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	<title>Dharmawiki - User contributions [en-gb]</title>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Adhikamasa_and_Kshyamasa(%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%8F%E0%A4%B5%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%AF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B8)&amp;diff=137652</id>
		<title>Adhikamasa and Kshyamasa(अधिकमास एवं क्षयमास)</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय कालगणना में नवविध कालमान के अन्तर्गत सौर एवं चान्द्र दोनों कालमानों को स्वीकार किया गया और व्यवहार में भी दोनों का प्रयोग किया जाता है। भारतीय पंचांग चान्द्र-सौर दोनों गणनाओं के समन्वय से निर्मित होते हैं। जिसमें सौर वर्ष (Solar Year) और चांद्र वर्ष (Lunar Year) के मध्य सामंजस्य बनाए रखना अनिवार्य होता है। इन दोनों गणनाओं में आने वाले अंतर को समाप्त करने के लिए भारतीय ज्योतिष शास्त्र में 'अधिक मास' एवं 'क्षयमास' की व्यवस्था की गई है। अधिकमास को ही पुरुषोत्तम मास या मलमास कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
भारतीय कालगणना में मास का अधिक महत्त्व है। कालमान के अनुसार चान्द्रमान के आधार पर ही मास की गणना ज्योतिषशास्त्र में बताई गई है। ग्रहसाधन के प्रसंग में अधिकमास और क्षयमास का अत्यधिक महत्त्व बताया गया है। भारतीय  यही प्रमुख कारण है कि अधिकमास एवं क्षयमास उत्पन्न होते हैं तथा उनका साधन भी शास्त्रों में किया गया है। केवल सिद्धान्त ग्रन्थों में ही नहीं परन्तु फलित एवं मुहूर्त ग्रन्थों में भी अधिकमास एवं क्षयमास का उल्लेख किया गया है। सौर वर्ष और चान्द्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिये हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। इसी को अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं। मास संबंधी ज्ञान के विषय में अधिकमास का ज्ञान परम आवश्यक है क्योंकि धार्मिक एवं ज्योतिषीय दोनों की दृष्टि से अधिकमास का आनयन एवं विचार महत्त्वपूर्ण है। सूर्यसिद्धान्त में कहा गया है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
भवन्ति शशिनो मासाः सूर्य्येन्दु भगणान्तरम्। रविमासोनितास्ते तु शेषाः स्युरधिमासकाः॥ (सूर्य सिद्धान्त)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' सूर्य और चन्द्रमा की गतियों (भगणों) के अन्तर से जो चान्द्रमास बनते हैं, उनमें से जब सौरमासों को घटाया जाता है, तब जो शेष बचता है वही अधिमास कहलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुभ एवं अशुभ कार्यों में अधिकमास एवं क्षयमास दोनों का विचार-विमर्श शास्त्रों में गंभीरता पूर्वक किया है। व्यवहारमें सौर और चान्द्रमासों की गणना प्रचलित है। जिसके साथ सावन दिनों का सम्बन्ध जुडा रहता है सूर्य के एक राशिभोग को सौरमास और ३० तिथ्यात्मक दो अमान्त कालाभ्यन्तर वर्तमान काल को चान्द्रमास कहते हैं। एक सौरमास को सावन दिन से मापा जाय तो जितने सावन दिन होंगे उससे कम सावन दिन १ चान्द्रमास में होते हैं अर्थात् चान्द्रमास की अपेक्षा सौरमास बडा होता है। चान्द्रमास से सौरमास जितना अधिक होता है उसी को अधिशेष कहते हैं। मध्यम मान से एक सौरमास ३० सावनदिन, २६ घटी एवं १५ पल का होता है और चान्द्रमास २९दिन, ३४ घटी एवं २० पल का होता है। दोनों का अन्तर (३०।२६।१५)-(२९।३४।२०)=०।५१।५५ सावनदिनादि १ सौरमास में होता है। यही अधिशेष प्रतिमास बढते हुये अनुपात से- १सौरमास + २९ दि०३४।२०/आन्तर शेष= ३०+२९ दिन ३४/ घ० २०/०।५१।५५= ३२ १/३ आसन्न मास में १ चान्द्रमास पड जाता है। वही अधिमास कहा जाता है। जब अधिशेष १चान्द्रमास बराबर होता है तो उस चान्द्रमास में सूर्य संक्रान्ति नहीं होती है। अर्थात् वह चान्द्रमास सूर्य संक्रान्ति से विहीन होता है, उसी को अधिमास या मलमास अथवा पुरुषोत्तममास कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा॥ Definition==&lt;br /&gt;
सिद्धान्तशिरोमणि के आधार पर अधिकमास एवं क्षयमास का लक्षण इस प्रकार है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;असंक्रान्तिमासोऽधिमासः स्फुटं स्याद् द्विसंक्रान्तिमासः क्षयाख्यः कदाचित्। क्षयः कार्तिकादित्रये नान्यतः स्यात्तदा वर्षमध्येऽधिमासद्वयंञ्च॥ (सिद्धान्त शिरोमणि)&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीकेदारदत्त जोशी, [https://archive.org/details/20230304_20230304_1743/page/n100/mode/1up सिद्धान्त शिरोमणि]-वासनाभाष्य सहित (१९६१), काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (पृ० ८०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिस चान्द्र मास में सूर्य की संक्रान्ति नहीं होती है तो उस मास की अधिकमास संज्ञा होती है। एवं जिस मास में अर्थात् चान्द्रमास में दो संक्रान्ति हो उस चान्द्रमास को क्षयमास कहते हैं। क्षयमास प्रायः  कार्तिकादि तीन मास में होता है। तथा जिस वर्ष में क्षय मास होता है उस वर्ष में दो अधिक मास १ तीन मास के पूर्व तथा १ बाद में होता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;मलमासोऽयं सौरचान्द्रमासयोः विकारः।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सौरमास और चान्द्रमास के विकार स्वरूप मलमास की उत्पत्ति होती है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;मस्ये परिमियते इत मासः।(शब्दकल्पद्रुमः)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%83/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%81%E0%A4%83 शब्दकल्पद्रुम] पृ०३/७१८।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ-काल प्रमाण ही मास है। सौर मास, चन्द्र मास, नाक्षत्रमास और सावन मास – ये ही मास के चार भेद हैं ।&amp;lt;blockquote&amp;gt;यस्मिन्मासे न संक्रान्ति संक्रान्तिद्वयमेव वा। मलमासः स विज्ञेयः। (शब्दकल्पद्रुमः)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिकमास और क्षयमास दोनों में विकार है। एक संक्रान्ति रहित है। दूसरा दो संक्रान्ति से युक्त है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;संक्रान्ति रहितो मासोऽधिमासः। (शब्दकल्पद्रुमः)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिकमास संक्रान्ति रहित है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;संक्रान्तिद्वययुक्तो मासः क्षयमासः। (शब्दकल्पद्रुमः)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;क्षयमास दो संक्रान्तियों से युक्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अधिकमास विज्ञान॥ Adhikamasa Vigyana==&lt;br /&gt;
पाण्डवों को बन गये कितने दिन हुए, इसके विषय में गोग्रहण के समय भीष्म दुर्योधन से कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
तेषां कालातिरेकेण ज्योतिषाञ्च व्यतिक्रमात्। पञ्चमे पञ्चमे वर्षे द्वौ मासावुपजायतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एषामभ्यधिकाः मासाः पञ्च च द्वादशक्षपाः। त्रयोदशानां वर्षाणामिति मे वर्तते मतिः॥ (विराट पर्व, अध्याय ५२)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;यहाँ पाँच वर्षों में दो अधिकमास बतलाये गये हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री शिवनाथ झारखंडी, [https://archive.org/details/BharatiyaJyotishShivnathJharkhandi/page/506/mode/1up भारतीय ज्योतिष] (१९७५), उत्तर प्रदेश शासन-हिन्दी समिति, लखनऊ (पृ० ५०७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
मीनादिस्थो रविर्येषामारंभप्रथमे क्षणे। भवेत्तेब्दे चान्द्रमासाश्चैत्राद्या द्वादश स्मृताः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेषादिस्थे सवितरि यो यो मासः प्रपूर्यते चान्द्रः। चैत्राद्यः स ज्ञेयः पूर्तिद्वित्वेऽधिमासोऽन्त्यः॥ (भारतीय ज्योतिष)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिकमास कई नामों से विख्यात है - अधिमास, मलमास, मलिम्लुच, संसर्प, अंहस्पति या अंहसस्पति, पुरुषोत्तममास। इनकी व्याख्या आवश्यक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सौरवर्ष का मान -''' ३६५ दिन - १५ घटी - ३१ पल - ३० विपल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चान्द्रवर्ष का मान -''' ३५४ दिन - २२ घटी - ०१ पल - ३३ विपल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः स्पष्ट है कि चान्द्रवर्ष सौर वर्ष से १० दिन - ५३ घटी - ३० पल - ०७ विपल कम है। इस क्षतिपूर्ति और दोनों मासों के सामञ्जस्य के उद्देश्य से हर तीसरे वर्ष अधिक चान्द्रमास तथा एक बार १४१ वर्षों के बाद तथा दूसरी बार १९ वर्षों के बाद क्षय-चान्द्रमास की आवृत्ति होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० जितेन्द्र कुमारी द्विवेदी, [http://assets.vmou.ac.in/CIJ02.pdf पंचांग का व्यावहारिक जीवन में उपयोग], वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा (पृ० १२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
== सौर एवं चांद्र वर्ष का गणितीय विश्लेषण ==&lt;br /&gt;
भारतीय कालगणना परम्परा में अनेक कालमानों का मिश्रित व्यवहार होता है जिसके अन्तर्गत मास व्यवहार में चैत्रमास से आरम्भ कर फाल्गुनमास तक दो-दो अमावस्याओं के मध्य क्रमशः मेषादि बारह राशियों की सूर्य संक्रान्तियों से चैत्र वैशाखादि बारह मास सिद्ध होते हैं, परन्तु वर्ष के मध्य में यदि इन चैत्रादि बारह मासों के अतिरिक्त तेरहवां मास आ जाता है तो वह अधिमास कहलाता है। क्षयमास को लुप्तमास के नाम से भी जाना जाता है अर्थात् ज्योतिषीय गणना में कभी-कभी ऐसी स्थिति भी आती है जब एक चन्द्रमास में दो संक्रान्तियाँ घटित हो जाती हैं। ऐसी अवस्था ‘क्षयमास’ कहलाती है। क्षयमास अत्यन्त दुर्लभ माना गया है। सामान्यतः क्षयमास की स्थिति होने पर उसके समीपवर्ती समय में दो अधिक मास भी पड़ सकते हैं। यदि कभी भी चैत्रादि मास के गणना क्रम में किसी मास का व्यवहार न हो तो उसे लुप्त अथवा क्षयमास की संज्ञा से जानते हैं। पंचांग गणना के अनुसार सौर और चांद्र वर्ष की अवधि में स्पष्ट अंतर पाया जाता है, जिसका विवरण निम्नवत है - &lt;br /&gt;
* '''सौर वर्ष का मान -''' ३६५ दिन, १५ घटी, २२ पल और ५७ विपल।&lt;br /&gt;
* '''चांद्र वर्ष का मान -''' ३५४ दिन, २२ घटी, १ पल और २३ विपल।&lt;br /&gt;
इस प्रकार, दोनों गणनाओं के मध्य प्रतिवर्ष लगभग १० दिन, ५३ घटी और २१ पल (अर्थात लगभग ११ दिन) का अंतर उत्पन्न हो जाता है। इस गणितीय अंतर को पाटने के लिए हर तीसरे वर्ष चांद्र वर्ष में १२ मासों के स्थान पर १३ मास समायोजित किए जाते हैं।&lt;br /&gt;
==अधिकमास की उपपत्ति॥ Upapatti of Adhikamasa==&lt;br /&gt;
सैद्धांतिक दृष्टि के आधार पर जब भी दो अमान्त के मध्य में संक्रान्ति का अभाव हो जाये तो उसे अधिमास की संज्ञा दी जाती है। सौरवर्ष ३६५ दिन का और चन्द्र वर्ष ३५५ दिन का होता है । जिससे दोनों में प्रतिवर्ष १० दिनों का अंतर पड़ता है । इस वैषम्य को दूर करने के लिए प्रति तीसरे वर्ष बारह की जगह १३ चान्द्र मास होते हैं । ऐसे बढे हुए मास को अधिमास या मलमास कहते हैं । &amp;lt;blockquote&amp;gt;मेषादिस्थे सवितरि यो यो मासः प्रपूर्यते चान्द्रः। चैत्राद्यः स विज्ञेयः पूर्तिर्द्वित्वे ऽधिमासोऽन्त्यः॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् मेषादि राशियों पर गमन करता हुआ सूर्य जब-जब चान्द्रमासों की पूर्ति करता है उस मासों को क्रम से चैत्रादि मास की संज्ञा दी गई है। जिसमें संक्रान्ति की पूर्ति नहीं होती है उसे अधिकमास कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री नारायण प्रसाद, वेद वाणी, अधिकमास एवं क्षयमास, सन् २००२, हरियाणा- वेदवाणी कार्यालय रेवली, (पृ० १२)। https://drive.google.com/file/d/1qsSgtZwIZs6iMUPpMeDhWFXjvgpa-XMq/view&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्य मत के अनुसार, जिसे आरम्भ पक्ष कहते हैं-&amp;lt;blockquote&amp;gt;मीनादिस्थो रविर्येषामारम्भप्रथमे क्षणे। भवेत् तेऽब्दे चान्द्रमासाश्चैत्राद्या द्वादश स्मृताः॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् जिस चान्द्रमास के आरम्भ क्षण में रवि मीन राशि में हो, वह चैत्र मास कहलाता है। इसी प्रकार वर्ष के चैत्रादि बारह मास होते हैं। किसी सामान्य चान्द्रमास में आरम्भ पक्ष और पूर्तिपक्ष दोनों नियमों से एक ही मास की संज्ञा प्राप्त होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौर-वर्ष का मान ३६५ दिन, १५ घटी, २२ पल और ५७ विपल है। जबकि चंद्र वर्ष में ३५४ दिन, २२ घटी, १ पल और २३ विपल का होता है। इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष १० दिन, ५३ घटी, २१ पल (अर्थात लगभग ११ दिन) का अंतर है। सौरवर्ष और चन्द्र वर्ष में सामञ्जस्य स्थापित करना परम आवश्यक है। यह सामञ्जस्य स्थापित करने के लिये हर तीसरे वर्ष भारतीय पञ्चांगों में एक चंद्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। यही अधिकमास है। वस्तुतः यह स्थिति स्वयं ही आ जाती है जब दो अमावस्या के बीच सूर्य की संक्रान्ति नहीं आती।&amp;lt;blockquote&amp;gt;द्वात्रिंशद्-भिर्गतैर्मासैर्दिनैः षोडशभिस्तथा। घटिकानां चतुष्केण पततिह्यधिमासकः॥ (वसिष्ठ-सिद्धान्त)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिमास ३२ महीने, १६ दिन और ४ घटी बीत जाने पर अधिकमास होता है। सूर्यसिद्धान्त के अनुसार ३३,५३५१ चांद्रमासों में ३२,५३४ सौर मास होते हैं। इस कारण सौरमासों को चांद्रमास बनाने के लिये सौरमासों के उपरान्त अथवा २ वर्ष ८ महीनों के उपरान्त अधिकमास होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब किसी चांद्रमास में सूर्य की कोई संक्रांति (एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) नहीं होती, तो उस मास को 'अधिक मास' कहा जाता है। इसे क्षेत्रीय और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिमास, मलमास, मलिम्लुच मास या पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==क्षयमास की उपपत्ति॥ Upapatti of Kshayamasa==&lt;br /&gt;
जिस चान्द्रमास में दो सूर्य-संक्रान्ति का समावेश हो जाय, वह क्षयमास कहलाता है। क्षयमास केवल कार्तिक, मार्ग व पौष मासों में होता है। जिस वर्ष क्षय-मास पडता है, उसी वर्ष अधिमास भी अवश्य पडता है परन्तु यह स्थिति १९ वर्षों या १४१ वर्षों के पश्चात् आती है। जैसे विक्रमी संवत् २०२० एवं २०३९ में क्षयमासों का आगमन हुआ तथा भविष्य में संवत् २०५८, २१५० में पडने की संभावना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== क्षयमास की विशेषता ===&lt;br /&gt;
क्षयमास अत्यन्त दुर्लभ घटना है। जब एक चन्द्रमास के भीतर सूर्य दो राशियों में प्रवेश कर लेता है, तब एक मास का लोप हो जाता है। इसे क्षयमास कहते हैं, ग्रन्थों के अनुसार - &lt;br /&gt;
* क्षयमास प्रायः कार्तिक, मार्गशीर्ष या पौष मास में ही सम्भव होता है।&lt;br /&gt;
* क्षयमास के पहले अथवा बाद में अधिकमास अवश्य पड़ता है।&lt;br /&gt;
* यह घटना बहुत लम्बे अन्तराल पर घटित होती है।&lt;br /&gt;
क्षयमास एक दुर्लभ स्थिति है जो तब उत्पन्न होती है जब एक ही चंद्रमास के भीतर दो सूर्य संक्रांतियों का समावेश हो जाता है।&lt;br /&gt;
* '''निर्धारित मास:''' क्षयमास मुख्य रूप से कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन) और पौष मास में ही संभव होता है।&lt;br /&gt;
* '''सम्बद्धता:''' यह एक ज्योतिषीय नियम है कि जिस वर्ष क्षयमास पड़ता है, उस वर्ष अधिमास (अधिक मास) का आगमन भी अनिवार्य रूप से होता है।&lt;br /&gt;
* '''पुनरावृत्ति:''' क्षयमास की स्थिति सामान्यतः १९ वर्षों या १४१ वर्षों के अंतराल पर आती है।&lt;br /&gt;
अधिक मास और क्षयमास की व्यवस्था यह दर्शाती है कि प्राचीन भारतीय ऋषियों और खगोलविदों को आकाशीय पिण्डों की गति का सूक्ष्म ज्ञान था। यह व्यवस्था न केवल ऋतुओं और त्योहारों के समन्वय को बनाए रखती है, अपितु समय की गणना को खगोलीय सत्यता के निकट लाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अधिकमास एवं क्षयमास में त्याग योग्य कर्म॥ Adhikamasa  evam Kshayamasa mein Tyaga yogya karma==&lt;br /&gt;
गर्गाचार्य जी के मत से अधिकमास में त्याज्य कर्म -&amp;lt;blockquote&amp;gt;अग्न्याधानं प्रतिष्ठां च यज्ञो दानव्रतानि च। वेदव्रतवृषोत्सर्ग चूडाकरणमेखलाः॥गमनं देवतीर्थानां विवाहमभिषेचनम्। यानं च गृहकर्माणि मलमासे विवर्जयेत्॥ (गर्ग संहिता)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' अग्न्याधान, प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रतादि, वेदव्रत वृषोत्सर्ग, चूडाकर्म, व्रतबन्ध, देवतीर्थों में गमन, विवाह, अभिषेक, यान और घर के काम अर्थात् गृहारम्भादि कार्य अधिक मास में नहीं करना चाहिये। मनुस्मृति के आधार पर कर्त्तव्य इस प्रकार हैं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;तीर्थश्राद्धं दर्शश्राद्धं प्रेतश्राद्धं सपिण्डनम्। चन्द्रसूर्यग्रहे स्नानं मलमासे विधीयते॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' तीर्थश्राद्ध, दर्शश्राद्ध, प्रेतश्राद्ध, सपिण्डीकरण, चन्द्रसूर्यग्रहणीय स्नान अधिकमास में भी करना चाहिये।&amp;lt;blockquote&amp;gt;न कुर्यादधिके मासि काम्यं कर्म कदाचन। (स्मृत्यन्तर)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' अधिकमास में फल-प्राप्ति की कामना से किये जानेवाले प्रायः सभी काम वर्जित हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;वाप्याराम-तडाग-कूप-भवनारम्भ प्रतिष्ठे व्रतारम्भोत्सर्ग-वधूप्रवेशन-महादानानि सोमाष्टके। गोदानाग्रयण-प्रपा-प्रथमकोपाकर्म वेदव्रतं नीलोद्वाहमथातिपन्न शिशुसंस्कारान् सुरस्थापनम् ॥&lt;br /&gt;
दीक्षा-मौञ्जि-विवाह-मुण्डनम पूर्वं देवतीर्थेक्षणं संन्यासाग्निपरिग्रहौ नृपतिसन्दर्शाऽभिषेकौ गमम्। चातुर्मास्य समावृती श्रवणयोर्वेधं परीक्षां त्यजेद् वृद्धत्वास्तशिशुत्व इज्य-सितयोर्न्यूनाधिमासे तथा॥ (मुहूर्त चिंतामणि)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;'''&lt;br /&gt;
== अधिकमास की पौराणिक कथा ==&lt;br /&gt;
पुराणों में अधिक मास के संबंध में एक अत्यंत रोचक एवं दार्शनिक कथा का वर्णन प्राप्त होता है, जो दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध से संबंधित है। इस कथा के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि ईश्वर की व्यवस्था और कालचक्र के समक्ष किसी भी प्रकार का अहंकार स्थायी नहीं रह सकता। पुराणों के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने कठोर तपस्या द्वारा ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। उसकी तपस्या से संतुष्ट होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान मांगने का अवसर प्रदान किया। हिरण्यकश्यप ने अमरता का वरदान चाहा, किंतु सृष्टि के नियमों के अनुसार ब्रह्मा जी किसी को अमरता प्रदान नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने हिरण्यकश्यप से कोई अन्य वर मांगने के लिए कहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब हिरण्यकश्यप ने अत्यंत चतुराई से अनेक शर्तों सहित वरदान मांगा। उसने कहा कि उसकी मृत्यु न किसी मनुष्य द्वारा हो, न किसी स्त्री द्वारा, न किसी पशु, देवता अथवा असुर द्वारा। वह वर्ष के बारह महीनों में किसी भी समय मृत्यु को प्राप्त न हो। उसकी मृत्यु न दिन में हो और न रात में। वह न किसी अस्त्र से मारा जाए और न किसी शस्त्र से। साथ ही, उसका वध न घर के भीतर हो और न घर के बाहर। ब्रह्मा जी ने उसकी इन शर्तों को स्वीकार कर उसे वरदान प्रदान कर दिया। इस वरदान को प्राप्त करने के पश्चात् हिरण्यकश्यप अत्यंत अहंकारी हो गया। उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया तथा समस्त प्रजा को अपनी उपासना करने के लिए बाध्य किया। धर्म और भक्ति का दमन होने लगा। ऐसे समय में भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा तथा भक्त प्रह्लाद के उद्धार हेतु नरसिंह अवतार धारण किया। यह अवतार आधे मनुष्य और आधे सिंह के रूप में था, जिससे हिरण्यकश्यप के वरदान की शर्तें निष्फल हो गईं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों में वर्णित है कि भगवान नरसिंह अधिक मास में संध्या समय प्रकट हुए। संध्या न पूर्णतः दिन होती है और न ही रात। उन्होंने हिरण्यकश्यप को राजमहल की देहरी पर पकड़ा, जो न घर के भीतर थी और न बाहर। तत्पश्चात् भगवान ने किसी अस्त्र या शस्त्र का प्रयोग न करके अपने नाखूनों से उसका वध किया। इस प्रकार हिरण्यकश्यप के सभी वरदान निष्प्रभावी सिद्ध हुए और धर्म की पुनः स्थापना हुई। यह कथा अधिक मास की महत्ता को भी प्रतिपादित करती है। सामान्य बारह महीनों से पृथक अधिक मास को भगवान विष्णु का विशेष प्रिय काल माना गया है। इसी कारण इसे “पुरुषोत्तम मास” भी कहा जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह मास साधना, भक्ति, दान तथा आत्मचिंतन के लिए अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धार्मिक दृष्टि से अधिकमास ===&lt;br /&gt;
अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। वैष्णव परम्परा में इसका अत्यधिक महत्व है। इस मास में भगवान विष्णु की आराधना, जप, तप, दान, तीर्थस्नान, कथा-श्रवण आदि का विशेष पुण्य माना गया है। धर्मशास्त्रों में विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत आदि मांगलिक कार्यों को अधिकमास में वर्जित बताया गया है, किन्तु - जप, तप, व्रत, दान, तीर्थयात्रा तथा भगवद्भक्ति आदि इनका विशेष विधान किया गया है। &lt;br /&gt;
=== वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्व ===&lt;br /&gt;
अधिकमास की व्यवस्था न हो, तो ऋतुओं और मासों में असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा। जैसे - &lt;br /&gt;
* चैत्र मास - शीतऋतु में आने लगेगा&lt;br /&gt;
* दीपावली - ग्रीष्म ऋतु में पड़ सकती है&lt;br /&gt;
* होली - वर्षा ऋतु में आने लगेगी।&lt;br /&gt;
अतः अधिकमास भारतीय पंचांग को ऋतु-संगत बनाए रखने का वैज्ञानिक साधन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सारांश॥ Summary==&lt;br /&gt;
विश्व के कैलेंडर के इतिहास में केवल भारत में ही महीनों का नामकरण वैज्ञानिक कहा जा सकता है। क्षयमास सामान्यतया ११९ या १९ वर्ष बाद घटित हुआ करता है। जब क्षयमास आता है तब ६-७ मासों के भीतर ही दो अधिक मास आ जाते हैं, जिनमें एक अधिमास क्षयमास से पूर्व और एक क्षयमास के बाद होता है। दो सूर्यसंक्रान्तियों से युक्त शुक्लादि चान्द्रमास को क्षयमास कहते हैं, इसे अंहस्पति वा न्यूनमास की संज्ञा भी दी गई है।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रियव्रत-शक्तिधर शर्मा, [https://archive.org/details/shaastriya-panchang-mimamsa/page/n30/mode/1up?view=theater शास्त्रीय पञ्चांग मीमांसा], सन् १९७९, श्रीमार्त्तण्ड ज्यौतिष कार्यालयः (पृ० १८६)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौर वर्ष और चान्द्रवर्ष में सामञ्जस्य स्थापित करने के लिये हर तीसरे वर्ष पंचाँगों में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। इसी को अधिक मास कहते हैं। सौर वर्ष का मान ३६५ दिन, १५ घटी, २२ पल और ५७ विपल हैं। जबकि चान्द्रवर्ष ३५४ दिन, २२ घडी, १ पल और २३ विपल का होता है। दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष १० दिन, ५३ घटी, २१॥ पल( औसतन ११ दिन) का अन्तर पडता है। इस अन्तर में समानता लाने के लिये चान्द्रवर्ष १२ मासों के स्थान पर १३ मास का हो जाता है। वास्तव में यह स्थिति स्वयं ही उत्पन्न हो जाती है क्योंकि जिस चान्द्रमास में सूर्य संक्रान्ति नहीं पडती, उसी को अधिकमास की संज्ञा दे दी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;पं० पन्नालाल ज्योतिषी, [https://ia801006.us.archive.org/2/items/brihatsamhitadr.surkantjha_201909/Jyotish%20Tattva%20-%20Panna%20Lal%20Jyotishi.pdf ज्योतिष तत्त्व], देवी दयालु ज्योतिषी एण्ड संज होशियारपुर, जालन्धर(पृ० २५)।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:Vedangas]]&lt;br /&gt;
[[Category:Jyotisha]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Adhikamasa_and_Kshyamasa(%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%8F%E0%A4%B5%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%AF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B8)&amp;diff=137648</id>
		<title>Adhikamasa and Kshyamasa(अधिकमास एवं क्षयमास)</title>
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		<updated>2026-05-10T16:11:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय कालगणना में नवविध कालमान के अन्तर्गत सौर एवं चान्द्र दोनों कालमानों को स्वीकार किया गया और व्यवहार में भी दोनों का प्रयोग किया जाता है। भारतीय पंचांग चान्द्र-सौर दोनों गणनाओं के समन्वय से निर्मित होते हैं। जिसमें सौर वर्ष (Solar Year) और चांद्र वर्ष (Lunar Year) के मध्य सामंजस्य बनाए रखना अनिवार्य होता है। इन दोनों गणनाओं में आने वाले अंतर को समाप्त करने के लिए भारतीय ज्योतिष शास्त्र में 'अधिक मास' एवं 'क्षयमास' की व्यवस्था की गई है। अधिकमास को ही पुरुषोत्तम मास या मलमास कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
भारतीय कालगणना में मास का अधिक महत्त्व है। कालमान के अनुसार चान्द्रमान के आधार पर ही मास की गणना ज्योतिषशास्त्र में बताई गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रहसाधन के प्रसंग में अधिकमास और क्षयमास का अत्यधिक महत्त्व बताया गया है। भारतीय  यही प्रमुख कारण है कि अधिकमास एवं क्षयमास उत्पन्न होते हैं तथा उनका साधन भी शास्त्रों में किया गया है। केवल सिद्धान्त ग्रन्थों में ही नहीं परन्तु फलित एवं मुहूर्त ग्रन्थों में भी अधिकमास एवं क्षयमास का उल्लेख किया गया है। सौर वर्ष और चान्द्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिये हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। इसी को अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मास संबंधी ज्ञान के विषय में अधिकमास का ज्ञान परम आवश्यक है क्योंकि धार्मिक एवं ज्योतिषीय दोनों की दृष्टि से अधिकमास का आनयन एवं विचार महत्त्वपूर्ण है। शुभ एवं अशुभ कार्यों में अधिकमास एवं क्षयमास दोनों का विचार-विमर्श शास्त्रों में गंभीरता पूर्वक किया है। व्यवहारमें सौर और चान्द्रमासों की गणना प्रचलित है। जिसके साथ सावन दिनों का सम्बन्ध जुडा रहता है सूर्य के एक राशिभोग को सौरमास और ३० तिथ्यात्मक दो अमान्त कालाभ्यन्तर वर्तमान काल को चान्द्रमास कहते हैं। एक सौरमास को सावन दिन से मापा जाय तो जितने सावन दिन होंगे उससे कम सावन दिन १ चान्द्रमास में होते हैं अर्थात् चान्द्रमास की अपेक्षा सौरमास बडा होता है। चान्द्रमास से सौरमास जितना अधिक होता है उसी को अधिशेष कहते हैं। मध्यम मान से एक सौरमास ३० सावनदिन, २६ घटी एवं १५ पल का होता है और चान्द्रमास २९दिन, ३४ घटी एवं २० पल का होता है। दोनों का अन्तर (३०।२६।१५)-(२९।३४।२०)=०।५१।५५ सावनदिनादि १ सौरमास में होता है। यही अधिशेष प्रतिमास बढते हुये अनुपात से- १सौरमास + २९ दि०३४।२०/आन्तर शेष= ३०+२९ दिन ३४/ घ० २०/०।५१।५५= ३२ १/३ आसन्न मास में १ चान्द्रमास पड जाता है। वही अधिमास कहा जाता है। जब अधिशेष १चान्द्रमास बराबर होता है तो उस चान्द्रमास में सूर्य संक्रान्ति नहीं होती है। अर्थात् वह चान्द्रमास सूर्य संक्रान्ति से विहीन होता है, उसी को अधिमास या मलमास अथवा पुरुषोत्तममास कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा॥ Definition==&lt;br /&gt;
सिद्धान्तशिरोमणि के आधार पर अधिकमास एवं क्षयमास का लक्षण इस प्रकार है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;असंक्रान्तिमासोऽधिमासः स्फुटं स्याद् द्विसंक्रान्तिमासः क्षयाख्यः कदाचित्। क्षयः कार्तिकादित्रये नान्यतः स्यात्तदा वर्षमध्येऽधिमासद्वयंञ्च॥ (सिद्धान्त शिरोमणि)&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीकेदारदत्त जोशी, [https://archive.org/details/20230304_20230304_1743/page/n100/mode/1up सिद्धान्त शिरोमणि]-वासनाभाष्य सहित (१९६१), काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (पृ० ८०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिस चान्द्र मास में सूर्य की संक्रान्ति नहीं होती है तो उस मास की अधिकमास संज्ञा होती है। एवं जिस मास में अर्थात् चान्द्रमास में दो संक्रान्ति हो उस चान्द्रमास को क्षयमास कहते हैं। क्षयमास प्रायः  कार्तिकादि तीन मास में होता है। तथा जिस वर्ष में क्षय मास होता है उस वर्ष में दो अधिक मास १ तीन मास के पूर्व तथा १ बाद में होता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;मलमासोऽयं सौरचान्द्रमासयोः विकारः।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सौरमास और चान्द्रमास के विकार स्वरूप मलमास की उत्पत्ति होती है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;मस्ये परिमियते इत मासः।(शब्दकल्पद्रुमः)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%83/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%81%E0%A4%83 शब्दकल्पद्रुम] पृ०३/७१८।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थ-काल प्रमाण ही मास है। सौर मास, चन्द्र मास, नाक्षत्रमास और सावन मास – ये ही मास के चार भेद हैं ।&amp;lt;blockquote&amp;gt;यस्मिन्मासे न संक्रान्ति संक्रान्तिद्वयमेव वा। मलमासः स विज्ञेयः। (शब्दकल्पद्रुमः)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिकमास और क्षयमास दोनों में विकार है। एक संक्रान्ति रहित है। दूसरा दो संक्रान्ति से युक्त है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;संक्रान्ति रहितो मासोऽधिमासः। (शब्दकल्पद्रुमः)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिकमास संक्रान्ति रहित है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;संक्रान्तिद्वययुक्तो मासः क्षयमासः। (शब्दकल्पद्रुमः)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;क्षयमास दो संक्रान्तियों से युक्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अधिकमास विज्ञान॥ Adhikamasa Vigyana==&lt;br /&gt;
पाण्डवों को बन गये कितने दिन हुए, इसके विषय में गोग्रहण के समय भीष्म दुर्योधन से कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
तेषां कालातिरेकेण ज्योतिषाञ्च व्यतिक्रमात्। पञ्चमे पञ्चमे वर्षे द्वौ मासावुपजायतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एषामभ्यधिकाः मासाः पञ्च च द्वादशक्षपाः। त्रयोदशानां वर्षाणामिति मे वर्तते मतिः॥ (विराट पर्व, अध्याय ५२)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;यहाँ पाँच वर्षों में दो अधिकमास बतलाये गये हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री शिवनाथ झारखंडी, [https://archive.org/details/BharatiyaJyotishShivnathJharkhandi/page/506/mode/1up भारतीय ज्योतिष] (१९७५), उत्तर प्रदेश शासन-हिन्दी समिति, लखनऊ (पृ० ५०७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
मीनादिस्थो रविर्येषामारंभप्रथमे क्षणे। भवेत्तेब्दे चान्द्रमासाश्चैत्राद्या द्वादश स्मृताः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेषादिस्थे सवितरि यो यो मासः प्रपूर्यते चान्द्रः। चैत्राद्यः स ज्ञेयः पूर्तिद्वित्वेऽधिमासोऽन्त्यः॥ (भारतीय ज्योतिष)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिकमास कई नामों से विख्यात है - अधिमास, मलमास, मलिम्लुच, संसर्प, अंहस्पति या अंहसस्पति, पुरुषोत्तममास। इनकी व्याख्या आवश्यक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सौरवर्ष का मान -''' ३६५ दिन - १५ घटी - ३१ पल - ३० विपल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चान्द्रवर्ष का मान -''' ३५४ दिन - २२ घटी - ०१ पल - ३३ विपल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः स्पष्ट है कि चान्द्रवर्ष सौर वर्ष से १० दिन - ५३ घटी - ३० पल - ०७ विपल कम है। इस क्षतिपूर्ति और दोनों मासों के सामञ्जस्य के उद्देश्य से हर तीसरे वर्ष अधिक चान्द्रमास तथा एक बार १४१ वर्षों के बाद तथा दूसरी बार १९ वर्षों के बाद क्षय-चान्द्रमास की आवृत्ति होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० जितेन्द्र कुमारी द्विवेदी, [http://assets.vmou.ac.in/CIJ02.pdf पंचांग का व्यावहारिक जीवन में उपयोग], वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा (पृ० १२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अधिकमास एवं क्षयमास॥ Adhikamasa and Kshayamasa==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय कालगणना परम्परा में अनेक कालमानों का मिश्रित व्यवहार होता है जिसके अन्तर्गत मास व्यवहार में चैत्रमास से आरम्भ कर फाल्गुनमास तक दो-दो अमावस्याओं के मध्य क्रमशः मेषादि बारह राशियों की सूर्य संक्रान्तियों से चैत्र वैशाखादि बारह मास सिद्ध होते हैं, परन्तु वर्ष के मध्य में यदि इन चैत्रादि बारह मासों के अतिरिक्त तेरहवां मास आ जाता है तो वह अधिमास कहलाता है। क्षयमास को लुप्तमास के नाम से भी जाना जाता है अर्थात् ज्योतिषीय गणना में कभी-कभी ऐसी स्थिति भी आती है जब एक चन्द्रमास में दो संक्रान्तियाँ घटित हो जाती हैं। ऐसी अवस्था ‘क्षयमास’ कहलाती है। क्षयमास अत्यन्त दुर्लभ माना गया है। सामान्यतः क्षयमास की स्थिति होने पर उसके समीपवर्ती समय में दो अधिक मास भी पड़ सकते हैं। यदि कभी भी चैत्रादि मास के गणना क्रम में किसी मास का व्यवहार न हो तो उसे लुप्त अथवा क्षयमास की संज्ञा से जानते हैं।&lt;br /&gt;
==अधिकमास की उपपत्ति॥ Upapatti of Adhikamasa==&lt;br /&gt;
सैद्धांतिक दृष्टि के आधार पर जब भी दो अमान्त के मध्य में संक्रान्ति का अभाव हो जाये तो उसे अधिमास की संज्ञा दी जाती है। सौरवर्ष ३६५ दिन का और चन्द्र वर्ष ३५५ दिन का होता है । जिससे दोनों में प्रतिवर्ष १० दिनों का अंतर पड़ता है । इस वैषम्य को दूर करने के लिए प्रति तीसरे वर्ष बारह की जगह १३ चान्द्र मास होते हैं । ऐसे बढे हुए मास को अधिमास या मलमास कहते हैं । &amp;lt;blockquote&amp;gt;मेषादिस्थे सवितरि यो यो मासः प्रपूर्यते चान्द्रः। चैत्राद्यः स विज्ञेयः पूर्तिर्द्वित्वे ऽधिमासोऽन्त्यः॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् मेषादि राशियों पर गमन करता हुआ सूर्य जब-जब चान्द्रमासों की पूर्ति करता है उस मासों को क्रम से चैत्रादि मास की संज्ञा दी गई है। जिसमें संक्रान्ति की पूर्ति नहीं होती है उसे अधिकमास कहते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री नारायण प्रसाद, वेद वाणी, अधिकमास एवं क्षयमास, सन् २००२, हरियाणा- वेदवाणी कार्यालय रेवली, (पृ० १२)। https://drive.google.com/file/d/1qsSgtZwIZs6iMUPpMeDhWFXjvgpa-XMq/view&amp;lt;/ref&amp;gt; अन्य मत के अनुसार, जिसे आरम्भ पक्ष कहते हैं-&amp;lt;blockquote&amp;gt;मीनादिस्थो रविर्येषामारम्भप्रथमे क्षणे। भवेत् तेऽब्दे चान्द्रमासाश्चैत्राद्या द्वादश स्मृताः॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् जिस चान्द्रमास के आरम्भ क्षण में रवि मीन राशि में हो, वह चैत्र मास कहलाता है। इसी प्रकार वर्ष के चैत्रादि बारह मास होते हैं। किसी सामान्य चान्द्रमास में आरम्भ पक्ष और पूर्तिपक्ष दोनों नियमों से एक ही मास की संज्ञा प्राप्त होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौर-वर्ष का मान ३६५ दिन, १५ घटी, २२ पल और ५७ विपल है। जबकि चंद्र वर्ष में ३५४ दिन, २२ घटी, १ पल और २३ विपल का होता है। इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष १० दिन, ५३ घटी, २१ पल (अर्थात लगभग ११ दिन) का अंतर है। सौरवर्ष और चन्द्र वर्ष में सामञ्जस्य स्थापित करना परम आवश्यक है। यह सामञ्जस्य स्थापित करने के लिये हर तीसरे वर्ष भारतीय पञ्चांगों में एक चंद्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। यही अधिकमास है। वस्तुतः यह स्थिति स्वयं ही आ जाती है जब दो अमावस्या के बीच सूर्य की संक्रान्ति नहीं आती।&amp;lt;blockquote&amp;gt;द्वात्रिंशद्-भिर्गतैर्मासैर्दिनैः षोडशभिस्तथा। घटिकानां चतुष्केण पततिह्यधिमासकः॥ (वसिष्ठ-सिद्धान्त)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिमास ३२ महीने, १६ दिन और ४ घटी बीत जाने पर अधिकमास होता है। सूर्यसिद्धान्त के अनुसार ३३,५३५१ चांद्रमासों में ३२,५३४ सौर मास होते हैं। इस कारण सौरमासों को चांद्रमास बनाने के लिये सौरमासों के उपरान्त अथवा २ वर्ष ८ महीनों के उपरान्त अधिकमास होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षयमास १४१ वर्ष पीछे और उसके बाद १९ वर्ष पीछे  आता है। क्षयमास कार्तिकादि तीन महीनों में से  होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==क्षयमास की उपपत्ति॥ Upapatti of Kshayamasa==&lt;br /&gt;
जिस चान्द्रमास में दो सूर्य-संक्रान्ति का समावेश हो जाय, वह क्षयमास कहलाता है। क्षयमास केवल कार्तिक, मार्ग व पौष मासों में होता है। जिस वर्ष क्षय-मास पडता है, उसी वर्ष अधिमास भी अवश्य पडता है परन्तु यह स्थिति १९ वर्षों या १४१ वर्षों के पश्चात् आती है। जैसे विक्रमी संवत् २०२० एवं २०३९ में क्षयमासों का आगमन हुआ तथा भविष्य में संवत् २०५८, २१५० में पडने की संभावना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== क्षयमास की विशेषता ===&lt;br /&gt;
क्षयमास अत्यन्त दुर्लभ घटना है। जब एक चन्द्रमास के भीतर सूर्य दो राशियों में प्रवेश कर लेता है, तब एक मास का लोप हो जाता है। इसे क्षयमास कहते हैं, ग्रन्थों के अनुसार - &lt;br /&gt;
* क्षयमास प्रायः कार्तिक, मार्गशीर्ष या पौष मास में ही सम्भव होता है।&lt;br /&gt;
* क्षयमास के पहले अथवा बाद में अधिकमास अवश्य पड़ता है।&lt;br /&gt;
* यह घटना बहुत लम्बे अन्तराल पर घटित होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अधिकमास एवं क्षयमास में त्याग योग्य कर्म॥ Adhikamasa  evam Kshayamasa mein Tyaga yogya karma==&lt;br /&gt;
गर्गाचार्य जी के मत से अधिकमास में त्याज्य कर्म -&amp;lt;blockquote&amp;gt;अग्न्याधानं प्रतिष्ठां च यज्ञो दानव्रतानि च। वेदव्रतवृषोत्सर्ग चूडाकरणमेखलाः॥गमनं देवतीर्थानां विवाहमभिषेचनम्। यानं च गृहकर्माणि मलमासे विवर्जयेत्॥ (गर्ग संहिता)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' अग्न्याधान, प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रतादि, वेदव्रत वृषोत्सर्ग, चूडाकर्म, व्रतबन्ध, देवतीर्थों में गमन, विवाह, अभिषेक, यान और घर के काम अर्थात् गृहारम्भादि कार्य अधिक मास में नहीं करना चाहिये। मनुस्मृति के आधार पर कर्त्तव्य इस प्रकार हैं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;तीर्थश्राद्धं दर्शश्राद्धं प्रेतश्राद्धं सपिण्डनम्। चन्द्रसूर्यग्रहे स्नानं मलमासे विधीयते॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' तीर्थश्राद्ध, दर्शश्राद्ध, प्रेतश्राद्ध, सपिण्डीकरण, चन्द्रसूर्यग्रहणीय स्नान अधिकमास में भी करना चाहिये।&amp;lt;blockquote&amp;gt;न कुर्यादधिके मासि काम्यं कर्म कदाचन। (स्मृत्यन्तर)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' अधिकमास में फल-प्राप्ति की कामना से किये जानेवाले प्रायः सभी काम वर्जित हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;वाप्याराम-तडाग-कूप-भवनारम्भ प्रतिष्ठे व्रतारम्भोत्सर्ग-वधूप्रवेशन-महादानानि सोमाष्टके। गोदानाग्रयण-प्रपा-प्रथमकोपाकर्म वेदव्रतं नीलोद्वाहमथातिपन्न शिशुसंस्कारान् सुरस्थापनम् ॥&lt;br /&gt;
दीक्षा-मौञ्जि-विवाह-मुण्डनम पूर्वं देवतीर्थेक्षणं संन्यासाग्निपरिग्रहौ नृपतिसन्दर्शाऽभिषेकौ गमम्। चातुर्मास्य समावृती श्रवणयोर्वेधं परीक्षां त्यजेद् वृद्धत्वास्तशिशुत्व इज्य-सितयोर्न्यूनाधिमासे तथा॥ (मुहूर्त चिंतामणि)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
== सौर एवं चांद्र वर्ष का गणितीय विश्लेषण ==&lt;br /&gt;
पंचांग गणना के अनुसार सौर और चांद्र वर्ष की अवधि में स्पष्ट भिन्नता पाई जाती है, जिसका विवरण निम्नवत् है:&lt;br /&gt;
* '''सौर वर्ष का मान:''' ३६५ दिन, १५ घड़ी, २२ पल और ५७ विपल।&lt;br /&gt;
* '''चांद्र वर्ष का मान:''' ३५४ दिन, २२ घड़ी, १ पल और २३ विपल।&lt;br /&gt;
इस प्रकार, दोनों गणनाओं के मध्य प्रतिवर्ष लगभग '''१० दिन, ५३ घटी और २१ पल''' (अर्थात लगभग ११ दिन) का अंतर उत्पन्न हो जाता है। इस गणितीय अंतर को पाटने के लिए हर तीसरे वर्ष चांद्र वर्ष में १२ मासों के स्थान पर १३ मास समायोजित किए जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अधिक मास: अवधारणा एवं कारण ==&lt;br /&gt;
जब किसी चंद्रमास के भीतर सूर्य की कोई संक्रांति (एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) नहीं होती, तो उस मास को '''&amp;lt;nowiki/&amp;gt;'अधिक मास'''' कहा जाता है। इसे क्षेत्रीय और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिमास, मलमास, मलिम्लुच मास या पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== क्षयमास: एक विशिष्ट खगोलीय स्थिति ==&lt;br /&gt;
क्षयमास एक दुर्लभ स्थिति है जो तब उत्पन्न होती है जब एक ही चंद्रमास के भीतर दो सूर्य संक्रांतियों का समावेश हो जाता है।&lt;br /&gt;
* '''निर्धारित मास:''' क्षयमास मुख्य रूप से कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन) और पौष मास में ही संभव होता है।&lt;br /&gt;
* '''सम्बद्धता:''' यह एक ज्योतिषीय नियम है कि जिस वर्ष क्षयमास पड़ता है, उस वर्ष अधिमास (अधिक मास) का आगमन भी अनिवार्य रूप से होता है।&lt;br /&gt;
* '''पुनरावृत्ति:''' क्षयमास की स्थिति सामान्यतः १९ वर्षों या १४१ वर्षों के अंतराल पर आती है।&lt;br /&gt;
अधिक मास और क्षयमास की व्यवस्था यह दर्शाती है कि प्राचीन भारतीय ऋषियों और खगोलविदों को आकाशीय पिण्डों की गति का सूक्ष्म ज्ञान था। यह व्यवस्था न केवल ऋतुओं और त्योहारों के तालमेल को बनाए रखती है, बल्कि समय की गणना को खगोलीय सत्यता के निकट लाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अधिकमास की पौराणिक कथा ==&lt;br /&gt;
पुराणों में अधिक मास के संबंध में एक अत्यंत रोचक एवं दार्शनिक कथा का वर्णन प्राप्त होता है, जो दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध से संबंधित है। इस कथा के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि ईश्वर की व्यवस्था और कालचक्र के समक्ष किसी भी प्रकार का अहंकार स्थायी नहीं रह सकता। पुराणों के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने कठोर तपस्या द्वारा ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। उसकी तपस्या से संतुष्ट होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान मांगने का अवसर प्रदान किया। हिरण्यकश्यप ने अमरता का वरदान चाहा, किंतु सृष्टि के नियमों के अनुसार ब्रह्मा जी किसी को अमरता प्रदान नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने हिरण्यकश्यप से कोई अन्य वर मांगने के लिए कहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब हिरण्यकश्यप ने अत्यंत चतुराई से अनेक शर्तों सहित वरदान मांगा। उसने कहा कि उसकी मृत्यु न किसी मनुष्य द्वारा हो, न किसी स्त्री द्वारा, न किसी पशु, देवता अथवा असुर द्वारा। वह वर्ष के बारह महीनों में किसी भी समय मृत्यु को प्राप्त न हो। उसकी मृत्यु न दिन में हो और न रात में। वह न किसी अस्त्र से मारा जाए और न किसी शस्त्र से। साथ ही, उसका वध न घर के भीतर हो और न घर के बाहर। ब्रह्मा जी ने उसकी इन शर्तों को स्वीकार कर उसे वरदान प्रदान कर दिया। इस वरदान को प्राप्त करने के पश्चात् हिरण्यकश्यप अत्यंत अहंकारी हो गया। उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया तथा समस्त प्रजा को अपनी उपासना करने के लिए बाध्य किया। धर्म और भक्ति का दमन होने लगा। ऐसे समय में भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा तथा भक्त प्रह्लाद के उद्धार हेतु नरसिंह अवतार धारण किया। यह अवतार आधे मनुष्य और आधे सिंह के रूप में था, जिससे हिरण्यकश्यप के वरदान की शर्तें निष्फल हो गईं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों में वर्णित है कि भगवान नरसिंह अधिक मास में संध्या समय प्रकट हुए। संध्या न पूर्णतः दिन होती है और न ही रात। उन्होंने हिरण्यकश्यप को राजमहल की देहरी पर पकड़ा, जो न घर के भीतर थी और न बाहर। तत्पश्चात् भगवान ने किसी अस्त्र या शस्त्र का प्रयोग न करके अपने नाखूनों से उसका वध किया। इस प्रकार हिरण्यकश्यप के सभी वरदान निष्प्रभावी सिद्ध हुए और धर्म की पुनः स्थापना हुई। यह कथा अधिक मास की महत्ता को भी प्रतिपादित करती है। सामान्य बारह महीनों से पृथक अधिक मास को भगवान विष्णु का विशेष प्रिय काल माना गया है। इसी कारण इसे “पुरुषोत्तम मास” भी कहा जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह मास साधना, भक्ति, दान तथा आत्मचिंतन के लिए अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धार्मिक दृष्टि से अधिकमास ===&lt;br /&gt;
अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। वैष्णव परम्परा में इसका अत्यधिक महत्व है। इस मास में भगवान विष्णु की आराधना, जप, तप, दान, तीर्थस्नान, कथा-श्रवण आदि का विशेष पुण्य माना गया है। धर्मशास्त्रों में विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत आदि मांगलिक कार्यों को अधिकमास में वर्जित बताया गया है, किन्तु - जप, तप, व्रत, दान, तीर्थयात्रा तथा भगवद्भक्ति आदि इनका विशेष विधान किया गया है। &lt;br /&gt;
=== वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्व ===&lt;br /&gt;
अधिकमास की व्यवस्था न हो, तो ऋतुओं और मासों में असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा। जैसे - &lt;br /&gt;
* चैत्र मास - शीतऋतु में आने लगेगा&lt;br /&gt;
* दीपावली - ग्रीष्म ऋतु में पड़ सकती है&lt;br /&gt;
* होली - वर्षा ऋतु में आने लगेगी।&lt;br /&gt;
अतः अधिकमास भारतीय पंचांग को ऋतु-संगत बनाए रखने का वैज्ञानिक साधन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सारांश॥ Summary==&lt;br /&gt;
विश्व के कैलेंडर के इतिहास में केवल भारत में ही महीनों का नामकरण वैज्ञानिक कहा जा सकता है। क्षयमास सामान्यतया ११९ या १९ वर्ष बाद घटित हुआ करता है। जब क्षयमास आता है तब ६-७ मासों के भीतर ही दो अधिक मास आ जाते हैं, जिनमें एक अधिमास क्षयमास से पूर्व और एक क्षयमास के बाद होता है। दो सूर्यसंक्रान्तियों से युक्त शुक्लादि चान्द्रमास को क्षयमास कहते हैं, इसे अंहस्पति वा न्यूनमास की संज्ञा भी दी गई है।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रियव्रत-शक्तिधर शर्मा, [https://archive.org/details/shaastriya-panchang-mimamsa/page/n30/mode/1up?view=theater शास्त्रीय पञ्चांग मीमांसा], सन् १९७९, श्रीमार्त्तण्ड ज्यौतिष कार्यालयः (पृ० १८६)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौर वर्ष और चान्द्रवर्ष में सामञ्जस्य स्थापित करने के लिये हर तीसरे वर्ष पंचाँगों में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। इसी को अधिक मास कहते हैं। सौर वर्ष का मान ३६५ दिन, १५ घटी, २२ पल और ५७ विपल हैं। जबकि चान्द्रवर्ष ३५४ दिन, २२ घडी, १ पल और २३ विपल का होता है। दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष १० दिन, ५३ घटी, २१॥ पल( औसतन ११ दिन) का अन्तर पडता है। इस अन्तर में समानता लाने के लिये चान्द्रवर्ष १२ मासों के स्थान पर १३ मास का हो जाता है। वास्तव में यह स्थिति स्वयं ही उत्पन्न हो जाती है क्योंकि जिस चान्द्रमास में सूर्य संक्रान्ति नहीं पडती, उसी को अधिकमास की संज्ञा दे दी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;पं० पन्नालाल ज्योतिषी, [https://ia801006.us.archive.org/2/items/brihatsamhitadr.surkantjha_201909/Jyotish%20Tattva%20-%20Panna%20Lal%20Jyotishi.pdf ज्योतिष तत्त्व], देवी दयालु ज्योतिषी एण्ड संज होशियारपुर, जालन्धर(पृ० २५)।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:Vedangas]]&lt;br /&gt;
[[Category:Jyotisha]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Navaratri_(%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF)&amp;diff=137644</id>
		<title>Navaratri (नवरात्रि)</title>
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		<updated>2026-04-29T15:32:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय धार्मिक परंपरा में नवरात्रि एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्रत एवं उत्सव है, जो शक्ति-उपासना का प्रमुख साधन माना जाता है। यह वर्ष में चार बार मनाया जाता है। नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है 'नौ रात्रियाँ, जिनमें आदिशक्ति के विविध रूपों की उपासना की जाती है। दुर्गापूजा का यह उत्सव विविध रूपों में मनाया जाता इसे दुर्गोत्सव या नवरात्र कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
भारतीय परंपरा में नवरात्रि मात्र एक उत्सव नहीं, अपितु अत्यंत संगठित व्रत-साधना का काल है, जिसमें शक्ति-तत्त्व की उपासना, काल-विज्ञान तथा अनुष्ठानिक अनुशासन का समन्वय देखने को मिलता है। नवरात्रि व्रत वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ - इन चार महीनों के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नवमी तिथि तक, कुल नौ दिनों तक विधिवत् सम्पन्न किया जाता है। इन नौ दिनों में साधक देवी के विभिन्न रूपों की उपासना, व्रत, जप, ध्यान एवं अनुष्ठान करते हुए आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्रत-विधान के प्रमुख अंग ==&lt;br /&gt;
उपवासमें बार-बार जल पीनेसे, एक बार भी ताम्बूल (पान) चबानेसे, दिनमें शयन करनेसे, अष्टविध मैथुन करने आदिसे व्रत-भंग हो जाता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असकृज्जलपानाच्च सकृत्ताम्बूलभक्षणात्। उपवासः प्रणश्येत्तु दिवास्वापाच्च मैथुनात्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसिन्धुकार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== दुर्गा के नौ रूप ==&lt;br /&gt;
देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। उनके पृथक् - पृथक् नाम इस प्रकार हैं। प्रथम नाम शैलपुत्री है। दूसरी मूर्तिका नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्तिको कूष्माण्डा कहते हैं। पाँचवीं देवी का नाम स्कन्द माता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनि कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है। नवीं दुर्गाका नाम सिद्धिदात्री है।&amp;lt;ref&amp;gt;पं० श्री रामनारायणदत्त शास्त्री, [https://vedpuran.net/wp-content/uploads/2021/05/durga_saptsati_web.pdf श्रीदुर्गासप्तशती], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० २०)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शैलपुत्री -''' गिरिराज हिमालयकी पुत्री पार्वतीदेवी, यद्यपि ये सबकी अधीश्वरी हैं। तथापि हिमालयकी तपस्या और प्रार्थनासे प्रसन्न हो कृपापूर्वक उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुईं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ब्रह्मचारिणी -''' ब्रह्म चारयितुं शीलं यस्याः सा ब्रह्मचारिणी, सच्चिदानन्दमय ब्रह्मस्वरूपकी प्राप्ति कराना जिनका स्वभाव हो, वे ब्रह्मचारिणी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चन्द्रघण्टा -''' चन्द्रः घण्टायां यस्याः सा चन्द्रघण्टा, आह्लादकारी चन्द्रमा जिनकी घण्टा में स्थित हों, उन देवीका नाम चन्द्रघण्टा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कूष्माण्डा -''' कुत्सितः ऊष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुतः संसारः, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्याः सा कूष्माण्डा, अर्थात त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदरमें स्थित है, वे भगवती कूष्माण्डा कहलाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''स्कन्दमाता -''' छान्दोग्यश्रुति के अनुसार भगवती की शक्तिसे उत्पन्न हुए सनत्कुमारका नाम स्कन्द है, उनकी माता होनेसे वे स्कन्दमाता कहलाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कात्यायनी -''' देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिए देवी महर्षि कात्यायनके आश्रमपर प्रकट हुईं और महर्षिने उन्हें अपनी कन्या माना, इसलिये कात्यायनी नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कालरात्रि -''' सबको मारने वाले कालकी भी रात्रि (विनाशिका) होनेसे उनका नाम कालरात्रि है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''महागौरी -''' इन्होंने तपस्याद्वारा महान गौरवर्ण प्राप्त किया था, अतः ये महागौरी कहलायीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सिद्धिदात्री -''' सिद्धि अर्थात मोक्षको देनेवाली होने से उनका नाम सिद्धिदात्री है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
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		<title>Navaratri (नवरात्रि)</title>
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		<updated>2026-04-28T17:10:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;भारतीय धार्मिक परंपरा में नवरात्रि एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्रत एवं उत्सव है, जो शक्ति-उपासना का प्रमुख साधन माना जाता है। यह वर्ष में चार बार मनाया जाता है। नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है 'नौ रात्रियाँ, जिनमें आदिशक्ति के विविध रूपों की उपासना की जाती है। दुर्गापूजा का यह उत्सव विविध रूपों में मनाया जाता इसे दुर्गोत्सव या नवरात्र कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
भारतीय परंपरा में नवरात्रि मात्र एक उत्सव नहीं, अपितु अत्यंत संगठित व्रत-साधना का काल है, जिसमें शक्ति-तत्त्व की उपासना, काल-विज्ञान तथा अनुष्ठानिक अनुशासन का समन्वय देखने को मिलता है। नवरात्रि व्रत वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ - इन चार महीनों के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नवमी तिथि तक, कुल नौ दिनों तक विधिवत् सम्पन्न किया जाता है। इन नौ दिनों में साधक देवी के विभिन्न रूपों की उपासना, व्रत, जप, ध्यान एवं अनुष्ठान करते हुए आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्रत-विधान के प्रमुख अंग ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== दुर्गा के नौ रूप ==&lt;br /&gt;
देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। उनके पृथक् - पृथक् नाम इस प्रकार हैं। प्रथम नाम शैलपुत्री है। दूसरी मूर्तिका नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्तिको कूष्माण्डा कहते हैं। पाँचवीं देवी का नाम स्कन्द माता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनि कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है। नवीं दुर्गाका नाम सिद्धिदात्री है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
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		<title>Navaratri (नवरात्रि)</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;भारतीय धार्मिक परंपरा में नवरात्रि एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्रत एवं उत्सव है, जो शक्ति-उपासना का प्रमुख साधन माना जाता है। यह वर्ष में चार बार मनाया जाता है। नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है 'नौ रात्रियाँ, जिनमें आदिशक्ति के विविध रूपों की उपासना की जाती है। दुर्गापूजा का यह उत्सव विविध रूपों में मनाया जाता इसे दुर्गोत्सव या नवरात्र कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
भारतीय परंपरा में नवरात्रि मात्र एक उत्सव नहीं, अपितु अत्यंत संगठित व्रत-साधना का काल है, जिसमें शक्ति-तत्त्व की उपासना, काल-विज्ञान तथा अनुष्ठानिक अनुशासन का समन्वय देखने को मिलता है। नवरात्रि व्रत वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ - इन चार महीनों के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नवमी तिथि तक, कुल नौ दिनों तक विधिवत् सम्पन्न किया जाता है। इन नौ दिनों में साधक देवी के विभिन्न रूपों की उपासना, व्रत, जप, ध्यान एवं अनुष्ठान करते हुए आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का प्रयास करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== व्रत-विधान के प्रमुख अंग ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
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		<title>Navaratri (नवरात्रि)</title>
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		<updated>2026-04-28T10:29:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: नया लेख प्रारंभ - नवरात्रि&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;भारतीय धार्मिक परंपरा में नवरात्रि एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्रत एवं उत्सव है, जो शक्ति-उपासना का प्रमुख साधन माना जाता है। यह वर्ष में चार बार मनाया जाता है। नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है 'नौ रात्रियाँ, जिनमें आदिशक्ति के विविध रूपों की उपासना की जाती है। दुर्गापूजा का यह उत्सव विविध रूपों में मनाया जाता है। इसे दुर्गोत्सव या नवरात्र कहा जाता है।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137633</id>
		<title>Vrata (व्रत)</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में व्रत (संस्कृत: व्रियते इति व्रतम्) जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण और अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। व्रत एवं नियम को पर्यायवाचक माना गया है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना व्रत कहलाता है। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। व्रत धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। इसका संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आत्मिक विकास की ओर अग्रसर करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
भारतीय धार्मिक एवं दार्शनिक परंपरा में व्रत का स्वरूप केवल बाह्य आचरण या अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, अपितु यह गहन आंतरिक अनुशासन, मानसिक संयम तथा आध्यात्मिक साधना का समन्वित रूप है। प्रस्तुत विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि व्रत का वास्तविक आधार नियम (discipline) है, और यही नियम तपस्वरूप माने गए हैं। इस प्रकार व्रत का मूल उद्देश्य इन्द्रियनिग्रह एवं चित्तशुद्धि है। व्रियते इति व्रतम जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण, अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। ऋग्वेद में वर्णित है कि सत्य इत्यादि व्रतों को व्यवहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। ऋग्वेद में सत्य एवं परिमित बोलने को व्रत कहा है। यजुर्वेद में सत्य एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। संयम व्रत का वर्णन करते हुए सामवेद में कहा गया है कि देवता संयमी लोगों पर कृपा करते हैं। दान करना प्रत्येक व्रत का अभिन्न अंग कहा गया है। अन्नदान के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो अतिथियों को अन्न दान करता है वह सभी प्राणियों का रक्षक है। अथर्ववेद में कहा गया है कि कटुवाणी का उपयोग नहीं करना चाहिए। मनुष्य जीवन को सफल बनाने वाले कर्मों में व्रतों की बड़ी महिमा है। देवल का कहना है कि व्रत और उपवास के नियम पालन से शरीर को तपाना ही तप है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः। शरीरशोषणं यत् तत् तप इत्युच्यते बुधैः॥ (व्रत परिचय)&amp;lt;ref&amp;gt;हनुमान् शर्मा, व्रतपरिचय (सं.2051), गीताप्रेस गोरखपुर, (पृ. 3)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत अनेक हैं और व्रतों के प्रकार भी अनेक हैं। लोकप्रसिद्धि में व्रत एवं उपवास दो होते हैं। ये कायिक, वाचिक, मानसिक, नित्य, नैमित्तिक, काम्य, एकभुक्त, अयाचित, मितभुक्, चान्द्रायण और प्राजापत्य के रूप में किये जाते हैं। वास्तव में व्रत और उपवास दोनों एक हैं, अन्तर यह है कि व्रत में भोजन किया जा सकता है जबकि उपवास में निराहार रहना पड़ता है। इनके कायिक आदि तीन भेद इस प्रकार हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#शस्त्राघात, मर्माघात और कार्यहानि आदि जनित हिंसा के त्याग से कायिक कहलाता है।&lt;br /&gt;
#सत्य बोलने और प्राणिमात्र के प्रति निर्वैर रहने से वाचिक हुआ।&lt;br /&gt;
# मन को शान्त रखने की दृढ़ता से मानसिक व्रत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुण्यसंचय के एकादशी और त्रयोदशी आदि 'नित्य' व्रत, पापक्षय के चान्द्रायणादि 'नैमित्तिक' व्रत और सुख-सौभाग्यादि के वटसावित्री आदि 'काम्य' व्रत माने गये हैं। इनमें द्रव्यविशेष के भोजन और पूजनादि की साधना के द्वारा साध्य व्रत 'प्रवृत्तिरूप' होते हैं और केवल उपवासादि करने के द्वारा साध्य व्रत 'निवृत्तिरूप' होते हैं। इनका यथोचित उपयोग फल देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतों को सम्पन्न करने के लिये अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। जिनमें वैदिक मन्त्रों का उपयोग होता है, मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये वेदांगों का विशेष महत्व है। रामायण का आधार सत्यव्रत है। रामायण में राम के दृढ़व्रत, सीता के पतिव्रत तथा भरत के तपोव्रत एवं हनुमान के सेवाव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत में क्षमा को सर्वश्रेष्ठ व्रत कहा है। क्षमाशील मनुष्य को यज्ञवेता, ब्रह्मवेता एवं तपस्वी पुरुषों से भी श्रेष्ठ बताया है। महाभारत में ब्रह्मचर्य, सत्य एवं पतिव्रत आदि व्रतों का वर्णन मिलता है। पुराणों में वर्णित है कि प्रत्येक व्रत में इन्द्रियों का नियमन (संयम) करना होता है। इस लिये इसे नियम कहते हैं। पुराणों में व्रतों के लक्षणों का वर्णन प्राप्त होता है। सत्य, क्षमा, दया, दान, शौच, इन्द्रियसंयम, देवपूजा प्रत्येक तिथि, मास, नक्षत्र एवं दिन के अनुसार धारण किये जाने वाले व्रतों का विस्तृत वर्णन पुराणों में वर्णित है। व्रताचरण, उपवास, नियमोंके परिपालन तथा विविध दानोंसे व्रतियों पर सभी देवता, ऋषि-मुनि तथा संसारके प्राणी निश्चित प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं -&amp;lt;ref&amp;gt;पी० वी० काणे, [https://archive.org/details/litI_dharma-shastra-ka-itihas-vol-4-of-dr.-pandurang-vaman-kane-uttar-pradesh-hindi-sansthan/page/n90/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास - भाग 4], उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (पृ० ४३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा देवादयो भवन्त्येव तेषां प्रीता न संशयः॥ (भविष्यपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपवासैस्तथा तुल्यं तपः कर्म न विद्यते॥ दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु विश्वामित्रेण धीमता। तपसाक्रान्तमेकेन भक्तेन स च विप्रत्वमागतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपोष्य विधिवद्देवांस्त्रिदिवं प्रतिपेदिरे। ऋषयश्च परां सिद्धिमुपवासैरवाप्नुयुः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये कुर्वन्ति उपवासांश्च विधानेन शुभान्विताः। न यान्ति ते मुनिश्रेष्ठ नरकान् भीमदारुणान्॥ (पद्मपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपवासके समान कोई तपश्चर्या नहीं है। महामति महर्षि विश्वामित्रजीने दिव्य हजार वर्षोंतक महान् तप किया और एकभुक्तव्रतका आचरण किया, उसीके प्रभावसे उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, उन्होंने व्रतोपवासद्वारा विविध देवताओंकी उपासना कर उत्तम स्वर्गलोक प्राप्त किया। ऋषियोंने भी उपवासोंके परिपालनसे परम सिद्धि प्राप्त की। जो कल्याणकामी विधिपूर्वक व्रतोपवासोंका परिपालन करते हैं, वे दारुण तथा भयंकर नरकोंमें नहीं जाते।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासैर्यैर्विष्णुर्नान्यजन्मनि तोषितः। ते नरा मुनिशार्दूल ग्रहरोगादिबाधिनः॥ (विष्णुधर्मोत्तरपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रतोपवासोंके द्वारा भगवान् विष्णुको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य ही इस जन्ममें ग्रह, रोग, व्याधिकष्ट आदिसे पीडित रहते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;न पूजितो भूतपतिः पुरा यै-र्व्रतं न चीर्णं न च सत्यमुक्तम्। दारिद्र्यशोकामयदुःखदग्धाः प्रायोऽनुशोचन्ति त एव मर्त्याः॥ (स्कन्दपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वमें भूतोंके अधिपति भगवान् शंकरका पूजन नहीं किया, व्रतपालन नहीं किया, सत्य वचनका पालन नहीं किया, वे ही मनुष्य दरिद्रता, शोक, रोग तथा दुःखोंसे दग्ध होते हैं तथा पश्चात्तापको प्राप्त होते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;ये सर्वदा व्रतपराश्च शिवं स्मरन्ति तेषां न दृष्टिपथमप्युपयान्ति दूताः। याम्या महाभयकृतोऽपि च पाशहस्ताः दंष्ट्राकरालवदना विकटोग्रवेषा ॥ (स्कन्दपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो सदा ही व्रतपरायण रहते हैं और भगवान् शिवका स्मरण करते रहते हैं, उनके सामने महान् भय उत्पन्न करनेवाले, हाथमें पाश धारण किये हुए, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले तथा उग्र वेशवाले यमराजके विकट दूत नहीं आते।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः॥ व्रतोपवासनियमैहोंमैः स्वाध्यायतर्पणैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषां वै रुद्रसायुज्यं सामीप्यञ्चातिदुर्लभम्॥ सलोकतां च सारूप्यं जायते तत्प्रसादतः॥ (कूर्मपुराण)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो व्रत, उपवास, नियम, होम, स्वाध्याय, तर्पण, यज्ञ, दान तथा ध्यान-समाधिके द्वारा भगवान् महादेवका अर्चन करते हैं, उन्हें भगवान् शंकरकी कृपासे अति दुर्लभ रुद्रसायुज्य, सामीप्य, सालोक्य तथा सारूप्य मोक्षकी प्राप्ति होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;[https://dn710602.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.402143/2015.402143.Kalyaan-Virat.pdf कल्याण विशेषांक-व्रतपर्वोत्सव], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा॥ Definition==&lt;br /&gt;
व्रत शब्द संस्कृत के वृञ् वरणे धातु से बना है, जिसका अर्थ है, चुनना और संकल्प करना। अर्थात इंद्रियनिग्रह, मनोनिग्रह और आचरण शुद्धि का समन्वय जिसमें सम्मिलित होता हो। अतः व्रत का मूल अर्थ हुआ - नियमपूर्वक किया गया दृढ संकल्प। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वैदिक साहित्य में व्रत विधान॥ Fasting rules in Vedic literature==&lt;br /&gt;
वैदिक एवं उपनिषद् साहित्य में व्रत की संकल्पना अत्यन्त व्यापक रूप में प्रस्तुत हुई है। सामान्यतः व्रत को केवल उपवास या किसी विशेष तिथि पर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान के रूप में समझ लिया जाता है, किन्तु वैदिक दृष्टि में व्रत का स्वरूप इससे कहीं अधिक गूढ़ और जीवनपर्यन्त साधना से सम्बद्ध है।&amp;lt;ref&amp;gt;नवीन शर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/329906 संस्कृत साहित्य में यज्ञ एवं व्रत का समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१९), पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला (पृ० ९७)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ऋग्वेद में व्रत॥ fasting in rigveda''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतों को व्यवाहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। सभी के साथ मित्रता की भावना रखने वाले व्रती को अगाध मात्रा में धन प्राप्त होता है। वाणी के सत्य एवं परिमित व्रतों के बारे में कहा गया है कि जो वाणी से कर्मों की महिमा बढ़ाते हैं उन्हें देवगण दुष्कर्म रूपी पापों से सुरक्षित करते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मत्र्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः॥ (ऋग्वेद ८।११।१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;हे अग्निदेव! आप व्रतका पालन-रक्षण करनेवाले हैं। हे दीप्तिमान् देव! आप सभी मनुष्योंमें विद्यमान रहते हैं। आप सभी यज्ञों (कर्मों) में विराजमान रहते हैं। आप प्रशंसनीय हैं, स्तुत्य हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''यजुर्वेद में व्रत॥ fasting in yajurveda'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यजुर्वेद में सत्य बोलना एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। अग्नि को व्रतपते कह कर सम्बोधित किया गया है। याचकों द्वारा अग्नि देव के अनुग्रह से सत्य का पालन करना वर्णित है। नियमपूर्वक सद्‌कार्यों से व्यक्ति का समर्थवान बनना वर्णित है। यह मनुष्य के आचरण, विचार और अन्तःकरण की शुद्धि का साधन है, जो उसे सत्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। यजुर्वेद के मन्त्रों में कहा गया है कि -&amp;lt;blockquote&amp;gt;अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्। इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥ (यजु० १।५)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतोंकी रक्षा करनेवाले हे अग्निदेव! मैं व्रताचरण करूँगा, आप मुझे व्रतोंके आचरणकी शक्ति प्रदान कीजिये। मेरा यह व्रताचरण निर्विघ्न सम्पन्न हो जाय। मैं असत्यसे दूर रहकर सत्यका ही आचरण करूँ। ऐसा आशीर्वाद मुझे प्रदान कीजिये।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्। दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ (यजु० १९।३०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत धारण करनेसे मनुष्य दीक्षित होता है। दीक्षासे उसे दाक्षिण्य (दक्षता, निपुणता) प्राप्त होता है। दक्षताकी प्राप्तिसे श्रद्धाका भाव जाग्रत् होता है और श्रद्धासे ही सत्यस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अथर्ववेद में व्रत॥ fasting in Atharvaveda'''&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह। तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वे॥ (अथर्व० ७।७४।४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतोंके स्वामी हे अग्निदेव ! आप व्रतानुष्ठानके द्वारा सम्यक् रूपसे प्रसन्न होते हैं। सर्वदा प्रसन्न मनवाले होकर आप हमारे घरमें प्रकाशित होनेकी कृपा करें। इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न तथा सम्यक् रूपसे प्रकाशमान हे जातवेद ! पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हम सभी आपकी उपासनामें लगे रहें।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। अन्नं न परिचक्षीत। तद् व्रतम्। अन्नं बहु कुर्वीत। तद् व्रतम्। न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्॥ (तैत्तिरीयोपनिषद् भृगुवल्ली अनु० ७-१०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अन्नकी निन्दा न करे, वह व्रत है। अन्नकी अवहेलना न करे, वह एक व्रत है। अन्नको बढ़ाये, वह एक व्रत है। अपने घरपर ठहरनेके लिये आये हुए किसी भी अतिथिको प्रतिकूल उत्तर न दे, वह एक व्रत है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्वृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥ (मुण्डक० ३।१।६) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;सत्य ही विजयी होता है, झूठ नहीं; क्योंकि वह देवयान नामक मार्ग सत्यसे परिपूर्ण है। जिससे पूर्णकाम ऋषिलोग (वहाँ) गमन करते हैं, जहाँ वह सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका उत्कृष्ट धाम है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुराणों में व्रत परंपरा॥ fasting tradition in Puranas==&lt;br /&gt;
