले से ही विद्यमान ‘पूर्णत्व’ के प्रकटीकरण को ही शिक्षा कहते हैं।’ इस पूर्णत्व शब्द को ठीक समझना होगा। पूर्णत्व का अर्थ है हर बात में पूर्णत्व। यह तो केवल परमात्मा में ही होता है। अन्य किसी में नहीं। स्वामीजी के कथन का अर्थ है की परमात्मपद प्राप्ति ही शिक्षा का लक्ष्य है। यही तो भारत की सहस्रकों से चली आ रही मान्यता है।   &amp;lt;blockquote&amp;gt;सा विद्या या विमुक्तये &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्थात जो मुक्ति दिलाए, मोक्ष की प्राप्ति जिससे हो, जिससे प्रमात्मपद प्राप्त हो वही शिक्षा है।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;एकात्म मानव दर्शन में इसी समग्र विकास की व्याख्या पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी ने सरल शब्दों में प्रस्तुत की। वे बताते हैं कि व्यक्तित्व का समग्र विकास उसके शरीर, मन, बुद्धि इन अंगों के विकास के साथ ही समष्टीगत और सृष्टिगत विकास होने से होता है। मनुष्य समाज और सृष्टि के बिना जी नहीं सकता। इन दोनों के साथ समायोजन अनिवार्य है। इसलिए इन के साथ समायोजन आवश्यक है।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह समायोजन भी दो प्रकार से होता है। एक होता है अपने स्वार्थ के लिए और दूसरा होता है इन के साथ अपना संबंध आत्मीयता का है ऐसा मानने से। चिरकाल से मनुष्य के सभी सामाजिक और सृष्टिगत संबंधों के पीछे ‘स्वार्थ’ और ‘आत्मीयता’ यही दो कारण रहे हैं। इन संबंधों का आधार स्वार्थ है ऐसा माननेवाले लोगों को ‘असुर’ स्वभाव और संबंधों का आधार आत्मीयता है ऐसा माननेवालों को ‘सुर’ स्वभाव कहा गया है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत हमेशा से ही सुर स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता रहा है। समग्र विकास की संकल्पना में अन्नमय से लेकर आनंदमय के विकास को ‘व्यक्तिगत’ विकास कहा जाता है। इससे आगे जब उस व्यक्ति को समाज के बारे में आत्मीयता का अनुभव होता है। तब इसे '''समष्टीगत विकास''' कहते हैं। जैसे बालक माता के साथ परिवार के सदस्यों के साथ जब आत्मीयता का व्यवहार करने लगता है, उसमें कुटुंब भावना का विकास होता है तो यह उस बालक के समष्टीगत विकास है। '''समूचे मानव समाज के साथ जब मनुष्य आत्मीयता अनुभव करता है तब समष्टीगत विकास पूरा होता है'''।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी तरह सृष्टि के मानवेतर सभी अस्तित्वों के साथ जब वह आत्मीयता या परिवार भावना अनुभव करता है तो उसका '''सृष्टिगत विकास''' होता है। व्यक्तिगत, समष्टीगत और सृष्टिगत ऐसे तीनों प्रकार के विकास के समुच्चय को ही ‘समग्र विकास’ कहते हैं। ऐसे समग्र विकसित मनुष्य को संसार में उपस्थित सभी अस्तित्वों के साथ आत्मीयता की अनुभूति होती है। ये सभी अस्तित्व परमात्मा के ही रूप होने से इन के साथ जो एकात्मता अनुभव करता है उसमें और परमात्मा में कोई अंतर नहीं रह जाता। यही मोक्ष की अवस्था है। यही मुक्ति है। यही पूर्णत्व की प्राप्ति है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय सोच के अनुसार व्यक्तित्व विकास के चार आयाम है । वे है व्यक्तिगत् विकास, समष्टिगत् विकास, सृष्टिगत् विकास और परमेष्ठीगत् विकास। पहले तीन के विकास से चौथे का विकास अपने आप हो जाता है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्यक्तिगत् विकास''' से अर्थ है, शरीर, प्राण, मन, बुध्दि, चित्त इन पाँच घटकों का विकास । ये पाँच घटक हर व्यक्ति के भिन्न होते है । इन्ही पाँच बातों को पंचकोश विकास भी कहा जाता है । शरीर अर्थात् अन्नमय कोश, प्राण अर्थात् प्राणमय कोष, मन अर्थात् मनोमय कोश, बुद्धि याने विज्ञानमय कोश और चित्त अर्थात् आनंदमय कोश का विकास । शरीर एक यंत्र जैसा है । पंच कर्मेन्द्रिय और पंच ज्ञानेन्द्रिय तथा शरीर मे काम करनेवाली चेतातंत्र, रक्ताभिसरण, पाचनतंत्र आदि विभिन्न प्रणालियाँ प्राण शक्ति के कारण चलती है । प्राण इस शरीर रूपी यंत्र को चलानेवाला इंधन है । प्राण शरीर और इंन्द्रियों से अधिक सूक्ष्म है । इसलिये अधिक बलवान है । तीसरा घटक है  मन । मनोमय का संबंध मन से होता है । मन के विकास का अर्थ है चंचलता मुक्त, स्थिर, एकाग्र, अलिप्त, निर्द्वंद्व, और विकार रहित मन । इंन्द्रियोंपर नियंत्रण करने वाले और बुध्दि के नियंत्रण में रहने वाला मन । ग्रहणशक्ति, धारणाशक्ति, स्मृति, निरीक्षण, परीक्षण, तर्क, अन्मान, विश्लेषण, संश्लेषण  और कल्पनाशक्ति का विकास ही बुध्दि का विकास होता है ।   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनंदमय कोश के विकास का अर्थ है, चित्त का विकास । अपने शरीर में स्थित उस परमात्वतत्व को जैसा वह है वैसा ही जानने की क्षमता, सहजता, स्वतंत्रता, सौंदर्यबोध यह चित्त के विकास के लक्षण है ।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्य और समाज  - इन का परस्पर संबंध अन्योन्याश्रित है । समाज के बिना मनुष्य जी नही सकता । इस समाज के संबंध में आत्मीयता की, एकात्मता की भावना का विकास ही समष्टिगत् विकास कहलाता है । समाज के हर घटक के दुख में दुख की अनुभूति होना इसका लक्षण है । इसी तरह मनुष्य और समाज सृष्टि के बिना जीवित नही रह सकते। इस चराचर सृष्टि के साथ आत्मीयता की, एकात्मता की भावना का विकास ही सृष्टिगत् विकास है । उपर्युक्त तीनों प्रकार से विकास होने से परमेष्ठिगत् विकास अपने आप हो जाता है ।   &amp;lt;blockquote&amp;gt;अहं ब्रह्मास्मि&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;तत् त्वं असि &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;सर्वं खल्विदं ब्रह्मं&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् मैं ही वह परमात्मतत्व हूं, तुम भी वह परमात्वत्व ही हो और चराचर में वह परमात्मतत्व ही व्याप्त है इस की अनुभूति होना ही परमेष्ठिगत् विकास है । यही पूर्णत्व है । यही मोक्ष है । यही नर का नारायण बनाना है। यही अहंकार विजय है। यही मानव जीवन का लक्ष्य है ।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मानव जीवन का लक्ष्य ==&lt;br /&gt;
अभारतीय और भारतीय विचार प्रवाह में सबसे पहला अंतर है मानव जीवन के लक्ष्य का । विश्व में यहूदी, ईसाई, मुसलमान समाजों की जनसंख्या विशाल और लक्षणीय है। इन सभी का लक्ष्य हेवन या जन्नत माना गया है। हेवन या जन्नत यह संकल्पनाएं मोक्ष से एकदम भिन्न हैं। मोक्ष का अर्थ है परमात्मपद की प्राप्ति । अर्थात् सुख और दुख की सीमा से परे चले जाना । सर्वं खल्विदं ब्रह्मं अर्थात् चराचर में एकत्व की या एक ही आत्मतत्व की अनूभूति करना । कई लोग ईसाई सॅल्व्हेशन या इस्लामी कयामत (आखिरत) की तुलना मोक्ष से करते हैं। किन्तु यह गलत है। यह दोनों पूर्णत: भिन्न बातें हैं।                                                                                            &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सॅल्व्हेशन या आखिरत यह तो हेवन और जन्नत तथा हेल और दोजख की संकल्पनाओं से जुडी संकल्पनाएं ही हैं। भारतीय विचार में स्वर्ग और नरक की संकल्पनाएं भी हेवन और जन्नत और हेल और दोजख की संकल्पनाओं से भिन्न है। ईसाईयत की सॅल्व्हेशन और इस्लाम की कयामत (आखिरत) की कल्पना और मोक्ष में कोई साम्य नहीं है। अभारतीय (ईसाई और इस्लाम की) मान्यता है कि मनुष्य मरने के बाद अपनी दफनभूमि में पडा रहता है। डे ऑफ सॅल्व्हेशन या कयामत के दिन को गॉड या अल्लाह अपने प्रेषित के माध्यम से सब को उठाते हैं। प्रेषित के कहे अनुसार जिसने ईसाईयत पर श्रध्दा रखी थी उसे गॉड हमेशा के लिये स्वर्ग भेज देता है। और जिन्होंने गॉड पर श्रध्दा नहीं रखी थी उन सबको हेल में भेज देता है। इसी प्रकार से प्रेषित के कहने से अल्लाहताला प्रत्येक मनुष्य की रूह का क्या होगा यह निर्णय करता है। जिसने अल्लाहताला में निष्ठा रखी थी उन सब को हमेशा के लिये जन्नत में भेज देता है। और जिसने अल्लताला पर निष्ठा नहीं रखी थी उन सब को हमेशा के लिये दोजख में भेज देता है। वास्तव में इन दोनों मजहबों की प्रक्रिया में गॉड या अल्लाहताला तो बस नाममात्र हैं। सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी तो उनके प्रेषित ही हैं गॉड और अल्लाहताला का काम तो बस अपने प्रेषित द्वारा बताये अनुसार लोगों को हेवन और हेल या जन्नत और दोजख में भेजने का ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय स्वर्ग और नरक की कल्पना भी इन से पूर्णत: भिन्न है। स्वर्ग या नरक की प्राप्ति में परमात्मा सीधा न्याय करता है। उसे किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं होती। वह सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी होने से वह प्रत्येक द्वारा किये सत्कर्म और दुष्कर्म जानता है। प्रत्येक मनुष्य द्वारा किये इन सत्कर्मों के अनुसार ही परमात्मा उस के लिये स्वर्ग सुख या नरक यातनाओं की व्यवस्था करता है। जैसे ही स्वर्ग सुख या नरक यातनाओं के भोग पूरे हो जाते हैं, मनुष्य स्वर्ग सुख से वंचित और नरक यातनाओं से मुक्त हो जाता है। यह भोग हर मनुष्य अपने वर्तमान जन्म में और आगामी जन्मों में प्राप्त करता है। भारतीय सोच में तो सीधा सीधा गणित है। जितना सत्कर्म उतना सुख जितना दुष्कर्म उतना दु:ख। अभारतीय समाजों में सत्कर्म और दुष्कर्म की कोई संकल्पना ही नहीं है। हेवन या जन्नत का अर्थ है सदैव सुखी रहने की स्थिति और हेल और दोजख का अर्थ है हमेशा दुखी रहने की स्थिति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभारतीय समाज तो मोक्ष की कल्पना तक नहीं कर सके हैं। भारतीय मोक्ष की कल्पना भारतीय सोच को आध्यात्मिक बना देती है। '''देहभाव से मुक्ति ही मोक्ष है'''। जीवात्मा जब देह-भाव से ग्रस्त होता है तब उसमें करता भाव, भोक्ता भाव और ज्ञाताभाव आ जाते हैं। इन के अभाव में जीवात्मा अपने देहभाव से मुक्त हो जाता है। फिर उसमें और परमात्मा में अंतर नहीं रहा जाता। अधि का अर्थ है श्रेष्ठ या उत्तम। श्रीमदभगवदगीता १५ वें अध्याय के १७ में परमात्मा को उत्तम पुरूष कहा है। अर्थात् अधि-आत्मा ही परमात्मा होता है। देहभाव से मुक्त होकर परमात्मा से तादात्म्य की दिशा में बढ़ना ही जीवन है। ऐसी भारतीय मान्यता के कारण सम्पूर्ण जीवन और जीवन का हर पहलू अध्यात्म से ओतप्रोत होता है।  भारतीय समाज ने अपने सम्मुख व्यक्तिगत, सामाजिक और सृष्टिगत ऐसे तीन प्रकार के एक दूसरे से सुसंगत ऐसे लक्ष्य रखे हैं। लक्ष्य का निर्धारण करते समय वे ‘स्वभावज’ हों इसका ध्यान रखा गया है। व्यक्तिगत स्तर का लक्ष्य और सामाजिक स्तर का लक्ष्य परस्पर पूरक और पोषक होना आवश्यक है। इसी तरह सृष्टिगत लक्ष्य, व्यक्तिगत और समष्टिगत लक्ष्य ये तीनों परस्पर पूरक पोषक होना आवश्यक हैं।  व्यक्तिगत स्तर का लक्ष्य मोक्ष या त्रिवर्ग के माध्यम से अभ्युदय है। यह सामाजिक लक्ष्य स्वतंत्रता को बाधक नहीं होना चाहिये। इसीलिये हमारे पूर्वजों ने कहा है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;आत्मनो मोक्षार्थं जगत् हिताय च।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;मुझे मोक्ष मिले लेकिन जगत् का हित करते हुए मिले। और त्रिवर्ग में तो मूलत: धर्म का ही अधिष्ठान है और धर्माचरण सृष्टिगत लक्ष्य है। तीनों स्तरों के लक्ष्यों का नियामक धर्म ही है। इसलिये तीनों स्तरों के लक्ष्य परस्पर पूरक और पोषक बनें रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मानव के व्यक्तित्व से संबंधित महत्वपूर्ण बातें ==&lt;br /&gt;
# मानव यह परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना है। सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। परमात्मा की सभी शक्तियाँ मनुष्य के पास विद्यमान होतीं हैं। केवल मात्रा का अंतर होता है। मानव की शक्तियाँ मर्यादित हैं। परमात्मा की अमर्याद हैं। किंतु भारतीय मान्यता और इतिहास के अनुसार नर करनी करे तो नारायण तक विकास कर सकता है। &lt;br /&gt;
# मानव जीवन का नियमन उसके कर्म ही करते हैं। भारतीय मान्यता है कि जीवों की ८४ लक्ष योनियाँ हैं। इनमें केवल मानव योनि ही कर्मयोनि है। अन्य सभी प्राणियों की योनियाँ भोग योनियाँ हैं। प्राणि उन्हें कहते हैं जो प्राण के यानि आहार, निद्रा, भय और मैथुन इन प्राणिक आवेगों के स्तरपर जीते हैं। इन अर्थों में मानव एक प्राणि भी है।  जन्म से तो मानव भी अन्य प्राणियों जैसा प्राण के स्तर पर जीनेवाला जीव ही होता है। संस्कार और शिक्षा से वह मन के स्तर पर जीने लगता है। &lt;br /&gt;
'''मन के स्तर पर जीनेवाले को मानव कहते हैं'''। बुध्दि के स्तर पर जीनेवाले को महामानव और चित्त या आत्मिक स्तर पर जीनेवाले को और भी अधिक श्रेष्ठ मानव या नरोत्तम कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानवेतर योनियों के प्राणियों को अपने स्वाभाविक प्राणिक आवेगों के अनुसार चलने मात्र की बुध्दि और मन मिला है। इसलिये सामान्यत: ये प्राणि स्वतंत्र कर्म नहीं कर सकते। केवल मानव को विशेष मन, बुध्दि, स्मृति आदि मिले हैं इस कारण वह अन्य प्राणियों से भिन्न, प्राणिक आवेगों से भिन्न और प्राणिक आवेगों के विपरीत भी कर्म करने की स्वतंत्रता ले सकता है। मानव व्यवहार की इस स्वतंत्रता का नियमन उस के कर्मों से होता है। यह नियमन कर्मसिध्दांत के आधार पर होता है। कर्मसिध्दांत की अधिक जानकारी के लिये ‘[[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|जीवनशैली के सूत्र]]‘ अध्याय में देखें। ऋणसिद्धांत का आधार भी कर्मसिद्धांत ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३. सृष्टि में मानव निर्माण तो सब से अंत में हुआ था। उससे पहले सृष्टि थी। सृष्टि के विलय की प्रक्रिया में भी मानव जाति नष्ट होने के उपरांत भी सृष्टि होगी।  सृष्टि को मानव की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मानव सृष्टि के बगैर जी नहीं सकता। इसलिये मानव के लिये यह अनिवार्य है कि वह सृष्टि के साथ अपने को समायोजित करे। अपने सभी व्यवहार प्रकृति सुसंगत रखे। प्रकृति का संतुलन नहीं बिगाडे। सृष्टि चक्र को अबाधित रखे। वैसे भी सृष्टि या प्रकृति के साथ जब मानव खिलवाड़ करता है, एक सीमा तक तो प्रकृति उसे सहन कर लेती है। इस सीमा को लाँघने के बाद प्रकृति भी उसकी प्रतिक्रया देती है। इस प्रतिक्रया से मानव का ही नुकसान होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४.  श्रेष्ठता के साथ दायित्व आता है। दायित्व बोध आना चाहिये। मानव को जो श्रेष्ठता परमात्मा से मिली है उस के कारण मानव का यह दायित्व बनता है कि वह विवेक से काम ले। प्रकृति नहीं बिगाडे। जीवश्रृंखला को नहीं तोडे। प्रकृति के साथ खिलवाड नहीं करे। दुर्बलों की सहायता करे। मानव को मिली श्रेष्ठ स्मृति के कारण ‘कृतज्ञता’, उपकार से उतराई होना यह मानव का अनिवार्य लक्षण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५.  भारतीय दृष्टि से मानव जीवन का लक्ष्य मोक्षप्राप्ति या मुक्ति है। व्यक्तिगत से ऊपर परमेष्ठीगत विकास है। इसी तरह मानव का सामाजिक स्तर पर लक्ष्य ‘स्वतंत्रता’ है। और सृष्टि के स्तरपर ‘धर्माचरण’ है। सृष्टि के नियमों के अनुकूल व्यवहार भी धर्म ही होता है। स्वतंत्रता का अर्थ स्वैराचार नहीं होता। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारियाँ आतीं हैं। दायित्व आते हैं। धर्म के विषय में अधिक जानकारी के लिये अध्याय ३ ‘[[Dharma: Bhartiya Jeevan Drishti (धर्म:भारतीय जीवन दृष्टि)|धर्म]]’ में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६.  मानव सदैव सुख की खोज करता रहता है। मानव के सारे प्रयास मूलत: सुखप्राप्ति के लिये होते हैं। सुख का अर्थ अनुकूल संवेदना है। सुख प्राप्ति के लिये निम्न बातें अनिवार्य होती हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- सुसाध्य आजीविका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- स्वतंत्रता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- शांति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- पौरुष&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन चारों बातों का समष्टीगत होना व्यक्ति के सुख के लिये आवश्यक है। जितने प्रमाण में ये समष्टिगत होंगी उतने प्रमाण में ही व्यक्ति को भी सुख मिल सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुख के भी भिन्न भिन्न प्रकार होते हैं। '''दैवी, मानवी और पाशवी'''। दैवी सुख आत्मिक सुख को कहते हैं। इस में ममता, सहानुभूति, आत्मीयता, परोपकार, प्रेम आदि के कारण मिले सुखों का समावेश होता है। मानवी सुख मन का सुख होता है। यह मन को प्रसन्न करनेवाला सुख होता है। पाशवी सुख में शरीर और इंद्रियों का सुख आता है। यह स्तर प्राणिक आवेगों में अनुकूल अनुभवों का स्तर है। सुख के भिन्न भिन्न स्तर भी होते हैं। इंद्रिय सुख का स्तर सबसे नीचे होता है। मन का सुख उससे ऊपर, बुध्दि का सुख उससे ऊपर, चित्त का सुख या आनंद उससे ऊपर और परमानंद का या परम कल्याण का सुख (आत्मीय) सब से ऊपर होता है। इस परम सुख का नाम ही मोक्ष है। आत्मिक सुख की प्राप्ति के लिये अन्य तीनों के न्यूनतम सुख की प्राप्ति की आवश्यकता होती है। यह मन-बुध्दि में स्थापित करने के लिये ही धर्मशिक्षा की व्यवस्था की जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७.  