व्रतों के करने से लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य इन व्रतों को धारण करता है उसे अनेकानेक नियमों का पालन करना पडता है। व्रत करने वाले को स्नान तो नित्य ही करना चाहिये, खारी वस्तुएँ, शहद, लवण, मदिरा इत्यादि के सेवन से बचना चाहिए -&amp;lt;ref&amp;gt;सुरेन्द्र कुमार सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/328108 पुराणों में व्रत एवं उपवास] (१९८८), काशी विद्यापीठ, वाराणसी (पृ० ११३)&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;blockquote&amp;gt;नित्यस्नायी मिताहारो गुरुदेव द्विजार्चकः। क्षारं क्षौद्रं च लवणं मधु मांसानि वर्जयेत्॥ (अग्नि पुराण १७५/१२)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत करने वाले को चाहिये कि वह किसी भी वस्तु की चोरी न करे, किसी भी प्राणिमात्र की हिंसा न करे, किसी भी वस्तु के प्रति लालच न करे, इन पाँच प्रकार के नियमों का उल्लेख लिंग महापुराण में प्राप्त होता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च अलोभस्त्याग एव च। व्रतानि पञ्च भिक्षूणां हिंसा परमां त्विह॥ (लिंगमहापुराण १/८२/२४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतों को धारण करने वाले व्यक्ति को जो भी त्याज्य वस्तुएं हैं तथा जो भी नियम हैं उन सभी का पालन करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रतों के प्रकार॥ Types of Vrat==&lt;br /&gt;
पुराण विभिन्न प्रकार के व्रतों को दर्शाते हैं, जैसे - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''कायिक व्रत -''' यह शरीर से संबंधित व्रत है। उपवास जैसी शारीरिक तपस्या पर जोर दिया जाता है। हिंसा आदिके त्यागको कायिकव्रत कहते हैं।&lt;br /&gt;
*'''वाचिक व्रत -''' यह वाणी से संबंधित व्रत है, इसमें सत्य बोलने और धर्मग्रंथों का पाठ करने को बहुत महत्व दिया जाता है। कटुवाणी, पिशुनता (चुगुली) तथा निन्दाका त्याग और सत्य, परिमित तथा हितयुक्त मधुर भाषण वाचिकव्रत कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*'''मानसिक व्रत -''' यह मन से संबंधित व्रत। यहां जोर मन को नियंत्रित करने, उसमें उत्पन्न होने वाले जुनून और पूर्वाग्रहों को नियंत्रित करने पर है। काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या तथा राग-द्वेष आदिसे रहित रहना मानसिक व्रत है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक व्रत को उसकी अवधि के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है, एक दिन तक चलने वाला व्रत दिन-व्रत होता है, और एक पक्ष (सप्ताह) तक चलने वाला व्रत पक्ष-व्रत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शास्त्रों के अनुसार व्रत के निम्नलिखित चार प्रकार हैं -  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#उपवास&lt;br /&gt;
# एकभुक्त&lt;br /&gt;
#नक्त&lt;br /&gt;
#अयाचित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रताचरणसे मनुष्यकों उन्नत जीवनकी योग्यता प्राप्त होती है। व्रतोंमें तीन बातोंकी प्रधानता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#संयम-नियमका पालन&lt;br /&gt;
# देवाराधन&lt;br /&gt;
#लक्ष्यके प्रति जागरूकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;भवनाथ झा, धर्मायण-व्रत विधि विशेषांक, [https://mahavirmandirpatna.org/dharmayan/wp-content/uploads/2022/07/Dharmayan-vol.-119-Vrata-vidhi-Ank-ebook.pdf म०म० रुद्रधर कृत व्रत-पद्धति में व्रत-विधान] (२०२२), महावीर मन्दिर, पटना (पृ० ३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रत की उपयोगिता॥ Vrat ki Upayogita==&lt;br /&gt;
वेदों में उल्लेख प्राप्त होता है कि व्रत धारण करने से मनुष्य दीक्षित होता है। दाक्षिण्य (दक्षता से, निपुणता) प्राप्त होती है। दक्षता की प्राप्ति से श्रद्धा का भाव जाग्रत होता है एवं श्रद्धा से सत्यस्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋग्वेद में सत्य बोलना व्रत कहा गया है। सत्य बोलने वाले मनुष्य पर देवताओं का प्रसन्न होना वर्णित है। मधुर भाषण को श्रेष्ठ व्रत कहा है। ऋग्वेद में दानशीलता को उत्तम व्रत कहा है। जो सामर्थ्यशाली एवं मित्र होते हुए भी मित्र को अन्नदान नहीं करते या उसका सत्कार नहीं करते ऐसे कृपण मनुष्य का परित्याग कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यजुर्वेद में सत्य इत्यादि श्रेष्ठ व्रतों का पालन करने का निर्देश किया गया है। सत्य इत्यादि व्रतों के पालन से व्यक्ति धनवान होता है। सामवेद में कहा गया है कि सत्यव्रत धारण करने वाले मनुष्य की रक्षा भगवान करते हैं। विद्वान को चाहिए कि वह कभी भी क्रोध न करे। किसी के प्रति अनादर का भाव मन न में लाए। सदा परमात्मा के ध्यान में लीन रहे तथा भगवान की स्तुति करे।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अनुव्रतः पितु पुत्रो मात्रा भवतु समना। जाया पत्ये मधुमर्ती वाच वदतु शान्तिवाम्॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अथर्ववेद में कहा गया है कि पुत्र को अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए। यही पुत्र धर्म के पालन हैं। पत्नी को अपने पति से मधुरता तथा सुख युक्त वाणी से वार्ता करनी चाहिए। ब्राह्मण व ग्रन्थों में सत्य इत्यादि श्रेष्ठ व्रतों का अनुपालन करने का निर्देश है। उपनिषदों में काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि विकृतियों का दमन करते हुए स्वाध्याय एवं प्रवचन करने का निर्देश है। व्रतों को सम्पन्न करने के लिये अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं, जिनमें वैदिक मन्त्रों का उपयोग होता है। मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिए वेदांगों का विशेष महत्व है। तिथियों, नक्षत्रों, वारों एवं अन्य प्रकार के व्रतों की सम्पन्नता हेतु मूहुर्त ज्ञान के लिये ज्योतिष वेदांग का अत्यन्त महत्व है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामायण का आधार सत्यव्रत से प्रारम्भ होता है। राजा दशरथ ने सत्य वचन के कारण धर्म-बन्धन में बंध कर प्यारे पुत्र राम को वनवास दिया। वाल्मीकि श्रीराम के असंख्य गुणों का उल्लेख करते हुए सत्यवाक्य तथा दृढव्रत श्रीराम सभी व्रतों के बीज हैं। राम ने अपने चरित्र द्वारा समस्त व्रतों, धर्मों एवं नियमों का पालन करके एक आदर्श स्थापित किया। रामायण में श्रीराम के दृढव्रत एवं सीता के पतिव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है, साथ ही भरत का तपोव्रत एवं हनुमान के सेवा व्रत का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत में क्षमाव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है कि जिसने पहले कभी तुम्हारा उपकार किया हो उससे यदि भारी अपराध हो जाए तो पहले उपकार का स्मरण करके उस अपराधी को क्षमा कर देना चाहिए। मनुष्य कोमल स्वभाव से उग्र स्वभाव तथा शान्त स्वभाव से शत्रुता का भी नाश कर सकता है। मृदुता से सब कुछ सिद्ध किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों में शास्त्रोक्त नियमों को व्रत कहा गया है, वही तप माना है दम (इन्द्रियसंयम) एवं शम (मनोनिग्रह) आदि विशेष नियम भी व्रत के ही अंग हैं। व्रत करने वाले पुरुष को शारीरिक संताप सहन करना पड़ता है। इसलिये व्रत को तप नाम दिया गया है। इसी प्रकार व्रत में इन्द्रियसमुदाय का नियमन (संयम करना होता है, इसलिये इसे नियम कहते हैं)। पापों से निवृत्त होकर सब प्रकार के भोगों का त्याग करते हुए जो सदगुणों के साथ वास करता है उसी को उपवास समझना चाहिए। पुराणों में उपवास में निषेध वस्तुओं के वर्णन के साथ व्रतों में धारण करने वाले नियमों का वर्णन मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीविश्वनाथ शर्मा, [https://archive.org/details/iBaw_vrataraj-of-vishvanath-sharma-with-bhasha-tika-by-madhavacharya-khemraj/page/n4/mode/1up श्रीव्रतराजः] (१९८४), खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई (पृ० ७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
अग्नि पुराण तथा गरुड़ पुराण में यह प्रतिपादित किया गया है कि व्रत का वास्तविक स्वरूप इन्द्रियों के संयम से ही सिद्ध होता है। केवल बाह्य क्रियाएँ जैसे - उपवास, स्नान या पूजा व्रत की पूर्णता नहीं प्रदान करतीं, जब तक कि साधक आंतरिक रूप से विषयासक्ति का त्याग न करे। अतः व्रत का स्वरूप द्वि-आयामी है - &lt;br /&gt;
* बाह्य (External): उपवास, पूजा, आचार&lt;br /&gt;
* आंतरिक (Internal): मनोनिग्रह, इन्द्रियसंयम, संकल्पशुद्धि&lt;br /&gt;
यह द्वैत ही व्रत को एक समग्र आध्यात्मिक साधना बनाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137632</id>
		<title>Vrata (व्रत)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137632"/>
		<updated>2026-04-28T09:33:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में व्रत (संस्कृत: व्रियते इति व्रतम्) जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण और अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। व्रत एवं नियम को पर्यायवाचक माना गया है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना व्रत कहलाता है। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। व्रत धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। इसका संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आत्मिक विकास की ओर अग्रसर करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
भारतीय धार्मिक एवं दार्शनिक परंपरा में व्रत का स्वरूप केवल बाह्य आचरण या अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, अपितु यह गहन आंतरिक अनुशासन, मानसिक संयम तथा आध्यात्मिक साधना का समन्वित रूप है। प्रस्तुत विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि व्रत का वास्तविक आधार नियम (discipline) है, और यही नियम तपस्वरूप माने गए हैं। इस प्रकार व्रत का मूल उद्देश्य इन्द्रियनिग्रह एवं चित्तशुद्धि है। व्रियते इति व्रतम जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण, अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। ऋग्वेद में वर्णित है कि सत्य इत्यादि व्रतों को व्यवहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। ऋग्वेद में सत्य एवं परिमित बोलने को व्रत कहा है। यजुर्वेद में सत्य एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। संयम व्रत का वर्णन करते हुए सामवेद में कहा गया है कि देवता संयमी लोगों पर कृपा करते हैं। दान करना प्रत्येक व्रत का अभिन्न अंग कहा गया है। अन्नदान के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो अतिथियों को अन्न दान करता है वह सभी प्राणियों का रक्षक है। अथर्ववेद में कहा गया है कि कटुवाणी का उपयोग नहीं करना चाहिए। मनुष्य जीवन को सफल बनाने वाले कर्मों में व्रतों की बड़ी महिमा है। देवल का कहना है कि व्रत और उपवास के नियम पालन से शरीर को तपाना ही तप है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः। शरीरशोषणं यत् तत् तप इत्युच्यते बुधैः॥ (व्रत परिचय)&amp;lt;ref&amp;gt;हनुमान् शर्मा, व्रतपरिचय (सं.2051), गीताप्रेस गोरखपुर, (पृ. 3)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत अनेक हैं और व्रतों के प्रकार भी अनेक हैं। लोकप्रसिद्धि में व्रत एवं उपवास दो होते हैं। ये कायिक, वाचिक, मानसिक, नित्य, नैमित्तिक, काम्य, एकभुक्त, अयाचित, मितभुक्, चान्द्रायण और प्राजापत्य के रूप में किये जाते हैं। वास्तव में व्रत और उपवास दोनों एक हैं, अन्तर यह है कि व्रत में भोजन किया जा सकता है जबकि उपवास में निराहार रहना पड़ता है। इनके कायिक आदि तीन भेद इस प्रकार हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#शस्त्राघात, मर्माघात और कार्यहानि आदि जनित हिंसा के त्याग से कायिक कहलाता है।&lt;br /&gt;
#सत्य बोलने और प्राणिमात्र के प्रति निर्वैर रहने से वाचिक हुआ।&lt;br /&gt;
# मन को शान्त रखने की दृढ़ता से मानसिक व्रत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुण्यसंचय के एकादशी और त्रयोदशी आदि 'नित्य' व्रत, पापक्षय के चान्द्रायणादि 'नैमित्तिक' व्रत और सुख-सौभाग्यादि के वटसावित्री आदि 'काम्य' व्रत माने गये हैं। इनमें द्रव्यविशेष के भोजन और पूजनादि की साधना के द्वारा साध्य व्रत 'प्रवृत्तिरूप' होते हैं और केवल उपवासादि करने के द्वारा साध्य व्रत 'निवृत्तिरूप' होते हैं। इनका यथोचित उपयोग फल देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतों को सम्पन्न करने के लिये अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। जिनमें वैदिक मन्त्रों का उपयोग होता है, मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये वेदांगों का विशेष महत्व है। रामायण का आधार सत्यव्रत है। रामायण में राम के दृढ़व्रत, सीता के पतिव्रत तथा भरत के तपोव्रत एवं हनुमान के सेवाव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत में क्षमा को सर्वश्रेष्ठ व्रत कहा है। क्षमाशील मनुष्य को यज्ञवेता, ब्रह्मवेता एवं तपस्वी पुरुषों से भी श्रेष्ठ बताया है। महाभारत में ब्रह्मचर्य, सत्य एवं पतिव्रत आदि व्रतों का वर्णन मिलता है। पुराणों में वर्णित है कि प्रत्येक व्रत में इन्द्रियों का नियमन (संयम) करना होता है। इस लिये इसे नियम कहते हैं। पुराणों में व्रतों के लक्षणों का वर्णन प्राप्त होता है। सत्य, क्षमा, दया, दान, शौच, इन्द्रियसंयम, देवपूजा प्रत्येक तिथि, मास, नक्षत्र एवं दिन के अनुसार धारण किये जाने वाले व्रतों का विस्तृत वर्णन पुराणों में वर्णित है। व्रताचरण, उपवास, नियमोंके परिपालन तथा विविध दानोंसे व्रतियों पर सभी देवता, ऋषि-मुनि तथा संसारके प्राणी निश्चित प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा देवादयो भवन्त्येव तेषां प्रीता न संशयः॥ (भविष्यपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपवासैस्तथा तुल्यं तपः कर्म न विद्यते॥ दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु विश्वामित्रेण धीमता। तपसाक्रान्तमेकेन भक्तेन स च विप्रत्वमागतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपोष्य विधिवद्देवांस्त्रिदिवं प्रतिपेदिरे। ऋषयश्च परां सिद्धिमुपवासैरवाप्नुयुः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये कुर्वन्ति उपवासांश्च विधानेन शुभान्विताः। न यान्ति ते मुनिश्रेष्ठ नरकान् भीमदारुणान्॥ (पद्मपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपवासके समान कोई तपश्चर्या नहीं है। महामति महर्षि विश्वामित्रजीने दिव्य हजार वर्षोंतक महान् तप किया और एकभुक्तव्रतका आचरण किया, उसीके प्रभावसे उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, उन्होंने व्रतोपवासद्वारा विविध देवताओंकी उपासना कर उत्तम स्वर्गलोक प्राप्त किया। ऋषियोंने भी उपवासोंके परिपालनसे परम सिद्धि प्राप्त की। जो कल्याणकामी विधिपूर्वक व्रतोपवासोंका परिपालन करते हैं, वे दारुण तथा भयंकर नरकोंमें नहीं जाते।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासैर्यैर्विष्णुर्नान्यजन्मनि तोषितः। ते नरा मुनिशार्दूल ग्रहरोगादिबाधिनः॥ (विष्णुधर्मोत्तरपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रतोपवासोंके द्वारा भगवान् विष्णुको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य ही इस जन्ममें ग्रह, रोग, व्याधिकष्ट आदिसे पीडित रहते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;न पूजितो भूतपतिः पुरा यै-र्व्रतं न चीर्णं न च सत्यमुक्तम्। दारिद्र्यशोकामयदुःखदग्धाः प्रायोऽनुशोचन्ति त एव मर्त्याः॥ (स्कन्दपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वमें भूतोंके अधिपति भगवान् शंकरका पूजन नहीं किया, व्रतपालन नहीं किया, सत्य वचनका पालन नहीं किया, वे ही मनुष्य दरिद्रता, शोक, रोग तथा दुःखोंसे दग्ध होते हैं तथा पश्चात्तापको प्राप्त होते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;ये सर्वदा व्रतपराश्च शिवं स्मरन्ति तेषां न दृष्टिपथमप्युपयान्ति दूताः। याम्या महाभयकृतोऽपि च पाशहस्ताः दंष्ट्राकरालवदना विकटोग्रवेषा ॥ (स्कन्दपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो सदा ही व्रतपरायण रहते हैं और भगवान् शिवका स्मरण करते रहते हैं, उनके सामने महान् भय उत्पन्न करनेवाले, हाथमें पाश धारण किये हुए, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले तथा उग्र वेशवाले यमराजके विकट दूत नहीं आते।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः॥ व्रतोपवासनियमैहोंमैः स्वाध्यायतर्पणैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषां वै रुद्रसायुज्यं सामीप्यञ्चातिदुर्लभम्॥ सलोकतां च सारूप्यं जायते तत्प्रसादतः॥ (कूर्मपुराण)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो व्रत, उपवास, नियम, होम, स्वाध्याय, तर्पण, यज्ञ, दान तथा ध्यान-समाधिके द्वारा भगवान् महादेवका अर्चन करते हैं, उन्हें भगवान् शंकरकी कृपासे अति दुर्लभ रुद्रसायुज्य, सामीप्य, सालोक्य तथा सारूप्य मोक्षकी प्राप्ति होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;[https://dn710602.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.402143/2015.402143.Kalyaan-Virat.pdf कल्याण विशेषांक-व्रतपर्वोत्सव], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा॥ Definition==&lt;br /&gt;
व्रत शब्द संस्कृत के वृञ् वरणे धातु से बना है, जिसका अर्थ है, चुनना और संकल्प करना। अर्थात इंद्रियनिग्रह, मनोनिग्रह और आचरण शुद्धि का समन्वय जिसमें सम्मिलित होता हो। अतः व्रत का मूल अर्थ हुआ - नियमपूर्वक किया गया दृढ संकल्प। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वैदिक साहित्य में व्रत विधान॥ Fasting rules in Vedic literature==&lt;br /&gt;
वैदिक एवं उपनिषद् साहित्य में व्रत की संकल्पना अत्यन्त व्यापक रूप में प्रस्तुत हुई है। सामान्यतः व्रत को केवल उपवास या किसी विशेष तिथि पर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान के रूप में समझ लिया जाता है, किन्तु वैदिक दृष्टि में व्रत का स्वरूप इससे कहीं अधिक गूढ़ और जीवनपर्यन्त साधना से सम्बद्ध है।&amp;lt;ref&amp;gt;नवीन शर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/329906 संस्कृत साहित्य में यज्ञ एवं व्रत का समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१९), पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला (पृ० ९७)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ऋग्वेद में व्रत॥ fasting in rigveda''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतों को व्यवाहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। सभी के साथ मित्रता की भावना रखने वाले व्रती को अगाध मात्रा में धन प्राप्त होता है। वाणी के सत्य एवं परिमित व्रतों के बारे में कहा गया है कि जो वाणी से कर्मों की महिमा बढ़ाते हैं उन्हें देवगण दुष्कर्म रूपी पापों से सुरक्षित करते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मत्र्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः॥ (ऋग्वेद ८।११।१)&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;हे अग्निदेव! आप व्रतका पालन-रक्षण करनेवाले हैं। हे दीप्तिमान् देव! आप सभी मनुष्योंमें विद्यमान रहते हैं। आप सभी यज्ञों (कर्मों) में विराजमान रहते हैं। आप प्रशंसनीय हैं, स्तुत्य हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''यजुर्वेद में व्रत॥ fasting in yajurveda'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यजुर्वेद में सत्य बोलना एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। अग्नि को व्रतपते कह कर सम्बोधित किया गया है। याचकों द्वारा अग्नि देव के अनुग्रह से सत्य का पालन करना वर्णित है। नियमपूर्वक सद्‌कार्यों से व्यक्ति का समर्थवान बनना वर्णित है। यह मनुष्य के आचरण, विचार और अन्तःकरण की शुद्धि का साधन है, जो उसे सत्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। यजुर्वेद के मन्त्रों में कहा गया है कि -&amp;lt;blockquote&amp;gt;अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्। इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥ (यजु० १।५)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतोंकी रक्षा करनेवाले हे अग्निदेव! मैं व्रताचरण करूँगा, आप मुझे व्रतोंके आचरणकी शक्ति प्रदान कीजिये। मेरा यह व्रताचरण निर्विघ्न सम्पन्न हो जाय। मैं असत्यसे दूर रहकर सत्यका ही आचरण करूँ। ऐसा आशीर्वाद मुझे प्रदान कीजिये।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्। दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ (यजु० १९।३०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत धारण करनेसे मनुष्य दीक्षित होता है। दीक्षासे उसे दाक्षिण्य (दक्षता, निपुणता) प्राप्त होता है। दक्षताकी प्राप्तिसे श्रद्धाका भाव जाग्रत् होता है और श्रद्धासे ही सत्यस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अथर्ववेद में व्रत॥ fasting in Atharvaveda'''&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह। तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वे॥ (अथर्व० ७।७४।४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतोंके स्वामी हे अग्निदेव ! आप व्रतानुष्ठानके द्वारा सम्यक् रूपसे प्रसन्न होते हैं। सर्वदा प्रसन्न मनवाले होकर आप हमारे घरमें प्रकाशित होनेकी कृपा करें। इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न तथा सम्यक् रूपसे प्रकाशमान हे जातवेद ! पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हम सभी आपकी उपासनामें लगे रहें।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। अन्नं न परिचक्षीत। तद् व्रतम्। अन्नं बहु कुर्वीत। तद् व्रतम्। न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्॥ (तैत्तिरीयोपनिषद् भृगुवल्ली अनु० ७-१०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अन्नकी निन्दा न करे, वह व्रत है। अन्नकी अवहेलना न करे, वह एक व्रत है। अन्नको बढ़ाये, वह एक व्रत है। अपने घरपर ठहरनेके लिये आये हुए किसी भी अतिथिको प्रतिकूल उत्तर न दे, वह एक व्रत है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्वृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥ (मुण्डक० ३।१।६) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;सत्य ही विजयी होता है, झूठ नहीं; क्योंकि वह देवयान नामक मार्ग सत्यसे परिपूर्ण है। जिससे पूर्णकाम ऋषिलोग (वहाँ) गमन करते हैं, जहाँ वह सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका उत्कृष्ट धाम है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुराणों में व्रत परंपरा॥ fasting tradition in Puranas==&lt;br /&gt;
व्रतों के करने से लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य इन व्रतों को धारण करता है उसे अनेकानेक नियमों का पालन करना पडता है। व्रत करने वाले को स्नान तो नित्य ही करना चाहिये, खारी वस्तुएँ, शहद, लवण, मदिरा इत्यादि के सेवन से बचना चाहिए -&amp;lt;ref&amp;gt;सुरेन्द्र कुमार सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/328108 पुराणों में व्रत एवं उपवास] (१९८८), काशी विद्यापीठ, वाराणसी (पृ० ११३)&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;blockquote&amp;gt;नित्यस्नायी मिताहारो गुरुदेव द्विजार्चकः। क्षारं क्षौद्रं च लवणं मधु मांसानि वर्जयेत्॥ (अग्नि पुराण १७५/१२)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत करने वाले को चाहिये कि वह किसी भी वस्तु की चोरी न करे, किसी भी प्राणिमात्र की हिंसा न करे, किसी भी वस्तु के प्रति लालच न करे, इन पाँच प्रकार के नियमों का उल्लेख लिंग महापुराण में प्राप्त होता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च अलोभस्त्याग एव च। व्रतानि पञ्च भिक्षूणां हिंसा परमां त्विह॥ (लिंगमहापुराण १/८२/२४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतों को धारण करने वाले व्यक्ति को जो भी त्याज्य वस्तुएं हैं तथा जो भी नियम हैं उन सभी का पालन करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रतों के प्रकार॥ Types of Vrat==&lt;br /&gt;
पुराण विभिन्न प्रकार के व्रतों को दर्शाते हैं, जैसे - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''कायिक व्रत -''' यह शरीर से संबंधित व्रत है। उपवास जैसी शारीरिक तपस्या पर जोर दिया जाता है। हिंसा आदिके त्यागको कायिकव्रत कहते हैं।&lt;br /&gt;
*'''वाचिक व्रत -''' यह वाणी से संबंधित व्रत है, इसमें सत्य बोलने और धर्मग्रंथों का पाठ करने को बहुत महत्व दिया जाता है। कटुवाणी, पिशुनता (चुगुली) तथा निन्दाका त्याग और सत्य, परिमित तथा हितयुक्त मधुर भाषण वाचिकव्रत कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*'''मानसिक व्रत -''' यह मन से संबंधित व्रत। यहां जोर मन को नियंत्रित करने, उसमें उत्पन्न होने वाले जुनून और पूर्वाग्रहों को नियंत्रित करने पर है। काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या तथा राग-द्वेष आदिसे रहित रहना मानसिक व्रत है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक व्रत को उसकी अवधि के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है, एक दिन तक चलने वाला व्रत दिन-व्रत होता है, और एक पक्ष (सप्ताह) तक चलने वाला व्रत पक्ष-व्रत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शास्त्रों के अनुसार व्रत के निम्नलिखित चार प्रकार हैं -  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#उपवास&lt;br /&gt;
# एकभुक्त&lt;br /&gt;
#नक्त&lt;br /&gt;
#अयाचित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रताचरणसे मनुष्यकों उन्नत जीवनकी योग्यता प्राप्त होती है। व्रतोंमें तीन बातोंकी प्रधानता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#संयम-नियमका पालन&lt;br /&gt;
# देवाराधन&lt;br /&gt;
#लक्ष्यके प्रति जागरूकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं। व्रत दो प्रकारसे किये जाते हैं -&amp;lt;ref&amp;gt;भवनाथ झा, धर्मायण-व्रत विधि विशेषांक, [https://mahavirmandirpatna.org/dharmayan/wp-content/uploads/2022/07/Dharmayan-vol.-119-Vrata-vidhi-Ank-ebook.pdf म०म० रुद्रधर कृत व्रत-पद्धति में व्रत-विधान] (२०२२), महावीर मन्दिर, पटना (पृ० ३)।&amp;lt;/ref&amp;gt; उपवास - निराहार रहकर और एक बार संयमित आहारके द्वारा, इन व्रतोंके कई भेद हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रत की उपयोगिता॥ Vrat ki Upayogita==&lt;br /&gt;
व्रत - व्रियते इति व्रतम् जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण, अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। व्रत एवं नियम को पर्यायवाचक माना गया है तथा उपवास, पुण्यक आदि को व्रत का प्रकार कहा है। वेदों में उल्लेख प्राप्त होता है कि व्रत धारण करने से मनुष्य दीक्षित होता है। दाक्षिण्य (दक्षता से, निपुणता) प्राप्त होती है। दक्षता की प्राप्ति से श्रद्धा का भाव जाग्रत होता है एवं श्रद्धा से सत्यस्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋग्वेद में सत्य बोलना व्रत कहा गया है। सत्य बोलने वाले मनुष्य पर देवताओं का प्रसन्न होना वर्णित है। मधुर भाषण को श्रेष्ठ व्रत कहा है। ऋग्वेद में दानशीलता को उत्तम व्रत कहा है। जो सामर्थ्यशाली एवं मित्र होते हुए भी मित्र को अन्नदान नहीं करते या उसका सत्कार नहीं करते ऐसे कृपण मनुष्य का परित्याग कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यजुर्वेद में सत्य इत्यादि श्रेष्ठ व्रतों का पालन करने का निर्देश किया गया है। सत्य इत्यादि व्रतों के पालन से व्यक्ति धनवान होता है। सामवेद में कहा गया है कि सत्यव्रत धारण करने वाले मनुष्य की रक्षा भगवान करते हैं। विद्वान को चाहिए कि वह कभी भी क्रोध न करे। किसी के प्रति अनादर का भाव मन न में लाए। सदा परमात्मा के ध्यान में लीन रहे तथा भगवान की स्तुति करे।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अनुव्रतः पितु पुत्रो मात्रा भवतु समना। जाया पत्ये मधुमर्ती वाच वदतु शान्तिवाम्॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अथर्ववेद में कहा गया है कि पुत्र को अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए। यही पुत्र धर्म के पालन हैं। पत्नी को अपने पति से मधुरता तथा सुख युक्त वाणी से वार्ता करनी चाहिए। ब्राह्मण व ग्रन्थों में सत्य इत्यादि श्रेष्ठ व्रतों का अनुपालन करने का निर्देश है। उपनिषदों में काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि विकृतियों का दमन करते हुए स्वाध्याय एवं प्रवचन करने का निर्देश है। व्रतों को सम्पन्न करने के लिये अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं, जिनमें वैदिक मन्त्रों का उपयोग होता है। मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिए वेदांगों का विशेष महत्व है। तिथियों, नक्षत्रों, वारों एवं अन्य प्रकार के व्रतों की सम्पन्नता हेतु मूहुर्त ज्ञान के लिये ज्योतिष वेदांग का अत्यन्त महत्व है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामायण का आधार सत्यव्रत से प्रारम्भ होता है। राजा दशरथ ने सत्य वचन के कारण धर्म-बन्धन में बंध कर प्यारे पुत्र राम को वनवास दिया। वाल्मीकि श्रीराम के असंख्य गुणों का उल्लेख करते हुए सत्यवाक्य तथा दृढव्रत श्रीराम सभी व्रतों के बीज हैं। राम ने अपने चरित्र द्वारा समस्त व्रतों, धर्मों एवं नियमों का पालन करके एक आदर्श स्थापित किया। रामायण में श्रीराम के दृढव्रत एवं सीता के पतिव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है, साथ ही भरत का तपोव्रत एवं हनुमान के सेवा व्रत का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत में क्षमाव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है कि जिसने पहले कभी तुम्हारा उपकार किया हो उससे यदि भारी अपराध हो जाए तो पहले उपकार का स्मरण करके उस अपराधी को क्षमा कर देना चाहिए। मनुष्य कोमल स्वभाव से उग्र स्वभाव तथा शान्त स्वभाव से शत्रुता का भी नाश कर सकता है। मृदुता से सब कुछ सिद्ध किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों में शास्त्रोक्त नियमों को व्रत कहा गया है, वही तप माना है दम (इन्द्रियसंयम) एवं शम (मनोनिग्रह) आदि विशेष नियम भी व्रत के ही अंग हैं। व्रत करने वाले पुरुष को शारीरिक संताप सहन करना पड़ता है। इसलिये व्रत को तप नाम दिया गया है। इसी प्रकार व्रत में इन्द्रियसमुदाय का नियमन (संयम करना होता है, इसलिये इसे नियम कहते हैं)। पापों से निवृत्त होकर सब प्रकार के भोगों का त्याग करते हुए जो सदगुणों के साथ वास करता है उसी को उपवास समझना चाहिए। पुराणों में उपवास में निषेध वस्तुओं के वर्णन के साथ व्रतों में धारण करने वाले नियमों का वर्णन मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीविश्वनाथ शर्मा, [https://archive.org/details/iBaw_vrataraj-of-vishvanath-sharma-with-bhasha-tika-by-madhavacharya-khemraj/page/n4/mode/1up श्रीव्रतराजः] (१९८४), खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई (पृ० ७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
अग्नि पुराण तथा गरुड़ पुराण में यह प्रतिपादित किया गया है कि व्रत का वास्तविक स्वरूप इन्द्रियों के संयम से ही सिद्ध होता है। केवल बाह्य क्रियाएँ जैसे - उपवास, स्नान या पूजा व्रत की पूर्णता नहीं प्रदान करतीं, जब तक कि साधक आंतरिक रूप से विषयासक्ति का त्याग न करे। अतः व्रत का स्वरूप द्वि-आयामी है - &lt;br /&gt;
* बाह्य (External): उपवास, पूजा, आचार&lt;br /&gt;
* आंतरिक (Internal): मनोनिग्रह, इन्द्रियसंयम, संकल्पशुद्धि&lt;br /&gt;
यह द्वैत ही व्रत को एक समग्र आध्यात्मिक साधना बनाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137606</id>
		<title>Vrata (व्रत)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137606"/>
		<updated>2026-04-26T17:14:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: सुधार जारी&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में व्रत (संस्कृत: व्रियते इति व्रतम्) जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण और अनुष्ठान किया जाये उसे व्रत कहते हैं। व्रत एवं नियम को पर्यायवाचक माना गया है तथा उपवास, पुण्यक आदि को व्रत का प्रकार कहा है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना व्रत कहलाता है। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। व्रत धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। इसका संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आत्मिक विकास की ओर अग्रसर करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
व्रियते इति व्रतम जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण, अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। ऋग्वेद में वर्णित है कि सत्य इत्यादि व्रतों को व्यवहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। ऋग्वेद में सत्य एवं परिमित बोलने को व्रत कहा है। यजुर्वेद में सत्य एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। संयम व्रत का वर्णन करते हुए सामवेद में कहा गया है कि देवता संयमी लोगों पर कृपा करते हैं। दान करना प्रत्येक व्रत का अभिन्न अंग कहा गया है। अन्नदान के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो अतिथियों को अन्न दान करता है वह सभी प्राणियों का रक्षक है। अथर्ववेद में कहा गया है कि कटुवाणी का उपयोग नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुष्य जीवन को सफल बनाने वाले कर्मों में व्रतों की बड़ी महिमा है। देवल का कहना है कि व्रत और उपवास के नियम पालन से शरीर को तपाना ही तप है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः। शरीरशोषणं यत् तत् तप इत्युच्यते बुधैः॥ (व्रत परिचय)&amp;lt;ref&amp;gt;हनुमान् शर्मा, व्रतपरिचय (सं.2051), गीताप्रेस गोरखपुर, (पृ. 3)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत अनेक हैं और व्रतों के प्रकार भी अनेक हैं। लोकप्रसिद्धि में व्रत एवं उपवास दो होते हैं। ये कायिक, वाचिक, मानसिक, नित्य, नैमित्तिक, काम्य, एकभुक्त, अयाचित, मितभुक्, चान्द्रायण और प्राजापत्य के रूप में किये जाते हैं। वास्तव में व्रत और उपवास दोनों एक हैं, अन्तर यह है कि व्रत में भोजन किया जा सकता है जबकि उपवास में निराहार रहना पड़ता है। इनके कायिक आदि तीन भेद इस प्रकार हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#शस्त्राघात, मर्माघात और कार्यहानि आदि जनित हिंसा के त्याग से कायिक कहलाता है।&lt;br /&gt;
#सत्य बोलने और प्राणिमात्र के प्रति निर्वैर रहने से वाचिक हुआ।&lt;br /&gt;
# मन को शान्त रखने की दृढ़ता से मानसिक व्रत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुण्यसंचय के एकादशी और त्रयोदशी आदि 'नित्य' व्रत, पापक्षय के चान्द्रायणादि 'नैमित्तिक' व्रत और सुख-सौभाग्यादि के वटसावित्री आदि 'काम्य' व्रत माने गये हैं। इनमें द्रव्यविशेष के भोजन और पूजनादि की साधना के द्वारा साध्य व्रत 'प्रवृत्तिरूप' होते हैं और केवल उपवासादि करने के द्वारा साध्य व्रत 'निवृत्तिरूप' होते हैं। इनका यथोचित उपयोग फल देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतों को सम्पन्न करने के लिये अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। जिनमें वैदिक मन्त्रों का उपयोग होता है, मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये वेदांगों का विशेष महत्व है। रामायण का आधार सत्यव्रत है। रामायण में राम के दृढ़व्रत, सीता के पतिव्रत तथा भरत के तपोव्रत एवं हनुमान के सेवाव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत में क्षमा को सर्वश्रेष्ठ व्रत कहा है। क्षमाशील मनुष्य को यज्ञवेता, ब्रह्मवेता एवं तपस्वी पुरुषों से भी श्रेष्ठ बताया है। महाभारत में ब्रह्मचर्य, सत्य एवं पतिव्रत आदि व्रतों का वर्णन मिलता है। पुराणों में वर्णित है कि प्रत्येक व्रत में इन्द्रियों का नियमन (संयम) करना होता है। इस लिये इसे नियम कहते हैं। पुराणों में व्रतों के लक्षणों का वर्णन प्राप्त होता है। सत्य, क्षमा, दया, दान, शौच, इन्द्रियसंयम, देवपूजा प्रत्येक तिथि, मास, नक्षत्र एवं दिन के अनुसार धारण किये जाने वाले व्रतों का विस्तृत वर्णन पुराणों में वर्णित है। व्रताचरण, उपवास, नियमोंके परिपालन तथा विविध दानोंसे व्रतियों पर सभी देवता, ऋषि-मुनि तथा संसारके प्राणी निश्चित प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा देवादयो भवन्त्येव तेषां प्रीता न संशयः॥ (भविष्यपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपवासैस्तथा तुल्यं तपः कर्म न विद्यते॥ दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु विश्वामित्रेण धीमता। तपसाक्रान्तमेकेन भक्तेन स च विप्रत्वमागतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपोष्य विधिवद्देवांस्त्रिदिवं प्रतिपेदिरे। ऋषयश्च परां सिद्धिमुपवासैरवाप्नुयुः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये कुर्वन्ति उपवासांश्च विधानेन शुभान्विताः। न यान्ति ते मुनिश्रेष्ठ नरकान् भीमदारुणान्॥ (पद्मपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपवासके समान कोई तपश्चर्या नहीं है। महामति महर्षि विश्वामित्रजीने दिव्य हजार वर्षोंतक महान् तप किया और एकभुक्तव्रतका आचरण किया, उसीके प्रभावसे उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, उन्होंने व्रतोपवासद्वारा विविध देवताओंकी उपासना कर उत्तम स्वर्गलोक प्राप्त किया। ऋषियोंने भी उपवासोंके परिपालनसे परम सिद्धि प्राप्त की। जो कल्याणकामी विधिपूर्वक व्रतोपवासोंका परिपालन करते हैं, वे दारुण तथा भयंकर नरकोंमें नहीं जाते।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासैर्यैर्विष्णुर्नान्यजन्मनि तोषितः। ते नरा मुनिशार्दूल ग्रहरोगादिबाधिनः॥ (विष्णुधर्मोत्तरपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रतोपवासोंके द्वारा भगवान् विष्णुको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य ही इस जन्ममें ग्रह, रोग, व्याधिकष्ट आदिसे पीडित रहते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;न पूजितो भूतपतिः पुरा यै-र्व्रतं न चीर्णं न च सत्यमुक्तम्। दारिद्र्यशोकामयदुःखदग्धाः प्रायोऽनुशोचन्ति त एव मर्त्याः॥ (स्कन्दपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वमें भूतोंके अधिपति भगवान् शंकरका पूजन नहीं किया, व्रतपालन नहीं किया, सत्य वचनका पालन नहीं किया, वे ही मनुष्य दरिद्रता, शोक, रोग तथा दुःखोंसे दग्ध होते हैं तथा पश्चात्तापको प्राप्त होते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;ये सर्वदा व्रतपराश्च शिवं स्मरन्ति तेषां न दृष्टिपथमप्युपयान्ति दूताः। याम्या महाभयकृतोऽपि च पाशहस्ताः दंष्ट्राकरालवदना विकटोग्रवेषा ॥ (स्कन्दपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो सदा ही व्रतपरायण रहते हैं और भगवान् शिवका स्मरण करते रहते हैं, उनके सामने महान् भय उत्पन्न करनेवाले, हाथमें पाश धारण किये हुए, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले तथा उग्र वेशवाले यमराजके विकट दूत नहीं आते।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः॥ व्रतोपवासनियमैहोंमैः स्वाध्यायतर्पणैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
+&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषां वै रुद्रसायुज्यं सामीप्यञ्चातिदुर्लभम्॥ सलोकतां च सारूप्यं जायते तत्प्रसादतः॥ (कूर्मपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो व्रत, उपवास, नियम, होम, स्वाध्याय, तर्पण, यज्ञ, दान तथा ध्यान-समाधिके द्वारा भगवान् महादेवका अर्चन करते हैं, उन्हें भगवान् शंकरकी कृपासे अति दुर्लभ रुद्रसायुज्य, सामीप्य, सालोक्य तथा सारूप्य मोक्षकी प्राप्ति होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;[https://dn710602.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.402143/2015.402143.Kalyaan-Virat.pdf कल्याण विशेषांक-व्रतपर्वोत्सव], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा॥ Definition==&lt;br /&gt;
व्रत शब्द संस्कृत के वृञ् वरणे धातु से बना है, जिसका अर्थ है, चुनना और संकल्प करना। अर्थात इंद्रियनिग्रह, मनोनिग्रह और आचरण शुद्धि का समन्वय जिसमें सम्मिलित होता हो। अतः व्रत का मूल अर्थ हुआ - नियमपूर्वक किया गया दृढ संकल्प। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वैदिक साहित्य में व्रत विधान॥ Fasting rules in Vedic literature==&lt;br /&gt;
वैदिक एवं उपनिषद् साहित्य में व्रत की संकल्पना अत्यन्त व्यापक रूप में प्रस्तुत हुई है। सामान्यतः व्रत को केवल उपवास या किसी विशेष तिथि पर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान के रूप में समझ लिया जाता है, किन्तु वैदिक दृष्टि में व्रत का स्वरूप इससे कहीं अधिक गूढ़ और जीवनपर्यन्त साधना से सम्बद्ध है।&amp;lt;ref&amp;gt;नवीन शर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/329906 संस्कृत साहित्य में यज्ञ एवं व्रत का समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१९), पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला (पृ० ९७)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ऋग्वेद में व्रत॥ fasting in rigveda''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतों को व्यवाहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। सभी के साथ मित्रता की भावना रखने वाले व्रती को अगाध मात्रा में धन प्राप्त होता है। वाणी के सत्य एवं परिमित व्रतों के बारे में कहा गया है कि जो वाणी से कर्मों की महिमा बढ़ाते हैं उन्हें देवगण दुष्कर्म रूपी पापों से सुरक्षित करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''यजुर्वेद में व्रत॥ fasting in yajurveda'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यजुर्वेद में सत्य बोलना एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। अग्नि को व्रतपते कह कर सम्बोधित किया गया है। याचकों द्वारा अग्नि देव के अनुग्रह से सत्य का पालन करना वर्णित है। नियमपूर्वक सद्‌कार्यों से व्यक्ति का समर्थवान बनना वर्णित है। यह मनुष्य के आचरण, विचार और अन्तःकरण की शुद्धि का साधन है, जो उसे सत्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। यजुर्वेद के मन्त्रों में कहा गया है कि -&amp;lt;blockquote&amp;gt;अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्। इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥ (यजु० १।५)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतोंकी रक्षा करनेवाले हे अग्निदेव! मैं व्रताचरण करूँगा, आप मुझे व्रतोंके आचरणकी शक्ति प्रदान कीजिये। मेरा यह व्रताचरण निर्विघ्न सम्पन्न हो जाय। मैं असत्यसे दूर रहकर सत्यका ही आचरण करूँ। ऐसा आशीर्वाद मुझे प्रदान कीजिये।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्। दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ (यजु० १९।३०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत धारण करनेसे मनुष्य दीक्षित होता है। दीक्षासे उसे दाक्षिण्य (दक्षता, निपुणता) प्राप्त होता है। दक्षताकी प्राप्तिसे श्रद्धाका भाव जाग्रत् होता है और श्रद्धासे ही सत्यस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह। तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वे॥ (अथर्व० ७।७४।४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतोंके स्वामी हे अग्निदेव ! आप व्रतानुष्ठानके द्वारा सम्यक् रूपसे प्रसन्न होते हैं। सर्वदा प्रसन्न मनवाले होकर आप हमारे घरमें प्रकाशित होनेकी कृपा करें। इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न तथा सम्यक् रूपसे प्रकाशमान हे जातवेद ! पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हम सभी आपकी उपासनामें लगे रहें।&amp;lt;blockquote&amp;gt;त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मत्र्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः॥ (ऋग्वेद ८।११।१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;हे अग्निदेव! आप व्रतका पालन-रक्षण करनेवाले हैं। हे दीप्तिमान् देव! आप सभी मनुष्योंमें विद्यमान रहते हैं। आप सभी यज्ञों (कर्मों) में विराजमान रहते हैं। आप प्रशंसनीय हैं, स्तुत्य हैं। &amp;lt;blockquote&amp;gt;अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। अन्नं न परिचक्षीत। तद् व्रतम्। अन्नं बहु कुर्वीत। तद् व्रतम्। न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्॥ (तैत्तिरीयोपनिषद् भृगुवल्ली अनु० ७-१०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अन्नकी निन्दा न करे, वह व्रत है। अन्नकी अवहेलना न करे, वह एक व्रत है। अन्नको बढ़ाये, वह एक व्रत है। अपने घरपर ठहरनेके लिये आये हुए किसी भी अतिथिको प्रतिकूल उत्तर न दे, वह एक व्रत है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्वृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥ (मुण्डक० ३।१।६) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;सत्य ही विजयी होता है, झूठ नहीं; क्योंकि वह देवयान नामक मार्ग सत्यसे परिपूर्ण है। जिससे पूर्णकाम ऋषिलोग (वहाँ) गमन करते हैं, जहाँ वह सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका उत्कृष्ट धाम है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुराणों में व्रत परंपरा॥ fasting tradition in Puranas==&lt;br /&gt;
व्रतों के करने से लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य इन व्रतों को धारण करता है उसे अनेकानेक नियमों का पालन करना पडता है। व्रत करने वाले को स्नान तो नित्य ही करना चाहिये, खारी वस्तुएँ, शहद, लवण, मदिरा इत्यादि के सेवन से बचना चाहिए -&amp;lt;ref&amp;gt;सुरेन्द्र कुमार सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/328108 पुराणों में व्रत एवं उपवास] (१९८८), काशी विद्यापीठ, वाराणसी (पृ० ११३)&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;blockquote&amp;gt;नित्यस्नायी मिताहारो गुरुदेव द्विजार्चकः। क्षारं क्षौद्रं च लवणं मधु मांसानि वर्जयेत्॥ (अग्नि पुराण १७५/१२)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत करने वाले को चाहिये कि वह किसी भी वस्तु की चोरी न करे, किसी भी प्राणिमात्र की हिंसा न करे, किसी भी वस्तु के प्रति लालच न करे, इन पाँच प्रकार के नियमों का उल्लेख लिंग महापुराण में प्राप्त होता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च अलोभस्त्याग एव च। व्रतानि पञ्च भिक्षूणां हिंसा परमां त्विह॥ (लिंगमहापुराण १/८२/२४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतों को धारण करने वाले व्यक्ति को जो भी त्याज्य वस्तुएं हैं तथा जो भी नियम हैं उन सभी का पालन करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रतों के प्रकार॥ Types of Vrat==&lt;br /&gt;
पुराण विभिन्न प्रकार के व्रतों को दर्शाते हैं, जैसे - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''कायिका व्रत -''' यह शरीर से संबंधित व्रत है। उपवास जैसी शारीरिक तपस्या पर जोर दिया जाता है।&lt;br /&gt;
*'''वाचिक व्रत -''' यह वाणी से संबंधित व्रत। यहां सत्य बोलने और धर्मग्रंथों का पाठ करने को बहुत महत्व दिया जाता है।&lt;br /&gt;
*'''मानसिक व्रत -''' यह मन से संबंधित व्रत। यहां जोर मन को नियंत्रित करने, उसमें उत्पन्न होने वाले जुनून और पूर्वाग्रहों को नियंत्रित करने पर है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक व्रत को उसकी अवधि के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है, एक दिन तक चलने वाला व्रत दिन-व्रत होता है, और एक पक्ष (सप्ताह) तक चलने वाला व्रत पक्ष-व्रत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शास्त्रों के अनुसार व्रत के निम्नलिखित चार प्रकार हैं -  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#उपवास&lt;br /&gt;
# एकभुक्त&lt;br /&gt;
#नक्त&lt;br /&gt;
#अयाचित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रताचरणसे मनुष्यकों उन्नत जीवनकी योग्यता प्राप्त होती है। व्रतोंमें तीन बातोंकी प्रधानता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#संयम-नियमका पालन&lt;br /&gt;
# देवाराधन&lt;br /&gt;
#लक्ष्यके प्रति जागरूकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं। व्रत दो प्रकारसे किये जाते हैं -&amp;lt;ref&amp;gt;भवनाथ झा, धर्मायण-व्रत विधि विशेषांक, [https://mahavirmandirpatna.org/dharmayan/wp-content/uploads/2022/07/Dharmayan-vol.-119-Vrata-vidhi-Ank-ebook.pdf म०म० रुद्रधर कृत व्रत-पद्धति में व्रत-विधान] (२०२२), महावीर मन्दिर, पटना (पृ० ३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपवास - निराहार रहकर और एक बार संयमित आहारके द्वारा। इन व्रतोंके कई भेद हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#कायिक हिंसा आदिके त्यागको कायिकव्रत कहते हैं।&lt;br /&gt;
#वाचिक- कटुवाणी, पिशुनता (चुगुली) तथा निन्दाका त्याग और सत्य, परिमित तथा हितयुक्त मधुर भाषण 'वाचिकव्रत' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
#मानसिक - काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या तथा राग-द्वेष आदिसे रहित रहना 'मानसिकव्रत' है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य रूपसे अपने यहाँ तीन प्रकारके व्रत माने गये हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#नित्य&lt;br /&gt;
#नैमित्तिक&lt;br /&gt;
#काम्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रत की उपयोगिता॥ Vrat ki Upayogita==&lt;br /&gt;
व्रत - व्रियते इति व्रतम् जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण, अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। व्रत एवं नियम को पर्यायवाचक माना गया है तथा उपवास, पुण्यक आदि को व्रत का प्रकार कहा है। वेदों में उल्लेख प्राप्त होता है कि व्रत धारण करने से मनुष्य दीक्षित होता है। दाक्षिण्य (दक्षता से, निपुणता) प्राप्त होती है। दक्षता की प्राप्ति से श्रद्धा का भाव जाग्रत होता है एवं श्रद्धा से सत्यस्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋग्वेद में सत्य बोलना व्रत कहा गया है। सत्य बोलने वाले मनुष्य पर देवताओं का प्रसन्न होना वर्णित है। मधुर भाषण को श्रेष्ठ व्रत कहा है। ऋग्वेद में दानशीलता को उत्तम व्रत कहा है। जो सामर्थ्यशाली एवं मित्र होते हुए भी मित्र को अन्नदान नहीं करते या उसका सत्कार नहीं करते ऐसे कृपण मनुष्य का परित्याग कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यजुर्वेद में सत्य इत्यादि श्रेष्ठ व्रतों का पालन करने का निर्देश किया गया है। सत्य इत्यादि व्रतों के पालन से व्यक्ति धनवान होता है। सामवेद में कहा गया है कि सत्यव्रत धारण करने वाले मनुष्य की रक्षा भगवान करते हैं। विद्वान को चाहिए कि वह कभी भी क्रोध न करे। किसी के प्रति अनादर का भाव मन न में लाए। सदा परमात्मा के ध्यान में लीन रहे तथा भगवान की स्तुति करे।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अनुव्रतः पितु पुत्रो मात्रा भवतु समना। जाया पत्ये मधुमर्ती वाच वदतु शान्तिवाम्॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अथर्ववेद में कहा गया है कि पुत्र को अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए। यही पुत्र धर्म के पालन हैं। पत्नी को अपने पति से मधुरता तथा सुख युक्त वाणी से वार्ता करनी चाहिए। ब्राह्मण व ग्रन्थों में सत्य इत्यादि श्रेष्ठ व्रतों का अनुपालन करने का निर्देश है। उपनिषदों में काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि विकृतियों का दमन करते हुए स्वाध्याय एवं प्रवचन करने का निर्देश है। व्रतों को सम्पन्न करने के लिये अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं, जिनमें वैदिक मन्त्रों का उपयोग होता है। मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिए वेदांगों का विशेष महत्व है। तिथियों, नक्षत्रों, वारों एवं अन्य प्रकार के व्रतों की सम्पन्नता हेतु मूहुर्त ज्ञान के लिये ज्योतिष वेदांग का अत्यन्त महत्व है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामायण का आधार सत्यव्रत से प्रारम्भ होता है। राजा दशरथ ने सत्य वचन के कारण धर्म-बन्धन में बंध कर प्यारे पुत्र राम को वनवास दिया। वाल्मीकि श्रीराम के असंख्य गुणों का उल्लेख करते हुए सत्यवाक्य तथा दृढव्रत श्रीराम सभी व्रतों के बीज हैं। राम ने अपने चरित्र द्वारा समस्त व्रतों, धर्मों एवं नियमों का पालन करके एक आदर्श स्थापित किया। रामायण में श्रीराम के दृढव्रत एवं सीता के पतिव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है, साथ ही भरत का तपोव्रत एवं हनुमान के सेवा व्रत का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत में क्षमाव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है कि जिसने पहले कभी तुम्हारा उपकार किया हो उससे यदि भारी अपराध हो जाए तो पहले उपकार का स्मरण करके उस अपराधी को क्षमा कर देना चाहिए। मनुष्य कोमल स्वभाव से उग्र स्वभाव तथा शान्त स्वभाव से शत्रुता का भी नाश कर सकता है। मृदुता से सब कुछ सिद्ध किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों में शास्त्रोक्त नियमों को व्रत कहा गया है, वही तप माना है दम (इन्द्रियसंयम) एवं शम (मनोनिग्रह) आदि विशेष नियम भी व्रत के ही अंग हैं। व्रत करने वाले पुरुष को शारीरिक संताप सहन करना पड़ता है। इसलिये व्रत को तप नाम दिया गया है। इसी प्रकार व्रत में इन्द्रियसमुदाय का नियमन (संयम करना होता है, इसलिये इसे नियम कहते हैं)। पापों से निवृत्त होकर सब प्रकार के भोगों का त्याग करते हुए जो सदगुणों के साथ वास करता है उसी को उपवास समझना चाहिए। पुराणों में उपवास में निषेध वस्तुओं के वर्णन के साथ व्रतों में धारण करने वाले नियमों का वर्णन मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीविश्वनाथ शर्मा, [https://archive.org/details/iBaw_vrataraj-of-vishvanath-sharma-with-bhasha-tika-by-madhavacharya-khemraj/page/n4/mode/1up श्रीव्रतराजः] (१९८४), खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई (पृ० ७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137605</id>
		<title>Vrata (व्रत)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137605"/>
		<updated>2026-04-26T12:10:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: सुधार जारी&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में व्रत (संस्कृत: व्रियते इति व्रतम्) जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण और अनुष्ठान किया जाये उसे व्रत कहते हैं। व्रत एवं नियम को पर्यायवाचक माना गया है तथा उपवास, पुण्यक आदि को व्रत का प्रकार कहा है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना व्रत कहलाता है। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। व्रत धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। इसका संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आत्मिक विकास की ओर अग्रसर करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
व्रियते इति व्रतम जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण, अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। ऋग्वेद में वर्णित है कि सत्य इत्यादि व्रतों को व्यवहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। ऋग्वेद में सत्य एवं परिमित बोलने को व्रत कहा है। यजुर्वेद में सत्य एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। संयम व्रत का वर्णन करते हुए सामवेद में कहा गया है कि देवता संयमी लोगों पर कृपा करते हैं। दान करना प्रत्येक व्रत का अभिन्न अंग कहा गया है। अन्नदान के महत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो अतिथियों को अन्न दान करता है वह सभी प्राणियों का रक्षक है। अथर्ववेद में कहा गया है कि कटुवाणी का उपयोग नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतों को सम्पन्न करने के लिये अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। जिनमें वैदिक मन्त्रों का उपयोग होता है, मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये वेदांगों का विशेष महत्व है। रामायण का आधार सत्यव्रत है। रामायण में राम के दृढ़व्रत, सीता के पतिव्रत तथा भरत के तपोव्रत एवं हनुमान के सेवाव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत में क्षमा को सर्वश्रेष्ठ व्रत कहा है। क्षमाशील मनुष्य को यज्ञवेता, ब्रह्मवेता एवं तपस्वी पुरुषों से भी श्रेष्ठ बताया है। महाभारत में ब्रह्मचर्य, सत्य एवं पतिव्रत आदि व्रतों का वर्णन मिलता है। पुराणों में वर्णित है कि प्रत्येक व्रत में इन्द्रियों का नियमन (संयम) करना होता है। इस लिये इसे नियम कहते हैं। पुराणों में व्रतों के लक्षणों का वर्णन प्राप्त होता है। सत्य, क्षमा, दया, दान, शौच, इन्द्रियसंयम, देवपूजा प्रत्येक तिथि, मास, नक्षत्र एवं दिन के अनुसार धारण किये जाने वाले व्रतों का विस्तृत वर्णन पुराणों में वर्णित है। व्रताचरण, उपवास, नियमोंके परिपालन तथा विविध दानोंसे व्रतियों पर सभी देवता, ऋषि-मुनि तथा संसारके प्राणी निश्चित प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा देवादयो भवन्त्येव तेषां प्रीता न संशयः॥ (भविष्यपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपवासैस्तथा तुल्यं तपः कर्म न विद्यते॥ दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु विश्वामित्रेण धीमता। तपसाक्रान्तमेकेन भक्तेन स च विप्रत्वमागतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपोष्य विधिवद्देवांस्त्रिदिवं प्रतिपेदिरे। ऋषयश्च परां सिद्धिमुपवासैरवाप्नुयुः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये कुर्वन्ति उपवासांश्च विधानेन शुभान्विताः। न यान्ति ते मुनिश्रेष्ठ नरकान् भीमदारुणान्॥ (पद्मपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपवासके समान कोई तपश्चर्या नहीं है। महामति महर्षि विश्वामित्रजीने दिव्य हजार वर्षोंतक महान् तप किया और एकभुक्तव्रतका आचरण किया, उसीके प्रभावसे उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, उन्होंने व्रतोपवासद्वारा विविध देवताओंकी उपासना कर उत्तम स्वर्गलोक प्राप्त किया। ऋषियोंने भी उपवासोंके परिपालनसे परम सिद्धि प्राप्त की। जो कल्याणकामी विधिपूर्वक व्रतोपवासोंका परिपालन करते हैं, वे दारुण तथा भयंकर नरकोंमें नहीं जाते।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासैर्यैर्विष्णुर्नान्यजन्मनि तोषितः। ते नरा मुनिशार्दूल ग्रहरोगादिबाधिनः॥ (विष्णुधर्मोत्तरपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रतोपवासोंके द्वारा भगवान् विष्णुको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य ही इस जन्ममें ग्रह, रोग, व्याधिकष्ट आदिसे पीडित रहते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;न पूजितो भूतपतिः पुरा यै-र्व्रतं न चीर्णं न च सत्यमुक्तम्। दारिद्र्यशोकामयदुःखदग्धाः प्रायोऽनुशोचन्ति त एव मर्त्याः॥ (स्कन्दपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वमें भूतोंके अधिपति भगवान् शंकरका पूजन नहीं किया, व्रतपालन नहीं किया, सत्य वचनका पालन नहीं किया, वे ही मनुष्य दरिद्रता, शोक, रोग तथा दुःखोंसे दग्ध होते हैं तथा पश्चात्तापको प्राप्त होते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;ये सर्वदा व्रतपराश्च शिवं स्मरन्ति तेषां न दृष्टिपथमप्युपयान्ति दूताः। याम्या महाभयकृतोऽपि च पाशहस्ताः दंष्ट्राकरालवदना विकटोग्रवेषा ॥ (स्कन्दपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो सदा ही व्रतपरायण रहते हैं और भगवान् शिवका स्मरण करते रहते हैं, उनके सामने महान् भय उत्पन्न करनेवाले, हाथमें पाश धारण किये हुए, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले तथा उग्र वेशवाले यमराजके विकट दूत नहीं आते।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः॥ व्रतोपवासनियमैहोंमैः स्वाध्यायतर्पणैः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषां वै रुद्रसायुज्यं सामीप्यञ्चातिदुर्लभम्॥ सलोकतां च सारूप्यं जायते तत्प्रसादतः॥ (कूर्मपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो व्रत, उपवास, नियम, होम, स्वाध्याय, तर्पण, यज्ञ, दान तथा ध्यान-समाधिके द्वारा भगवान् महादेवका अर्चन करते हैं, उन्हें भगवान् शंकरकी कृपासे अति दुर्लभ रुद्रसायुज्य, सामीप्य, सालोक्य तथा सारूप्य मोक्षकी प्राप्ति होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;[https://dn710602.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.402143/2015.402143.Kalyaan-Virat.pdf कल्याण विशेषांक-व्रतपर्वोत्सव], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा ==&lt;br /&gt;
व्रत शब्द संस्कृत के वृञ् वरणे धातु से बना है, जिसका अर्थ है, चुनना और संकल्प करना। अर्थात इंद्रियनिग्रह, मनोनिग्रह और आचरण शुद्धि का समन्वय जिसमें सम्मिलित होता हो। अतः व्रत का मूल अर्थ हुआ - नियमपूर्वक किया गया दृढ संकल्प। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वैदिक साहित्य में व्रत विधान==&lt;br /&gt;
वैदिक एवं उपनिषद् साहित्य में व्रत की संकल्पना अत्यन्त व्यापक रूप में प्रस्तुत हुई है। सामान्यतः व्रत को केवल उपवास या किसी विशेष तिथि पर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान के रूप में समझ लिया जाता है, किन्तु वैदिक दृष्टि में व्रत का स्वरूप इससे कहीं अधिक गूढ़ और जीवनपर्यन्त साधना से सम्बद्ध है।&amp;lt;ref&amp;gt;नवीन शर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/329906 संस्कृत साहित्य में यज्ञ एवं व्रत का समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१९), पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला (पृ० ९७)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ऋग्वेद में व्रत॥ fasting in rigveda''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतों को व्यवाहारिक जीवन में प्रयोग करने वाले मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। सभी के साथ मित्रता की भावना रखने वाले व्रती को अगाध मात्रा में धन प्राप्त होता है। वाणी के सत्य एवं परिमित व्रतों के बारे में कहा गया है कि जो वाणी से कर्मों की महिमा बढ़ाते हैं उन्हें देवगण दुष्कर्म रूपी पापों से सुरक्षित करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''यजुर्वेद में व्रत॥ fasting in yajurveda'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यजुर्वेद में सत्य बोलना एवं श्रेष्ठ कार्यों में निपुण होने को सभी व्रतों में श्रेष्ठ कहा है। अग्नि को व्रतपते कह कर सम्बोधित किया गया है। याचकों द्वारा अग्नि देव के अनुग्रह से सत्य का पालन करना वर्णित है। नियमपूर्वक सद्‌कार्यों से व्यक्ति का समर्थवान बनना वर्णित है। यह मनुष्य के आचरण, विचार और अन्तःकरण की शुद्धि का साधन है, जो उसे सत्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। यजुर्वेद के मन्त्रों में कहा गया है कि -&amp;lt;blockquote&amp;gt;अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्। इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥ (यजु० १।५)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतोंकी रक्षा करनेवाले हे अग्निदेव! मैं व्रताचरण करूँगा, आप मुझे व्रतोंके आचरणकी शक्ति प्रदान कीजिये। मेरा यह व्रताचरण निर्विघ्न सम्पन्न हो जाय। मैं असत्यसे दूर रहकर सत्यका ही आचरण करूँ। ऐसा आशीर्वाद मुझे प्रदान कीजिये।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्। दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ (यजु० १९।३०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत धारण करनेसे मनुष्य दीक्षित होता है। दीक्षासे उसे दाक्षिण्य (दक्षता, निपुणता) प्राप्त होता है। दक्षताकी प्राप्तिसे श्रद्धाका भाव जाग्रत् होता है और श्रद्धासे ही सत्यस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह। तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वे॥ (अथर्व० ७।७४।४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतोंके स्वामी हे अग्निदेव ! आप व्रतानुष्ठानके द्वारा सम्यक् रूपसे प्रसन्न होते हैं। सर्वदा प्रसन्न मनवाले होकर आप हमारे घरमें प्रकाशित होनेकी कृपा करें। इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न तथा सम्यक् रूपसे प्रकाशमान हे जातवेद ! पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हम सभी आपकी उपासनामें लगे रहें।&amp;lt;blockquote&amp;gt;त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मत्र्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः॥ (ऋग्वेद ८।११।१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;हे अग्निदेव! आप व्रतका पालन-रक्षण करनेवाले हैं। हे दीप्तिमान् देव! आप सभी मनुष्योंमें विद्यमान रहते हैं। आप सभी यज्ञों (कर्मों) में विराजमान रहते हैं। आप प्रशंसनीय हैं, स्तुत्य हैं। &amp;lt;blockquote&amp;gt;अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। अन्नं न परिचक्षीत। तद् व्रतम्। अन्नं बहु कुर्वीत। तद् व्रतम्। न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्॥ (तैत्तिरीयोपनिषद् भृगुवल्ली अनु० ७-१०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अन्नकी निन्दा न करे, वह व्रत है। अन्नकी अवहेलना न करे, वह एक व्रत है। अन्नको बढ़ाये, वह एक व्रत है। अपने घरपर ठहरनेके लिये आये हुए किसी भी अतिथिको प्रतिकूल उत्तर न दे, वह एक व्रत है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्वृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥ (मुण्डक० ३।१।६) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;सत्य ही विजयी होता है, झूठ नहीं; क्योंकि वह देवयान नामक मार्ग सत्यसे परिपूर्ण है। जिससे पूर्णकाम ऋषिलोग (वहाँ) गमन करते हैं, जहाँ वह सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका उत्कृष्ट धाम है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुराणों में व्रत परंपरा॥ fasting tradition in Puranas==&lt;br /&gt;
व्रतों के करने से लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य इन व्रतों को धारण करता है उसे अनेकानेक नियमों का पालन करना पडता है। व्रत करने वाले को स्नान तो नित्य ही करना चाहिये, खारी वस्तुएँ, शहद, लवण, मदिरा इत्यादि के सेवन से बचना चाहिए -&amp;lt;ref&amp;gt;सुरेन्द्र कुमार सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/328108 पुराणों में व्रत एवं उपवास] (१९८८), काशी विद्यापीठ, वाराणसी (पृ० ११३)&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;blockquote&amp;gt;नित्यस्नायी मिताहारो गुरुदेव द्विजार्चकः। क्षारं क्षौद्रं च लवणं मधु मांसानि वर्जयेत्॥ (अग्नि पुराण १७५/१२)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत करने वाले को चाहिये कि वह किसी भी वस्तु की चोरी न करे, किसी भी प्राणिमात्र की हिंसा न करे, किसी भी वस्तु के प्रति लालच न करे, इन पाँच प्रकार के नियमों का उल्लेख लिंग महापुराण में प्राप्त होता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अस्तेयं ब्रह्मचर्यं च अलोभस्त्याग एव च। व्रतानि पञ्च भिक्षूणां हिंसा परमां त्विह॥ (लिंगमहापुराण १/८२/२४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतों को धारण करने वाले व्यक्ति को जो भी त्याज्य वस्तुएं हैं तथा जो भी नियम हैं उन सभी का पालन करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रतों के प्रकार॥ Types of Vrat==&lt;br /&gt;
पुराण विभिन्न प्रकार के व्रतों को दर्शाते हैं, जैसे - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* '''कायिका व्रत -''' यह शरीर से संबंधित व्रत है। उपवास जैसी शारीरिक तपस्या पर जोर दिया जाता है।&lt;br /&gt;
* '''वाचिक व्रत -''' यह वाणी से संबंधित व्रत। यहां सत्य बोलने और धर्मग्रंथों का पाठ करने को बहुत महत्व दिया जाता है।&lt;br /&gt;
* '''मनस व्रत -''' यह मन से संबंधित व्रत। यहां जोर मन को नियंत्रित करने, उसमें उत्पन्न होने वाले जुनून और पूर्वाग्रहों को नियंत्रित करने पर है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक व्रत को उसकी अवधि के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है, एक दिन तक चलने वाला व्रत दिन-व्रत होता है, और एक पक्ष (सप्ताह) तक चलने वाला व्रत पक्ष-व्रत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शास्त्रों के अनुसार व्रत के निम्नलिखित चार प्रकार हैं -  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#उपवास&lt;br /&gt;
#एकभुक्त&lt;br /&gt;
#नक्त&lt;br /&gt;
#अयाचित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रताचरणसे मनुष्यकों उन्नत जीवनकी योग्यता प्राप्त होती है। व्रतोंमें तीन बातोंकी प्रधानता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#संयम-नियमका पालन&lt;br /&gt;
#देवाराधन&lt;br /&gt;
#लक्ष्यके प्रति जागरूकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं। व्रत दो प्रकारसे किये जाते हैं -&amp;lt;ref&amp;gt;भवनाथ झा, धर्मायण-व्रत विधि विशेषांक, [https://mahavirmandirpatna.org/dharmayan/wp-content/uploads/2022/07/Dharmayan-vol.-119-Vrata-vidhi-Ank-ebook.pdf म०म० रुद्रधर कृत व्रत-पद्धति में व्रत-विधान] (२०२२), महावीर मन्दिर, पटना (पृ० ३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपवास - निराहार रहकर और एक बार संयमित आहारके द्वारा। इन व्रतोंके कई भेद हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#कायिक हिंसा आदिके त्यागको कायिकव्रत कहते हैं।&lt;br /&gt;
#वाचिक- कटुवाणी, पिशुनता (चुगुली) तथा निन्दाका त्याग और सत्य, परिमित तथा हितयुक्त मधुर भाषण 'वाचिकव्रत' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
#मानसिक - काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या तथा राग-द्वेष आदिसे रहित रहना 'मानसिकव्रत' है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य रूपसे अपने यहाँ तीन प्रकारके व्रत माने गये हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#नित्य&lt;br /&gt;
#नैमित्तिक&lt;br /&gt;
#काम्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रत की उपयोगिता॥ Vrat ki Upayogita==&lt;br /&gt;
व्रत - व्रियते इति व्रतम् जिसका वरण, ग्रहण, अनुपालन, आचरण, अनुष्ठान किया जाए उसे व्रत कहते हैं। व्रत एवं नियम को पर्यायवाचक माना गया है तथा उपवास, पुण्यक आदि को व्रत का प्रकार कहा है। वेदों में उल्लेख प्राप्त होता है कि व्रत धारण करने से मनुष्य दीक्षित होता है। दाक्षिण्य (दक्षता से, निपुणता) प्राप्त होती है। दक्षता की प्राप्ति से श्रद्धा का भाव जाग्रत होता है एवं श्रद्धा से सत्यस्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋग्वेद में सत्य बोलना व्रत कहा गया है। सत्य बोलने वाले मनुष्य पर देवताओं का प्रसन्न होना वर्णित है। मधुर भाषण को श्रेष्ठ व्रत कहा है। ऋग्वेद में दानशीलता को उत्तम व्रत कहा है। जो सामर्थ्यशाली एवं मित्र होते हुए भी मित्र को अन्नदान नहीं करते या उसका सत्कार नहीं करते ऐसे कृपण मनुष्य का परित्याग कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यजुर्वेद में सत्य इत्यादि श्रेष्ठ व्रतों का पालन करने का निर्देश किया गया है। सत्य इत्यादि व्रतों के पालन से व्यक्ति धनवान होता है। सामवेद में कहा गया है कि सत्यव्रत धारण करने वाले मनुष्य की रक्षा भगवान करते हैं। विद्वान को चाहिए कि वह कभी भी क्रोध न करे। किसी के प्रति अनादर का भाव मन न में लाए। सदा परमात्मा के ध्यान में लीन रहे तथा भगवान की स्तुति करे।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अनुव्रतः पितु पुत्रो मात्रा भवतु समना। जाया पत्ये मधुमर्ती वाच वदतु शान्तिवाम्॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अथर्ववेद में कहा गया है कि पुत्र को अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए। यही पुत्र धर्म के पालन हैं। पत्नी को अपने पति से मधुरता तथा सुख युक्त वाणी से वार्ता करनी चाहिए। ब्राह्मण व ग्रन्थों में सत्य इत्यादि श्रेष्ठ व्रतों का अनुपालन करने का निर्देश है। उपनिषदों में काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि विकृतियों का दमन करते हुए स्वाध्याय एवं प्रवचन करने का निर्देश है। व्रतों को सम्पन्न करने के लिये अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं, जिनमें वैदिक मन्त्रों का उपयोग होता है। मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिए वेदांगों का विशेष महत्व है। तिथियों, नक्षत्रों, वारों एवं अन्य प्रकार के व्रतों की सम्पन्नता हेतु मूहुर्त ज्ञान के लिये ज्योतिष वेदांग का अत्यन्त महत्व है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रामायण का आधार सत्यव्रत से प्रारम्भ होता है। राजा दशरथ ने सत्य वचन के कारण धर्म-बन्धन में बंध कर प्यारे पुत्र राम को वनवास दिया। वाल्मीकि श्रीराम के असंख्य गुणों का उल्लेख करते हुए सत्यवाक्य तथा दृढव्रत श्रीराम सभी व्रतों के बीज हैं। राम ने अपने चरित्र द्वारा समस्त व्रतों, धर्मों एवं नियमों का पालन करके एक आदर्श स्थापित किया। रामायण में श्रीराम के दृढव्रत एवं सीता के पतिव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है, साथ ही भरत का तपोव्रत एवं हनुमान के सेवा व्रत का उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारत में क्षमाव्रत का उल्लेख प्राप्त होता है कि जिसने पहले कभी तुम्हारा उपकार किया हो उससे यदि भारी अपराध हो जाए तो पहले उपकार का स्मरण करके उस अपराधी को क्षमा कर देना चाहिए। मनुष्य कोमल स्वभाव से उग्र स्वभाव तथा शान्त स्वभाव से शत्रुता का भी नाश कर सकता है। मृदुता से सब कुछ सिद्ध किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणों में शास्त्रोक्त नियमों को व्रत कहा गया है, वही तप माना है दम (इन्द्रियसंयम) एवं शम (मनोनिग्रह) आदि विशेष नियम भी व्रत के ही अंग हैं। व्रत करने वाले पुरुष को शारीरिक संताप सहन करना पड़ता है। इसलिये व्रत को तप नाम दिया गया है। इसी प्रकार व्रत में इन्द्रियसमुदाय का नियमन (संयम करना होता है, इसलिये इसे नियम कहते हैं)। पापों से निवृत्त होकर सब प्रकार के भोगों का त्याग करते हुए जो सदगुणों के साथ वास करता है उसी को उपवास समझना चाहिए। पुराणों में उपवास में निषेध वस्तुओं के वर्णन के साथ व्रतों में धारण करने वाले नियमों का वर्णन मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीविश्वनाथ शर्मा, [https://archive.org/details/iBaw_vrataraj-of-vishvanath-sharma-with-bhasha-tika-by-madhavacharya-khemraj/page/n4/mode/1up श्रीव्रतराजः] (१९८४), खेमराज श्रीकृष्णदास, मुंबई (पृ० ७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137602</id>
		<title>Vrata (व्रत)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137602"/>
		<updated>2026-04-14T11:17:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में &amp;quot;व्रत&amp;quot; की संकल्पना अत्यंत प्राचीन एवं व्यापक रही है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना व्रत कहलाता है। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। व्रत मात्र धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। इसका संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में अग्रसर करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
व्रताचरण, उपवास, नियमोंके परिपालन तथा विविध दानोंसे व्रतियों पर सभी देवता, ऋषि-मुनि तथा संसारके प्राणी निश्चित प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा देवादयो भवन्त्येव तेषां प्रीता न संशयः ॥ (भविष्यपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपवासैस्तथा तुल्यं तपः कर्म न विद्यते॥ दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु विश्वामित्रेण धीमता। तपसाक्रान्तमेकेन भक्तेन स च विप्रत्वमागतः॥ उपोष्य विधिवद्देवांस्त्रिदिवं प्रतिपेदिरे। ऋषयश्च परां सिद्धिमुपवासैरवाप्नुयुः॥ ये कुर्वन्ति उपवासांश्च विधानेन शुभान्विताः। न यान्ति ते मुनिश्रेष्ठ नरकान् भीमदारुणान्॥ (पद्मपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपवासके समान कोई तपश्चर्या नहीं है। महामति महर्षि विश्वामित्रजीने दिव्य हजार वर्षोंतक महान् तप किया और एकभुक्तव्रतका आचरण किया, उसीके प्रभावसे उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, उन्होंने व्रतोपवासद्वारा विविध देवताओंकी उपासना कर उत्तम स्वर्गलोक प्राप्त किया। ऋषियोंने भी उपवासोंके परिपालनसे परम सिद्धि प्राप्त की। जो कल्याणकामी विधिपूर्वक व्रतोपवासोंका परिपालन करते हैं, वे दारुण तथा भयंकर नरकोंमें नहीं जाते।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासैर्यैर्विष्णुर्नान्यजन्मनि तोषितः। ते नरा मुनिशार्दूल ग्रहरोगादिबाधिनः॥ (विष्णुधर्मोत्तरपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रतोपवासोंके द्वारा भगवान् विष्णुको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य ही इस जन्ममें ग्रह, रोग, व्याधिकष्ट आदिसे पीडित रहते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;न पूजितो भूतपतिः पुरा यै-र्व्रतं न चीर्णं न च सत्यमुक्तम्। दारिद्र्यशोकामयदुःखदग्धाः प्रायोऽनुशोचन्ति त एव मर्त्याः॥ (स्कन्दपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वमें भूतोंके अधिपति भगवान् शंकरका पूजन नहीं किया, व्रतपालन नहीं किया, सत्य वचनका पालन नहीं किया, वे ही मनुष्य दरिद्रता, शोक, रोग तथा दुःखोंसे दग्ध होते हैं तथा पश्चात्तापको प्राप्त होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये सर्वदा व्रतपराश्च शिवं स्मरन्ति तेषां न दृष्टिपथमप्युपयान्ति दूताः। याम्या महाभयकृतोऽपि च पाशहस्ताः दंष्ट्राकरालवदना विकटोग्रवेषा ॥ (स्कन्दपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो सदा ही व्रतपरायण रहते हैं और भगवान् शिवका स्मरण करते रहते हैं, उनके सामने महान् भय उत्पन्न करनेवाले, हाथमें पाश धारण किये हुए, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले तथा उग्र वेशवाले यमराजके विकट दूत नहीं आते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः॥ व्रतोपवासनियमैहोंमैः स्वाध्यायतर्पणैः। तेषां वै रुद्रसायुज्यं सामीप्यञ्चातिदुर्लभम् ॥ सलोकतां च सारूप्यं जायते तत्प्रसादतः। (कूर्मपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो व्रत, उपवास, नियम, होम, स्वाध्याय, तर्पण, यज्ञ, दान तथा ध्यान-समाधिके द्वारा भगवान् महादेवका अर्चन करते हैं, उन्हें भगवान् शंकरकी कृपासे अति दुर्लभ रुद्रसायुज्य, सामीप्य, सालोक्य तथा सारूप्य मोक्षकी प्राप्ति होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;[https://dn710602.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.402143/2015.402143.Kalyaan-Virat.pdf कल्याण विशेषांक-व्रतपर्वोत्सव], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा==&lt;br /&gt;
व्रत शब्द संस्कृत के वृञ् वरणे धातु से बना है, जिसका अर्थ है, चुनना और संकल्प करना। अर्थात इंद्रियनिग्रह, मनोनिग्रह और आचरण शुद्धि का समन्वय जिसमें सम्मिलित होता हो। अतः व्रत का मूल अर्थ हुआ - नियमपूर्वक किया गया दृढ संकल्प। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== वैदिक साहित्य में व्रत विधान==&lt;br /&gt;
वैदिक एवं उपनिषद् साहित्य में व्रत की संकल्पना अत्यन्त व्यापक रूप में प्रस्तुत हुई है। सामान्यतः व्रत को केवल उपवास या किसी विशेष तिथि पर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान के रूप में समझ लिया जाता है, किन्तु वैदिक दृष्टि में व्रत का स्वरूप इससे कहीं अधिक गूढ़ और जीवनपर्यन्त साधना से सम्बद्ध है। यह मनुष्य के आचरण, विचार और अन्तःकरण की शुद्धि का साधन है, जो उसे सत्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। यजुर्वेद के मन्त्रों में कहा गया है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्। इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥ (यजु० १।५)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतोंकी रक्षा करनेवाले हे अग्निदेव! मैं व्रताचरण करूँगा, आप मुझे व्रतोंके आचरणकी शक्ति प्रदान कीजिये। मेरा यह व्रताचरण निर्विघ्न सम्पन्न हो जाय। मैं असत्यसे दूर रहकर सत्यका ही आचरण करूँ। ऐसा आशीर्वाद मुझे प्रदान कीजिये।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम्। दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥ (यजु० १९।३०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रत धारण करनेसे मनुष्य दीक्षित होता है। दीक्षासे उसे दाक्षिण्य (दक्षता, निपुणता) प्राप्त होता है। दक्षताकी प्राप्तिसे श्रद्धाका भाव जाग्रत् होता है और श्रद्धासे ही सत्यस्वरूप ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह। तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वे॥ (अथर्व० ७।७४।४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्रतोंके स्वामी हे अग्निदेव ! आप व्रतानुष्ठानके द्वारा सम्यक् रूपसे प्रसन्न होते हैं। सर्वदा प्रसन्न मनवाले होकर आप हमारे घरमें प्रकाशित होनेकी कृपा करें। इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न तथा सम्यक् रूपसे प्रकाशमान हे जातवेद ! पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हम सभी आपकी उपासनामें लगे रहें।&amp;lt;blockquote&amp;gt;त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मत्र्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः॥ (ऋग्वेद ८।११।१)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;हे अग्निदेव! आप व्रतका पालन-रक्षण करनेवाले हैं। हे दीप्तिमान् देव! आप सभी मनुष्योंमें विद्यमान रहते हैं। आप सभी यज्ञों (कर्मों) में विराजमान रहते हैं। आप प्रशंसनीय हैं, स्तुत्य हैं। &amp;lt;blockquote&amp;gt;अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। अन्नं न परिचक्षीत। तद् व्रतम्। अन्नं बहु कुर्वीत। तद् व्रतम्। न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद् व्रतम्॥ (तैत्तिरीयोपनिषद् भृगुवल्ली अनु० ७-१०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अन्नकी निन्दा न करे, वह व्रत है। अन्नकी अवहेलना न करे, वह एक व्रत है। अन्नको बढ़ाये, वह एक व्रत है। अपने घरपर ठहरनेके लिये आये हुए किसी भी अतिथिको प्रतिकूल उत्तर न दे, वह एक व्रत है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्वृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥ (मुण्डक० ३।१।६) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;सत्य ही विजयी होता है, झूठ नहीं; क्योंकि वह देवयान नामक मार्ग सत्यसे परिपूर्ण है। जिससे पूर्णकाम ऋषिलोग (वहाँ) गमन करते हैं, जहाँ वह सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका उत्कृष्ट धाम है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुराणों में व्रत परंपरा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रतों के प्रकार॥ Types of Vrat==&lt;br /&gt;
शास्त्रों के अनुसार व्रत के निम्नलिखित चार प्रकार हैं -  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#उपवास&lt;br /&gt;
#एकभुक्त&lt;br /&gt;
#नक्त&lt;br /&gt;
#अयाचित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रताचरणसे मनुष्यकों उन्नत जीवनकी योग्यता प्राप्त होती है। व्रतोंमें तीन बातोंकी प्रधानता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#संयम-नियमका पालन&lt;br /&gt;
#देवाराधन&lt;br /&gt;
#लक्ष्यके प्रति जागरूकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं। व्रत दो प्रकारसे किये जाते हैं -&amp;lt;ref&amp;gt;भवनाथ झा, धर्मायण-व्रत विधि विशेषांक, [https://mahavirmandirpatna.org/dharmayan/wp-content/uploads/2022/07/Dharmayan-vol.-119-Vrata-vidhi-Ank-ebook.pdf म०म० रुद्रधर कृत व्रत-पद्धति में व्रत-विधान] (२०२२), महावीर मन्दिर, पटना (पृ० ३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपवास - निराहार रहकर और एक बार संयमित आहारके द्वारा। इन व्रतोंके कई भेद हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#कायिक हिंसा आदिके त्यागको कायिकव्रत कहते हैं।&lt;br /&gt;
#वाचिक- कटुवाणी, पिशुनता (चुगुली) तथा निन्दाका त्याग और सत्य, परिमित तथा हितयुक्त मधुर भाषण 'वाचिकव्रत' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
#मानसिक - काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या तथा राग-द्वेष आदिसे रहित रहना 'मानसिकव्रत' है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य रूपसे अपने यहाँ तीन प्रकारके व्रत माने गये हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#नित्य&lt;br /&gt;
#नैमित्तिक&lt;br /&gt;
#काम्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रत की उपयोगिता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137591</id>
		<title>Vrata (व्रत)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137591"/>
		<updated>2026-04-09T18:51:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति में &amp;quot;व्रत&amp;quot; की संकल्पना अत्यंत प्राचीन एवं व्यापक रही है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। यह मात्र धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। व्रत का संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में अग्रसर करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
व्रताचरण, उपवास, नियमोंके परिपालन तथा विविध दानोंसे व्रतियों पर सभी देवता, ऋषि-मुनि तथा संसारके प्राणी निश्चित प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा देवादयो भवन्त्येव तेषां प्रीता न संशयः ॥ (भविष्यपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपवासैस्तथा तुल्यं तपः कर्म न विद्यते॥ दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु विश्वामित्रेण धीमता। तपसाक्रान्तमेकेन भक्तेन स च विप्रत्वमागतः॥ उपोष्य विधिवद्देवांस्त्रिदिवं प्रतिपेदिरे। ऋषयश्च परां सिद्धिमुपवासैरवाप्नुयुः॥ ये कुर्वन्ति उपवासांश्च विधानेन शुभान्विताः। न यान्ति ते मुनिश्रेष्ठ नरकान् भीमदारुणान्॥ (पद्मपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपवासके समान कोई तपश्चर्या नहीं है। महामति महर्षि विश्वामित्रजीने दिव्य हजार वर्षोंतक महान् तप किया और एकभुक्तव्रतका आचरण किया, उसीके प्रभावसे उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, उन्होंने व्रतोपवासद्वारा विविध देवताओंकी उपासना कर उत्तम स्वर्गलोक प्राप्त किया। ऋषियोंने भी उपवासोंके परिपालनसे परम सिद्धि प्राप्त की। जो कल्याणकामी विधिपूर्वक व्रतोपवासोंका परिपालन करते हैं, वे दारुण तथा भयंकर नरकोंमें नहीं जाते।&amp;lt;blockquote&amp;gt;व्रतोपवासैर्यैर्विष्णुर्नान्यजन्मनि तोषितः। ते नरा मुनिशार्दूल ग्रहरोगादिबाधिनः॥ (विष्णुधर्मोत्तरपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रतोपवासोंके द्वारा भगवान् विष्णुको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य ही इस जन्ममें ग्रह, रोग, व्याधिकष्ट आदिसे पीडित रहते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;न पूजितो भूतपतिः पुरा यै-र्व्रतं न चीर्णं न च सत्यमुक्तम्। दारिद्र्यशोकामयदुःखदग्धाः प्रायोऽनुशोचन्ति त एव मर्त्याः॥ (स्कन्दपुराण)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जिन्होंने पूर्वमें भूतोंके अधिपति भगवान् शंकरका पूजन नहीं किया, व्रतपालन नहीं किया, सत्य वचनका पालन नहीं किया, वे ही मनुष्य दरिद्रता, शोक, रोग तथा दुःखोंसे दग्ध होते हैं तथा पश्चात्तापको प्राप्त होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये सर्वदा व्रतपराश्च शिवं स्मरन्ति तेषां न दृष्टिपथमप्युपयान्ति दूताः। याम्या महाभयकृतोऽपि च पाशहस्ताः दंष्ट्राकरालवदना विकटोग्रवेषा ॥ (स्कन्दपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो सदा ही व्रतपरायण रहते हैं और भगवान् शिवका स्मरण करते रहते हैं, उनके सामने महान् भय उत्पन्न करनेवाले, हाथमें पाश धारण किये हुए, भयंकर दाढ़ोंसे युक्त मुखवाले तथा उग्र वेशवाले यमराजके विकट दूत नहीं आते।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः ॥ व्रतोपवासनियमैहोंमैः स्वाध्यायतर्पणैः । तेषां वै रुद्रसायुज्यं सामीप्यञ्चातिदुर्लभम् ॥ सलोकतां च सारूप्यं जायते तत्प्रसादतः । (कूर्मपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो व्रत, उपवास, नियम, होम, स्वाध्याय, तर्पण, यज्ञ, दान तथा ध्यान-समाधिके द्वारा भगवान् महादेवका अर्चन करते हैं, उन्हें भगवान् शंकरकी कृपासे अति दुर्लभ रुद्रसायुज्य, सामीप्य, सालोक्य तथा सारूप्य मोक्षकी प्राप्ति होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;[https://dn710602.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.402143/2015.402143.Kalyaan-Virat.pdf कल्याण विशेषांक-व्रतपर्वोत्सव], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्रतों के प्रकार॥ Types of Vrat==&lt;br /&gt;
व्रताचरणसे मनुष्यकों उन्नत जीवनकी योग्यता प्राप्त होती है। व्रतोंमें तीन बातोंकी प्रधानता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#संयम- नियमका पालन&lt;br /&gt;
#देवाराधन&lt;br /&gt;
#लक्ष्यके प्रति जागरूकता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्रतोंसे अन्तःकरणकी शुद्धिके साथ-साथ बाह्य वातावरणमें भी पवित्रता आती है तथा संकल्पशक्तिमें दृढ़ता आती है। इनसे मानसिक शान्ति और ईश्वरकी भक्ति भी प्राप्त होती है। भौतिक दृष्टिसे स्वास्थ्यमें भी लाभ होता है अर्थात् रोगोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। यद्यपि रोग भी पाप हैं और ऐसे पाप व्रतोंसे ही दूर भी होते हैं तथापि कायिक, वाचिक, मानसिक और संसर्गजनित सभी प्रकारके पाप, उपपाप और महापापादि भी व्रतोंसे ही दूर होते हैं। व्रत दो प्रकारसे किये जाते हैं -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपवास - निराहार रहकर और एक बार संयमित आहारके द्वारा। इन व्रतोंके कई भेद हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#कायिक हिंसा आदिके त्यागको कायिकव्रत कहते हैं।&lt;br /&gt;
#वाचिक- कटुवाणी, पिशुनता (चुगुली) तथा निन्दाका त्याग और सत्य, परिमित तथा हितयुक्त मधुर भाषण 'वाचिकव्रत' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
#मानसिक - काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या तथा राग-द्वेष आदिसे रहित रहना 'मानसिकव्रत' है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य रूपसे अपने यहाँ तीन प्रकारके व्रत माने गये हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#नित्य&lt;br /&gt;
#नैमित्तिक&lt;br /&gt;
#काम्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137590</id>
		<title>Vrata (व्रत)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Vrata_(%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4)&amp;diff=137590"/>
		<updated>2026-04-07T05:30:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: नया लेख प्रारंभ - व्रत&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;भारतीय संस्कृति में “व्रत” की संकल्पना अत्यंत प्राचीन एवं व्यापक रही है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संकल्पपूर्वक नियमों का पालन करना। इसमें व्यक्ति अपने आहार, व्यवहार तथा विचारों पर नियंत्रण रखता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, अपितु आत्मसंयम, आचार-शुद्धि एवं संकल्प-प्रधान जीवन पद्धति का द्योतक है। व्रत का संबंध व्यक्ति के आंतरिक अनुशासन तथा बाह्य आचरण दोनों से है, जो उसे आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में अग्रसर करता है।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Livelihood_(%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE)&amp;diff=137566</id>
		<title>Livelihood (आजीविका)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Livelihood_(%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE)&amp;diff=137566"/>
		<updated>2026-02-27T17:35:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परंपरा में आजीविका अथवा जीवन-वृत्ति मात्र आर्थिक दायित्व न होकर एक विस्तृत नैतिक, सामाजिक और धर्मसंबद्ध अवधारणा है। धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा नीतिग्रंथ इस विषय को कर्तव्य, उत्तरदायित्व और सामाजिक संतुलन के रूप में निरूपित करते हैं। प्रस्तुत लेख में आजीविका की संकल्पना, उसके शास्त्रीय आधार, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व तथा आधुनिक संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
मानव जीवन की निरंतरता का मूल आधार जीवन-वृत्ति है। भारतीय परंपरा में जीविका केवल आत्मनिर्वाह का साधन नहीं, अपितु समाज और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। भरण-पोषण का प्रश्न तभी उत्पन्न होता है जब व्यक्ति आश्रित संबंधों - जैसे माता-पिता, पत्नी, संतान, वृद्ध एवं दुर्बल जन के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है। शास्त्रों ने इसे धर्म का अनिवार्य अंग माना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रीय दृष्टि से संपत्ति-चिन्तन==&lt;br /&gt;
भारतीय धर्मशास्त्रीय परम्परा में संपत्ति का विचार केवल आर्थिक अधिकार का विषय नहीं है, अपितु वह धर्म, कर्तव्य, सामाजिक संरचना और न्याय-व्यवस्था का अभिन्न अंग है। आधुनिक विधि-शास्त्र में संपत्ति को प्रायः स्वामित्व और उपभोग के अधिकार तक सीमित कर दिया जाता है, किन्तु धर्मशास्त्रों में संपत्ति एक नैतिक और दायित्वपूर्ण अवधारणा है। संपत्ति-संबंधी निर्णय केवल ग्रंथोक्त वचनों पर आधारित नहीं होते, बल्कि लोक-व्यवहार, युक्ति और परम्परा भी उनके निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
याज्ञवल्क्य सिद्धान्त है कि स्मृतियों में परस्पर विरोध होने पर व्यवहार को बल देना चाहिए, भारतीय विधि-चिन्तन की व्यावहारिकता को व्यक्त करता है। इसका आशय यह है कि यदि शास्त्रीय ग्रंथों में मतभेद हो, तो समाज में प्रचलित न्यायोचित आचरण को मान्यता दी जाए। यह दृष्टिकोण संपत्ति-विवादों में विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि उत्तराधिकार, विभाजन या स्वामित्व के प्रश्न अनेक परिस्थितियों में उत्पन्न होते हैं। शास्त्र का उद्देश्य समाज की स्थिरता है, अतः जहाँ शास्त्र-वचन और व्यवहार में सामंजस्य संभव न हो, वहाँ न्यायपूर्ण व्यवहार को प्राथमिकता दी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बृहस्पति का कथन कि - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केवल शास्त्र के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए, युक्तिहीन विचार धर्म की हानि करता है - इस तथ्य को और स्पष्ट करता है। यहाँ ‘युक्ति’ का अर्थ तर्क, परिस्थिति-विवेक और सामाजिक परिणामों की समझ से है। यदि संपत्ति का विभाजन या अधिकार-निर्णय केवल ग्रंथ के शाब्दिक अर्थ पर आधारित होगा और परिस्थितियों की उपेक्षा करेगा, तो वह न्यायसंगत नहीं माना जाएगा। धर्मशास्त्र का लक्ष्य जीवंत समाज है, न कि जड़ नियमों का अनुपालन।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संपत्ति की संकल्पना धर्मशास्त्रों में व्यापक है। इसमें स्वार्जित धन, पैतृक दाय, स्त्रीधन, संयुक्त पारिवारिक संपत्ति और सामुदायिक अधिकार सम्मिलित हैं। पैतृक संपत्ति पर पुत्रों का जन्मसिद्ध अधिकार स्वीकार किया गया है, जिससे संयुक्त परिवार व्यवस्था को स्थायित्व प्राप्त हुआ। यह व्यवस्था केवल आर्थिक साझेदारी नहीं, अपितु पारिवारिक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक थी। संपत्ति का अर्थ यहाँ उपभोग से अधिक संरक्षण और उत्तराधिकार की परम्परा का निर्वाह है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*स्त्रीधन की अवधारणा धर्मशास्त्रीय संपत्ति-विचार का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। विवाह, उपहार, आभूषण या विशेष अनुदान के रूप में स्त्री को प्राप्त धन पर उसका विशिष्ट अधिकार माना गया। यह व्यवस्था स्त्री की आर्थिक सुरक्षा का साधन थी। यद्यपि समय-समय पर इसके स्वरूप में परिवर्तन हुआ, तथापि मूल भावना स्त्री के स्वामित्व की स्वीकृति थी।&lt;br /&gt;
*व्यवहार-ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि - देश, जाति और कुल में प्रचलित नियमों का सम्मान किया जाना चाहिए। इसका आशय यह है कि संपत्ति-विवादों में स्थानीय परम्परा और सामाजिक स्वीकृति का विचार आवश्यक है। यदि न्यायाधीश लोक-परम्परा की उपेक्षा करेगा, तो समाज में असंतोष उत्पन्न होगा और न्याय-व्यवस्था की प्रतिष्ठा पर आघात पहुँचेगा। इस प्रकार धर्मशास्त्रीय संपत्ति-व्यवस्था सामाजिक संतुलन की रक्षक है।&lt;br /&gt;
*धर्म, अर्थ और न्याय का यह समन्वित दृष्टिकोण आधुनिक विधि-चिन्तन के लिए भी शिक्षाप्रद है। आज के उत्तराधिकार कानून, संयुक्त परिवार की अवधारणा तथा स्त्री-अधिकारों में इस परम्परा की प्रतिध्वनि देखी जा सकती है। अंतर केवल इतना है कि आधुनिक विधि अधिक औपचारिक और संहिताबद्ध है, जबकि धर्मशास्त्रीय व्यवस्था अधिक जीवन-सापेक्ष और लचीली थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः यह कहा जा सकता है कि भारतीय धर्मशास्त्रीय संपत्ति-चिन्तन एक जीवंत न्याय-दर्शन प्रस्तुत करता है, जिसमें शास्त्र, युक्ति और लोकाचार का समन्वय है। यह प्रणाली कठोर विधिक संरचना न होकर सामाजिक नैतिकता का व्यावहारिक रूप है। धर्मशास्त्र में निहित सिद्धान्तों के आधार पर स्पष्ट होता है कि संपत्ति का प्रश्न केवल अधिकार का नहीं, अपितु उत्तरदायित्व और सामाजिक समन्वय का भी विषय है।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधकर्त्री- सुनीता देवी, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/108932 स्मृति साहित्य में स्त्रियों के सम्पत्ति विषयक अधिकारों का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अनुशीलन] (२००९), शोधकेन्द्र- पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ (पृ० ७९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संपत्ति का वर्गीकरण==&lt;br /&gt;
'''चल तथा अचल सम्पत्ति'''&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+चल एवं अचल संपत्ति&lt;br /&gt;
!प्रकार&lt;br /&gt;
!उदाहरण&lt;br /&gt;
!विशेषता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|चल संपत्ति&lt;br /&gt;
|स्वर्ण, रजत, पशु, धन आदि&lt;br /&gt;
|परिवर्तनशील&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|अचल संपत्ति&lt;br /&gt;
|भूमि, गृह, क्षेत्र आदि&lt;br /&gt;
|स्थायी&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
'''पैतृक सम्पत्ति॥ Ancestral Property -''' पूर्वजों से प्राप्त संपत्ति इस पर पुत्रों का जन्मसिद्ध अधिकार माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''स्वार्जित सम्पत्ति॥ Self-acquired Property –''' व्यक्ति के परिश्रम, व्यापार, विद्या या सेवा से अर्जित धन उपार्जित सम्पत्ति कहलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सम्पत्ति का विभाजन==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्त्रीधन की अवधारणा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आजीविका की संकल्पना॥ Concept of livelihood==&lt;br /&gt;
भारतीय धर्मशास्त्रीय परंपरा में मानव जीवन के सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक आयामों का समन्वित विधान प्रस्तुत करती है। जीवन-वृत्ति अथवा भरण-पोषण का प्रश्न इसमें केवल जीविका अर्जन तक सीमित नहीं है, अपितु धर्म, नीति और सामाजिक उत्तरदायित्व से गहराई से जुड़ा हुआ है। धर्मशास्त्रमें प्रतिपादित धनागमन के सात धर्मयुक्त स्रोत तथा आजीविका के दस मान्य साधनों का विश्लेषण किया गया है, साथ ही उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मनुस्मृति में धनागमन स्रोत'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुस्मृति में धनागमन के सात साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है, जिन्हें सभी वर्णों के लिए सामान्य रूप से स्वीकार किया गया है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः। प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च॥ (मनुस्मृति १०.११५)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनुस्मृति], अध्याय 10, श्लोक 115।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;धर्मसम्मत धन प्राप्ति के  दाय, लाभ, क्रय, जय, प्रयोग, कर्मयोग तथा सत्प्रतिग्रह ये सात प्रकार के साधन बताए गए हैं। इन सातों को धर्मानुकूल माना गया है और इन्हीं माध्यमों से अर्जित धन को शास्त्रसम्मत एवं पवित्र कहा गया है। इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दाय॥ Inheritance -''' धर्मयुक्त उत्तराधिकार द्वारा प्राप्त संपत्ति दाय कहलाती है। यह पारिवारिक संपत्ति का वैध और नैतिक हस्तांतरण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''लाभ॥ Gains -''' मित्रों, संबंधियों अथवा समाज से प्राप्त उपहार, सहयोग अथवा सहायता द्वारा अर्जित धन लाभ की श्रेणी में आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''क्रय॥ Purchase / Exchange -''' अपने धन से क्रय-विक्रय कर प्राप्त संपत्ति क्रय कहलाती है। यह व्यापार और विनिमय का धर्मसम्मत रूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जय॥ Victory -''' धर्मयुक्त युद्ध या प्रतियोगिता में प्राप्त संपत्ति जय मानी जाती है। यह विशेषतः क्षत्रिय वर्ग से संबद्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रयोग॥ Investment / Lending -''' अपने धन को अन्य कार्यों में लगाकर उससे आय प्राप्त करना प्रयोग कहलाता है, जैसे ब्याज, साझेदारी अथवा निवेश।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कर्मयोग॥ Labour and Profession -''' कृषि, उद्योग, शिल्प, पशुपालन आदि श्रम आधारित कार्यों से अर्जित धन कर्मयोग के अंतर्गत आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सत्प्रतिग्रह॥ Honourable Acceptance -''' धर्मयुक्त रूप से प्राप्त दान या वेतन को सत्प्रतिग्रह कहा गया है, विशेषतः ब्राह्मणों के लिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनु के अनुसार, इन स्रोतों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार का धन अधर्मजन्य  माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आजीविका के साधन==&lt;br /&gt;
नागरिक के जीवन-निर्वाह हेतु आर्थिक संसाधनों की अनिवार्य आवश्यकता होती है। जिन कार्यों के माध्यम से व्यक्ति को जीवनयापन की आवश्यक सुविधाएँ सुलभ होती हैं, वे उसकी आजीविका के साधन कहलाते हैं। समाज में विभिन्न व्यक्तियों के पास भिन्न-भिन्न प्रकार की क्षमताएँ, रुचियाँ तथा योग्यताएँ पाई जाती हैं। शिक्षा के माध्यम से इन अंतर्निहित क्षमताओं का परिष्कार कर उनका सम्यक् विकास किया जाता है, जिससे व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुरूप आजीविका अर्जित करने में समर्थ होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सर्वविदित है कि सम्पूर्ण समाज एक ही प्रकार की आजीविका पर आधारित नहीं रह सकता। ऐसा न तो व्यावहारिक है और न ही सामाजिक संतुलन की दृष्टि से संभव। इसी कारण मनुस्मृति में मानव जीवन के निर्वाह हेतु विविध प्रकार की आजीविकाओं का उल्लेख किया गया है। मनु के अनुसार, विभिन्न स्वभाव, क्षमता एवं परिस्थितियों में स्थित मनुष्यों के लिए पृथक-पृथक आजीविका-मार्ग निर्धारित किए गए हैं, क्योंकि सभी मनुष्यों का जीवन किसी एक ही प्रकार की आजीविका से संचालित नहीं हो सकता। मनुस्मृति में जीवन-निर्वाह हेतु दस प्रकार की आजीविकाओं का उल्लेख मिलता है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्यं विपणिः कृषिः। धृतिर्भैक्षं कुसीदं च दश जीवनहेतवः॥ (मनुस्मृति 10.116)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनुस्मृति], अध्याय 10, श्लोक 116।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' विद्या (ज्ञानार्जन), शिल्प (कला-कौशल), भृति (वेतन या आजीविका हेतु किया गया कार्य), सेवा (किसी के अधीन की गई सेवा), गोरक्षा (पशुपालन), विपणि (व्यापार), कृषि (खेती), धृति (धैर्यपूर्वक संचय/स्वावलम्बन), भैक्ष (भिक्षा) तथा कुसीद (ऋण या सूद पर दिया गया धन) - ये दस मनुष्य के जीवन-निर्वाह के साधन कहे गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''विद्या -''' विद्या से अभिप्राय वेदविद्या से है, अर्थात् संसार की विविध क्रियाओं, नियमों और व्यवस्थाओं का सम्यक् ज्ञान। इस विद्या के अन्तर्गत शिक्षा, कल्प (अनुष्ठान-विधान), इतिहास, व्याकरण, ज्योतिष (खगोल एवं अंतरिक्ष विज्ञान), निरुक्त (वेदपदों की व्याख्या) तथा तर्क आदि शास्त्र सम्मिलित हैं। यह विद्या अध्ययन-अध्यापन के रूप में ग्रहण की जाती थी। इसके माध्यम से समाज को आध्यात्मिक, बौद्धिक एवं व्यावहारिक मार्गदर्शन प्राप्त होता था तथा इसी के द्वारा आजीविका हेतु आवश्यक वस्तुएँ और साधन उपलब्ध होते थे। ज्ञानार्जन एवं शिक्षण के माध्यम से आजीविका अर्जन, इसमें वेद, शास्त्र, व्याकरण, तर्क, खगोल, चिकित्सा आदि सम्मिलित हैं।&lt;br /&gt;
#'''शिल्प -''' शिल्प से तात्पर्य सभी प्रकार की कलाओं एवं तकनीकी कौशलों से है। इसके अन्तर्गत निर्माण-कार्य, वास्तु एवं शिल्पकला, वस्त्र-निर्माण तथा वस्त्रों को सुगन्धित करने जैसी विधियाँ आती हैं। आधुनिक परिभाषा में इन्हें इंजीनियर, आर्ट-डिज़ाइनर, शिल्पकार आदि कहा जा सकता है। सभी प्रकार के कुटीर उद्योग, लघु एवं हस्तशिल्प उद्योग, नाट्यकला, नृत्य, गायन, वादन, अभिनय तथा जनसम्पर्क और विज्ञापन से सम्बद्ध कलाएँ भी शिल्प के अन्तर्गत ही मानी जाती हैं। इसी प्रकार योद्धा वर्ग अपनी युद्धकला एवं रक्षा-कौशल के प्रतिफलस्वरूप धन प्राप्त कर आजीविका का निर्वाह करता था। इस प्रकार शिल्प जीवन-यापन का एक महत्त्वपूर्ण एवं बहुआयामी साधन रहा है। निर्माण, हस्तकला, तकनीकी एवं कलात्मक कार, आधुनिक संदर्भ में इसे इंजीनियरिंग, डिजाइन और तकनीकी सेवाओं से जोड़ा जा सकता है।&lt;br /&gt;
#'''भृति -''' वेतन या पारिश्रमिक के रूप में सेवा करके जीवन-यापन करना है। भृति का तात्पर्य प्रैष्यभाव के अंतर्गत पारिश्रमिक प्राप्त करने से है। अर्थात् किसी विशेष संवाद, आदेश अथवा सन्देश के प्रेषण और प्रत्यावर्तन के प्रतिफलस्वरूप वेतन ग्रहण करना। प्राचीन समाज में यह कार्य प्रायः उन व्यक्तियों द्वारा किया जाता था जो राजपुरुषों, उच्चाधिकारियों अथवा प्रतिष्ठित व्यक्तियों के दूत के रूप में सन्देश लाने–ले जाने का दायित्व निभाते थे। व्यापारिक एवं वाणिज्यिक सन्देशों का आदान-प्रदान भी इसी श्रेणी में सम्मिलित माना जाता था।&lt;br /&gt;
#'''सेवा -''' दूसरों की सहायता एवं संरक्षण के बदले प्राप्त आय, जिसमें राजकीय और निजी सेवाएँ सम्मिलित हैं। सेवा का अर्थ है पराश्रय जीवन, अर्थात् दूसरे की आज्ञा का पालन करते हुए उसके अधीन कार्य करना और उसके प्रतिफलस्वरूप धन या वेतन प्राप्त करना। राज्य से सम्बन्धित सभी शासकीय सेवाएँ तथा व्यक्तिगत रूप से की जाने वाली निजी सेवाएँ (नौकरियाँ) इसी श्रेणी में आती हैं। इसके अतिरिक्त, विविध प्रकार की दैनिक मजदूरी भी सेवा-वृत्ति के अन्तर्गत ही मानी जाती है। धर्मशास्त्रीय परम्परा में यह कार्य प्रायः शूद्रों द्वारा किया जाने वाला बताया गया है। वर्तमान समय में भी जो व्यक्ति इस प्रकार की आजीविका को अपनाते हैं, उन्हें शास्त्रीय दृष्टि से शूद्र-वर्ग में परिगणित किया जाता है।&lt;br /&gt;
#'''गोरक्षा -''' पशुपालन एवं कृषि-आधारित आजीविका, विशेषतः गौ-पालन आदि। गोरक्षण - पशुपालन को गोरक्षण कहा गया है। इसके अंतर्गत गाय, बैल, भैंस आदि विविध पशुओं का पालन-पोषण कर उनसे दुग्ध, घृत, गोमय, कृषि-सहायता आदि के माध्यम से आय प्राप्त करना सम्मिलित है। भारतीय समाज में गोरक्षण को न केवल आर्थिक आजीविका का साधन माना गया, अपितु धार्मिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी इसे अत्यन्त पवित्र कर्म स्वीकार किया गया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में इसका विशेष महत्व रहा है।&lt;br /&gt;
#'''विपणि -''' व्यापार, वस्तुओं का क्रय-विक्रय। वस्तुओं के क्रय-विक्रय द्वारा आय अर्जन करना ‘विपणि’ कहलाता है। यह कृषि से भिन्न एक स्वतंत्र आजीविका-साधन माना गया, जिसमें व्यापार, वाणिज्य, बाजार व्यवस्था तथा दूरस्थ क्षेत्रों के साथ लेन-देन सम्मिलित था। प्राचीन भारत में व्यापार को समृद्धि का प्रमुख माध्यम माना गया और समाज के आर्थिक संतुलन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।&lt;br /&gt;
#'''कृषि -''' भूमि पर श्रम कर अन्न एवं अन्य उत्पादों का उत्पादन। भूमि में बीज बोकर अन्न एवं अन्य वनस्पतियों का उत्पादन करना कृषि कहलाता है। यह आय प्राप्ति का प्रमुख साधन रहा है, जिसमें समाज का एक बड़ा वर्ग संलग्न था। भारतीय सामाजिक-आर्थिक संरचना में कृषि को आधारभूत आजीविका के रूप में स्वीकार किया गया है।&lt;br /&gt;
#'''धृति -''' धैर्यपूर्वक कठिन कार्यों द्वारा आजीविका, जिसमें जोखिमपूर्ण अथवा परिश्रमसाध्य कर्म सम्मिलित हैं। धैर्यपूर्वक जीवन निर्वाह करना धृति कहलाता है। जिन व्यक्तियों में तत्काल अधिक आय अर्जन की क्षमता नहीं होती, वे संतोष और निरन्तर प्रयास के माध्यम से अपनी क्षमता का विकास करते हैं अथवा क्रमशः धन संचय कर अन्य व्यवसायों की ओर अग्रसर होते हैं। यह आत्मसंयम एवं दीर्घकालिक दृष्टि का प्रतीक है।&lt;br /&gt;
#'''भैक्ष -''' भिक्षाटन द्वारा जीवन निर्वाह करना भैक्ष कहा गया है। यह आजीविका-विधि विशेष रूप से अपरिग्रही ब्राह्मणों एवं वैराग्यशील व्यक्तियों के लिए निर्धारित मानी गई है, जिसमें आत्मसंयम और सामाजिक अनुग्रह का समन्वय दिखाई देता है।&lt;br /&gt;
#'''ऋण/कुसीद -''' सीमित और धर्मयुक्त रूप से ऋण देकर आय अर्जन, जिसे मनु ने विशेष परिस्थितियों में स्वीकार किया है। अपने पास उपलब्ध धन को आवश्यकता-मंद व्यक्तियों को देकर उससे सूद लेना कुसीद कहलाता है। यह भी आय प्राप्ति का एक साधन माना गया है, यद्यपि इसके नैतिक पक्ष पर धर्मशास्त्रों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया गया है।  इस प्रकार विद्या, शिल्प, भृति, सेवा, गोरक्षण, विपणि, कृषि, धृति, भैक्ष एवं कुसीद - ये सभी जीवन-निर्वाह के विविध साधन हैं, जो समाज की आर्थिक विविधता, श्रम-विभाजन तथा नैतिक मर्यादाओं को प्रतिबिम्बित करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सूद पर धर्मशास्त्र का दृष्टिकोण'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुस्मृति (10.117) में स्पष्ट किया गया है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए सूद पर धन लेना निषिद्ध है। किंतु वैश्यों के लिए यह सीमित रूप में स्वीकार्य है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मनु आर्थिक गतिविधियों को वर्णानुसार नैतिक मर्यादाओं में बांधते हैं। मनुस्मृति की जीवन-वृत्ति संबंधी अवधारणा यह सुनिश्चित करती है कि -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*आजीविका समाज को हानि न पहुँचाए&lt;br /&gt;
*धन का स्रोत पारदर्शी और धर्मसम्मत हो&lt;br /&gt;
*भरण-पोषण के माध्यम से परिवार और समाज की स्थिरता बनी रहे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह व्यवस्था आज के समय में आर्थिक नैतिकता और सतत विकास की अवधारणा से साम्य रखती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भरण-पोषण और उत्तराधिकार का संबंध==&lt;br /&gt;
भारतीय परंपरा में भरण-पोषण के उत्तरदायित्व का विधान प्राचीन व्यवहार के अन्तर्गत दो रूपों में प्राप्त होता है। परस्पर संबंध के कारण या सम्पत्ति-प्राप्ति की स्थिति के कारण। मनु ने कहा है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;वृद्धौ च मातापितरौ साध्वी भार्या सुतः शिशुः। अप्यकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुरब्रवीत्॥ (मनुभाष्य ४।२५१); (मिता०याज्ञ० २।१७५)&amp;lt;ref&amp;gt;संपादक- गंगानाथ झा, [https://archive.org/details/manusmriti-with-bhashya-of-medhatithi-vol-1-sanskrit-text-ganganath-jha-1932-bis/Manusmriti%20with%20Bhashya%20of%20Medhatithi%20Vol%201%20-%20Sanskrit%20Text%20-%20Ganganath%20Jha%201932%20%28BIS%29/page/n422/mode/1up मनुस्मृति-मेधातिथि-मनुभाष्यसमेत] (१९३९), अध्याय-४, श्लोक-२५१, एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता (पृ० ४१४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;एक सौ बुरे कर्मों के सम्पादन से भी वृद्ध माता-पिता, साध्वी पत्नी एवं शिशु का भरण-पोषण करना चाहिये। इससे स्पष्ट होता है कि चाहे सम्पत्ति हो या न हो, पिता का यह कर्त्तव्य है कि वह शिशु का पालन करे, पति का कर्त्तव्य है कि वह अपनी पतिव्रता स्त्री का भरण-पोषण करे और पुत्र का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने वृद्ध माता-पिता का संवर्धन करें। कौटिल्य ने भी कहा है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अपत्य-दारं माता-पितरौ भ्रातृऋनप्राप्त-व्यवहारान्भगिनीः कन्याविधवाश्चाबिभ्रतः शक्तिमतो द्वादश-पणो दण्डः। अन्यत्र पतितेभ्यः, अन्यत्र मातुः॥ (अर्थशास्त्र २.१.२८)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D_%E0%A5%A8/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7 अर्थशास्त्र], अधिकरण-२, अध्याय- १, सूत्र-२८।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;भाषार्थ - जो अपने अपतित बच्चों, पत्नी, माता-पिता, छोटे भाइयों एवं बहिनों, कुमारी कन्याओं, विधवा पुत्रियों का भरण-पोषण नहीं करता उस पर १२ पणों का दण्ड लगाया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0)&amp;diff=137563</id>
		<title>Dharmashastra (धर्मशास्त्र)</title>
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		<updated>2026-02-23T17:39:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परम्परा द्वारा समाज में धर्मसम्मत आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त, सामाजिक एवं वैयक्तिक कर्तव्य-अकर्तव्य आदि कर्मों के सुव्यवस्थित निर्धारण हेतु धर्मशास्त्र का प्रवर्तन हुआ तथा वैदिकसाहित्य में यह कल्प नामक वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित है। इस शास्त्र के अन्तर्गत मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, बृहस्पति, बौधायन, जीमूतवाहन, विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य आदि आचार्यों के सूत्र, स्मृतियाँ, भाष्य एवं समकालीन निबन्धात्मक प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति का मूल आधार धर्म है। विविध शास्त्रकारों ने धर्म शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं। धर्मशास्त्र में सामाजिक आचार-विचार, [[Varnashrama Dharma (वर्णाश्रमधर्मः)|वर्णाश्रम-धर्म]], [[Achara (आचार)|सदाचार]], [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]], राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य तथा शासन से सम्बन्धित नियम आदि का सुव्यवस्थित विवेचन किया गया है। धर्मशास्त्र शब्द दो पदों [[Dharma (धर्मः)|धर्म]] और [[Shastra Shikshana Paddhati (शास्त्रशिक्षणपद्धतिः)|शास्त्र]] के संयोग से निर्मित है। इन दोनों पदों के शाब्दिक अर्थों का ज्ञान आवश्यक है। धर्म शब्द पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध प्राच्यविद् पण्डित तारिणीश झा ने संस्कृत शब्दार्थ कोश में क्रमशः -&amp;lt;blockquote&amp;gt;ध्रियते लोकानेन, ध्रियते लोकाः वा तथा ध्रियते लोकान् ध्रियते पुण्यात्मान् इति वा। (शब्दकोश)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार व्युत्पत्ति करते हुए धृ धातु से मन प्रत्यय द्वारा धर्म शब्द की निष्पत्ति मानी है तथा इसके पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों प्रयोगों को स्वीकार किया है। शास्त्र शब्द का अर्थ भी उपर्युक्त शब्दकोशकार द्वारा प्रायः समान रूप में ग्रहण किया गया है। शास् धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से शास्त्र शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। विभिन्न विद्वानों ने इसके अर्थ क्रमशः आज्ञा, उपदेश, नियम, धार्मिक ग्रन्थ, वेद एवं धर्मशास्त्र तथा जनसामान्य के कल्याण हेतु विधि-विधान प्रतिपादित करने वाले ग्रन्थ आदि स्वीकार किए हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्र शब्द का तात्पर्य उस व्यवस्था से है, जो मनुष्य के आचार-व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, सामाजिक मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। सामान्यतः स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र का पर्याय माना जाता है। मनुस्मृति में यह प्रतिपादित किया गया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय-२, श्लोक-१०।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;भाषार्थ - [[Shruti (श्रुतिः)|श्रुति]] को [[Vedas (वेदाः)|वेद]] तथा [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृति]] को धर्मशास्त्र के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार [[Mukhya Smritis (मुख्य स्मृतियां)|स्मृतिग्रन्थों]] को धर्मशास्त्र की संज्ञा प्रदान की गई है तथा स्मृतिकारों को धर्मशास्त्रकार कहा गया है। इस प्रकार धर्मशास्त्र का मूलाधार [[Vaidika Vangmaya (वैदिकवाङ्मयम्)|वैदिक परम्परा]] में निहित है, परन्तु उसका व्यावहारिक स्वरूप सूत्र, स्मृति, भाष्य एवं निबन्धात्मक ग्रन्थों के माध्यम से विकसित हुआ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः। धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश॥ (विष्णुपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चार वेद, छह वेदाङ्ग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र और पुराण विद्याओं के चौदह आधार माने गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र से सम्बन्धित साहित्य मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है - धर्मसूत्र एवं स्मृतियाँ। वैदिक अध्ययन की परम्परा में छह [[Shad Vedangas (षड्वेदाङ्गानि)|वेदाङ्गों]] का विधान किया गया, जिन्हें [[Shiksha (शिक्षा)|शिक्षा]], [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प]], [[Vyakarana Vedanga (व्याकरणवेदाङ्गम्)|व्याकरण]], [[Nirukta (निरुक्त)|निरुक्त]], [[Chandas (छन्दस्)|छन्द]] एवं [[Jyotisha (ज्योतिष)|ज्योतिष]] कहा जाता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;छन्‍द: पादौ तु वेदस्‍य, हस्‍तौ कल्‍पोऽथ पठ्यते। ज्‍योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्‍तं श्रोत्रमुच्‍यते॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्‍य मुखं व्‍याकरणं स्‍मृतम्। तस्‍मात्‍सांगमधीत्‍यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय शिक्षा)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE/%E0%A4%85%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%83 पाणिनीय शिक्षा], खण्ड- ८, श्लोक- ४१-४२।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इनमें [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प वेदांग]] का विशेष स्थान है, शास्त्रीय दृष्टि से कल्प उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें यज्ञानुष्ठान का विधि-विधान एवं  धार्मिक संस्कारों के नियम बतलाये गये हैं। विष्णुमित्र ने कल्प का शाब्दिक अर्थ बताते हुए कहा है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्। (ऋक्प्रातिशाख्य वृत्ति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद में विहित कर्मों को क्रमबद्ध रूप में विवेचित करने वाला शास्त्र कल्प है। कल्पसूत्रों के अन्तर्गत चार प्रकार की सूत्र रचनाएं हैं - [[Shrautasutras (श्रौतसूत्राणि)|श्रौतसूत्र]], [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्यसूत्र]], [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]] तथा [[Shulbasutras (शुल्बसूत्राणि)|शुल्बसूत्र]]। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''श्रौतसूत्र''' - [[Vedas (वेदाः)|वेदों]] में वर्णित [[Yajna (यज्ञः)|यज्ञों]] की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''गृह्यसूत्र''' - [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्याग्नि]] में होने वाले यज्ञों एवं [[Upanayana (उपनयनम्)|उपनयन]], [[Vivaha (विवाहः)|विवाह]] आदि संस्कारों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''धर्मसूत्र''' - [[Ashram System (आश्रम व्यवस्था)|आश्रमों]] और [[Varna Dharma (वर्णधर्मः)|चारों वर्णों]], [[Achara (आचार)|धार्मिक आचारों]] एवं राजा के कर्तव्यों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''शुल्बसूत्र''' - [[Vedi (वेदिः)|वेदी]] के निर्माण की विधि आदि के प्रतिपादक ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार सम्पूर्ण [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प-वेदांग]] चार वर्गों में विभाजित किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शालिनी वर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/55290 वसिष्ठधर्मसूत्र-एक अनुशीलन] (२००८), भूमिका, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ (पृ० २-३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रीय वाङ्मय॥ Dharmasastric literature==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अन्तर्गत [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]], [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृतियाँ]], उन पर रचित टीकाएँ तथा निबन्धात्मक ग्रन्थ सम्मिलित किए जाते हैं। धर्मसूत्रों, स्मृतियों, टीकाओं एवं निबन्धों की संख्या अत्यन्त व्यापक मानी जाती है। इन मूल ग्रन्थों पर रचित लघु एवं विशाल दोनों प्रकार के ग्रन्थ भी धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अंतर्गत ही समाहित किए जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थी- संदीप कुमार गुप्त, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264949 चतुर्वर्ग की धर्मशास्त्रीय अवधारणा] (2011), शोधकेंद्र- छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० २२)।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसको तीन निश्चित कालों में विभक्त किया जा सकता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#प्रथम काल गौतम, वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रों का है, जो कि कल्प वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित हैं।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्रों के द्वितीय क्रम में मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृतियों का समावेश होता है।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्र का तृतीय क्रम स्मृतियों की प्राचीन टीकाएँ और निबन्ध ग्रन्थों का है, इनमें विश्वरूप, मेधातिथि और विज्ञानेश्वर आदि के नाम प्रमुख हैं साथ ही कृत्यकल्पतरु, स्मृतिचन्द्रिका, चतुर्वर्गचिन्तामणि चण्डेश्वर का रत्नाकर आदि ग्रन्थों को निबन्ध की श्रेणी में परिगणन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्वोक्त तीनों कालक्रम में परिगणित धर्मसूत्र, स्मृतियाँ, टीकाएँ तथा निबन्ध ग्रन्थ धर्मशास्त्रीय वाङ्मय में समावेश किये जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===धर्मसूत्रों का स्वरूप===&lt;br /&gt;
{{Main|Dharmasutras_(धर्मसूत्राणि)}}&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय साहित्य का विकास मुख्यतः धर्मसूत्रों से प्रारम्भ होकर स्मृति एवं निबन्ध ग्रन्थों तक विस्तृत है। बौधायन, आपस्तम्ब, गौतम एवं वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रकारों ने धर्मसूत्रों के माध्यम से सामाजिक आचारों एवं विधिक मान्यताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, बृहस्पति आदि स्मृतिकारों ने धर्म के विविध पक्षों राजधर्म, व्यवहार, दण्ड, उत्तराधिकार, स्त्री-अधिकार एवं सामाजिक न्याय का विस्तृत विवेचन किया।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थिनी- रोली गुप्ता, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264777 बौधायन धर्मसूत्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१३), छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० ७-८)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्रों का वेद-विशेष से कोई निश्चित सम्बन्ध नहीं, ये स्वतंत्र रचनाएँ जैसी हैं। परन्तु जैसा कि डॉ० पी० वी० काणे ने उल्लेख किया है- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परम्परानुसार गौतमधर्मसूत्र का अध्ययन सामवेदी लोग करते थे, आपस्तम्ब के सूत्रों का अध्ययन तैत्तिरीय शाखा के अनुयायी गण करते थे और वसिष्ठधर्मसूत्र का अध्ययन ऋग्वेदी लोग करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि धर्मसूत्र स्वतन्त्र रचनाओं के रूप में थे। परन्तु बाद में भिन्न-भिन्न वेदों के अनुयायियों ने इन्हें अपनाकर अपना कल्प वेदांग अध्ययन पूरा किया। वर्तमान समय में केवल चार धर्मसूत्र ही उपलब्ध होते हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*गौतम धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनके अतिरिक्त तीन धर्मसूत्रों का और उल्लेख मिलता है- विष्णुधर्मसूत्र, हिरण्यकेशि धर्मसूत्र और वैखानसधर्मसूत्र। इनमें हिरण्यकेशि धर्मसूत्र आपस्तम्ब से ही अधिकांशतः मिलता-जुलता है। वैखानस मुख्यरूप से संन्यास व वानप्रस्थ आश्रमों के अध्ययन के लिए उपयोगी है। अतः अध्ययन की दृष्टि से केवल पाँच धर्मसूत्र ही उपयोगी है- गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन, वसिष्ठ और विष्णु धर्मसूत्र।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+धर्मसूत्र एवं उन पर लिखित भाष्य&lt;br /&gt;
!'''वेद'''&lt;br /&gt;
!शाखा&lt;br /&gt;
!धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
!विषय-वस्तु&lt;br /&gt;
!भाष्य एवं टीकाएं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;2&amp;quot; |ऋग्वेद&lt;br /&gt;
|शाकल&lt;br /&gt;
|वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|३० अध्याय, सूत्र एवं श्लोक-दोनों रूपों में&lt;br /&gt;
|कृष्ण पण्डित धर्माधिकारी का भाष्य, जिसे विद्वन्मेदिनी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|कौषीतकि&lt;br /&gt;
|विष्णु&lt;br /&gt;
|१०० अध्याय&lt;br /&gt;
|नन्द पण्डित (वैजयन्ती व्याख्या), भारुचि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!शुक्ल&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
|_&lt;br /&gt;
|हारीत&lt;br /&gt;
|३० अध्याय&lt;br /&gt;
|लघु हारीत स्मृति तथा वृद्ध हारीत स्मृति से सम्बद्ध&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कृष्ण&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |तैत्तिरीय&lt;br /&gt;
|बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|चार प्रश्न (जिनमें से केवल दो को मूल माना जाता है)&lt;br /&gt;
|गोविन्दस्वामी का भाष्य (विवरण)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब कल्प के 28वें एवं 29वें प्रश्न (1364 सूत्र एवं 30 श्लोक)&lt;br /&gt;
|हरदत्त (उज्ज्वलवृत्ति), धूर्तस्वामी तथा शंकर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि कल्प के 26वें एवं 27वें प्रश्न&lt;br /&gt;
|महादेव दीक्षित (वैजयन्ती)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| वैखानस धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|वैखानस स्मार्तसूत्र के 3 प्रश्न (51 काण्ड एवं 365 सूत्र)&lt;br /&gt;
|कोई भाष्य उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!सामवेद&lt;br /&gt;
|राणायनीय शाखा&lt;br /&gt;
|गौतम धर्मसूत्र (चरणव्यूह के अनुसार)&lt;br /&gt;
|२८ अध्याय, सूत्ररूप में रचित&lt;br /&gt;
|हरदत्त (मिताक्षरा) असहाय, भारत्यज्ञ, मस्करी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!अथर्ववेद&lt;br /&gt;
| colspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कोई धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कल्पसूत्रों में धर्मसूत्रों को तीसरे वर्ग में रखा गया है। धर्मसूत्रों का गृह्यसूत्रों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन दोंनों के विषयों में कुछ समानता भी है। यथा-उपनयन, अनध्याय, विवाह, श्राद्ध, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, महायज्ञ आदि। धर्मसूत्रों में इनके सामाजिक नियमों प्रतिबन्धों व रीतियों का उल्लेख है। जबकि गृह्यसूत्रों में विधि व अनुष्ठान का वर्णन है। किन्तु धर्मसूत्रों में जहाँ गृह्यकर्मों से सम्बन्धित सूत्र हैं, वहीं धर्मसूत्रों का विषय अधिक व्यापक है। वे मानव के आचरण सम्बन्धी नियमों का विवेचन करते हैं। संक्षेप में धर्मसूत्रों का मुख्य विषय मानव जीवन के विविध पक्षों के कर्त्तव्यों का ज्ञान कराना है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===स्मृति ग्रंथो की अवधारणा===&lt;br /&gt;
{{Main|Smrti_(स्मृतिः)}}&lt;br /&gt;
मनु का वचन 'धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः' इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि धर्मशास्त्र मूलतः स्मृति-परम्परा से सम्बद्ध हैं। अर्थात् जितने भी धर्मशास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी स्मृति-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। इन धर्मशास्त्रों के कर्त्ताओं एवं उनकी परम्परा का विवेचन पराशर स्मृति में प्राप्त होता है। पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पे कल्पे क्षयोत्पत्त्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।  श्रुतिस्मृतिसमाचारनिर्णेतारश्च सर्वदा॥ (पराशर स्मृति 1.20)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot;&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० २०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक पर स्मृतिमुक्ताफल में टीका करते हुए कहा गया है कि सृष्टि और प्रलय का यह क्रम प्रत्येक महाकल्प एवं अवांतर कल्प में निरन्तर चलता रहता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देवता महाकल्प के अन्त में लीन होते हैं और नये महाकल्प के प्रारम्भ में पुनः प्रकट होते हैं। स्मृतिमुक्ताफल में टिप्पणी प्राप्त होती है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;क्षयसहिता उत्पत्तिः क्षयोत्पत्तिः। तयोपलाक्षता भवंति कल्पे कल्पे महाकल्पे अवांतरकल्पे च। ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा महाकल्पावसाने क्षीयंते महाकल्पादावुत्पद्यंते। एवमवांतरकल्पानामवसाने प्रारंभे च स्मृत्यादीनां निर्णेतारो मन्वादयः क्षयोत्पत्तिभ्यामुपलक्ष्यंते। चकारेणानुक्तो धर्मः समुच्चीयते। सर्वदेत्यनेन सृष्टिसंहारप्रवाहस्यानादित्वमनंतत्वं च दर्शितम्। स एव॥ (स्मृति मुक्ताफलम् १।२१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;वैद्यनाथ दीक्षितीय, [https://ia801409.us.archive.org/9/items/in.ernet.dli.2015.486485/2015.486485.Smrtimuktaphalama-part-1_text.pdf स्मृतिमुक्ताफलम्], वर्णाश्रमधर्मकाण्डम् (1937), विश्वनाथ जगन्नाथ घारपुरे (पृ० ११)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार श्रुति और स्मृति के निर्णायक मनु आदि भी प्रत्येक कल्प के आरम्भ और अन्त में प्रकट एवं विलीन होते रहते हैं। यहाँ &amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt;सर्वदा&amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt; पद के माध्यम से सृष्टि–प्रलय की अनादि और अनन्त परम्परा का संकेत किया गया है। आगे पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;न कश्चिद्वेदकर्त्ता च वेदं श्रुत्वा चतुर्मुखः। तथैव धर्मान् स्मरति मनुः कल्पांतरे तथा॥ (पराशर स्मृति 1. 21)&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक की टीका में स्मृतिमुक्ताफलकार स्पष्ट करते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पांतरे धर्मान् स्मरति इति पत्रयं पूर्वार्धेऽपि संबध्यते। महाकल्पे चतुर्मुखः परमेश्वरेण दत्तं वेदं श्रुत्त्वा तत्र विप्रकीर्णान्वर्णाश्रमादिधर्मान्स्मृतिग्रंथरूपेण उपनिबध्नाति तथैव स्वायंभुवो मनुः प्रत्यवांतरकल्पं वेदोक्तधर्मान्ग्रथ्नाति। मनुग्रहणेनात्रिविष्ण्वाद्य उपलक्ष्यंते। (स्मृति मुक्ताफलम्)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;quot;कल्पान्तरे धर्मान् स्मरति&amp;quot; यह पद पूर्ववर्ती वाक्य से सम्बद्ध है। प्रत्येक महाकल्प के प्रारम्भ में चतुर्मुख ब्रह्मा परमेश्वर से प्राप्त वेद को सुनते हैं और उसमें वर्णित वर्णाश्रम आदि धर्मों को स्मृति-ग्रन्थों के रूप में व्यवस्थित करते हैं। इसी प्रकार स्वायम्भुव मनु प्रत्येक अवांतर कल्प में वेदोक्त धर्मों को स्मरण कर स्मृति-रूप में स्थापित करते हैं। यहाँ मनु शब्द से मात्र एक व्यक्ति नहीं, अपितु अत्रि, विष्णु, पराशर आदि सभी धर्मशास्त्रकारों का भी संकेत होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० दिलीप कुमार नाथाणी, [https://ijesrr.org/publication/83/1.%20ijesrr%20june%202022.pdf स्मृति-धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के रचनाकार] (२०२२), इण्टरनेशनल जर्नल ऑफ एजुकेशन एण्ड साइंस रिसर्च रिव्यू (पृ० ३४९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''स्मृतियों की संख्या'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्धकारों एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा में स्मृतियों की संख्या को लेकर विभिन्न मत प्राप्त होते हैं। कुछ परम्पराओं में 36 स्मृतियों का उल्लेख है, तो कहीं यह संख्या और अधिक बतायी गयी है। वर्तमान में उपलब्ध स्मृतियों की संख्या सौ से भी अधिक मानी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधाता- सुभाष वी. वसोया, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/521411 धर्मशास्त्रानुसारेण आचारस्य एकं समीक्षात्मकम् अध्ययनम्] (२०१८), द्वितीय अध्याय, श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात (पृ० १४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{columns-list|colwidth=15em|style=width: 800px; font-style: normal;|&lt;br /&gt;
# अत्रिस्मृति &lt;br /&gt;
# अरुणस्मृति &lt;br /&gt;
# अगस्त्यस्मृति &lt;br /&gt;
# आंगिरसस्मृति (पूर्वागिरस, उत्तरांगिरस)&lt;br /&gt;
# आत्रेयस्मृति&lt;br /&gt;
# आस्तम्बस्मृति&lt;br /&gt;
# आश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ईशानस्मृति&lt;br /&gt;
# इन्द्रदत्तस्मृति&lt;br /&gt;
# उपकश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# उपांगिरसस्मृति&lt;br /&gt;
# औपजंघनस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनसस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनस संहिता&lt;br /&gt;
# ऋतुपर्णस्मृति&lt;br /&gt;
# ऋष्यश्रृंग स्मृति&lt;br /&gt;
# कणादस्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिञ्जलस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिल स्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वषस्मृति&lt;br /&gt;
# कश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# कवसस्मृति&lt;br /&gt;
# कात्यायनस्मृति&lt;br /&gt;
# काष्र्णाजिनस्मृति&lt;br /&gt;
# कुमारस्मृति&lt;br /&gt;
# कोकिलस्मृति&lt;br /&gt;
# कौत्सस्मृति&lt;br /&gt;
# कुतुस्मृति &lt;br /&gt;
# गर्गस्मृति&lt;br /&gt;
# गव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# गोभिलरमृति&lt;br /&gt;
# गौतम स्मृति&lt;br /&gt;
# चन्द्रस्मृति&lt;br /&gt;
# च्यवनरमुति&lt;br /&gt;
# छागल्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जमदग्निस्मृति&lt;br /&gt;
# जातुकर्ण्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जाबालीस्मृति&lt;br /&gt;
# दक्षरमृति&lt;br /&gt;
# दाल्भ्यस्मृति&lt;br /&gt;
# देवलस्मृति&lt;br /&gt;
# नाचिकेतस्मृति&lt;br /&gt;
# नारदस्मृति&lt;br /&gt;
# नारायणस्मृति&lt;br /&gt;
# पराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# पारस्करस्मृति&lt;br /&gt;
# पितामहस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्त्यस्मृति&lt;br /&gt;
# पैठीनसिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रजापतिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रह्लादरमृति&lt;br /&gt;
# प्राचेतसरमृति&lt;br /&gt;
# बादरायणस्मृति&lt;br /&gt;
# बाहस्पत्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बुधस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहत्पाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्रद्यमस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्वसिष्ठ स्मृति&lt;br /&gt;
# बृह‌द्विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# बैजवापरमृति&lt;br /&gt;
# बौधायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ब्रह्मोक्तयाज्ञवल्क्य स्मृति&lt;br /&gt;
# ब्राह्मणवधस्मृति&lt;br /&gt;
# भारद्वाजरमृति&lt;br /&gt;
# भूगुस्मृति&lt;br /&gt;
# मनुस्मृति&lt;br /&gt;
# मरीचिस्मृति&lt;br /&gt;
# माण्डव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# मार्कण्डेयस्मृति&lt;br /&gt;
# मुद्गलस्मृति&lt;br /&gt;
# मृत्युञ्जय स्मृति&lt;br /&gt;
# यमस्मृति&lt;br /&gt;
# याज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुपाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुबृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुव्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशंखस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशौनकस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वत्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वाश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुयमस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुहारितस्मृति&lt;br /&gt;
# लिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# लोमशस्मृति&lt;br /&gt;
# लोहितस्मृति&lt;br /&gt;
# लौगाक्षिस्मृति&lt;br /&gt;
# वत्सरमृति&lt;br /&gt;
# वभ्रूरमृति&lt;br /&gt;
# वसिष्ठस्मृति&lt;br /&gt;
# वाधूलस्मृति&lt;br /&gt;
# वाराहीस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वामित्रस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वेश्वरस्मृति&lt;br /&gt;
# विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धगौतम&lt;br /&gt;
# वृद्धशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धहारीतस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धात्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# वैखानसस्मृति&lt;br /&gt;
# वैजवापस्मृति&lt;br /&gt;
# वैशम्पायनस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यवहारांगस्मृति&lt;br /&gt;
# व्याघ्रस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# शकिलरमृति&lt;br /&gt;
# शंखस्मृति&lt;br /&gt;
# शतक्रतुस्मृति&lt;br /&gt;
# शन्तनुस्मृति &lt;br /&gt;
# शंखलिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकलस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकटायनस्मृति&lt;br /&gt;
# शातातपरमृति&lt;br /&gt;
# शाट्यायनस्मृति &lt;br /&gt;
# शाण्डिल्यस्मृति &lt;br /&gt;
# शुन क्षेपस्मृति &lt;br /&gt;
# शुनःपुच्छस्मृति &lt;br /&gt;
# शूद्रस्मृति &lt;br /&gt;
# शौनकस्मृति &lt;br /&gt;
# षण्मुखस्मृति &lt;br /&gt;
# संवर्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सत्यव्रतस्मृति &lt;br /&gt;
# सदाचारस्मृति &lt;br /&gt;
# सप्तर्षिस्मृति &lt;br /&gt;
# सनत्कुमारस्मृति &lt;br /&gt;
# स्कन्दस्मृति &lt;br /&gt;
# सांख्यायनरमृति&lt;br /&gt;
# सुमन्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सोमरमृति &lt;br /&gt;
# हारितस्मृति &lt;br /&gt;
# होरिलस्मृति }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निष्कर्षतः हम देखते हैं कि स्मृतियों की संख्या जितनी वर्तमान में प्राप्त हो रही है उससे कई अधिक हों। तात्पर्य है कि स्मृतियाँ हमारे सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, पारिवारिक, आदि सभी भावों का मार्ग प्रशस्त करने वाले ग्रन्थ हैं। भारतीय जनमानस का जीवन इन्हीं स्मृतियों के अनुसार प्रवृत्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उपस्मृति परम्परा'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य स्मृतियों के अतिरिक्त अनेक उपस्मृतियों का भी उल्लेख धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है। ये उपस्मृतियाँ मूल स्मृतियों का विस्तार अथवा विशिष्ट विषयों पर केन्द्रित व्याख्या के रूप में देखी जा सकती हैं। जाबालि, आपस्तम्ब, बौधायन, कणाद, वैशम्पायन आदि के नाम उपस्मृति कर्ताओं के रूप में उल्लिखित हैं। अंगिरा स्मृति में भी धर्मशास्त्रकारों को लिखा है, परन्तु अंगिरा ने जिनका नामोल्लेख किया है, उन्हें उपस्मृतिकार कहा है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कंदो लोगाक्षिकाश्यपौ। व्यासः सनत्कुमारश्च शंतनुर्जनकस्तथा॥&lt;br /&gt;
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकर्णिः कपिंजलः। बोधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च। पैठीनसीर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः॥ (अंगिरा स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' जाबालि, नचिकेता, स्कंद, लोगाक्षि, कश्यप, व्यासः, सनत्कुमार, शंतनु, जनक, व्याघ्र, कात्यायन, जातुकर्णि, कपिंजल, बोधायन, कणाद, विश्वामित्र, पैठीनसि, गोभिल। ये सभी उपस्मृतिकार हैं। उपस्मृतियों के माध्यम से धर्मशास्त्रीय परम्परा अधिक व्यापक होती है, जिससे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का समावेश सम्भव हो पाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===टीका, भाष्य एवं निबन्ध ग्रन्थ===&lt;br /&gt;