मानवेतर प्राणियों में नवजात बच्चे बहुत शीघ्र स्वावलंबी बन जाते हैं। मानव में व्यक्तित्व विकास यह लंबी चलनेवाली प्रक्रिया होती है। इसलिये मानव परिवार की रचना और पशूओं के परिवार की रचना में और प्रवर्तन में अंतर होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८.  मानव का व्यक्तित्व पाँच पहलुओं से बना है। तैत्तिरीय उपनिषद् में इन्हें पञ्चविध पुरूष कहा है। आदि जगदगुरु शंकराचार्य इन पहलुओं को पंचकोश कहते हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय - ऐसे उन पञ्चविध पुरूषों के या पाँच कोशों के नाम हैं। सामान्य लोगों की भाषा में इन्हें शरीर (इंद्रियाँ), प्राण, मन, बुध्दि और चित्त कहा जा सकता है। जन्म के समय इन सभी का स्वरूप अविकसित होता है। ये सब बातें वैसे तो हर प्राणि के पास भी होतीं ही हैं। किंतु मानवेतर प्राणियों में मन, बुध्दि और चित्त या तो अक्रिय होते हैं या अत्यंत निम्न स्तर के होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हर मानव के पंचकोशीय स्वरूप में से स्वयं परमात्मा अभिव्यक्त होता है इसीलिये मानव को व्यक्ति कहते हैं। इन कोशों के साथ तादात्म्य हो जाने से उस व्यक्ति में उपस्थित आत्म तत्व अपने को व्यक्ति मानने लग जाता है। जब मानव इन पंचकोशों के परे जाता है तब ही उस का साक्षात्कार परमात्मा से होता है। हर मानव का व्यक्तित्व अन्य मानवों से भिन्न होता है। इसलिये उसके विकास का रास्ता भी अन्यों से भिन्न होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९.  मानव व्यक्तित्व के पहलुओं का विकास भी एकसाथ नहीं होता। गर्भधारणा के बाद सर्वप्रथम चित्त सक्रिय होता है। इस काल में गर्भ अपनी माँ से भी कहीं अधिक संवेदनशील होता है। अब तक इंद्रियों का विकास नहीं होने से शब्द, स्पर्श, रूप रस और गंध के सूक्ष्म से सूक्ष्म संस्कार वह ग्रहण कर लेता है। जब इंद्रियों का निर्माण शुरू होता है तब फिर संस्कार क्षमता उस इंद्रिय की क्षमता जितनी कम हो जाती है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिशू अवस्था में बालक के इंद्रियों के विकास का काल होता है। पूर्वबाल्यावस्था में मन का या विचार शक्ति का, उत्तर बाल्यावस्था और पूर्व किशोरावस्था में बुध्दि, तर्क आदि का और उत्तर किशोरवस्था में तथा यौवन में अहंकार का यानी 'मै' का यानी कर्ता भाव (मैं करता हूँ), ज्ञाता भाव (मैं जानता हूँ) और भोक्ता भाव (मैं उपभोग करता हूँ) का विकास होता है। इसलिये व्यक्तित्व विकास के लिये संस्कारों का और शिक्षा का स्वरूप आयु की अवस्था के अनुसार बदलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०. हर मानव जन्म लेते समय अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार विकास की कुछ संभाव्य सीमाएँ लेकर जन्म लेता है। अच्छा संगोपन मिलने से वह पूरी संभावनाओं तक विकास कर सकता है। कुछ विशेष इच्छाशक्ति रखने वाले बच्चे अपनी संभावनाओं से भी अधिक विकास कर लेते हैं। लेकिन ऐसे बच्चे अल्प संख्या में ही होते हैं। अपवाद स्वरूप ही होते हैं। अपवाद स्वरूप बच्चों के विकास के लिये सामान्य बच्चों के नियम और पद्धतियाँ पर्याप्त नहीं होतीं। सामान्य बच्चों के साथ भी विशेष प्रतिभा रखनेवाले बच्चों जैसा व्यवहार करने से सामान्य बच्चों की हानि होती है। समाज के सभी लोग प्रतिभावान या जिन्हें श्रीमद्भगवद्गीता ‘श्रेष्ठ’ कहती है या जिन्हें ‘महाजनो येन गत: स: पंथ:’ में ‘महाजन’ कहा गया है ऐसे नहीं होते हैं। इनका समाज में प्रमाण ५-१० प्रतिशत से अधिक नहीं होता है।  इसीलिये भारतीय समाज के पतन के कालखण्ड छोड दें तो सामान्यत: भारतीय न्याय व्यवस्था में एक ही प्रकार के अपराध के लिये ब्राह्मण को क्षत्रिय से अधिक, क्षत्रिय को वैश्य से अधिक और वैश्य को शूद्र से अधिक दण्ड का विधान था। इस विषय में चीनी प्रवासी द्वारा लिखी विक्रमादित्य की कथा ध्यान देने योग्य है। कुछ स्मृतियों में ब्राह्मण को अवध्य कहा गया है। अवध्यता से तात्पर्य है शारीरिक अवध्यता। ब्राह्मण का अपराधी सिध्द होना उसके सम्मान की समाप्ति होती है। और  ब्राह्मण का सम्मान छिन जाना मृत्यू से अधिक बडा दंड माना जाता था। ब्राह्मणों में क्षत्रियों में और वैश्यों में भी महाजन होते हैं। इनका प्रमाण ५-१० % से कम ही होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११. आवश्यकता और इच्छा एक नहीं हैं। आवश्यकताएँ शरीर और प्राण के लिये होती हैं। इसलिये वे मर्यादित होतीं हैं। इच्छाएँ मन करता है। मन की शक्ति असीम होती है। इसीलिये इच्छाएँ अमर्याद होतीं हैं। इच्छाओं की पूर्ति से मन तृप्त नहीं होता। वह और इच्छा करने लग जाता है। इसी का वर्णन किया है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;न जातु काम: कामानाम् उपभोगेन शाम्यम् ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;हविषा कृष्णवर्त्वेम् भूयं एवाभिवर्धते ॥ &amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रत्येक मानव को उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार और सामर्थ्य होती है। लेकिन साथ ही में इच्छाओं को नियंत्रण में रखने का दायित्व भी होता है। इसलिए मन के संयम की शिक्षा, शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू है। स्वाद संयम, वाणी संयम ऐसे सभी इन्द्रियों की तन्मात्राओं याने स्पर्श, रूप, रस, गंध और शब्द इन के विषय में संयम रखना चाहिए । सामान्यत: बुद्धि, जब तक कि इन्द्रिय नियंत्रित मन उसे प्रभावित नहीं करता, ठीक ही काम करती है। इसलिए हम ऐसा भी कह सकते हैं कि इन्द्रियों को मन के नियंत्रण में रखने की और मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखने की शिक्षा भी शिक्षा का आवश्यक पहलू है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२. मानव अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति में उपलब्ध पदार्थों से या तो सीधे या समाज के अन्य सदस्यों के माध्यम से करता है। इसलिये यह मानव के ही हित में है कि वह प्रकृति के साथ कोई खिलवाड नहीं करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३. श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार चारों वर्ण परमात्मा द्वारा निर्मित हैं । इन में अंतर गुणों का और कर्मों का है। गुण का अर्थ है सत्व, रज और तम गुण। वैसे तो प्रत्येक मनुष्य में तीनों गुण कम अधिक मात्रा में होते ही हैं,  लेकिन जिस वर्ण की प्रधानता होगी उसी वर्ण का वह व्यक्ति माना जाता है। वर्णश: गुणों का संबंध निम्न है:&amp;lt;blockquote&amp;gt;ब्राह्मण वर्ण	- सत्व प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर रज या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;क्षत्रिय वर्ण	- रज प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;वैश्य वर्ण	- रज प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या तम&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;शूद्र वर्ण		- तम प्रधान, दूसरे और तीसरे क्रमांक पर सत्व या रज&amp;lt;/blockquote&amp;gt;समाज सुखी बनें इसलिये विप्र वर्ण स्वतंत्रता के लिये, क्षत्रिय वर्ण सुरक्षा के लिये, वैश्य वर्ण सुसाध्य आजीविका के लिये और शूद्र वर्ण शांति के लिये जिम्मेदार है। ब्राह्मण वर्ण की जिम्मेदारी स्वाभाविक स्वतंत्रता की प्रस्थापना, क्षत्रिय वर्ण की जिम्मेदारी शासनिक स्वतंत्रता की प्रस्थापना, वैश्य वर्ण की जिम्मेदारी आर्थिक स्वतंत्रता की प्रस्थापना की है। देशिक शास्त्र इन स्वतंत्रताओं की व्याख्या निम्न रूप में करता है:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.१ स्वाभाविक स्वतंत्रता : जो काम किसी के प्राकृतिक हित के प्रतिकूल नहीं हो उस काम को करने में किसी का और किसी भी प्रकारका हस्तक्षेप नहीं होने को स्वाभाविक स्वतंत्रता कहते हैं। शासनिक और आर्थिक स्वतंत्रता स्वाभाविक स्वतंत्रता में साविष्ट हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.२ शासनिक स्वतंत्रता : शासक के अथवा प्रजा के प्राकृतिक हित में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होकर सदा प्रजा के हित के अनुकूल होने को ही शासनिक स्वतंत्रता कहते हैं। आथिक स्वतंत्रता भी इस में समाविष्ट है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३.३ आर्थिक स्वतंत्रता : अर्थ के अभाव या प्रभाव के कारण मनुष्य के प्राकृतिक हित में कोई बाधा निर्माण नहीं होने की स्थिति को आर्थिक स्वतंत्रता कहते हैं। उपर्युक्त व्याख्याओं से यह समझ में आएगा कि स्वाभाविक स्वतंत्रता में अन्य दोनों स्वतंत्रताओं का समावेश हो जाता है। इसी प्रकार से शासनिक स्वतंत्रता में आर्थिक स्वतंत्रता का समावेष हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसीलिये ब्राह्मण वर्ण को सर्वोच्च जिम्मेदारी के अनुसार सर्वोच्च प्रतिष्ठा और क्षत्रिय को दूसरे क्रमांक की प्रातिष्ठा समाज में प्राप्त होनी चाहिये। इन स्वतंत्रताओं की प्राप्ति ही सामाजिक दृष्टि से मानव का लक्ष्य है । ऐसा देशिक शास्त्र का कहना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमद्भगवद्गीता कर्म का महत्व विषद करती है। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने ‘स्वभावज’ कर्म अनिवार्यता से करने चाहिये। स्वभावज का अर्थ है जन्म से ही जैसा स्वभाव है उस के अनुरूप। श्रीमद्भगवद्गीता में शब्दप्रयोग हैं '''ब्रह्मकर्मस्वभावजम्''', '''वैश्यकर्मस्वभावजम्''' आदि। साथ में यह भी कहा है कि अपने वर्ण का काम भले ही अच्छा नहीं लगता हो तब भी वही करना चाहिये। सामान्य मानव को तो इसी तरह व्यवहार करना चाहिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो प्रतिभावान हैं उन्हें शायद सामान्य नियम नहीं लगाये जाते। जैसे गुरू के बिना भवसागर तर नहीं सकते ऐसा कहते हैं। लेकिन जो विशेष प्रतिभावान हैं उन्हें यह बात अनिवार्य नहीं है। वे तो आप ही बिना गुरू के मोक्षगामी हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्णों में परस्पर पूरकता और परस्पर अनुकूलता होती है। इसीलिये वेद कहते हैं कि चारों वर्ण एक शरीर के चार अंगों के समान हैं। जब ज्ञान का विषय होगा, स्वाभाविक स्ववतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तो ब्राह्मण का, जब सुरक्षा का प्रश्न होगा,शासनिक स्वतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तब क्षत्रिय का, जब उदरभरण का, आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा का विषय होगा तो वैश्य का और जब कला, कारीगरी, परिचर्या, मनोरंजन आदि का विषय होगा तो शूद्र का महत्व होगा।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रेष्ठ और हीन का विवेक समझाने का, अभ्युदय के साथ नि:श्रेयस की प्राप्ति का मार्गदर्शन करने का काम ब्राह्मण का होने से वह समाज का शिक्षक बन जाता है। स्वाभाविक स्वतंत्रता में शासनिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता दोनों का समावेश होता है। पूरे समाज की स्वाभाविक स्वतंत्रता की रक्षा का दायित्व उठाने के कारण शिक्षक सर्वोच्च आदर प्राप्ति का अधिकारी होता है। मोक्ष - इस परम लक्ष्य के कारण शिक्षक या गुरू का सम्मान सबसे अधिक होना उचित ही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे क्रमांक पर शासनिक स्वतंत्रता याने सुरक्षा का विषय आता है। शासनिक स्वतंत्रता की जिम्मेदारी लेने के कारण शासक या क्षत्रिय वर्ग का सम्मान होना भी स्वाभाविक ही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंतु अपने वर्ण के अनुसार व्यवहार नहीं करना और अपने ब्राह्मण या क्षत्रिय होने का दंभ भरना यह समाज के पतन की आश्वस्ति है। ऐसे लोग कठोर दण्ड के अधिकारी हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४. संस्कारों के तीन प्रकार होते हैं। सहज, कृत्रिम और अन्वयागत। सहज में फिर तीन संस्कार होते हैं। योनि संस्कार (मानव योनि के), वर्ण संस्कार और राष्ट्रीयता के संस्कार । कृत्रिम में १६ या कुछ लोगों के अनुसार ४९ संस्कार होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितरों और माता-पिता की ओर से प्राप्त संस्कारों को अन्वयागत संस्कार कहते हैं। अन्वयागत में माता-पिता और पूर्वजों के सहज संस्कार और तीव्र कृत्रिम संस्कार होते हैं। तीव्र कृत्रिम संस्कार दीर्घ अभ्यास के कारण बनीं आदतों के कारण होते हैं। इन संस्कारों में माता की ओर से पाँच पीढ़ियों के मन से संबंधित और पिता की ओर से १४ पीढ़ियों के शरीर से संबंधित संस्कार होते हैं। करीब की पीढ़ी के संस्कार अधिक और दूर की पीढ़ी के संस्कार कम होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१५. हर मानव सुर और असुर प्रवृत्तियों से भरा होता है। इसी प्रकार से समाज में भी सुर और असुर दोनों प्रवृत्तियों के लोग होते हैं। भर्तृहरि के अनुसार अपना कोई हित नहीं होते हुए भी औरों के अहित में आनंद लेने वाले असुर से भी गये गुजरे लोग भी समाज में होते है। इन सभी के लिये सदाचार की शिक्षा की व्यवस्था करना समाज का दायित्व है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जो बात अपने को प्रिय होती है उसे प्रेय कहते हैं। और जो अंतिमत: कल्याणकारी बात होती है उसे श्रेय कहते हैं।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने प्रेय के लिये अन्यों का अहित करनेवाले को असुर कहते हैं। ऐसे मानव को भी श्रेय ही प्रेय लगने लग जाए इसलिये शिक्षा होती है। कुल मिलाकर शिक्षा का स्वरूप धर्मशिक्षा का होता है। पुरूषार्थ चतुष्ट्य की शिक्षा का होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६. मानव अच्छा डॉक्टर बनता है, अच्छा व्यावसायिक आदि बनता है यह समाज के लिये महत्वपूर्ण बात होती है। किंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात हर बालक के लिये यह है कि वह एक अच्छा बेटा, अच्छा भाई, अच्छा पति, अच्छा गृहस्थ, अच्छा पिता, अच्छा देशभक्त और अच्छा मानव बने। इसी तरह हर बालिका अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी पत्नि, अच्छी गृहिणी, अच्छी देशभक्त और अच्छी मानव बनें यह अधिक महत्वपूर्ण होता है।  इसे सुनिश्चित करने के लिये सब से अधिक अवसर माता को होता है इसलिए सबसे अधिक जिम्मेदारी माता की होती है। दूसरे स्थान पर पिता जिम्मेदार होता है। कहा गया है ‘माता प्रथमो गुरू: पिता द्वितीयो’। इस में माता पिता समान घर के सब ज्येष्ठ लोगों का भी योगदान होता है। तीसरी जिम्मेदारी शिक्षक की होती है। ऐसी मान्यता है कि बालक के विकास में २५ प्रतिशत हिस्सा उसके पूर्वजन्मों के कर्मों का होता है। दूसरा २५ प्रतिशत उसे प्राप्त संस्कार और शिक्षा का होता है। तीसरा २५ प्रतिशत उसे मिले वातावरण, संगत, मित्र आदि का होता है। चौथा २५ प्रतिशत उसके अपने प्रयासों का होता है। इन हिस्सों का महत्वक्रम भी इसी क्रम से होता है। पूर्व कर्मों का प्रभाव सबसे अधिक, उसके उपरांत संस्कार और शिक्षा का आदि।  