किसी धर्मसूत्र या स्मृति के आधार पर उसका अर्थ करने के लिए लिखी गई रचना टीका है। इनमें किसी प्रकार का विभाजन नहीं किया जा सकता, क्योंकि दोनों ही किसी एक धर्मसूत्र या स्मृति के आधार पर रचित हैं। निबन्ध-ग्रंथों में किसी एक सूत्रकार अथवा स्मृतिकार को आधार बनाने की अपेक्षा किसी विशिष्ट विषय को ही आधार के रूप में ग्रहण किया जाता है। तत्पश्चात उस विषय से संबंधित पूर्ववर्ती विभिन्न आचार्यों के वचनों का संकलन एवं समन्वय प्रस्तुत किया जाता है। यही पद्धति टीका भाष्य और निबन्ध ग्रन्थ की संरचनात्मक विशेषता को स्पष्ट करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः टीका, भाष्य तथा निबन्ध के मध्य स्पष्ट विभाजन-रेखा निर्धारित करना कठिन प्रतीत होता है। उदाहरणतः शंकर भट्ट के द्वैतनिर्णय में विज्ञानेश्वर को निबन्धकारों में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है, जबकि सामान्य परम्परा में वे याज्ञवल्क्य स्मृति के टीकाकार के रूप में विख्यात हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भाष्य और निबन्ध दोनों ही धर्मसूत्रों अथवा स्मृतियों में निहित आचार्यों के परस्पर विरोधी अथवा असंगत प्रतीत होने वाले वचनों का समाधान एवं समन्वय करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्ध-साहित्य के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि उनमें श्रुति की अपेक्षा स्मृतियों और पुराणों के उद्धरण अधिक मात्रा में मिलते हैं। जहाँ स्मृतियों के लिए श्रुति प्रमुख प्रमाण मानी जाती थी, वहीं निबन्धों के संदर्भ में स्मृतियाँ अधिक प्रामाणिक आधार बन गईं। इसका एक कारण यह प्रतीत होता है कि स्मृतियाँ जनसामान्य के लिए अधिक सुलभ एवं ग्राह्य थीं, जबकि वेद कालान्तर में सामान्य समाज की प्रत्यक्ष बौद्धिक पहुँच से अपेक्षया दूर होते चले गए तथा उनके वास्तविक तात्पर्य को ग्रहण करने वाले विद्वानों की संख्या सीमित रह गई।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधात्री- सुधा सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/552143 स्मृति परम्परा और पराशर स्मृति - एक अध्ययन](सन् २०१२), अध्याय-१, शोध केन्द्र - संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग - लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ (पृ० १२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेधातिथि द्वारा रचित मनुभाष्य (मनुस्मृति पर भाष्य) तथा याज्ञवल्क्यस्मृति पर विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा टीका आदि ग्रंथों को भी व्यापक अर्थ में धर्मशास्त्रीय साहित्य की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। यद्यपि ये मूल स्मृतियाँ नहीं हैं, तथापि इनके माध्यम से धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन, व्याख्या तथा व्यवहारिक प्रतिपादन किया गया है, अतः इनका स्थान धर्मशास्त्र-परम्परा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्षेत्रीय दृष्टि से भी धर्मशास्त्रीय निबन्ध-साहित्य का विकास उल्लेखनीय है -  &lt;br /&gt;
*उत्तर भारत: काशीनाथ उपाध्याय का कार्य - धर्मसिंधु।&lt;br /&gt;
*महाराष्ट्र: विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका और कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु।&lt;br /&gt;
*दक्षिण भारत: वैद्यनाथ दीक्षित का वैद्यनाथ-दीक्षितीयम इसको  स्मृतिमुक्ताफल ग्रंथ के रूप में भी जानते हैं।&lt;br /&gt;
*संन्यास आश्रम में स्थित जन: विद्येश्वर-संहिता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रकारों की परम्परा==&lt;br /&gt;
याज्ञवल्क्य स्मृति में जब धर्मशास्त्रकार के रूप में पाराशर और व्यास का नामोल्लेख मिलता है, तब यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि इन धर्मशास्त्रकारों के मध्य कोई कालक्रम (पौर्वापर्य) निर्धारित नहीं किया जा सकता। मनु द्वारा धर्म के स्वरूप का प्रतिपादन किए जाने के पश्चात् अन्य धर्मशास्त्रकारों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण और सामाजिक संदर्भों के अनुसार धर्म का विवेचन किया। इसी कारण कलियुग के धर्मशास्त्रकार माने जाने वाले पराशर का उल्लेख याज्ञवल्क्य द्वारा किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी परम्परा का समर्थन पराशर-स्मृति में भी प्राप्त होता है, जहाँ व्यास विभिन्न धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख करते हुए अपने पिता से यह कहते हैं कि उन्होंने उन सभी आचार्यों द्वारा प्रतिपादित धर्म का अध्ययन कर लिया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;धर्मकथय मे तातानुग्राह्यो ह्यहं तव। श्रुता मे मानवा धर्मो वासिष्ठा काश्यपास्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्गेया गौतमीयाश्च तथाञ्चोशनसास्मृताः। अत्रेर्विष्णोश्च संवर्ताद् दक्षादंगिरसस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शातातपाच्च हारीताद् याज्ञवल्क्यात्तथैव च। आपस्तम्बकृता धर्माः शंखस्य लिखितस्य च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृति], आचार अध्याय, उपोद्घातप्रकरण, श्लोक ४-५।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
याज्ञवल्क्य ने व्यवहार-निर्णय के सम्बन्ध में यह नियम दिया है कि यदि दो स्मृतियों में निर्णय के सम्बन्ध में परस्पर विरोध हो तो लोक व्यवहार अर्थात् युक्ति द्वारा निर्धारित परम्परानुसार निर्णय किया जाये, क्योंकि लोक व्यवहार द्वारा किया गया निर्णय सर्वमान्य होता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान् व्यवहारतः। (याज्ञवल्क्य स्मृति २/२१)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%83%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृतिः], व्यवहाराध्यायः, असाधारणव्यवहारमातृकाप्रकरणम्, श्लोक-२१।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपर्युक्त निर्णयों को ध्यान में रखते हुए बृहस्पति ने अपना विशिष्ट नियम दिया है कि केवल शास्त्रों के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए, अपितु युक्ति अर्थात् तर्क आदि के द्वारा निर्णय करना चाहिए, क्योंकि युक्तिहीन निर्णय से धर्म की हानि होती है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो हि निर्णयः। युक्तिहीनं विचारस्तु धर्महानिं प्रजायते॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्यवहार सम्बन्धी नियमों को स्पष्ट करते हुए व्यवहार मयूख में कहा गया है कि देश, जाति तथा कुलों में जो नियम पहले से चले आ रहे हैं, उनका उसी प्रकार पालन करना चाहिए। यही व्यवहार का नियम है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;देशजातिकुलानां च ये धर्माः प्रवर्तिताः। तथैव ते पालनीयाः प्रजास्वप्रतिवर्तिताः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उक्त परम्परा के विपरीत निर्णय करने पर प्रजा में आक्रोश उत्पन्न होता है और न्यायाधीश अपयश का भागी होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधित्सु- स्वाति सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/277434 याज्ञवल्क्य एवं नारदीय स्मृति के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक व्यवहार पद्धति का समीक्षात्मक अध्ययन], सन् २०००, शोध केन्द्र - सी०एस०एन० स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हरदोई (पृ० ४१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पाराशर स्मृति में युगानुरूप धर्म-विकास'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय धर्मशास्त्रीय (Dharmashastric) परम्परा में युग-चतुष्टय के अनुसार धर्म के स्वरूप में परिवर्तन (Transformation) की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। पाराशर स्मृति में महर्षि पराशर ने इस युगानुरूप धर्म-परिवर्तन (Epochal Modification of Dharma) को अत्यन्त व्यावहारिक दृष्टिकोण (Pragmatic Approach) से प्रतिपादित किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''युगधर्मानुसार साधन-प्रधानता॥ Primacy of Means as per Yuga-Dharma'''&amp;lt;blockquote&amp;gt;तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते। द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे॥ (पाराशर स्मृति-23)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''कृतयुग में तप॥ Austerity as Supreme Discipline -''' कृतयुग में तप को सर्वप्रधान धर्म कहा गया। तप का तात्पर्य केवल शारीरिक कष्ट-सहन नहीं, अपितु इन्द्रियनिग्रह (Self-restraint), चित्त-शुद्धि (Purification of Consciousness) तथा आध्यात्मिक उत्कर्ष (Spiritual Elevation) से है। उस काल में मनुष्य की आयु (Longevity), धैर्य (Endurance) और सात्त्विकता (Purity) उच्च कोटि की थी; अतः तप ही मोक्षोपाय माना गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''त्रेतायुग में ज्ञान॥ Epistemic Realization -''' त्रेता में ज्ञान (Spiritual Knowledge) को प्रधानता मिली। ज्ञान यहाँ तत्त्वबोध एवं आत्मसाक्षात्कार का द्योतक है। यह युग दार्शनिक अन्वेषण का युग माना गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''द्वापर में यज्ञ॥ Ritual Sacrifice -''' द्वापर में यज्ञ-यागादि को महत्त्व मिला। अश्वमेध, गोमेध आदि महायज्ञ सामाजिक-राजनीतिक प्रतिष्ठा के प्रतीक बन गये। धर्म का रूप अधिकाधिक कर्मकाण्डात्मक हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कलियुग में दान॥ Charity as Ethical Core -''' कलियुग में दान को ही सर्वोपरि धर्म माना गया। इसका कारण मानव की अल्पायु, मन्दबुद्धिता (Intellectual Weakness) एवं अनुत्साह है। अतः सरलतम साधन के रूप में दान को प्रतिष्ठित किया गया। इस संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य -  “दत्त, दयध्वं, दम्यत्” दान, दया और दम का त्रिविध उपदेश देता है। भर्तृहरि ने भी कहा - &amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt;दानेन पाणिर्नतु कंकणेन&amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt; अर्थात् दान ही कर-कमलों की वास्तविक शोभा है। धर्मनियन्ताओं का युगानुसार परिवर्तन आदि विषयों का पाराशर स्मृति में उल्लेख इस प्रकार है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः। द्वापरे शङ्खलिखितौ कलौ पाराशराः स्मृताः॥ (पाराशर स्मृति-24)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सत्ययुग में मनु का विधान प्रचलित था, त्रेता में गौतम के नियम मान्य हुए, द्वापर में शंख और लिखित का अधिकार स्थापित हुआ, कलियुग में महर्षि पराशर स्वयं धर्मनियन्ता माने गये। यह परिवर्तन धर्म की ऐतिहासिकता को सूचित करता है। धर्म कोई स्थिर तत्त्व नहीं, अपितु काल-सापेक्ष (Time-conditioned) व्यवस्था है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दण्ड-व्यवस्था में शिथिलीकरण॥ Penal Relaxation and Reformative Justice'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत्। द्वापरे कुलमेकं तु कर्त्तारं च कलौ युगे॥ (पाराशर स्मृति-25)&lt;br /&gt;
*कृतयुग में देश-निर्वासन (Exile from Nation)&lt;br /&gt;
*त्रेता में ग्राम-निर्वासन (Village Banishment)&lt;br /&gt;
*द्वापर में कुल-बहिष्कार (Family Ostracism)&lt;br /&gt;
*कलियुग में प्रायश्चित्त (Expiatory Reform)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ दण्ड-नीति में सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) स्पष्ट होता है। कलियुग में अपराधी को पुनर्वास (Rehabilitation) का अवसर प्रदान किया गया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च। द्वापरे त्वत्रमादाय कलौ पतति कर्मणा॥ (पाराशर स्मृति-26)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपर्युक्त श्लोक में पापी के साथ संसर्ग के नियमों का विवेचन है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कृतयुग - सम्भाषण मात्र से पतन&lt;br /&gt;
*त्रेता - स्पर्श से पतन&lt;br /&gt;
*द्वापर - अन्नग्रहण से पतन&lt;br /&gt;
*कलियुग - केवल स्वयं के कर्म से पतन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह नैतिक उत्तरदायित्व की व्यक्तिगतता (Individualization of Responsibility) को सूचित करता है। धर्म का केन्द्र बाह्य संसर्ग से हटकर आन्तरिक कर्तृत्व पर आ गया। पाराशर का यह प्रतिपादन स्पष्ट करता है कि - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*धर्म स्थिर न होकर परिस्थितिजन्य है।&lt;br /&gt;
*दण्ड से अधिक प्रायश्चित्त को महत्त्व दिया गया।&lt;br /&gt;
*बाह्याचार (External Conduct) से अधिक आन्तरिक नैतिकता (Inner Morality) को प्रधानता मिली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पाराशर-स्मृति में धर्म का स्वरूप विकासमान, अनुकूलनीय एवं समाजोपयोगी है। युगानुसार धर्म के साधन, दण्ड-विधान, सामाजिक मर्यादा तथा आध्यात्मिक प्रभाव की यह क्रमिक शिथिलता भारतीय धर्मशास्त्र की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता को प्रमाणित करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह प्रतिपादन आधुनिक विधिशास्त्र (Modern Jurisprudence) की उस धारणा से साम्य रखता है जिसमें विधि (Law) को समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित किया जाता है। इस प्रकार पाराशर का दृष्टिकोण न केवल धार्मिक आचारसंहिता है, अपितु एक गतिशील सामाजिक-दर्शन भी है, जो काल, परिस्थिति और मानवीय क्षमता के अनुरूप धर्म की पुनर्व्याख्या का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रों के वर्ण्यविषय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''आचार -''' दैनिक आचार, सदाचार एवं दुराचार निर्णय आदि।&lt;br /&gt;
*'''आश्रम एवं''' '''वर्ण व्यवस्था -''' चारों आश्रमों एवं चारों वर्णों के कर्तव्याकर्तव्य विवेचन।&lt;br /&gt;
*'''नारी की स्थिति एवं धर्मशास्त्रीय अवधारणाएँ -''' नारी का धन, स्त्री का धर्म, स्त्रियों की पवित्रता, कन्या द्वारा पति वरण करना, अगम्या स्त्रियाँ, पत्नी की रक्षा, कन्या विक्रय का पाप, विधवा का धर्म आदि। न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते॥&lt;br /&gt;
*'''शुद्धि एवं पवित्रता -''' पात्र,वस्त्र, अन्न, भूमि, शुद्धि के साधन एवं उपाय, शरीर की शुद्धि एवं अन्य शुद्धियां।&lt;br /&gt;
*'''संस्कार -''' गर्भाधान, उपनयन, विवाह एवं अंत्येष्टि आदि संस्कार।&lt;br /&gt;
*'''दंड एवं प्रायश्चित -''' विदेश यात्रा, हत्या (वध), परस्त्रीगमन, सुरापान, स्वर्ण आदि चोरी का प्रायश्चित।&lt;br /&gt;
*'''विविध नियम एवं वृत्तियां -''' अभिवादन नियम, यज्ञोपवीत धारण विधि, आचमन एवं प्रक्षालन विधि, अशौच, तर्पण, स्नान, भोजन एवं दान विधि।&lt;br /&gt;
*'''प्रायश्चित -''' जप, तप, प्राणायाम एवं कृच्छ्रादि व्रत विधान&lt;br /&gt;
*'''प्रकीर्ण -''' संपत्ति का उत्तराधिकार एवं विभाजन, पुत्रों के प्रकार, भक्ष्याभक्ष्य एवं पेयापेय विचार, योग साधन आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे- स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0)&amp;diff=137560</id>
		<title>Dharmashastra (धर्मशास्त्र)</title>
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		<updated>2026-02-22T19:22:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परम्परा द्वारा समाज में धर्मसम्मत आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त, सामाजिक एवं वैयक्तिक कर्तव्य-अकर्तव्य आदि कर्मों के सुव्यवस्थित निर्धारण हेतु धर्मशास्त्र का प्रवर्तन हुआ तथा वैदिकसाहित्य में यह कल्प नामक वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित है। इस शास्त्र के अन्तर्गत मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, बृहस्पति, बौधायन, जीमूतवाहन, विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य आदि आचार्यों के सूत्र, स्मृतियाँ, भाष्य एवं समकालीन निबन्धात्मक प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति का मूल आधार धर्म है। विविध शास्त्रकारों ने धर्म शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं। धर्मशास्त्र में सामाजिक आचार-विचार, [[Varnashrama Dharma (वर्णाश्रमधर्मः)|वर्णाश्रम-धर्म]], [[Achara (आचार)|सदाचार]], [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]], राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य तथा शासन से सम्बन्धित नियम आदि का सुव्यवस्थित विवेचन किया गया है। धर्मशास्त्र शब्द दो पदों [[Dharma (धर्मः)|धर्म]] और [[Shastra Shikshana Paddhati (शास्त्रशिक्षणपद्धतिः)|शास्त्र]] के संयोग से निर्मित है। इन दोनों पदों के शाब्दिक अर्थों का ज्ञान आवश्यक है। धर्म शब्द पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध प्राच्यविद् पण्डित तारिणीश झा ने संस्कृत शब्दार्थ कोश में क्रमशः -&amp;lt;blockquote&amp;gt;ध्रियते लोकानेन, ध्रियते लोकाः वा तथा ध्रियते लोकान् ध्रियते पुण्यात्मान् इति वा। (शब्दकोश)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार व्युत्पत्ति करते हुए धृ धातु से मन प्रत्यय द्वारा धर्म शब्द की निष्पत्ति मानी है तथा इसके पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों प्रयोगों को स्वीकार किया है। शास्त्र शब्द का अर्थ भी उपर्युक्त शब्दकोशकार द्वारा प्रायः समान रूप में ग्रहण किया गया है। शास् धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से शास्त्र शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। विभिन्न विद्वानों ने इसके अर्थ क्रमशः आज्ञा, उपदेश, नियम, धार्मिक ग्रन्थ, वेद एवं धर्मशास्त्र तथा जनसामान्य के कल्याण हेतु विधि-विधान प्रतिपादित करने वाले ग्रन्थ आदि स्वीकार किए हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्र शब्द का तात्पर्य उस व्यवस्था से है, जो मनुष्य के आचार-व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, सामाजिक मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। सामान्यतः स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र का पर्याय माना जाता है। मनुस्मृति में यह प्रतिपादित किया गया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय-२, श्लोक-१०।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;भाषार्थ - [[Shruti (श्रुतिः)|श्रुति]] को [[Vedas (वेदाः)|वेद]] तथा [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृति]] को धर्मशास्त्र के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार [[Mukhya Smritis (मुख्य स्मृतियां)|स्मृतिग्रन्थों]] को धर्मशास्त्र की संज्ञा प्रदान की गई है तथा स्मृतिकारों को धर्मशास्त्रकार कहा गया है। इस प्रकार धर्मशास्त्र का मूलाधार [[Vaidika Vangmaya (वैदिकवाङ्मयम्)|वैदिक परम्परा]] में निहित है, परन्तु उसका व्यावहारिक स्वरूप सूत्र, स्मृति, भाष्य एवं निबन्धात्मक ग्रन्थों के माध्यम से विकसित हुआ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः। धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्या ह्येताश्चतुर्दश॥ (विष्णुपुराण)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चार वेद, छह वेदाङ्ग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र और पुराण विद्याओं के चौदह आधार माने गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र से सम्बन्धित साहित्य मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है - धर्मसूत्र एवं स्मृतियाँ। वैदिक अध्ययन की परम्परा में छह [[Shad Vedangas (षड्वेदाङ्गानि)|वेदाङ्गों]] का विधान किया गया, जिन्हें [[Shiksha (शिक्षा)|शिक्षा]], [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प]], [[Vyakarana Vedanga (व्याकरणवेदाङ्गम्)|व्याकरण]], [[Nirukta (निरुक्त)|निरुक्त]], [[Chandas (छन्दस्)|छन्द]] एवं [[Jyotisha (ज्योतिष)|ज्योतिष]] कहा जाता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;छन्‍द: पादौ तु वेदस्‍य, हस्‍तौ कल्‍पोऽथ पठ्यते। ज्‍योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्‍तं श्रोत्रमुच्‍यते॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्‍य मुखं व्‍याकरणं स्‍मृतम्। तस्‍मात्‍सांगमधीत्‍यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय शिक्षा)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE/%E0%A4%85%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%83 पाणिनीय शिक्षा], खण्ड- ८, श्लोक- ४१-४२।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इनमें [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प वेदांग]] का विशेष स्थान है, शास्त्रीय दृष्टि से कल्प उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें यज्ञानुष्ठान का विधि-विधान एवं  धार्मिक संस्कारों के नियम बतलाये गये हैं। विष्णुमित्र ने कल्प का शाब्दिक अर्थ बताते हुए कहा है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्। (ऋक्प्रातिशाख्य वृत्ति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद में विहित कर्मों को क्रमबद्ध रूप में विवेचित करने वाला शास्त्र कल्प है। कल्पसूत्रों के अन्तर्गत चार प्रकार की सूत्र रचनाएं हैं - [[Shrautasutras (श्रौतसूत्राणि)|श्रौतसूत्र]], [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्यसूत्र]], [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]] तथा [[Shulbasutras (शुल्बसूत्राणि)|शुल्बसूत्र]]। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''श्रौतसूत्र''' - [[Vedas (वेदाः)|वेदों]] में वर्णित [[Yajna (यज्ञः)|यज्ञों]] की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''गृह्यसूत्र''' - [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्याग्नि]] में होने वाले यज्ञों एवं [[Upanayana (उपनयनम्)|उपनयन]], [[Vivaha (विवाहः)|विवाह]] आदि संस्कारों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''धर्मसूत्र''' - [[Ashram System (आश्रम व्यवस्था)|आश्रमों]] और [[Varna Dharma (वर्णधर्मः)|चारों वर्णों]], [[Achara (आचार)|धार्मिक आचारों]] एवं राजा के कर्तव्यों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''शुल्बसूत्र''' - [[Vedi (वेदिः)|वेदी]] के निर्माण की विधि आदि के प्रतिपादक ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार सम्पूर्ण [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प-वेदांग]] चार वर्गों में विभाजित किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शालिनी वर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/55290 वसिष्ठधर्मसूत्र-एक अनुशीलन] (२००८), भूमिका, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ (पृ० २-३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रीय वाङ्मय॥ Dharmasastric literature==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अन्तर्गत [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]], [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृतियाँ]], उन पर रचित टीकाएँ तथा निबन्धात्मक ग्रन्थ सम्मिलित किए जाते हैं। धर्मसूत्रों, स्मृतियों, टीकाओं एवं निबन्धों की संख्या अत्यन्त व्यापक मानी जाती है। इन मूल ग्रन्थों पर रचित लघु एवं विशाल दोनों प्रकार के ग्रन्थ भी धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अंतर्गत ही समाहित किए जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थी- संदीप कुमार गुप्त, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264949 चतुर्वर्ग की धर्मशास्त्रीय अवधारणा] (2011), शोधकेंद्र- छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० २२)।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसको तीन निश्चित कालों में विभक्त किया जा सकता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#प्रथम काल गौतम, वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रों का है, जो कि कल्प वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित हैं।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्रों के द्वितीय क्रम में मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृतियों का समावेश होता है।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्र का तृतीय क्रम स्मृतियों की प्राचीन टीकाएँ और निबन्ध ग्रन्थों का है, इनमें विश्वरूप, मेधातिथि और विज्ञानेश्वर आदि के नाम प्रमुख हैं साथ ही कृत्यकल्पतरु, स्मृतिचन्द्रिका, चतुर्वर्गचिन्तामणि चण्डेश्वर का रत्नाकर आदि ग्रन्थों को निबन्ध की श्रेणी में परिगणन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्वोक्त तीनों कालक्रम में परिगणित धर्मसूत्र, स्मृतियाँ, टीकाएँ तथा निबन्ध ग्रन्थ धर्मशास्त्रीय वाङ्मय में समावेश किये जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===धर्मसूत्रों का स्वरूप===&lt;br /&gt;
{{Main|Dharmasutras_(धर्मसूत्राणि)}}&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय साहित्य का विकास मुख्यतः धर्मसूत्रों से प्रारम्भ होकर स्मृति एवं निबन्ध ग्रन्थों तक विस्तृत है। बौधायन, आपस्तम्ब, गौतम एवं वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रकारों ने धर्मसूत्रों के माध्यम से सामाजिक आचारों एवं विधिक मान्यताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, बृहस्पति आदि स्मृतिकारों ने धर्म के विविध पक्षों राजधर्म, व्यवहार, दण्ड, उत्तराधिकार, स्त्री-अधिकार एवं सामाजिक न्याय का विस्तृत विवेचन किया।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थिनी- रोली गुप्ता, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264777 बौधायन धर्मसूत्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१३), छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० ७-८)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्रों का वेद-विशेष से कोई निश्चित सम्बन्ध नहीं, ये स्वतंत्र रचनाएँ जैसी हैं। परन्तु जैसा कि डॉ० पी० वी० काणे ने उल्लेख किया है- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परम्परानुसार गौतमधर्मसूत्र का अध्ययन सामवेदी लोग करते थे, आपस्तम्ब के सूत्रों का अध्ययन तैत्तिरीय शाखा के अनुयायी गण करते थे और वसिष्ठधर्मसूत्र का अध्ययन ऋग्वेदी लोग करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि धर्मसूत्र स्वतन्त्र रचनाओं के रूप में थे। परन्तु बाद में भिन्न-भिन्न वेदों के अनुयायियों ने इन्हें अपनाकर अपना कल्प वेदांग अध्ययन पूरा किया। वर्तमान समय में केवल चार धर्मसूत्र ही उपलब्ध होते हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*गौतम धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनके अतिरिक्त तीन धर्मसूत्रों का और उल्लेख मिलता है- विष्णुधर्मसूत्र, हिरण्यकेशि धर्मसूत्र और वैखानसधर्मसूत्र। इनमें हिरण्यकेशि धर्मसूत्र आपस्तम्ब से ही अधिकांशतः मिलता-जुलता है। वैखानस मुख्यरूप से संन्यास व वानप्रस्थ आश्रमों के अध्ययन के लिए उपयोगी है। अतः अध्ययन की दृष्टि से केवल पाँच धर्मसूत्र ही उपयोगी है- गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन, वसिष्ठ और विष्णु धर्मसूत्र।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+धर्मसूत्र एवं उन पर लिखित भाष्य&lt;br /&gt;
!'''वेद'''&lt;br /&gt;
!शाखा&lt;br /&gt;
!धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
!विषय-वस्तु&lt;br /&gt;
!भाष्य एवं टीकाएं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;2&amp;quot; |ऋग्वेद&lt;br /&gt;
|शाकल&lt;br /&gt;
|वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|३० अध्याय, सूत्र एवं श्लोक-दोनों रूपों में&lt;br /&gt;
|कृष्ण पण्डित धर्माधिकारी का भाष्य, जिसे विद्वन्मेदिनी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|कौषीतकि&lt;br /&gt;
|विष्णु&lt;br /&gt;
|१०० अध्याय&lt;br /&gt;
|नन्द पण्डित (वैजयन्ती व्याख्या), भारुचि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!शुक्ल&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
|_&lt;br /&gt;
|हारीत&lt;br /&gt;
|३० अध्याय&lt;br /&gt;
|लघु हारीत स्मृति तथा वृद्ध हारीत स्मृति से सम्बद्ध&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कृष्ण&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |तैत्तिरीय&lt;br /&gt;
|बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|चार प्रश्न (जिनमें से केवल दो को मूल माना जाता है)&lt;br /&gt;
|गोविन्दस्वामी का भाष्य (विवरण)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब कल्प के 28वें एवं 29वें प्रश्न (1364 सूत्र एवं 30 श्लोक)&lt;br /&gt;
|हरदत्त (उज्ज्वलवृत्ति), धूर्तस्वामी तथा शंकर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि कल्प के 26वें एवं 27वें प्रश्न&lt;br /&gt;
|महादेव दीक्षित (वैजयन्ती)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| वैखानस धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|वैखानस स्मार्तसूत्र के 3 प्रश्न (51 काण्ड एवं 365 सूत्र)&lt;br /&gt;
|कोई भाष्य उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!सामवेद&lt;br /&gt;
|राणायनीय शाखा&lt;br /&gt;
|गौतम धर्मसूत्र (चरणव्यूह के अनुसार)&lt;br /&gt;
|२८ अध्याय, सूत्ररूप में रचित&lt;br /&gt;
|हरदत्त (मिताक्षरा) असहाय, भारत्यज्ञ, मस्करी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!अथर्ववेद&lt;br /&gt;
| colspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कोई धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कल्पसूत्रों में धर्मसूत्रों को तीसरे वर्ग में रखा गया है। धर्मसूत्रों का गृह्यसूत्रों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन दोंनों के विषयों में कुछ समानता भी है। यथा-उपनयन, अनध्याय, विवाह, श्राद्ध, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, महायज्ञ आदि। धर्मसूत्रों में इनके सामाजिक नियमों प्रतिबन्धों व रीतियों का उल्लेख है। जबकि गृह्यसूत्रों में विधि व अनुष्ठान का वर्णन है। किन्तु धर्मसूत्रों में जहाँ गृह्यकर्मों से सम्बन्धित सूत्र हैं, वहीं धर्मसूत्रों का विषय अधिक व्यापक है। वे मानव के आचरण सम्बन्धी नियमों का विवेचन करते हैं। संक्षेप में धर्मसूत्रों का मुख्य विषय मानव जीवन के विविध पक्षों के कर्त्तव्यों का ज्ञान कराना है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===स्मृति ग्रंथो की अवधारणा===&lt;br /&gt;
{{Main|Smrti_(स्मृतिः)}}&lt;br /&gt;
मनु का वचन 'धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः' इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि धर्मशास्त्र मूलतः स्मृति-परम्परा से सम्बद्ध हैं। अर्थात् जितने भी धर्मशास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी स्मृति-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। इन धर्मशास्त्रों के कर्त्ताओं एवं उनकी परम्परा का विवेचन पराशर स्मृति में प्राप्त होता है। पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पे कल्पे क्षयोत्पत्त्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।  श्रुतिस्मृतिसमाचारनिर्णेतारश्च सर्वदा॥ (पराशर स्मृति 1.20)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot;&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० २०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक पर स्मृतिमुक्ताफल में टीका करते हुए कहा गया है कि सृष्टि और प्रलय का यह क्रम प्रत्येक महाकल्प एवं अवांतर कल्प में निरन्तर चलता रहता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देवता महाकल्प के अन्त में लीन होते हैं और नये महाकल्प के प्रारम्भ में पुनः प्रकट होते हैं। स्मृतिमुक्ताफल में टिप्पणी प्राप्त होती है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;क्षयसहिता उत्पत्तिः क्षयोत्पत्तिः। तयोपलाक्षता भवंति कल्पे कल्पे महाकल्पे अवांतरकल्पे च। ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा महाकल्पावसाने क्षीयंते महाकल्पादावुत्पद्यंते। एवमवांतरकल्पानामवसाने प्रारंभे च स्मृत्यादीनां निर्णेतारो मन्वादयः क्षयोत्पत्तिभ्यामुपलक्ष्यंते। चकारेणानुक्तो धर्मः समुच्चीयते। सर्वदेत्यनेन सृष्टिसंहारप्रवाहस्यानादित्वमनंतत्वं च दर्शितम्। स एव॥ (स्मृति मुक्ताफलम् १।२१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;वैद्यनाथ दीक्षितीय, [https://ia801409.us.archive.org/9/items/in.ernet.dli.2015.486485/2015.486485.Smrtimuktaphalama-part-1_text.pdf स्मृतिमुक्ताफलम्], वर्णाश्रमधर्मकाण्डम् (1937), विश्वनाथ जगन्नाथ घारपुरे (पृ० ११)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार श्रुति और स्मृति के निर्णायक मनु आदि भी प्रत्येक कल्प के आरम्भ और अन्त में प्रकट एवं विलीन होते रहते हैं। यहाँ &amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt;सर्वदा&amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt; पद के माध्यम से सृष्टि–प्रलय की अनादि और अनन्त परम्परा का संकेत किया गया है। आगे पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;न कश्चिद्वेदकर्त्ता च वेदं श्रुत्वा चतुर्मुखः। तथैव धर्मान् स्मरति मनुः कल्पांतरे तथा॥ (पराशर स्मृति 1. 21)&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक की टीका में स्मृतिमुक्ताफलकार स्पष्ट करते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पांतरे धर्मान् स्मरति इति पत्रयं पूर्वार्धेऽपि संबध्यते। महाकल्पे चतुर्मुखः परमेश्वरेण दत्तं वेदं श्रुत्त्वा तत्र विप्रकीर्णान्वर्णाश्रमादिधर्मान्स्मृतिग्रंथरूपेण उपनिबध्नाति तथैव स्वायंभुवो मनुः प्रत्यवांतरकल्पं वेदोक्तधर्मान्ग्रथ्नाति। मनुग्रहणेनात्रिविष्ण्वाद्य उपलक्ष्यंते। (स्मृति मुक्ताफलम्)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;quot;कल्पान्तरे धर्मान् स्मरति&amp;quot; यह पद पूर्ववर्ती वाक्य से सम्बद्ध है। प्रत्येक महाकल्प के प्रारम्भ में चतुर्मुख ब्रह्मा परमेश्वर से प्राप्त वेद को सुनते हैं और उसमें वर्णित वर्णाश्रम आदि धर्मों को स्मृति-ग्रन्थों के रूप में व्यवस्थित करते हैं। इसी प्रकार स्वायम्भुव मनु प्रत्येक अवांतर कल्प में वेदोक्त धर्मों को स्मरण कर स्मृति-रूप में स्थापित करते हैं। यहाँ मनु शब्द से मात्र एक व्यक्ति नहीं, अपितु अत्रि, विष्णु, पराशर आदि सभी धर्मशास्त्रकारों का भी संकेत होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० दिलीप कुमार नाथाणी, [https://ijesrr.org/publication/83/1.%20ijesrr%20june%202022.pdf स्मृति-धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के रचनाकार] (२०२२), इण्टरनेशनल जर्नल ऑफ एजुकेशन एण्ड साइंस रिसर्च रिव्यू (पृ० ३४९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''स्मृतियों की संख्या'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्धकारों एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा में स्मृतियों की संख्या को लेकर विभिन्न मत प्राप्त होते हैं। कुछ परम्पराओं में 36 स्मृतियों का उल्लेख है, तो कहीं यह संख्या और अधिक बतायी गयी है। वर्तमान में उपलब्ध स्मृतियों की संख्या सौ से भी अधिक मानी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधाता- सुभाष वी. वसोया, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/521411 धर्मशास्त्रानुसारेण आचारस्य एकं समीक्षात्मकम् अध्ययनम्] (२०१८), द्वितीय अध्याय, श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात (पृ० १४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{columns-list|colwidth=15em|style=width: 800px; font-style: normal;|&lt;br /&gt;
# अत्रिस्मृति &lt;br /&gt;
# अरुणस्मृति &lt;br /&gt;
# अगस्त्यस्मृति &lt;br /&gt;
# आंगिरसस्मृति (पूर्वागिरस, उत्तरांगिरस)&lt;br /&gt;
# आत्रेयस्मृति&lt;br /&gt;
# आस्तम्बस्मृति&lt;br /&gt;
# आश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ईशानस्मृति&lt;br /&gt;
# इन्द्रदत्तस्मृति&lt;br /&gt;
# उपकश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# उपांगिरसस्मृति&lt;br /&gt;
# औपजंघनस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनसस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनस संहिता&lt;br /&gt;
# ऋतुपर्णस्मृति&lt;br /&gt;
# ऋष्यश्रृंग स्मृति&lt;br /&gt;
# कणादस्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिञ्जलस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिल स्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वषस्मृति&lt;br /&gt;
# कश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# कवसस्मृति&lt;br /&gt;
# कात्यायनस्मृति&lt;br /&gt;
# काष्र्णाजिनस्मृति&lt;br /&gt;
# कुमारस्मृति&lt;br /&gt;
# कोकिलस्मृति&lt;br /&gt;
# कौत्सस्मृति&lt;br /&gt;
# कुतुस्मृति &lt;br /&gt;
# गर्गस्मृति&lt;br /&gt;
# गव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# गोभिलरमृति&lt;br /&gt;
# गौतम स्मृति&lt;br /&gt;
# चन्द्रस्मृति&lt;br /&gt;
# च्यवनरमुति&lt;br /&gt;
# छागल्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जमदग्निस्मृति&lt;br /&gt;
# जातुकर्ण्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जाबालीस्मृति&lt;br /&gt;
# दक्षरमृति&lt;br /&gt;
# दाल्भ्यस्मृति&lt;br /&gt;
# देवलस्मृति&lt;br /&gt;
# नाचिकेतस्मृति&lt;br /&gt;
# नारदस्मृति&lt;br /&gt;
# नारायणस्मृति&lt;br /&gt;
# पराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# पारस्करस्मृति&lt;br /&gt;
# पितामहस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्त्यस्मृति&lt;br /&gt;
# पैठीनसिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रजापतिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रह्लादरमृति&lt;br /&gt;
# प्राचेतसरमृति&lt;br /&gt;
# बादरायणस्मृति&lt;br /&gt;
# बाहस्पत्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बुधस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहत्पाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्रद्यमस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्वसिष्ठ स्मृति&lt;br /&gt;
# बृह‌द्विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# बैजवापरमृति&lt;br /&gt;
# बौधायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ब्रह्मोक्तयाज्ञवल्क्य स्मृति&lt;br /&gt;
# ब्राह्मणवधस्मृति&lt;br /&gt;
# भारद्वाजरमृति&lt;br /&gt;
# भूगुस्मृति&lt;br /&gt;
# मनुस्मृति&lt;br /&gt;
# मरीचिस्मृति&lt;br /&gt;
# माण्डव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# मार्कण्डेयस्मृति&lt;br /&gt;
# मुद्गलस्मृति&lt;br /&gt;
# मृत्युञ्जय स्मृति&lt;br /&gt;
# यमस्मृति&lt;br /&gt;
# याज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुपाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुबृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुव्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशंखस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशौनकस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वत्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वाश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुयमस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुहारितस्मृति&lt;br /&gt;
# लिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# लोमशस्मृति&lt;br /&gt;
# लोहितस्मृति&lt;br /&gt;
# लौगाक्षिस्मृति&lt;br /&gt;
# वत्सरमृति&lt;br /&gt;
# वभ्रूरमृति&lt;br /&gt;
# वसिष्ठस्मृति&lt;br /&gt;
# वाधूलस्मृति&lt;br /&gt;
# वाराहीस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वामित्रस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वेश्वरस्मृति&lt;br /&gt;
# विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धगौतम&lt;br /&gt;
# वृद्धशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धहारीतस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धात्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# वैखानसस्मृति&lt;br /&gt;
# वैजवापस्मृति&lt;br /&gt;
# वैशम्पायनस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यवहारांगस्मृति&lt;br /&gt;
# व्याघ्रस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# शकिलरमृति&lt;br /&gt;
# शंखस्मृति&lt;br /&gt;
# शतक्रतुस्मृति&lt;br /&gt;
# शन्तनुस्मृति &lt;br /&gt;
# शंखलिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकलस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकटायनस्मृति&lt;br /&gt;
# शातातपरमृति&lt;br /&gt;
# शाट्यायनस्मृति &lt;br /&gt;
# शाण्डिल्यस्मृति &lt;br /&gt;
# शुन क्षेपस्मृति &lt;br /&gt;
# शुनःपुच्छस्मृति &lt;br /&gt;
# शूद्रस्मृति &lt;br /&gt;
# शौनकस्मृति &lt;br /&gt;
# षण्मुखस्मृति &lt;br /&gt;
# संवर्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सत्यव्रतस्मृति &lt;br /&gt;
# सदाचारस्मृति &lt;br /&gt;
# सप्तर्षिस्मृति &lt;br /&gt;
# सनत्कुमारस्मृति &lt;br /&gt;
# स्कन्दस्मृति &lt;br /&gt;
# सांख्यायनरमृति&lt;br /&gt;
# सुमन्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सोमरमृति &lt;br /&gt;
# हारितस्मृति &lt;br /&gt;
# होरिलस्मृति }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निष्कर्षतः हम देखते हैं कि स्मृतियों की संख्या जितनी वर्तमान में प्राप्त हो रही है उससे कई अधिक हों। तात्पर्य है कि स्मृतियाँ हमारे सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, पारिवारिक, आदि सभी भावों का मार्ग प्रशस्त करने वाले ग्रन्थ हैं। भारतीय जनमानस का जीवन इन्हीं स्मृतियों के अनुसार प्रवृत्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उपस्मृति परम्परा'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य स्मृतियों के अतिरिक्त अनेक उपस्मृतियों का भी उल्लेख धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है। ये उपस्मृतियाँ मूल स्मृतियों का विस्तार अथवा विशिष्ट विषयों पर केन्द्रित व्याख्या के रूप में देखी जा सकती हैं। जाबालि, आपस्तम्ब, बौधायन, कणाद, वैशम्पायन आदि के नाम उपस्मृति कर्ताओं के रूप में उल्लिखित हैं। अंगिरा स्मृति में भी धर्मशास्त्रकारों को लिखा है, परन्तु अंगिरा ने जिनका नामोल्लेख किया है, उन्हें उपस्मृतिकार कहा है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कंदो लोगाक्षिकाश्यपौ। व्यासः सनत्कुमारश्च शंतनुर्जनकस्तथा॥&lt;br /&gt;
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकर्णिः कपिंजलः। बोधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च। पैठीनसीर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः॥ (अंगिरा स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' जाबालि, नचिकेता, स्कंद, लोगाक्षि, कश्यप, व्यासः, सनत्कुमार, शंतनु, जनक, व्याघ्र, कात्यायन, जातुकर्णि, कपिंजल, बोधायन, कणाद, विश्वामित्र, पैठीनसि, गोभिल। ये सभी उपस्मृतिकार हैं। उपस्मृतियों के माध्यम से धर्मशास्त्रीय परम्परा अधिक व्यापक होती है, जिससे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का समावेश सम्भव हो पाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===टीका, भाष्य एवं निबन्ध ग्रन्थ===&lt;br /&gt;
किसी धर्मसूत्र या स्मृति के आधार पर उसका अर्थ करने के लिए लिखी गई रचना टीका है। इनमें किसी प्रकार का विभाजन नहीं किया जा सकता, क्योंकि दोनों ही किसी एक धर्मसूत्र या स्मृति के आधार पर रचित हैं। निबन्ध-ग्रंथों में किसी एक सूत्रकार अथवा स्मृतिकार को आधार बनाने की अपेक्षा किसी विशिष्ट विषय को ही आधार के रूप में ग्रहण किया जाता है। तत्पश्चात उस विषय से संबंधित पूर्ववर्ती विभिन्न आचार्यों के वचनों का संकलन एवं समन्वय प्रस्तुत किया जाता है। यही पद्धति टीका भाष्य और निबन्ध ग्रन्थ की संरचनात्मक विशेषता को स्पष्ट करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः टीका, भाष्य तथा निबन्ध के मध्य स्पष्ट विभाजन-रेखा निर्धारित करना कठिन प्रतीत होता है। उदाहरणतः शंकर भट्ट के द्वैतनिर्णय में विज्ञानेश्वर को निबन्धकारों में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है, जबकि सामान्य परम्परा में वे याज्ञवल्क्य स्मृति के टीकाकार के रूप में विख्यात हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भाष्य और निबन्ध दोनों ही धर्मसूत्रों अथवा स्मृतियों में निहित आचार्यों के परस्पर विरोधी अथवा असंगत प्रतीत होने वाले वचनों का समाधान एवं समन्वय करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्ध-साहित्य के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि उनमें श्रुति की अपेक्षा स्मृतियों और पुराणों के उद्धरण अधिक मात्रा में मिलते हैं। जहाँ स्मृतियों के लिए श्रुति प्रमुख प्रमाण मानी जाती थी, वहीं निबन्धों के संदर्भ में स्मृतियाँ अधिक प्रामाणिक आधार बन गईं। इसका एक कारण यह प्रतीत होता है कि स्मृतियाँ जनसामान्य के लिए अधिक सुलभ एवं ग्राह्य थीं, जबकि वेद कालान्तर में सामान्य समाज की प्रत्यक्ष बौद्धिक पहुँच से अपेक्षया दूर होते चले गए तथा उनके वास्तविक तात्पर्य को ग्रहण करने वाले विद्वानों की संख्या सीमित रह गई।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधात्री- सुधा सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/552143 स्मृति परम्परा और पराशर स्मृति - एक अध्ययन](सन् २०१२), अध्याय-१, शोध केन्द्र - संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग - लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ (पृ० १२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेधातिथि द्वारा रचित मनुभाष्य (मनुस्मृति पर भाष्य) तथा याज्ञवल्क्यस्मृति पर विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा टीका आदि ग्रंथों को भी व्यापक अर्थ में धर्मशास्त्रीय साहित्य की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। यद्यपि ये मूल स्मृतियाँ नहीं हैं, तथापि इनके माध्यम से धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन, व्याख्या तथा व्यवहारिक प्रतिपादन किया गया है, अतः इनका स्थान धर्मशास्त्र-परम्परा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्षेत्रीय दृष्टि से भी धर्मशास्त्रीय निबन्ध-साहित्य का विकास उल्लेखनीय है -  &lt;br /&gt;
*उत्तर भारत: काशीनाथ उपाध्याय का कार्य - धर्मसिंधु।&lt;br /&gt;
*महाराष्ट्र: विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका और कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु।&lt;br /&gt;
*दक्षिण भारत: वैद्यनाथ दीक्षित का वैद्यनाथ-दीक्षितीयम इसको  स्मृतिमुक्ताफल ग्रंथ के रूप में भी जानते हैं।&lt;br /&gt;
*संन्यास आश्रम में स्थित जन: विद्येश्वर-संहिता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रकारों की परम्परा==&lt;br /&gt;
याज्ञवल्क्य स्मृति में जब धर्मशास्त्रकार के रूप में पाराशर और व्यास का नामोल्लेख मिलता है, तब यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि इन धर्मशास्त्रकारों के मध्य कोई कालक्रम (पौर्वापर्य) निर्धारित नहीं किया जा सकता। मनु द्वारा धर्म के स्वरूप का प्रतिपादन किए जाने के पश्चात् अन्य धर्मशास्त्रकारों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण और सामाजिक संदर्भों के अनुसार धर्म का विवेचन किया। इसी कारण कलियुग के धर्मशास्त्रकार माने जाने वाले पराशर का उल्लेख याज्ञवल्क्य द्वारा किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी परम्परा का समर्थन पराशर-स्मृति में भी प्राप्त होता है, जहाँ व्यास विभिन्न धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख करते हुए अपने पिता से यह कहते हैं कि उन्होंने उन सभी आचार्यों द्वारा प्रतिपादित धर्म का अध्ययन कर लिया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;धर्मकथय मे तातानुग्राह्यो ह्यहं तव। श्रुता मे मानवा धर्मो वासिष्ठा काश्यपास्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्गेया गौतमीयाश्च तथाञ्चोशनसास्मृताः। अत्रेर्विष्णोश्च संवर्ताद् दक्षादंगिरसस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शातातपाच्च हारीताद् याज्ञवल्क्यात्तथैव च। आपस्तम्बकृता धर्माः शंखस्य लिखितस्य च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृति], आचार अध्याय, उपोद्घातप्रकरण, श्लोक ४-५।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
याज्ञवल्क्य ने व्यवहार-निर्णय के सम्बन्ध में यह नियम दिया है कि यदि दो स्मृतियों में निर्णय के सम्बन्ध में परस्पर विरोध हो तो लोक व्यवहार अर्थात् युक्ति द्वारा निर्धारित परम्परानुसार निर्णय किया जाये, क्योंकि लोक व्यवहार द्वारा किया गया निर्णय सर्वमान्य होता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान् व्यवहारतः। (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपर्युक्त निर्णयों को ध्यान में रखते हुए बृहस्पति ने अपना विशिष्ट नियम दिया है कि केवल शास्त्रों के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए, अपितु युक्ति अर्थात् तर्क आदि के द्वारा निर्णय करना चाहिए, क्योंकि युक्तिहीन निर्णय से धर्म की हानि होती है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो हि निर्णयः। युक्तिहीनं विचारस्तु धर्महानिं प्रजायते॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;व्यवहार सम्बन्धी नियमों को स्पष्ट करते हुए व्यवहार मयूख में कहा गया है कि देश, जाति तथा कुलों में जो नियम पहले से चले आ रहे हैं, उनका उसी प्रकार पालन करना चाहिए। यही व्यवहार का नियम है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;देशजातिकुलानां च ये धर्माः प्रवर्तिताः। तथैव ते पालनीयाः प्रजास्वप्रतिवर्तिताः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उक्त परम्परा के विपरीत निर्णय करने पर प्रजा में आक्रोश उत्पन्न होता है और न्यायाधीश अपयश का भागी होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधित्सु- स्वाति सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/277434 याज्ञवल्क्य एवं नारदीय स्मृति के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक व्यवहार पद्धति का समीक्षात्मक अध्ययन], सन् २०००, शोध केन्द्र - सी०एस०एन० स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हरदोई (पृ० ४१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पाराशर स्मृति में युगानुरूप धर्म-विकास'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय धर्मशास्त्रीय (Dharmashastric) परम्परा में युग-चतुष्टय के अनुसार धर्म के स्वरूप में परिवर्तन (Transformation) की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। पाराशर स्मृति में महर्षि पराशर ने इस युगानुरूप धर्म-परिवर्तन (Epochal Modification of Dharma) को अत्यन्त व्यावहारिक दृष्टिकोण (Pragmatic Approach) से प्रतिपादित किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''युगधर्मानुसार साधन-प्रधानता॥ Primacy of Means as per Yuga-Dharma'''&amp;lt;blockquote&amp;gt;तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते। द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे॥ (पाराशर स्मृति-23)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''कृतयुग में तप॥ Austerity as Supreme Discipline -''' कृतयुग में तप (Austerity) को सर्वप्रधान धर्म कहा गया। तप का तात्पर्य केवल शारीरिक कष्ट-सहन (Physical Mortification) नहीं, अपितु इन्द्रियनिग्रह (Self-restraint), चित्त-शुद्धि (Purification of Consciousness) तथा आध्यात्मिक उत्कर्ष (Spiritual Elevation) से है। उस काल में मनुष्य की आयु (Longevity), धैर्य (Endurance) और सात्त्विकता (Purity) उच्च कोटि की थी; अतः तप ही मोक्षोपाय (Means of Liberation) माना गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''त्रेतायुग में ज्ञान॥ Epistemic Realization -''' त्रेता में ज्ञान (Spiritual Knowledge) को प्रधानता मिली। ज्ञान यहाँ तत्त्वबोध (Metaphysical Insight) एवं आत्मसाक्षात्कार (Self-realization) का द्योतक है। यह युग दार्शनिक अन्वेषण (Philosophical Inquiry) का युग माना गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''द्वापर में यज्ञ॥ Ritual Sacrifice -''' द्वापर में यज्ञ-यागादि (Ritualism) को महत्त्व मिला। अश्वमेध, गोमेध आदि महायज्ञ सामाजिक-राजनीतिक प्रतिष्ठा (Royal Prestige) के प्रतीक बन गये। धर्म का रूप अधिकाधिक कर्मकाण्डात्मक (Ritualistic) हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कलियुग में दान॥ Charity as Ethical Core -''' कलियुग में दान (Charitable Giving) को ही सर्वोपरि धर्म माना गया। इसका कारण मानव की अल्पायु (Short-lived Nature), मन्दबुद्धिता (Intellectual Weakness) एवं अनुत्साह (Lethargy) है। अतः सरलतम साधन (Simplified Spiritual Method) के रूप में दान को प्रतिष्ठित किया गया। इस संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य -  “दत्त, दयध्वं, दम्यत्” दान, दया और दम का त्रिविध उपदेश देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भर्तृहरि ने भी कहा - &amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt;दानेन पाणिर्नतु कंकणेन&amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt; अर्थात् दान ही कर-कमलों की वास्तविक शोभा है। धर्मनियन्ताओं का युगानुसार परिवर्तन आदि विषयों का पाराशर स्मृति में उल्लेख इस प्रकार है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः। द्वापरे शङ्खलिखितौ कलौ पाराशराः स्मृताः॥ (पाराशर स्मृति-24)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सत्ययुग में मनु का विधान प्रचलित था, त्रेता में गौतम के नियम मान्य हुए, द्वापर में शंख और लिखित का अधिकार स्थापित हुआ, कलियुग में महर्षि पराशर स्वयं धर्मनियन्ता माने गये। यह परिवर्तन धर्म की ऐतिहासिकता (Historicity of Dharma) को सूचित करता है। धर्म कोई स्थिर तत्त्व नहीं, अपितु काल-सापेक्ष (Time-conditioned) व्यवस्था है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दण्ड-व्यवस्था में शिथिलीकरण॥ Penal Relaxation and Reformative Justice'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत्। द्वापरे कुलमेकं तु कर्त्तारं च कलौ युगे॥ (पाराशर स्मृति-25)&lt;br /&gt;
*कृतयुग में देश-निर्वासन (Exile from Nation)&lt;br /&gt;
*त्रेता में ग्राम-निर्वासन (Village Banishment)&lt;br /&gt;
*द्वापर में कुल-बहिष्कार (Family Ostracism)&lt;br /&gt;
*कलियुग में प्रायश्चित्त (Expiatory Reform)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ दण्ड-नीति (Penology) में सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) स्पष्ट होता है। कलियुग में अपराधी को पुनर्वास (Rehabilitation) का अवसर प्रदान किया गया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च। द्वापरे त्वत्रमादाय कलौ पतति कर्मणा॥ (पाराशर स्मृति-26)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;उपर्युक्त श्लोक में पापी के साथ संसर्ग (Association with Sinner) के नियमों का विवेचन है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कृतयुग - सम्भाषण मात्र से पतन&lt;br /&gt;
* त्रेता - स्पर्श से पतन&lt;br /&gt;
*द्वापर - अन्नग्रहण से पतन&lt;br /&gt;
*कलियुग - केवल स्वयं के कर्म से पतन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह नैतिक उत्तरदायित्व की व्यक्तिगतता (Individualization of Responsibility) को सूचित करता है। धर्म का केन्द्र बाह्य संसर्ग से हटकर आन्तरिक कर्तृत्व (Internal Agency) पर आ गया। पाराशर का यह प्रतिपादन स्पष्ट करता है कि - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*धर्म स्थिर न होकर परिस्थितिजन्य है।&lt;br /&gt;
*दण्ड से अधिक प्रायश्चित्त (Atonement) को महत्त्व दिया गया।&lt;br /&gt;
*बाह्याचार (External Conduct) से अधिक आन्तरिक नैतिकता (Inner Morality) को प्रधानता मिली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पाराशर-स्मृति में धर्म का स्वरूप विकासमान (Evolutionary), अनुकूलनीय (Adaptive) एवं समाजोपयोगी (Socially Relevant) है। युगानुसार धर्म के साधन, दण्ड-विधान, सामाजिक मर्यादा तथा आध्यात्मिक प्रभाव की यह क्रमिक शिथिलता (Gradual Relaxation) भारतीय धर्मशास्त्र की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता (Practical Wisdom) को प्रमाणित करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह प्रतिपादन आधुनिक विधिशास्त्र (Modern Jurisprudence) की उस धारणा से साम्य रखता है जिसमें विधि (Law) को समाज की आवश्यकताओं (Social Needs) के अनुरूप संशोधित किया जाता है। इस प्रकार पाराशर का दृष्टिकोण न केवल धार्मिक आचारसंहिता (Religious Code of Conduct) है, अपितु एक गतिशील सामाजिक-दर्शन भी है, जो काल, परिस्थिति और मानवीय क्षमता के अनुरूप धर्म की पुनर्व्याख्या का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रों के वर्ण्यविषय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''आचार -''' दैनिक आचार, सदाचार एवं दुराचार निर्णय आदि।&lt;br /&gt;
*'''आश्रम एवं''' '''वर्ण व्यवस्था -''' चारों आश्रमों एवं चारों वर्णों के कर्तव्याकर्तव्य विवेचन।&lt;br /&gt;
*'''नारी की स्थिति एवं धर्मशास्त्रीय अवधारणाएँ -''' नारी का धन, स्त्री का धर्म, स्त्रियों की पवित्रता, कन्या द्वारा पति वरण करना, अगम्या स्त्रियाँ, पत्नी की रक्षा, कन्या विक्रय का पाप, विधवा का धर्म आदि। न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते॥&lt;br /&gt;
*'''शुद्धि एवं पवित्रता -''' पात्र,वस्त्र, अन्न, भूमि, शुद्धि के साधन एवं उपाय, शरीर की शुद्धि एवं अन्य शुद्धियां।&lt;br /&gt;
*'''संस्कार -''' गर्भाधान, उपनयन, विवाह एवं अंत्येष्टि आदि संस्कार।&lt;br /&gt;
*'''दंड एवं प्रायश्चित -''' विदेश यात्रा, हत्या (वध), परस्त्रीगमन, सुरापान, स्वर्ण आदि चोरी का प्रायश्चित।&lt;br /&gt;
*'''विविध नियम एवं वृत्तियां -''' अभिवादन नियम, यज्ञोपवीत धारण विधि, आचमन एवं प्रक्षालन विधि, अशौच, तर्पण, स्नान, भोजन एवं दान विधि।&lt;br /&gt;
*'''प्रायश्चित -''' जप, तप, प्राणायाम एवं कृच्छ्रादि व्रत विधान&lt;br /&gt;
*'''प्रकीर्ण -''' संपत्ति का उत्तराधिकार एवं विभाजन, पुत्रों के प्रकार, भक्ष्याभक्ष्य एवं पेयापेय विचार, योग साधन आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे- स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137559</id>
		<title>Treasury System (कोष व्यवस्था)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137559"/>
		<updated>2026-02-20T18:25:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन में राज्य की स्थिरता एवं उन्नति के लिए कोष को प्रमुख स्थान प्राप्त है। कौटिल्य द्वारा रचित [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को न केवल राज्य का आधार माना गया है, अपितु उसे दण्ड, सेना, प्रशासन और लोककल्याण की शक्ति का मूल स्रोत भी बताया गया है। प्रस्तुत लेख में कोष-संरचना, कोष-वृद्धि के उपाय, कोष-क्षय के कारण तथा कोष में संचित विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों का विश्लेषण किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि कौटिल्य की कोष-नीति केवल राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं थी, अपितु नैतिक प्रशासन, भ्रष्टाचार-नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा की समग्र योजना प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
राज्य संचालन का मूलाधार आर्थिक सुदृढ़ता है। प्राचीन शास्त्रकारों ने राज्य के [[Saptanga Siddhanta (सप्तांग सिद्धांत)|सप्ताङ्ग सिद्धान्त]] में कोष को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। कौटिल्य भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि समस्त प्रशासनिक क्रियाएँ कोष पर ही आधारित होती हैं। कोष के बिना न तो सेना का संचालन सम्भव है और न ही दण्ड-व्यवस्था की प्रभावशीलता। इसीलिए राजा का प्रथम कर्तव्य कोष की रक्षा एवं वृद्धि बताया गया है-&amp;lt;ref&amp;gt;शोधकर्त्री-अनुराधा भारद्वाज, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/21647/3/shukraniti.pdf शुक्रनीति का अनुशीलन] (२०१३), शोधकेन्द्र - कुमाऊं विश्वविद्यालय (पृ० १९७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
कोषपूर्वाः सर्वारंभाः। तस्मात् पूर्वं कोषमवेक्षेत्॥ (कौटिल्य अर्थशास्त्र २/२) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्राचीन काल से ही राजस्व एवं सैन्य बल राज्य के प्रमुख दो स्तम्भ कहे गये हैं। आचार्य शुक्र कोष का लक्षण करते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;एकार्थ समुदायो यः स कोशः स्यात् पृथक् पृथक्। (शुक्रनीति ४/२/१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;पं० श्री ब्रह्माशंकर मिश्र, [https://archive.org/details/20230223_20230223_0110/page/n285/mode/1up शुक्रनीति] (१९६८), चतुर्थ अध्याय-कोशनिरूपण प्रकरण, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी (पृ० २०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;किसी भी एक तरह की वस्तुओं के समूह को कोष कहा जाता है जो कई तरह के होते हैं। राज्य की समृद्धि तथा लोककल्याणकारी दायित्वों के निर्वहन हेतु कोष की वृद्धि अनिवार्य मानते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;येन केन प्रकारेण धनं सञ्चिनुयात् नृपः। तेन संरक्षयेद्राष्ट्रं बलं यज्ञादिकाः क्रियाः॥ (शुक्रनीति ४/२/२)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;राजा का यह कर्तव्य है कि वह विविध उपायों द्वारा धन का संग्रह करे, जिससे संचित संपत्ति के माध्यम से राष्ट्र, सेना तथा धार्मिक कार्यों की समुचित रक्षा की जा सके। कोश वृद्धि का मूल कारण सेना को मानते हुए शुक्राचार्य जी कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम्। बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिरक्षयः॥ (शुक्रनीति ४/२/१४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सेना को राजकोष का मूल आधार माना गया है, क्योंकि सेना के माध्यम से ही कोष का संरक्षण एवं संचय सम्भव होता है। इसी प्रकार राजकोष भी सेना का आधारस्तम्भ है, क्योंकि कोष के अभाव में सेना का भरण-पोषण तथा संरक्षण नहीं किया जा सकता। इस प्रकार सेना और कोष परस्पर आश्रित हैं। जब सेना तथा राजकोष की समुचित रक्षा की जाती है, तब न केवल कोष और राज्य की समृद्धि होती है, अपितु शत्रुओं का विनाश भी सुनिश्चित होता है। महाभारत में कहा गया है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कोशश्च सततं रक्ष्यो यत्नमास्थाय राजभिः। कोशमूला हि राजानः कोशवृद्धिकरो भवेत्॥ कोष्ठागारं च ते नित्यं स्फीतं धान्यैः सुसंचितैः॥ (महाभारत ११९/१६)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D-12-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5-119 महाभारत], शांतिपर्व, अध्याय ११९, श्लोक १६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' राजाओं को चाहिए कि वे पूर्ण प्रयास और सतत सावधानी के साथ राजकोष की निरन्तर रक्षा करें, क्योंकि राजाओं की सत्ता का मूल आधार कोष ही होता है। अतः राजा को कोष की वृद्धि करने वाला होना चाहिए। राजा का भण्डारगृह सदैव अन्न-धान्यों से परिपूर्ण तथा भली-भाँति संचित होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कोष की अवधारणा॥ Concept of Treasury==&lt;br /&gt;
कौटिल्य के अनुसार कोष केवल धन-संग्रह नहीं, बल्कि राज्य की जीवन-रेखा है। [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को राज्यरूपी वृक्ष की जड़ कहा गया है। यदि जड़ सुदृढ़ है तो वृक्ष स्वतः फल-फूलता है। [[Mahabharat (महाभारत)|महाभारत]] के शान्तिपर्व तथा विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी कोष के इसी महत्त्व का उल्लेख मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कोष की अवधारणा भारतीय परम्परा में दीर्घकाल से प्रतिष्ठित रही है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - रंजना, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/566325/13/9th_file_chapter5.pdf कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र में वर्णित आय स्रोत तथा कर व्यवस्था का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक अध्ययन] (२०२२), शोधकेंद्र - बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय , रोहतक (पृ० २१०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-वृद्धि के उपाय॥ Measures for Growth of the Treasury ===&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रकारों ने कर-ग्रहण को कोष-समृद्धि का प्रमुख आधार स्वीकार किया है। [[Acharya (आचार्यः)|आचार्य]] कौटिल्य ने कर-आदान (Tax Collection) के अतिरिक्त कोष-वृद्धि (Treasury Growth) के अन्य उपायों का भी विस्तार से निरूपण किया है तथा साथ ही कोष-क्षय के कारणों को भी स्पष्ट किया है। अर्थशास्त्र में कोष-वृद्धि के अनेक व्यावहारिक साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन उपायों में राष्ट्र की सम्पत्ति में वृद्धि करना, राज्य के नैतिक चरित्र पर विशेष ध्यान देना, चोरों एवं अपराधियों पर सतत निगरानी रखना, राजकीय अधिकारियों को रिश्वत-ग्रहण (Bribery) से रोकना, समस्त प्रकार के अन्न-उत्पादन को प्रोत्साहित करना, जल और स्थल दोनों क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाली व्यापार-योग्य वस्तुओं (Tradeable Goods) की वृद्धि करना, अग्नि आदि आपदाओं से राज्य की रक्षा करना, नियत समय पर विधिपूर्वक कर-आहरण करना तथा हिरण्य आदि भेंटों को स्वीकार करना सम्मिलित है। कौटिल्य के अनुसार ये सभी [[Upayas in Indian Diplomacy|उपाय]] कोष-वृद्धि के प्रभावी साधन माने जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य ने कोष-वृद्धि के लिए अनेक व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं। इनमें प्रमुख हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''राजस्व संग्रह (कर व्यवस्था)''' - [[Krshi Vijnana (कृषिविज्ञानम्)|कृषि]], पशुपालन, व्यापार एवं उद्योग से कर संग्रह को कोष-वृद्धि का मुख्य साधन माना गया।&lt;br /&gt;
#'''उत्पादन का प्रोत्साहन''' - कृषि, मत्स्य-पालन, खनन तथा वाणिज्यिक गतिविधियों को राज्य से जोड़कर राष्ट्रीय सम्पदा बढ़ाने पर बल दिया गया।&lt;br /&gt;
#'''व्यापार नियंत्रण''' - तौल-माप, मूल्य-नियंत्रण और शुल्क व्यवस्था के माध्यम से राजकोष में नियमित आय सुनिश्चित की गई।&lt;br /&gt;
#'''आपदाकालीन व्यवस्था''' - दुर्भिक्ष, महामारी अथवा युद्ध जैसी परिस्थितियों में विशेष उपायों द्वारा कोष को पुनः सुदृढ़ करने की व्यवस्था की गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-हानि के प्रकार॥ Types of Treasury Losses===&lt;br /&gt;
कौटिल्य कोष-क्षय के कारणों के प्रति अत्यन्त सजग थे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि राज्यकर्मचारी विभिन्न रूपों में राजकोष का दुरुपयोग कर सकते हैं। अर्थशास्त्र में कोष-क्षय के आठ प्रमुख कारण बताए गए हैं जिनसे सचेत रहना भी राजा के लिए आवश्यक था जो निम्न हैं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रतिबन्धः प्रयोगोव्यवहारोऽवस्तारः परिहायणमुपभोगः परिवर्तनमपहारश्चेति कोषक्षयः॥ (अर्थशास्त्र २/२४/८/३)&amp;lt;ref&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० १०९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रतिबन्ध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन और अपहार ये आठ कोषक्षय के प्रमुख कारण हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''प्रतिबंधक (राजकर की अनुचित वसूली एवं संग्रह) -''' अर्थशास्त्र के अनुसार राजकर की वसूली कर उसे अपने अधिकार में न रखना, अधिकार में रखने पर भी उसे राजकोष में जमा न करना अथवा वसूल की गई राशि का अन्यत्र उपयोग करना - ये तीनों स्थितियाँ प्रतिबन्धक क्षय कहलाती हैं। ऐसे कृत्यों द्वारा राजकोष की हानि होती है, क्योंकि कर का  नियमानुकूल लेखांकन एवं संग्रह बाधित हो जाता है - सिद्धीनामसाधनमनवतारणमप्रवेशनं वा प्रतिबन्धः, तत्र दश-बन्धो दण्डः। कौटिल्य ने इस प्रकार के कोष-क्षय को गम्भीर अपराध मानते हुए दोषी अध्यक्ष पर क्षतिग्रस्त राशि से दस गुना दण्ड निर्धारित किया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot;&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], प्रकरण २४, अध्याय ८, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० ११०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''प्रयोग (कोषधन का निजी लेन-देन में प्रयोग)''' - राजकोष के धन से स्वयं लेन-देन कर उसे बढ़ाने का प्रयास करना प्रयोग कहलाता है। ऐसा कृत्य राज्यधन के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है - कोषद्रव्याणां वृद्धिप्रयोगः प्रयोगः। इस प्रकार के अपराध में संलिप्त अधिकारी को भी दूना दण्ड दिया जाना आवश्यक बताया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''व्यवहार (कोष की सम्पत्ति से निजी व्यापार) -'''  राजकोष में संचित धन अथवा वस्तुओं से स्वयं व्यापार करना व्यवहार कहा गया है। यह भी कोष के अनुचित उपयोग का रूप है - पण्यव्यवहारो व्यवहारः। तत्र फलद्विगुणो दण्डः। ऐसे कृत्य के लिए दोषी व्यक्ति को दुगुना दण्ड देने का विधान किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''अवस्तार (भय अथवा रिश्वत द्वारा धन-संग्रह) -''' जो अधिकारी नियत समय पर कर वसूली न करके, विलम्ब का भय दिखाकर अथवा रिश्वत प्राप्त करने की इच्छा से प्रजा को उत्पीड़ित कर धन एकत्र करता है, उसे अवस्तार कहा गया है - सिद्ध कालमप्राप्तं करोत्यप्राप्तं प्राप्तं वेत्यवस्तारः। तत्र पञ्च-बन्धो दण्डः। इस प्रकार की वसूली को अत्यन्त निन्दनीय माना गया है और ऐसे अधिकारी पर हानि की राशि से पाँच गुना दण्ड लगाने का निर्देश दिया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''परिहरण (आय को घटाकर एवं व्यय को बढ़ाकर कोष-हानि) -''' जो अध्यक्ष अथवा अधिकारी अपने दुष्कृत्यों के कारण राज्य की आय को कम कर देता है तथा व्यय की राशि को अनावश्यक रूप से बढ़ा देता है, उसे परिहरण कहा गया है - क्लृप्तमायं परिहापयति व्ययं वा विवर्धयतीति परिहापणम्। तत्र हीनचतुर्गुणो दण्डः। इस प्रकार का आचरण भी कोष को क्षति पहुँचाने वाला माना गया है और इसके लिए चौगुना दण्ड का विधान किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''उपभोग (राजकोषीय द्रव्यों का निजी उपभोग)''' - राजकोष में संचित द्रव्यों का स्वयं उपयोग करना अथवा दूसरों को उसका उपयोग करने देना उपभोग कहलाता है। यह कोष-क्षय का गम्भीर अपराध माना गया है। ऐसे अपराध में संलग्न अध्यक्ष के लिए [[Penal System (दण्ड व्यवस्था)|दण्ड]] का निर्धारण उपभोग की वस्तु के अनुसार किया गया है - स्वयमन्यैर्वा राजद्रव्याणामुपभोजनमुपभोगः। तत्र रत्नोपभोगे घातः, सारोपभोगे मध्यमः साहसदण्डः, फल्गुकुप्योपभोगे तच्च तावच्च दण्डः। यदि वह रत्नों का उपभोग करता है तो उस पर प्राणदण्ड का विधान है; साहसिक द्रव्यों के उपभोग की स्थिति में मध्यम साहस दण्ड (250 से 500 पण तक का अर्थदण्ड) निर्धारित किया गया है; तथा यदि फल, कन्द-मूल अथवा अन्य उपभोग्य पदार्थों का उपयोग किया गया हो तो उनसे सम्बन्धित द्रव्य को वापस लेकर उसकी लागत के अनुरूप दण्ड दिया जाना चाहिए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''परिवर्तन (राजकोषीय द्रव्यों का परिवर्तन) -''' राजकोष की वस्तुओं को अन्य वस्तुओं से बदल लेना परिवर्तन कहा जाता है - राजद्रव्याणामन्यद्रव्येणादानं परिवर्तनं, तद् उपभोगेन व्याख्यातम्। यह भी कोष के अनधिकृत उपयोग का ही एक रूप है। इस प्रकार के कृत्य में संलिप्त अध्यक्ष को उपभोग-क्षय के समान ही दण्ड दिया जाना चाहिए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''अपहार (लेखा-विवरण में अनियमितता) -''' प्राप्त आय को लेखा-पुस्तकों (रजिस्टर) में अंकित न करना, नियमित व्यय को रजिस्टर में दर्शाने के उपरान्त भी उसका वास्तविक उपयोग न करना, अथवा प्राप्त निधि के सम्बन्ध में छल-कपट करना - ये तीनों प्रकार के कृत्य अपहार की श्रेणी में आते हैं - सिद्धमायं न प्रवेशयति निबद्धं व्ययं न प्रयच्छति, प्राप्तां नीवीं विप्रतिजानीत इत्यपहारः। तत्र द्वादशगुणो दण्डः। अपहार के माध्यम से कोष-क्षय करने वाले अध्यक्ष को हुई हानि से बारह गुना दण्ड देने का निर्देश दिया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोषाध्यक्ष के दायित्व॥ Duties of the Treasurer===&lt;br /&gt;
कोषाध्यक्ष संस्कृत का एक संयुक्त शब्द है, जो कोष तथा अध्यक्ष शब्दों से मिलकर बना है। कोष का अर्थ है- राज्य की संचित सम्पत्ति या खजाना, तथा अध्यक्ष का अर्थ है- उसका प्रधान या निरीक्षक। इस प्रकार कोषाध्यक्ष वह अधिकारी होता है जो कोषागार का अधीक्षक एवं संरक्षक होता है। प्राचीन भारतीय प्रशासन व्यवस्था में कोषाध्यक्ष का दायित्व राज्य के खजाने की सुरक्षा, आय–व्यय का नियंत्रण तथा वित्तीय अनुशासन बनाए रखना था। वह राज्य की आय को संग्रहीत करने, भुगतान की व्यवस्था करने तथा कोष से संबंधित समस्त कार्यों का संचालन करता था। कोषाध्यक्ष के स्वरूप का लक्षण करते हुए शुकाचार्य जी ने कहा है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;रत्नानां स्वर्ण रजतमुद्राणामधिपश्च सः। मानाकृतप्रभावर्णजातिसाम्पाच्च मौल्यवित्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दान्तुस्तु सधनो यस्तु व्यवहारविशारदः। धनप्राणोऽतिकृपणः कोषाध्यक्षः स एव हि॥ (शुक्रनीति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् सोने, चाँदी, सिक्के तथा रत्नों के जो अध्यक्ष बनाये जाएँ उन्हें इनकी पहचान होनी चाहिए। इनके तौल, आकार, चमक, रङ्ग, जाति और समता को देखकर इनका मूल्य-निर्धारण करने की क्षमता होनी चाहिए। आत्मनियन्त्रिक धनी, व्यवहारकुशल, धन को अपने प्राणों से भी अधिक समझने वाले तथा अति व्यक्ति को कोषाध्यक्ष अथवा धनाध्यक्ष के पद पर नियुक्त करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यावहारिक अर्थ में कोषाध्यक्ष को खजांची (Treasurer), भुगतानकर्ता (Paymaster) तथा वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा प्रधान अधिकारी माना जाता है। आधुनिक शासन प्रणाली में उसके कार्य और दायित्वों की प्रकृति वित्त मंत्री (Finance Minister) या उच्च वित्तीय अधिकारी से तुलनीय मानी जा सकती है, यद्यपि प्रशासनिक संरचना में पदनाम भिन्न हो सकता है। कौटिल्य के अनुसार -&amp;lt;blockquote&amp;gt;सन्निधाता कोशगृहं पण्यगृहं कोष्ठागारं कुप्यगृहमायुधागारं बन्धनागारं च कारयेत्। चतुरश्रां वापीमनुदकोपस्नेहां खानयित्वा पृथुशिलाभिरुभयतः पार्श्व मूलं च प्रचित्य सारदारुपञ्जरं भूमिसमत्रितलमनेकविधानं कुट्टिम-देशस्थानतल मेकद्वारं यन्त्रयुक्तसोपानं देवतापिधानं भूमिगृहं कारयेत्। तस्योपर्युभयतोनिषेधं सप्रग्रीवमैष्टकं भाण्डवाहिनीपरिक्षिप्तं कोशगृहं कारयेत्, प्रासादं वा। जनपदान्ते ध्रुवनिधिमापदर्थमभित्यक्तः पुरुषैः कारयेत्॥ (अर्थशास्त्र २१/५/१-२)&amp;lt;ref&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], प्रकरण २१, अध्याय ५, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० ९६)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;राजकीय कोष का प्रधान अधिकारी सन्निधाता कहलाता था। सन्निधाता का दायित्व था कि वह कोषगृह, पण्यगृह, कोष्ठागार, कुष्ठागार, आयुधागार तथा कारागार आदि की स्थापना कर उनकी समुचित देखरेख करे। कोषगृह आदि की संपूर्ण व्यवस्था उसके अधीन संचालित होती थी तथा कोषाध्यक्ष, पण्याध्यक्ष आदि अन्य अधिकारी उसके निर्देशन में अपने-अपने कार्यों का निर्वहन करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोषगृह में विविध प्रकार की मूल्यवान वस्तुओं का संग्रह किया जाता था। कोषगृह के निर्माण के विषय में आचार्य कौटिल्य ने विशेष तकनीकी निर्देश दिए हैं। उनके अनुसार कोषगृह का निर्माण ऐसे सुरक्षित स्थान पर किया जाना चाहिए जहाँ न जल का प्रवेश हो और न ही आर्द्रता। इसकी दीवारें तथा फर्श सुदृढ़ शिलाओं से निर्मित हों तथा भीतर लकड़ी के खम्भों के बीच एक पृथक कक्ष बनाया जाए, जिसमें केवल एक द्वार हो। उस कक्ष के मध्य भाग में भूमि को समतल कर उसमें एक गड्ढा बनाया जाए, जिसमें चन्दन की लकड़ी स्थापित हो और उस पर देवता की प्रतिष्ठा की जाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके ऊपर एक पृथक कोषागार का निर्माण किया जाए, जो चारों ओर से सुरक्षित एवं बंद हो, जिसकी छत दृढ़ हो, ईंटों से निर्मित हो तथा जिसमें कोषीय वस्तुओं को रखने हेतु नालीयुक्त व्यवस्था की गई हो। इस प्रकार कौटिल्य ने कोषगृह की संरचना में सुरक्षा, पवित्रता एवं सुव्यवस्थित संग्रह - तीनों पर विशेष बल दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-संग्रह॥ Treasury Collection ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार्य शुक्र ने कोष को सुखद तथा दुःखद - इन दो प्रकारों में विभाजित किया है। उनके अनुसार जो कोष राजा, प्रजा, सेना तथा धार्मिक कृत्यों के हित में प्रयुक्त होता है, वही सुखद कोष कहलाता है। ऐसा कोष राज्य की समृद्धि, सामाजिक संतुलन तथा लोककल्याण का साधन बनता है। इसके विपरीत, जो कोष अनुचित साधनों से संचित हो, या जिसे केवल व्यक्तिगत सुख, पत्नी–पुत्र अथवा संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए उपयोग किया जाए, वह दुःखद कोष माना जाता है। ऐसा धन न तो वास्तविक सुख प्रदान करता है और न ही स्थायी कल्याण का कारण बनता है, अपितु अंततः कष्ट और पतन का हेतु बनता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;बलप्रजारक्षणार्थं यज्ञार्थं कोशसङ्ग्रहः। परत्रेह च सुखदो नृपास्यान्यश्च दुःखदः॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्रीपुत्रार्थं कृतो यश्च स्वोपभोगाय केवलम्। नरकायैव स ज्ञेयो न परत्र सुखप्रदः॥ (शुक्रनीति ४/२/३-४) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार शुक्रनीति में कोष का निर्धारण उसके उपार्जन के साधन (means of acquisition) तथा उसके उपयोग के उद्देश्य (purpose of utilisation) के आधार पर किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष में संचित सम्पत्तियों के प्रकार॥ Types of Assets Stored in the Treasury===&lt;br /&gt;
आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजकोष में संचित सम्पदाओं (Assets) एवं मुद्राओं (Currency) के स्वरूप का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। उन्होंने एक कुशल जौहरी की भाँति विविध प्रकार के रत्नों और मूल्यवान वस्तुओं, जैसे - मोती, मणि, हीरा, मूंगा, चन्दन, बहुमूल्य वस्त्र, स्वर्ण एवं रजत से निर्मित आभूषण (Gold and Silver Ornaments) तथा स्वर्ण, रजत और ताम्र धातुओं से निर्मित मुद्राओं - का सूक्ष्म एवं प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है। इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि कौटिल्य को कोष में संचित सम्पत्ति के भौतिक स्वरूप (Treasury Management) तथा उसके आर्थिक महत्व (Material Wealth Classification) का गहन ज्ञान था। उनके अनुसार राजकोष में संचित सम्पदा (Stored Wealth) मुख्यतः स्वर्ण, रजत, हीरा, मोती आदि बहुमूल्य धातुओं एवं रत्नों के रूप में विद्यमान रहती थी, जो राज्य की आर्थिक सुदृढ़ता (Economic Stability of the State) का आधार मानी जाती थी।&amp;lt;ref&amp;gt;पी०वी० काणे, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.306909/page/n102/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास] (१९६५), द्वितीय भाग-अध्याय ५, हिन्दी विभाग सूचना समिति, लखनऊ (पृ० ६६७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
कौटिल्य की कोष-व्यवस्था केवल आर्थिक [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]] नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रशासनिक दर्शन है। कोष-वृद्धि, कोष-संरक्षण और कोष नियन्त्रण - ये तीनों राज्य की स्थिरता के मूल स्तम्भ हैं। आधुनिक सार्वजनिक वित्त एवं प्रशासनिक पारदर्शिता की अवधारणाओं में भी कौटिल्य के सिद्धान्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। अतः प्राचीन भारतीय कोष-व्यवस्था को भारतीय आर्थिक चिन्तन की आधारशिला कहा जा सकता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Arthashastra]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0)&amp;diff=137558</id>
		<title>Dharmashastra (धर्मशास्त्र)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0)&amp;diff=137558"/>
		<updated>2026-02-16T18:22:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परम्परा द्वारा समाज में धर्मसम्मत आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त, सामाजिक एवं वैयक्तिक कर्तव्य-अकर्तव्य आदि कर्मों के सुव्यवस्थित निर्धारण हेतु धर्मशास्त्र का प्रवर्तन हुआ तथा वैदिकसाहित्य में यह कल्प नामक वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित है। इस शास्त्र के अन्तर्गत मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, बृहस्पति, बौधायन, जीमूतवाहन, विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य आदि आचार्यों के सूत्र, स्मृतियाँ, भाष्य एवं समकालीन निबन्धात्मक प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति का मूल आधार धर्म है। विविध शास्त्रकारों ने धर्म शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं। धर्मशास्त्र में सामाजिक आचार-विचार, [[Varnashrama Dharma (वर्णाश्रमधर्मः)|वर्णाश्रम-धर्म]], [[Achara (आचार)|सदाचार]], [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]], राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य तथा शासन से सम्बन्धित नियम आदि का सुव्यवस्थित विवेचन किया गया है। धर्मशास्त्र शब्द दो पदों [[Dharma (धर्मः)|धर्म]] और [[Shastra Shikshana Paddhati (शास्त्रशिक्षणपद्धतिः)|शास्त्र]] के संयोग से निर्मित है। इन दोनों पदों के शाब्दिक अर्थों का ज्ञान आवश्यक है। धर्म शब्द पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध प्राच्यविद् पण्डित तारिणीश झा ने संस्कृत शब्दार्थ कोश में क्रमशः -&amp;lt;blockquote&amp;gt;ध्रियते लोकानेन, ध्रियते लोकाः वा तथा ध्रियते लोकान् ध्रियते पुण्यात्मान् इति वा। (शब्दकोश)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार व्युत्पत्ति करते हुए धृ धातु से मन प्रत्यय द्वारा धर्म शब्द की निष्पत्ति मानी है तथा इसके पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों प्रयोगों को स्वीकार किया है। शास्त्र शब्द का अर्थ भी उपर्युक्त शब्दकोशकार द्वारा प्रायः समान रूप में ग्रहण किया गया है। शास् धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से शास्त्र शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। विभिन्न विद्वानों ने इसके अर्थ क्रमशः आज्ञा, उपदेश, नियम, धार्मिक ग्रन्थ, वेद एवं धर्मशास्त्र तथा जनसामान्य के कल्याण हेतु विधि-विधान प्रतिपादित करने वाले ग्रन्थ आदि स्वीकार किए हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्र शब्द का तात्पर्य उस व्यवस्था से है, जो मनुष्य के आचार-व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, सामाजिक मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। सामान्यतः स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र का पर्याय माना जाता है। मनुस्मृति में यह प्रतिपादित किया गया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय-२, श्लोक-१०।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;भाषार्थ - [[Shruti (श्रुतिः)|श्रुति]] को [[Vedas (वेदाः)|वेद]] तथा [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृति]] को धर्मशास्त्र के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार [[Mukhya Smritis (मुख्य स्मृतियां)|स्मृतिग्रन्थों]] को धर्मशास्त्र की संज्ञा प्रदान की गई है तथा स्मृतिकारों को धर्मशास्त्रकार कहा गया है। इस प्रकार धर्मशास्त्र का मूलाधार [[Vaidika Vangmaya (वैदिकवाङ्मयम्)|वैदिक परम्परा]] में निहित है, परन्तु उसका व्यावहारिक स्वरूप सूत्र, स्मृति, भाष्य एवं निबन्धात्मक ग्रन्थों के माध्यम से विकसित हुआ है। धर्मशास्त्र से सम्बन्धित साहित्य मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है - धर्मसूत्र एवं स्मृतियाँ। वैदिक अध्ययन की परम्परा में छह [[Shad Vedangas (षड्वेदाङ्गानि)|वेदाङ्गों]] का विधान किया गया, जिन्हें [[Shiksha (शिक्षा)|शिक्षा]], [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प]], [[Vyakarana Vedanga (व्याकरणवेदाङ्गम्)|व्याकरण]], [[Nirukta (निरुक्त)|निरुक्त]], [[Chandas (छन्दस्)|छन्द]] एवं [[Jyotisha (ज्योतिष)|ज्योतिष]] कहा जाता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;छन्‍द: पादौ तु वेदस्‍य, हस्‍तौ कल्‍पोऽथ पठ्यते। ज्‍योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्‍तं श्रोत्रमुच्‍यते॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्‍य मुखं व्‍याकरणं स्‍मृतम्। तस्‍मात्‍सांगमधीत्‍यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय शिक्षा)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE/%E0%A4%85%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%83 पाणिनीय शिक्षा], खण्ड- ८, श्लोक- ४१-४२।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इनमें [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प वेदांग]] का विशेष स्थान है, शास्त्रीय दृष्टि से कल्प उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें यज्ञानुष्ठान का विधि-विधान एवं  धार्मिक संस्कारों के नियम बतलाये गये हैं। विष्णुमित्र ने कल्प का शाब्दिक अर्थ बताते हुए कहा है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्। (ऋक्प्रातिशाख्य वृत्ति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद में विहित कर्मों को क्रमबद्ध रूप में विवेचित करने वाला शास्त्र कल्प है। कल्पसूत्रों के अन्तर्गत चार प्रकार की सूत्र रचनाएं हैं - [[Shrautasutras (श्रौतसूत्राणि)|श्रौतसूत्र]], [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्यसूत्र]], [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]] तथा [[Shulbasutras (शुल्बसूत्राणि)|शुल्बसूत्र]]। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''श्रौतसूत्र''' - [[Vedas (वेदाः)|वेदों]] में वर्णित [[Yajna (यज्ञः)|यज्ञों]] की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''गृह्यसूत्र''' - [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्याग्नि]] में होने वाले यज्ञों एवं [[Upanayana (उपनयनम्)|उपनयन]], [[Vivaha (विवाहः)|विवाह]] आदि संस्कारों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''धर्मसूत्र''' - [[Ashram System (आश्रम व्यवस्था)|आश्रमों]] और [[Varna Dharma (वर्णधर्मः)|चारों वर्णों]], [[Achara (आचार)|धार्मिक आचारों]] एवं राजा के कर्तव्यों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''शुल्बसूत्र''' - [[Vedi (वेदिः)|वेदी]] के निर्माण की विधि आदि के प्रतिपादक ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार सम्पूर्ण [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प-वेदांग]] चार वर्गों में विभाजित किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शालिनी वर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/55290 वसिष्ठधर्मसूत्र-एक अनुशीलन] (२००८), भूमिका, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ (पृ० २-३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रीय वाङ्मय॥ Dharmasastric literature==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अन्तर्गत [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]], [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृतियाँ]], उन पर रचित टीकाएँ तथा निबन्धात्मक ग्रन्थ सम्मिलित किए जाते हैं। धर्मसूत्रों, स्मृतियों, टीकाओं एवं निबन्धों की संख्या अत्यन्त व्यापक मानी जाती है। इन मूल ग्रन्थों पर रचित लघु एवं विशाल दोनों प्रकार के ग्रन्थ भी धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अंतर्गत ही समाहित किए जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थी- संदीप कुमार गुप्त, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264949 चतुर्वर्ग की धर्मशास्त्रीय अवधारणा] (2011), शोधकेंद्र- छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० २२)।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसको तीन निश्चित कालों में विभक्त किया जा सकता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#प्रथम काल गौतम, वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रों का है, जो कि कल्प वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित हैं।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्रों के द्वितीय क्रम में मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृतियों का समावेश होता है।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्र का तृतीय क्रम स्मृतियों की प्राचीन टीकाएँ और निबन्ध ग्रन्थों का है, इनमें विश्वरूप, मेधातिथि और विज्ञानेश्वर आदि के नाम प्रमुख हैं साथ ही कृत्यकल्पतरु, स्मृतिचन्द्रिका, चतुर्वर्गचिन्तामणि चण्डेश्वर का रत्नाकर आदि ग्रन्थों को निबन्ध की श्रेणी में परिगणन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्वोक्त तीनों कालक्रम में परिगणित धर्मसूत्र, स्मृतियाँ, टीकाएँ तथा निबन्ध ग्रन्थ धर्मशास्त्रीय वाङ्मय में समावेश किये जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===धर्मसूत्रों का स्वरूप===&lt;br /&gt;
{{Main|Dharmasutras_(धर्मसूत्राणि)}}&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय साहित्य का विकास मुख्यतः धर्मसूत्रों से प्रारम्भ होकर स्मृति एवं निबन्ध ग्रन्थों तक विस्तृत है। बौधायन, आपस्तम्ब, गौतम एवं वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रकारों ने धर्मसूत्रों के माध्यम से सामाजिक आचारों एवं विधिक मान्यताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, बृहस्पति आदि स्मृतिकारों ने धर्म के विविध पक्षों राजधर्म, व्यवहार, दण्ड, उत्तराधिकार, स्त्री-अधिकार एवं सामाजिक न्याय का विस्तृत विवेचन किया।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थिनी- रोली गुप्ता, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264777 बौधायन धर्मसूत्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१३), छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० ७-८)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्रों का वेद-विशेष से कोई निश्चित सम्बन्ध नहीं, ये स्वतंत्र रचनाएँ जैसी हैं। परन्तु जैसा कि डॉ० पी० वी० काणे ने उल्लेख किया है- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परम्परानुसार गौतमधर्मसूत्र का अध्ययन सामवेदी लोग करते थे, आपस्तम्ब के सूत्रों का अध्ययन तैत्तिरीय शाखा के अनुयायी गण करते थे और वसिष्ठधर्मसूत्र का अध्ययन ऋग्वेदी लोग करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि धर्मसूत्र स्वतन्त्र रचनाओं के रूप में थे। परन्तु बाद में भिन्न-भिन्न वेदों के अनुयायियों ने इन्हें अपनाकर अपना कल्प वेदांग अध्ययन पूरा किया। वर्तमान समय में केवल चार धर्मसूत्र ही उपलब्ध होते हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*गौतम धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
* वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनके अतिरिक्त तीन धर्मसूत्रों का और उल्लेख मिलता है- विष्णुधर्मसूत्र, हिरण्यकेशि धर्मसूत्र और वैखानसधर्मसूत्र। इनमें हिरण्यकेशि धर्मसूत्र आपस्तम्ब से ही अधिकांशतः मिलता-जुलता है। वैखानस मुख्यरूप से संन्यास व वानप्रस्थ आश्रमों के अध्ययन के लिए उपयोगी है। अतः अध्ययन की दृष्टि से केवल पाँच धर्मसूत्र ही उपयोगी है- गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन, वसिष्ठ और विष्णु धर्मसूत्र।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+धर्मसूत्र एवं उन पर लिखित भाष्य&lt;br /&gt;
!'''वेद'''&lt;br /&gt;
!शाखा&lt;br /&gt;
!धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
!विषय-वस्तु&lt;br /&gt;
! भाष्य एवं टीकाएं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;2&amp;quot; |ऋग्वेद&lt;br /&gt;
|शाकल&lt;br /&gt;
|वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|३० अध्याय, सूत्र एवं श्लोक-दोनों रूपों में&lt;br /&gt;
|कृष्ण पण्डित धर्माधिकारी का भाष्य, जिसे विद्वन्मेदिनी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|कौषीतकि&lt;br /&gt;
| विष्णु&lt;br /&gt;
|१०० अध्याय&lt;br /&gt;
|नन्द पण्डित (वैजयन्ती व्याख्या), भारुचि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!शुक्ल&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
|_&lt;br /&gt;
|हारीत&lt;br /&gt;
|३० अध्याय&lt;br /&gt;
|लघु हारीत स्मृति तथा वृद्ध हारीत स्मृति से सम्बद्ध&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कृष्ण&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |तैत्तिरीय&lt;br /&gt;
|बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|चार प्रश्न (जिनमें से केवल दो को मूल माना जाता है)&lt;br /&gt;
|गोविन्दस्वामी का भाष्य (विवरण)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब कल्प के 28वें एवं 29वें प्रश्न (1364 सूत्र एवं 30 श्लोक)&lt;br /&gt;
|हरदत्त (उज्ज्वलवृत्ति), धूर्तस्वामी तथा शंकर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि कल्प के 26वें एवं 27वें प्रश्न&lt;br /&gt;
|महादेव दीक्षित (वैजयन्ती)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|वैखानस धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|वैखानस स्मार्तसूत्र के 3 प्रश्न (51 काण्ड एवं 365 सूत्र)&lt;br /&gt;
|कोई भाष्य उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!सामवेद&lt;br /&gt;
|राणायनीय शाखा&lt;br /&gt;
|गौतम धर्मसूत्र (चरणव्यूह के अनुसार)&lt;br /&gt;
|२८ अध्याय, सूत्ररूप में रचित&lt;br /&gt;
|हरदत्त (मिताक्षरा) असहाय, भारत्यज्ञ, मस्करी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!अथर्ववेद&lt;br /&gt;
| colspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कोई धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कल्पसूत्रों में धर्मसूत्रों को तीसरे वर्ग में रखा गया है। धर्मसूत्रों का गृह्यसूत्रों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन दोंनों के विषयों में कुछ समानता भी है। यथा-उपनयन, अनध्याय, विवाह, श्राद्ध, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, महायज्ञ आदि। धर्मसूत्रों में इनके सामाजिक नियमों प्रतिबन्धों व रीतियों का उल्लेख है। जबकि गृह्यसूत्रों में विधि व अनुष्ठान का वर्णन है। किन्तु धर्मसूत्रों में जहाँ गृह्यकर्मों से सम्बन्धित सूत्र हैं, वहीं धर्मसूत्रों का विषय अधिक व्यापक है। वे मानव के आचरण सम्बन्धी नियमों का विवेचन करते हैं। संक्षेप में धर्मसूत्रों का मुख्य विषय मानव जीवन के विविध पक्षों के कर्त्तव्यों का ज्ञान कराना है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===स्मृति ग्रंथो की अवधारणा===&lt;br /&gt;
{{Main|Smrti_(स्मृतिः)}}&lt;br /&gt;
मनु का वचन 'धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः' इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि धर्मशास्त्र मूलतः स्मृति-परम्परा से सम्बद्ध हैं। अर्थात् जितने भी धर्मशास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी स्मृति-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। इन धर्मशास्त्रों के कर्त्ताओं एवं उनकी परम्परा का विवेचन पराशर स्मृति में प्राप्त होता है। पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पे कल्पे क्षयोत्पत्त्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।  श्रुतिस्मृतिसमाचारनिर्णेतारश्च सर्वदा॥ (पराशर स्मृति 1.20)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot;&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० २०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक पर स्मृतिमुक्ताफल में टीका करते हुए कहा गया है कि सृष्टि और प्रलय का यह क्रम प्रत्येक महाकल्प एवं अवांतर कल्प में निरन्तर चलता रहता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देवता महाकल्प के अन्त में लीन होते हैं और नये महाकल्प के प्रारम्भ में पुनः प्रकट होते हैं। स्मृतिमुक्ताफल में टिप्पणी प्राप्त होती है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;क्षयसहिता उत्पत्तिः क्षयोत्पत्तिः। तयोपलाक्षता भवंति कल्पे कल्पे महाकल्पे अवांतरकल्पे च। ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा महाकल्पावसाने क्षीयंते महाकल्पादावुत्पद्यंते। एवमवांतरकल्पानामवसाने प्रारंभे च स्मृत्यादीनां निर्णेतारो मन्वादयः क्षयोत्पत्तिभ्यामुपलक्ष्यंते। चकारेणानुक्तो धर्मः समुच्चीयते। सर्वदेत्यनेन सृष्टिसंहारप्रवाहस्यानादित्वमनंतत्वं च दर्शितम्। स एव॥ (स्मृति मुक्ताफलम् १।२१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;वैद्यनाथ दीक्षितीय, [https://ia801409.us.archive.org/9/items/in.ernet.dli.2015.486485/2015.486485.Smrtimuktaphalama-part-1_text.pdf स्मृतिमुक्ताफलम्], वर्णाश्रमधर्मकाण्डम् (1937), विश्वनाथ जगन्नाथ घारपुरे (पृ० ११)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार श्रुति और स्मृति के निर्णायक मनु आदि भी प्रत्येक कल्प के आरम्भ और अन्त में प्रकट एवं विलीन होते रहते हैं। यहाँ &amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt;सर्वदा&amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt; पद के माध्यम से सृष्टि–प्रलय की अनादि और अनन्त परम्परा का संकेत किया गया है। आगे पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;न कश्चिद्वेदकर्त्ता च वेदं श्रुत्वा चतुर्मुखः। तथैव धर्मान् स्मरति मनुः कल्पांतरे तथा॥ (पराशर स्मृति 1. 21)&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक की टीका में स्मृतिमुक्ताफलकार स्पष्ट करते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पांतरे धर्मान् स्मरति इति पत्रयं पूर्वार्धेऽपि संबध्यते। महाकल्पे चतुर्मुखः परमेश्वरेण दत्तं वेदं श्रुत्त्वा तत्र विप्रकीर्णान्वर्णाश्रमादिधर्मान्स्मृतिग्रंथरूपेण उपनिबध्नाति तथैव स्वायंभुवो मनुः प्रत्यवांतरकल्पं वेदोक्तधर्मान्ग्रथ्नाति। मनुग्रहणेनात्रिविष्ण्वाद्य उपलक्ष्यंते। (स्मृति मुक्ताफलम्)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;quot;कल्पान्तरे धर्मान् स्मरति&amp;quot; यह पद पूर्ववर्ती वाक्य से सम्बद्ध है। प्रत्येक महाकल्प के प्रारम्भ में चतुर्मुख ब्रह्मा परमेश्वर से प्राप्त वेद को सुनते हैं और उसमें वर्णित वर्णाश्रम आदि धर्मों को स्मृति-ग्रन्थों के रूप में व्यवस्थित करते हैं। इसी प्रकार स्वायम्भुव मनु प्रत्येक अवांतर कल्प में वेदोक्त धर्मों को स्मरण कर स्मृति-रूप में स्थापित करते हैं। यहाँ मनु शब्द से मात्र एक व्यक्ति नहीं, अपितु अत्रि, विष्णु, पराशर आदि सभी धर्मशास्त्रकारों का भी संकेत होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० दिलीप कुमार नाथाणी, [https://ijesrr.org/publication/83/1.%20ijesrr%20june%202022.pdf स्मृति-धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के रचनाकार] (२०२२), इण्टरनेशनल जर्नल ऑफ एजुकेशन एण्ड साइंस रिसर्च रिव्यू (पृ० ३४९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''स्मृतियों की संख्या'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्धकारों एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा में स्मृतियों की संख्या को लेकर विभिन्न मत प्राप्त होते हैं। कुछ परम्पराओं में 36 स्मृतियों का उल्लेख है, तो कहीं यह संख्या और अधिक बतायी गयी है। वर्तमान में उपलब्ध स्मृतियों की संख्या सौ से भी अधिक मानी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधाता- सुभाष वी. वसोया, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/521411 धर्मशास्त्रानुसारेण आचारस्य एकं समीक्षात्मकम् अध्ययनम्] (२०१८), द्वितीय अध्याय, श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात (पृ० १४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{columns-list|colwidth=15em|style=width: 800px; font-style: normal;|&lt;br /&gt;
# अत्रिस्मृति &lt;br /&gt;
# अरुणस्मृति &lt;br /&gt;
# अगस्त्यस्मृति &lt;br /&gt;
# आंगिरसस्मृति (पूर्वागिरस, उत्तरांगिरस)&lt;br /&gt;
# आत्रेयस्मृति&lt;br /&gt;
# आस्तम्बस्मृति&lt;br /&gt;
# आश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ईशानस्मृति&lt;br /&gt;
# इन्द्रदत्तस्मृति&lt;br /&gt;
# उपकश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# उपांगिरसस्मृति&lt;br /&gt;
# औपजंघनस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनसस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनस संहिता&lt;br /&gt;
# ऋतुपर्णस्मृति&lt;br /&gt;
# ऋष्यश्रृंग स्मृति&lt;br /&gt;
# कणादस्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिञ्जलस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिल स्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वषस्मृति&lt;br /&gt;
# कश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# कवसस्मृति&lt;br /&gt;
# कात्यायनस्मृति&lt;br /&gt;
# काष्र्णाजिनस्मृति&lt;br /&gt;
# कुमारस्मृति&lt;br /&gt;
# कोकिलस्मृति&lt;br /&gt;
# कौत्सस्मृति&lt;br /&gt;
# कुतुस्मृति &lt;br /&gt;
# गर्गस्मृति&lt;br /&gt;
# गव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# गोभिलरमृति&lt;br /&gt;
# गौतम स्मृति&lt;br /&gt;
# चन्द्रस्मृति&lt;br /&gt;
# च्यवनरमुति&lt;br /&gt;
# छागल्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जमदग्निस्मृति&lt;br /&gt;
# जातुकर्ण्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जाबालीस्मृति&lt;br /&gt;
# दक्षरमृति&lt;br /&gt;
# दाल्भ्यस्मृति&lt;br /&gt;
# देवलस्मृति&lt;br /&gt;
# नाचिकेतस्मृति&lt;br /&gt;
# नारदस्मृति&lt;br /&gt;
# नारायणस्मृति&lt;br /&gt;
# पराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# पारस्करस्मृति&lt;br /&gt;
# पितामहस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्त्यस्मृति&lt;br /&gt;
# पैठीनसिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रजापतिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रह्लादरमृति&lt;br /&gt;
# प्राचेतसरमृति&lt;br /&gt;
# बादरायणस्मृति&lt;br /&gt;
# बाहस्पत्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बुधस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहत्पाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्रद्यमस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्वसिष्ठ स्मृति&lt;br /&gt;
# बृह‌द्विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# बैजवापरमृति&lt;br /&gt;
# बौधायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ब्रह्मोक्तयाज्ञवल्क्य स्मृति&lt;br /&gt;
# ब्राह्मणवधस्मृति&lt;br /&gt;
# भारद्वाजरमृति&lt;br /&gt;
# भूगुस्मृति&lt;br /&gt;
# मनुस्मृति&lt;br /&gt;
# मरीचिस्मृति&lt;br /&gt;
# माण्डव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# मार्कण्डेयस्मृति&lt;br /&gt;
# मुद्गलस्मृति&lt;br /&gt;
# मृत्युञ्जय स्मृति&lt;br /&gt;
# यमस्मृति&lt;br /&gt;
# याज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुपाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुबृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुव्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशंखस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशौनकस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वत्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वाश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुयमस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुहारितस्मृति&lt;br /&gt;
# लिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# लोमशस्मृति&lt;br /&gt;
# लोहितस्मृति&lt;br /&gt;
# लौगाक्षिस्मृति&lt;br /&gt;
# वत्सरमृति&lt;br /&gt;
# वभ्रूरमृति&lt;br /&gt;
# वसिष्ठस्मृति&lt;br /&gt;
# वाधूलस्मृति&lt;br /&gt;
# वाराहीस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वामित्रस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वेश्वरस्मृति&lt;br /&gt;
# विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धगौतम&lt;br /&gt;
# वृद्धशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धहारीतस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धात्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# वैखानसस्मृति&lt;br /&gt;
# वैजवापस्मृति&lt;br /&gt;
# वैशम्पायनस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यवहारांगस्मृति&lt;br /&gt;
# व्याघ्रस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# शकिलरमृति&lt;br /&gt;
# शंखस्मृति&lt;br /&gt;
# शतक्रतुस्मृति&lt;br /&gt;
# शन्तनुस्मृति &lt;br /&gt;
# शंखलिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकलस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकटायनस्मृति&lt;br /&gt;
# शातातपरमृति&lt;br /&gt;
# शाट्यायनस्मृति &lt;br /&gt;
# शाण्डिल्यस्मृति &lt;br /&gt;
# शुन क्षेपस्मृति &lt;br /&gt;
# शुनःपुच्छस्मृति &lt;br /&gt;
# शूद्रस्मृति &lt;br /&gt;
# शौनकस्मृति &lt;br /&gt;
# षण्मुखस्मृति &lt;br /&gt;
# संवर्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सत्यव्रतस्मृति &lt;br /&gt;
# सदाचारस्मृति &lt;br /&gt;
# सप्तर्षिस्मृति &lt;br /&gt;
# सनत्कुमारस्मृति &lt;br /&gt;
# स्कन्दस्मृति &lt;br /&gt;
# सांख्यायनरमृति&lt;br /&gt;
# सुमन्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सोमरमृति &lt;br /&gt;
# हारितस्मृति &lt;br /&gt;
# होरिलस्मृति }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निष्कर्षतः हम देखते हैं कि स्मृतियों की संख्या जितनी वर्तमान में प्राप्त हो रही है उससे कई अधिक हों। तात्पर्य है कि स्मृतियाँ हमारे सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, पारिवारिक, आदि सभी भावों का मार्ग प्रशस्त करने वाले ग्रन्थ हैं। भारतीय जनमानस का जीवन इन्हीं स्मृतियों के अनुसार प्रवृत्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उपस्मृति परम्परा'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य स्मृतियों के अतिरिक्त अनेक उपस्मृतियों का भी उल्लेख धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है। ये उपस्मृतियाँ मूल स्मृतियों का विस्तार अथवा विशिष्ट विषयों पर केन्द्रित व्याख्या के रूप में देखी जा सकती हैं। जाबालि, आपस्तम्ब, बौधायन, कणाद, वैशम्पायन आदि के नाम उपस्मृति कर्ताओं के रूप में उल्लिखित हैं। अंगिरा स्मृति में भी धर्मशास्त्रकारों को लिखा है, परन्तु अंगिरा ने जिनका नामोल्लेख किया है, उन्हें उपस्मृतिकार कहा है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कंदो लोगाक्षिकाश्यपौ। व्यासः सनत्कुमारश्च शंतनुर्जनकस्तथा॥&lt;br /&gt;
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकर्णिः कपिंजलः। बोधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च। पैठीनसीर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः॥ (अंगिरा स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' जाबालि, नचिकेता, स्कंद, लोगाक्षि, कश्यप, व्यासः, सनत्कुमार, शंतनु, जनक, व्याघ्र, कात्यायन, जातुकर्णि, कपिंजल, बोधायन, कणाद, विश्वामित्र, पैठीनसि, गोभिल। ये सभी उपस्मृतिकार हैं। उपस्मृतियों के माध्यम से धर्मशास्त्रीय परम्परा अधिक व्यापक होती है, जिससे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का समावेश सम्भव हो पाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===टीका, भाष्य एवं निबन्ध ग्रन्थ===&lt;br /&gt;
किसी धर्मसूत्र या स्मृति के आधार पर उसका अर्थ करने के लिए लिखी गई रचना टीका है। इनमें किसी प्रकार का विभाजन नहीं किया जा सकता, क्योंकि दोनों ही किसी एक धर्मसूत्र या स्मृति के आधार पर रचित हैं। निबन्ध-ग्रंथों में किसी एक सूत्रकार अथवा स्मृतिकार को आधार बनाने की अपेक्षा किसी विशिष्ट विषय को ही आधार के रूप में ग्रहण किया जाता है। तत्पश्चात उस विषय से संबंधित पूर्ववर्ती विभिन्न आचार्यों के वचनों का संकलन एवं समन्वय प्रस्तुत किया जाता है। यही पद्धति टीका भाष्य और निबन्ध ग्रन्थ की संरचनात्मक विशेषता को स्पष्ट करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः टीका, भाष्य तथा निबन्ध के मध्य स्पष्ट विभाजन-रेखा निर्धारित करना कठिन प्रतीत होता है। उदाहरणतः शंकर भट्ट के द्वैतनिर्णय में विज्ञानेश्वर को निबन्धकारों में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है, जबकि सामान्य परम्परा में वे याज्ञवल्क्य स्मृति के टीकाकार के रूप में विख्यात हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भाष्य और निबन्ध दोनों ही धर्मसूत्रों अथवा स्मृतियों में निहित आचार्यों के परस्पर विरोधी अथवा असंगत प्रतीत होने वाले वचनों का समाधान एवं समन्वय करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्ध-साहित्य के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि उनमें श्रुति की अपेक्षा स्मृतियों और पुराणों के उद्धरण अधिक मात्रा में मिलते हैं। जहाँ स्मृतियों के लिए श्रुति प्रमुख प्रमाण मानी जाती थी, वहीं निबन्धों के संदर्भ में स्मृतियाँ अधिक प्रामाणिक आधार बन गईं। इसका एक कारण यह प्रतीत होता है कि स्मृतियाँ जनसामान्य के लिए अधिक सुलभ एवं ग्राह्य थीं, जबकि वेद कालान्तर में सामान्य समाज की प्रत्यक्ष बौद्धिक पहुँच से अपेक्षया दूर होते चले गए तथा उनके वास्तविक तात्पर्य को ग्रहण करने वाले विद्वानों की संख्या सीमित रह गई।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधात्री- सुधा सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/552143 स्मृति परम्परा और पराशर स्मृति - एक अध्ययन](सन् २०१२), अध्याय-१, शोध केन्द्र - संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग - लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ (पृ० १२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेधातिथि द्वारा रचित मनुभाष्य (मनुस्मृति पर भाष्य) तथा याज्ञवल्क्यस्मृति पर विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा टीका आदि ग्रंथों को भी व्यापक अर्थ में धर्मशास्त्रीय साहित्य की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। यद्यपि ये मूल स्मृतियाँ नहीं हैं, तथापि इनके माध्यम से धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन, व्याख्या तथा व्यवहारिक प्रतिपादन किया गया है, अतः इनका स्थान धर्मशास्त्र-परम्परा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्षेत्रीय दृष्टि से भी धर्मशास्त्रीय निबन्ध-साहित्य का विकास उल्लेखनीय है -  &lt;br /&gt;
* उत्तर भारत: काशीनाथ उपाध्याय का कार्य - धर्मसिंधु।&lt;br /&gt;
*महाराष्ट्र: विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका और कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु।&lt;br /&gt;
*दक्षिण भारत: वैद्यनाथ दीक्षित का वैद्यनाथ-दीक्षितीयम इसको  स्मृतिमुक्ताफल ग्रंथ के रूप में भी जानते हैं।&lt;br /&gt;
*संन्यास आश्रम में स्थित जन: विद्येश्वर-संहिता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रकारों की परम्परा==&lt;br /&gt;
याज्ञवल्क्य स्मृति में जब धर्मशास्त्रकार के रूप में पाराशर और व्यास का नामोल्लेख मिलता है, तब यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि इन धर्मशास्त्रकारों के मध्य कोई कालक्रम (पौर्वापर्य) निर्धारित नहीं किया जा सकता। मनु द्वारा धर्म के स्वरूप का प्रतिपादन किए जाने के पश्चात् अन्य धर्मशास्त्रकारों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण और सामाजिक संदर्भों के अनुसार धर्म का विवेचन किया। इसी कारण कलियुग के धर्मशास्त्रकार माने जाने वाले पराशर का उल्लेख याज्ञवल्क्य द्वारा किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी परम्परा का समर्थन पराशर-स्मृति में भी प्राप्त होता है, जहाँ व्यास विभिन्न धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख करते हुए अपने पिता से यह कहते हैं कि उन्होंने उन सभी आचार्यों द्वारा प्रतिपादित धर्म का अध्ययन कर लिया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;धर्मकथय मे तातानुग्राह्यो ह्यहं तव। श्रुता मे मानवा धर्मो वासिष्ठा काश्यपास्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्गेया गौतमीयाश्च तथाञ्चोशनसास्मृताः। अत्रेर्विष्णोश्च संवर्ताद् दक्षादंगिरसस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शातातपाच्च हारीताद् याज्ञवल्क्यात्तथैव च। आपस्तम्बकृता धर्माः शंखस्य लिखितस्य च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥&lt;br /&gt;
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृति], आचार अध्याय, उपोद्घातप्रकरण, श्लोक ४-५।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पाराशर स्मृति में युगानुरूप धर्म-विकास'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय धर्मशास्त्रीय (Dharmashastric) परम्परा में युग-चतुष्टय के अनुसार धर्म के स्वरूप में परिवर्तन (Transformation) की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। पाराशर स्मृति में महर्षि पराशर ने इस युगानुरूप धर्म-परिवर्तन (Epochal Modification of Dharma) को अत्यन्त व्यावहारिक दृष्टिकोण (Pragmatic Approach) से प्रतिपादित किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''युगधर्मानुसार साधन-प्रधानता॥ Primacy of Means as per Yuga-Dharma'''&amp;lt;blockquote&amp;gt;तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते। द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे॥ (पाराशर स्मृति-23)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''कृतयुग में तप॥ Austerity as Supreme Discipline -''' कृतयुग में तप (Austerity) को सर्वप्रधान धर्म कहा गया। तप का तात्पर्य केवल शारीरिक कष्ट-सहन (Physical Mortification) नहीं, अपितु इन्द्रियनिग्रह (Self-restraint), चित्त-शुद्धि (Purification of Consciousness) तथा आध्यात्मिक उत्कर्ष (Spiritual Elevation) से है। उस काल में मनुष्य की आयु (Longevity), धैर्य (Endurance) और सात्त्विकता (Purity) उच्च कोटि की थी; अतः तप ही मोक्षोपाय (Means of Liberation) माना गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''त्रेतायुग में ज्ञान॥ Epistemic Realization -''' त्रेता में ज्ञान (Spiritual Knowledge) को प्रधानता मिली। ज्ञान यहाँ तत्त्वबोध (Metaphysical Insight) एवं आत्मसाक्षात्कार (Self-realization) का द्योतक है। यह युग दार्शनिक अन्वेषण (Philosophical Inquiry) का युग माना गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''द्वापर में यज्ञ॥ Ritual Sacrifice -''' द्वापर में यज्ञ-यागादि (Ritualism) को महत्त्व मिला। अश्वमेध, गोमेध आदि महायज्ञ सामाजिक-राजनीतिक प्रतिष्ठा (Royal Prestige) के प्रतीक बन गये। धर्म का रूप अधिकाधिक कर्मकाण्डात्मक (Ritualistic) हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कलियुग में दान॥ Charity as Ethical Core -''' कलियुग में दान (Charitable Giving) को ही सर्वोपरि धर्म माना गया। इसका कारण मानव की अल्पायु (Short-lived Nature), मन्दबुद्धिता (Intellectual Weakness) एवं अनुत्साह (Lethargy) है। अतः सरलतम साधन (Simplified Spiritual Method) के रूप में दान को प्रतिष्ठित किया गया। इस संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य -  “दत्त, दयध्वं, दम्यत्” दान, दया और दम का त्रिविध उपदेश देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भर्तृहरि ने भी कहा - “दानेन पाणिर्नतु कंकणेन” — अर्थात् दान ही कर-कमलों की वास्तविक शोभा (True Ornamentation) है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''धर्मनियन्ताओं का युगानुसार परिवर्तन (Shift of Normative Authorities)'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्लोक 24 में उल्लेख है—&amp;lt;blockquote&amp;gt;कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः । द्वापरे शङ्खलिखिती कली पाराशराः स्मृताः॥ (पाराशर स्मृति-24)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सत्ययुग में मनु के विधान (Manava Dharma) प्रचलित थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रेता में गौतम के नियम मान्य हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वापर में शंख और लिखित का अधिकार स्थापित हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कलियुग में महर्षि पराशर स्वयं धर्मनियन्ता (Normative Authority) माने गये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह परिवर्तन धर्म की ऐतिहासिकता (Historicity of Dharma) को सूचित करता है। धर्म कोई स्थिर (Static) तत्त्व नहीं, अपितु काल-सापेक्ष (Time-conditioned) व्यवस्था है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दण्ड-व्यवस्था में शिथिलीकरण (Penal Relaxation and Reformative Justice)'''&amp;lt;blockquote&amp;gt;त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत् । द्वापरे कुलमेकं तु कत्तारं च कलौ युगे ॥ (पाराशर स्मृति-25)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;श्लोक 25 के अनुसार - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* कृतयुग में देश-निर्वासन (Exile from Nation)&lt;br /&gt;
* त्रेता में ग्राम-निर्वासन (Village Banishment)&lt;br /&gt;
* द्वापर में कुल-बहिष्कार (Family Ostracism)&lt;br /&gt;
* कलियुग में प्रायश्चित्त (Expiatory Reform)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ दण्ड-नीति (Penology) में सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) स्पष्ट होता है। कलियुग में अपराधी को पुनर्वास (Rehabilitation) का अवसर प्रदान किया गया है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च। द्वापरे त्वत्रमादाय कलौ पतति कर्मणा ॥ (पाराशर स्मृति-26)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;श्लोक 26 में पापी के साथ संसर्ग (Association with Sinner) के नियमों का विवेचन है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* कृतयुग: सम्भाषण मात्र से पतन&lt;br /&gt;
* त्रेता: स्पर्श से पतन&lt;br /&gt;
* द्वापर: अन्नग्रहण से पतन&lt;br /&gt;
* कलियुग: केवल स्वयं के कर्म से पतन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह नैतिक उत्तरदायित्व (Moral Accountability) की व्यक्तिगतता (Individualization of Responsibility) को सूचित करता है। धर्म का केन्द्र बाह्य संसर्ग से हटकर आन्तरिक कर्तृत्व (Internal Agency) पर आ गया। पाराशर का यह प्रतिपादन स्पष्ट करता है कि - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* धर्म स्थिर न होकर परिस्थितिजन्य है।&lt;br /&gt;
* कठोरता के स्थान पर लोचशीलता को वरण किया गया।&lt;br /&gt;
* दण्ड से अधिक प्रायश्चित्त (Atonement) को महत्त्व दिया गया।&lt;br /&gt;
* बाह्याचार (External Conduct) से अधिक आन्तरिक नैतिकता (Inner Morality) को प्रधानता मिली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पाराशर-स्मृति में धर्म का स्वरूप विकासमान (Evolutionary), अनुकूलनीय (Adaptive) एवं समाजोपयोगी (Socially Relevant) है। युगानुसार धर्म के साधन, दण्ड-विधान, सामाजिक मर्यादा तथा आध्यात्मिक प्रभाव की यह क्रमिक शिथिलता (Gradual Relaxation) भारतीय धर्मशास्त्र की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता (Practical Wisdom) को प्रमाणित करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह प्रतिपादन आधुनिक विधिशास्त्र (Modern Jurisprudence) की उस धारणा से साम्य रखता है जिसमें विधि (Law) को समाज की आवश्यकताओं (Social Needs) के अनुरूप संशोधित किया जाता है। इस प्रकार पाराशर का दृष्टिकोण न केवल धार्मिक आचारसंहिता (Religious Code of Conduct) है, अपितु एक गतिशील सामाजिक-दर्शन भी है, जो काल, परिस्थिति और मानवीय क्षमता के अनुरूप धर्म की पुनर्व्याख्या का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रों के वर्ण्यविषय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''आचार -''' दैनिक आचार, सदाचार एवं दुराचार निर्णय आदि।&lt;br /&gt;
*'''आश्रम एवं''' '''वर्ण व्यवस्था -''' चारों आश्रमों एवं चारों वर्णों के कर्तव्याकर्तव्य विवेचन।&lt;br /&gt;
*'''नारी की स्थिति एवं धर्मशास्त्रीय अवधारणाएँ -''' नारी का धन, स्त्री का धर्म, स्त्रियों की पवित्रता, कन्या द्वारा पति वरण करना, अगम्या स्त्रियाँ, पत्नी की रक्षा, कन्या विक्रय का पाप, विधवा का धर्म आदि। न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते॥&lt;br /&gt;
*'''शुद्धि एवं पवित्रता -''' पात्र,वस्त्र, अन्न, भूमि, शुद्धि के साधन एवं उपाय, शरीर की शुद्धि एवं अन्य शुद्धियां।&lt;br /&gt;
*'''संस्कार -''' गर्भाधान, उपनयन, विवाह एवं अंत्येष्टि आदि संस्कार।&lt;br /&gt;
*'''दंड एवं प्रायश्चित -''' विदेश यात्रा, हत्या (वध), परस्त्रीगमन, सुरापान, स्वर्ण आदि चोरी का प्रायश्चित।&lt;br /&gt;
*'''विविध नियम एवं वृत्तियां -''' अभिवादन नियम, यज्ञोपवीत धारण विधि, आचमन एवं प्रक्षालन विधि, अशौच, तर्पण, स्नान, भोजन एवं दान विधि।&lt;br /&gt;
*'''प्रायश्चित -''' जप, तप, प्राणायाम एवं कृच्छ्रादि व्रत विधान&lt;br /&gt;
*'''प्रकीर्ण -''' संपत्ति का उत्तराधिकार एवं विभाजन, पुत्रों के प्रकार, भक्ष्याभक्ष्य एवं पेयापेय विचार, योग साधन आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे - स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0)&amp;diff=137557</id>
		<title>Dharmashastra (धर्मशास्त्र)</title>
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		<updated>2026-02-14T16:30:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परम्परा द्वारा समाज में धर्मसम्मत आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त, सामाजिक एवं वैयक्तिक कर्तव्य-अकर्तव्य आदि कर्मों के सुव्यवस्थित निर्धारण हेतु धर्मशास्त्र का प्रवर्तन हुआ तथा वैदिकसाहित्य में यह कल्प नामक वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित है। इस शास्त्र के अन्तर्गत मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, बृहस्पति, बौधायन, जीमूतवाहन, विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य आदि आचार्यों के सूत्र, स्मृतियाँ, भाष्य एवं समकालीन निबन्धात्मक प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति का मूल आधार धर्म है। विविध शास्त्रकारों ने धर्म शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं। धर्मशास्त्र में सामाजिक आचार-विचार, [[Varnashrama Dharma (वर्णाश्रमधर्मः)|वर्णाश्रम-धर्म]], [[Achara (आचार)|सदाचार]], [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]], राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य तथा शासन से सम्बन्धित नियम आदि का सुव्यवस्थित विवेचन किया गया है। धर्मशास्त्र शब्द दो पदों [[Dharma (धर्मः)|धर्म]] और [[Shastra Shikshana Paddhati (शास्त्रशिक्षणपद्धतिः)|शास्त्र]] के संयोग से निर्मित है। इन दोनों पदों के शाब्दिक अर्थों का ज्ञान आवश्यक है। धर्म शब्द पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध प्राच्यविद् पण्डित तारिणीश झा ने संस्कृत शब्दार्थ कोश में क्रमशः -&amp;lt;blockquote&amp;gt;ध्रियते लोकानेन, ध्रियते लोकाः वा तथा ध्रियते लोकान् ध्रियते पुण्यात्मान् इति वा। (शब्दकोश)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार व्युत्पत्ति करते हुए धृ धातु से मन प्रत्यय द्वारा धर्म शब्द की निष्पत्ति मानी है तथा इसके पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों प्रयोगों को स्वीकार किया है। शास्त्र शब्द का अर्थ भी उपर्युक्त शब्दकोशकार द्वारा प्रायः समान रूप में ग्रहण किया गया है। शास् धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से शास्त्र शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। विभिन्न विद्वानों ने इसके अर्थ क्रमशः आज्ञा, उपदेश, नियम, धार्मिक ग्रन्थ, वेद एवं धर्मशास्त्र तथा जनसामान्य के कल्याण हेतु विधि-विधान प्रतिपादित करने वाले ग्रन्थ आदि स्वीकार किए हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्र शब्द का तात्पर्य उस व्यवस्था से है, जो मनुष्य के आचार-व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, सामाजिक मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। सामान्यतः स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र का पर्याय माना जाता है। मनुस्मृति में यह प्रतिपादित किया गया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय-२, श्लोक-१०।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;भाषार्थ - [[Shruti (श्रुतिः)|श्रुति]] को [[Vedas (वेदाः)|वेद]] तथा [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृति]] को धर्मशास्त्र के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार [[Mukhya Smritis (मुख्य स्मृतियां)|स्मृतिग्रन्थों]] को धर्मशास्त्र की संज्ञा प्रदान की गई है तथा स्मृतिकारों को धर्मशास्त्रकार कहा गया है। इस प्रकार धर्मशास्त्र का मूलाधार [[Vaidika Vangmaya (वैदिकवाङ्मयम्)|वैदिक परम्परा]] में निहित है, परन्तु उसका व्यावहारिक स्वरूप सूत्र, स्मृति, भाष्य एवं निबन्धात्मक ग्रन्थों के माध्यम से विकसित हुआ है। धर्मशास्त्र से सम्बन्धित साहित्य मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है - धर्मसूत्र एवं स्मृतियाँ। वैदिक अध्ययन की परम्परा में छह [[Shad Vedangas (षड्वेदाङ्गानि)|वेदाङ्गों]] का विधान किया गया, जिन्हें [[Shiksha (शिक्षा)|शिक्षा]], [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प]], [[Vyakarana Vedanga (व्याकरणवेदाङ्गम्)|व्याकरण]], [[Nirukta (निरुक्त)|निरुक्त]], [[Chandas (छन्दस्)|छन्द]] एवं [[Jyotisha (ज्योतिष)|ज्योतिष]] कहा जाता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;छन्‍द: पादौ तु वेदस्‍य, हस्‍तौ कल्‍पोऽथ पठ्यते। ज्‍योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्‍तं श्रोत्रमुच्‍यते॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्‍य मुखं व्‍याकरणं स्‍मृतम्। तस्‍मात्‍सांगमधीत्‍यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय शिक्षा)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE/%E0%A4%85%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%83 पाणिनीय शिक्षा], खण्ड- ८, श्लोक- ४१-४२।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इनमें [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प वेदांग]] का विशेष स्थान है, शास्त्रीय दृष्टि से कल्प उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें यज्ञानुष्ठान का विधि-विधान एवं  धार्मिक संस्कारों के नियम बतलाये गये हैं। विष्णुमित्र ने कल्प का शाब्दिक अर्थ बताते हुए कहा है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्। (ऋक्प्रातिशाख्य वृत्ति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद में विहित कर्मों को क्रमबद्ध रूप में विवेचित करने वाला शास्त्र कल्प है। कल्पसूत्रों के अन्तर्गत चार प्रकार की सूत्र रचनाएं हैं - [[Shrautasutras (श्रौतसूत्राणि)|श्रौतसूत्र]], [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्यसूत्र]], [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]] तथा [[Shulbasutras (शुल्बसूत्राणि)|शुल्बसूत्र]]। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''श्रौतसूत्र''' - [[Vedas (वेदाः)|वेदों]] में वर्णित [[Yajna (यज्ञः)|यज्ञों]] की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''गृह्यसूत्र''' - [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्याग्नि]] में होने वाले यज्ञों एवं [[Upanayana (उपनयनम्)|उपनयन]], [[Vivaha (विवाहः)|विवाह]] आदि संस्कारों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''धर्मसूत्र''' - [[Ashram System (आश्रम व्यवस्था)|आश्रमों]] और [[Varna Dharma (वर्णधर्मः)|चारों वर्णों]], [[Achara (आचार)|धार्मिक आचारों]] एवं राजा के कर्तव्यों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''शुल्बसूत्र''' - [[Vedi (वेदिः)|वेदी]] के निर्माण की विधि आदि के प्रतिपादक ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार सम्पूर्ण [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प-वेदांग]] चार वर्गों में विभाजित किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शालिनी वर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/55290 वसिष्ठधर्मसूत्र-एक अनुशीलन] (२००८), भूमिका, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ (पृ० २-३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रीय वाङ्मय॥ Dharmasastric literature==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अन्तर्गत [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]], [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृतियाँ]], उन पर रचित टीकाएँ तथा निबन्धात्मक ग्रन्थ सम्मिलित किए जाते हैं। धर्मसूत्रों, स्मृतियों, टीकाओं एवं निबन्धों की संख्या अत्यन्त व्यापक मानी जाती है। इन मूल ग्रन्थों पर रचित लघु एवं विशाल दोनों प्रकार के ग्रन्थ भी धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अंतर्गत ही समाहित किए जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थी- संदीप कुमार गुप्त, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264949 चतुर्वर्ग की धर्मशास्त्रीय अवधारणा] (2011), शोधकेंद्र- छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० २२)।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसको तीन निश्चित कालों में विभक्त किया जा सकता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#प्रथम काल गौतम, वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रों का है, जो कि कल्प वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित हैं।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्रों के द्वितीय क्रम में मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृतियों का समावेश होता है।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्र का तृतीय क्रम स्मृतियों की प्राचीन टीकाएँ और निबन्ध ग्रन्थों का है, इनमें विश्वरूप, मेधातिथि और विज्ञानेश्वर आदि के नाम प्रमुख हैं साथ ही कृत्यकल्पतरु, स्मृतिचन्द्रिका, चतुर्वर्गचिन्तामणि चण्डेश्वर का रत्नाकर आदि ग्रन्थों को निबन्ध की श्रेणी में परिगणन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्वोक्त तीनों कालक्रम में परिगणित धर्मसूत्र, स्मृतियाँ, टीकाएँ तथा निबन्ध ग्रन्थ धर्मशास्त्रीय वाङ्मय में समावेश किये जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===धर्मसूत्रों का स्वरूप===&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय साहित्य का विकास मुख्यतः धर्मसूत्रों से प्रारम्भ होकर स्मृति एवं निबन्ध ग्रन्थों तक विस्तृत है। बौधायन, आपस्तम्ब, गौतम एवं वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रकारों ने धर्मसूत्रों के माध्यम से सामाजिक आचारों एवं विधिक मान्यताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, बृहस्पति आदि स्मृतिकारों ने धर्म के विविध पक्षों राजधर्म, व्यवहार, दण्ड, उत्तराधिकार, स्त्री-अधिकार एवं सामाजिक न्याय का विस्तृत विवेचन किया।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थिनी- रोली गुप्ता, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264777 बौधायन धर्मसूत्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१३), छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० ७-८)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्रों का वेद-विशेष से कोई निश्चित सम्बन्ध नहीं, ये स्वतंत्र रचनाएँ जैसी हैं। परन्तु जैसा कि डॉ० पी० वी० काणे ने उल्लेख किया है- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परम्परानुसार गौतमधर्मसूत्र का अध्ययन सामवेदी लोग करते थे, आपस्तम्ब के सूत्रों का अध्ययन तैत्तिरीय शाखा के अनुयायी गण करते थे और वसिष्ठधर्मसूत्र का अध्ययन ऋग्वेदी लोग करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि धर्मसूत्र स्वतन्त्र रचनाओं के रूप में थे। परन्तु बाद में भिन्न-भिन्न वेदों के अनुयायियों ने इन्हें अपनाकर अपना कल्प वेदांग अध्ययन पूरा किया। वर्तमान समय में केवल चार धर्मसूत्र ही उपलब्ध होते हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*गौतम धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
* वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनके अतिरिक्त तीन धर्मसूत्रों का और उल्लेख मिलता है- विष्णुधर्मसूत्र, हिरण्यकेशि धर्मसूत्र और वैखानसधर्मसूत्र। इनमें हिरण्यकेशि धर्मसूत्र आपस्तम्ब से ही अधिकांशतः मिलता-जुलता है। वैखानस मुख्यरूप से संन्यास व वानप्रस्थ आश्रमों के अध्ययन के लिए उपयोगी है। अतः अध्ययन की दृष्टि से केवल पाँच धर्मसूत्र ही उपयोगी है- गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन, वसिष्ठ और विष्णु धर्मसूत्र।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+धर्मसूत्र एवं उन पर लिखित भाष्य&lt;br /&gt;
!'''वेद'''&lt;br /&gt;
!शाखा&lt;br /&gt;
!धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
!विषय-वस्तु&lt;br /&gt;
!भाष्य एवं टीकाएं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;2&amp;quot; |ऋग्वेद&lt;br /&gt;
|शाकल&lt;br /&gt;
|वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|३० अध्याय, सूत्र एवं श्लोक-दोनों रूपों में&lt;br /&gt;
|कृष्ण पण्डित धर्माधिकारी का भाष्य, जिसे विद्वन्मेदिनी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|कौषीतकि&lt;br /&gt;
|विष्णु&lt;br /&gt;
|१०० अध्याय&lt;br /&gt;
|नन्द पण्डित (वैजयन्ती व्याख्या), भारुचि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!शुक्ल&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
|_&lt;br /&gt;
|हारीत&lt;br /&gt;
|३० अध्याय&lt;br /&gt;
|लघु हारीत स्मृति तथा वृद्ध हारीत स्मृति से सम्बद्ध&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कृष्ण&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |तैत्तिरीय&lt;br /&gt;
|बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|चार प्रश्न (जिनमें से केवल दो को मूल माना जाता है)&lt;br /&gt;
|गोविन्दस्वामी का भाष्य (विवरण)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब कल्प के 28वें एवं 29वें प्रश्न (1364 सूत्र एवं 30 श्लोक)&lt;br /&gt;
|हरदत्त (उज्ज्वलवृत्ति), धूर्तस्वामी तथा शंकर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि कल्प के 26वें एवं 27वें प्रश्न&lt;br /&gt;
|महादेव दीक्षित (वैजयन्ती)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|वैखानस धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
| वैखानस स्मार्तसूत्र के 3 प्रश्न (51 काण्ड एवं 365 सूत्र)&lt;br /&gt;
|कोई भाष्य उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!सामवेद&lt;br /&gt;
|राणायनीय शाखा&lt;br /&gt;
|गौतम धर्मसूत्र (चरणव्यूह के अनुसार)&lt;br /&gt;
|२८ अध्याय, सूत्ररूप में रचित&lt;br /&gt;
|हरदत्त (मिताक्षरा) असहाय, भारत्यज्ञ, मस्करी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!अथर्ववेद&lt;br /&gt;
| colspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कोई धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कल्पसूत्रों में धर्मसूत्रों को तीसरे वर्ग में रखा गया है। धर्मसूत्रों का गृह्यसूत्रों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन दोंनों के विषयों में कुछ समानता भी है। यथा-उपनयन, अनध्याय, विवाह, श्राद्ध, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, महायज्ञ आदि। धर्मसूत्रों में इनके सामाजिक नियमों प्रतिबन्धों व रीतियों का उल्लेख है। जबकि गृह्यसूत्रों में विधि व अनुष्ठान का वर्णन है। किन्तु धर्मसूत्रों में जहाँ गृह्यकर्मों से सम्बन्धित सूत्र हैं, वहीं धर्मसूत्रों का विषय अधिक व्यापक है। वे मानव के आचरण सम्बन्धी नियमों का विवेचन करते हैं। संक्षेप में धर्मसूत्रों का मुख्य विषय मानव जीवन के विविध पक्षों के कर्त्तव्यों का ज्ञान कराना है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===स्मृति ग्रंथो की अवधारणा===&lt;br /&gt;