अन्य एक वर्गीकरण के अनुसार श्रेष्ठ मानव निर्माण के दो मुख्य पहलू हैं। पहला श्रेष्ठ जीवात्मा होना। और दूसरा है उसे अच्छी शिक्षा और संस्कार प्राप्त होना। इस दृष्टि से श्रेष्ठ मानव निर्माण में ५० प्रतिशत हिस्सा तो जन्म देनेवाले माता पिता का है। संस्कारों का काम भी घर में ही मुख्यत: चलता है। इसलिए संस्कारों का २५ प्रतिशत हिस्सा कुटुंब का होता है। शेष २५ प्रतिशत शिक्षा का जिसमें विद्यालयीन शिक्षा और लोकशिक्षा के माध्यमों का सहभाग होता है। समाज में यदि समस्याएँ हैं और बढ रहीं हैं तो माता, पिता और शिक्षक ये तीन लोग क्रम से इस के जिम्मेदार होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१७. मानव के लिये कुछ बातें जन्मजात और कुछ समाज से प्राप्त होनेवाली होतीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार आने वाली बातें - दस इंद्रिय, मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार, श्रेष्ठ जीवात्मा, प्रारब्ध (पूर्व कर्मों का फल) जो जन्म कुंडली में दिखाई देता है, त्रिगुणयुक्त व्यक्तित्व, त्रिदोषयुक्त शरीर, माता पिता आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माता-पिता से जन्म से प्राप्त होने वाली बातें : पितर और उन की विरासत- सामाजिक प्रतिष्ठा, नाम, भौतिक समृध्दि,  शारीरिक स्वास्थ्य, जाति और आनुवांशिकता से आनेवाली बातें जैसे वर्ण, (त्रिदोषात्मक) शारीरिक स्वास्थ्य, व्यावसायिक और अन्य कुशलताएँ, परम्पराएँ आदि परिवार में और समाज में प्राप्त होनेवाली बातें : नाम, प्यार, आत्मीयता, रक्षण, पोषण, संस्कार, शिक्षण, आदतें, आर्थिक और पारिवारिक विरासत और परंपराएँ, सामाजिकता, सामाजिक प्रतिष्ठा, कुलधर्म, कुलाचार, विविध पारिवारिक यानी रक्तसंबंध के रिश्ते, विविध सामाजिक रिश्ते, सदाचार, धर्म आदि की शिक्षा आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८. मानव के जन्म, जीवन और मृत्यू के चक्र में आयू की अवस्था के अनुसार निम्न बातें बदलतीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- प्यार-दुलार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- रक्षण/पोषण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- संस्कार और शिक्षण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- क्षमताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- योग्यताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- भावनाएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- आवश्यकताएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- इच्छाएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- जिम्मेदारियाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- कर्तव्य/बोध &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- अधिकार/बोध&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन का समायोजन सामाजिक संगठन और व्यवस्थाओं में होना आवश्यक है। इस हेतु से समाज भिन्न भिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं को चलाता है, भिन्न भिन्न संगठन और व्यवस्थाएँ निर्माण करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९. सामान्यत: गृहस्थ के लिये चारों आश्रमों के लोगों तथा अन्य जीव जगत के योगक्षेम की जिम्मेदारी के अलावा दो और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ होतीं हैं। पहली यह है कि वह धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों के योगक्षेम की व्यवस्था करे। दूसरी है समाज की विभिन्न भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सार्थक योगदान दे। धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों की संख्या का समाज की कुल आबादी के साथ संतुलन भी महत्वपूर्ण है। धर्म चिंतन, धर्म शिक्षण और धर्म रक्षण (शासन) में लगे लोगों के योगक्षेम की व्यवस्था करने से वह नि:श्रेयस को और भौतिक वस्तुओं के उत्पादन से वह व्यक्तिगत और सामाजिक स्तरपर अभ्युदय को प्राप्त करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०. भारतीय समाज में गृहस्थ के लिये तीन बातें आवश्यक मानीं गईं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहली बात यह है कि वह केवल धर्म की कमाई करे, दूसरे व्यय भी धर्मानुसार ही करे और तीसरे आवश्यकता से अतिरिक्त कमाई यथासंभव अधिक से अधिक दान में दे।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१. सुख और सुविधा में अंतर होता है। सुविधा से सुख बढेगा यह आवश्यक नहीं है। जब सुविधा मानव को पंगु बना देती है, उसकी स्वाभाविक क्षमताओं को कुंठित कर देती है या स्वाभाविक क्षमताओं का क्षरण करती है तब वह दुख का कारण बनती है। इसलिये कितना सुविधाभोगी बनना यह विवेक महत्वपूर्ण है। सुविधाओं के विकास में दो बातें ध्यान में रखना चाहिये। पहली यह कि सुविधा अक्षम लोगों की मदद के लिये होती है। दूसरी बात यह है कि उससे मानव की प्राकृतिक क्षमताओं में और सामाजिकता यानी पारिवारिक भावना और व्यवहार में वृध्दि हो। कम से कम हानि तो नहीं हो।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२२. कोई भी वस्तु खरीदते समय उस वस्तु की पर्यावरण सुसंगतता, सामाजिकता से सुसंगतता, उपयोगिता, सौंदर्यबोध और सबसे अंत में उसकी कीमत को महत्व देना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२३. हर गृहस्थ को लोकहितकारी उत्पादक व्यवसाय करना चाहिये। इससे एक ओर तो वह अपनी सामजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करता है तो दूसरी ओर वह (अधम गति से विपरीत) श्रेष्ठ गति को प्राप्त कर लेता है। २४. मनुष्य के शरीर की रचना शाकाहारी प्राणि के अनुसार है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२५. हर मनुष्य शरीर, प्राण, मन, बुध्दि और चित्त का स्वामी होता है। ये पाँचों बातें हर मनुष्य की भिन्न होतीं हैं। परमात्व तत्व भी इन पाँच घटकों के माध्यम से ही अभि‘व्यक्त’ होता है। इसीलिये मनुष्य को व्यक्ति कहते हैं। और व्यक्ति के स्वभाव, क्षमताएँ, प्रभाव आदि को व्यक्तित्व कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यक्तित्व से संबंधित कुछ बातें निम्न हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राणिक आवेग : आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये चार प्राणिक आवेग हैं। ये मनुष्य और पशू दोनों में समान हैं। इसलिये मनुष्य भी प्राणि होता ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक व्यक्ति को सुख, दु:ख, ममता, प्रेम, आत्मीयता, तथा द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर जैसे षड्विकार यानी मन की भावनाएँ होतीं हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवश्यकताएँ और इच्छाएँ : प्राणिक आवेगों की पूर्ति को आवश्यकता और मन की चाहतों को इच्छा कहते हैं। आवश्यकताएँ मर्यादित और इच्छाएँ अमर्याद होतीं हैं। -  कर्म योनि : प्राणिक आवेगों की पूर्ति के लिये और इच्छाओं की पूर्ति के लिये जो बातें की जातीं हैं उन्हें कर्म कहते हैं। उसे प्राप्त मन और बुध्दि की श्रेष्ठता के कारण मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र होता है। यह कर्म ही मनुष्य के जीवन का नियमन करते हैं। इस नियमन को कर्म सिध्दांत के माध्यम से समझा जा सकता है। कर्मसिध्दांत की जानकारी के लिये कृपया ‘ [[Elements of Hindu Jeevan Drishti and Life Style (भारतीय/हिन्दू जीवनदृष्टि और जीवन शैली के सूत्र)|भारतीय जीवन दृष्टि और जीवन शैली]] ‘ अध्याय में देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२६. समाज में व्यक्ति के दो प्रकार हैं। स्त्री और पुरूष। परमात्मा ने इन्हें जैसे ये आज हैं इसी स्वरूप में निर्माण किया था। समाज धारणा के लिये यानि समाज बना रहने के लिये के लिये स्त्री और पुरूष दोनों की आवश्यकता होती है। एक की अनुपस्थिति में समाज जी नहीं सकता। स्त्री और पुरूष एक दूसरे के पूरक होते हैं। बच्चे को जन्म देने का काम दोनों मिलकर करते हैं। अन्य एक भी ऐसा काम नहीं है जो स्त्री नहीं कर सकती या पुरूष नहीं कर सकता। किंतु इनको एक दूसरे से कई बातों में भिन्न बनाने में परमात्मा का कुछ प्रयोजन अवश्य है। इस प्रयोजन के अनुसार इनमें कार्य विभाजन होने से समाज ठीक चलता है। सुखी, समृध्द और चिरंजीवी बनता है। स्त्री-पुरूष संबंधों के विषय में थोड़ा अधिक गहराई से अब हम विचार करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== स्त्री और पुरूष संबंधी भारतीय सोच ==&lt;br /&gt;
भारतीय सोच के अनुसार स्त्री और पुरूष दोनों एकसाथ ही निर्माण हुए थे। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 3 के श्लोक 10 में कहा है &amp;lt;blockquote&amp;gt;सहयज्ञा: प्रजा सृष्ट:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रजा अर्थात् स्त्री और पुरूष साथ ही पैदा हुए थे। स्त्री और पुरूष की भिन्नता का बुध्दियुक्त सोच के आधार पर भारतीय मनीषियों ने मूल्यांकन किया है।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा ने सृष्टि को एक संतुलन के साथ बनाया है। स्त्री और पुरूष दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे होते है । दोनों की पूर्ण बनने की चाह ही स्त्री और पुरूष में परस्पर आकर्षण निर्माण करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसार में प्रत्येक वस्तु के निर्माण में परमात्मा का कोई प्रयोजन होता है। स्त्री की और पुरूष की शारीरिक और मानसिक भिन्नता का भी कुछ प्रयोजन है। दोनों की भूमिकाएं भिन्न किंतु परस्पर पूरक होंगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमात्मा से ही बना होने के कारण, परमात्मपद ( पूर्णत्व ) प्राप्ति की दिशा में आगे बढना ही प्रत्येक मानव के जीवन का लक्ष्य है। लेकिन शारीरिक रचना के कारण, सुरक्षा की आवश्यकता के कारण स्त्री के पूर्णत्व की दिशा में विकास का मार्ग अधिक कठिन होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारीवारिक मामलों में स्त्री को निर्णय का अधिकार और सामाजिक मामलों में जहाँ परिवार से बाहर के वातावरण का संबंध होता है, स्त्री के लिये सुरक्षा की समस्या निर्माण हो सकती है, उस में पुरूष को निर्णय का अधिकार भारतीय परिवार और समाज व्यवस्था की विशेषता रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंदू शास्त्र बताते है: &amp;lt;blockquote&amp;gt;'आत्मवत् सर्वभूतेषू'  या 'आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् '&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ है - जो बात अपने लिये अयोग्य या प्रतिकूल समझते हो उसे औरों के लिये भी अयोग्य और प्रतिकूल समझो और उसे मत करो। इसी का विस्तार है ' मातृवत् परदारेषू '। अपनी बहन, बेटी, माता और पत्नि के साथ अन्य पुरूष अभद्र व्यवहार न करें, सम्मान का व्यवहार करें ऐसी यदि आप औरों से अपेक्षा करते है तो आप भी किसी अन्य की बहन, बेटी, पत्नि या माता के साथ अभद्र व्यवहार न करें, उन्हे सम्मान दें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। अपनी पत्नि को छोडकर अन्य सभी स्त्रियों के प्रति माता की भावना को सुसंस्कार कहा गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। यह भी कहा गया कि &amp;lt;blockquote&amp;gt;यत्र नार्यस्तु पुज्यंते रमंते तर देवता: &amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ : जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता रहते है अर्थात् वह समाज देवता स्वरूप बन जाता है। सुख समृध्दि से भर जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारतीय स्त्री विषयक दृष्टि - तत्व और व्यवहार ==&lt;br /&gt;
उपर्युक्त स्त्री विषयक भारतीय दृष्टि से सब परिचित है। फिर प्रश्न उठता है कि वर्तमान में भारतीय समाज में स्त्री की दुरवस्था क्यों है? इस के लिये थोडा इतिहास देखना पडेगा। दो बडे कारण समझ में आते है। एक तो बौद्ध काल में महात्मा गौतम बुध्द के निर्वाण के पश्चात् कई बौद्ध विहार अनैतिकता के अड्डे बन गये थे। बौद्ध मत को राजाश्रय मिला हुआ था। यौवन में स्त्री का पुरूषों के प्रति और पुरूष का स्त्री के प्रति यौन आकर्षण अत्यंत स्वाभाविक बात है। फिर यौवन में विवेक और अनुभव भी कुछ कम ही होते है। ऐसी युवतियाँ इस स्वाभाविक आकर्षण के कारण विहारों में शरण लेतीं थीं। उन्हें वापस लाना असंभव हो जाता था। इसलिये सावधानी के तौर पर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद नहीं हुआ तो भी बहुत कम हो गया। दूसरे मुस्लिम आक्रांताओं ने जो अत्याचार स्त्रियों पर किये, स्त्रियों को जबरन उठाकर अरब देशों में बेचा इस से आतंकित होकर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद हो गया। स्त्री शिक्षा के मामले में और इसलिये अन्य सभी मामलों में भी बहुत पिछड गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वाधीनता के पश्चात यह अपेक्षा थी कि शिक्षा राष्ट्रीय बनेगी, भारतीय बनेगी, सेमेटिक मजहबों के प्रभाव से बाहर निकलेगी । दो तीन पीढ़ियों में स्त्री को योग्य स्थान दिलाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान में भारतीय स्त्री, जिस में अभी कुछ भारतीयता शेष है, वह बहुत संभ्रम में है। उस के विरासत में मिले संस्कार उस की शिक्षा से मेल नहीं खाते। वर्तमान शिक्षा की झंझा उसे पश्चिमी रहन सहन की ओर घसीटती रहती है। जो पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित है ऐसी स्त्रियाँ भी अपेक्षा तो यह करतीं है कि हर अन्य पुरूष उन की ओर ध्यान अवश्य दे किन्तु उनकी तय की हुई मर्यादा को नहीं लांघे। उन से आदर से व्यवहार करे। किन्तु इस के लिये वह अपने बच्चों पर ऐसे संस्कार करने के लिये न तो तैयार है और न ही सक्षम।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== समाज में कामों का वर्गीकरण ==&lt;br /&gt;
पारिवारिक और सामाजिक काम निम्न है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारिवारिक काम वे है जो केवल परिवार में किये जाते है, और सामाजिक काम वे है जो समाज ( परिवार भी समाज का ही हिस्सा होता है ) में किये जाते है। कुछ प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१.  प्रजा का निर्माण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२.  संस्कार और शिक्षा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३.  सामाजिक व्यवस्थाओं को चलाना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४.  जीने के लिये या मनोरंजन के लिये आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन में प्रजा का निर्माण यह तो शुध्द पारिवारिक काम है। इस से आगे पाँच वर्ष तक की शिक्षा का अर्थात् इंद्रिय, मन और संस्कारों की शिक्षा का काम भी मोटे तौर पर परिवार में ही होता है। इस के बाद जब बालक विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तब वह जिम्मेदारी समाज की होती है।  जीवन की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भिन्न भिन्न प्रकार के उद्योग चलाये जाते है। यह सामाजिक प्रयासों का ही क्षेत्र होता है। समाज ठीक चले इस दृष्टि से विभिन्न व्यवस्थाओं का निर्माण भी किया जाता है। जैसे सडक बनाना, कुए बनाना, धर्मशालाएं बनाना, मंदिर बनाना, विद्यालय बनाना आदि। यह व्यवस्थाएं अच्छीं चलें इस के लिये भी ध्यान देना पडता है। सामाजिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक कार्यों की सूची में आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुरूष और स्त्री की विशेषताएं ==&lt;br /&gt;
पुरूष और स्त्री को परमात्मा ने मूलत: ही भिन्न बनाया है। फिर भी यदि ठीक से देखा जाये तो बच्चे को जन्म देना, जो दोनों का साझा काम है, उसे छोडकर दूसरा ऐसा कोई भी काम नहीं है जो स्त्री या पुरूष नहीं कर सकता। किंतु केवल ' कर सकना ' के आधार पर स्त्री और पुरूष दोनों जो काम वर्तमान में स्त्रियाँ करतीं है वही करने लग जाएं तो जीना हराम हो जाएगा। इसीलिये सामान्यत: विभिन्न कामों का स्त्री सुलभ और पुरूष सुलभ कामों में बँटवारा किया जाता है और स्त्री के काम कौन से है और पुरूष के कौन से है यह निश्चय किया जाता है। वैसे तो कई काम ऐसे है जो सीमा रेखा पर होते है। जो स्त्री भी और पुरूष भी सहजता से कर सकते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री में इस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन नाम के लैंगिक अंत:स्त्राव (हार्मोन) होते है। इन के कारण स्त्री के शरीर और अवयवों की रचना भिन्न और कोमल बनती है। पुरूष में ऍंड्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन नाम के स्त्राव (हार्मोन) होते है। इन के कारण पुरूष के शरीर और अवयवों की रचना भिन्न और मजबूत बनती है। वैसे तो स्त्री और पुरूष दोनों में इस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन दोनों हार्मोन होते ही है। लेकिन पुरूष में टेस्टोस्टेरॉन का प्रमाण स्त्री से १५ से २० गुना अधिक होता है। इसी प्रकार से स्त्री के शरीर में २६ प्रतिशत चरबी (फॅट्) और २० प्रतिशत प्रथिन (प्रोटीन) होते है तो पुरूष के शरीर में १५ प्रतिशत चरबी और ४५ प्रतिशत प्रथिन होते है। इन्हीं घटकों के कारण स्त्री और पुरूष में शारीरिक और मानसिक भिन्नता होती है। स्त्री में स्त्रीत्व और पुरूष में पुरूषत्व होता है। स्त्री का स्त्रीत्व और पुरूष का पुरूषत्व तीव्र होने से संतति अधिक तेजस्वी और ओजस्वी बनती है। सामाजिक संस्कारों के माध्यम से स्त्री के स्त्रीत्व को और पुरूष के पुरूषत्व को अधिक तीव्र बनाया जा सकता है। अधिजनन शास्त्र के माध्यम से भारतीय परंपराओं में ऐसा बनाया जाता रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री का स्वभाव भावना प्रधान होता है तो पुरूष का स्वभाव वस्तुनिष्ठ और तर्कनिष्ठ होता है। दिशा, गणित, विज्ञान, समय आदि विश्लेषण और संश्लेषण के विषय पुरूष के लिये अधिक सरल होते है। स्त्री के लिये कला, कौशल, कोमलता से करने के विषय सरल होते है। स्त्री की त्वचा भी पुरूष की त्वचा से महीन और इसलिये अधिक संवेदनशील होती है। स्पर्श ही नही तो स्पर्श के पीछे छुपी इच्छाओं को भी समझने की सामर्थ्य स्त्री में होती है। स्त्री में संवाद कुशलता अधिक अच्छी होती है। अन्यों के भाव स्त्री आसानी से समझ जाती है। पुरूष को उस के लिये प्रयास करने पडते है। पुरूष मेहनत के काम दीर्घ काल तक कर सकता है। स्त्री, उस के स्नायू कोमल होने के कारण शारीरिक दृष्टि से अधिक सहनशील होती है जब की पुरूष मानसिक आघातों को अधिक अच्छी तरह सहन कर लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-१३ वर्ष की अर्थात् माहवारी शुरू होने की आयु में स्त्री के शरीर में इस्ट्रोजन का प्रमाण और इस कारण प्रभाव बढ जाता है। यह स्त्री में लैंगिक आकर्षण निर्माण करता है। माहवारी के काल में स्त्री के अंत:स्त्रावों के असंतुलन के कारण स्त्री का स्वभाव चिडचिडा बन जाता है। पुरूषों में यह आयु १५-१६ वर्ष की होती है। इस आयु में पुरूषों में टेस्टोस्टेरॉन का प्रमाण बढता है। उस के स्नायू कठोर बनने लगते है। वह मदमस्त बन किसी को टकराने की इच्छा करने लगता है। आजकल लैंगिक  स्वैराचार और खुलापन बढ़ने से यह आयु कम हो रही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्भ धारणा से लेकर संतान के पाँच वर्ष का होने तक के लिये स्त्री को किसी अन्य की मदद की आवश्यकता होती है। स्त्री में काम वासना से वात्सल्य की भावना अधिक प्रबल होती है। इसीलिये कहा गया है कि स्त्री क्षण काल की पत्नि और अनंत काल की माता होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री का स्वभाव बचत का होता है। उस के लिये प्रतिष्ठा से बचत का मूल्य अधिक होता है। इस लिये वह नि:संकोच होकर बीच बाजार में भी रुपये दो रुपयों के लिये भाव ताव करती दिखाई देती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री को अंतर्मुख होना कठिन होता है। त्रयस्थ वृत्ति से वह अपने व्यवहार का विश्लेषण नहीं कर सकती। स्त्री शारीरिक दृष्टि से पुरूष से दुर्बल तो होती ही है, गर्भावस्था में वह और भी परावलंबी बन जाती है। &lt;br /&gt;
इस दुर्बलता के कारण ही मनु ने कहा है&amp;lt;blockquote&amp;gt;पिता रक्षति कौमार्ये, भर्ता रक्षति यौवने, स्थवीरे रक्षति पुत्र:&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् कौमार्यावस्था में स्त्री को पिता का यौवन में पति का और वार्धक्य में पुत्र का संरक्षण मिलना आवश्यक होता है। इस से उस स्त्री का और समाज का भी भला होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सब विश्लेषण का हेतु पुरूष और स्त्री में परमात्मा प्रदत्त अंतर होता है यह बताने का है। इस अंतर के कारण स्त्रियों के और पुरूषों के बल स्थान और दुर्बल स्थान भिन्न होते है, यह बताने का है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपसंहार ==&lt;br /&gt;
मनुष्य एक स्खलनशील जीव है। स्खलन यह प्रकृति का नियम है। जैसे पानी हमेशा नीचे की ओर प्रवाहित होता है उसी तरह मनुष्य की प्रेरणाएँ भी उसे स्वभावत: निन्म स्तर की दिशा में आगे बढातीं हैं। इस कारण मानव व्यवस्थाओं को और संस्कारों को बिगाडता रहता है। मानव जीवन और समाज जीवन सुचारू रूप से चलने के लिये मानव को तीव्र संस्कारों और शिक्षा की तथा दंण्ड व्यवस्था की आवश्यकता होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानव जीवन को मोक्षगामी बनाने का साधन धर्म है। अपनी इच्छाओं (काम) को और उन इच्छाओं की पूर्ति के लिये किये गये प्रयासों तथा उपयोग में लाए गये धन, साधन और संसाधनों (तीनों मिलाकर अर्थ) को धर्मानुकूल रखने से मनुष्य मोक्षगामी बनता है। इसलिये काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखने की शिक्षा ही वास्तव में शिक्षा होती है। जो मोक्षगामी नहीं बनना चाहते उन के लिये भी काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखना उतना ही आवश्यक और महत्वपूर्ण है जितना मोक्षगामी लोगों के लिये। काम और अर्थ को धर्मानुकूल रखने से ही समाज सुखी, समृध्द और सुसंस्कृत बनता है। जब मानव के व्यवहारों को यानि इच्छाओं की पूर्ति के प्रयासों को धर्म के दायरे में रखा जाता है तब 'सर्वे भवन्तु सुखिन: की प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मनुष्य पैदा होता है उस समय उसके कोई कर्तव्य नहीं होते। केवल अधिकार ही होते हैं। ऐसे केवल अधिकार लेकर जिन्होंने जन्म लिया है उन बच्चों को अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिये जीनेवाले मनुष्य नहीं बनाया गया तो मानव का समाज जीवन नरक बन जाएगा। उसे कर्तव्यों के लिए जीनेवाला मनुष्य बनाना यह परिवार का काम है। और ऐसा विकास ही व्यक्ति का विकास है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==References==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;अन्य स्रोत:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१. शिक्षा का समग्र विकास प्रतिमान, लेखक सुश्री इंदुमती काटदरे, पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Bhartiya Jeevan Pratiman (भारतीय जीवन (प्रतिमान)]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Agni_(%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%83)&amp;diff=11092</id>
		<title>Agni (अग्निः)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Agni_(%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%83)&amp;diff=11092"/>
		<updated>2018-03-28T07:50:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt; &lt;br /&gt;
Agni (Samskrit: अग्निः) means Fire, Lighting, Purifier.  अग्निः ॥ Agni (the Fire deity) occupies a key place in Vedic mantras. Fire was one of the main elements that brought about a change in the way human civilizations evolved and plays an important role in the evolution of man and this fact is explicit in the वेदाः ॥ Vedas as अग्निः ॥ Agni was significantly praised for his prowess.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==     परिचयः ॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
A large number of मन्त्राः ॥ mantras of the ऋग्वेदः ॥ [[Rigveda]] are devoted to describing and praising अग्निः ॥ Agni. Some of the attributes are summarized as follows&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;Vettam. Mani, (1975). ''[https://archive.org/details/puranicencyclopa00maniuoft Puranic encyclopaedia : A comprehensive dictionary with special reference to the epic and Puranic literature].'' Delhi:Motilal Banasidass.&amp;lt;/ref&amp;gt;: &lt;br /&gt;
*     '''पञ्चभूतः ॥ Panchabhuta''' : Fire is one of the पञ्चभूत-s || Panchabhutas or the five traditional elemental forces that make up the world of matter.   &lt;br /&gt;
*    '''Bearer of Sacrificial Offerings''' : The presiding deity of तेजस् ॥ tejas (fire and heat), अग्निः ॥ Agni is revered as the receiver of oblations and sacrifices of men on behalf of the देवताः ॥ Devatas. &lt;br /&gt;
*    '''First Rigveda Sukta''' :  Fire has a very prominent place since the Vedic period and the Rigveda starts with the अग्निसूक्तम् || Agni sukta (Agnimeele purohitam...). अग्निः ॥ Agni is second only to इन्द्रः ॥ [[Indra (इन्द्रः)|Indra]] in power and importance attributed to him in Vedic literature, with 218 out of 1,028 hymns of the ऋग्वेदः ॥ Rigveda dedicated to him. With वरुणः ॥ [[Varuna]] and इन्द्रः ॥ Indra, he is one of the supreme gods in the ऋग्वेदः ॥ Rigveda.&lt;br /&gt;
*    दिक्पालकः ॥ '''Dikpalaka''' : He is the one of the [[Astadikpalakas (अष्टदिक्पालकाः)|अष्टदिक्पालकाः ॥ Astadikpalakas]] or the presiding deities of the eight directions as described in देवीभागवतम् ॥ Devi bhagavata (Chap. 8). Among them, He is the आग्नेयदिशाधिपतिः ॥ Agneyadishadhipati (the sovereign guardian of the Agneya direction or the south-east quarter).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*    स्वरूपम् ॥ '''Swaroopa (Nature)''' : अग्निः ॥ Agni manifests as follows in nature&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;सूर्यः द्युस्थानः । वायुः वा इन्द्रः वा अन्तरिक्षस्थानः । अग्निः पृथिवीस्थानः ।(Nirukta 7.5)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;Nirukta ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 Adhyaya 7])&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;sūryaḥ dyusthānaḥ । vāyuḥ vā indraḥ vā antarikṣasthānaḥ । agniḥ pṛthivīsthānaḥ ।(Nirukta 7.5)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Meaning: Self illumine bodies such as Surya in the अन्तरीक्षम् ॥ Antariksha (heavenly Cosmic regions), Lightning in the आकाशः ॥ Akasha or Sky (वायुः ॥ Vayu and इन्द्रः ॥ Indra representing wind and lightning). Fire (Flame or अग्निः ॥ Agni) on the पृथिवी ॥ Prithivi (Earth).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बडवाग्निः ॥ Badavagni (Vadavagni) in water (underground volcanic structures) as given in शब्दकल्पद्रुमः ॥ Shabdakalpadruma, &amp;lt;blockquote&amp;gt;बडवायाः समुद्रस्थितायाः घोटक्या मुखस्थोऽग्निः । समुद्रस्थाग्निः ।&amp;lt;ref&amp;gt;Shabdakalpadruma ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%83/%E0%A4%AC बडवाग्निः])&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;baḍavāyāḥ samudrasthitāyāḥ ghoṭakyā mukhastho'gniḥ । samudrasthāgniḥ ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जठराग्निः ॥ Jataragni (hunger) in all mortal beings as fire that cooks food in the stomach as given in वाचस्पत्यम् ॥ Vachaspatya, &amp;lt;blockquote&amp;gt;जठरस्थितोऽग्निः । कौक्षेये अन्नादिपाचके वह्नौ “अन्नरसोजठराग्निना पच्यमानोरक्ततां प्रतिपद्यते”।&amp;lt;ref&amp;gt;Vachaspatyam ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%9C जठराग्निः])&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;jaṭharasthito'gniḥ । kaukṣeye annādipācake vahnau &amp;quot;annarasojaṭharāgninā pacyamānoraktatāṃ pratipadyate&amp;quot;।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Thus, as an element that lights up and consumes everything He plays a very significant role in सृष्टिः ॥ Srishti.&lt;br /&gt;
*  '''देवतास्वरूपम् ॥ Devataswaroopa''' : He is prominent as the twin brother of इन्द्रः ॥ Indra and the husband of स्वाहा ॥ Svaha and स्वधा ॥ Svadha, and the father of दक्षिणम् ॥ Dakshina, गार्हपत्यम् ॥ Garhapatya and आहवनीयम् ॥ Ahavaniya. &lt;br /&gt;
*  '''ज्ञानतत्त्वम् ॥ Jnana Tattva''' : He is also known as the devata for ज्ञानम् ॥ Jnana (Knowledge). Knowledge or nature of every object is known only in the presence of Light or दीपः ॥ Deepa. But Fire is, by nature, self illuminating and does not need another lamp to reveal its nature.   &lt;br /&gt;
==  व्युत्पत्तिः || Etymology ==&lt;br /&gt;
* अमरकोषः ॥ '''[[Amarakosha (अमरकोषः)|Amarakosha]]''' defines the following about अग्निः ॥ Agni in स्वर्गवर्गः ॥ Svargavarga (प्रथमकाण्डश्लोकाः ॥ Prathama Kanda Slokas 53 - 57, Page No 12 of Reference 5)&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.sanskritebooks.org/2009/07/amara-kosa-the-sanskrit-thesaurus-with-notes-index/ Amarakosha]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;अग्निर्वैश्वानरो वह्निर्वीतिहोत्रो धनंजयः । कृपीटयोनिर्ज्वलनो जातवेदास्तनूनपात् ॥ (Amara 1. स्वर्ग. 53)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;बर्हिः शुष्मा कृष्णवर्त्मा शोचिष्केश उषर्बुधः । आशयाशो बृह्दभानुः कृशानुः पावकोनलः ॥ (Amara 1. स्वर्ग. 54)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;रोहिताश्वो वायुसखः शिखावानाशुशुक्षणिः । हिरण्यरेता हुतभुग्दहनो हव्यवाहनः ॥ (Amara 1. स्वर्ग. 55)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;सप्तार्चिर्दमुनाः शुक्रश्चित्रभानुर्विभावसुः । शुचिरप्पित्तमौर्वस्तु वाडवो वडवानलः ॥ (Amara 1. स्वर्ग. 56)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;वह्नेर्द्वयोर्ज्वालकिलावर्चिर्हेतिः शिखा स्त्रियाम् । त्रिषु स्फुलिङ्गोग्निकणः संतापः संज्वरः समौ || (Amara 1. स्वर्ग. 57)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;agnirvaiśvānaro vahnirvītihotro dhanaṃjayaḥ । kṛpīṭayonirjvalano jātavedāstanūnapāt ॥ (Amara 1. svarga. 53)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;barhiḥ śuṣmā kṛṣṇavartmā śociṣkeśa uṣarbudhaḥ । āśayāśo bṛhdabhānuḥ kṛśānuḥ pāvakonalaḥ ॥ (Amara 1. svarga. 54)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;rohitāśvo vāyusakhaḥ śikhāvānāśuśukṣaṇiḥ । hiraṇyaretā hutabhugdahano havyavāhanaḥ ॥ (Amara 1. svarga. 55)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;saptārcirdamunāḥ śukraścitrabhānurvibhāvasuḥ । śucirappittamaurvastu vāḍavo vaḍavānalaḥ ॥ (Amara 1. svarga. 56)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;vahnerdvayorjvālakilāvarcirhetiḥ śikhā striyām । triṣu sphuliṅgognikaṇaḥ saṃtāpaḥ saṃjvaraḥ samau || (Amara 1. svarga. 57)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Different names of अग्निः ॥ Agni include अग्निः ॥ Agni, वैश्वानरः ॥ Vaishvanara, कृशानुः ॥ Krushanu, जातवेदः ॥ Jataveda, बर्हिः ॥ Barhihi, पावकः ॥ Pavaka, अनलः ॥ Anala, वायुसखा ॥ Vayusakha, हिरण्यरेता ॥ Hiranyareta, हव्यवाहनः ॥ Havyavahana, ज्वालः ॥ Jwala, चित्रभानुः ॥ Chitrabhanu, वडवानलः ॥ Vadavanala and other names. &lt;br /&gt;
* According to शब्दकल्पद्रुमः ॥ Shabdakalpadruma,  &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;अङ्गयन्ति अग्य्रं जन्म प्रापयन्ति इतिव्युत्पत्त्या... अङ्गति ऊर्द्ध्वं गच्छति इति . अगि गतौ ॥ &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;aṅgayanti agyraṃ janma prāpayanti itivyutpattyā... aṅgati ūrddhvaṃ gacchati iti . agi gatau ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Meaning : अग्निः ॥ Agni is that which goes upward, and who was &amp;quot;first born&amp;quot; derived from the धातुः ॥ dhatu - अग् ॥ ag used in the meaning कुटिलायां गतौ || kuṭilāyāṃ gatau (as in Panini's धातुपाठः ॥ Dhatupatha) meaning that which moves crookedly.  &lt;br /&gt;
* यास्काचार्यः ॥ Yaskacharya explains in निरुक्तम् ॥ Nirukta (7.14) अग्रणीः भवति । अग्रम् अथ अतः अनुक्रमिष्यामः ॥ agraṇīḥ bhavati । agram atha ataḥ anukramiṣyāmaḥ &amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt; - अग्निः (Agni) is so called because he is अग्रणी ॥ Agrani (the foremost leader), whom one follows.  &lt;br /&gt;
* According to काण्वशतपथब्राह्मणम् ॥ Kanva Shatapatha Brahmana (1.2.4.2)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:8&amp;quot;&amp;gt;Swaminathan. C. R. (2000). ''[http://ignca.nic.in/eBooks/KANVASATAPATHABRAHMAAAM_Vol_I.pdf Kanvasatapathabrahmanam, Volume 1.]'' New Delhi : Indira Gandhi National Center for the Arts and Motilal Banarsidass Publishers Pvt. Ltd&amp;lt;/ref&amp;gt;   &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;स वा एषोऽग्रे देवतानामजायता तस्मादग्रिर्नामाग्रिर्ह वै नामैतद्यदग्निरित्याहुः स उ जातः पूर्वः प्रयाय तद्वैवास्य द्वितीयमग्रित्वं पूर्वं्हि यन्तमाहुरग्र एतीति ॥ (Kanv. Shat. Brah. 1.2.4.2)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;sa vā eṣo'gre devatānāmajāyatā tasmādagrirnāmāgrirha vai nāmaitadyadagnirityāhuḥ sa u jātaḥ pūrvaḥ prayāya tadvaivāsya dvitīyamagritvaṃ pūrvaṃhi yantamāhuragra etīti ॥ (Kanv. Shat. Brah. 1.2.4.2)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Meaning : This (अग्निः ॥ Agni) was born before the देवताः ॥ devatas. Therefore, he is known as अग्री ॥ Agri. It is indeed अग्री ॥ Agri which they say as 'अग्निः ॥ Agni'. Being born, he went ahead of others. That is indeed his second 'aheadness/firstness'. They say (of) one who goes first (before others) 'he goes ahead'.&lt;br /&gt;