मनु का वचन 'धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः' इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि धर्मशास्त्र मूलतः स्मृति-परम्परा से सम्बद्ध हैं। अर्थात् जितने भी धर्मशास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी स्मृति-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। इन धर्मशास्त्रों के कर्त्ताओं एवं उनकी परम्परा का विवेचन पराशर स्मृति में प्राप्त होता है। पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पे कल्पे क्षयोत्पत्त्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।  श्रुतिस्मृतिसमाचारनिर्णेतारश्च सर्वदा॥ (पराशर स्मृति 1.20)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot;&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० २०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक पर स्मृतिमुक्ताफल में टीका करते हुए कहा गया है कि सृष्टि और प्रलय का यह क्रम प्रत्येक महाकल्प एवं अवांतर कल्प में निरन्तर चलता रहता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देवता महाकल्प के अन्त में लीन होते हैं और नये महाकल्प के प्रारम्भ में पुनः प्रकट होते हैं। स्मृतिमुक्ताफल में टिप्पणी प्राप्त होती है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;क्षयसहिता उत्पत्तिः क्षयोत्पत्तिः। तयोपलाक्षता भवंति कल्पे कल्पे महाकल्पे अवांतरकल्पे च। ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा महाकल्पावसाने क्षीयंते महाकल्पादावुत्पद्यंते। एवमवांतरकल्पानामवसाने प्रारंभे च स्मृत्यादीनां निर्णेतारो मन्वादयः क्षयोत्पत्तिभ्यामुपलक्ष्यंते। चकारेणानुक्तो धर्मः समुच्चीयते। सर्वदेत्यनेन सृष्टिसंहारप्रवाहस्यानादित्वमनंतत्वं च दर्शितम्। स एव॥ (स्मृति मुक्ताफलम् १।२१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;वैद्यनाथ दीक्षितीय, [https://ia801409.us.archive.org/9/items/in.ernet.dli.2015.486485/2015.486485.Smrtimuktaphalama-part-1_text.pdf स्मृतिमुक्ताफलम्], वर्णाश्रमधर्मकाण्डम् (1937), विश्वनाथ जगन्नाथ घारपुरे (पृ० ११)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार श्रुति और स्मृति के निर्णायक मनु आदि भी प्रत्येक कल्प के आरम्भ और अन्त में प्रकट एवं विलीन होते रहते हैं। यहाँ &amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt;सर्वदा&amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt; पद के माध्यम से सृष्टि–प्रलय की अनादि और अनन्त परम्परा का संकेत किया गया है। आगे पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;न कश्चिद्वेदकर्त्ता च वेदं श्रुत्वा चतुर्मुखः। तथैव धर्मान् स्मरति मनुः कल्पांतरे तथा॥ (पराशर स्मृति 1. 21)&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक की टीका में स्मृतिमुक्ताफलकार स्पष्ट करते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पांतरे धर्मान् स्मरति इति पत्रयं पूर्वार्धेऽपि संबध्यते। महाकल्पे चतुर्मुखः परमेश्वरेण दत्तं वेदं श्रुत्त्वा तत्र विप्रकीर्णान्वर्णाश्रमादिधर्मान्स्मृतिग्रंथरूपेण उपनिबध्नाति तथैव स्वायंभुवो मनुः प्रत्यवांतरकल्पं वेदोक्तधर्मान्ग्रथ्नाति। मनुग्रहणेनात्रिविष्ण्वाद्य उपलक्ष्यंते। (स्मृति मुक्ताफलम्)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;quot;कल्पान्तरे धर्मान् स्मरति&amp;quot; यह पद पूर्ववर्ती वाक्य से सम्बद्ध है। प्रत्येक महाकल्प के प्रारम्भ में चतुर्मुख ब्रह्मा परमेश्वर से प्राप्त वेद को सुनते हैं और उसमें वर्णित वर्णाश्रम आदि धर्मों को स्मृति-ग्रन्थों के रूप में व्यवस्थित करते हैं। इसी प्रकार स्वायम्भुव मनु प्रत्येक अवांतर कल्प में वेदोक्त धर्मों को स्मरण कर स्मृति-रूप में स्थापित करते हैं। यहाँ मनु शब्द से मात्र एक व्यक्ति नहीं, अपितु अत्रि, विष्णु, पराशर आदि सभी धर्मशास्त्रकारों का भी संकेत होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० दिलीप कुमार नाथाणी, [https://ijesrr.org/publication/83/1.%20ijesrr%20june%202022.pdf स्मृति-धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के रचनाकार] (२०२२), इण्टरनेशनल जर्नल ऑफ एजुकेशन एण्ड साइंस रिसर्च रिव्यू (पृ० ३४९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''स्मृतियों की संख्या'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्धकारों एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा में स्मृतियों की संख्या को लेकर विभिन्न मत प्राप्त होते हैं। कुछ परम्पराओं में 36 स्मृतियों का उल्लेख है, तो कहीं यह संख्या और अधिक बतायी गयी है। वर्तमान में उपलब्ध स्मृतियों की संख्या सौ से भी अधिक मानी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधाता- सुभाष वी. वसोया, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/521411 धर्मशास्त्रानुसारेण आचारस्य एकं समीक्षात्मकम् अध्ययनम्] (२०१८), द्वितीय अध्याय, श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात (पृ० १४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{columns-list|colwidth=15em|style=width: 800px; font-style: normal;|&lt;br /&gt;
# अत्रिस्मृति &lt;br /&gt;
# अरुणस्मृति &lt;br /&gt;
# अगस्त्यस्मृति &lt;br /&gt;
# आंगिरसस्मृति (पूर्वागिरस, उत्तरांगिरस)&lt;br /&gt;
# आत्रेयस्मृति&lt;br /&gt;
# आस्तम्बस्मृति&lt;br /&gt;
# आश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ईशानस्मृति&lt;br /&gt;
# इन्द्रदत्तस्मृति&lt;br /&gt;
# उपकश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# उपांगिरसस्मृति&lt;br /&gt;
# औपजंघनस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनसस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनस संहिता&lt;br /&gt;
# ऋतुपर्णस्मृति&lt;br /&gt;
# ऋष्यश्रृंग स्मृति&lt;br /&gt;
# कणादस्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिञ्जलस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिल स्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वषस्मृति&lt;br /&gt;
# कश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# कवसस्मृति&lt;br /&gt;
# कात्यायनस्मृति&lt;br /&gt;
# काष्र्णाजिनस्मृति&lt;br /&gt;
# कुमारस्मृति&lt;br /&gt;
# कोकिलस्मृति&lt;br /&gt;
# कौत्सस्मृति&lt;br /&gt;
# कुतुस्मृति &lt;br /&gt;
# गर्गस्मृति&lt;br /&gt;
# गव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# गोभिलरमृति&lt;br /&gt;
# गौतम स्मृति&lt;br /&gt;
# चन्द्रस्मृति&lt;br /&gt;
# च्यवनरमुति&lt;br /&gt;
# छागल्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जमदग्निस्मृति&lt;br /&gt;
# जातुकर्ण्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जाबालीस्मृति&lt;br /&gt;
# दक्षरमृति&lt;br /&gt;
# दाल्भ्यस्मृति&lt;br /&gt;
# देवलस्मृति&lt;br /&gt;
# नाचिकेतस्मृति&lt;br /&gt;
# नारदस्मृति&lt;br /&gt;
# नारायणस्मृति&lt;br /&gt;
# पराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# पारस्करस्मृति&lt;br /&gt;
# पितामहस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्त्यस्मृति&lt;br /&gt;
# पैठीनसिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रजापतिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रह्लादरमृति&lt;br /&gt;
# प्राचेतसरमृति&lt;br /&gt;
# बादरायणस्मृति&lt;br /&gt;
# बाहस्पत्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बुधस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहत्पाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्रद्यमस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्वसिष्ठ स्मृति&lt;br /&gt;
# बृह‌द्विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# बैजवापरमृति&lt;br /&gt;
# बौधायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ब्रह्मोक्तयाज्ञवल्क्य स्मृति&lt;br /&gt;
# ब्राह्मणवधस्मृति&lt;br /&gt;
# भारद्वाजरमृति&lt;br /&gt;
# भूगुस्मृति&lt;br /&gt;
# मनुस्मृति&lt;br /&gt;
# मरीचिस्मृति&lt;br /&gt;
# माण्डव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# मार्कण्डेयस्मृति&lt;br /&gt;
# मुद्गलस्मृति&lt;br /&gt;
# मृत्युञ्जय स्मृति&lt;br /&gt;
# यमस्मृति&lt;br /&gt;
# याज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुपाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुबृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुव्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशंखस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशौनकस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वत्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वाश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुयमस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुहारितस्मृति&lt;br /&gt;
# लिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# लोमशस्मृति&lt;br /&gt;
# लोहितस्मृति&lt;br /&gt;
# लौगाक्षिस्मृति&lt;br /&gt;
# वत्सरमृति&lt;br /&gt;
# वभ्रूरमृति&lt;br /&gt;
# वसिष्ठस्मृति&lt;br /&gt;
# वाधूलस्मृति&lt;br /&gt;
# वाराहीस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वामित्रस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वेश्वरस्मृति&lt;br /&gt;
# विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धगौतम&lt;br /&gt;
# वृद्धशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धहारीतस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धात्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# वैखानसस्मृति&lt;br /&gt;
# वैजवापस्मृति&lt;br /&gt;
# वैशम्पायनस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यवहारांगस्मृति&lt;br /&gt;
# व्याघ्रस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# शकिलरमृति&lt;br /&gt;
# शंखस्मृति&lt;br /&gt;
# शतक्रतुस्मृति&lt;br /&gt;
# शन्तनुस्मृति &lt;br /&gt;
# शंखलिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकलस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकटायनस्मृति&lt;br /&gt;
# शातातपरमृति&lt;br /&gt;
# शाट्यायनस्मृति &lt;br /&gt;
# शाण्डिल्यस्मृति &lt;br /&gt;
# शुन क्षेपस्मृति &lt;br /&gt;
# शुनःपुच्छस्मृति &lt;br /&gt;
# शूद्रस्मृति &lt;br /&gt;
# शौनकस्मृति &lt;br /&gt;
# षण्मुखस्मृति &lt;br /&gt;
# संवर्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सत्यव्रतस्मृति &lt;br /&gt;
# सदाचारस्मृति &lt;br /&gt;
# सप्तर्षिस्मृति &lt;br /&gt;
# सनत्कुमारस्मृति &lt;br /&gt;
# स्कन्दस्मृति &lt;br /&gt;
# सांख्यायनरमृति&lt;br /&gt;
# सुमन्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सोमरमृति &lt;br /&gt;
# हारितस्मृति &lt;br /&gt;
# होरिलस्मृति }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निष्कर्षतः हम देखते हैं कि स्मृतियों की संख्या जितनी वर्तमान में प्राप्त हो रही है उससे कई अधिक हों। तात्पर्य है कि स्मृतियाँ हमारे सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, पारिवारिक, आदि सभी भावों का मार्ग प्रशस्त करने वाले ग्रन्थ हैं। भारतीय जनमानस का जीवन इन्हीं स्मृतियों के अनुसार प्रवृत्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उपस्मृति परम्परा'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य स्मृतियों के अतिरिक्त अनेक उपस्मृतियों का भी उल्लेख धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है। ये उपस्मृतियाँ मूल स्मृतियों का विस्तार अथवा विशिष्ट विषयों पर केन्द्रित व्याख्या के रूप में देखी जा सकती हैं। जाबालि, आपस्तम्ब, बौधायन, कणाद, वैशम्पायन आदि के नाम उपस्मृति कर्ताओं के रूप में उल्लिखित हैं। अंगिरा स्मृति में भी धर्मशास्त्रकारों को लिखा है, परन्तु अंगिरा ने जिनका नामोल्लेख किया है, उन्हें उपस्मृतिकार कहा है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कंदो लोगाक्षिकाश्यपौ। व्यासः सनत्कुमारश्च शंतनुर्जनकस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकर्णिः कपिंजलः। बोधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च। पैठीनसीर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः॥ (अंगिरा स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' जाबालि, नचिकेता, स्कंद, लोगाक्षि, कश्यप, व्यासः, सनत्कुमार, शंतनु, जनक, व्याघ्र, कात्यायन, जातुकर्णि, कपिंजल, बोधायन, कणाद, विश्वामित्र, पैठीनसि, गोभिल। ये सभी उपस्मृतिकार हैं। उपस्मृतियों के माध्यम से धर्मशास्त्रीय परम्परा अधिक व्यापक होती है, जिससे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का समावेश सम्भव हो पाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===टीका, भाष्य एवं निबन्ध ग्रन्थ===&lt;br /&gt;
किसी धर्मसूत्र या स्मृति के आधार पर उसका अर्थ करने के लिए लिखी गई रचना टीका है। इनमें किसी प्रकार का विभाजन नहीं किया जा सकता, क्योंकि दोनों ही किसी एक धर्मसूत्र या स्मृति के आधार पर रचित हैं। निबन्ध-ग्रंथों में किसी एक सूत्रकार अथवा स्मृतिकार को आधार बनाने की अपेक्षा किसी विशिष्ट विषय को ही आधार के रूप में ग्रहण किया जाता है। तत्पश्चात उस विषय से संबंधित पूर्ववर्ती विभिन्न आचार्यों के वचनों का संकलन एवं समन्वय प्रस्तुत किया जाता है। यही पद्धति टीका भाष्य और निबन्ध ग्रन्थ की संरचनात्मक विशेषता को स्पष्ट करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः टीका, भाष्य तथा निबन्ध के मध्य स्पष्ट विभाजन-रेखा निर्धारित करना कठिन प्रतीत होता है। उदाहरणतः शंकर भट्ट के द्वैतनिर्णय में विज्ञानेश्वर को निबन्धकारों में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है, जबकि सामान्य परम्परा में वे याज्ञवल्क्य स्मृति के टीकाकार के रूप में विख्यात हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भाष्य और निबन्ध दोनों ही धर्मसूत्रों अथवा स्मृतियों में निहित आचार्यों के परस्पर विरोधी अथवा असंगत प्रतीत होने वाले वचनों का समाधान एवं समन्वय करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्ध-साहित्य के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि उनमें श्रुति की अपेक्षा स्मृतियों और पुराणों के उद्धरण अधिक मात्रा में मिलते हैं। जहाँ स्मृतियों के लिए श्रुति प्रमुख प्रमाण मानी जाती थी, वहीं निबन्धों के संदर्भ में स्मृतियाँ अधिक प्रामाणिक आधार बन गईं। इसका एक कारण यह प्रतीत होता है कि स्मृतियाँ जनसामान्य के लिए अधिक सुलभ एवं ग्राह्य थीं, जबकि वेद कालान्तर में सामान्य समाज की प्रत्यक्ष बौद्धिक पहुँच से अपेक्षया दूर होते चले गए तथा उनके वास्तविक तात्पर्य को ग्रहण करने वाले विद्वानों की संख्या सीमित रह गई।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधात्री- सुधा सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/552143 स्मृति परम्परा और पराशर स्मृति - एक अध्ययन](सन् २०१२), अध्याय-१, शोध केन्द्र - संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग - लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ (पृ० १२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेधातिथि द्वारा रचित मनुभाष्य (मनुस्मृति पर भाष्य) तथा याज्ञवल्क्यस्मृति पर विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा टीका आदि ग्रंथों को भी व्यापक अर्थ में धर्मशास्त्रीय साहित्य की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। यद्यपि ये मूल स्मृतियाँ नहीं हैं, तथापि इनके माध्यम से धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन, व्याख्या तथा व्यवहारिक प्रतिपादन किया गया है, अतः इनका स्थान धर्मशास्त्र-परम्परा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्षेत्रीय दृष्टि से भी धर्मशास्त्रीय निबन्ध-साहित्य का विकास उल्लेखनीय है -  &lt;br /&gt;
*उत्तर भारत: काशीनाथ उपाध्याय का कार्य - धर्मसिंधु।&lt;br /&gt;
*महाराष्ट्र: विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका और कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु।&lt;br /&gt;
* दक्षिण भारत: वैद्यनाथ दीक्षित का वैद्यनाथ-दीक्षितीयम इसको  स्मृतिमुक्ताफल ग्रंथ के रूप में भी जानते हैं।&lt;br /&gt;
*संन्यास आश्रम में स्थित जन: विद्येश्वर-संहिता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रकारों की परम्परा==&lt;br /&gt;
याज्ञवल्क्य स्मृति में जब धर्मशास्त्रकार के रूप में पाराशर और व्यास का नामोल्लेख मिलता है, तब यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि इन धर्मशास्त्रकारों के मध्य कोई कालक्रम (पौर्वापर्य) निर्धारित नहीं किया जा सकता। मनु द्वारा धर्म के स्वरूप का प्रतिपादन किए जाने के पश्चात् अन्य धर्मशास्त्रकारों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण और सामाजिक संदर्भों के अनुसार धर्म का विवेचन किया। इसी कारण कलियुग के धर्मशास्त्रकार माने जाने वाले पराशर का उल्लेख याज्ञवल्क्य द्वारा किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी परम्परा का समर्थन पराशर-स्मृति में भी प्राप्त होता है, जहाँ व्यास विभिन्न धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख करते हुए अपने पिता से यह कहते हैं कि उन्होंने उन सभी आचार्यों द्वारा प्रतिपादित धर्म का अध्ययन कर लिया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;धर्मकथय मे तातानुग्राह्यो ह्यहं तव। श्रुता मे मानवा धर्मो वासिष्ठा काश्यपास्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्गेया गौतमीयाश्च तथाञ्चोशनसास्मृताः। अत्रेर्विष्णोश्च संवर्ताद् दक्षादंगिरसस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शातातपाच्च हारीताद् याज्ञवल्क्यात्तथैव च। आपस्तम्बकृता धर्माः शंखस्य लिखितस्य च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्यस्मृति], आचार अध्याय, उपोद्घातप्रकरण, श्लोक ४-५।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रों के वर्ण्यविषय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''आचार -''' दैनिक आचार, सदाचार एवं दुराचार निर्णय आदि।&lt;br /&gt;
*'''आश्रम एवं''' '''वर्ण व्यवस्था -''' चारों आश्रमों एवं चारों वर्णों के कर्तव्याकर्तव्य विवेचन।&lt;br /&gt;
*'''नारी की स्थिति एवं धर्मशास्त्रीय अवधारणाएँ -''' नारी का धन, स्त्री का धर्म, स्त्रियों की पवित्रता, कन्या द्वारा पति वरण करना, अगम्या स्त्रियाँ, पत्नी की रक्षा, कन्या विक्रय का पाप, विधवा का धर्म आदि। न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते॥&lt;br /&gt;
*'''शुद्धि एवं पवित्रता -''' पात्र,वस्त्र, अन्न, भूमि, शुद्धि के साधन एवं उपाय, शरीर की शुद्धि एवं अन्य शुद्धियां।&lt;br /&gt;
*'''संस्कार -''' गर्भाधान, उपनयन, विवाह एवं अंत्येष्टि आदि संस्कार।&lt;br /&gt;
*'''दंड एवं प्रायश्चित -''' विदेश यात्रा, हत्या (वध), परस्त्रीगमन, सुरापान, स्वर्ण आदि चोरी का प्रायश्चित।&lt;br /&gt;
*'''विविध नियम एवं वृत्तियां -''' अभिवादन नियम, यज्ञोपवीत धारण विधि, आचमन एवं प्रक्षालन विधि, अशौच, तर्पण, स्नान, भोजन एवं दान विधि।&lt;br /&gt;
*'''प्रायश्चित -''' जप, तप, प्राणायाम एवं कृच्छ्रादि व्रत विधान&lt;br /&gt;
*'''प्रकीर्ण -''' संपत्ति का उत्तराधिकार एवं विभाजन, पुत्रों के प्रकार, भक्ष्याभक्ष्य एवं पेयापेय विचार, योग साधन आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे - स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Livelihood_(%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE)&amp;diff=137556</id>
		<title>Livelihood (आजीविका)</title>
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		<updated>2026-02-10T11:15:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परंपरा में आजीविका अथवा जीवन-वृत्ति मात्र आर्थिक दायित्व न होकर एक विस्तृत नैतिक, सामाजिक और धर्मसंबद्ध अवधारणा है। धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा नीतिग्रंथ इस विषय को कर्तव्य, उत्तरदायित्व और सामाजिक संतुलन के रूप में निरूपित करते हैं। प्रस्तुत लेख में जीवन-वृत्ति की संकल्पना, उसके शास्त्रीय आधार, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व तथा आधुनिक संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
मानव जीवन की निरंतरता का मूल आधार जीवन-वृत्ति है। भारतीय परंपरा में जीविका केवल आत्मनिर्वाह का साधन नहीं, अपितु समाज और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। भरण-पोषण का प्रश्न तभी उत्पन्न होता है जब व्यक्ति आश्रित संबंधों - जैसे माता-पिता, पत्नी, संतान, वृद्ध एवं दुर्बल जन के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है। शास्त्रों ने इसे धर्म का अनिवार्य अंग माना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आजीविका की संकल्पना॥ Concept of livelihood==&lt;br /&gt;
भारतीय धर्मशास्त्रीय परंपरा में मानव जीवन के सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक आयामों का समन्वित विधान प्रस्तुत करती है। जीवन-वृत्ति अथवा भरण-पोषण का प्रश्न इसमें केवल जीविका अर्जन तक सीमित नहीं है, अपितु धर्म, नीति और सामाजिक उत्तरदायित्व से गहराई से जुड़ा हुआ है। धर्मशास्त्रमें प्रतिपादित धनागमन के सात धर्मयुक्त स्रोत तथा आजीविका के दस मान्य साधनों का विश्लेषण किया गया है, साथ ही उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मनुस्मृति में धनागमन स्रोत'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुस्मृति में धनागमन के सात साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है, जिन्हें सभी वर्णों के लिए सामान्य रूप से स्वीकार किया गया है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः। प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च॥ (मनुस्मृति १०.११५)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनुस्मृति], अध्याय 10, श्लोक 115।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;धर्मसम्मत धन प्राप्ति के  दाय, लाभ, क्रय, जय, प्रयोग, कर्मयोग तथा सत्प्रतिग्रह ये सात प्रकार के साधन बताए गए हैं। इन सातों को धर्मानुकूल माना गया है और इन्हीं माध्यमों से अर्जित धन को शास्त्रसम्मत एवं पवित्र कहा गया है। इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दाय॥ Inheritance -''' धर्मयुक्त उत्तराधिकार द्वारा प्राप्त संपत्ति दाय कहलाती है। यह पारिवारिक संपत्ति का वैध और नैतिक हस्तांतरण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''लाभ॥ Gains -''' मित्रों, संबंधियों अथवा समाज से प्राप्त उपहार, सहयोग अथवा सहायता द्वारा अर्जित धन लाभ की श्रेणी में आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''क्रय॥ Purchase / Exchange -''' अपने धन से क्रय-विक्रय कर प्राप्त संपत्ति क्रय कहलाती है। यह व्यापार और विनिमय का धर्मसम्मत रूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जय॥ Victory -''' धर्मयुक्त युद्ध या प्रतियोगिता में प्राप्त संपत्ति जय मानी जाती है। यह विशेषतः क्षत्रिय वर्ग से संबद्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रयोग॥ Investment / Lending -''' अपने धन को अन्य कार्यों में लगाकर उससे आय प्राप्त करना प्रयोग कहलाता है, जैसे ब्याज, साझेदारी अथवा निवेश।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''कर्मयोग॥ Labour and Profession -''' कृषि, उद्योग, शिल्प, पशुपालन आदि श्रम आधारित कार्यों से अर्जित धन कर्मयोग के अंतर्गत आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सत्प्रतिग्रह॥ Honourable Acceptance -''' धर्मयुक्त रूप से प्राप्त दान या वेतन को सत्प्रतिग्रह कहा गया है, विशेषतः ब्राह्मणों के लिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनु के अनुसार, इन स्रोतों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार का धन अधर्मजन्य  माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आजीविका के साधन==&lt;br /&gt;
नागरिक के जीवन-निर्वाह हेतु आर्थिक संसाधनों की अनिवार्य आवश्यकता होती है। जिन कार्यों के माध्यम से व्यक्ति को जीवनयापन की आवश्यक सुविधाएँ सुलभ होती हैं, वे उसकी आजीविका के साधन कहलाते हैं। समाज में विभिन्न व्यक्तियों के पास भिन्न-भिन्न प्रकार की क्षमताएँ, रुचियाँ तथा योग्यताएँ पाई जाती हैं। शिक्षा के माध्यम से इन अंतर्निहित क्षमताओं का परिष्कार कर उनका सम्यक् विकास किया जाता है, जिससे व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुरूप आजीविका अर्जित करने में समर्थ होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सर्वविदित है कि सम्पूर्ण समाज एक ही प्रकार की आजीविका पर आधारित नहीं रह सकता। ऐसा न तो व्यावहारिक है और न ही सामाजिक संतुलन की दृष्टि से संभव। इसी कारण मनुस्मृति में मानव जीवन के निर्वाह हेतु विविध प्रकार की आजीविकाओं का उल्लेख किया गया है। मनु के अनुसार, विभिन्न स्वभाव, क्षमता एवं परिस्थितियों में स्थित मनुष्यों के लिए पृथक-पृथक आजीविका-मार्ग निर्धारित किए गए हैं, क्योंकि सभी मनुष्यों का जीवन किसी एक ही प्रकार की आजीविका से संचालित नहीं हो सकता। मनुस्मृति में जीवन-निर्वाह हेतु दस प्रकार की आजीविकाओं का उल्लेख मिलता है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्यं विपणिः कृषिः। धृतिर्भैक्षं कुसीदं च दश जीवनहेतवः॥ (मनुस्मृति 10.116)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनुस्मृति], अध्याय 10, श्लोक 116।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' विद्या (ज्ञानार्जन), शिल्प (कला-कौशल), भृति (वेतन या आजीविका हेतु किया गया कार्य), सेवा (किसी के अधीन की गई सेवा), गोरक्षा (पशुपालन), विपणि (व्यापार), कृषि (खेती), धृति (धैर्यपूर्वक संचय/स्वावलम्बन), भैक्ष (भिक्षा) तथा कुसीद (ऋण या सूद पर दिया गया धन) - ये दस मनुष्य के जीवन-निर्वाह के साधन कहे गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''विद्या -''' विद्या से अभिप्राय वेदविद्या से है, अर्थात् संसार की विविध क्रियाओं, नियमों और व्यवस्थाओं का सम्यक् ज्ञान। इस विद्या के अन्तर्गत शिक्षा, कल्प (अनुष्ठान-विधान), इतिहास, व्याकरण, ज्योतिष (खगोल एवं अंतरिक्ष विज्ञान), निरुक्त (वेदपदों की व्याख्या) तथा तर्क आदि शास्त्र सम्मिलित हैं। यह विद्या अध्ययन-अध्यापन के रूप में ग्रहण की जाती थी। इसके माध्यम से समाज को आध्यात्मिक, बौद्धिक एवं व्यावहारिक मार्गदर्शन प्राप्त होता था तथा इसी के द्वारा आजीविका हेतु आवश्यक वस्तुएँ और साधन उपलब्ध होते थे। ज्ञानार्जन एवं शिक्षण के माध्यम से आजीविका अर्जन, इसमें वेद, शास्त्र, व्याकरण, तर्क, खगोल, चिकित्सा आदि सम्मिलित हैं।&lt;br /&gt;
#'''शिल्प -''' शिल्प से तात्पर्य सभी प्रकार की कलाओं एवं तकनीकी कौशलों से है। इसके अन्तर्गत निर्माण-कार्य, वास्तु एवं शिल्पकला, वस्त्र-निर्माण तथा वस्त्रों को सुगन्धित करने जैसी विधियाँ आती हैं। आधुनिक परिभाषा में इन्हें इंजीनियर, आर्ट-डिज़ाइनर, शिल्पकार आदि कहा जा सकता है। सभी प्रकार के कुटीर उद्योग, लघु एवं हस्तशिल्प उद्योग, नाट्यकला, नृत्य, गायन, वादन, अभिनय तथा जनसम्पर्क और विज्ञापन से सम्बद्ध कलाएँ भी शिल्प के अन्तर्गत ही मानी जाती हैं। इसी प्रकार योद्धा वर्ग अपनी युद्धकला एवं रक्षा-कौशल के प्रतिफलस्वरूप धन प्राप्त कर आजीविका का निर्वाह करता था। इस प्रकार शिल्प जीवन-यापन का एक महत्त्वपूर्ण एवं बहुआयामी साधन रहा है। निर्माण, हस्तकला, तकनीकी एवं कलात्मक कार, आधुनिक संदर्भ में इसे इंजीनियरिंग, डिजाइन और तकनीकी सेवाओं से जोड़ा जा सकता है।&lt;br /&gt;
#'''भृति -''' वेतन या पारिश्रमिक के रूप में सेवा करके जीवन-यापन करना है। भृति का तात्पर्य प्रैष्यभाव के अंतर्गत पारिश्रमिक प्राप्त करने से है। अर्थात् किसी विशेष संवाद, आदेश अथवा सन्देश के प्रेषण और प्रत्यावर्तन के प्रतिफलस्वरूप वेतन ग्रहण करना। प्राचीन समाज में यह कार्य प्रायः उन व्यक्तियों द्वारा किया जाता था जो राजपुरुषों, उच्चाधिकारियों अथवा प्रतिष्ठित व्यक्तियों के दूत के रूप में सन्देश लाने–ले जाने का दायित्व निभाते थे। व्यापारिक एवं वाणिज्यिक सन्देशों का आदान-प्रदान भी इसी श्रेणी में सम्मिलित माना जाता था।&lt;br /&gt;
#'''सेवा -''' दूसरों की सहायता एवं संरक्षण के बदले प्राप्त आय, जिसमें राजकीय और निजी सेवाएँ सम्मिलित हैं। सेवा का अर्थ है पराश्रय जीवन, अर्थात् दूसरे की आज्ञा का पालन करते हुए उसके अधीन कार्य करना और उसके प्रतिफलस्वरूप धन या वेतन प्राप्त करना। राज्य से सम्बन्धित सभी शासकीय सेवाएँ तथा व्यक्तिगत रूप से की जाने वाली निजी सेवाएँ (नौकरियाँ) इसी श्रेणी में आती हैं। इसके अतिरिक्त, विविध प्रकार की दैनिक मजदूरी भी सेवा-वृत्ति के अन्तर्गत ही मानी जाती है। धर्मशास्त्रीय परम्परा में यह कार्य प्रायः शूद्रों द्वारा किया जाने वाला बताया गया है। वर्तमान समय में भी जो व्यक्ति इस प्रकार की आजीविका को अपनाते हैं, उन्हें शास्त्रीय दृष्टि से शूद्र-वर्ग में परिगणित किया जाता है।&lt;br /&gt;
#'''गोरक्षा -''' पशुपालन एवं कृषि-आधारित आजीविका, विशेषतः गौ-पालन आदि। गोरक्षण - पशुपालन को गोरक्षण कहा गया है। इसके अंतर्गत गाय, बैल, भैंस आदि विविध पशुओं का पालन-पोषण कर उनसे दुग्ध, घृत, गोमय, कृषि-सहायता आदि के माध्यम से आय प्राप्त करना सम्मिलित है। भारतीय समाज में गोरक्षण को न केवल आर्थिक आजीविका का साधन माना गया, अपितु धार्मिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी इसे अत्यन्त पवित्र कर्म स्वीकार किया गया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में इसका विशेष महत्व रहा है।&lt;br /&gt;
#'''विपणि -''' व्यापार, वस्तुओं का क्रय-विक्रय। वस्तुओं के क्रय-विक्रय द्वारा आय अर्जन करना ‘विपणि’ कहलाता है। यह कृषि से भिन्न एक स्वतंत्र आजीविका-साधन माना गया, जिसमें व्यापार, वाणिज्य, बाजार व्यवस्था तथा दूरस्थ क्षेत्रों के साथ लेन-देन सम्मिलित था। प्राचीन भारत में व्यापार को समृद्धि का प्रमुख माध्यम माना गया और समाज के आर्थिक संतुलन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।&lt;br /&gt;
#'''कृषि -''' भूमि पर श्रम कर अन्न एवं अन्य उत्पादों का उत्पादन। भूमि में बीज बोकर अन्न एवं अन्य वनस्पतियों का उत्पादन करना कृषि कहलाता है। यह आय प्राप्ति का प्रमुख साधन रहा है, जिसमें समाज का एक बड़ा वर्ग संलग्न था। भारतीय सामाजिक-आर्थिक संरचना में कृषि को आधारभूत आजीविका के रूप में स्वीकार किया गया है।&lt;br /&gt;
#'''धृति -''' धैर्यपूर्वक कठिन कार्यों द्वारा आजीविका, जिसमें जोखिमपूर्ण अथवा परिश्रमसाध्य कर्म सम्मिलित हैं। धैर्यपूर्वक जीवन निर्वाह करना धृति कहलाता है। जिन व्यक्तियों में तत्काल अधिक आय अर्जन की क्षमता नहीं होती, वे संतोष और निरन्तर प्रयास के माध्यम से अपनी क्षमता का विकास करते हैं अथवा क्रमशः धन संचय कर अन्य व्यवसायों की ओर अग्रसर होते हैं। यह आत्मसंयम एवं दीर्घकालिक दृष्टि का प्रतीक है।&lt;br /&gt;
#'''भैक्ष -''' भिक्षाटन द्वारा जीवन निर्वाह करना भैक्ष कहा गया है। यह आजीविका-विधि विशेष रूप से अपरिग्रही ब्राह्मणों एवं वैराग्यशील व्यक्तियों के लिए निर्धारित मानी गई है, जिसमें आत्मसंयम और सामाजिक अनुग्रह का समन्वय दिखाई देता है।&lt;br /&gt;
#'''ऋण/कुसीद -''' सीमित और धर्मयुक्त रूप से ऋण देकर आय अर्जन, जिसे मनु ने विशेष परिस्थितियों में स्वीकार किया है। अपने पास उपलब्ध धन को आवश्यकता-मंद व्यक्तियों को देकर उससे सूद लेना कुसीद कहलाता है। यह भी आय प्राप्ति का एक साधन माना गया है, यद्यपि इसके नैतिक पक्ष पर धर्मशास्त्रों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया गया है।  इस प्रकार विद्या, शिल्प, भृति, सेवा, गोरक्षण, विपणि, कृषि, धृति, भैक्ष एवं कुसीद - ये सभी जीवन-निर्वाह के विविध साधन हैं, जो समाज की आर्थिक विविधता, श्रम-विभाजन तथा नैतिक मर्यादाओं को प्रतिबिम्बित करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सूद पर धर्मशास्त्र का दृष्टिकोण'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुस्मृति (10.117) में स्पष्ट किया गया है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए सूद पर धन लेना निषिद्ध है। किंतु वैश्यों के लिए यह सीमित रूप में स्वीकार्य है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मनु आर्थिक गतिविधियों को वर्णानुसार नैतिक मर्यादाओं में बांधते हैं। मनुस्मृति की जीवन-वृत्ति संबंधी अवधारणा यह सुनिश्चित करती है कि -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*आजीविका समाज को हानि न पहुँचाए&lt;br /&gt;
*धन का स्रोत पारदर्शी और धर्मसम्मत हो&lt;br /&gt;
*भरण-पोषण के माध्यम से परिवार और समाज की स्थिरता बनी रहे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह व्यवस्था आज के समय में आर्थिक नैतिकता और सतत विकास की अवधारणा से साम्य रखती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भरण-पोषण और उत्तराधिकार का संबंध==&lt;br /&gt;
भारतीय परंपरा में भरण-पोषण के उत्तरदायित्व का विधान प्राचीन व्यवहार के अन्तर्गत दो रूपों में प्राप्त होता है। परस्पर संबंध के कारण या सम्पत्ति-प्राप्ति की स्थिति के कारण। मनु ने कहा है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;वृद्धौ च मातापितरौ साध्वी भार्या सुतः शिशुः। अप्यकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुरब्रवीत्॥ (मनुभाष्य ४।२५१); (मिता०याज्ञ० २।१७५)&amp;lt;ref&amp;gt;संपादक- गंगानाथ झा, [https://archive.org/details/manusmriti-with-bhashya-of-medhatithi-vol-1-sanskrit-text-ganganath-jha-1932-bis/Manusmriti%20with%20Bhashya%20of%20Medhatithi%20Vol%201%20-%20Sanskrit%20Text%20-%20Ganganath%20Jha%201932%20%28BIS%29/page/n422/mode/1up मनुस्मृति-मेधातिथि-मनुभाष्यसमेत] (१९३९), अध्याय-४, श्लोक-२५१, एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता (पृ० ४१४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;एक सौ बुरे कर्मों के सम्पादन से भी वृद्ध माता-पिता, साध्वी पत्नी एवं शिशु का भरण-पोषण करना चाहिये। इससे स्पष्ट होता है कि चाहे सम्पत्ति हो या न हो, पिता का यह कर्त्तव्य है कि वह शिशु का पालन करे, पति का कर्त्तव्य है कि वह अपनी पतिव्रता स्त्री का भरण-पोषण करे और पुत्र का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने वृद्ध माता-पिता का संवर्धन करें। कौटिल्य ने भी कहा है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अपत्य-दारं माता-पितरौ भ्रातृऋनप्राप्त-व्यवहारान्भगिनीः कन्याविधवाश्चाबिभ्रतः शक्तिमतो द्वादश-पणो दण्डः। अन्यत्र पतितेभ्यः, अन्यत्र मातुः॥ (अर्थशास्त्र २.१.२८)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D_%E0%A5%A8/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A7 अर्थशास्त्र], अधिकरण-२, अध्याय- १, सूत्र-२८।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;भाषार्थ - जो अपने अपतित बच्चों, पत्नी, माता-पिता, छोटे भाइयों एवं बहिनों, कुमारी कन्याओं, विधवा पुत्रियों का भरण-पोषण नहीं करता उस पर १२ पणों का दण्ड लगाया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0)&amp;diff=137555</id>
		<title>Dharmashastra (धर्मशास्त्र)</title>
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		<updated>2026-02-13T17:50:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परम्परा द्वारा समाज में धर्मसम्मत आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त, सामाजिक एवं वैयक्तिक कर्तव्य-अकर्तव्य आदि कर्मों के सुव्यवस्थित निर्धारण हेतु धर्मशास्त्र का प्रवर्तन हुआ तथा वैदिकसाहित्य में यह कल्प नामक वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित है। इस शास्त्र के अन्तर्गत मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, बृहस्पति, बौधायन, जीमूतवाहन, विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य आदि आचार्यों के सूत्र, स्मृतियाँ, भाष्य एवं समकालीन निबन्धात्मक प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति का मूल आधार धर्म है। विविध शास्त्रकारों ने धर्म शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं। धर्मशास्त्र में सामाजिक आचार-विचार, [[Varnashrama Dharma (वर्णाश्रमधर्मः)|वर्णाश्रम-धर्म]], [[Achara (आचार)|सदाचार]], [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]], राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य तथा शासन से सम्बन्धित नियम आदि का सुव्यवस्थित विवेचन किया गया है। धर्मशास्त्र शब्द दो पदों [[Dharma (धर्मः)|धर्म]] और [[Shastra Shikshana Paddhati (शास्त्रशिक्षणपद्धतिः)|शास्त्र]] के संयोग से निर्मित है। इन दोनों पदों के शाब्दिक अर्थों का ज्ञान आवश्यक है। धर्म शब्द पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध प्राच्यविद् पण्डित तारिणीश झा ने संस्कृत शब्दार्थ कोश में क्रमशः -&amp;lt;blockquote&amp;gt;ध्रियते लोकानेन, ध्रियते लोकाः वा तथा ध्रियते लोकान् ध्रियते पुण्यात्मान् इति वा। (शब्दकोश)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार व्युत्पत्ति करते हुए धृ धातु से मन प्रत्यय द्वारा धर्म शब्द की निष्पत्ति मानी है तथा इसके पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों प्रयोगों को स्वीकार किया है। शास्त्र शब्द का अर्थ भी उपर्युक्त शब्दकोशकार द्वारा प्रायः समान रूप में ग्रहण किया गया है। शास् धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से शास्त्र शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। विभिन्न विद्वानों ने इसके अर्थ क्रमशः आज्ञा, उपदेश, नियम, धार्मिक ग्रन्थ, वेद एवं धर्मशास्त्र तथा जनसामान्य के कल्याण हेतु विधि-विधान प्रतिपादित करने वाले ग्रन्थ आदि स्वीकार किए हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्र शब्द का तात्पर्य उस व्यवस्था से है, जो मनुष्य के आचार-व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, सामाजिक मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। सामान्यतः स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र का पर्याय माना जाता है। मनुस्मृति में यह प्रतिपादित किया गया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;भाषार्थ - [[Shruti (श्रुतिः)|श्रुति]] को [[Vedas (वेदाः)|वेद]] तथा [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृति]] को धर्मशास्त्र के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार [[Mukhya Smritis (मुख्य स्मृतियां)|स्मृतिग्रन्थों]] को धर्मशास्त्र की संज्ञा प्रदान की गई है तथा स्मृतिकारों को धर्मशास्त्रकार कहा गया है। इस प्रकार धर्मशास्त्र का मूलाधार [[Vaidika Vangmaya (वैदिकवाङ्मयम्)|वैदिक परम्परा]] में निहित है, परन्तु उसका व्यावहारिक स्वरूप सूत्र, स्मृति, भाष्य एवं निबन्धात्मक ग्रन्थों के माध्यम से विकसित हुआ है। धर्मशास्त्र से सम्बन्धित साहित्य मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है - धर्मसूत्र एवं स्मृतियाँ। वैदिक अध्ययन की परम्परा में छह [[Shad Vedangas (षड्वेदाङ्गानि)|वेदाङ्गों]] का विधान किया गया, जिन्हें [[Shiksha (शिक्षा)|शिक्षा]], [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प]], [[Vyakarana Vedanga (व्याकरणवेदाङ्गम्)|व्याकरण]], [[Nirukta (निरुक्त)|निरुक्त]], [[Chandas (छन्दस्)|छन्द]] एवं [[Jyotisha (ज्योतिष)|ज्योतिष]] कहा जाता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;छन्‍दा: पादौ तु वेदस्‍य, हस्‍तौ कल्‍पोऽथ पठ्यते। ज्‍योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्‍तं श्रोत्रमुच्‍यते॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्‍य मुखं व्‍याकरणं स्‍मृतम्। तस्‍मात्‍सांगमधीत्‍यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय शिक्षा)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इनमें [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प वेदांग]] का विशेष स्थान है, शास्त्रीय दृष्टि से कल्प उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें यज्ञानुष्ठान का विधि-विधान एवं  धार्मिक संस्कारों के नियम बतलाये गये हैं। विष्णुमित्र ने कल्प का शाब्दिक अर्थ बताते हुए कहा है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्। (ऋक्प्रातिशाख्य वृत्ति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद में विहित कर्मों को क्रमबद्ध रूप में विवेचित करने वाला शास्त्र कल्प है। कल्पसूत्रों के अन्तर्गत चार प्रकार की सूत्र रचनाएं हैं - [[Shrautasutras (श्रौतसूत्राणि)|श्रौतसूत्र]], [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्यसूत्र]], [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]] तथा [[Shulbasutras (शुल्बसूत्राणि)|शुल्बसूत्र]]। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''श्रौतसूत्र''' - [[Vedas (वेदाः)|वेदों]] में वर्णित [[Yajna (यज्ञः)|यज्ञों]] की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''गृह्यसूत्र''' - [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्याग्नि]] में होने वाले यज्ञों एवं [[Upanayana (उपनयनम्)|उपनयन]], [[Vivaha (विवाहः)|विवाह]] आदि संस्कारों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''धर्मसूत्र''' - [[Ashram System (आश्रम व्यवस्था)|आश्रमों]] और [[Varna Dharma (वर्णधर्मः)|चारों वर्णों]], [[Achara (आचार)|धार्मिक आचारों]] एवं राजा के कर्तव्यों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''शुल्बसूत्र''' - [[Vedi (वेदिः)|वेदी]] के निर्माण की विधि आदि के प्रतिपादक ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार सम्पूर्ण [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प-वेदांग]] चार वर्गों में विभाजित किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शालिनी वर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/55290 वसिष्ठधर्मसूत्र-एक अनुशीलन] (२००८), भूमिका, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ (पृ० २-३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रीय वाङ्मय॥ Dharmasastric literature==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अन्तर्गत [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]], [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृतियाँ]], उन पर रचित टीकाएँ तथा निबन्धात्मक ग्रन्थ सम्मिलित किए जाते हैं। धर्मसूत्रों, स्मृतियों, टीकाओं एवं निबन्धों की संख्या अत्यन्त व्यापक मानी जाती है। इन मूल ग्रन्थों पर रचित लघु एवं विशाल दोनों प्रकार के ग्रन्थ भी धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अंतर्गत ही समाहित किए जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थी- संदीप कुमार गुप्त, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264949 चतुर्वर्ग की धर्मशास्त्रीय अवधारणा] (2011), शोधकेंद्र- छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० २२)।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसको तीन निश्चित कालों में विभक्त किया जा सकता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#प्रथम काल गौतम, वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रों का है, जो कि कल्प वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित हैं।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्रों के द्वितीय क्रम में मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृतियों का समावेश होता है।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्र का तृतीय क्रम स्मृतियों की प्राचीन टीकाएँ और निबन्ध ग्रन्थों का है, इनमें विश्वरूप, मेधातिथि और विज्ञानेश्वर आदि के नाम प्रमुख हैं साथ ही कृत्यकल्पतरु, स्मृतिचन्द्रिका, चतुर्वर्गचिन्तामणि चण्डेश्वर का रत्नाकर आदि ग्रन्थों को निबन्ध की श्रेणी में परिगणन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्वोक्त तीनों कालक्रम में परिगणित धर्मसूत्र, स्मृतियाँ, टीकाएँ तथा निबन्ध ग्रन्थ धर्मशास्त्रीय वाङ्मय में समावेश किये जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===धर्मसूत्रों का स्वरूप===&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय साहित्य का विकास मुख्यतः धर्मसूत्रों से प्रारम्भ होकर स्मृति एवं निबन्ध ग्रन्थों तक विस्तृत है। बौधायन, आपस्तम्ब, गौतम एवं वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रकारों ने धर्मसूत्रों के माध्यम से सामाजिक आचारों एवं विधिक मान्यताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, बृहस्पति आदि स्मृतिकारों ने धर्म के विविध पक्षों राजधर्म, व्यवहार, दण्ड, उत्तराधिकार, स्त्री-अधिकार एवं सामाजिक न्याय का विस्तृत विवेचन किया।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थिनी- रोली गुप्ता, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264777 बौधायन धर्मसूत्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१३), छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० ७-८)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्रों का वेद-विशेष से कोई निश्चित सम्बन्ध नहीं, ये स्वतंत्र रचनाएँ जैसी हैं। परन्तु जैसा कि डॉ० पी० वी० काणे ने उल्लेख किया है- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परम्परानुसार गौतमधर्मसूत्र का अध्ययन सामवेदी लोग करते थे, आपस्तम्ब के सूत्रों का अध्ययन तैत्तिरीय शाखा के अनुयायी गण करते थे और वसिष्ठधर्मसूत्र का अध्ययन ऋग्वेदी लोग करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि धर्मसूत्र स्वतन्त्र रचनाओं के रूप में थे। परन्तु बाद में भिन्न-भिन्न वेदों के अनुयायियों ने इन्हें अपनाकर अपना कल्प वेदांग अध्ययन पूरा किया। वर्तमान समय में केवल चार धर्मसूत्र ही उपलब्ध होते हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*गौतम धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
*आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
* वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनके अतिरिक्त तीन धर्मसूत्रों का और उल्लेख मिलता है- विष्णुधर्मसूत्र, हिरण्यकेशि धर्मसूत्र और वैखानसधर्मसूत्र। इनमें हिरण्यकेशि धर्मसूत्र आपस्तम्ब से ही अधिकांशतः मिलता-जुलता है। वैखानस मुख्यरूप से संन्यास व वानप्रस्थ आश्रमों के अध्ययन के लिए उपयोगी है। अतः अध्ययन की दृष्टि से केवल पाँच धर्मसूत्र ही उपयोगी है- गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन, वसिष्ठ और विष्णु धर्मसूत्र।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+धर्मसूत्र एवं उन पर लिखित भाष्य&lt;br /&gt;
!'''वेद'''&lt;br /&gt;
!शाखा&lt;br /&gt;
!धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
!विषय-वस्तु&lt;br /&gt;
!भाष्य एवं टीकाएं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;2&amp;quot; |ऋग्वेद&lt;br /&gt;
|शाकल&lt;br /&gt;
|वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|३० अध्याय, सूत्र एवं श्लोक-दोनों रूपों में&lt;br /&gt;
|कृष्ण पण्डित धर्माधिकारी का भाष्य, जिसे विद्वन्मेदिनी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|कौषीतकि&lt;br /&gt;
|विष्णु&lt;br /&gt;
|१०० अध्याय&lt;br /&gt;
|नन्द पण्डित (वैजयन्ती व्याख्या), भारुचि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!शुक्ल&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
|_&lt;br /&gt;
|हारीत&lt;br /&gt;
|३० अध्याय&lt;br /&gt;
|लघु हारीत स्मृति तथा वृद्ध हारीत स्मृति से सम्बद्ध&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कृष्ण&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |तैत्तिरीय&lt;br /&gt;
|बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|चार प्रश्न (जिनमें से केवल दो को मूल माना जाता है)&lt;br /&gt;
|गोविन्दस्वामी का भाष्य (विवरण)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब कल्प के 28वें एवं 29वें प्रश्न (1364 सूत्र एवं 30 श्लोक)&lt;br /&gt;
|हरदत्त (उज्ज्वलवृत्ति), धूर्तस्वामी तथा शंकर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि कल्प के 26वें एवं 27वें प्रश्न&lt;br /&gt;
|महादेव दीक्षित (वैजयन्ती)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|वैखानस धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
| वैखानस स्मार्तसूत्र के 3 प्रश्न (51 काण्ड एवं 365 सूत्र)&lt;br /&gt;
|कोई भाष्य उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!सामवेद&lt;br /&gt;
|राणायनीय शाखा&lt;br /&gt;
|गौतम धर्मसूत्र (चरणव्यूह के अनुसार)&lt;br /&gt;
|२८ अध्याय, सूत्ररूप में रचित&lt;br /&gt;
|हरदत्त (मिताक्षरा) असहाय, भारत्यज्ञ, मस्करी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!अथर्ववेद&lt;br /&gt;
| colspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कोई धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कल्पसूत्रों में धर्मसूत्रों को तीसरे वर्ग में रखा गया है। धर्मसूत्रों का गृह्यसूत्रों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन दोंनों के विषयों में कुछ समानता भी है। यथा-उपनयन, अनध्याय, विवाह, श्राद्ध, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, महायज्ञ आदि। धर्मसूत्रों में इनके सामाजिक नियमों प्रतिबन्धों व रीतियों का उल्लेख है। जबकि गृह्यसूत्रों में विधि व अनुष्ठान का वर्णन है। किन्तु धर्मसूत्रों में जहाँ गृह्यकर्मों से सम्बन्धित सूत्र हैं, वहीं धर्मसूत्रों का विषय अधिक व्यापक है। वे मानव के आचरण सम्बन्धी नियमों का विवेचन करते हैं। संक्षेप में धर्मसूत्रों का मुख्य विषय मानव जीवन के विविध पक्षों के कर्त्तव्यों का ज्ञान कराना है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===स्मृति ग्रंथो की अवधारणा===&lt;br /&gt;
मनु का वचन “धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः” इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि धर्मशास्त्र मूलतः स्मृति-परम्परा से सम्बद्ध हैं। अर्थात् जितने भी धर्मशास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी स्मृति-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। इन धर्मशास्त्रों के कर्त्ताओं एवं उनकी परम्परा का विवेचन पराशर स्मृति में प्राप्त होता है। पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पे कल्पे क्षयोत्पत्त्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।  श्रुतिस्मृतिसमाचारनिर्णेतारश्च सर्वदा॥ (पराशर स्मृति 1.20)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot;&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० २०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक पर स्मृतिमुक्ताफल में टीका करते हुए कहा गया है कि सृष्टि और प्रलय का यह क्रम प्रत्येक महाकल्प एवं अवांतर कल्प में निरन्तर चलता रहता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देवता महाकल्प के अन्त में लीन होते हैं और नये महाकल्प के प्रारम्भ में पुनः प्रकट होते हैं। स्मृतिमुक्ताफल में टिप्पणी प्राप्त होती है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;क्षयसहिता उत्पत्तिः क्षयोत्पत्तिः। तयोपलाक्षता भवंति कल्पे कल्पे महाकल्पे अवांतरकल्पे च। ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा महाकल्पावसाने क्षीयंते महाकल्पादावुत्पद्यंते। एवमवांतरकल्पानामवसाने प्रारंभे च स्मृत्यादीनां निर्णेतारो मन्वादयः क्षयोत्पत्तिभ्यामुपलक्ष्यंते। चकारेणानुक्तो धर्मः समुच्चीयते। सर्वदेत्यनेन सृष्टिसंहारप्रवाहस्यानादित्वमनंतत्वं च दर्शितम्। स एव॥ (स्मृति मुक्ताफलम् १।२१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;वैद्यनाथ दीक्षितीय, [https://ia801409.us.archive.org/9/items/in.ernet.dli.2015.486485/2015.486485.Smrtimuktaphalama-part-1_text.pdf स्मृतिमुक्ताफलम्], वर्णाश्रमधर्मकाण्डम् (1937), विश्वनाथ जगन्नाथ घारपुरे (पृ० ११)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार श्रुति और स्मृति के निर्णायक मनु आदि भी प्रत्येक कल्प के आरम्भ और अन्त में प्रकट एवं विलीन होते रहते हैं। यहाँ &amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt;सर्वदा&amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt; पद के माध्यम से सृष्टि–प्रलय की अनादि और अनन्त परम्परा का संकेत किया गया है। आगे पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;न कश्चिद्वेदकर्त्ता च वेदं श्रुत्वा चतुर्मुखः। तथैव धर्मान् स्मरति मनुः कल्पांतरे तथा॥ (पराशर स्मृति 1. 21)&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक की टीका में स्मृतिमुक्ताफलकार स्पष्ट करते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पांतरे धर्मान् स्मरति इति पत्रयं पूर्वार्धेऽपि संबध्यते। महाकल्पे चतुर्मुखः परमेश्वरेण दत्तं वेदं श्रुत्त्वा तत्र विप्रकीर्णान्वर्णाश्रमादिधर्मान्स्मृतिग्रंथरूपेण उपनिबध्नाति तथैव स्वायंभुवो मनुः प्रत्यवांतरकल्पं वेदोक्तधर्मान्ग्रथ्नाति। मनुग्रहणेनात्रिविष्ण्वाद्य उपलक्ष्यंते। (स्मृति मुक्ताफलम्)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;quot;कल्पान्तरे धर्मान् स्मरति&amp;quot; यह पद पूर्ववर्ती वाक्य से सम्बद्ध है। प्रत्येक महाकल्प के प्रारम्भ में चतुर्मुख ब्रह्मा परमेश्वर से प्राप्त वेद को सुनते हैं और उसमें वर्णित वर्णाश्रम आदि धर्मों को स्मृति-ग्रन्थों के रूप में व्यवस्थित करते हैं। इसी प्रकार स्वायम्भुव मनु प्रत्येक अवांतर कल्प में वेदोक्त धर्मों को स्मरण कर स्मृति-रूप में स्थापित करते हैं। यहाँ मनु शब्द से मात्र एक व्यक्ति नहीं, अपितु अत्रि, विष्णु, पराशर आदि सभी धर्मशास्त्रकारों का भी संकेत होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० दिलीप कुमार नाथाणी, [https://ijesrr.org/publication/83/1.%20ijesrr%20june%202022.pdf स्मृति-धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के रचनाकार] (२०२२), इण्टरनेशनल जर्नल ऑफ एजुकेशन एण्ड साइंस रिसर्च रिव्यू (पृ० ३४९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''स्मृतियों की संख्या'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्धकारों एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा में स्मृतियों की संख्या को लेकर विभिन्न मत प्राप्त होते हैं। कुछ परम्पराओं में 36 स्मृतियों का उल्लेख है, तो कहीं यह संख्या और अधिक बतायी गयी है। वर्तमान में उपलब्ध स्मृतियों की संख्या सौ से भी अधिक मानी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधाता- सुभाष वी. वसोया, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/521411 धर्मशास्त्रानुसारेण आचारस्य एकं समीक्षात्मकम् अध्ययनम्] (२०१८), द्वितीय अध्याय, श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात (पृ० १४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{columns-list|colwidth=15em|style=width: 800px; font-style: normal;|&lt;br /&gt;
# अत्रिस्मृति &lt;br /&gt;
# अरुणस्मृति &lt;br /&gt;
# अगस्त्यस्मृति &lt;br /&gt;
# आंगिरसस्मृति (पूर्वागिरस, उत्तरांगिरस)&lt;br /&gt;
# आत्रेयस्मृति&lt;br /&gt;
# आस्तम्बस्मृति&lt;br /&gt;
# आश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ईशानस्मृति&lt;br /&gt;
# इन्द्रदत्तस्मृति&lt;br /&gt;
# उपकश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# उपांगिरसस्मृति&lt;br /&gt;
# औपजंघनस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनसस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनस संहिता&lt;br /&gt;
# ऋतुपर्णस्मृति&lt;br /&gt;
# ऋष्यश्रृंग स्मृति&lt;br /&gt;
# कणादस्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिञ्जलस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिल स्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वषस्मृति&lt;br /&gt;
# कश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# कवसस्मृति&lt;br /&gt;
# कात्यायनस्मृति&lt;br /&gt;
# काष्र्णाजिनस्मृति&lt;br /&gt;
# कुमारस्मृति&lt;br /&gt;
# कोकिलस्मृति&lt;br /&gt;
# कौत्सस्मृति&lt;br /&gt;
# कुतुस्मृति &lt;br /&gt;
# गर्गस्मृति&lt;br /&gt;
# गव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# गोभिलरमृति&lt;br /&gt;
# गौतम स्मृति&lt;br /&gt;
# चन्द्रस्मृति&lt;br /&gt;
# च्यवनरमुति&lt;br /&gt;
# छागल्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जमदग्निस्मृति&lt;br /&gt;
# जातुकर्ण्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जाबालीस्मृति&lt;br /&gt;
# दक्षरमृति&lt;br /&gt;
# दाल्भ्यस्मृति&lt;br /&gt;
# देवलस्मृति&lt;br /&gt;
# नाचिकेतस्मृति&lt;br /&gt;
# नारदस्मृति&lt;br /&gt;
# नारायणस्मृति&lt;br /&gt;
# पराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# पारस्करस्मृति&lt;br /&gt;
# पितामहस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्त्यस्मृति&lt;br /&gt;
# पैठीनसिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रजापतिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रह्लादरमृति&lt;br /&gt;
# प्राचेतसरमृति&lt;br /&gt;
# बादरायणस्मृति&lt;br /&gt;
# बाहस्पत्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बुधस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहत्पाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्रद्यमस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्वसिष्ठ स्मृति&lt;br /&gt;
# बृह‌द्विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# बैजवापरमृति&lt;br /&gt;
# बौधायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ब्रह्मोक्तयाज्ञवल्क्य स्मृति&lt;br /&gt;
# ब्राह्मणवधस्मृति&lt;br /&gt;
# भारद्वाजरमृति&lt;br /&gt;
# भूगुस्मृति&lt;br /&gt;
# मनुस्मृति&lt;br /&gt;
# मरीचिस्मृति&lt;br /&gt;
# माण्डव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# मार्कण्डेयस्मृति&lt;br /&gt;
# मुद्गलस्मृति&lt;br /&gt;
# मृत्युञ्जय स्मृति&lt;br /&gt;
# यमस्मृति&lt;br /&gt;
# याज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुपाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुबृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुव्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशंखस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशौनकस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वत्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वाश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुयमस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुहारितस्मृति&lt;br /&gt;
# लिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# लोमशस्मृति&lt;br /&gt;
# लोहितस्मृति&lt;br /&gt;
# लौगाक्षिस्मृति&lt;br /&gt;
# वत्सरमृति&lt;br /&gt;
# वभ्रूरमृति&lt;br /&gt;
# वसिष्ठस्मृति&lt;br /&gt;
# वाधूलस्मृति&lt;br /&gt;
# वाराहीस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वामित्रस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वेश्वरस्मृति&lt;br /&gt;
# विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धगौतम&lt;br /&gt;
# वृद्धशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धहारीतस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धात्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# वैखानसस्मृति&lt;br /&gt;
# वैजवापस्मृति&lt;br /&gt;
# वैशम्पायनस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यवहारांगस्मृति&lt;br /&gt;
# व्याघ्रस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# शकिलरमृति&lt;br /&gt;
# शंखस्मृति&lt;br /&gt;
# शतक्रतुस्मृति&lt;br /&gt;
# शन्तनुस्मृति &lt;br /&gt;
# शंखलिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकलस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकटायनस्मृति&lt;br /&gt;
# शातातपरमृति&lt;br /&gt;
# शाट्यायनस्मृति &lt;br /&gt;
# शाण्डिल्यस्मृति &lt;br /&gt;
# शुन क्षेपस्मृति &lt;br /&gt;
# शुनःपुच्छस्मृति &lt;br /&gt;
# शूद्रस्मृति &lt;br /&gt;
# शौनकस्मृति &lt;br /&gt;
# षण्मुखस्मृति &lt;br /&gt;
# संवर्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सत्यव्रतस्मृति &lt;br /&gt;
# सदाचारस्मृति &lt;br /&gt;
# सप्तर्षिस्मृति &lt;br /&gt;
# सनत्कुमारस्मृति &lt;br /&gt;
# स्कन्दस्मृति &lt;br /&gt;
# सांख्यायनरमृति&lt;br /&gt;
# सुमन्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सोमरमृति &lt;br /&gt;
# हारितस्मृति &lt;br /&gt;
# होरिलस्मृति }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निष्कर्षतः हम देखते हैं कि स्मृतियों की संख्या जितनी वर्तमान में प्राप्त हो रही है उससे कई अधिक हों। तात्पर्य है कि स्मृतियाँ हमारे सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, पारिवारिक, आदि सभी भावों का मार्ग प्रशस्त करने वाले ग्रन्थ हैं। भारतीय जनमानस का जीवन इन्हीं स्मृतियों के अनुसार प्रवृत्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उपस्मृति परम्परा'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य स्मृतियों के अतिरिक्त अनेक उपस्मृतियों का भी उल्लेख धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है। ये उपस्मृतियाँ मूल स्मृतियों का विस्तार अथवा विशिष्ट विषयों पर केन्द्रित व्याख्या के रूप में देखी जा सकती हैं। जाबालि, आपस्तम्ब, बौधायन, कणाद, वैशम्पायन आदि के नाम उपस्मृति कर्ताओं के रूप में उल्लिखित हैं। अंगिरा स्मृति में भी धर्मशास्त्रकारों को लिखा है, परन्तु अंगिरा ने जिनका नामोल्लेख किया है, उन्हें उपस्मृतिकार कहा है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कंदो लोगाक्षिकाश्यपौ। व्यासः सनत्कुमारश्च शंतनुर्जनकस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकर्णिः कपिंजलः। बोधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च। पैठीनसीर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः॥ (अंगिरा स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' जाबालि, नचिकेता, स्कंद, लोगाक्षि, कश्यप, व्यासः, सनत्कुमार, शंतनु, जनक, व्याघ्र, कात्यायन, जातुकर्णि, कपिंजल, बोधायन, कणाद, विश्वामित्र, पैठीनसि, गोभिल। ये सभी उपस्मृतिकार हैं। उपस्मृतियों के माध्यम से धर्मशास्त्रीय परम्परा अधिक व्यापक होती है, जिससे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का समावेश सम्भव हो पाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===टीका, भाष्य एवं निबन्ध ग्रन्थ===&lt;br /&gt;
किसी धर्मसूत्र या स्मृति के आधार पर उसका अर्थ करने के लिए लिखी गई रचना टीका है। इनमें किसी प्रकार का विभाजन नहीं किया जा सकता, क्योंकि दोनों ही किसी एक धर्मसूत्र या स्मृति के आधार पर रचित हैं। निबन्ध-ग्रंथों में किसी एक सूत्रकार अथवा स्मृतिकार को आधार बनाने की अपेक्षा किसी विशिष्ट विषय को ही आधार के रूप में ग्रहण किया जाता है। तत्पश्चात उस विषय से संबंधित पूर्ववर्ती विभिन्न आचार्यों के वचनों का संकलन एवं समन्वय प्रस्तुत किया जाता है। यही पद्धति टीका भाष्य और निबन्ध ग्रन्थ की संरचनात्मक विशेषता को स्पष्ट करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः टीका, भाष्य तथा निबन्ध के मध्य स्पष्ट विभाजन-रेखा निर्धारित करना कठिन प्रतीत होता है। उदाहरणतः शंकर भट्ट के द्वैतनिर्णय में विज्ञानेश्वर को निबन्धकारों में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है, जबकि सामान्य परम्परा में वे याज्ञवल्क्य स्मृति के टीकाकार के रूप में विख्यात हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भाष्य और निबन्ध दोनों ही धर्मसूत्रों अथवा स्मृतियों में निहित आचार्यों के परस्पर विरोधी अथवा असंगत प्रतीत होने वाले वचनों का समाधान एवं समन्वय करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्ध-साहित्य के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि उनमें श्रुति की अपेक्षा स्मृतियों और पुराणों के उद्धरण अधिक मात्रा में मिलते हैं। जहाँ स्मृतियों के लिए श्रुति प्रमुख प्रमाण मानी जाती थी, वहीं निबन्धों के संदर्भ में स्मृतियाँ अधिक प्रामाणिक आधार बन गईं। इसका एक कारण यह प्रतीत होता है कि स्मृतियाँ जनसामान्य के लिए अधिक सुलभ एवं ग्राह्य थीं, जबकि वेद कालान्तर में सामान्य समाज की प्रत्यक्ष बौद्धिक पहुँच से अपेक्षया दूर होते चले गए तथा उनके वास्तविक तात्पर्य को ग्रहण करने वाले विद्वानों की संख्या सीमित रह गई।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधात्री- सुधा सिंह, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/552143 स्मृति परम्परा और पराशर स्मृति - एक अध्ययन](सन् २०१२), अध्याय-१, शोध केन्द्र - संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग - लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ (पृ० १२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेधातिथि द्वारा रचित मनुभाष्य (मनुस्मृति पर भाष्य) तथा याज्ञवल्क्यस्मृति पर विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा टीका आदि ग्रंथों को भी व्यापक अर्थ में धर्मशास्त्रीय साहित्य की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। यद्यपि ये मूल स्मृतियाँ नहीं हैं, तथापि इनके माध्यम से धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों का विस्तृत विवेचन, व्याख्या तथा व्यवहारिक प्रतिपादन किया गया है, अतः इनका स्थान धर्मशास्त्र-परम्परा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। क्षेत्रीय दृष्टि से भी धर्मशास्त्रीय निबन्ध-साहित्य का विकास उल्लेखनीय है -  &lt;br /&gt;
*उत्तर भारत: काशीनाथ उपाध्याय का कार्य - धर्मसिंधु।&lt;br /&gt;
*महाराष्ट्र: विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका और कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु।&lt;br /&gt;
* दक्षिण भारत: वैद्यनाथ दीक्षित का वैद्यनाथ-दीक्षितीयम इसको  स्मृतिमुक्ताफल ग्रंथ के रूप में भी जानते हैं।&lt;br /&gt;
*संन्यास आश्रम में स्थित जन: विद्येश्वर-संहिता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रकारों की परम्परा==&lt;br /&gt;
याज्ञवल्क्य स्मृति में जब धर्मशास्त्रकार के रूप में पाराशर और व्यास का नामोल्लेख मिलता है, तब यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि इन धर्मशास्त्रकारों के मध्य कोई कालक्रम (पौर्वापर्य) निर्धारित नहीं किया जा सकता। मनु द्वारा धर्म के स्वरूप का प्रतिपादन किए जाने के पश्चात् अन्य धर्मशास्त्रकारों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण और सामाजिक संदर्भों के अनुसार धर्म का विवेचन किया। इसी कारण कलियुग के धर्मशास्त्रकार माने जाने वाले पराशर का उल्लेख याज्ञवल्क्य द्वारा किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी परम्परा का समर्थन पराशर-स्मृति में भी प्राप्त होता है, जहाँ व्यास विभिन्न धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख करते हुए अपने पिता से यह कहते हैं कि उन्होंने उन सभी आचार्यों द्वारा प्रतिपादित धर्म का अध्ययन कर लिया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;धर्मकथय मे तातानुग्राह्यो ह्यहं तव। श्रुता मे मानवा धर्मो वासिष्ठा काश्यपास्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्गेया गौतमीयाश्च तथाञ्चोशनसास्मृताः। अत्रेर्विष्णोश्च संवर्ताद् दक्षादंगिरसस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शातातपाच्च हारीताद् याज्ञवल्क्यात्तथैव च। आपस्तम्बकृता धर्माः शंखस्य लिखितस्य च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसन्मुनेः। श्रुताः ह्येते भवत्प्रोक्ताः श्रुत्यर्थं मे न विस्मृताः॥ (पराशर स्मृति १. १२-१५)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसका आशय यह है कि व्यास अपने पिता से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें पुनः धर्मविषयक उपदेश प्रदान करें, यद्यपि उन्होंने मनु, वसिष्ठ, कश्यप, गर्ग, गौतम, उशना, अत्रि, विष्णु, संवर्त, अंगिरस, शातातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख, लिखित, कात्यायन, प्रचेता तथा स्वयं पिता द्वारा प्रतिपादित धर्म का श्रवण कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धर्मशास्त्र परम्परा एक सतत और बहुविध विचारधारा वाली परम्परा रही है, जिसमें विभिन्न आचार्यों ने समय, समाज और युग के अनुसार धर्म का विवेचन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥&lt;br /&gt;
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रों के वर्ण्यविषय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''आचार -''' दैनिक आचार, सदाचार एवं दुराचार निर्णय आदि।&lt;br /&gt;
*'''आश्रम एवं''' '''वर्ण व्यवस्था -''' चारों आश्रमों एवं चारों वर्णों के कर्तव्याकर्तव्य विवेचन।&lt;br /&gt;
*'''नारी की स्थिति एवं धर्मशास्त्रीय अवधारणाएँ -''' नारी का धन, स्त्री का धर्म, स्त्रियों की पवित्रता, कन्या द्वारा पति वरण करना, अगम्या स्त्रियाँ, पत्नी की रक्षा, कन्या विक्रय का पाप, विधवा का धर्म आदि। न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते॥&lt;br /&gt;
*'''शुद्धि एवं पवित्रता -''' पात्र,वस्त्र, अन्न, भूमि, शुद्धि के साधन एवं उपाय, शरीर की शुद्धि एवं अन्य शुद्धियां।&lt;br /&gt;
*'''संस्कार -''' गर्भाधान, उपनयन, विवाह एवं अंत्येष्टि आदि संस्कार।&lt;br /&gt;
*'''दंड एवं प्रायश्चित -''' विदेश यात्रा, हत्या (वध), परस्त्रीगमन, सुरापान, स्वर्ण आदि चोरी का प्रायश्चित।&lt;br /&gt;
*'''विविध नियम एवं वृत्तियां -''' अभिवादन नियम, यज्ञोपवीत धारण विधि, आचमन एवं प्रक्षालन विधि, अशौच, तर्पण, स्नान, भोजन एवं दान विधि।&lt;br /&gt;
*'''प्रायश्चित -''' जप, तप, प्राणायाम एवं कृच्छ्रादि व्रत विधान&lt;br /&gt;
*'''प्रकीर्ण -''' संपत्ति का उत्तराधिकार एवं विभाजन, पुत्रों के प्रकार, भक्ष्याभक्ष्य एवं पेयापेय विचार, योग साधन आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे - स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0)&amp;diff=137554</id>
		<title>Dharmashastra (धर्मशास्त्र)</title>
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		<updated>2026-02-10T03:48:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परम्परा द्वारा समाज में धर्मसम्मत आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त, सामाजिक एवं वैयक्तिक कर्तव्य-अकर्तव्य आदि कर्मों के सुव्यवस्थित निर्धारण हेतु धर्मशास्त्र का प्रवर्तन हुआ तथा वैदिकसाहित्य में यह कल्प नामक वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित है। इस शास्त्र के अन्तर्गत मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, बृहस्पति, बौधायन, जीमूतवाहन, विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य आदि आचार्यों के सूत्र, स्मृतियाँ, भाष्य एवं समकालीन निबन्धात्मक प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