* अग्निः ॥ Agni is the god of fire and sacrifice, of divine knowledge, and is also associated with water.  अग्निः ॥ Agni, identified with energy and action, is the first emanation and the sacred spark hidden within all beings. अग्निः ॥ Agni has three forms: 'fire', 'lightning' and 'the Sun'.  Agni is the drying agent which neither wets nor moistens anything.  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अग्निः यज्ञाः च ॥ Agni and Yajnas ==&lt;br /&gt;
Kindling of fire in a कुण्डम् ॥ kunda (altar or यज्ञवेदी ॥ yajnavedi) is the most important usage aspect of अग्निः ॥ Agni, since ancient times. शतपथब्राह्मणम् ॥ Shatapatabrahmana (काण्वम् ॥ Kanva) outlines the process of अग्न्याधानम् ॥ Agnyadhana (installation of the fire) and setting up the two अग्नि-s || Agnis () by for the purpose of यज्ञाः ॥ yajnas. A unique feature about Agni is that it is classified and called by different names based on its purpose in यज्ञाः ॥ yajnas (श्रौतः ॥ Shrauta and स्मार्तः ॥ smarta), the आहुति-s ॥ ahutis (oblations) offered and its use in लौकिकक्रियाः ॥ laukika kriyas (cooking).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== एकाग्निः ॥ Ekagni (One Fire) ===&lt;br /&gt;
गृह्याग्निः || Grhyagni is also called औपासनाग्निः ॥ aupasanagni since the daily rite of उपासना ॥ upasana is performed in it by the गृहस्थः ॥ grhastha. This is the fire contained in one &amp;quot;कुण्डम् ॥ kunda&amp;quot; and so it is called &amp;quot;एकाग्निः ॥ ekagni&amp;quot;. Rites conducted in the family are included in the chapter called &amp;quot;एकाग्निकाण्डम् ॥ Ekagni-kanda&amp;quot; in the आपस्तम्बसूत्रम् ॥ Apastamba-sutra.&amp;lt;ref&amp;gt;Sri Sri Sri Chandrasekharendra Saraswathi Swamiji, (2000) ''[http://www.kamakoti.org/hindudharma/part5/chap5.htm Hindu Dharma (Collection of Swamiji's Speeches between 1907 to 1994)]''Mumbai : Bharatiya Vidya Bhavan&amp;lt;/ref&amp;gt; अग्निः ॥ Agni acts as the intermediary between man and देवताः ॥ devatas as the divine sacrificial priest. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
In ऋग्वेदः ॥ Rigveda, the first सूक्तम् ॥ sukta, where अग्निः ॥ Agni is praised for his presence, he brings in all other deities to bless the यज्ञकर्ता ॥ yajnakarta (performer of the vedic ritual) with abundance, wealth and fulfill the desires when pleased. गृह्याग्निः ॥ Grhyagni or औपासनाग्निः ॥ Aupasana Agni and श्रौताग्निः ॥ Shrautagni are thus maintained by the गृहस्थाः ॥ grhasthas, and offerings (ghee, rice, पूर्णाहुतिः ॥ purnaahuti etc) are made to अग्निदेवः ॥ Agnideva to fulfill the worldly desires. The तैत्तिरीयसंहिता ॥ Taittiriya samhita outlines the different activities of a householder as the one who tends the गृह्याग्निः ॥ Grhyagni for the welfare of nature, animals and plants and fellow human beings. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== त्रेताग्निः ॥ Tretagni (Three Fires) ===&lt;br /&gt;
अग्निः (Agni) is carried at the fore front in all ritualistic undertakings (यज्ञाः ॥ yajnas) given in the श्रौतसूत्राणि ॥ Shrauta sutras. Some श्रौतयागाः ॥ Shrauta yagas require three fires called as त्रेताग्निः ॥ [[Tretagni (त्रेताग्नयः)|Tretagni]] which are invoked through procedures with chanting of मन्त्राः ॥ mantras. Example: सोमयागः ॥ Somayaga &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अग्निः ॥ Agni is ascribed 3 names and placed in three sides of a यज्ञवेदी ॥ yajnavedi –  &lt;br /&gt;
# गार्हपत्यः ॥ Garhapatya (अग्निः ॥ Agni maintained by आहिताग्नि-s ॥ ahitagnis on a daily basis). It is placed to the west of the यज्ञवेदी ॥ yagnavedi. &lt;br /&gt;
# आहवनीयः॥ Ahavaniya (अग्निः ॥ Agni used for यागाः ॥ yagas where a particular offerings are made to deities). It is derived from the गार्हपत्य-अग्निः ॥ Garhapatya agni and placed east of the यज्ञवेदी ॥ yajnavedi. &lt;br /&gt;
# दक्षिणाग्निः ॥ Dakshinagni (अग्निः ॥ Agni used to give offerings to पितृ-s || pitrs). It is also derived from the गार्हपत्य-अग्निः ॥ Garhapatya Agni and placed south of the यज्ञवेदी ॥ yajnavedi.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== पञ्चाग्निः ॥ Panchagni (Five Fires) ===&lt;br /&gt;
पञ्चाग्निः ॥ Panchagni means 5 अग्नि-s || Agnis or fires&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;. In vedic and puranic literature, पञ्चाग्निः ॥ Panchagni has been mentioned as a methodology adopted for performing severe penance. There are many instances of तपस् ॥ tapas (penance) for thousands of years, performed by different celestial beings including कुबेरः ॥ Kubera, पार्वती ॥ Parvati and असुराः ॥ asuras such as महिषासुरः ॥ Mahishasura and तारकासुरः ॥ Tarakasura, by standing or sitting in the midst of a set of five fires called पञ्चाग्निः ॥ Panchagni.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
According to Puranic Encyclopaedia, रोहिणी ॥ Rohini - a daughter, सोमः ॥ Soma - a son and अग्निः ॥ [[Agni (आग्निः)|Agni]], were born to निशा ॥ Nisha, the third wife of मनुः ॥ [[Manu (मनुः)|Manu]]. Besides them, they begot five sons in the form of अग्निः ॥ Agni (fire) and these five are called पञ्चाग्नि-s ॥ Panchagnis. They are वैश्वानरः ॥ Vaishvanara, विश्वपतिः ॥ Vishvapati, सन्निहितः ॥ Sannihita, कपिलः ॥ Kapila and अग्रणी ॥ Agrani. Such a penance that is performed amidst the five अग्नि-s || agnis is said to be very austere and is performed with an intention to please ब्रह्मा ॥ [[Brahma (ब्रह्मा)|Brahma]] or the others in the Trinity for obtaining material boons. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== षडग्निः ॥ Shad Agni (Six Fires) ===&lt;br /&gt;
According to शब्दकल्पद्रुमः ॥ Shabdakalpadruma, names of षड् अग्नि-s || six fires into which हविस् || havis is offered, are गार्हपत्यः ॥ Garhapatya, आहवनीयः ॥ Ahavaniya, दक्षिणाग्निः ॥ Dakshinagni, सभ्यः ॥ Sabhya, अवस्थ्यः ॥ Avasathya, औपासनः ॥ Aupasana Agnis.&amp;lt;blockquote&amp;gt;हविः प्रक्षेपाधिकरणेषु गार्हपत्याहवनीयदक्षिणाग्निसभ्यावसथ्यौपासनाख्येषु षड्ग्निषु ।&amp;lt;ref&amp;gt;Shabdakalpadruma ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%83/%E0%A4%85 See Agni])&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;haviḥ prakṣepādhikaraṇeṣu gārhapatyāhavanīyadakṣiṇāgnisabhyāvasathyaupāsanākhyeṣu ṣaḍgniṣu ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अग्निदेवतास्वरुपम् ॥ Agnidevata Svaroopa ==&lt;br /&gt;
==== Birth and Family ====&lt;br /&gt;
There are different versions in different texts about the birth of अग्निः ॥ Agni.  &lt;br /&gt;
* अग्निः ॥ Agni descended from विष्णुः ॥ Vishnu in the following order according to '''Puranic Encyclopedia'''&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt; (based on भागवतम् ॥ Bhagavata and महाभारतम् ॥ Mahabharata) :  विष्णुः ॥ Vishnu - ब्रह्मा ॥ Brahma - अङ्गिरस् ॥ Angiras - बृहस्पतिः ॥ Brihaspati - अग्निः ॥ Agni. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* अग्निः ॥ Agni is described as the son of वायुः ॥ Vayu as per ऋग्वेदसूक्तम् ॥ '''Rigveda Sukta''' (1.16.112). Fire is made by the attrition of two sticks (some scholars believe these to be from शमी ॥ Sami trees) named as अरणिः ॥ Arani, and sages get the strength to produce fire from it through the व्यानवायुः ॥ Vyana vayu (one of the पञ्चवायु-s || panchavayus), hence अग्निः || Agni is the son of वायुः ॥ Vayu.&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt; &lt;br /&gt;
* '''ऋग्वेदसूक्तम् ॥ Rigveda Sukta''' (1.95.1 to 11) describes the birth of अग्निः ॥ Agni from the ten daughters of त्वष्टा ॥ Tvashta according to Ralph Griffith's translation.&amp;lt;ref&amp;gt;Birth of Agni from Tvashtra's daughters Rig Veda ([http://www.sacred-texts.com/hin/rigveda/rv01095.htm Mandala 1 Sukta 95])&amp;lt;/ref&amp;gt; However, according to Pt. Satavalekar,  दशयुवतयः ॥ ten ladies (in the meaning of 'ten fingers') त्वष्टुः गर्भे जनयन्ति ॥ tvaṣṭuḥ garbhe janayanti - give rise to अग्निः ॥ Agni from अरणि-s || Aranis (sticks).(Page 244 of Reference &amp;lt;ref name=&amp;quot;:7&amp;quot; /&amp;gt;). According to Acharya Dharmadev Vidya Martanda, another version is described as follows&amp;lt;ref&amp;gt;Acharya Dharma Deva Vidya Martanda (1978) ''The Rigveda, Volume 2'' New Delhi : Sarvadeshik Arya Pratinidhi Sabha&amp;lt;/ref&amp;gt;: &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;''&amp;quot;Men should know the 'ten directions' which like un-wearied industrious young women bring forth from electricity or wind त्वष्टुः ||'' tvaṣṭuḥ'', thus germ the origin of dealings गर्भे जनयन्ति ||'' garbhe janayanti''&amp;quot;''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;दशेमं त्वष्टुर्जनयन्त गर्भमतन्द्रासो युवतयो विभृत्रम् (Rig. Veda.1.95.2)&amp;lt;ref&amp;gt;Rig Veda ([http://vedicheritage.gov.in/samhitas/rigveda/shakala-samhita/rigveda-shakala-samhitas-mandal-01-sukta-095/ Mandala 1, Sukta 95])&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;daśemaṃ tvaṣṭurjanayanta garbhamatandrāso yuvatayo vibhṛtram (Rig. Veda.1.95.2)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
* अग्निः || Agni was born from प्रजापतिः ॥ Prajapati as per शतपथब्राह्मणम् ॥ '''Shatapatha Brahmana (माध्यन्दिनः ॥ Madhyandina)''' (2.2.4.1) &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रजापतिर्ह वा इदमग्र एक एवास । स ऐक्षत कथं नु प्रजायेयेति सोऽश्राम्यत्स तपोऽतप्यत सोऽग्निमेव मुखाज्जनयांचक्रे तद्यदेनं मुखादजनयत तस्मादन्नादोऽग्निः ... - २.२.४.[१] (Shat. Brah. 2.2.4.1)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:4&amp;quot;&amp;gt;Shatapata Brahmana ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A4%A5%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%AE%E0%A5%8D_%E0%A5%A8/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A8/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A3_%E0%A5%AA Kanda 2 Adyaya 2])&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;prajāpatirha vā idamagra eka evāsa । sa aikṣata kathaṃ nu prajāyeyeti so'śrāmyatsa tapo'tapyata so'gnimeva mukhājjanayāṃcakre tadyadenaṃ mukhādajanayata tasmādannādo'gniḥ ... - 2.2.4.[1] (Shat. Brah. 2.2.4.1)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Meaning : In the beginning प्रजापतिः ॥ Prajapati only existed. He thought 'How may I be reproduced?' He toiled and undertook penance and generated (gave birth to) अग्निः ॥ Agni from his mouth. And because he was so generated he became the consumer of food.&amp;lt;ref&amp;gt;http://www.sacred-texts.com/hin/sbr/sbe12/sbe1247.htm&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Same concept has been presented even in the काण्वशतपथब्राह्मणम् ॥ Kanva Shatapatha Brahmana (1.2.4.1).&amp;lt;ref name=&amp;quot;:8&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
* मुण्डकोपनिषद् ॥ '''Mundakopanishad''' describes the origin of सृष्टिः ॥ Srshti and the पञ्चभूत-s || Panchabhutas. Thus, from the परमपुरुषः ॥ Paramapurusha arises अग्निः ॥ Agni as one of the five elements.  &amp;lt;blockquote&amp;gt;अग्निमूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिश: श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदा: | वायु: प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भयां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा || (Mund. Upan. 2.1.4).&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;agnimūrdhā cakṣuṣī candrasūryau diśa: śrotre vāgvivṛtāśca vedā: | vāyu: prāṇo hṛdayaṃ viśvamasya padbhayāṃ pṛthivī hyeṣa sarvabhūtāntarātmā || (Mund. Upan. 2.1.4).&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
Meaning : अग्निः ॥ Agni (Fire) is forehead of the परमपुरुषः ॥ Paramapurusha while सूर्यः ॥ Surya and चन्द्रः ॥ Chandra are the eyes. वायुः ॥ Vayu is the breath.&lt;br /&gt;
* अग्निः ॥ Agni was born to पुरूरवस् ॥ Pururavas as a son named जातवेदा ॥ Jataveda according to श्रीमद्भागवतम् ॥ '''Shrimad Bhagavata''' (नवमस्कन्दः ॥ Navama Skanda, अध्यायः १४ ॥ Adhyaya 14)&amp;lt;ref&amp;gt;Shrimad Bhavagata Purana ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83_%E0%A5%AF/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%AA Skanda 9 Adhyaya 14])&amp;lt;/ref&amp;gt;.  &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;स्थालीस्थानं गतोऽश्वत्थं शमीगर्भं विलक्ष्य सः ।  तेन द्वे अरणी कृत्वा उर्वशीलोककाम्यया ॥ ४४ ॥ &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;sthālīsthānaṃ gato'śvatthaṃ śamīgarbhaṃ vilakṣya saḥ ।  tena dve araṇī kṛtvā urvaśīlokakāmyayā ॥ 44 ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Meaning : Returning to the spot (in the forest) where the fire pot was kept (by him), he notices an अश्वत्थः ॥ ashvattha (Peepul) tree grown out of the 'womb' of the शमी ॥ Sami tree. With a desire to attain the region of उर्वशी ॥ Urvasi, he made two अरणि-s || aranis (churning sticks) out of them (with a view to kindle fire by friction).&amp;lt;blockquote&amp;gt;उर्वशीं मन्त्रतो ध्यायन् अधरारणिमुत्तराम् । आत्मानं उभयोर्मध्ये यत्तत् प्रजननं प्रभुः ॥ ४५ ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;urvaśīṃ mantrato dhyāyan adharāraṇimuttarām । ātmānaṃ ubhayormadhye yattat prajananaṃ prabhuḥ ॥ 45 ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Meaning : Reciting the मन्त्रः ॥ mantra, the king contemplated the lower अरणिः ॥ arani as उर्वशी ॥ Urvasi and upper अरणिः ॥ arani to be himself and the intermediate piece between them as their issue (son) (the king churned out the fire while saying the मन्त्रः ॥ mantra prescribed for such frictional fire). &amp;lt;blockquote&amp;gt;तस्य निर्मन्थनात् जातो जातवेदा विभावसुः । त्रय्या स विद्यया राज्ञा पुत्रत्वे कल्पितस्त्रिवृत् ॥ ४६ ॥  &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;tasya nirmanthanāt jāto jātavedā vibhāvasuḥ । trayyā sa vidyayā rājñā putratve kalpitastrivṛt ॥ 46 ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Meaning : By that friction of churning was kindled a fire (flame) which is called जातवेदा ॥Jataveda (that from which wealth and every enjoyable object is produced). It was consecrated by the method prescribed in the three vedas. It assumed three forms - आहवनीयः ॥ Ahvaniya, गार्हपत्यः ॥ Garhapatya and दक्षिणाग्निः ॥ Dakshinagni. As it, with its three forms, leads to the celestial regions, it was adopted as his son by the King पुरूरवस् ॥ Pururavas.&amp;lt;ref&amp;gt;Shastri, J. L. and Tagare, G. V. (1950) ''The Bhagavata Purana, Part 1.'' Delhi : Motilal Banarsidass Publishers Pvt Ltd ([https://archive.org/stream/BhagavataPuranaMotilalEnglish/Bhagavata%20Purana%20-%20Motilal%20-%20English%20-%20Parts%201%20-%205#page/n1215/mode/2up Skanda 9 Adhyaya 14])&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
* महाभारत-अनुशासनपर्व ॥ '''Mahabharata Anushasana parva''' (अध्यायः ॥ Adhyaya 85) mentions the association of the शमी ॥ Sami tree and अग्निदेवता ॥ Agni devata.  It is said that the heart (core) of the शमी ॥ Sami tree branches have fire in them. ऋषि-s || Rishis use this tree branches to generate fire. After the curse of भृगुमहर्षिः ॥ Bhrugu maharshi, अग्निः ॥ Agni hides himself in different places and ultimately देवाः ॥ devas find him in the शमी ॥ Sami tree. Hence, this tree is sacred and since this finding out of अग्निः ॥ Agni after a long absence is like a rebirth, the पुराणानि ॥ Puranas mention it as being born from शमी ॥ Sami Tree.&amp;lt;ref name=&amp;quot;:3&amp;quot; /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;इत्युक्त्वा निःसृतोऽश्वत्थादग्निर्वारणसूचितः। प्रविवेश शमीगर्भमथ वह्निः सुषुप्सया॥ (Maha. Anush. Parv. 13-85-36)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;ityuktvā niḥsṛto'śvatthādagnirvāraṇasūcitaḥ। praviveśa śamīgarbhamatha vahniḥ suṣupsayā॥ (Maha. Anush. Parv. 13-85-36)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
* अग्निः ॥ Agni has two consorts, स्वाहा ॥ Svaha and स्वधा ॥ Svadha. शब्दकल्पद्रुमः ॥ '''Shabdakalpadhruma''' mentions that अग्निः ॥ Agni through स्वाहादेवी ॥ Svahadevi (invocation offering) fathered three sons पुत्त्रास्त्रयः पावकः १ पवमानः २ शुचिः ३&amp;lt;ref&amp;gt;Shabdakalpadruma ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%83/%E0%A4%85 Agni])&amp;lt;/ref&amp;gt; - Pavaka, Pavamana and Suchi, who in their turn had forty-five children. Thus, अग्निः ॥ Agni, his three sons, and fortyfive grandsons, together constitute the fortynine Fires mentioned in the पुराणानि ॥ Puranas. महाभारत-सभापर्व ॥ '''Mahabharata Sabha parva''' (Sabh. Parv. Adhy. 31&amp;lt;ref&amp;gt;Pt. Ram Narayandatt. ''Mahabharat Volume 1'' ([https://archive.org/stream/Mahabharata04SanskritHindiPanditRamnarayanGitaPress/Mahabharata%2001_%20Sanskrit-Hindi_Pandit%20Ramnarayan_Gita%20Press#page/n837/mode/2up Sabhaparva, Adhyaya 31]) Gorakhpur: Gita Press&amp;lt;/ref&amp;gt;) contains the legend about सुदर्शना ॥ Sudarshana, the daughter of King नीलः ॥ Neela of महिष्मतिपुरः ॥ Mahishmatipura, who became the wife of अग्निदेवः ॥ Agnideva.  &lt;br /&gt;
* According to अग्निपुराणम् ॥ '''Agni Purana,''' शुचिः ॥ Suchi born of स्वाहादेवी ॥ Svahadevi is the बडवाग्निः ॥ Badavagni (Badabagni, or Vadavagni) the अग्निः ॥ Agni that resides in the underground parts of the earth (Agni. Pura. 20.16)&amp;lt;ref&amp;gt;Agni Purana ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A8%E0%A5%A6 Adhyaya. 20])&amp;lt;/ref&amp;gt;.   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पावकः ॥ Pavaka ====&lt;br /&gt;
Offended by अग्निः ॥ Agni, भृगुः ॥ Bhrigu had cursed अग्निः ॥ Agni to become the devourer of all things on this earth, but ब्रह्मा ॥ Brahma modified that curse and made Agni the purifier of all things he touched. Puranic Encyclopedia cites the ऋग्वेदमन्त्राः || Rigveda (1.52) mantras describing अग्निः ॥ Agni as the purifier. देवताः ॥ Devatas wanted to clean their hands off the oblation materials and for this purpose अग्निः ॥ Agni created three sons from water named एकतः ॥ Ekata, द्वितः ॥ Dvita, and त्रितः ॥ Trita&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;. &lt;br /&gt;
==== दाहकः '''॥''' Dahaka ====&lt;br /&gt;
अग्निः ॥ Agni is feared as the deity for destruction.  In महाभारतम् ॥ Mahabharata (आदिपर्व ॥ Adi Parva. खाण्डवदाहपर्व ॥ Khandavadaha parva Chap. 221 to 226)&amp;lt;ref&amp;gt;Pt. Ram Narayandatt. ''Mahabharat Volume 1'' ([https://archive.org/stream/Mahabharata04SanskritHindiPanditRamnarayanGitaPress/Mahabharata%2001_%20Sanskrit-Hindi_Pandit%20Ramnarayan_Gita%20Press#page/n705/mode/2up Adiparva, Adhyaya 221]) Gorakhapur:Gita Press&amp;lt;/ref&amp;gt;, there is a legend about अग्निः ॥ Agni. अग्निः ॥ Agni who suffers from stomach ailments (due to the यज्ञाः ॥ Yajnas of श्वेतकी ॥ Svetaki King) was advised to consume the Khandava forest which contains the medicinal herbs that can treat his condition. In the process, इन्द्रः ॥ Indra protects तक्षकः ॥ Takshaka who resides in the same forest, thus preventing अग्निः ॥ Agni from consuming the medicinal plants. In this पर्व ॥ parva, कृष्णः ॥ Krishna and अर्जुनः ॥ Arjuna, are requested by अग्निः ॥ Agni (who in the guise of a ब्राह्मणः ॥ Brahmana) to quench his hunger.  Realizing his true form, they agree to prevent his obstacles (इन्द्रः ॥ Indra from sending heavy rain) in consuming the forest.  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Pleased with their offer of help अग्निः ॥ Agni gave अर्जुनः ॥ Arjuna an arrow case which would never be empty, a chariot bearing हनुमान् ॥ Hanuman on the flag and four white horses and the famous गाण्डीवः ॥ Gandiva bow. To कृष्णः ॥ Krishna he gave the चक्रायुधः ॥ Chakrayudha (discus). With the help of these military equipment, कृष्णः ॥ Krishna and अर्जुनः ॥ Arjuna created a canopy of arrow against the downpour created by इन्द्रः ॥ Indra and thus, अग्निः ॥ Agni burned incessantly for fifteen days, and was cured of his stomach ailments.  &lt;br /&gt;
==== हव्यवाहनः ॥ Havyavahana  ====&lt;br /&gt;
अग्निः ॥ Agni is the very personification of the sacrificial fire. He is associated with Vedic sacrifice, taking offerings of men to the other world in his fire. He is the priest of the gods, and the god of the priests. Through यज्ञः ॥ ''yajna'' he carries the oblations to the gods, to ensure the continuance of conditions favorable to mankind. No देवता ॥ devata is approachable without the medium of अग्निः ॥ Agni, and no divinity is without the presence of अग्निः ॥ Agni.       &lt;br /&gt;
==== अग्निर्होता ॥ Agnirhota ====&lt;br /&gt;
In the Vedic literature, अग्निः ॥ Agni occupies, after इन्द्रः ॥ Indra, the most important position. He occupies a prominent place in the वेदाः ॥ Vedas (both as a deity and as a मन्त्रद्रष्टा ॥ mantra drasta) and particularly the ब्राह्मणाः ॥ Brahmanas. अग्निः ॥ Agni also has the role of a मन्त्रद्रष्टा ॥ mantra drashta as to him are revealed many मन्त्राः ॥ mantras of the 9th मण्डलम् ॥ Mandala of ऋग्वेदः ॥ Rigveda. The first मन्त्रः ॥ mantra of the ऋग्वेदः ॥ Rigveda (1.1.1) starts with the word अग्निः ॥ Agni of the अग्निसूक्तम् ॥ Agni sukta and and thereafter many मन्त्राः ॥ mantras and सूक्तानि ॥ suktas are given lauding his role in the existence of life forms. ऋग्वेदमन्त्राः ॥ Rigveda mantras (1.26.1 to 10) extol the role of अग्निः || Agni as the वरेण्य: ॥ varenya (distinguished or chief ) पूर्व्यहोता || purvya hota (सनातन-यज्ञकर्ता ॥ Sanatana Yajnakarta)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:7&amp;quot;&amp;gt;Pt. Sripada Damodara Satavalekar. (1985). ''Rigved ka Subodh Bhashya, Volume 1'', Parady: Svadhyaya Mandali&amp;lt;/ref&amp;gt;.    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Rigveda details the two forms of अग्निः || Agni - जातवेदः ॥ Jataveda and क्रव्यादः ॥ Kravyada&amp;lt;ref name=&amp;quot;:5&amp;quot;&amp;gt;Pt. Jayadeva Sharma (1935) ''[https://archive.org/stream/FourVedas-SanskritTextWithHindiCommentaryByPanditJaydevSharma/RigVedSanhitaBhashaBhashya-jaydevSharmaVol61935#page/n0/mode/2up Rig Veda Samhita, Bhasha Bhashya, Volume 6.]'' Ajmer : Arya Sahitya Mandal Ltd&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;क्रव्यादमग्निं प्र हिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः । इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन् ॥९॥ (Rig. Veda. 10.16.9)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:6&amp;quot;&amp;gt;Rig Veda ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%8B%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%83_%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%82_%E0%A5%A7%E0%A5%A6.%E0%A5%A7%E0%A5%AC Mandala 10 Sukta 16])&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;kravyādamagniṃ pra hiṇomi dūraṃ yamarājño gacchatu ripravāhaḥ । ihaivāyamitaro jātavedā devebhyo havyaṃ vahatu prajānan ॥9॥ (Rig. Veda. 10.16.9)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Summary : Keep us far away from क्रव्याद-अग्निः ॥ Kravyada Agni (the अग्निः ॥ agni that consumes flesh) may he leave for the people of यमलोकः ॥ Yamaloka, while जातवेदा ॥ Jataveda (अग्निः ॥ Agni) may carry the offerings to देवताः ॥ devatas.    &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== जातवेदाः ॥ Jataveda ====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;जातवेदाः कस्मात् । जातवित् यः वा जातप्रज्ञानः । जातानि वेद । तस्य एषा भवति । जाते जाते विद्यते इति वा । जातधनः ।(Nirukta 7.19)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;jātavedāḥ kasmāt । jātavit yaḥ vā jātaprajñānaḥ । jātāni veda । tasya eṣā bhavati । jāte jāte vidyate iti vā । jātadhanaḥ ।(Nirukta 7.19)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;Meaning : जातवेदस् ॥ Jatavedas is used as in - one who knows all creatures by birth, one who is Knowledgeable (knows वेदाः ॥ Vedas) by birth.     &amp;lt;blockquote&amp;gt;जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः । स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः ॥१॥ (Rig. Veda. 1.99.1)&amp;lt;ref&amp;gt;Rig Veda ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%8B%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%83_%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%82_%E0%A5%A7.%E0%A5%AF%E0%A5%AF Mandala 1, Sukta 99])&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;jātavedase sunavāma somamarātīyato nidahāti vedaḥ । sa naḥ parṣadati durgāṇi viśvā nāveva sindhuṃ duritātyagniḥ ॥1॥ (Rig. Veda. 1.99.1)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;In this famous दुर्गासूक्तम् ॥ Durga Sukta, containing ऋग्वेदमन्त्राः ॥ Rigveda mantras (also seen in तैत्तिरीय-उपनिषद् ॥ Taittriya Upanishad), अग्निः ॥ Agni is praised as the protector who knows all creatures by birth, to whom सोम ॥ Soma is offered and who burns all the impediments that arise in life.     &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== क्रव्यादः ॥ Kravyada ====&lt;br /&gt;
क्रव्यादः ॥ Kravyada is the form of अग्निः ॥ Agni which consumes corpses, the fire of the funeral pyre; the fire that burns the corpses can consume everything (Rig. Veda. 10.16.9)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:5&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;ref name=&amp;quot;:6&amp;quot; /&amp;gt;. In this form, after one’s death and at the time of cremation, अग्निः ॥ Agni heats up and burns the body (Shat. Brah. 2.2.4.8).&amp;lt;ref name=&amp;quot;:4&amp;quot; /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Cremation is the fastest way to unite the body's पञ्चभूतानि ॥ panchabhutas (five elements) back into them. अग्निः ॥ Agni thus, releases the जीवात्मा ॥ Jeevatma from the body, and the soul then starts its ascent to the higher realms based on its कर्म ॥ Karma. &lt;br /&gt;
==== ज्ञानप्रदायकः ॥ Jnanapradayaka ====&lt;br /&gt;
In ईशावास्योपनिषद् ॥ '''Isavasyopanishad''' (मन्त्राः ॥ Mantras 17 and 18)&amp;lt;ref&amp;gt;Swami Krishnananda's [https://www.swami-krishnananda.org/essay/essay_1.html Essays on the Upanishads, Isavasyopanishad]&amp;lt;/ref&amp;gt;, अग्निः ॥ Agni is worshiped as the torch bearer to the departing soul, leading it through the path of the देवताः ॥ Devatas (देवयानः ॥ Devayana) towards the परब्रह्मन् ॥ Parabrahman. He is the witness to the deeds of all beings.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केनोपनिषद् ॥ '''Kenopanishad''' describes अग्निः ॥ Agni as the Speech that runs the life processes of any being, eventually acclaimed for his knowledge of the Brahman.&amp;lt;ref&amp;gt;Swami Krishnananda's [https://www.swami-krishnananda.org/essay/essay_2.html Essays on the Upanishads, Kenopanishad]&amp;lt;/ref&amp;gt;      &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कठोपनिषद् ॥ '''Kathopanishad''' reveals the secrets of the fire that lead one on an enlightened path to the higher worlds or realms. This most divinely is explained in the famous Yama Nachiketa dialogue in कठोपनिषद् ॥ kathopanishad&amp;lt;ref&amp;gt;Vasu, Siris Chandra. (1905). ''[https://archive.org/stream/KathaUpanisad/Katha_upani%E1%B9%A3ad#page/n11/mode/1up Kathopanishad].'' Allahabad: Allahabad Press.&amp;lt;/ref&amp;gt;.      &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''छान्दोग्य-उपनिषद् ॥ Chandogya Upanishad''' &amp;lt;ref&amp;gt;Ganganatha, Jha. (1923). ''The Chandogya Upanishad and Sri Sankara's Commentary'', Fourth Volume, Madras: The India Printing Works&amp;lt;/ref&amp;gt;, in a more सकर्मक-मार्गः ॥ sakarmaka marg, throws light on how a normal householder can enter the ब्रह्मज्ञानमार्गः ॥ Brahmajnana marga through the tending of अग्निहोत्रम् ॥ Agnihotra as given in Upakosala's and Satyakama Jabali's conversation (Adhyaya 5).  The essence of ब्रह्मविद्या ॥ brahmavidya symbolized by [[Panchagnividya (पञ्चाग्निविद्या)|Panchagnividya]] for the householder is given in this upaniShad || Upanishad in the form of the dialogue between उद्दालकः ॥ Uddalaka and श्वेतकेतुः ॥ Shvetaketu.        &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुण्डकोपनिषद् ॥ '''Mundakopanishad''', explains how a person progresses through the different आश्रम-s || ashrams in life and the rules and consequences of not tending to the अग्निहोत्रम् || Agnihotra by a गृहस्थः ॥ grhasta (Mund. Upan. 1.2.2 to 1.2.4)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot;&amp;gt;Swami Sharvananda, (1920) ''Mundaka and Mandukya Upanishads'' Madras : Sri Ramakrishna Math&amp;lt;/ref&amp;gt;.      &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अग्निः पुराणानि च ॥ Agni and Puranas ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== अग्निपुराणम् ॥ Agni Purana ===&lt;br /&gt;