भारतीय संस्कृति का मूल आधार धर्म है। विविध शास्त्रकारों ने धर्म शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं। धर्मशास्त्र में सामाजिक आचार-विचार, [[Varnashrama Dharma (वर्णाश्रमधर्मः)|वर्णाश्रम-धर्म]], [[Achara (आचार)|सदाचार]], [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]], राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य तथा शासन से सम्बन्धित नियम आदि का सुव्यवस्थित विवेचन किया गया है। धर्मशास्त्र शब्द दो पदों [[Dharma (धर्मः)|धर्म]] और [[Shastra Shikshana Paddhati (शास्त्रशिक्षणपद्धतिः)|शास्त्र]] के संयोग से निर्मित है। इन दोनों पदों के शाब्दिक अर्थों का ज्ञान आवश्यक है। धर्म शब्द पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध प्राच्यविद् पण्डित तारिणीश झा ने संस्कृत शब्दार्थ कोश में क्रमशः -&amp;lt;blockquote&amp;gt;ध्रियते लोकानेन, ध्रियते लोकाः वा तथा ध्रियते लोकान् ध्रियते पुण्यात्मान् इति वा। (शब्दकोश)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार व्युत्पत्ति करते हुए धृ धातु से मन प्रत्यय द्वारा धर्म शब्द की निष्पत्ति मानी है तथा इसके पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों प्रयोगों को स्वीकार किया है। शास्त्र शब्द का अर्थ भी उपर्युक्त शब्दकोशकार द्वारा प्रायः समान रूप में ग्रहण किया गया है। शास् धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से शास्त्र शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। विभिन्न विद्वानों ने इसके अर्थ क्रमशः आज्ञा, उपदेश, नियम, धार्मिक ग्रन्थ, वेद एवं धर्मशास्त्र तथा जनसामान्य के कल्याण हेतु विधि-विधान प्रतिपादित करने वाले ग्रन्थ आदि स्वीकार किए हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्र शब्द का तात्पर्य उस व्यवस्था से है, जो मनुष्य के आचार-व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, सामाजिक मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। सामान्यतः स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र का पर्याय माना जाता है। मनुस्मृति में यह प्रतिपादित किया गया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;भाषार्थ - [[Shruti (श्रुतिः)|श्रुति]] को [[Vedas (वेदाः)|वेद]] तथा [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृति]] को धर्मशास्त्र के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार [[Mukhya Smritis (मुख्य स्मृतियां)|स्मृतिग्रन्थों]] को धर्मशास्त्र की संज्ञा प्रदान की गई है तथा स्मृतिकारों को धर्मशास्त्रकार कहा गया है। इस प्रकार धर्मशास्त्र का मूलाधार [[Vaidika Vangmaya (वैदिकवाङ्मयम्)|वैदिक परम्परा]] में निहित है, परन्तु उसका व्यावहारिक स्वरूप सूत्र, स्मृति, भाष्य एवं निबन्धात्मक ग्रन्थों के माध्यम से विकसित हुआ है। धर्मशास्त्र से सम्बन्धित साहित्य मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है - धर्मसूत्र एवं स्मृतियाँ। वैदिक अध्ययन की परम्परा में छह [[Shad Vedangas (षड्वेदाङ्गानि)|वेदाङ्गों]] का विधान किया गया, जिन्हें [[Shiksha (शिक्षा)|शिक्षा]], [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प]], [[Vyakarana Vedanga (व्याकरणवेदाङ्गम्)|व्याकरण]], [[Nirukta (निरुक्त)|निरुक्त]], [[Chandas (छन्दस्)|छन्द]] एवं [[Jyotisha (ज्योतिष)|ज्योतिष]] कहा जाता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;छन्‍दा: पादौ तु वेदस्‍य, हस्‍तौ कल्‍पोऽथ पठ्यते। ज्‍योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्‍तं श्रोत्रमुच्‍यते॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्‍य मुखं व्‍याकरणं स्‍मृतम्। तस्‍मात्‍सांगमधीत्‍यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पाणिनीय शिक्षा)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इनमें [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प वेदांग]] का विशेष स्थान है, शास्त्रीय दृष्टि से कल्प उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें यज्ञानुष्ठान का विधि-विधान एवं  धार्मिक संस्कारों के नियम बतलाये गये हैं। विष्णुमित्र ने कल्प का शाब्दिक अर्थ बताते हुए कहा है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पो वेदविहितानां कर्मणामानुपूर्व्येण कल्पनाशास्त्रम्। (ऋक्प्रातिशाख्य वृत्ति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद में विहित कर्मों को क्रमबद्ध रूप में विवेचित करने वाला शास्त्र कल्प है। कल्पसूत्रों के अन्तर्गत चार प्रकार की सूत्र रचनाएं हैं - [[Shrautasutras (श्रौतसूत्राणि)|श्रौतसूत्र]], [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्यसूत्र]], [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]] तथा [[Shulbasutras (शुल्बसूत्राणि)|शुल्बसूत्र]]। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''श्रौतसूत्र''' - [[Vedas (वेदाः)|वेदों]] में वर्णित [[Yajna (यज्ञः)|यज्ञों]] की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''गृह्यसूत्र''' - [[Grhyasutras (गृह्यसूत्राणि)|गृह्याग्नि]] में होने वाले यज्ञों एवं [[Upanayana (उपनयनम्)|उपनयन]], [[Vivaha (विवाहः)|विवाह]] आदि संस्कारों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''धर्मसूत्र''' - [[Ashram System (आश्रम व्यवस्था)|आश्रमों]] और [[Varna Dharma (वर्णधर्मः)|चारों वर्णों]], [[Achara (आचार)|धार्मिक आचारों]] एवं राजा के कर्तव्यों का वर्णन करने वाले सूत्र ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
*'''शुल्बसूत्र''' - [[Vedi (वेदिः)|वेदी]] के निर्माण की विधि आदि के प्रतिपादक ग्रन्थ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार सम्पूर्ण [[Kalpa Vedanga (कल्पवेदाङ्गम्)|कल्प-वेदांग]] चार वर्गों में विभाजित किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शालिनी वर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/55290 वसिष्ठधर्मसूत्र-एक अनुशीलन] (२००८), भूमिका, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ (पृ० २-३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रीय वाङ्मय॥ Dharmasastric literature==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अन्तर्गत [[Dharmasutras (धर्मसूत्राणि)|धर्मसूत्र]], [[Smrti (स्मृतिः)|स्मृतियाँ]], उन पर रचित टीकाएँ तथा निबन्धात्मक ग्रन्थ सम्मिलित किए जाते हैं। धर्मसूत्रों, स्मृतियों, टीकाओं एवं निबन्धों की संख्या अत्यन्त व्यापक मानी जाती है। इन मूल ग्रन्थों पर रचित लघु एवं विशाल दोनों प्रकार के ग्रन्थ भी धर्मशास्त्रीय वाङ्मय के अंतर्गत ही समाहित किए जाते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थी- संदीप कुमार गुप्त, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264949 चतुर्वर्ग की धर्मशास्त्रीय अवधारणा] (2011), शोधकेंद्र- छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० २२)।&amp;lt;/ref&amp;gt; इसको तीन निश्चित कालों में विभक्त किया जा सकता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#प्रथम काल गौतम, वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रों का है, जो कि कल्प वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित हैं।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्रों के द्वितीय क्रम में मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृतियों का समावेश होता है।&lt;br /&gt;
#धर्मशास्त्र का तृतीय क्रम स्मृतियों की प्राचीन टीकाएँ और निबन्ध ग्रन्थों का है, इनमें विश्वरूप, मेधातिथि और विज्ञानेश्वर आदि के नाम प्रमुख हैं साथ ही कृत्यकल्पतरु, स्मृतिचन्द्रिका, चतुर्वर्गचिन्तामणि चण्डेश्वर का रत्नाकर आदि ग्रन्थों को निबन्ध की श्रेणी में परिगणन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्वोक्त तीनों कालक्रम में परिगणित धर्मसूत्र, स्मृतियाँ, टीकाएँ तथा निबन्ध ग्रन्थ धर्मशास्त्रीय वाङ्मय में समावेश किये जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===धर्मसूत्रों का स्वरूप===&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय साहित्य का विकास मुख्यतः धर्मसूत्रों से प्रारम्भ होकर स्मृति एवं निबन्ध ग्रन्थों तक विस्तृत है। बौधायन, आपस्तम्ब, गौतम एवं वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रकारों ने धर्मसूत्रों के माध्यम से सामाजिक आचारों एवं विधिक मान्यताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, बृहस्पति आदि स्मृतिकारों ने धर्म के विविध पक्षों राजधर्म, व्यवहार, दण्ड, उत्तराधिकार, स्त्री-अधिकार एवं सामाजिक न्याय का विस्तृत विवेचन किया।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थिनी- रोली गुप्ता, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/264777 बौधायन धर्मसूत्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन] (२०१३), छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर (पृ० ७-८)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्रों का वेद-विशेष से कोई निश्चित सम्बन्ध नहीं, ये स्वतंत्र रचनाएँ जैसी हैं। परन्तु जैसा कि डॉ० पी० वी० काणे ने उल्लेख किया है- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परम्परानुसार गौतमधर्मसूत्र का अध्ययन सामवेदी लोग करते थे, आपस्तम्ब के सूत्रों का अध्ययन तैत्तिरीय शाखा के अनुयायी गण करते थे और वसिष्ठधर्मसूत्र का अध्ययन ऋग्वेदी लोग करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि धर्मसूत्र स्वतन्त्र रचनाओं के रूप में थे। परन्तु बाद में भिन्न-भिन्न वेदों के अनुयायियों ने इन्हें अपनाकर अपना कल्प वेदांग अध्ययन पूरा किया। वर्तमान समय में केवल चार धर्मसूत्र ही उपलब्ध होते हैं- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*गौतम&lt;br /&gt;
*बौधायन&lt;br /&gt;
*आपस्तम्ब&lt;br /&gt;
*वसिष्ठधर्मसूत्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनके अतिरिक्त तीन धर्मसूत्रों का और उल्लेख मिलता है- विष्णुधर्मसूत्र, हिरण्यकेशि धर्मसूत्र और वैखानसधर्मसूत्र। इनमें हिरण्यकेशि धर्मसूत्र आपस्तम्ब से ही अधिकांशतः मिलता-जुलता है। वैखानस मुख्यरूप से संन्यास व वानप्रस्थ आश्रमों के अध्ययन के लिए उपयोगी है। अतः अध्ययन की दृष्टि से केवल पाँच धर्मसूत्र ही उपयोगी है- गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन, वसिष्ठ और विष्णु धर्मसूत्र।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+धर्मसूत्र एवं उन पर लिखित भाष्य&lt;br /&gt;
!'''वेद'''&lt;br /&gt;
!शाखा&lt;br /&gt;
!धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
!विषय-वस्तु&lt;br /&gt;
!भाष्य एवं टीकाएं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;2&amp;quot; |ऋग्वेद&lt;br /&gt;
|शाकल&lt;br /&gt;
|वसिष्ठ धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|३० अध्याय, सूत्र एवं श्लोक-दोनों रूपों में&lt;br /&gt;
|कृष्ण पण्डित धर्माधिकारी का भाष्य, जिसे विद्वन्मेदिनी कहा जाता है।&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|कौषीतकि&lt;br /&gt;
|विष्णु&lt;br /&gt;
|१०० अध्याय&lt;br /&gt;
|नन्द पण्डित (वैजयन्ती व्याख्या), भारुचि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!शुक्ल&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
|_&lt;br /&gt;
|हारीत&lt;br /&gt;
|३० अध्याय&lt;br /&gt;
|लघु हारीत स्मृति तथा वृद्ध हारीत स्मृति से सम्बद्ध&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कृष्ण&lt;br /&gt;
यजुर्वेद&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; |तैत्तिरीय&lt;br /&gt;
|बौधायन धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|चार प्रश्न (जिनमें से केवल दो को मूल माना जाता है)&lt;br /&gt;
|गोविन्दस्वामी का भाष्य (विवरण)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|आपस्तम्ब कल्प के 28वें एवं 29वें प्रश्न (1364 सूत्र एवं 30 श्लोक)&lt;br /&gt;
|हरदत्त (उज्ज्वलवृत्ति), धूर्तस्वामी तथा शंकर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|हिरण्यकेशि कल्प के 26वें एवं 27वें प्रश्न&lt;br /&gt;
|महादेव दीक्षित (वैजयन्ती)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|वैखानस धर्मसूत्र&lt;br /&gt;
|वैखानस स्मार्तसूत्र के 3 प्रश्न (51 काण्ड एवं 365 सूत्र)&lt;br /&gt;
|कोई भाष्य उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!सामवेद&lt;br /&gt;
|राणायनीय शाखा&lt;br /&gt;
|गौतम धर्मसूत्र (चरणव्यूह के अनुसार)&lt;br /&gt;
|२८ अध्याय, सूत्ररूप में रचित&lt;br /&gt;
|हरदत्त (मिताक्षरा) असहाय, भारत्यज्ञ, मस्करी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
!अथर्ववेद&lt;br /&gt;
| colspan=&amp;quot;4&amp;quot; |कोई धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
कल्पसूत्रों में धर्मसूत्रों को तीसरे वर्ग में रखा गया है। धर्मसूत्रों का गृह्यसूत्रों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इन दोंनों के विषयों में कुछ समानता भी है। यथा-उपनयन, अनध्याय, विवाह, श्राद्ध, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, महायज्ञ आदि। धर्मसूत्रों में इनके सामाजिक नियमों प्रतिबन्धों व रीतियों का उल्लेख है। जबकि गृह्यसूत्रों में विधि व अनुष्ठान का वर्णन है। किन्तु धर्मसूत्रों में जहाँ गृह्यकर्मों से सम्बन्धित सूत्र हैं, वहीं धर्मसूत्रों का विषय अधिक व्यापक है। वे मानव के आचरण सम्बन्धी नियमों का विवेचन करते हैं। संक्षेप में धर्मसूत्रों का मुख्य विषय मानव जीवन के विविध पक्षों के कर्त्तव्यों का ज्ञान कराना है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===स्मृति ग्रंथो की अवधारणा===&lt;br /&gt;
मनु का वचन “धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः” इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि धर्मशास्त्र मूलतः स्मृति-परम्परा से सम्बद्ध हैं। अर्थात् जितने भी धर्मशास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी स्मृति-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। इन धर्मशास्त्रों के कर्त्ताओं एवं उनकी परम्परा का विवेचन पराशर स्मृति में प्राप्त होता है। पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पे कल्पे क्षयोत्पत्त्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।  श्रुतिस्मृतिसमाचारनिर्णेतारश्च सर्वदा॥ (पराशर स्मृति 1.20)&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० २०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक पर स्मृतिमुक्ताफल में टीका करते हुए कहा गया है कि सृष्टि और प्रलय का यह क्रम प्रत्येक महाकल्प एवं अवांतर कल्प में निरन्तर चलता रहता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे देवता महाकल्प के अन्त में लीन होते हैं और नये महाकल्प के प्रारम्भ में पुनः प्रकट होते हैं। स्मृतिमुक्ताफल में टिप्पणी प्राप्त होती है -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;क्षयसहिता उत्पत्तिः क्षयोत्पत्तिः। तयोपलाक्षता भवंति कल्पे कल्पे महाकल्पे अवांतरकल्पे च। ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा महाकल्पावसाने क्षीयंते महाकल्पादावुत्पद्यंते। एवमवांतरकल्पानामवसाने प्रारंभे च स्मृत्यादीनां निर्णेतारो मन्वादयः क्षयोत्पत्तिभ्यामुपलक्ष्यंते। चकारेणानुक्तो धर्मः समुच्चीयते। सर्वदेत्यनेन सृष्टिसंहारप्रवाहस्यानादित्वमनंतत्वं च दर्शितम्। स एव॥ (स्मृति मुक्ताफलम् १।२१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;वैद्यनाथ दीक्षितीय, [https://ia801409.us.archive.org/9/items/in.ernet.dli.2015.486485/2015.486485.Smrtimuktaphalama-part-1_text.pdf स्मृतिमुक्ताफलम्], वर्णाश्रमधर्मकाण्डम् (1937), विश्वनाथ जगन्नाथ घारपुरे (पृ० ११)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी प्रकार श्रुति और स्मृति के निर्णायक मनु आदि भी प्रत्येक कल्प के आरम्भ और अन्त में प्रकट एवं विलीन होते रहते हैं। यहाँ &amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt;सर्वदा&amp;lt;nowiki&amp;gt;''&amp;lt;/nowiki&amp;gt; पद के माध्यम से सृष्टि–प्रलय की अनादि और अनन्त परम्परा का संकेत किया गया है। आगे पराशर मुनि कहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;न कश्चिद्वेदकर्त्ता च वेदं श्रुत्वा चतुर्मुखः। तथैव धर्मान् स्मरति मनुः कल्पांतरे तथा॥ (पराशर स्मृति 1. 21)&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० रामचन्द्र वर्मा शास्त्री, [https://archive.org/details/ParasharSmritiDr.RamChandraShastri/page/16/mode/1up पाराशर स्मृति]-हिन्दी टीका सहित,  अध्याय- १, श्लोक- २०, डायनेमिक पब्लिकेशंस (इण्डिया) लिमिटेड, मेरठ (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस श्लोक की टीका में स्मृतिमुक्ताफलकार स्पष्ट करते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कल्पांतरे धर्मान् स्मरति इति पत्रयं पूर्वार्धेऽपि संबध्यते। महाकल्पे चतुर्मुखः परमेश्वरेण दत्तं वेदं श्रुत्त्वा तत्र विप्रकीर्णान्वर्णाश्रमादिधर्मान्स्मृतिग्रंथरूपेण उपनिबध्नाति तथैव स्वायंभुवो मनुः प्रत्यवांतरकल्पं वेदोक्तधर्मान्ग्रथ्नाति। मनुग्रहणेनात्रिविष्ण्वाद्य उपलक्ष्यंते। (स्मृति मुक्ताफलम्)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;quot;कल्पान्तरे धर्मान् स्मरति&amp;quot; यह पद पूर्ववर्ती वाक्य से सम्बद्ध है। प्रत्येक महाकल्प के प्रारम्भ में चतुर्मुख ब्रह्मा परमेश्वर से प्राप्त वेद को सुनते हैं और उसमें वर्णित वर्णाश्रम आदि धर्मों को स्मृति-ग्रन्थों के रूप में व्यवस्थित करते हैं। इसी प्रकार स्वायम्भुव मनु प्रत्येक अवांतर कल्प में वेदोक्त धर्मों को स्मरण कर स्मृति-रूप में स्थापित करते हैं। यहाँ मनु शब्द से मात्र एक व्यक्ति नहीं, अपितु अत्रि, विष्णु, पराशर आदि सभी धर्मशास्त्रकारों का भी संकेत होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० दिलीप कुमार नाथाणी, [https://ijesrr.org/publication/83/1.%20ijesrr%20june%202022.pdf स्मृति-धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के रचनाकार] (२०२२), इण्टरनेशनल जर्नल ऑफ एजुकेशन एण्ड साइंस रिसर्च रिव्यू (पृ० ३४९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''स्मृतियों की संख्या'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निबन्धकारों एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा में स्मृतियों की संख्या को लेकर विभिन्न मत प्राप्त होते हैं। कुछ परम्पराओं में 36 स्मृतियों का उल्लेख है, तो कहीं यह संख्या और अधिक बतायी गयी है। वर्तमान में उपलब्ध स्मृतियों की संख्या सौ से भी अधिक मानी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;अनुसंधाता- सुभाष वी. वसोया, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/521411 धर्मशास्त्रानुसारेण आचारस्य एकं समीक्षात्मकम् अध्ययनम्] (२०१८), द्वितीय अध्याय, श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात (पृ० १४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{columns-list|colwidth=15em|style=width: 800px; font-style: normal;|&lt;br /&gt;
# अत्रिस्मृति &lt;br /&gt;
# अरुणस्मृति &lt;br /&gt;
# अगस्त्यस्मृति &lt;br /&gt;
# आंगिरसस्मृति (पूर्वागिरस, उत्तरांगिरस)&lt;br /&gt;
# आत्रेयस्मृति&lt;br /&gt;
# आस्तम्बस्मृति&lt;br /&gt;
# आश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ईशानस्मृति&lt;br /&gt;
# इन्द्रदत्तस्मृति&lt;br /&gt;
# उपकश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# उपांगिरसस्मृति&lt;br /&gt;
# औपजंघनस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनसस्मृति&lt;br /&gt;
# औशनस संहिता&lt;br /&gt;
# ऋतुपर्णस्मृति&lt;br /&gt;
# ऋष्यश्रृंग स्मृति&lt;br /&gt;
# कणादस्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिञ्जलस्मृति&lt;br /&gt;
# कपिल स्मृति&lt;br /&gt;
# कण्वषस्मृति&lt;br /&gt;
# कश्यपस्मृति&lt;br /&gt;
# कवसस्मृति&lt;br /&gt;
# कात्यायनस्मृति&lt;br /&gt;
# काष्र्णाजिनस्मृति&lt;br /&gt;
# कुमारस्मृति&lt;br /&gt;
# कोकिलस्मृति&lt;br /&gt;
# कौत्सस्मृति&lt;br /&gt;
# कुतुस्मृति &lt;br /&gt;
# गर्गस्मृति&lt;br /&gt;
# गव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# गोभिलरमृति&lt;br /&gt;
# गौतम स्मृति&lt;br /&gt;
# चन्द्रस्मृति&lt;br /&gt;
# च्यवनरमुति&lt;br /&gt;
# छागल्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जमदग्निस्मृति&lt;br /&gt;
# जातुकर्ण्यस्मृति&lt;br /&gt;
# जाबालीस्मृति&lt;br /&gt;
# दक्षरमृति&lt;br /&gt;
# दाल्भ्यस्मृति&lt;br /&gt;
# देवलस्मृति&lt;br /&gt;
# नाचिकेतस्मृति&lt;br /&gt;
# नारदस्मृति&lt;br /&gt;
# नारायणस्मृति&lt;br /&gt;
# पराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# पारस्करस्मृति&lt;br /&gt;
# पितामहस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्मृति&lt;br /&gt;
# पुलस्त्यस्मृति&lt;br /&gt;
# पैठीनसिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रजापतिस्मृति&lt;br /&gt;
# प्रह्लादरमृति&lt;br /&gt;
# प्राचेतसरमृति&lt;br /&gt;
# बादरायणस्मृति&lt;br /&gt;
# बाहस्पत्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बुधस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहत्पाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्रद्यमस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहद्वसिष्ठ स्मृति&lt;br /&gt;
# बृह‌द्विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# बृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# बैजवापरमृति&lt;br /&gt;
# बौधायनस्मृति&lt;br /&gt;
# ब्रह्मोक्तयाज्ञवल्क्य स्मृति&lt;br /&gt;
# ब्राह्मणवधस्मृति&lt;br /&gt;
# भारद्वाजरमृति&lt;br /&gt;
# भूगुस्मृति&lt;br /&gt;
# मनुस्मृति&lt;br /&gt;
# मरीचिस्मृति&lt;br /&gt;
# माण्डव्यस्मृति&lt;br /&gt;
# मार्कण्डेयस्मृति&lt;br /&gt;
# मुद्गलस्मृति&lt;br /&gt;
# मृत्युञ्जय स्मृति&lt;br /&gt;
# यमस्मृति&lt;br /&gt;
# याज्ञवल्क्यस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुपाराशरस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुबृहस्पतिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुव्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशंखस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुशौनकस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वत्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# लघ्वाश्वलायनस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुयमस्मृति&lt;br /&gt;
# लघुहारितस्मृति&lt;br /&gt;
# लिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# लोमशस्मृति&lt;br /&gt;
# लोहितस्मृति&lt;br /&gt;
# लौगाक्षिस्मृति&lt;br /&gt;
# वत्सरमृति&lt;br /&gt;
# वभ्रूरमृति&lt;br /&gt;
# वसिष्ठस्मृति&lt;br /&gt;
# वाधूलस्मृति&lt;br /&gt;
# वाराहीस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वामित्रस्मृति&lt;br /&gt;
# विश्वेश्वरस्मृति&lt;br /&gt;
# विष्णुस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धगौतम&lt;br /&gt;
# वृद्धशातातपस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धहारीतस्मृति&lt;br /&gt;
# वृद्धात्रिस्मृति&lt;br /&gt;
# वैखानसस्मृति&lt;br /&gt;
# वैजवापस्मृति&lt;br /&gt;
# वैशम्पायनस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यवहारांगस्मृति&lt;br /&gt;
# व्याघ्रस्मृति&lt;br /&gt;
# व्यासस्मृति&lt;br /&gt;
# शकिलरमृति&lt;br /&gt;
# शंखस्मृति&lt;br /&gt;
# शतक्रतुस्मृति&lt;br /&gt;
# शन्तनुस्मृति &lt;br /&gt;
# शंखलिखितस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकलस्मृति&lt;br /&gt;
# शाकटायनस्मृति&lt;br /&gt;
# शातातपरमृति&lt;br /&gt;
# शाट्यायनस्मृति &lt;br /&gt;
# शाण्डिल्यस्मृति &lt;br /&gt;
# शुन क्षेपस्मृति &lt;br /&gt;
# शुनःपुच्छस्मृति &lt;br /&gt;
# शूद्रस्मृति &lt;br /&gt;
# शौनकस्मृति &lt;br /&gt;
# षण्मुखस्मृति &lt;br /&gt;
# संवर्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सत्यव्रतस्मृति &lt;br /&gt;
# सदाचारस्मृति &lt;br /&gt;
# सप्तर्षिस्मृति &lt;br /&gt;
# सनत्कुमारस्मृति &lt;br /&gt;
# स्कन्दस्मृति &lt;br /&gt;
# सांख्यायनरमृति&lt;br /&gt;
# सुमन्तस्मृति &lt;br /&gt;
# सोमरमृति &lt;br /&gt;
# हारितस्मृति &lt;br /&gt;
# होरिलस्मृति }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निष्कर्षतः हम देखते हैं कि स्मृतियों की संख्या जितनी वर्तमान में प्राप्त हो रही है उससे कई अधिक हों। तात्पर्य है कि स्मृतियाँ हमारे सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक, पारिवारिक, आदि सभी भावों का मार्ग प्रशस्त करने वाले ग्रन्थ हैं। भारतीय जनमानस का जीवन इन्हीं स्मृतियों के अनुसार प्रवृत्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उपस्मृति परम्परा'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य स्मृतियों के अतिरिक्त अनेक उपस्मृतियों का भी उल्लेख धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है। ये उपस्मृतियाँ मूल स्मृतियों का विस्तार अथवा विशिष्ट विषयों पर केन्द्रित व्याख्या के रूप में देखी जा सकती हैं। जाबालि, आपस्तम्ब, बौधायन, कणाद, वैशम्पायन आदि के नाम उपस्मृति कर्ताओं के रूप में उल्लिखित हैं। अंगिरा स्मृति में भी धर्मशास्त्रकारों को लिखा है, परन्तु अंगिरा ने जिनका नामोल्लेख किया है, उन्हें उपस्मृतिकार कहा है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कंदो लोगाक्षिकाश्यपौ। व्यासः सनत्कुमारश्च शंतनुर्जनकस्तथा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकर्णिः कपिंजलः। बोधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च। पैठीनसीर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः॥ (अंगिरा स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' जाबालि, नचिकेता, स्कंद, लोगाक्षि, कश्यप, व्यासः, सनत्कुमार, शंतनु, जनक, व्याघ्र, कात्यायन, जातुकर्णि, कपिंजल, बोधायन, कणाद, विश्वामित्र, पैठीनसि, गोभिल। ये सभी उपस्मृतिकार हैं। उपस्मृतियों के माध्यम से धर्मशास्त्रीय परम्परा अधिक व्यापक होती है, जिससे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का समावेश सम्भव हो पाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===टीकाएँ एवं निबन्ध ग्रन्थ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*उत्तर भारत: काशीनाथ उपाध्याय का कार्य - धर्मसिंधु।&lt;br /&gt;
*महाराष्ट्र: विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका और कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु।&lt;br /&gt;
*दक्षिण भारत: वैद्यनाथ दीक्षित का वैद्यनाथ-दीक्षितीयम इसको  स्मृतिमुक्ताफल ग्रंथ के रूप में भी जानते हैं।&lt;br /&gt;
*संन्यास आश्रम में स्थित जन: विद्येश्वर-संहिता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रकारों की परम्परा==&lt;br /&gt;
याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनांऽगिराः। यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाराशर्यव्यासशंखलिखितौ दक्षगौतमौ। शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इन श्लोकों के अनुसार मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पाराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप और वसिष्ठ - ये सभी धर्मशास्त्रों के प्रवर्तक (प्रणेता) माने गए हैं। यहाँ पाराशर और व्यास जैसे उत्तरवर्ती काल के मुनियों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि धर्मशास्त्रकारों में कोई कठोर कालक्रम (पौर्वापर्य) नहीं है। जैसे मनु ने धर्म का प्रतिपादन किया, वैसे ही अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से उसी धर्म को विवेचित किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्रों के वर्ण्यविषय ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* '''आश्रम व्यवस्था -''' &lt;br /&gt;
* '''वर्ण व्यवस्था -''' &lt;br /&gt;
* '''नारी की स्थिति एवं धर्मशास्त्रीय अवधारणाएँ -''' नारी का धन, स्त्री का धर्म, स्त्रियों की पवित्रता, कन्या द्वारा पति वरण करना, अगम्या स्त्रियाँ, पत्नी की रक्षा, कन्या विक्रय का पाप, विधवा का धर्म आदि।&lt;br /&gt;
* '''शुद्धि एवं पवित्रता -''' पात्र,वस्त्र, अन्न, भूमि, शुद्धि के साधन एवं उपाय, शरीर की शुद्धि एवं अन्य शुद्धियां।&lt;br /&gt;
* '''संस्कार -''' गर्भाधान, उपनयन, विवाह एवं अंत्येष्टि आदि संस्कार।&lt;br /&gt;
* '''दंड एवं प्रायश्चित -''' विदेश यात्रा, हत्या (वध), परस्त्रीगमन, सुरापान, स्वर्ण आदि चोरी का प्रायश्चित।&lt;br /&gt;
* '''विविध नियम एवं वृत्तियां -''' अभिवादन नियम, यज्ञोपवीत धारण विधि, आचमन एवं प्रक्षालन विधि, अशौच, तर्पण, स्नान, भोजन एवं दान विधि।&lt;br /&gt;
* '''जप, तप एवं कृच्छ्र -'''&lt;br /&gt;
* '''प्रकीर्ण -''' संपत्ति का उत्तराधिकार एवं विभाजन, पुत्रों के प्रकार, भक्ष्याभक्ष्य एवं पेयापेय विचार, योग साधन आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे - स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Livelihood_(%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE)&amp;diff=137553</id>
		<title>Livelihood (आजीविका)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Livelihood_(%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE)&amp;diff=137553"/>
		<updated>2026-02-05T18:12:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परंपरा में आजीविका अथवा जीवन-वृत्ति मात्र आर्थिक दायित्व न होकर एक विस्तृत नैतिक, सामाजिक और धर्मसंबद्ध अवधारणा है। धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा नीतिग्रंथ इस विषय को कर्तव्य, उत्तरदायित्व और सामाजिक संतुलन के रूप में निरूपित करते हैं। प्रस्तुत लेख में जीवन-वृत्ति की संकल्पना, उसके शास्त्रीय आधार, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व तथा आधुनिक संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
मानव जीवन की निरंतरता का मूल आधार जीवन-वृत्ति है। भारतीय परंपरा में जीविका केवल आत्मनिर्वाह का साधन नहीं, अपितु समाज और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। भरण-पोषण का प्रश्न तभी उत्पन्न होता है जब व्यक्ति आश्रित संबंधों - जैसे माता-पिता, पत्नी, संतान, वृद्ध एवं दुर्बल जन के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है। शास्त्रों ने इसे धर्म का अनिवार्य अंग माना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आजीविका की संकल्पना॥ Concept of livelihood==&lt;br /&gt;
भारतीय धर्मशास्त्रीय परंपरा में मानव जीवन के सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक आयामों का समन्वित विधान प्रस्तुत करती है। जीवन-वृत्ति अथवा भरण-पोषण का प्रश्न इसमें केवल जीविका अर्जन तक सीमित नहीं है, अपितु धर्म, नीति और सामाजिक उत्तरदायित्व से गहराई से जुड़ा हुआ है। धर्मशास्त्रमें प्रतिपादित धनागमन के सात धर्मयुक्त स्रोत तथा आजीविका के दस मान्य साधनों का विश्लेषण किया गया है, साथ ही उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रों में भरण-पोषण का दायित्व==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मनुस्मृति में धनागमन स्रोत'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुस्मृति में धनागमन के सात साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है, जिन्हें सभी वर्णों के लिए सामान्य रूप से स्वीकार किया गया है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभः क्रयो जयः। प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च॥ (मनुस्मृति १०.११५)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनुस्मृति], अध्याय 10, श्लोक 115।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;धर्मसम्मत धन प्राप्ति के  दाय, लाभ, क्रय, जय, प्रयोग, कर्मयोग तथा सत्प्रतिग्रह ये सात प्रकार के साधन बताए गए हैं। इन सातों को धर्मानुकूल माना गया है और इन्हीं माध्यमों से अर्जित धन को शास्त्रसम्मत एवं पवित्र कहा गया है। इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===दाय॥ Inheritance===&lt;br /&gt;
धर्मयुक्त उत्तराधिकार द्वारा प्राप्त संपत्ति दाय कहलाती है। यह पारिवारिक संपत्ति का वैध और नैतिक हस्तांतरण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===लाभ॥ Gains===&lt;br /&gt;
मित्रों, संबंधियों अथवा समाज से प्राप्त उपहार, सहयोग अथवा सहायता द्वारा अर्जित धन लाभ की श्रेणी में आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===क्रय॥ Purchase / Exchange===&lt;br /&gt;
अपने धन से क्रय-विक्रय कर प्राप्त संपत्ति क्रय कहलाती है। यह व्यापार और विनिमय का धर्मसम्मत रूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जय॥ Victory===&lt;br /&gt;
धर्मयुक्त युद्ध या प्रतियोगिता में प्राप्त संपत्ति जय मानी जाती है। यह विशेषतः क्षत्रिय वर्ग से संबद्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===प्रयोग॥ Investment / Lending===&lt;br /&gt;
अपने धन को अन्य कार्यों में लगाकर उससे आय प्राप्त करना प्रयोग कहलाता है, जैसे ब्याज, साझेदारी अथवा निवेश।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कर्मयोग॥ Labour and Profession===&lt;br /&gt;
कृषि, उद्योग, शिल्प, पशुपालन आदि श्रम आधारित कार्यों से अर्जित धन कर्मयोग के अंतर्गत आता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===सत्प्रतिग्रह॥ Honourable Acceptance===&lt;br /&gt;
धर्मयुक्त रूप से प्राप्त दान या वेतन को सत्प्रतिग्रह कहा गया है, विशेषतः ब्राह्मणों के लिए। मनु के अनुसार, इन स्रोतों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार का धन अधर्मजन्य  माना गया है। मनु के अनुसार, इन स्रोतों के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार का धन अधर्मजन्य अथवा अवैध माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आजीविका के साधन==&lt;br /&gt;
नागरिक के जीवन-निर्वाह हेतु आर्थिक संसाधनों की अनिवार्य आवश्यकता होती है। जिन कार्यों के माध्यम से व्यक्ति को जीवनयापन की आवश्यक सुविधाएँ सुलभ होती हैं, वे उसकी आजीविका के साधन कहलाते हैं। समाज में विभिन्न व्यक्तियों के पास भिन्न-भिन्न प्रकार की क्षमताएँ, रुचियाँ तथा योग्यताएँ पाई जाती हैं। शिक्षा के माध्यम से इन अंतर्निहित क्षमताओं का परिष्कार कर उनका सम्यक् विकास किया जाता है, जिससे व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुरूप आजीविका अर्जित करने में समर्थ होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सर्वविदित है कि सम्पूर्ण समाज एक ही प्रकार की आजीविका पर आधारित नहीं रह सकता। ऐसा न तो व्यावहारिक है और न ही सामाजिक संतुलन की दृष्टि से संभव। इसी कारण मनुस्मृति में मानव जीवन के निर्वाह हेतु विविध प्रकार की आजीविकाओं का उल्लेख किया गया है। मनु के अनुसार, विभिन्न स्वभाव, क्षमता एवं परिस्थितियों में स्थित मनुष्यों के लिए पृथक-पृथक आजीविका-मार्ग निर्धारित किए गए हैं, क्योंकि सभी मनुष्यों का जीवन किसी एक ही प्रकार की आजीविका से संचालित नहीं हो सकता। मनुस्मृति में जीवन-निर्वाह हेतु दस प्रकार की आजीविकाओं का उल्लेख मिलता है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;विद्या शिल्पं भृतिः सेवा गोरक्ष्यं विपणिः कृषिः। धृतिर्भैक्षं कुसीदं च दश जीवनहेतवः॥ (मनुस्मृति 10.116)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनुस्मृति], अध्याय 10, श्लोक 116।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' विद्या (ज्ञानार्जन), शिल्प (कला-कौशल), भृति (वेतन या आजीविका हेतु किया गया कार्य), सेवा (किसी के अधीन की गई सेवा), गोरक्षा (पशुपालन), विपणि (व्यापार), कृषि (खेती), धृति (धैर्यपूर्वक संचय/स्वावलम्बन), भैक्ष (भिक्षा) तथा कुसीद (ऋण या सूद पर दिया गया धन) - ये दस मनुष्य के जीवन-निर्वाह के साधन कहे गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''विद्या -''' विद्या से अभिप्राय वेदविद्या से है, अर्थात् संसार की विविध क्रियाओं, नियमों और व्यवस्थाओं का सम्यक् ज्ञान। इस विद्या के अन्तर्गत शिक्षा, कल्प (अनुष्ठान-विधान), इतिहास, व्याकरण, ज्योतिष (खगोल एवं अंतरिक्ष विज्ञान), निरुक्त (वेदपदों की व्याख्या) तथा तर्क आदि शास्त्र सम्मिलित हैं। यह विद्या अध्ययन-अध्यापन के रूप में ग्रहण की जाती थी। इसके माध्यम से समाज को आध्यात्मिक, बौद्धिक एवं व्यावहारिक मार्गदर्शन प्राप्त होता था तथा इसी के द्वारा आजीविका हेतु आवश्यक वस्तुएँ और साधन उपलब्ध होते थे। ज्ञानार्जन एवं शिक्षण के माध्यम से आजीविका अर्जन, इसमें वेद, शास्त्र, व्याकरण, तर्क, खगोल, चिकित्सा आदि सम्मिलित हैं।&lt;br /&gt;
#'''शिल्प -''' शिल्प से तात्पर्य सभी प्रकार की कलाओं एवं तकनीकी कौशलों से है। इसके अन्तर्गत निर्माण-कार्य, वास्तु एवं शिल्पकला, वस्त्र-निर्माण तथा वस्त्रों को सुगन्धित करने जैसी विधियाँ आती हैं। आधुनिक परिभाषा में इन्हें इंजीनियर, आर्ट-डिज़ाइनर, शिल्पकार आदि कहा जा सकता है। सभी प्रकार के कुटीर उद्योग, लघु एवं हस्तशिल्प उद्योग, नाट्यकला, नृत्य, गायन, वादन, अभिनय तथा जनसम्पर्क और विज्ञापन से सम्बद्ध कलाएँ भी शिल्प के अन्तर्गत ही मानी जाती हैं। इसी प्रकार योद्धा वर्ग अपनी युद्धकला एवं रक्षा-कौशल के प्रतिफलस्वरूप धन प्राप्त कर आजीविका का निर्वाह करता था। इस प्रकार शिल्प जीवन-यापन का एक महत्त्वपूर्ण एवं बहुआयामी साधन रहा है। निर्माण, हस्तकला, तकनीकी एवं कलात्मक कार, आधुनिक संदर्भ में इसे इंजीनियरिंग, डिजाइन और तकनीकी सेवाओं से जोड़ा जा सकता है।&lt;br /&gt;
#'''भृति -''' वेतन या पारिश्रमिक के रूप में सेवा करके जीवन-यापन करना है। भृति का तात्पर्य प्रैष्यभाव के अंतर्गत पारिश्रमिक प्राप्त करने से है। अर्थात् किसी विशेष संवाद, आदेश अथवा सन्देश के प्रेषण और प्रत्यावर्तन के प्रतिफलस्वरूप वेतन ग्रहण करना। प्राचीन समाज में यह कार्य प्रायः उन व्यक्तियों द्वारा किया जाता था जो राजपुरुषों, उच्चाधिकारियों अथवा प्रतिष्ठित व्यक्तियों के दूत के रूप में सन्देश लाने–ले जाने का दायित्व निभाते थे। व्यापारिक एवं वाणिज्यिक सन्देशों का आदान-प्रदान भी इसी श्रेणी में सम्मिलित माना जाता था।&lt;br /&gt;
#'''सेवा -''' दूसरों की सहायता एवं संरक्षण के बदले प्राप्त आय, जिसमें राजकीय और निजी सेवाएँ सम्मिलित हैं। सेवा का अर्थ है पराश्रय जीवन, अर्थात् दूसरे की आज्ञा का पालन करते हुए उसके अधीन कार्य करना और उसके प्रतिफलस्वरूप धन या वेतन प्राप्त करना। राज्य से सम्बन्धित सभी शासकीय सेवाएँ तथा व्यक्तिगत रूप से की जाने वाली निजी सेवाएँ (नौकरियाँ) इसी श्रेणी में आती हैं। इसके अतिरिक्त, विविध प्रकार की दैनिक मजदूरी भी सेवा-वृत्ति के अन्तर्गत ही मानी जाती है। धर्मशास्त्रीय परम्परा में यह कार्य प्रायः शूद्रों द्वारा किया जाने वाला बताया गया है। वर्तमान समय में भी जो व्यक्ति इस प्रकार की आजीविका को अपनाते हैं, उन्हें शास्त्रीय दृष्टि से शूद्र-वर्ग में परिगणित किया जाता है।&lt;br /&gt;
#'''गोरक्षा -''' पशुपालन एवं कृषि-आधारित आजीविका, विशेषतः गौ-पालन आदि। गोरक्षण - पशुपालन को गोरक्षण कहा गया है। इसके अंतर्गत गाय, बैल, भैंस आदि विविध पशुओं का पालन-पोषण कर उनसे दुग्ध, घृत, गोमय, कृषि-सहायता आदि के माध्यम से आय प्राप्त करना सम्मिलित है। भारतीय समाज में गोरक्षण को न केवल आर्थिक आजीविका का साधन माना गया, अपितु धार्मिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी इसे अत्यन्त पवित्र कर्म स्वीकार किया गया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में इसका विशेष महत्व रहा है।&lt;br /&gt;
#'''विपणि -''' व्यापार, वस्तुओं का क्रय-विक्रय। वस्तुओं के क्रय-विक्रय द्वारा आय अर्जन करना ‘विपणि’ कहलाता है। यह कृषि से भिन्न एक स्वतंत्र आजीविका-साधन माना गया, जिसमें व्यापार, वाणिज्य, बाजार व्यवस्था तथा दूरस्थ क्षेत्रों के साथ लेन-देन सम्मिलित था। प्राचीन भारत में व्यापार को समृद्धि का प्रमुख माध्यम माना गया और समाज के आर्थिक संतुलन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।&lt;br /&gt;
#'''कृषि -''' भूमि पर श्रम कर अन्न एवं अन्य उत्पादों का उत्पादन। भूमि में बीज बोकर अन्न एवं अन्य वनस्पतियों का उत्पादन करना कृषि कहलाता है। यह आय प्राप्ति का प्रमुख साधन रहा है, जिसमें समाज का एक बड़ा वर्ग संलग्न था। भारतीय सामाजिक-आर्थिक संरचना में कृषि को आधारभूत आजीविका के रूप में स्वीकार किया गया है।&lt;br /&gt;
#'''धृति -''' धैर्यपूर्वक कठिन कार्यों द्वारा आजीविका, जिसमें जोखिमपूर्ण अथवा परिश्रमसाध्य कर्म सम्मिलित हैं। धैर्यपूर्वक जीवन निर्वाह करना धृति कहलाता है। जिन व्यक्तियों में तत्काल अधिक आय अर्जन की क्षमता नहीं होती, वे संतोष और निरन्तर प्रयास के माध्यम से अपनी क्षमता का विकास करते हैं अथवा क्रमशः धन संचय कर अन्य व्यवसायों की ओर अग्रसर होते हैं। यह आत्मसंयम एवं दीर्घकालिक दृष्टि का प्रतीक है।&lt;br /&gt;
#'''भैक्ष -''' भिक्षाटन द्वारा जीवन निर्वाह करना भैक्ष कहा गया है। यह आजीविका-विधि विशेष रूप से अपरिग्रही ब्राह्मणों एवं वैराग्यशील व्यक्तियों के लिए निर्धारित मानी गई है, जिसमें आत्मसंयम और सामाजिक अनुग्रह का समन्वय दिखाई देता है।&lt;br /&gt;
#'''ऋण/कुसीद -''' सीमित और धर्मयुक्त रूप से ऋण देकर आय अर्जन, जिसे मनु ने विशेष परिस्थितियों में स्वीकार किया है। अपने पास उपलब्ध धन को आवश्यकता-मंद व्यक्तियों को देकर उससे सूद लेना कुसीद कहलाता है। यह भी आय प्राप्ति का एक साधन माना गया है, यद्यपि इसके नैतिक पक्ष पर धर्मशास्त्रों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया गया है।  इस प्रकार विद्या, शिल्प, भृति, सेवा, गोरक्षण, विपणि, कृषि, धृति, भैक्ष एवं कुसीद - ये सभी जीवन-निर्वाह के विविध साधन हैं, जो समाज की आर्थिक विविधता, श्रम-विभाजन तथा नैतिक मर्यादाओं को प्रतिबिम्बित करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सूद पर धर्मशास्त्र का दृष्टिकोण'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनुस्मृति (10.117) में स्पष्ट किया गया है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए सूद पर धन लेना निषिद्ध है। किंतु वैश्यों के लिए यह सीमित रूप में स्वीकार्य है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मनु आर्थिक गतिविधियों को वर्णानुसार नैतिक मर्यादाओं में बांधते हैं। मनुस्मृति की जीवन-वृत्ति संबंधी अवधारणा यह सुनिश्चित करती है कि -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*आजीविका समाज को हानि न पहुँचाए&lt;br /&gt;
*धन का स्रोत पारदर्शी और धर्मसम्मत हो&lt;br /&gt;
*भरण-पोषण के माध्यम से परिवार और समाज की स्थिरता बनी रहे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह व्यवस्था आज के समय में आर्थिक नैतिकता और सतत विकास की अवधारणा से साम्य रखती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भरण-पोषण और उत्तराधिकार का संबंध ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0)&amp;diff=137552</id>
		<title>Dharmashastra (धर्मशास्त्र)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0)&amp;diff=137552"/>
		<updated>2026-02-07T00:52:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: नया लेख प्रारंभ - धर्मशास्त्र&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परम्परा द्वारा समाज में धर्मसम्मत आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त, सामाजिक एवं वैयक्तिक कर्तव्य-अकर्तव्य आदि कर्मों के सुव्यवस्थित निर्धारण हेतु धर्मशास्त्र का प्रवर्तन हुआ तथा वैदिकसाहित्य में यह कल्प नामक वेदांग के रूप में प्रतिष्ठित है। इस शास्त्र के अन्तर्गत मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर, बृहस्पति, बौधायन, जीमूतवाहन, विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य आदि आचार्यों के सूत्र, स्मृतियाँ, भाष्य एवं समकालीन निबन्धात्मक प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र में सामाजिक आचार-विचार, व्यवस्था, वर्ण-आश्रम धर्म, नीति, सदाचार, राजा-प्रजा के अधिकार एवं कर्तव्य तथा शासन से सम्बन्धित नियम आदि का सुव्यवस्थित विवेचन किया गया है। धर्मशास्त्र शब्द दो पदों धर्म और शास्त्र के संयोग से निर्मित है। इन दोनों पदों के शाब्दिक अर्थों का ज्ञान आवश्यक है। धर्म शब्द पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। प्रसिद्ध प्राच्यविद् पण्डित तारिणीश झा ने संस्कृत-शब्दार्थ-कोश में क्रमशः - &amp;lt;blockquote&amp;gt;ध्रियते लोकानेन, ध्रियते लोकाः वा तथा ध्रियते लोकान् ध्रियते पुण्यात्मान् इति वा। (शब्दकोश)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार व्युत्पत्ति करते हुए धृ धातु से मन प्रत्यय द्वारा धर्म शब्द की निष्पत्ति मानी है तथा इसके पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग दोनों प्रयोगों को स्वीकार किया है। शास्त्र शब्द का अर्थ भी उपर्युक्त शब्दकोशकार द्वारा प्रायः समान रूप में ग्रहण किया गया है। शास् धातु से ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से शास्त्र शब्द की निष्पत्ति मानी गई है। विभिन्न विद्वानों ने इसके अर्थ क्रमशः आज्ञा, उपदेश, नियम, धार्मिक ग्रन्थ, वेद एवं धर्मशास्त्र तथा जनसामान्य के कल्याण हेतु विधि-विधान प्रतिपादित करने वाले ग्रन्थ स्वीकार किए हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्र शब्द का तात्पर्य उस व्यवस्था से है, जो मनुष्य के आचार-व्यवहार, कर्तव्य-अकर्तव्य, सामाजिक मर्यादाओं एवं आध्यात्मिक उद्देश्यों को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। सामान्यतः स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र का पर्याय माना जाता है। मनुस्मृति में यह प्रतिपादित किया गया है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् श्रुति को वेद तथा स्मृति को धर्मशास्त्र के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रकार स्मृतिग्रन्थों को धर्मशास्त्र की संज्ञा प्रदान की गई है तथा स्मृतिकारों को धर्मशास्त्रकार कहा गया है। इस प्रकार धर्मशास्त्र का मूलाधार वैदिक परम्परा में निहित है, परन्तु उसका व्यावहारिक स्वरूप सूत्र, स्मृति, भाष्य एवं निबन्धात्मक ग्रन्थों के माध्यम से विकसित हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र से सम्बन्धित साहित्य मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त है - धर्मसूत्र एवं स्मृतियाँ। वैदिक अध्ययन की परम्परा में षड्वेदाङ्गों का विधान किया गया, जिन्हें शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द एवं ज्योतिष कहा जाता है। इनमें कल्प वेदांग का विशेष स्थान है, जिसके चार प्रमुख भेद माने गए हैं - श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र तथा शुल्बसूत्र। इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* '''श्रौतसूत्र''' - श्रौतसूत्रों में वेदाधारित यज्ञों का क्रमबद्ध, सुव्यवस्थित तथा विधिपूर्वक विवरण प्राप्त होता है। इनमें श्रुति (वेदों) में वर्णित याग-यज्ञों की प्रक्रिया का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया गया है।&lt;br /&gt;
* '''गृह्यसूत्र''' - गृह्यसूत्रों का मुख्य विषय कर्मकाण्ड है। इनमें गृहस्थ जीवन से सम्बन्धित यज्ञों, संस्कारों तथा उत्सवों आदि से सम्बद्ध विविध विधानों का निरूपण किया गया है।&lt;br /&gt;
* '''धर्मसूत्र''' - आचारशास्त्र से सम्बन्धित सूत्रों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है। इनमें सामाजिक, नैतिक एवं वैयक्तिक कर्तव्यों का संहितात्मक विवेचन प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
* '''शुल्बसूत्र''' - शुल्बसूत्रों में यज्ञों के लिए वेदियों के निर्माण से सम्बन्धित मापन, रेखांकन एवं स्थापत्य-विधियों का विशद वर्णन किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मसूत्र प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, जिनमें राजधर्म के सिद्धान्तों का क्रमबद्ध एवं संहितात्मक प्रतिपादन किया गया है। इनमें राजा के कर्तव्य, चतुर्वर्ण व्यवस्था, कर-नियम, सम्पत्ति-विधान आदि विषयों का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। राजा तथा राज्य से सम्बन्धित विषयों को धर्मसूत्रों के अन्तर्गत विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है और प्रत्येक धर्मसूत्र में किसी न किसी रूप में राजधर्म की चर्चा अवश्य की गई है। क्योंकि धर्मसूत्रों का प्रधान विषय धर्म है, अतः धर्म की परिधि में राजा तथा राज्य-व्यवस्था के सिद्धान्त भी अन्तर्निहित माने गए हैं। विशेषतः विष्णु धर्मसूत्र में राजदण्ड, न्यायिक व्यवस्था एवं प्रशासन को राजधर्म का अनिवार्य अंग स्वीकार किया गया है। इस प्रकार न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्तों का सुव्यवस्थित प्रतिपादन धर्मसूत्रों के माध्यम से किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्मसूत्र और उसका वर्गीकरण ===&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रीय साहित्य का विकास मुख्यतः धर्मसूत्रों से प्रारम्भ होकर स्मृति एवं निबन्ध ग्रन्थों तक विस्तृत है। बौधायन, आपस्तम्ब, गौतम एवं वसिष्ठ आदि धर्मसूत्रकारों ने धर्मसूत्रों के माध्यम से सामाजिक आचारों एवं विधिक मान्यताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया। इसके पश्चात् मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, पराशर, बृहस्पति आदि स्मृतिकारों ने धर्म के विविध पक्षों राजधर्म, व्यवहार, दण्ड, उत्तराधिकार, स्त्री-अधिकार एवं सामाजिक न्याय का विस्तृत विवेचन किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== स्मृतियों की अवधारणा ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== स्मृतियों की संख्या ====&lt;br /&gt;
निबन्धकारों एवं धर्मशास्त्रीय परम्परा में स्मृतियों की संख्या को लेकर विभिन्न मत प्राप्त होते हैं। कुछ परम्पराओं में 36 स्मृतियों का उल्लेख है, तो कहीं यह संख्या और अधिक बतायी गयी है। वर्तमान में उपलब्ध स्मृतियों की संख्या सौ से भी अधिक मानी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== उपस्मृति परम्परा ====&lt;br /&gt;
मुख्य स्मृतियों के अतिरिक्त अनेक उपस्मृतियों का भी उल्लेख धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में मिलता है। ये उपस्मृतियाँ मूल स्मृतियों का विस्तार अथवा विशिष्ट विषयों पर केन्द्रित व्याख्या के रूप में देखी जा सकती हैं। जाबालि, आपस्तम्ब, बौधायन, कणाद, वैशम्पायन आदि के नाम उपस्मृति कर्ताओं के रूप में उल्लिखित हैं। उपस्मृतियों के माध्यम से धर्मशास्त्रीय परम्परा अधिक व्यापक होती है, जिससे विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का समावेश सम्भव हो पाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== धर्मशास्त्रकारों की परम्परा ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निष्कर्ष ==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में युगसापेक्ष एवं आधुनिक सन्दर्भों से सामंजस्य रखने वाले विषयों जैसे - स्त्री-अधिकार, हिन्दू विधि, संस्कार-प्रणाली, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-चिन्तन, मानवाधिकार, राजधर्म, दण्ड-व्यवस्था तथा अपराध-विचार पर अध्ययन-अध्यापन सम्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप सामाजिक विधि-व्यवस्थाओं के उन्नत दार्शनिक आयामों का बोध होता है तथा मानवीय मूल्यों के विकास के साथ आत्मिक उन्नयन भी सुनिश्चित होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Livelihood_(%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE)&amp;diff=137551</id>
		<title>Livelihood (आजीविका)</title>
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		<updated>2026-02-04T13:41:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: नया लेख प्रारंभ-आजीविका&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परंपरा में आजीविका अथवा जीवन-वृत्ति मात्र आर्थिक दायित्व न होकर एक विस्तृत नैतिक, सामाजिक और धर्मसंबद्ध अवधारणा है। धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा नीतिग्रंथ इस विषय को कर्तव्य, उत्तरदायित्व और सामाजिक संतुलन के रूप में निरूपित करते हैं। प्रस्तुत लेख में जीवन-वृत्ति की संकल्पना, उसके शास्त्रीय आधार, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व तथा आधुनिक संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
मानव जीवन की निरंतरता का मूल आधार जीवन-वृत्ति है। भारतीय परंपरा में जीविका केवल आत्मनिर्वाह का साधन नहीं, अपितु समाज और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। भरण-पोषण का प्रश्न तभी उत्पन्न होता है जब व्यक्ति आश्रित संबंधों—जैसे माता-पिता, पत्नी, संतान, वृद्ध एवं दुर्बल जन—के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है। शास्त्रों ने इसे धर्म का अनिवार्य अंग माना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== आजीविका की संकल्पना ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== धर्मशास्त्रों में भरण-पोषण का दायित्व ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भरण-पोषण और उत्तराधिकार का संबंध ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निष्कर्ष ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137550</id>
		<title>Treasury System (कोष व्यवस्था)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137550"/>
		<updated>2026-02-03T09:55:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन में राज्य की स्थिरता एवं उन्नति के लिए कोष को प्रमुख स्थान प्राप्त है। कौटिल्य द्वारा रचित [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को न केवल राज्य का आधार माना गया है, अपितु उसे दण्ड, सेना, प्रशासन और लोककल्याण की शक्ति का मूल स्रोत भी बताया गया है। प्रस्तुत लेख में कोष-संरचना, कोष-वृद्धि के उपाय, कोष-क्षय के कारण तथा कोष में संचित विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों का विश्लेषण किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि कौटिल्य की कोष-नीति केवल राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं थी, अपितु नैतिक प्रशासन, भ्रष्टाचार-नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा की समग्र योजना प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
राज्य संचालन का मूलाधार आर्थिक सुदृढ़ता है। प्राचीन शास्त्रकारों ने राज्य के [[Saptanga Siddhanta (सप्तांग सिद्धांत)|सप्ताङ्ग सिद्धान्त]] में कोष को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। कौटिल्य भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि समस्त प्रशासनिक क्रियाएँ कोष पर ही आधारित होती हैं। कोष के बिना न तो सेना का संचालन सम्भव है और न ही दण्ड-व्यवस्था की प्रभावशीलता। इसीलिए राजा का प्रथम कर्तव्य कोष की रक्षा एवं वृद्धि बताया गया है-&amp;lt;ref&amp;gt;शोधकर्त्री-अनुराधा भारद्वाज, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/21647/3/shukraniti.pdf शुक्रनीति का अनुशीलन] (२०१३), शोधकेन्द्र - कुमाऊं विश्वविद्यालय (पृ० १९७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
कोषपूर्वाः सर्वारंभाः। तस्मात् पूर्वं कोषमवेक्षेत्॥ (कौटिल्य अर्थशास्त्र २/२) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्राचीन काल से ही राजस्व एवं सैन्य बल राज्य के प्रमुख दो स्तम्भ कहे गये हैं। आचार्य शुक्र कोष का लक्षण करते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;एकार्थ समुदायो यः स कोशः स्यात् पृथक् पृथक्। (शुक्रनीति ४/२/१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;पं० श्री ब्रह्माशंकर मिश्र, [https://archive.org/details/20230223_20230223_0110/page/n285/mode/1up शुक्रनीति] (१९६८), चतुर्थ अध्याय-कोशनिरूपण प्रकरण, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी (पृ० २०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;किसी भी एक तरह की वस्तुओं के समूह को कोष कहा जाता है जो कई तरह के होते हैं। राज्य की समृद्धि तथा लोककल्याणकारी दायित्वों के निर्वहन हेतु कोष की वृद्धि अनिवार्य मानते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;येन केन प्रकारेण धनं सञ्चिनुयात् नृपः। तेन संरक्षयेद्राष्ट्रं बलं यज्ञादिकाः क्रियाः॥ (शुक्रनीति ४/२/२)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;राजा का यह कर्तव्य है कि वह विविध उपायों द्वारा धन का संग्रह करे, जिससे संचित संपत्ति के माध्यम से राष्ट्र, सेना तथा धार्मिक कार्यों की समुचित रक्षा की जा सके। कोश वृद्धि का मूल कारण सेना को मानते हुए शुक्राचार्य जी कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम्। बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिरक्षयः॥ (शुक्रनीति ४/२/१४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सेना को राजकोष का मूल आधार माना गया है, क्योंकि सेना के माध्यम से ही कोष का संरक्षण एवं संचय सम्भव होता है। इसी प्रकार राजकोष भी सेना का आधारस्तम्भ है, क्योंकि कोष के अभाव में सेना का भरण-पोषण तथा संरक्षण नहीं किया जा सकता। इस प्रकार सेना और कोष परस्पर आश्रित हैं। जब सेना तथा राजकोष की समुचित रक्षा की जाती है, तब न केवल कोष और राज्य की समृद्धि होती है, अपितु शत्रुओं का विनाश भी सुनिश्चित होता है। महाभारत में कहा गया है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कोशश्च सततं रक्ष्यो यत्नमास्थाय राजभिः। कोशमूला हि राजानः कोशवृद्धिकरो भवेत्॥ कोष्ठागारं च ते नित्यं स्फीतं धान्यैः सुसंचितैः॥ (महाभारत ११९/१६)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D-12-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5-119 महाभारत], शांतिपर्व, अध्याय ११९, श्लोक १६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' राजाओं को चाहिए कि वे पूर्ण प्रयास और सतत सावधानी के साथ राजकोष की निरन्तर रक्षा करें, क्योंकि राजाओं की सत्ता का मूल आधार कोष ही होता है। अतः राजा को कोष की वृद्धि करने वाला होना चाहिए। राजा का भण्डारगृह सदैव अन्न-धान्यों से परिपूर्ण तथा भली-भाँति संचित होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कोष की अवधारणा॥ Concept of Treasury==&lt;br /&gt;
कौटिल्य के अनुसार कोष केवल धन-संग्रह नहीं, बल्कि राज्य की जीवन-रेखा है। [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को राज्यरूपी वृक्ष की जड़ कहा गया है। यदि जड़ सुदृढ़ है तो वृक्ष स्वतः फल-फूलता है। [[Mahabharat (महाभारत)|महाभारत]] के शान्तिपर्व तथा विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी कोष के इसी महत्त्व का उल्लेख मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कोष की अवधारणा भारतीय परम्परा में दीर्घकाल से प्रतिष्ठित रही है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - रंजना, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/566325/13/9th_file_chapter5.pdf कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र में वर्णित आय स्रोत तथा कर व्यवस्था का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक अध्ययन] (२०२२), शोधकेंद्र - बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय , रोहतक (पृ० २१०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-वृद्धि के उपाय॥ Measures for Growth of the Treasury ===&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रकारों ने कर-ग्रहण को कोष-समृद्धि का प्रमुख आधार स्वीकार किया है। [[Acharya (आचार्यः)|आचार्य]] कौटिल्य ने कर-आदान (Tax Collection) के अतिरिक्त कोष-वृद्धि (Treasury Growth) के अन्य उपायों का भी विस्तार से निरूपण किया है तथा साथ ही कोष-क्षय के कारणों को भी स्पष्ट किया है। अर्थशास्त्र में कोष-वृद्धि के अनेक व्यावहारिक साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन उपायों में राष्ट्र की सम्पत्ति में वृद्धि करना, राज्य के नैतिक चरित्र पर विशेष ध्यान देना, चोरों एवं अपराधियों पर सतत निगरानी रखना, राजकीय अधिकारियों को रिश्वत-ग्रहण (Bribery) से रोकना, समस्त प्रकार के अन्न-उत्पादन को प्रोत्साहित करना, जल और स्थल दोनों क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाली व्यापार-योग्य वस्तुओं (Tradeable Goods) की वृद्धि करना, अग्नि आदि आपदाओं से राज्य की रक्षा करना, नियत समय पर विधिपूर्वक कर-आहरण करना तथा हिरण्य आदि भेंटों को स्वीकार करना सम्मिलित है। कौटिल्य के अनुसार ये सभी [[Upayas in Indian Diplomacy|उपाय]] कोष-वृद्धि के प्रभावी साधन माने जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य ने कोष-वृद्धि के लिए अनेक व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं। इनमें प्रमुख हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''राजस्व संग्रह (कर व्यवस्था)''' - [[Krshi Vijnana (कृषिविज्ञानम्)|कृषि]], पशुपालन, व्यापार एवं उद्योग से कर संग्रह को कोष-वृद्धि का मुख्य साधन माना गया।&lt;br /&gt;
#'''उत्पादन का प्रोत्साहन''' - कृषि, मत्स्य-पालन, खनन तथा वाणिज्यिक गतिविधियों को राज्य से जोड़कर राष्ट्रीय सम्पदा बढ़ाने पर बल दिया गया।&lt;br /&gt;
#'''व्यापार नियंत्रण''' - तौल-माप, मूल्य-नियंत्रण और शुल्क व्यवस्था के माध्यम से राजकोष में नियमित आय सुनिश्चित की गई।&lt;br /&gt;
#'''आपदाकालीन व्यवस्था''' - दुर्भिक्ष, महामारी अथवा युद्ध जैसी परिस्थितियों में विशेष उपायों द्वारा कोष को पुनः सुदृढ़ करने की व्यवस्था की गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-हानि के प्रकार॥ Types of Treasury Losses===&lt;br /&gt;
कौटिल्य कोष-क्षय के कारणों के प्रति अत्यन्त सजग थे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि राज्यकर्मचारी विभिन्न रूपों में राजकोष का दुरुपयोग कर सकते हैं। अर्थशास्त्र में कोष-क्षय के आठ प्रमुख कारण बताए गए हैं जिनसे सचेत रहना भी राजा के लिए आवश्यक था जो निम्न हैं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रतिबन्धः प्रयोगोव्यवहारोऽवस्तारः परिहायणमुपभोगः परिवर्तनमपहारश्चेति कोषक्षयः॥ (अर्थशास्त्र २/२४/८/३)&amp;lt;ref&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० १०९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रतिबन्ध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन और अपहार ये आठ कोषक्षय के प्रमुख कारण हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''प्रतिबंधक (राजकर की अनुचित वसूली एवं संग्रह) -''' अर्थशास्त्र के अनुसार राजकर की वसूली कर उसे अपने अधिकार में न रखना, अधिकार में रखने पर भी उसे राजकोष में जमा न करना अथवा वसूल की गई राशि का अन्यत्र उपयोग करना - ये तीनों स्थितियाँ प्रतिबन्धक क्षय कहलाती हैं। ऐसे कृत्यों द्वारा राजकोष की हानि होती है, क्योंकि कर का  नियमानुकूल लेखांकन एवं संग्रह बाधित हो जाता है - सिद्धीनामसाधनमनवतारणमप्रवेशनं वा प्रतिबन्धः, तत्र दश-बन्धो दण्डः। कौटिल्य ने इस प्रकार के कोष-क्षय को गम्भीर अपराध मानते हुए दोषी अध्यक्ष पर क्षतिग्रस्त राशि से दस गुना दण्ड निर्धारित किया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot;&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], प्रकरण २४, अध्याय ८, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० ११०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''प्रयोग (कोषधन का निजी लेन-देन में प्रयोग)''' - राजकोष के धन से स्वयं लेन-देन कर उसे बढ़ाने का प्रयास करना प्रयोग कहलाता है। ऐसा कृत्य राज्यधन के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है - कोषद्रव्याणां वृद्धिप्रयोगः प्रयोगः। इस प्रकार के अपराध में संलिप्त अधिकारी को भी दूना दण्ड दिया जाना आवश्यक बताया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''व्यवहार (कोष की सम्पत्ति से निजी व्यापार) -'''  राजकोष में संचित धन अथवा वस्तुओं से स्वयं व्यापार करना व्यवहार कहा गया है। यह भी कोष के अनुचित उपयोग का रूप है - पण्यव्यवहारो व्यवहारः। तत्र फलद्विगुणो दण्डः। ऐसे कृत्य के लिए दोषी व्यक्ति को दुगुना दण्ड देने का विधान किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''अवस्तार (भय अथवा रिश्वत द्वारा धन-संग्रह) -''' जो अधिकारी नियत समय पर कर वसूली न करके, विलम्ब का भय दिखाकर अथवा रिश्वत प्राप्त करने की इच्छा से प्रजा को उत्पीड़ित कर धन एकत्र करता है, उसे अवस्तार कहा गया है - सिद्ध कालमप्राप्तं करोत्यप्राप्तं प्राप्तं वेत्यवस्तारः। तत्र पञ्च-बन्धो दण्डः। इस प्रकार की वसूली को अत्यन्त निन्दनीय माना गया है और ऐसे अधिकारी पर हानि की राशि से पाँच गुना दण्ड लगाने का निर्देश दिया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''परिहरण (आय को घटाकर एवं व्यय को बढ़ाकर कोष-हानि) -''' जो अध्यक्ष अथवा अधिकारी अपने दुष्कृत्यों के कारण राज्य की आय को कम कर देता है तथा व्यय की राशि को अनावश्यक रूप से बढ़ा देता है, उसे परिहरण कहा गया है - क्लृप्तमायं परिहापयति व्ययं वा विवर्धयतीति परिहापणम्। तत्र हीनचतुर्गुणो दण्डः। इस प्रकार का आचरण भी कोष को क्षति पहुँचाने वाला माना गया है और इसके लिए चौगुना दण्ड का विधान किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''उपभोग (राजकोषीय द्रव्यों का निजी उपभोग)''' - राजकोष में संचित द्रव्यों का स्वयं उपयोग करना अथवा दूसरों को उसका उपयोग करने देना उपभोग कहलाता है। यह कोष-क्षय का गम्भीर अपराध माना गया है। ऐसे अपराध में संलग्न अध्यक्ष के लिए [[Penal System (दण्ड व्यवस्था)|दण्ड]] का निर्धारण उपभोग की वस्तु के अनुसार किया गया है - स्वयमन्यैर्वा राजद्रव्याणामुपभोजनमुपभोगः। तत्र रत्नोपभोगे घातः, सारोपभोगे मध्यमः साहसदण्डः, फल्गुकुप्योपभोगे तच्च तावच्च दण्डः। यदि वह रत्नों का उपभोग करता है तो उस पर प्राणदण्ड का विधान है; साहसिक द्रव्यों के उपभोग की स्थिति में मध्यम साहस दण्ड (250 से 500 पण तक का अर्थदण्ड) निर्धारित किया गया है; तथा यदि फल, कन्द-मूल अथवा अन्य उपभोग्य पदार्थों का उपयोग किया गया हो तो उनसे सम्बन्धित द्रव्य को वापस लेकर उसकी लागत के अनुरूप दण्ड दिया जाना चाहिए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''परिवर्तन (राजकोषीय द्रव्यों का परिवर्तन) -''' राजकोष की वस्तुओं को अन्य वस्तुओं से बदल लेना परिवर्तन कहा जाता है - राजद्रव्याणामन्यद्रव्येणादानं परिवर्तनं, तद् उपभोगेन व्याख्यातम्। यह भी कोष के अनधिकृत उपयोग का ही एक रूप है। इस प्रकार के कृत्य में संलिप्त अध्यक्ष को उपभोग-क्षय के समान ही दण्ड दिया जाना चाहिए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''अपहार (लेखा-विवरण में अनियमितता) -''' प्राप्त आय को लेखा-पुस्तकों (रजिस्टर) में अंकित न करना, नियमित व्यय को रजिस्टर में दर्शाने के उपरान्त भी उसका वास्तविक उपयोग न करना, अथवा प्राप्त निधि के सम्बन्ध में छल-कपट करना - ये तीनों प्रकार के कृत्य अपहार की श्रेणी में आते हैं - सिद्धमायं न प्रवेशयति निबद्धं व्ययं न प्रयच्छति, प्राप्तां नीवीं विप्रतिजानीत इत्यपहारः। तत्र द्वादशगुणो दण्डः। अपहार के माध्यम से कोष-क्षय करने वाले अध्यक्ष को हुई हानि से बारह गुना दण्ड देने का निर्देश दिया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोषाध्यक्ष के दायित्व॥ Duties of the Treasurer===&lt;br /&gt;