अग्निः ॥ Agni has a पुराणम् ॥ purana ascribed to him, named as अग्निपुराणम् ॥ Agni Purana&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D Link to Agni Purana from Wikisource] &amp;lt;/ref&amp;gt; (one of the ten main पुराणानि ॥ Puranas), and is said to have been related to ब्रह्मऋषिः वसिष्ठः ॥ Brahmarshi Vasishta by अग्निः ॥ Agni himself. In here, अग्निः ॥ Agni gives the essence of ब्रह्मविद्या ॥ Brahmavidya apart from the details of the ten अवताराः ॥ avataras (incarnations of विष्णुः ॥ Vishnu). This पुराणम् ॥ purana is a sacred text containing the expositions on the following matters in brief            &lt;br /&gt;
* religious rituals such as conducting व्रताः ॥ vratas or sacred vows, pilgrimages and consequences of attaining hell when these धर्माः ॥ dharmas are not adhered to.             &lt;br /&gt;
* different मनु-s || Manus in each मन्वन्तरम् ॥ Manvantara or Era of मनुः ॥ Manu            &lt;br /&gt;
* the different वर्णाश्रमधर्माः ॥ varnasrama dharmas and राजधर्माः ॥ raja dharmas            &lt;br /&gt;
* astrology and time aspects            &lt;br /&gt;
* various aspects about construction of temples            &lt;br /&gt;
* wars between देवाः ॥ devas and असुराः ॥ asuras            &lt;br /&gt;
* list of all other महापुराणानि ॥ Mahapuranas and their length in terms of श्लोकाः ॥ shlokas             &lt;br /&gt;
* literature and grammar. अग्निपुराणम् ॥ Agni Purana is the oldest text to talk about the characteristics of a काव्यम् ॥ Kavya or poetic text.            &lt;br /&gt;
* the origin or सृष्टिः ॥ srshti and प्रलयः ॥ pralaya (destruction)            &lt;br /&gt;
* योगशास्त्रम् ॥ yoga shastra and ब्रह्मविद्या ॥ brahmavidya            &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शिवपुराणम् ॥ Shiva Purana ===&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;पुरा कल्पे महाकाले प्रपन्ने लोकविश्रुते आयुध्येतां महात्मानौ ब्रह्मविष्णू परस्परम् २७ (Shiv. Pura. 5.27)&lt;br /&gt;
तयोर्मानं निराकर्तुं तन्मध्ये परमेश्वरः निष्कलस्तंभरूपेण स्वरूपं समदर्शयत् २८ (Shiv. Pura. 5.28)&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
ततः स्वलिंगचिह्नत्वात्स्तंभतो निष्कलं शिवः स्वलिंगं दर्शयामास जगतां हितकाम्यया २९ (Shiv. Pura. 5.29)&amp;lt;ref&amp;gt;Shivapuranam ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A5%A7_(%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE)/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A6%E0%A5%AB Adhyaya 5])&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;purā kalpe mahākāle prapanne lokaviśrute āyudhyetāṃ mahātmānau brahmaviṣṇū parasparam 27 (Shiv. Pura. 5.27)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;tayormānaṃ nirākartuṃ tanmadhye parameśvaraḥ niṣkalastaṃbharūpeṇa svarūpaṃ samadarśayat 28 (Shiv. Pura. 5.28)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;tataḥ svaliṃgacihnatvātstaṃbhato niṣkalaṃ śivaḥ svaliṃgaṃ darśayāmāsa jagatāṃ hitakāmyayā 29 (Shiv. Pura. 5.29)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;The शिवपुराणम् ॥ Shiva Purana contains the legend about Shiva appearing in the form of a pillar of fire (स्तम्भः ॥ stambha) burning infinitely without a beginning or end, between ब्रह्मा ॥ Brahma and विष्णुः ॥ Vishnu. This form is believed to be the सदाशिवः ॥ Sadashiva, the five-headed शिवः ॥ Shiva, who asks ब्रह्मा ॥ Brahma and विष्णुः ॥ Vishnu to find the beginning and end of this अनिलस्तम्भः ॥ Anilastambha.  The शिवलिङ्गम् ॥ Shiva-linga represents that pillar of fire which is अग्निः ॥ Agni. ब्रह्मा ॥ Brahma and विष्णुः ॥ Vishnu were very surprised to see the pillar of fire, which was so enormous in size that it reached the sky and penetrated down the earth. विष्णुः ॥ Vishnu transformed himself into a boar and went to 'पातालः ॥ Patal' (nether  world) to find the base of that 'Pillar of fire'. But he was unsuccessful in his attempt and came back. ब्रह्मा ॥ Brahma then sought the help of केतकी ॥ Ketaki flower to give a false witness before lord विष्णुः ॥ Vishnu, that he (ब्रह्मा ॥ Brahma) had been successful in seeing the limit of that pillar of fire. केतकी ॥ Ketaki flower agreed. Both of  them  went  to  विष्णुः ॥ Vishnu  and  ब्रह्मा ॥ Brahma  told  him  that  he  had  seen  the  limit  of  that  Pillar  of  fire. केतकी ॥ Ketaki flower gave a witness. विष्णुः ॥ Vishnu accepted the superiority of ब्रह्मा ॥ Brahma.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Knowing that ब्रह्मा ॥ Brahma lied, in order to punish him शिवः ॥ Shiva severed the fifth head of ब्रह्मा ॥ Brahma and cursed him that he will not be worshiped by anyone and केतकी ॥ Ketaki flower will not be used for puja of शिवः ॥ Shiva. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== रामायणमहभारतयोः अग्निः ॥ Agni In Ramayana and Mahabharata ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कार्तिकेयः ॥ Kartikeya ===&lt;br /&gt;
Different versions of birth of Kumaraswamy who is the chief of the devagana and plays a key role in the war between devatas and Taarakasura, have been described in Mahabharata and Ramayana as follows. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== वह्निगर्भः ॥ Vahnigarbha ====&lt;br /&gt;
Valmiki Ramayana ( Balakanda Sarga 36 and 37&amp;lt;ref&amp;gt;Valmiki Ramayana ([http://valmikiramayan.net/utf8/baala/sarga37/bala_37_frame.htm Balakanda Sarga 37])&amp;lt;/ref&amp;gt;) details the birth of Kaartikeya यत्र जातो महातेजाः कार्तिकेयो अग्नि संभवः |  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Although we see a few versions of this event, generally it is said that the devatas request Bhudevi to receive Shiva’s energy (formed due to divine association with Parvati for 300 divyayugas). Once received part of it becomes the element gold and the rest of it, unable to be borne by her, is transferred to Agni upon the request of the devatas. Agni requests Gangadevi to accept Shiva's effulgence, who then bears a six-headed child and she unable to contain the tejas any longer slips Him in the Sharavana reeds in a forest near the river. Hence Shiva's son is also called Vahnigarbha (through Agni), Gaangeya (through Gangadevi) and Sharavana (as he is born in Sharavana reeds). Thereafter, the six stars of Krittika, feed and raise the six-headed boy. Hence he is called as Kaartikeya in honor of the six mothers who cared for him.  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Parvati angry at being denied motherhood curses that the Devas wives would be infertile and never enjoy parental happiness henceforth. She angered by Prithvi for being a part of this matter, also curses her to be uneven and 'one with many husbands' (Earth having many landscapes is ruled by many kings (King is called as Bhupati). She curses Agni that he would be an all-consumer, without distinction between pure and impure things and and everything that touches him would turn into ash (bhasma). &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== स्कन्दोत्पत्तिः ॥ Skanda Utpatti   ====&lt;br /&gt;
In Mahabharata, Vana Parva, the legend of Skanda, is described with Indra approaching the Brahmadeva, for advise regarding the marriage of his daughter Devasena. In this context it is described that Svahadevi, the daughter of Daksha Prajapati takes the form of 6 wives of Saptarshis to please Agni. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Once during the istikas performed by the maharshis, Agni gets infatuated with the wives of the Saptarshis who came to take part in the istikas. Agni after delivering the havishya, notices the beautiful wives of the Saptarshis and desires them. Knowing that his Kaama (desire) for them is inappropriate thus unable to fulfill his wish he goes to the forest dejected. Svahadevi, daughter of Daksha, who chose Agni as her husband, assumes the forms of the wives of Saptarshi's and approaches him first in the form of the wife of Angirasa called Shivaa. Later she pleases him assuming the forms of 6 wives of the 6 Saptarshis except Arundhati, the wife of Vasishta rishi.  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Svahadevi, places Agni's energy so fallen 6 times, in a pot, which takes the form of lustrous boy with 6 heads and pairs of hands. This valorous son of Agni was called Skanda by maharshi Viswamitra. Saptarishis except Vasishta hearing this news forsake their wives assuming infidelity on their part. However, later on learning the truth, they take their wives back (Maha. Vanaparva Adhyaya 223 - 227)&amp;lt;ref&amp;gt;Pt. Ram Narayandatt. Mahabharat Volume 2 ( [https://archive.org/stream/Mahabharata04SanskritHindiPanditRamnarayanGitaPress/Mahabharata%2002_%20Sanskrit-Hindi_Pandit%20Ramnarayan_Gita%20Press#page/n723/mode/2up Vanaparva Adhyaya 225]) Gorakhpur: Gita Press&amp;lt;/ref&amp;gt;. Skanda, as the leader of the army of devatas was instrumental in the death of Taarakasura. Indra then offers his daughter, Devasena, to Skanda.  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
In the Anushasana Parva (Adhyayas 84 to 86)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:3&amp;quot;&amp;gt;Pt. Ram Narayandatt. Mahabharat Volume 6 ( [https://archive.org/stream/Mahabharata04SanskritHindiPanditRamnarayanGitaPress/Mahabharata06_Sanskrit-hindi_panditRamnarayan_gitaPress#page/n353/mode/2up Anushasana Parva Adhyaya 85]) Gorakhpur: Gita Press&amp;lt;/ref&amp;gt;, the legend of Kartikeya is touched upon again (continued as given in Ramayana). When the effulgence of Shiva slipped and Parvati became angry as she was denied the privilege of bearing Shiva's son, she cursed the Devatas that henceforth they will not bear children. When devatas approach Brahma, he instructs them to search for Agni, who was absent and hence was excluded from the curse of Parvati. Devatas go in search of him and finally find him hiding in the Sami tree. They request him to transfer his tejas along with the effulgence of Shiva to Ganga. Gangadevi bears the tejas until a certain time and then unable to bear it leaves it in the reeds. That tejas partly becomes gold and partly into a boy who is called as Gangeya. Since Agni was also an instrument in the creation of gold - he is called hiranyaretas and earth which bore the gold or vasu was known as Vasumati.     &lt;br /&gt;
=== अग्निप्रवेशः ॥ Agnipravesha ===&lt;br /&gt;
Valmiki Ramayana (Yuddhakanda Sarga 118&amp;lt;ref&amp;gt;Valmiki Ramayana ([http://valmikiramayan.net/utf8/yuddha/sarga118/yuddha_118_frame.htm Yuddhakanda Sarga 118])&amp;lt;/ref&amp;gt;) describes the Agnipareeksha or 'Fire ordeal' undergone by Sitadevi after death of Ravanaasura. Bhagavan Sri Rama, informs Sita that he has released her from her bondage from Ravanaasura and that she is free to go to the place of her choice. Unable to bear the thought of going anywhere else other than being with her husband Rama, she choses to enter the fire. Agni proving Sita's chastity returns her back to Sri Rama. There are different versions to this event, however, the role of Agni is as a witness to all deeds and as a purifier has been significant throughout different eras.   &lt;br /&gt;
=== शिबिचक्रवर्तिः ॥ Shibi Chakravarty ===&lt;br /&gt;
Shibi (Usheenara) Chakravarthy, belonging to the Ikshvaku dynasty, the ancestor of Bhagavan Sri Rama, was famous for his righteousness and charity. Indradeva who wanted to test his daatrutvam (sense of charity), assumed the form of an eagle and Agnideva assumed the form of a dove who was a prey to the eagle. The dove takes sharanagati or  refuge in Shibi Charavarty, who then offered an equal weight of his own flesh to the eagle in exchange of dove's life.  Assuming the dove to weigh a little, Shibi offered a portion of his flesh, but soon he had to offer himself as the food to the eagle. Shibi's sacrifice for the bird was highly praised and both Agni and Indra offered him a place in the heavens in return (Mahabharata, Vanaparva Adhyaya 131)&amp;lt;ref&amp;gt;Pt. Ram Narayandatt. Mahabharat Volume 2 ([https://archive.org/stream/Mahabharata04SanskritHindiPanditRamnarayanGitaPress/Mahabharata%2002_%20Sanskrit-Hindi_Pandit%20Ramnarayan_Gita%20Press#page/n417/mode/2up (Vanaparva, Adhyaya 131]) Gorakhapur:Gita Press&amp;lt;/ref&amp;gt;.&lt;br /&gt;
== श्रीमद्भागवद्गीतायाम् अग्निः ॥ Agni In Shrimad Bhagavadgita ==&lt;br /&gt;
In Shrimad Bhagavad Gita (Sloka 15.14) it is said: अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः | Srikrishna says - Taking the form of Vaisvanara and residing in the bodies of creatures, I, in association with Prana and Apana, digest the four kinds of food.&amp;lt;ref&amp;gt;https://www.gitasupersite.iitk.ac.in/srimad?language=dv&amp;amp;field_chapter_value=15&amp;amp;field_nsutra_value=14&amp;amp;etsiva=1&amp;amp;etgb=1&amp;amp;choose=1&amp;lt;/ref&amp;gt;    &lt;br /&gt;
== आयुर्वेदस्य दृष्टिः ॥ Ayurvedic Perspective ==&lt;br /&gt;
Agni is an important vital entity in Ayurveda. Agni is the indispensable agent involved in the process of Paaka (Digestion and transformation).&amp;lt;ref&amp;gt;Agrawal, Akash Kumar, C. R. Yadav, and M. S. Meena. “Physiological Aspects of ''Agni''.” ''Ayu'' 31.3 (2010): 395–398. ''PMC''. Web. 1 Mar. 2018.&amp;lt;/ref&amp;gt;  Different Ayurvedic texts mention that Agni is Pitta, one of the tridoshas of the human body, which are vaata, pitta and kapha.  Different texts mention different numbers of Agni present in the body, however according to the function and site of action there are 13 in number - 1 Jatharagni, 5 Bhutagnis and 7 Dhatvaagni.  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Jataraagni, the most important Agni, aids in digestion of four types of food and transforms it into Rasa and Mala (waste and toxins), thus converting the gross matter to subtle substance thereby providing energy for body's needs. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Ayurveda also defines three types of Agni based on the digestion types and Doshas (Vata, Pitta, Kapha) - Vishaamgni, Teekshanagni, Mandaagni.  Samaagni is a state of balanced Agni of the body. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मन्त्राः अर्थः च ॥ Verses and Meanings ==&lt;br /&gt;
Rig veda mantras 1.26.1 to 10&amp;lt;ref&amp;gt;Rig Veda ([https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%8B%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%83_%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%82_%E0%A5%A7.%E0%A5%A8%E0%A5%AC Mandala 1, Sukta 26])&amp;lt;/ref&amp;gt; praise Agni as the bearer of yagna havisya (sacrificial offerings) from मर्त्याः (humans) to अमर्त्याः (celestial beings).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजीगर्तिः शुनःशेप स कृत्रिमो वैश्वामित्रो देवरातः। अग्निः,। गायत्री।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वसि॑ष्वा॒ हि मि॑येध्य॒ वस्त्रा॑ण्यूर्जां पते । सेमं नो॑ अध्व॒रं य॑ज ॥१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नि नो॒ होता॒ वरे॑ण्य॒: सदा॑ यविष्ठ॒ मन्म॑भिः । अग्ने॑ दि॒वित्म॑ता॒ वच॑: ॥२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आ हि ष्मा॑ सू॒नवे॑ पि॒तापिर्यज॑त्या॒पये॑ । सखा॒ सख्ये॒ वरे॑ण्यः ॥३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आ नो॑ ब॒र्ही रि॒शाद॑सो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा । सीद॑न्तु॒ मनु॑षो यथा ॥४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्व्य॑ होतर॒स्य नो॒ मन्द॑स्व स॒ख्यस्य॑ च । इ॒मा उ॒ षु श्रु॑धी॒ गिर॑: ॥५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒ तना॑ दे॒वंदे॑वं॒ यजा॑महे । त्वे इद्धू॑यते ह॒विः ॥ ६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रि॒यो नो॑ अस्तु वि॒श्पति॒र्होता॑ म॒न्द्रो वरे॑ण्यः । प्रि॒याः स्व॒ग्नयो॑ व॒यम् ॥७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्व॒ग्नयो॒ हि वार्यं॑ दे॒वासो॑ दधि॒रे च॑ नः । स्व॒ग्नयो॑ मनामहे ॥८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथा॑ न उ॒भये॑षा॒ममृ॑त॒ मर्त्या॑नाम् । मि॒थः स॑न्तु॒ प्रश॑स्तयः ॥९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्वे॑भिरग्ने अ॒ग्निभि॑रि॒मं य॒ज्ञमि॒दं वच॑: । चनो॑ धाः सहसो यहो ॥१०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Isavasyopanishad Mantras 17 and 18&amp;lt;ref&amp;gt;Isavasyopanishad from [http://vedicheritage.gov.in/upanishads/ishavasyopanishad/ Vedic Heritage Portal]&amp;lt;/ref&amp;gt; praise Agni as the witnessing divinity to all actions of individuals and guides the soul on path of immortality.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वा॒युरनि॑लम॒मृत॒मथे॒दं भस्मा॑न्त॒ शरी॑रम् । ॐ क्रतो॒ स्मर॑ कृ॒त स्म॑र॒ क्रतो॒ स्मर॑ कृ॒त स्म॑र ॥१७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒ये अ॒स्मान्विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् । यु॒यो॒ध्य॒स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑ उ॒क्तिं विधेम ॥१८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== References ==&lt;br /&gt;
[[Category:Devatas]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=68</id>
		<title>Main Page</title>
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		<updated>2016-06-21T10:05:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: &lt;/p&gt;
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		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<title>Main Page</title>
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		<updated>2016-06-21T07:43:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: &lt;/p&gt;
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		<updated>2016-05-31T07:01:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: &lt;/p&gt;
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		<updated>2016-05-31T07:00:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: &lt;/p&gt;
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		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<title>Dharma Point of View</title>
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		<updated>2016-03-08T18:55:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: Created page with &amp;quot;Every person leads a life irrespective of the civilization he belongs to. But every civilization has a characteristic way of living ('''jeevan shaili'''), which, as per that c...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Every person leads a life irrespective of the civilization he belongs to. But every civilization has a characteristic way of living ('''jeevan shaili'''), which, as per that civilization’s convictions, is superior to the way other civilizations live. And the basis of this “characteristic way of living” are the perspectives of life ('''jeevan dristi''') that the civilization is founded upon. And underlying the way of living and the perspectives of life are the perspectives about the world ('''vishwa dristhi''' (विश्व दृष्टी ) or '''tattvajnana''' (तत्त्वज्ञान)) that the civilization is founded upon and these include its world view of all moving ('''char''') and non-moving ('''achar''') entities, as well as its view of creation overall. The world view and perspectives toward life held by the civilization tend to influence an individual’s relationships with other entities, which include all moving ('''char''') and non-moving ('''achar''') entities. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
In order to ensure that life continues in alignment with its world view and perspectives about life, the civilization gives birth to certain structures that are mutually supplementary as well as complementary. These structures, in conjunction with the '''vishwa dristi''' (which includes '''jeevan dristi''' and '''jeevan shaili''') constitute the paradigm ('''pratiman''') characterizing the civilization. &lt;br /&gt;
The pratiman that leads to integrity within and without the civilization, that produces synthesis and harmony within each entity and structure, whether it be the individual, the family, the society, a region (demarcated by boundaries) or the entire cosmos, can be understood to be '''dharma''' [dharyate iti dharma]. Hereafter, we will refer to such a pratiman or paradigm as '''dharmic paradigm'''. In the rest of this article, we present:&lt;br /&gt;
#Some basic elements of the dharmic paradigm ('''dharmik tattvajnana''' or '''dharmik pratiman''')&lt;br /&gt;
#Some elements of the dharmik perspective of life ('''dharmik jeevan dristi''') that are based on such a dharmic paradigm. &lt;br /&gt;
#Some elements of the dharmik codes of conduct that ('''dharmik vyavahar sutra''') that are aligned with such a dharmik perspective of life.&lt;br /&gt;
#Some elements of the dharmik structures ('''dharmik vyavastha''') that are meant to support and facilitate the dharmik codes of conduct.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Some basic elements of the dharmik paradigm (dharmik tattvajnana or dharmik pratiman) [Major reference: Being Different of Shri Rajiv Malhotra: [http://beingdifferentbook.com/] ]&lt;br /&gt;
#Integral unity: &lt;br /&gt;
##Ekoham bahusyamaha, Ekaki na ramate&lt;br /&gt;
##Bhagavad Gita 3.10 and 3.11: saha yagyaha prajaha srustva, purovaca prajapatih.. &amp;amp; devan bhavaya tanena..&lt;br /&gt;
##Bhagavad Gita 15.5: sarvasya chaaham hridi sannivishtaha&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Some elements of the dharmik perspective of life ('''dharmik jeevan dristi''') that are based on such a dharmic paradigm [Major references: Dr. K. S. Narayanacharya, Shri Aurobindo]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#Consciousness is all pervading [Bhagavad Gita 2.24: nitya sarva gatah, Bhagavad Gita 10.8: aham sarvasya prabhavo], nature is made of consciousness [Bhagavad Gita 9.4: maya tatami dam sarvam..]. Thus life is unlimited in space. &lt;br /&gt;
#Similarly, life is eternal in time and rebirth ('''punarjanma''') is but an expression of this eternity of life [Bhagavad Gita: yam yam vapi smaran…] &lt;br /&gt;
#In line with this eternity, creation and destruction are cyclic and mutually complementary. [example of seed that grows into tree, gives rise to more seed that fall to the ground again and each seed, in its destruction gives rise to more trees]&lt;br /&gt;
#Yajnya: The law or principle of self-offering, self-causation, the law of life’s self-preservation, the law of self-continuity, and the law of Becoming leading to Beinghood or Immortality&lt;br /&gt;
#Tapas: Hard efforts to integrate faculties of bodily potencies with those of mind and speech and yoking them to achieve unity of personality. Tapas can be dharmik or adharmik. When engaged favourably (such as Bhagavad Gita yada samharate chayam …Kurma), such integrated effort can help one can visualize God, achieve immortality and eternal service to cosmos, subjectively as well as objectively. It is complete tuning of body, mind and speech to the total evolution of the spirit to its fullness. Self-control comes as a first step in an eight-fold path called yoga.&lt;br /&gt;
#Ahimsa: Non-violence to any aspect of the law of life, and not merely avoidance of blood-shed or cruder forms of violence in terms of war, racial conquests, human suppression or infringement of human dignity. [ahimsa paramo dharmo, himsa dharma tathavia ca]&lt;br /&gt;
#Shraddha: Not merely faith in the wisdom and comfort of cosmic forces that lead to this evolution, but development  of human personality in terms of the stuff suitable for the mind and speech in such a way as suits the path of perfection. It is implicit faith in something sublime. Man and his essential ‘stuff’ are identical from this angle. Body, mind and intelligence are ‘made’ and we can so feed them with food, thought and expression, appropriately in gradual steps to achieve this purpose. Conviction, courage, wisdom, right choices, the desire for self-improvement, love, cooperation, harmony and right vision – are all products shraddha. Trust in God’s elevating Grace, and the faith that good will triumph over Evil, also form this shraddha. &lt;br /&gt;
#Sannyasa: Renunciation of all that is not conducive to this evolution, and not merely ‘asceticism’, for its own sake; or abandonment of unavoidable duties appropriate to contexts, professions, and personalities upholding society manifoldly; it is not a negation of life or unhealthy withdrawal from life which tantamounts to escapism.  Positively it means giving more to the society than taking. And depositing one’s all in God, and worshipping as His agent, refraining from selfishness or attachment to fruits of appointed duties. It is an attitude of life for all and throughout life. &lt;br /&gt;
#Punarjanma: Rebirth as a means to fulfill the missed opportunity of self-fulfillment, in earlier lives, with no achievement made at any stage lost. It is an assurance that life shall not fail. It is not aimless or endless transmigration of life as pessimists understand or fatalists believe. It is positive way of life-fulfillment.&lt;br /&gt;
#Three-fold Yoga: Man can  attain God by a Yoga in three steps of Action, Knowledge and Devotion, while in this life, and practice his vocation in his own field of action and stage of spiritual evolution. Yoga is not an abnormal activity away from outside its legitimate scheme or sphere. The three-fold yoga consists of&lt;br /&gt;
##Activity (profession) supported by knowledge and inspired by Devotion&lt;br /&gt;
##Knowledge of the self, sustained by life and activity, and filled with Devotion&lt;br /&gt;
##Devotion sustained on activity and inspired by this knowledge and of the relation between self and God&lt;br /&gt;
#Karma siddhanta…&lt;br /&gt;
#Role of moksha, independence (svatantrata), sannyasa etc in individual and social life&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Some elements of the dharmik codes of conduct that (dharmik vyavahar sutra) that are aligned with such a dharmik perspective of life.&lt;br /&gt;
#Sarve bhavantu sukhinaha [Somebody may think this is impractical. Swami Vivekananda however said. It is unfortunate when man tries to idealize reality instead of realizing ideals] &lt;br /&gt;
#Vasudaiva Kutumbakam&lt;br /&gt;
#Aatmavat sarva bhuteshu [Chanakya niti: matravat para daresu, para dravyesu lostravat]&lt;br /&gt;
Lifestyle based on Purushartha &lt;br /&gt;
#Krunvanto vishvam Aaryam&lt;br /&gt;
#Pancha yajna: Brahma yajna, pitru yajna, deva yajna, bhuta yajna, atithi yajna&lt;br /&gt;
#Runavimuktih: deva runa, pitru runa, rushi and guru runa, samaaj runa, bhuta runa&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Some elements of the dharmik structures ('''dharmik vyavastha''') that are meant to support and facilitate the dharmik codes of conduct.&lt;br /&gt;
#Varna and Ashrama: The grouping of life-sustaining professions, giving them a place, a meaning and divine ordainment, as steps appropriate for the law of evolution. It is not caste in its corrupt form and grasp: This is ‘varna’ – a minimum description of units in society and its dignified vocations such as discovery of knowledge, dissemination and preservation. It also include protection of social and national integrity, smooth functioning of vocations, preservation from internal or external aggressions or grabbings and confusions, vocation of circulation of essential commodities, their production, preservation and distribution; and the varieties of labor involved in all this inter-related smooth running of society. ‘Ashram’ is the concept of human evolution from bachelorship, devoted earning of knowledge or proficient in vocation through householdership, asceticism and renunciation in gradually evolving steps. &lt;br /&gt;
[insert picture here]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
In the table below, we contrast some basic differences in the paradigms, perspective of life and the world between the dharmik and the adharmik paradigms.&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=11</id>
		<title>Main Page</title>
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		<updated>2016-03-08T18:55:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Ganramkr: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Basic article on [[Dharma Point of View]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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* [//www.mediawiki.org/wiki/Special:MyLanguage/Localisation#Translation_resources Localise MediaWiki for your language]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Ganramkr</name></author>
	</entry>
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