कोषाध्यक्ष संस्कृत का एक संयुक्त शब्द है, जो कोष तथा अध्यक्ष शब्दों से मिलकर बना है। कोष का अर्थ है- राज्य की संचित सम्पत्ति या खजाना, तथा अध्यक्ष का अर्थ है- उसका प्रधान या निरीक्षक। इस प्रकार कोषाध्यक्ष वह अधिकारी होता है जो कोषागार का अधीक्षक एवं संरक्षक होता है। प्राचीन भारतीय प्रशासन व्यवस्था में कोषाध्यक्ष का दायित्व राज्य के खजाने की सुरक्षा, आय–व्यय का नियंत्रण तथा वित्तीय अनुशासन बनाए रखना था। वह राज्य की आय को संग्रहीत करने, भुगतान की व्यवस्था करने तथा कोष से संबंधित समस्त कार्यों का संचालन करता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यावहारिक अर्थ में कोषाध्यक्ष को खजांची (Treasurer), भुगतानकर्ता (Paymaster) तथा वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा प्रधान अधिकारी माना जाता है। आधुनिक शासन प्रणाली में उसके कार्य और दायित्वों की प्रकृति वित्त मंत्री (Finance Minister) या उच्च वित्तीय अधिकारी से तुलनीय मानी जा सकती है, यद्यपि प्रशासनिक संरचना में पदनाम भिन्न हो सकता है। कौटिल्य के अनुसार - &amp;lt;blockquote&amp;gt;सन्निधाता कोशगृहं पण्यगृहं कोष्ठागारं कुप्यगृहमायुधागारं बन्धनागारं च कारयेत्। चतुरश्रां वापीमनुदकोपस्नेहां खानयित्वा पृथुशिलाभिरुभयतः पार्श्व मूलं च प्रचित्य सारदारुपञ्जरं भूमिसमत्रितलमनेकविधानं कुट्टिम-देशस्थानतल मेकद्वारं यन्त्रयुक्तसोपानं देवतापिधानं भूमिगृहं कारयेत्। तस्योपर्युभयतोनिषेधं सप्रग्रीवमैष्टकं भाण्डवाहिनीपरिक्षिप्तं कोशगृहं कारयेत्, प्रासादं वा। जनपदान्ते ध्रुवनिधिमापदर्थमभित्यक्तः पुरुषैः कारयेत्॥ (अर्थशास्त्र २१/५/१-२)&amp;lt;ref&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], प्रकरण २१, अध्याय ५, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० ९६)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;राजकीय कोष का प्रधान अधिकारी सन्निधाता कहलाता था। सन्निधाता का दायित्व था कि वह कोषगृह, पण्यगृह, कोष्ठागार, कुष्ठागार, आयुधागार तथा कारागार आदि की स्थापना कर उनकी समुचित देखरेख करे। कोषगृह आदि की संपूर्ण व्यवस्था उसके अधीन संचालित होती थी तथा कोषाध्यक्ष, पण्याध्यक्ष आदि अन्य अधिकारी उसके निर्देशन में अपने-अपने कार्यों का निर्वहन करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोषगृह में विविध प्रकार की मूल्यवान वस्तुओं का संग्रह किया जाता था। कोषगृह के निर्माण के विषय में आचार्य कौटिल्य ने विशेष तकनीकी निर्देश दिए हैं। उनके अनुसार कोषगृह का निर्माण ऐसे सुरक्षित स्थान पर किया जाना चाहिए जहाँ न जल का प्रवेश हो और न ही आर्द्रता। इसकी दीवारें तथा फर्श सुदृढ़ शिलाओं से निर्मित हों तथा भीतर लकड़ी के खम्भों के बीच एक पृथक कक्ष बनाया जाए, जिसमें केवल एक द्वार हो। उस कक्ष के मध्य भाग में भूमि को समतल कर उसमें एक गड्ढा बनाया जाए, जिसमें चन्दन की लकड़ी स्थापित हो और उस पर देवता की प्रतिष्ठा की जाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके ऊपर एक पृथक कोषागार का निर्माण किया जाए, जो चारों ओर से सुरक्षित एवं बंद हो, जिसकी छत दृढ़ हो, ईंटों से निर्मित हो तथा जिसमें कोषीय वस्तुओं को रखने हेतु नालीयुक्त व्यवस्था की गई हो। इस प्रकार कौटिल्य ने कोषगृह की संरचना में सुरक्षा, पवित्रता एवं सुव्यवस्थित संग्रह - तीनों पर विशेष बल दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-संग्रह॥ Treasury Collection ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार्य शुक्र ने कोष को सुखद तथा दुःखद - इन दो प्रकारों में विभाजित किया है। उनके अनुसार जो कोष राजा, प्रजा, सेना तथा धार्मिक कृत्यों के हित में प्रयुक्त होता है, वही सुखद कोष कहलाता है। ऐसा कोष राज्य की समृद्धि, सामाजिक संतुलन तथा लोककल्याण का साधन बनता है। इसके विपरीत, जो कोष अनुचित साधनों से संचित हो, या जिसे केवल व्यक्तिगत सुख, पत्नी–पुत्र अथवा संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए उपयोग किया जाए, वह दुःखद कोष माना जाता है। ऐसा धन न तो वास्तविक सुख प्रदान करता है और न ही स्थायी कल्याण का कारण बनता है, अपितु अंततः कष्ट और पतन का हेतु बनता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;बलप्रजारक्षणार्थं यज्ञार्थं कोशसङ्ग्रहः। परत्रेह च सुखदो नृपास्यान्यश्च दुःखदः॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्रीपुत्रार्थं कृतो यश्च स्वोपभोगाय केवलम्। नरकायैव स ज्ञेयो न परत्र सुखप्रदः॥ (शुक्रनीति ४/२/३-४) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार शुक्रनीति में कोष का निर्धारण उसके उपार्जन के साधन (means of acquisition) तथा उसके उपयोग के उद्देश्य (purpose of utilisation) के आधार पर किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष में संचित सम्पत्तियों के प्रकार॥ Types of Assets Stored in the Treasury===&lt;br /&gt;
आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजकोष में संचित सम्पदाओं (Assets) एवं मुद्राओं (Currency) के स्वरूप का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। उन्होंने एक कुशल जौहरी की भाँति विविध प्रकार के रत्नों और मूल्यवान वस्तुओं, जैसे - मोती, मणि, हीरा, मूंगा, चन्दन, बहुमूल्य वस्त्र, स्वर्ण एवं रजत से निर्मित आभूषण (Gold and Silver Ornaments) तथा स्वर्ण, रजत और ताम्र धातुओं से निर्मित मुद्राओं - का सूक्ष्म एवं प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है। इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि कौटिल्य को कोष में संचित सम्पत्ति के भौतिक स्वरूप (Treasury Management) तथा उसके आर्थिक महत्व (Material Wealth Classification) का गहन ज्ञान था। उनके अनुसार राजकोष में संचित सम्पदा (Stored Wealth) मुख्यतः स्वर्ण, रजत, हीरा, मोती आदि बहुमूल्य धातुओं एवं रत्नों के रूप में विद्यमान रहती थी, जो राज्य की आर्थिक सुदृढ़ता (Economic Stability of the State) का आधार मानी जाती थी।&amp;lt;ref&amp;gt;पी०वी० काणे, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.306909/page/n102/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास] (१९६५), द्वितीय भाग-अध्याय ५, हिन्दी विभाग सूचना समिति, लखनऊ (पृ० ६६७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
कौटिल्य की कोष-व्यवस्था केवल आर्थिक [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]] नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रशासनिक दर्शन है। कोष-वृद्धि, कोष-संरक्षण और कोष नियन्त्रण - ये तीनों राज्य की स्थिरता के मूल स्तम्भ हैं। आधुनिक सार्वजनिक वित्त एवं प्रशासनिक पारदर्शिता की अवधारणाओं में भी कौटिल्य के सिद्धान्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। अतः प्राचीन भारतीय कोष-व्यवस्था को भारतीय आर्थिक चिन्तन की आधारशिला कहा जा सकता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Arthashastra]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137549</id>
		<title>Treasury System (कोष व्यवस्था)</title>
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		<updated>2026-02-02T17:25:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन में राज्य की स्थिरता एवं उन्नति के लिए कोष को प्रमुख स्थान प्राप्त है। कौटिल्य द्वारा रचित [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को न केवल राज्य का आधार माना गया है, अपितु उसे दण्ड, सेना, प्रशासन और लोककल्याण की शक्ति का मूल स्रोत भी बताया गया है। प्रस्तुत लेख में कोष-संरचना, कोष-वृद्धि के उपाय, कोष-क्षय के कारण तथा कोष में संचित विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों का विश्लेषण किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि कौटिल्य की कोष-नीति केवल राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं थी, अपितु नैतिक प्रशासन, भ्रष्टाचार-नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा की समग्र योजना प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
राज्य संचालन का मूलाधार आर्थिक सुदृढ़ता है। प्राचीन शास्त्रकारों ने राज्य के [[Saptanga Siddhanta (सप्तांग सिद्धांत)|सप्ताङ्ग सिद्धान्त]] में कोष को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। कौटिल्य भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि समस्त प्रशासनिक क्रियाएँ कोष पर ही आधारित होती हैं। कोष के बिना न तो सेना का संचालन सम्भव है और न ही दण्ड-व्यवस्था की प्रभावशीलता। इसीलिए राजा का प्रथम कर्तव्य कोष की रक्षा एवं वृद्धि बताया गया है-&amp;lt;ref&amp;gt;शोधकर्त्री-अनुराधा भारद्वाज, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/21647/3/shukraniti.pdf शुक्रनीति का अनुशीलन] (२०१३), शोधकेन्द्र - कुमाऊं विश्वविद्यालय (पृ० १९७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
कोषपूर्वाः सर्वारंभाः। तस्मात् पूर्वं कोषमवेक्षेत्॥ (कौटिल्य अर्थशास्त्र २/२) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्राचीन काल से ही राजस्व एवं सैन्य बल राज्य के प्रमुख दो स्तम्भ कहे गये हैं। आचार्य शुक्र कोष का लक्षण करते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;एकार्थ समुदायो यः स कोशः स्यात् पृथक् पृथक्। (शुक्रनीति ४/२/१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;पं० श्री ब्रह्माशंकर मिश्र, [https://archive.org/details/20230223_20230223_0110/page/n285/mode/1up शुक्रनीति] (१९६८), चतुर्थ अध्याय-कोशनिरूपण प्रकरण, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी (पृ० २०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;किसी भी एक तरह की वस्तुओं के समूह को कोष कहा जाता है जो कई तरह के होते हैं। राज्य की समृद्धि तथा लोककल्याणकारी दायित्वों के निर्वहन हेतु कोष की वृद्धि अनिवार्य मानते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;येन केन प्रकारेण धनं सञ्चिनुयात् नृपः। तेन संरक्षयेद्राष्ट्रं बलं यज्ञादिकाः क्रियाः॥ (शुक्रनीति ४/२/२)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;राजा का यह कर्तव्य है कि वह विविध उपायों द्वारा धन का संग्रह करे, जिससे संचित संपत्ति के माध्यम से राष्ट्र, सेना तथा धार्मिक कार्यों की समुचित रक्षा की जा सके। कोश वृद्धि का मूल कारण सेना को मानते हुए शुक्राचार्य जी कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम्। बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिरक्षयः॥ (शुक्रनीति ४/२/१४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सेना को राजकोष का मूल आधार माना गया है, क्योंकि सेना के माध्यम से ही कोष का संरक्षण एवं संचय सम्भव होता है। इसी प्रकार राजकोष भी सेना का आधारस्तम्भ है, क्योंकि कोष के अभाव में सेना का भरण-पोषण तथा संरक्षण नहीं किया जा सकता। इस प्रकार सेना और कोष परस्पर आश्रित हैं। जब सेना तथा राजकोष की समुचित रक्षा की जाती है, तब न केवल कोष और राज्य की समृद्धि होती है, अपितु शत्रुओं का विनाश भी सुनिश्चित होता है। महाभारत में कहा गया है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कोशश्च सततं रक्ष्यो यत्नमास्थाय राजभिः। कोशमूला हि राजानः कोशवृद्धिकरो भवेत्॥ कोष्ठागारं च ते नित्यं स्फीतं धान्यैः सुसंचितैः॥ (महाभारत ११९/१६)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D-12-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5-119 महाभारत], शांतिपर्व, अध्याय ११९, श्लोक १६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' राजाओं को चाहिए कि वे पूर्ण प्रयास और सतत सावधानी के साथ राजकोष की निरन्तर रक्षा करें, क्योंकि राजाओं की सत्ता का मूल आधार कोष ही होता है। अतः राजा को कोष की वृद्धि करने वाला होना चाहिए। राजा का भण्डारगृह सदैव अन्न-धान्यों से परिपूर्ण तथा भली-भाँति संचित होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कोष की अवधारणा॥ Concept of Treasury==&lt;br /&gt;
कौटिल्य के अनुसार कोष केवल धन-संग्रह नहीं, बल्कि राज्य की जीवन-रेखा है। [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को राज्यरूपी वृक्ष की जड़ कहा गया है। यदि जड़ सुदृढ़ है तो वृक्ष स्वतः फल-फूलता है। [[Mahabharat (महाभारत)|महाभारत]] के शान्तिपर्व तथा विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी कोष के इसी महत्त्व का उल्लेख मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कोष की अवधारणा भारतीय परम्परा में दीर्घकाल से प्रतिष्ठित रही है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - रंजना, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/566325/13/9th_file_chapter5.pdf कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र में वर्णित आय स्रोत तथा कर व्यवस्था का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक अध्ययन] (२०२२), शोधकेंद्र - बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय , रोहतक (पृ० २१०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-वृद्धि के उपाय॥ Measures for Growth of the Treasury ===&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रकारों ने कर-ग्रहण को कोष-समृद्धि का प्रमुख आधार स्वीकार किया है। [[Acharya (आचार्यः)|आचार्य]] कौटिल्य ने कर-आदान (Tax Collection) के अतिरिक्त कोष-वृद्धि (Treasury Growth) के अन्य उपायों का भी विस्तार से निरूपण किया है तथा साथ ही कोष-क्षय के कारणों को भी स्पष्ट किया है। अर्थशास्त्र में कोष-वृद्धि के अनेक व्यावहारिक साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन उपायों में राष्ट्र की सम्पत्ति में वृद्धि करना, राज्य के नैतिक चरित्र पर विशेष ध्यान देना, चोरों एवं अपराधियों पर सतत निगरानी रखना, राजकीय अधिकारियों को रिश्वत-ग्रहण (Bribery) से रोकना, समस्त प्रकार के अन्न-उत्पादन को प्रोत्साहित करना, जल और स्थल दोनों क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाली व्यापार-योग्य वस्तुओं (Tradeable Goods) की वृद्धि करना, अग्नि आदि आपदाओं से राज्य की रक्षा करना, नियत समय पर विधिपूर्वक कर-आहरण करना तथा हिरण्य आदि भेंटों को स्वीकार करना सम्मिलित है। कौटिल्य के अनुसार ये सभी [[Upayas in Indian Diplomacy|उपाय]] कोष-वृद्धि के प्रभावी साधन माने जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य ने कोष-वृद्धि के लिए अनेक व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं। इनमें प्रमुख हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''राजस्व संग्रह (कर व्यवस्था)''' - [[Krshi Vijnana (कृषिविज्ञानम्)|कृषि]], पशुपालन, व्यापार एवं उद्योग से कर संग्रह को कोष-वृद्धि का मुख्य साधन माना गया।&lt;br /&gt;
#'''उत्पादन का प्रोत्साहन''' - कृषि, मत्स्य-पालन, खनन तथा वाणिज्यिक गतिविधियों को राज्य से जोड़कर राष्ट्रीय सम्पदा बढ़ाने पर बल दिया गया।&lt;br /&gt;
#'''व्यापार नियंत्रण''' - तौल-माप, मूल्य-नियंत्रण और शुल्क व्यवस्था के माध्यम से राजकोष में नियमित आय सुनिश्चित की गई।&lt;br /&gt;
#'''आपदाकालीन व्यवस्था''' - दुर्भिक्ष, महामारी अथवा युद्ध जैसी परिस्थितियों में विशेष उपायों द्वारा कोष को पुनः सुदृढ़ करने की व्यवस्था की गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-हानि के प्रकार॥ Types of Treasury Losses===&lt;br /&gt;
कौटिल्य कोष-क्षय के कारणों के प्रति अत्यन्त सजग थे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि राज्यकर्मचारी विभिन्न रूपों में राजकोष का दुरुपयोग कर सकते हैं। अर्थशास्त्र में कोष-क्षय के आठ प्रमुख कारण बताए गए हैं जिनसे सचेत रहना भी राजा के लिए आवश्यक था जो निम्न हैं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रतिबन्धः प्रयोगोव्यवहारोऽवस्तारः परिहायणमुपभोगः परिवर्तनमपहारश्चेति कोषक्षयः॥ (अर्थशास्त्र २/२४/८/३)&amp;lt;ref&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० १०९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रतिबन्ध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन और अपहार ये आठ कोषक्षय के प्रमुख कारण हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''प्रतिबंधक (राजकर की अनुचित वसूली एवं संग्रह) -''' अर्थशास्त्र के अनुसार राजकर की वसूली कर उसे अपने अधिकार में न रखना, अधिकार में रखने पर भी उसे राजकोष में जमा न करना अथवा वसूल की गई राशि का अन्यत्र उपयोग करना - ये तीनों स्थितियाँ प्रतिबन्धक क्षय कहलाती हैं। ऐसे कृत्यों द्वारा राजकोष की हानि होती है, क्योंकि कर का  नियमानुकूल लेखांकन एवं संग्रह बाधित हो जाता है - '''सिद्धीनामसाधनमनवतारणमप्रवेशनं वा प्रतिबन्धः, तत्र दश-बन्धो दण्डः।''' कौटिल्य ने इस प्रकार के कोष-क्षय को गम्भीर अपराध मानते हुए दोषी अध्यक्ष पर क्षतिग्रस्त राशि से दस गुना दण्ड निर्धारित किया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot;&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], प्रकरण २४, अध्याय ८, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० ११०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''प्रयोग (कोषधन का निजी लेन-देन में प्रयोग)''' - राजकोष के धन से स्वयं लेन-देन कर उसे बढ़ाने का प्रयास करना प्रयोग कहलाता है। ऐसा कृत्य राज्यधन के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है - '''कोषद्रव्याणां वृद्धिप्रयोगः प्रयोगः।''' इस प्रकार के अपराध में संलिप्त अधिकारी को भी दूना दण्ड दिया जाना आवश्यक बताया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''व्यवहार (कोष की सम्पत्ति से निजी व्यापार) -'''  राजकोष में संचित धन अथवा वस्तुओं से स्वयं व्यापार करना व्यवहार कहा गया है। यह भी कोष के अनुचित उपयोग का रूप है - '''पण्यव्यवहारो व्यवहारः। तत्र फलद्विगुणो दण्डः।''' ऐसे कृत्य के लिए दोषी व्यक्ति को दुगुना दण्ड देने का विधान किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''अवस्तार (भय अथवा रिश्वत द्वारा धन-संग्रह) -''' जो अधिकारी नियत समय पर कर वसूली न करके, विलम्ब का भय दिखाकर अथवा रिश्वत प्राप्त करने की इच्छा से प्रजा को उत्पीड़ित कर धन एकत्र करता है, उसे अवस्तार कहा गया है - '''सिद्ध कालमप्राप्तं करोत्यप्राप्तं प्राप्तं वेत्यवस्तारः। तत्र पञ्च-बन्धो दण्डः।''' इस प्रकार की वसूली को अत्यन्त निन्दनीय माना गया है और ऐसे अधिकारी पर हानि की राशि से पाँच गुना दण्ड लगाने का निर्देश दिया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''परिहरण (आय को घटाकर एवं व्यय को बढ़ाकर कोष-हानि) -''' जो अध्यक्ष अथवा अधिकारी अपने दुष्कृत्यों के कारण राज्य की आय को कम कर देता है तथा व्यय की राशि को अनावश्यक रूप से बढ़ा देता है, उसे परिहरण कहा गया है - '''क्लृप्तमायं परिहापयति व्ययं वा विवर्धयतीति परिहापणम्। तत्र हीनचतुर्गुणो दण्डः।''' इस प्रकार का आचरण भी कोष को क्षति पहुँचाने वाला माना गया है और इसके लिए चौगुना दण्ड का विधान किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''उपभोग (राजकोषीय द्रव्यों का निजी उपभोग)''' - राजकोष में संचित द्रव्यों का स्वयं उपयोग करना अथवा दूसरों को उसका उपयोग करने देना उपभोग कहलाता है। यह कोष-क्षय का गम्भीर अपराध माना गया है। ऐसे अपराध में संलग्न अध्यक्ष के लिए [[Penal System (दण्ड व्यवस्था)|दण्ड]] का निर्धारण उपभोग की वस्तु के अनुसार किया गया है - '''स्वयमन्यैर्वा राजद्रव्याणामुपभोजनमुपभोगः। तत्र रत्नोपभोगे घातः, सारोपभोगे मध्यमः साहसदण्डः, फल्गुकुप्योपभोगे तच्च तावच्च दण्डः।''' यदि वह रत्नों का उपभोग करता है तो उस पर प्राणदण्ड का विधान है; साहसिक द्रव्यों के उपभोग की स्थिति में मध्यम साहस दण्ड (250 से 500 पण तक का अर्थदण्ड) निर्धारित किया गया है; तथा यदि फल, कन्द-मूल अथवा अन्य उपभोग्य पदार्थों का उपयोग किया गया हो तो उनसे सम्बन्धित द्रव्य को वापस लेकर उसकी लागत के अनुरूप दण्ड दिया जाना चाहिए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''परिवर्तन (राजकोषीय द्रव्यों का परिवर्तन) -''' राजकोष की वस्तुओं को अन्य वस्तुओं से बदल लेना परिवर्तन कहा जाता है - '''राजद्रव्याणामन्यद्रव्येणादानं परिवर्तनं, तद् उपभोगेन व्याख्यातम्।''' यह भी कोष के अनधिकृत उपयोग का ही एक रूप है। इस प्रकार के कृत्य में संलिप्त अध्यक्ष को उपभोग-क्षय के समान ही दण्ड दिया जाना चाहिए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
#'''अपहार (लेखा-विवरण में अनियमितता) -''' प्राप्त आय को लेखा-पुस्तकों (रजिस्टर) में अंकित न करना, नियमित व्यय को रजिस्टर में दर्शाने के उपरान्त भी उसका वास्तविक उपयोग न करना, अथवा प्राप्त निधि के सम्बन्ध में छल-कपट करना - ये तीनों प्रकार के कृत्य अपहार की श्रेणी में आते हैं - '''सिद्धमायं न प्रवेशयति निबद्धं व्ययं न प्रयच्छति, प्राप्तां नीवीं विप्रतिजानीत इत्यपहारः। तत्र द्वादशगुणो दण्डः।''' अपहार के माध्यम से कोष-क्षय करने वाले अध्यक्ष को हुई हानि से बारह गुना दण्ड देने का निर्देश दिया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोषाध्यक्ष के दायित्व॥ Duties of the Treasurer===&lt;br /&gt;
कोषाध्यक्ष संस्कृत का एक संयुक्त शब्द है, जो कोष तथा अध्यक्ष शब्दों से मिलकर बना है। कोष का अर्थ है- राज्य की संचित सम्पत्ति या खजाना, तथा अध्यक्ष का अर्थ है- उसका प्रधान या निरीक्षक। इस प्रकार कोषाध्यक्ष वह अधिकारी होता है जो कोषागार का अधीक्षक एवं संरक्षक होता है। प्राचीन भारतीय प्रशासन व्यवस्था में कोषाध्यक्ष का दायित्व राज्य के खजाने की सुरक्षा, आय–व्यय का नियंत्रण तथा वित्तीय अनुशासन बनाए रखना था। वह राज्य की आय को संग्रहीत करने, भुगतान की व्यवस्था करने तथा कोष से संबंधित समस्त कार्यों का संचालन करता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यावहारिक अर्थ में कोषाध्यक्ष को खजांची (Treasurer), भुगतानकर्ता (Paymaster) तथा वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा प्रधान अधिकारी माना जाता है। आधुनिक शासन प्रणाली में उसके कार्य और दायित्वों की प्रकृति वित्त मंत्री (Finance Minister) या उच्च वित्तीय अधिकारी से तुलनीय मानी जा सकती है, यद्यपि प्रशासनिक संरचना में पदनाम भिन्न हो सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य के अनुसार राजकीय कोष का प्रधान अधिकारी सन्निधाता कहलाता था। सन्निधाता का दायित्व था कि वह कोषगृह, पण्यगृह, कोष्ठागार, कुष्ठागार, आयुधागार तथा कारागार आदि की स्थापना कर उनकी समुचित देखरेख करे। कोषगृह आदि की संपूर्ण व्यवस्था उसके अधीन संचालित होती थी तथा कोषाध्यक्ष, पण्याध्यक्ष आदि अन्य अधिकारी उसके निर्देशन में अपने-अपने कार्यों का निर्वहन करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोषगृह में विविध प्रकार की मूल्यवान वस्तुओं का संग्रह किया जाता था। कोषगृह के निर्माण के विषय में आचार्य कौटिल्य ने विशेष तकनीकी निर्देश दिए हैं। उनके अनुसार कोषगृह का निर्माण ऐसे सुरक्षित स्थान पर किया जाना चाहिए जहाँ न जल का प्रवेश हो और न ही आर्द्रता। इसकी दीवारें तथा फर्श सुदृढ़ शिलाओं से निर्मित हों तथा भीतर लकड़ी के खम्भों के बीच एक पृथक कक्ष बनाया जाए, जिसमें केवल एक द्वार हो। उस कक्ष के मध्य भाग में भूमि को समतल कर उसमें एक गड्ढा बनाया जाए, जिसमें चन्दन की लकड़ी स्थापित हो और उस पर देवता की प्रतिष्ठा की जाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके ऊपर एक पृथक कोषागार का निर्माण किया जाए, जो चारों ओर से सुरक्षित एवं बंद हो, जिसकी छत दृढ़ हो, ईंटों से निर्मित हो तथा जिसमें कोषीय वस्तुओं को रखने हेतु नालीयुक्त व्यवस्था की गई हो। इस प्रकार कौटिल्य ने कोषगृह की संरचना में सुरक्षा, पवित्रता एवं सुव्यवस्थित संग्रह - तीनों पर विशेष बल दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-संग्रह॥ Treasury Collection ===&lt;br /&gt;
आचार्य शुक्र ने कोष को सुखद तथा दुःखद - इन दो प्रकारों में विभाजित किया है। उनके अनुसार जो कोष राजा, प्रजा, सेना तथा धार्मिक कृत्यों के हित में प्रयुक्त होता है, वही सुखद कोष कहलाता है। ऐसा कोष राज्य की समृद्धि, सामाजिक संतुलन तथा लोककल्याण का साधन बनता है। इसके विपरीत, जो कोष अनुचित साधनों से संचित हो, या जिसे केवल व्यक्तिगत सुख, पत्नी–पुत्र अथवा संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए उपयोग किया जाए, वह दुःखद कोष माना जाता है। ऐसा धन न तो वास्तविक सुख प्रदान करता है और न ही स्थायी कल्याण का कारण बनता है, अपितु अंततः कष्ट और पतन का हेतु बनता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;बलप्रजारक्षणार्थं यज्ञार्थं कोशसङ्ग्रहः। परत्रेह च सुखदो नृपास्यान्यश्च दुःखदः॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्रीपुत्रार्थं कृतो यश्च स्वोपभोगाय केवलम्। नरकायैव स ज्ञेयो न परत्र सुखप्रदः॥ (शुक्रनीति ४/२/३-४) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार शुक्रनीति में कोष का निर्धारण उसके उपार्जन के साधन (means of acquisition) तथा उसके उपयोग के उद्देश्य (purpose of utilisation) के आधार पर किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष में संचित सम्पत्तियों के प्रकार॥ Types of Assets Stored in the Treasury===&lt;br /&gt;
आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजकोष में संचित सम्पदाओं (Assets) एवं मुद्राओं (Currency) के स्वरूप का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। उन्होंने एक कुशल जौहरी की भाँति विविध प्रकार के रत्नों और मूल्यवान वस्तुओं, जैसे - मोती, मणि, हीरा, मूंगा, चन्दन, बहुमूल्य वस्त्र, स्वर्ण एवं रजत से निर्मित आभूषण (Gold and Silver Ornaments) तथा स्वर्ण, रजत और ताम्र धातुओं से निर्मित मुद्राओं - का सूक्ष्म एवं प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है। इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि कौटिल्य को कोष में संचित सम्पत्ति के भौतिक स्वरूप (Treasury Management) तथा उसके आर्थिक महत्व (Material Wealth Classification) का गहन ज्ञान था। उनके अनुसार राजकोष में संचित सम्पदा (Stored Wealth) मुख्यतः स्वर्ण, रजत, हीरा, मोती आदि बहुमूल्य धातुओं एवं रत्नों के रूप में विद्यमान रहती थी, जो राज्य की आर्थिक सुदृढ़ता (Economic Stability of the State) का आधार मानी जाती थी।&amp;lt;ref&amp;gt;पी०वी० काणे, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.306909/page/n102/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास] (१९६५), द्वितीय भाग-अध्याय ५, हिन्दी विभाग सूचना समिति, लखनऊ (पृ० ६६७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
कौटिल्य की कोष-व्यवस्था केवल आर्थिक [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]] नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रशासनिक दर्शन है। कोष-वृद्धि, कोष-संरक्षण और कोष नियन्त्रण - ये तीनों राज्य की स्थिरता के मूल स्तम्भ हैं। आधुनिक सार्वजनिक वित्त एवं प्रशासनिक पारदर्शिता की अवधारणाओं में भी कौटिल्य के सिद्धान्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। अतः प्राचीन भारतीय कोष-व्यवस्था को भारतीय आर्थिक चिन्तन की आधारशिला कहा जा सकता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Arthashastra]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137547</id>
		<title>Treasury System (कोष व्यवस्था)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137547"/>
		<updated>2026-01-29T17:19:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन में राज्य की स्थिरता एवं उन्नति के लिए कोष को प्रमुख स्थान प्राप्त है। कौटिल्य द्वारा रचित [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को न केवल राज्य का आधार माना गया है, अपितु उसे दण्ड, सेना, प्रशासन और लोककल्याण की शक्ति का मूल स्रोत भी बताया गया है। प्रस्तुत लेख में कोष-संरचना, कोष-वृद्धि के उपाय, कोष-क्षय के कारण तथा कोष में संचित विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों का विश्लेषण किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि कौटिल्य की कोष-नीति केवल राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं थी, अपितु नैतिक प्रशासन, भ्रष्टाचार-नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा की समग्र योजना प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
राज्य संचालन का मूलाधार आर्थिक सुदृढ़ता है। प्राचीन शास्त्रकारों ने राज्य के [[Saptanga Siddhanta (सप्तांग सिद्धांत)|सप्ताङ्ग सिद्धान्त]] में कोष को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। कौटिल्य भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि समस्त प्रशासनिक क्रियाएँ कोष पर ही आधारित होती हैं। कोष के बिना न तो सेना का संचालन सम्भव है और न ही दण्ड-व्यवस्था की प्रभावशीलता। इसीलिए राजा का प्रथम कर्तव्य कोष की रक्षा एवं वृद्धि बताया गया है-&amp;lt;ref&amp;gt;शोधकर्त्री-अनुराधा भारद्वाज, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/21647/3/shukraniti.pdf शुक्रनीति का अनुशीलन] (२०१३), शोधकेन्द्र - कुमाऊं विश्वविद्यालय (पृ० १९७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
कोशमूला कोशपूर्वा सर्वारंभाः। तस्मात पूर्वं कोशमवेक्षते॥ (कौटिल्य अर्थशास्त्र २/२) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्राचीन काल से ही राजस्व एवं सैन्य बल राज्य के प्रमुख दो स्तम्भ कहे गये हैं। आचार्य शुक्र कोष का लक्षण करते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;एकार्थ समुदायो यः स कोशः स्यात् पृथक् पृथक्। (शुक्रनीति ४/२/१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;पं० श्री ब्रह्माशंकर मिश्र, [https://archive.org/details/20230223_20230223_0110/page/n285/mode/1up शुक्रनीति] (१९६८), चतुर्थ अध्याय-कोशनिरूपण प्रकरण, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी (पृ० २०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;किसी भी एक तरह की वस्तुओं के समूह को कोष कहा जाता है जो कई तरह के होते हैं। राज्य की समृद्धि तथा लोककल्याणकारी दायित्वों के निर्वहन हेतु कोष की वृद्धि अनिवार्य मानते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;येन केन प्रकारेण धनं सञ्चिनुयात् नृपः। तेन संरक्षयेद्राष्ट्रं बलं यज्ञादिकाः क्रियाः॥ (शुक्रनीति ४/२/२)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;राजा का यह कर्तव्य है कि वह विविध उपायों द्वारा धन का संग्रह करे, जिससे संचित संपत्ति के माध्यम से राष्ट्र, सेना तथा धार्मिक कार्यों की समुचित रक्षा की जा सके। कोश वृद्धि का मूल कारण सेना को मानते हुए शुक्राचार्य जी कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम्। बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिरक्षयः॥ (शुक्रनीति ४/२/१४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सेना को राजकोष का मूल आधार माना गया है, क्योंकि सेना के माध्यम से ही कोष का संरक्षण एवं संचय सम्भव होता है। इसी प्रकार राजकोष भी सेना का आधारस्तम्भ है, क्योंकि कोष के अभाव में सेना का भरण-पोषण तथा संरक्षण नहीं किया जा सकता। इस प्रकार सेना और कोष परस्पर आश्रित हैं। जब सेना तथा राजकोष की समुचित रक्षा की जाती है, तब न केवल कोष और राज्य की समृद्धि होती है, अपितु शत्रुओं का विनाश भी सुनिश्चित होता है। महाभारत में कहा गया है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कोशश्च सततं रक्ष्यो यत्नमास्थाय राजभिः। कोशमूला हि राजानः कोशवृद्धिकरो भवेत्॥ कोष्ठागारं च ते नित्यं स्फीतं धान्यैः सुसंचितैः॥ (महाभारत ११९/१६)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D-12-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5-119 महाभारत], शांतिपर्व, अध्याय ११९, श्लोक १६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' राजाओं को चाहिए कि वे पूर्ण प्रयास और सतत सावधानी के साथ राजकोष की निरन्तर रक्षा करें, क्योंकि राजाओं की सत्ता का मूल आधार कोष ही होता है। अतः राजा को कोष की वृद्धि करने वाला होना चाहिए। राजा का भण्डारगृह सदैव अन्न-धान्यों से परिपूर्ण तथा भली-भाँति संचित होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कोष की अवधारणा॥ Concept of Treasury==&lt;br /&gt;
कौटिल्य के अनुसार कोष केवल धन-संग्रह नहीं, बल्कि राज्य की जीवन-रेखा है। [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को राज्यरूपी वृक्ष की जड़ कहा गया है। यदि जड़ सुदृढ़ है तो वृक्ष स्वतः फल-फूलता है। [[Mahabharat (महाभारत)|महाभारत]] के शान्तिपर्व तथा विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी कोष के इसी महत्त्व का उल्लेख मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कोष की अवधारणा भारतीय परम्परा में दीर्घकाल से प्रतिष्ठित रही है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - रंजना, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/566325/13/9th_file_chapter5.pdf कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र में वर्णित आय स्रोत तथा कर व्यवस्था का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक अध्ययन] (२०२२), शोधकेंद्र - बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय , रोहतक (पृ० २१०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-वृद्धि के उपाय॥ Measures for Growth of the Treasury ===&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रकारों ने कर-ग्रहण को कोष-समृद्धि का प्रमुख आधार स्वीकार किया है। [[Acharya (आचार्यः)|आचार्य]] कौटिल्य ने कर-आदान (Tax Collection) के अतिरिक्त कोष-वृद्धि (Treasury Growth) के अन्य उपायों का भी विस्तार से निरूपण किया है तथा साथ ही कोष-क्षय के कारणों को भी स्पष्ट किया है। अर्थशास्त्र में कोष-वृद्धि के अनेक व्यावहारिक साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन उपायों में राष्ट्र की सम्पत्ति में वृद्धि करना, राज्य के नैतिक चरित्र पर विशेष ध्यान देना, चोरों एवं अपराधियों पर सतत निगरानी रखना, राजकीय अधिकारियों को रिश्वत-ग्रहण (Bribery) से रोकना, समस्त प्रकार के अन्न-उत्पादन को प्रोत्साहित करना, जल और स्थल दोनों क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाली व्यापार-योग्य वस्तुओं (Tradeable Goods) की वृद्धि करना, अग्नि आदि आपदाओं से राज्य की रक्षा करना, नियत समय पर विधिपूर्वक कर-आहरण करना तथा हिरण्य आदि भेंटों को स्वीकार करना सम्मिलित है। कौटिल्य के अनुसार ये सभी [[Upayas in Indian Diplomacy|उपाय]] कोष-वृद्धि के प्रभावी साधन माने जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य ने कोष-वृद्धि के लिए अनेक व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं। इनमें प्रमुख हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''राजस्व संग्रह (कर व्यवस्था)''' - [[Krshi Vijnana (कृषिविज्ञानम्)|कृषि]], पशुपालन, व्यापार एवं उद्योग से कर संग्रह को कोष-वृद्धि का मुख्य साधन माना गया।&lt;br /&gt;
#'''उत्पादन का प्रोत्साहन''' - कृषि, मत्स्य-पालन, खनन तथा वाणिज्यिक गतिविधियों को राज्य से जोड़कर राष्ट्रीय सम्पदा बढ़ाने पर बल दिया गया।&lt;br /&gt;
#'''व्यापार नियंत्रण''' - तौल-माप, मूल्य-नियंत्रण और शुल्क व्यवस्था के माध्यम से राजकोष में नियमित आय सुनिश्चित की गई।&lt;br /&gt;
#'''आपदाकालीन व्यवस्था''' - दुर्भिक्ष, महामारी अथवा युद्ध जैसी परिस्थितियों में विशेष उपायों द्वारा कोष को पुनः सुदृढ़ करने की व्यवस्था की गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-हानि के प्रकार॥ Types of Treasury Losses===&lt;br /&gt;
कौटिल्य कोष-क्षय के कारणों के प्रति अत्यन्त सजग थे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि राज्यकर्मचारी विभिन्न रूपों में राजकोष का दुरुपयोग कर सकते हैं। अर्थशास्त्र में कोष-क्षय के आठ प्रमुख कारण बताए गए हैं जिनसे सचेत रहना भी राजा के लिए आवश्यक था जो निम्न हैं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रतिबन्धः प्रयोगोव्यवहारोऽवस्तारः परिहायणमुपभोगः परिवर्तनमवहारश्चेति कोषक्षयः॥ (अर्थशास्त्र २/२४/८/३)&amp;lt;ref&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० १०९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रतिबन्ध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन और अपहार ये आठ कोषक्षय के प्रमुख कारण हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''प्रतिबंधक (राजकर की अनुचित वसूली एवं संग्रह) -''' अर्थशास्त्र के अनुसार राजकर की वसूली कर उसे अपने अधिकार में न रखना, अधिकार में रखने पर भी उसे राजकोष में जमा न करना अथवा वसूल की गई राशि का अन्यत्र उपयोग करना - ये तीनों स्थितियाँ प्रतिबन्धक क्षय कहलाती हैं। ऐसे कृत्यों द्वारा राजकोष की हानि होती है, क्योंकि कर का  नियमानुकूल लेखांकन एवं संग्रह बाधित हो जाता है। कौटिल्य ने इस प्रकार के कोष-क्षय को गम्भीर अपराध मानते हुए दोषी अध्यक्ष पर क्षतिग्रस्त राशि से दस गुना दण्ड निर्धारित किया है।&lt;br /&gt;
#'''प्रयोग (कोषधन का निजी लेन-देन में प्रयोग)''' - राजकोष के धन से स्वयं लेन-देन कर उसे बढ़ाने का प्रयास करना प्रयोग कहलाता है। ऐसा कृत्य राज्यधन के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है। इस प्रकार के अपराध में संलिप्त अधिकारी को भी दूना दण्ड दिया जाना आवश्यक बताया गया है।&lt;br /&gt;
#'''व्यवहार (कोष की सम्पत्ति से निजी व्यापार) -'''  राजकोष में संचित धन अथवा वस्तुओं से स्वयं व्यापार करना व्यवहार कहा गया है। यह भी कोष के अनुचित उपयोग का रूप है। ऐसे कृत्य के लिए दोषी व्यक्ति को दुगुना दण्ड देने का विधान किया गया है।&lt;br /&gt;
#'''अवस्तार (भय अथवा रिश्वत द्वारा धन-संग्रह) -''' जो अधिकारी नियत समय पर कर वसूली न करके, विलम्ब का भय दिखाकर अथवा रिश्वत प्राप्त करने की इच्छा से प्रजा को उत्पीड़ित कर धन एकत्र करता है, उसे अवस्तार कहा गया है। इस प्रकार की वसूली को अत्यन्त निन्दनीय माना गया है और ऐसे अधिकारी पर हानि की राशि से पाँच गुना दण्ड लगाने का निर्देश दिया गया है।&lt;br /&gt;
#'''परिहरण (आय को घटाकर एवं व्यय को बढ़ाकर कोष-हानि) -''' जो अध्यक्ष अथवा अधिकारी अपने दुष्कृत्यों के कारण राज्य की आय को कम कर देता है तथा व्यय की राशि को अनावश्यक रूप से बढ़ा देता है, उसे परिहरण कहा गया है। इस प्रकार का आचरण भी कोष को क्षति पहुँचाने वाला माना गया है और इसके लिए चौगुना दण्ड का विधान किया गया है।&lt;br /&gt;
#'''उपभोग (राजकोषीय द्रव्यों का निजी उपभोग)''' - राजकोष में संचित द्रव्यों का स्वयं उपयोग करना अथवा दूसरों को उसका उपयोग करने देना उपभोग कहलाता है। यह कोष-क्षय का गम्भीर अपराध माना गया है। ऐसे अपराध में संलग्न अध्यक्ष के लिए [[Penal System (दण्ड व्यवस्था)|दण्ड]] का निर्धारण उपभोग की वस्तु के अनुसार किया गया है। यदि वह रत्नों का उपभोग करता है तो उस पर प्राणदण्ड का विधान है; साहसिक द्रव्यों के उपभोग की स्थिति में मध्यम साहस दण्ड (250 से 500 पण तक का अर्थदण्ड) निर्धारित किया गया है; तथा यदि फल, कन्द-मूल अथवा अन्य उपभोग्य पदार्थों का उपयोग किया गया हो तो उनसे सम्बन्धित द्रव्य को वापस लेकर उसकी लागत के अनुरूप दण्ड दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
#'''परिवर्तन (राजकोषीय द्रव्यों का परिवर्तन) -''' राजकोष की वस्तुओं को अन्य वस्तुओं से बदल लेना परिवर्तन कहा जाता है। यह भी कोष के अनधिकृत उपयोग का ही एक रूप है। इस प्रकार के कृत्य में संलिप्त अध्यक्ष को उपभोग-क्षय के समान ही दण्ड दिया जाना चाहिए&lt;br /&gt;
#'''अपहार (लेखा-विवरण में अनियमितता) -''' प्राप्त आय को लेखा-पुस्तकों (रजिस्टर) में अंकित न करना, नियमित व्यय को रजिस्टर में दर्शाने के उपरान्त भी उसका वास्तविक उपयोग न करना, अथवा प्राप्त निधि के सम्बन्ध में छल-कपट करना- ये तीनों प्रकार के कृत्य अपहार की श्रेणी में आते हैं। अपहार के माध्यम से कोष-क्षय करने वाले अध्यक्ष को हुई हानि से बारह गुना दण्ड देने का निर्देश दिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कोषाध्यक्ष के दायित्व॥ Duties of the Treasurer ===&lt;br /&gt;
कोषाध्यक्ष संस्कृत का एक संयुक्त शब्द है, जो कोष तथा अध्यक्ष शब्दों से मिलकर बना है। कोष का अर्थ है- राज्य की संचित सम्पत्ति या खजाना, तथा अध्यक्ष का अर्थ है- उसका प्रधान या निरीक्षक। इस प्रकार कोषाध्यक्ष वह अधिकारी होता है जो कोषागार का अधीक्षक एवं संरक्षक होता है। प्राचीन भारतीय प्रशासन व्यवस्था में कोषाध्यक्ष का दायित्व राज्य के खजाने की सुरक्षा, आय–व्यय का नियंत्रण तथा वित्तीय अनुशासन बनाए रखना था। वह राज्य की आय को संग्रहीत करने, भुगतान की व्यवस्था करने तथा कोष से संबंधित समस्त कार्यों का संचालन करता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यावहारिक अर्थ में कोषाध्यक्ष को खजांची (Treasurer), भुगतानकर्ता (Paymaster) तथा वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा प्रधान अधिकारी माना जाता है। आधुनिक शासन प्रणाली में उसके कार्य और दायित्वों की प्रकृति वित्त मंत्री (Finance Minister) या उच्च वित्तीय अधिकारी से तुलनीय मानी जा सकती है, यद्यपि प्रशासनिक संरचना में पदनाम भिन्न हो सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य के अनुसार राजकीय कोष का प्रधान अधिकारी सन्निधाता कहलाता था। सन्निधाता का दायित्व था कि वह कोषगृह, पण्यगृह, कोष्ठागार, कुष्ठागार, आयुधागार तथा कारागार आदि की स्थापना कर उनकी समुचित देखरेख करे। कोषगृह आदि की संपूर्ण व्यवस्था उसके अधीन संचालित होती थी तथा कोषाध्यक्ष, पण्याध्यक्ष आदि अन्य अधिकारी उसके निर्देशन में अपने-अपने कार्यों का निर्वहन करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोषगृह में विविध प्रकार की मूल्यवान वस्तुओं का संग्रह किया जाता था। कोषगृह के निर्माण के विषय में आचार्य कौटिल्य ने विशेष तकनीकी निर्देश दिए हैं। उनके अनुसार कोषगृह का निर्माण ऐसे सुरक्षित स्थान पर किया जाना चाहिए जहाँ न जल का प्रवेश हो और न ही आर्द्रता। इसकी दीवारें तथा फर्श सुदृढ़ शिलाओं से निर्मित हों तथा भीतर लकड़ी के खम्भों के बीच एक पृथक कक्ष बनाया जाए, जिसमें केवल एक द्वार हो। उस कक्ष के मध्य भाग में भूमि को समतल कर उसमें एक गड्ढा बनाया जाए, जिसमें चन्दन की लकड़ी स्थापित हो और उस पर देवता की प्रतिष्ठा की जाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके ऊपर एक पृथक कोषागार का निर्माण किया जाए, जो चारों ओर से सुरक्षित एवं बंद हो, जिसकी छत दृढ़ हो, ईंटों से निर्मित हो तथा जिसमें कोषीय वस्तुओं को रखने हेतु नालीयुक्त व्यवस्था की गई हो। इस प्रकार कौटिल्य ने कोषगृह की संरचना में सुरक्षा, पवित्रता एवं सुव्यवस्थित संग्रह - तीनों पर विशेष बल दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष में संचित सम्पत्तियों के प्रकार॥ Types of Assets Stored in the Treasury===&lt;br /&gt;
आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजकोष में संचित सम्पदाओं (Assets) एवं मुद्राओं (Currency) के स्वरूप का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। उन्होंने एक कुशल जौहरी की भाँति विविध प्रकार के रत्नों और मूल्यवान वस्तुओं, जैसे - मोती, मणि, हीरा, मूंगा, चन्दन, बहुमूल्य वस्त्र, स्वर्ण एवं रजत से निर्मित आभूषण (Gold and Silver Ornaments) तथा स्वर्ण, रजत और ताम्र धातुओं से निर्मित मुद्राओं - का सूक्ष्म एवं प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है। इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि कौटिल्य को कोष में संचित सम्पत्ति के भौतिक स्वरूप (Treasury Management) तथा उसके आर्थिक महत्व (Material Wealth Classification) का गहन ज्ञान था। उनके अनुसार राजकोष में संचित सम्पदा (Stored Wealth) मुख्यतः स्वर्ण, रजत, हीरा, मोती आदि बहुमूल्य धातुओं एवं रत्नों के रूप में विद्यमान रहती थी, जो राज्य की आर्थिक सुदृढ़ता (Economic Stability of the State) का आधार मानी जाती थी।&amp;lt;ref&amp;gt;पी०वी० काणे, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.306909/page/n102/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास] (१९६५), द्वितीय भाग-अध्याय ५, हिन्दी विभाग सूचना समिति, लखनऊ (पृ० ६६७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
कौटिल्य की कोष-व्यवस्था केवल आर्थिक [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]] नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रशासनिक दर्शन है। कोष-वृद्धि, कोष-संरक्षण और कोष नियन्त्रण - ये तीनों राज्य की स्थिरता के मूल स्तम्भ हैं। आधुनिक सार्वजनिक वित्त एवं प्रशासनिक पारदर्शिता की अवधारणाओं में भी कौटिल्य के सिद्धान्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। अतः प्राचीन भारतीय कोष-व्यवस्था को भारतीय आर्थिक चिन्तन की आधारशिला कहा जा सकता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Arthashastra]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137546</id>
		<title>Treasury System (कोष व्यवस्था)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137546"/>
		<updated>2026-01-28T17:25:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन में राज्य की स्थिरता एवं उन्नति के लिए कोष को प्रमुख स्थान प्राप्त है। कौटिल्य द्वारा रचित [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को न केवल राज्य का आधार माना गया है, अपितु उसे दण्ड, सेना, प्रशासन और लोककल्याण की शक्ति का मूल स्रोत भी बताया गया है। प्रस्तुत लेख में कोष-संरचना, कोष-वृद्धि के उपाय, कोष-क्षय के कारण तथा कोष में संचित विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों का विश्लेषण किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि कौटिल्य की कोष-नीति केवल राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं थी, अपितु नैतिक प्रशासन, भ्रष्टाचार-नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा की समग्र योजना प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
राज्य संचालन का मूलाधार आर्थिक सुदृढ़ता है। प्राचीन शास्त्रकारों ने राज्य के [[Saptanga Siddhanta (सप्तांग सिद्धांत)|सप्ताङ्ग सिद्धान्त]] में कोष को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। कौटिल्य भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि समस्त प्रशासनिक क्रियाएँ कोष पर ही आधारित होती हैं। कोष के बिना न तो सेना का संचालन सम्भव है और न ही दण्ड-व्यवस्था की प्रभावशीलता। इसीलिए राजा का प्रथम कर्तव्य कोष की रक्षा एवं वृद्धि बताया गया है-&amp;lt;ref&amp;gt;शोधकर्त्री-अनुराधा भारद्वाज, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/21647/3/shukraniti.pdf शुक्रनीति का अनुशीलन] (२०१३), शोधकेन्द्र - कुमाऊं विश्वविद्यालय (पृ० १९७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
कोशमूला कोशपूर्वा सर्वारंभाः। तस्मात पूर्वं कोशमवेक्षते॥ (कौटिल्य अर्थशास्त्र २/२) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्राचीन काल से ही राजस्व एवं सैन्य बल राज्य के प्रमुख दो स्तम्भ कहे गये हैं। आचार्य शुक्र कोष का लक्षण करते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;एकार्थ समुदायो यः स कोशः स्यात् पृथक् पृथक्। (शुक्रनीति ४/२/१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;पं० श्री ब्रह्माशंकर मिश्र, [https://archive.org/details/20230223_20230223_0110/page/n285/mode/1up शुक्रनीति] (१९६८), चतुर्थ अध्याय-कोशनिरूपण प्रकरण, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी (पृ० २०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;किसी भी एक तरह की वस्तुओं के समूह को कोष कहा जाता है जो कई तरह के होते हैं। राज्य की समृद्धि तथा लोककल्याणकारी दायित्वों के निर्वहन हेतु कोष की वृद्धि अनिवार्य मानते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;येन केन प्रकारेण धनं सञ्चिनुयात् नृपः। तेन संरक्षयेद्राष्ट्रं बलं यज्ञादिकाः क्रियाः॥ (शुक्रनीति ४/२/२)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;राजा का यह कर्तव्य है कि वह विविध उपायों द्वारा धन का संग्रह करे, जिससे संचित संपत्ति के माध्यम से राष्ट्र, सेना तथा धार्मिक कार्यों की समुचित रक्षा की जा सके। कोश वृद्धि का मूल कारण सेना को मानते हुए शुक्राचार्य जी कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम्। बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिरक्षयः॥ (शुक्रनीति ४/२/१४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सेना को राजकोष का मूल आधार माना गया है, क्योंकि सेना के माध्यम से ही कोष का संरक्षण एवं संचय सम्भव होता है। इसी प्रकार राजकोष भी सेना का आधारस्तम्भ है, क्योंकि कोष के अभाव में सेना का भरण-पोषण तथा संरक्षण नहीं किया जा सकता। इस प्रकार सेना और कोष परस्पर आश्रित हैं। जब सेना तथा राजकोष की समुचित रक्षा की जाती है, तब न केवल कोष और राज्य की समृद्धि होती है, अपितु शत्रुओं का विनाश भी सुनिश्चित होता है। महाभारत में कहा गया है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कोशश्च सततं रक्ष्यो यत्नमास्थाय राजभिः। कोशमूला हि राजानः कोशवृद्धिकरो भवेत्॥ कोष्ठागारं च ते नित्यं स्फीतं धान्यैः सुसंचितैः॥ (महाभारत ११९/१६)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D-12-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5-119 महाभारत], शांतिपर्व, अध्याय ११९, श्लोक १६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' राजाओं को चाहिए कि वे पूर्ण प्रयास और सतत सावधानी के साथ राजकोष की निरन्तर रक्षा करें, क्योंकि राजाओं की सत्ता का मूल आधार कोष ही होता है। अतः राजा को कोष की वृद्धि करने वाला होना चाहिए। राजा का भण्डारगृह सदैव अन्न-धान्यों से परिपूर्ण तथा भली-भाँति संचित होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कोष की अवधारणा॥ Concept of Treasury==&lt;br /&gt;
कौटिल्य के अनुसार कोष केवल धन-संग्रह नहीं, बल्कि राज्य की जीवन-रेखा है। [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को राज्यरूपी वृक्ष की जड़ कहा गया है। यदि जड़ सुदृढ़ है तो वृक्ष स्वतः फल-फूलता है। [[Mahabharat (महाभारत)|महाभारत]] के शान्तिपर्व तथा विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी कोष के इसी महत्त्व का उल्लेख मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कोष की अवधारणा भारतीय परम्परा में दीर्घकाल से प्रतिष्ठित रही है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - रंजना, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/566325/13/9th_file_chapter5.pdf कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र में वर्णित आय स्रोत तथा कर व्यवस्था का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक अध्ययन] (२०२२), शोधकेंद्र - बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय , रोहतक (पृ० २१०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-वृद्धि के उपाय॥ Measures for Growth of the Treasury ===&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रकारों ने कर-ग्रहण को कोष-समृद्धि का प्रमुख आधार स्वीकार किया है। [[Acharya (आचार्यः)|आचार्य]] कौटिल्य ने कर-आदान (Tax Collection) के अतिरिक्त कोष-वृद्धि (Treasury Growth) के अन्य उपायों का भी विस्तार से निरूपण किया है तथा साथ ही कोष-क्षय के कारणों को भी स्पष्ट किया है। अर्थशास्त्र में कोष-वृद्धि के अनेक व्यावहारिक साधनों का उल्लेख प्राप्त होता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन उपायों में राष्ट्र की सम्पत्ति में वृद्धि करना, राज्य के नैतिक चरित्र पर विशेष ध्यान देना, चोरों एवं अपराधियों पर सतत निगरानी रखना, राजकीय अधिकारियों को रिश्वत-ग्रहण (Bribery) से रोकना, समस्त प्रकार के अन्न-उत्पादन को प्रोत्साहित करना, जल और स्थल दोनों क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाली व्यापार-योग्य वस्तुओं (Tradeable Goods) की वृद्धि करना, अग्नि आदि आपदाओं से राज्य की रक्षा करना, नियत समय पर विधिपूर्वक कर-आहरण करना तथा हिरण्य आदि भेंटों को स्वीकार करना सम्मिलित है। कौटिल्य के अनुसार ये सभी [[Upayas in Indian Diplomacy|उपाय]] कोष-वृद्धि के प्रभावी साधन माने जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौटिल्य ने कोष-वृद्धि के लिए अनेक व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं। इनमें प्रमुख हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''राजस्व संग्रह (कर व्यवस्था)''' - [[Krshi Vijnana (कृषिविज्ञानम्)|कृषि]], पशुपालन, व्यापार एवं उद्योग से कर संग्रह को कोष-वृद्धि का मुख्य साधन माना गया।&lt;br /&gt;
#'''उत्पादन का प्रोत्साहन''' - कृषि, मत्स्य-पालन, खनन तथा वाणिज्यिक गतिविधियों को राज्य से जोड़कर राष्ट्रीय सम्पदा बढ़ाने पर बल दिया गया।&lt;br /&gt;
#'''व्यापार नियंत्रण''' - तौल-माप, मूल्य-नियंत्रण और शुल्क व्यवस्था के माध्यम से राजकोष में नियमित आय सुनिश्चित की गई।&lt;br /&gt;
#'''आपदाकालीन व्यवस्था''' - दुर्भिक्ष, महामारी अथवा युद्ध जैसी परिस्थितियों में विशेष उपायों द्वारा कोष को पुनः सुदृढ़ करने की व्यवस्था की गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-हानि के प्रकार॥ Types of Treasury Losses===&lt;br /&gt;
कौटिल्य कोष-क्षय के कारणों के प्रति अत्यन्त सजग थे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि राज्यकर्मचारी विभिन्न रूपों में राजकोष का दुरुपयोग कर सकते हैं। अर्थशास्त्र में कोष-क्षय के आठ प्रमुख कारण बताए गए हैं जिनसे सचेत रहना भी राजा के लिए आवश्यक था जो निम्न हैं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रतिबन्धः प्रयोगोव्यवहारोऽवस्तारः परिहायणमुपभोगः परिवर्तनमवहारश्चेति कोषक्षयः॥ (अर्थशास्त्र २/२४/८/३)&amp;lt;ref&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० १०९)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रतिबन्ध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन और अपहार ये आठ कोषक्षय के प्रमुख कारण हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''प्रतिबंधक (राजकर की अनुचित वसूली एवं संग्रह) -''' अर्थशास्त्र के अनुसार राजकर की वसूली कर उसे अपने अधिकार में न रखना, अधिकार में रखने पर भी उसे राजकोष में जमा न करना अथवा वसूल की गई राशि का अन्यत्र उपयोग करना - ये तीनों स्थितियाँ प्रतिबन्धक क्षय कहलाती हैं। ऐसे कृत्यों द्वारा राजकोष की हानि होती है, क्योंकि कर का  नियमानुकूल लेखांकन एवं संग्रह बाधित हो जाता है। कौटिल्य ने इस प्रकार के कोष-क्षय को गम्भीर अपराध मानते हुए दोषी अध्यक्ष पर क्षतिग्रस्त राशि से दस गुना दण्ड निर्धारित किया है।&lt;br /&gt;
#'''प्रयोग (कोषधन का निजी लेन-देन में प्रयोग)''' - राजकोष के धन से स्वयं लेन-देन कर उसे बढ़ाने का प्रयास करना प्रयोग कहलाता है। ऐसा कृत्य राज्यधन के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है। इस प्रकार के अपराध में संलिप्त अधिकारी को भी दूना दण्ड दिया जाना आवश्यक बताया गया है।&lt;br /&gt;
#'''व्यवहार (कोष की सम्पत्ति से निजी व्यापार) -'''  राजकोष में संचित धन अथवा वस्तुओं से स्वयं व्यापार करना व्यवहार कहा गया है। यह भी कोष के अनुचित उपयोग का रूप है। ऐसे कृत्य के लिए दोषी व्यक्ति को दुगुना दण्ड देने का विधान किया गया है।&lt;br /&gt;
#'''अवस्तार (भय अथवा रिश्वत द्वारा धन-संग्रह) -''' जो अधिकारी नियत समय पर कर वसूली न करके, विलम्ब का भय दिखाकर अथवा रिश्वत प्राप्त करने की इच्छा से प्रजा को उत्पीड़ित कर धन एकत्र करता है, उसे अवस्तार कहा गया है। इस प्रकार की वसूली को अत्यन्त निन्दनीय माना गया है और ऐसे अधिकारी पर हानि की राशि से पाँच गुना दण्ड लगाने का निर्देश दिया गया है।&lt;br /&gt;
#'''परिहरण (आय को घटाकर एवं व्यय को बढ़ाकर कोष-हानि) -''' जो अध्यक्ष अथवा अधिकारी अपने दुष्कृत्यों के कारण राज्य की आय को कम कर देता है तथा व्यय की राशि को अनावश्यक रूप से बढ़ा देता है, उसे परिहरण कहा गया है। इस प्रकार का आचरण भी कोष को क्षति पहुँचाने वाला माना गया है और इसके लिए चौगुना दण्ड का विधान किया गया है।&lt;br /&gt;
#'''उपभोग (राजकोषीय द्रव्यों का निजी उपभोग)''' - राजकोष में संचित द्रव्यों का स्वयं उपयोग करना अथवा दूसरों को उसका उपयोग करने देना उपभोग कहलाता है। यह कोष-क्षय का गम्भीर अपराध माना गया है। ऐसे अपराध में संलग्न अध्यक्ष के लिए [[Penal System (दण्ड व्यवस्था)|दण्ड]] का निर्धारण उपभोग की वस्तु के अनुसार किया गया है। यदि वह रत्नों का उपभोग करता है तो उस पर प्राणदण्ड का विधान है; साहसिक द्रव्यों के उपभोग की स्थिति में मध्यम साहस दण्ड (250 से 500 पण तक का अर्थदण्ड) निर्धारित किया गया है; तथा यदि फल, कन्द-मूल अथवा अन्य उपभोग्य पदार्थों का उपयोग किया गया हो तो उनसे सम्बन्धित द्रव्य को वापस लेकर उसकी लागत के अनुरूप दण्ड दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
#'''परिवर्तन (राजकोषीय द्रव्यों का परिवर्तन) -''' राजकोष की वस्तुओं को अन्य वस्तुओं से बदल लेना परिवर्तन कहा जाता है। यह भी कोष के अनधिकृत उपयोग का ही एक रूप है। इस प्रकार के कृत्य में संलिप्त अध्यक्ष को उपभोग-क्षय के समान ही दण्ड दिया जाना चाहिए&lt;br /&gt;
#'''अपहार (लेखा-विवरण में अनियमितता) -''' प्राप्त आय को लेखा-पुस्तकों (रजिस्टर) में अंकित न करना, नियमित व्यय को रजिस्टर में दर्शाने के उपरान्त भी उसका वास्तविक उपयोग न करना, अथवा प्राप्त निधि के सम्बन्ध में छल-कपट करना- ये तीनों प्रकार के कृत्य अपहार की श्रेणी में आते हैं। अपहार के माध्यम से कोष-क्षय करने वाले अध्यक्ष को हुई हानि से बारह गुना दण्ड देने का निर्देश दिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== कोषाध्यक्ष के दायित्व ===&lt;br /&gt;
कौटिल्य के अनुसार राजकीय कोष का प्रधान अधिकारी सन्निधाता कहलाता था। सन्निधाता का दायित्व था कि वह कोषगृह, पण्यगृह, कोष्ठागार, कुष्ठागार, आयुधागार तथा कारागार आदि की स्थापना कर उनकी समुचित देखरेख करे। कोषगृह आदि की संपूर्ण व्यवस्था उसके अधीन संचालित होती थी तथा कोषाध्यक्ष, पण्याध्यक्ष आदि अन्य अधिकारी उसके निर्देशन में अपने-अपने कार्यों का निर्वहन करते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोषगृह में विविध प्रकार की मूल्यवान वस्तुओं का संग्रह किया जाता था। कोषगृह के निर्माण के विषय में आचार्य कौटिल्य ने विशेष तकनीकी निर्देश दिए हैं। उनके अनुसार कोषगृह का निर्माण ऐसे सुरक्षित स्थान पर किया जाना चाहिए जहाँ न जल का प्रवेश हो और न ही आर्द्रता। इसकी दीवारें तथा फर्श सुदृढ़ शिलाओं से निर्मित हों तथा भीतर लकड़ी के खम्भों के बीच एक पृथक कक्ष बनाया जाए, जिसमें केवल एक द्वार हो। उस कक्ष के मध्य भाग में भूमि को समतल कर उसमें एक गड्ढा बनाया जाए, जिसमें चन्दन की लकड़ी स्थापित हो और उस पर देवता की प्रतिष्ठा की जाए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके ऊपर एक पृथक कोषागार का निर्माण किया जाए, जो चारों ओर से सुरक्षित एवं बंद हो, जिसकी छत दृढ़ हो, ईंटों से निर्मित हो तथा जिसमें कोषीय वस्तुओं को रखने हेतु नालीयुक्त व्यवस्था की गई हो। इस प्रकार कौटिल्य ने कोषगृह की संरचना में सुरक्षा, पवित्रता एवं सुव्यवस्थित संग्रह - तीनों पर विशेष बल दिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष में संचित सम्पत्तियों के प्रकार॥ Types of Assets Stored in the Treasury===&lt;br /&gt;
आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजकोष में संचित सम्पदाओं (Assets) एवं मुद्राओं (Currency) के स्वरूप का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। उन्होंने एक कुशल जौहरी की भाँति विविध प्रकार के रत्नों और मूल्यवान वस्तुओं, जैसे - मोती, मणि, हीरा, मूंगा, चन्दन, बहुमूल्य वस्त्र, स्वर्ण एवं रजत से निर्मित आभूषण (Gold and Silver Ornaments) तथा स्वर्ण, रजत और ताम्र धातुओं से निर्मित मुद्राओं - का सूक्ष्म एवं प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है। इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि कौटिल्य को कोष में संचित सम्पत्ति के भौतिक स्वरूप (Treasury Management) तथा उसके आर्थिक महत्व (Material Wealth Classification) का गहन ज्ञान था। उनके अनुसार राजकोष में संचित सम्पदा (Stored Wealth) मुख्यतः स्वर्ण, रजत, हीरा, मोती आदि बहुमूल्य धातुओं एवं रत्नों के रूप में विद्यमान रहती थी, जो राज्य की आर्थिक सुदृढ़ता (Economic Stability of the State) का आधार मानी जाती थी।&amp;lt;ref&amp;gt;पी०वी० काणे, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.306909/page/n102/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास] (१९६५), द्वितीय भाग-अध्याय ५, हिन्दी विभाग सूचना समिति, लखनऊ (पृ० ६६७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
कौटिल्य की कोष-व्यवस्था केवल आर्थिक [[Niti Shastra (नीति शास्त्र)|नीति]] नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रशासनिक दर्शन है। कोष-वृद्धि, कोष-संरक्षण और कोष नियन्त्रण - ये तीनों राज्य की स्थिरता के मूल स्तम्भ हैं। आधुनिक सार्वजनिक वित्त एवं प्रशासनिक पारदर्शिता की अवधारणाओं में भी कौटिल्य के सिद्धान्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। अतः प्राचीन भारतीय कोष-व्यवस्था को भारतीय आर्थिक चिन्तन की आधारशिला कहा जा सकता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Arthashastra]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137545</id>
		<title>Treasury System (कोष व्यवस्था)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137545"/>
		<updated>2026-01-27T15:56:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन में राज्य की स्थिरता एवं उन्नति के लिए कोष को प्रमुख स्थान प्राप्त है। कौटिल्य द्वारा रचित [[Arthashastra (अर्थशास्त्रम्)|अर्थशास्त्र]] में कोष को न केवल राज्य का आधार माना गया है, अपितु उसे दण्ड, सेना, प्रशासन और लोककल्याण की शक्ति का मूल स्रोत भी बताया गया है। प्रस्तुत लेख में कोष-संरचना, कोष-वृद्धि के उपाय, कोष-क्षय के कारण तथा कोष में संचित विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों का विश्लेषण किया गया है। यह स्पष्ट करता है कि कौटिल्य की कोष-नीति केवल राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं थी, अपितु नैतिक प्रशासन, भ्रष्टाचार-नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा की समग्र योजना प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
राज्य संचालन का मूलाधार आर्थिक सुदृढ़ता है। प्राचीन शास्त्रकारों ने राज्य के [[Saptanga Siddhanta (सप्तांग सिद्धांत)|सप्ताङ्ग सिद्धान्त]] में कोष को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। कौटिल्य भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि समस्त प्रशासनिक क्रियाएँ कोष पर ही आधारित होती हैं। कोष के बिना न तो सेना का संचालन सम्भव है और न ही दण्ड-व्यवस्था की प्रभावशीलता। इसीलिए राजा का प्रथम कर्तव्य कोष की रक्षा एवं वृद्धि बताया गया है-&amp;lt;ref&amp;gt;शोधकर्त्री-अनुराधा भारद्वाज, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/21647/3/shukraniti.pdf शुक्रनीति का अनुशीलन] (२०१३), शोधकेन्द्र - कुमाऊं विश्वविद्यालय (पृ० १९७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
कोशमूला कोशपूर्वा सर्वारंभाः। तस्मात पूर्वं कोशमवेक्षते॥ (कौटिल्य अर्थशास्त्र २/२) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्राचीन काल से ही राजस्व एवं सैन्य बल राज्य के प्रमुख दो स्तम्भ कहे गये हैं। आचार्य शुक्र कोष का लक्षण करते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;एकार्थ समुदायो यः स कोशः स्यात् पृथक् पृथक्। (शुक्रनीति ४/२/१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;पं० श्री ब्रह्माशंकर मिश्र, [https://archive.org/details/20230223_20230223_0110/page/n285/mode/1up शुक्रनीति] (१९६८), चतुर्थ अध्याय-कोशनिरूपण प्रकरण, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी (पृ० २०१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;किसी भी एक तरह की वस्तुओं के समूह को कोष कहा जाता है जो कई तरह के होते हैं। राज्य की समृद्धि तथा लोककल्याणकारी दायित्वों के निर्वहन हेतु कोष की वृद्धि अनिवार्य मानते हुए कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;येन केन प्रकारेण धनं सञ्चिनुयात् नृपः। तेन संरक्षयेद्राष्ट्रं बलं यज्ञादिकाः क्रियाः॥ (शुक्रनीति ४/२/२)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;राजा का यह कर्तव्य है कि वह विविध उपायों द्वारा धन का संग्रह करे, जिससे संचित संपत्ति के माध्यम से राष्ट्र, सेना तथा धार्मिक कार्यों की समुचित रक्षा की जा सके। कोश वृद्धि का मूल कारण सेना को मानते हुए शुक्राचार्य जी कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम्। बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिरक्षयः॥ (शुक्रनीति ४/२/१४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सेना को राजकोष का मूल आधार माना गया है, क्योंकि सेना के माध्यम से ही कोष का संरक्षण एवं संचय सम्भव होता है। इसी प्रकार राजकोष भी सेना का आधारस्तम्भ है, क्योंकि कोष के अभाव में सेना का भरण-पोषण तथा संरक्षण नहीं किया जा सकता। इस प्रकार सेना और कोष परस्पर आश्रित हैं। जब सेना तथा राजकोष की समुचित रक्षा की जाती है, तब न केवल कोष और राज्य की समृद्धि होती है, अपितु शत्रुओं का विनाश भी सुनिश्चित होता है। महाभारत में कहा गया है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;कोशश्च सततं रक्ष्यो यत्नमास्थाय राजभिः। कोशमूला हि राजानः कोशवृद्धिकरो भवेत्॥ कोष्ठागारं च ते नित्यं स्फीतं धान्यैः सुसंचितैः॥ (महाभारत ११९/१६)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D-12-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5-119 महाभारत], शांतिपर्व, अध्याय ११९, श्लोक १६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' राजाओं को चाहिए कि वे पूर्ण प्रयास और सतत सावधानी के साथ राजकोष की निरन्तर रक्षा करें, क्योंकि राजाओं की सत्ता का मूल आधार कोष ही होता है। अतः राजा को कोष की वृद्धि करने वाला होना चाहिए। राजा का भण्डारगृह सदैव अन्न-धान्यों से परिपूर्ण तथा भली-भाँति संचित होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कोष की अवधारणा॥ Concept of Treasury==&lt;br /&gt;
कौटिल्य के अनुसार कोष केवल धन-संग्रह नहीं, बल्कि राज्य की जीवन-रेखा है। अर्थशास्त्र में कोष को राज्यरूपी वृक्ष की जड़ कहा गया है। यदि जड़ सुदृढ़ है तो वृक्ष स्वतः फल-फूलता है। महाभारत के शान्तिपर्व तथा विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी कोष के इसी महत्त्व का उल्लेख मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कोष की अवधारणा भारतीय परम्परा में दीर्घकाल से प्रतिष्ठित रही है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - रंजना, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/566325/13/9th_file_chapter5.pdf कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र में वर्णित आय स्रोत तथा कर व्यवस्था का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तुलनात्मक अध्ययन] (२०२२), शोधकेंद्र - बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय , रोहतक (पृ० २१०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-वृद्धि के उपाय॥ Measures for Growth of '''the''' Treasury===&lt;br /&gt;
कौटिल्य ने कोष-वृद्धि के लिए अनेक व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं। इनमें प्रमुख हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''राजस्व संग्रह (कर व्यवस्था)''' - कृषि, पशुपालन, व्यापार एवं उद्योग से कर संग्रह को कोष-वृद्धि का मुख्य साधन माना गया।&lt;br /&gt;
#'''उत्पादन का प्रोत्साहन''' - कृषि, मत्स्य-पालन, खनन तथा वाणिज्यिक गतिविधियों को राज्य से जोड़कर राष्ट्रीय सम्पदा बढ़ाने पर बल दिया गया।&lt;br /&gt;
#'''व्यापार नियंत्रण''' - तौल-माप, मूल्य-नियंत्रण और शुल्क व्यवस्था के माध्यम से राजकोष में नियमित आय सुनिश्चित की गई।&lt;br /&gt;
#'''आपदाकालीन व्यवस्था''' - दुर्भिक्ष, महामारी अथवा युद्ध जैसी परिस्थितियों में विशेष उपायों द्वारा कोष को पुनः सुदृढ़ करने की व्यवस्था की गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष-हानि के प्रकार एवं दण्ड-विधान॥ '''Types of Treasury Losses and Penal Provisions'''===&lt;br /&gt;
कौटिल्य कोष-क्षय के कारणों के प्रति अत्यन्त सजग थे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि राज्यकर्मचारी विभिन्न रूपों में राजकोष का दुरुपयोग कर सकते हैं। अर्थशास्त्र में कोष-क्षय के आठ प्रमुख कारण बताए गए हैं जिनसे सचेत रहना भी राजा के लिए आवश्यक था जो निम्न हैं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रतिबन्धः प्रयोगोव्यवहारा अवस्तारः परिहायणमुपभोगः परिवर्तनमवहारश्चेति कोषक्षयः॥ (अर्थशास्त्र २/२४/१७)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;प्रतिबन्ध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन और अपहार ये आठ कोषक्षय के प्रमुख कारण हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''प्रतिबंधक (राजकर की अनुचित वसूली एवं संग्रह) -''' अर्थशास्त्र के अनुसार राजकर की वसूली कर उसे अपने अधिकार में न रखना, अधिकार में रखने पर भी उसे राजकोष में जमा न करना अथवा वसूल की गई राशि का अन्यत्र उपयोग करना - ये तीनों स्थितियाँ प्रतिबन्धक क्षय कहलाती हैं। ऐसे कृत्यों द्वारा राजकोष की हानि होती है, क्योंकि कर का  नियमानुकूल लेखांकन एवं संग्रह बाधित हो जाता है। कौटिल्य ने इस प्रकार के कोष-क्षय को गम्भीर अपराध मानते हुए दोषी अध्यक्ष पर क्षतिग्रस्त राशि से दस गुना दण्ड निर्धारित किया है।&lt;br /&gt;
#'''प्रयोग (कोषधन का निजी लेन-देन में प्रयोग)''' - राजकोष के धन से स्वयं लेन-देन कर उसे बढ़ाने का प्रयास करना प्रयोग कहलाता है। ऐसा कृत्य राज्यधन के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है। इस प्रकार के अपराध में संलिप्त अधिकारी को भी दूना दण्ड दिया जाना आवश्यक बताया गया है।&lt;br /&gt;
#'''व्यवहार (कोष की सम्पत्ति से निजी व्यापार) -'''  राजकोष में संचित धन अथवा वस्तुओं से स्वयं व्यापार करना व्यवहार कहा गया है। यह भी कोष के अनुचित उपयोग का रूप है। ऐसे कृत्य के लिए दोषी व्यक्ति को दुगुना दण्ड देने का विधान किया गया है।&lt;br /&gt;
#'''अवस्तार (भय अथवा रिश्वत द्वारा धन-संग्रह) -''' जो अधिकारी नियत समय पर कर वसूली न करके, विलम्ब का भय दिखाकर अथवा रिश्वत प्राप्त करने की इच्छा से प्रजा को उत्पीड़ित कर धन एकत्र करता है, उसे अवस्तार कहा गया है। इस प्रकार की वसूली को अत्यन्त निन्दनीय माना गया है और ऐसे अधिकारी पर हानि की राशि से पाँच गुना दण्ड लगाने का निर्देश दिया गया है।&lt;br /&gt;
#'''परिहरण (आय को घटाकर एवं व्यय को बढ़ाकर कोष-हानि) -''' जो अध्यक्ष अथवा अधिकारी अपने दुष्कृत्यों के कारण राज्य की आय को कम कर देता है तथा व्यय की राशि को अनावश्यक रूप से बढ़ा देता है, उसे परिहरण कहा गया है। इस प्रकार का आचरण भी कोष को क्षति पहुँचाने वाला माना गया है और इसके लिए चौगुना दण्ड का विधान किया गया है।&lt;br /&gt;
#'''उपभोग (राजकोषीय द्रव्यों का निजी उपभोग)''' - राजकोष में संचित द्रव्यों का स्वयं उपयोग करना अथवा दूसरों को उसका उपयोग करने देना उपभोग कहलाता है। यह कोष-क्षय का गम्भीर अपराध माना गया है। ऐसे अपराध में संलग्न अध्यक्ष के लिए दण्ड का निर्धारण उपभोग की वस्तु के अनुसार किया गया है। यदि वह रत्नों का उपभोग करता है तो उस पर प्राणदण्ड का विधान है; साहसिक द्रव्यों के उपभोग की स्थिति में मध्यम साहस दण्ड (250 से 500 पण तक का अर्थदण्ड) निर्धारित किया गया है; तथा यदि फल, कन्द-मूल अथवा अन्य उपभोग्य पदार्थों का उपयोग किया गया हो तो उनसे सम्बन्धित द्रव्य को वापस लेकर उसकी लागत के अनुरूप दण्ड दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
#'''परिवर्तन (राजकोषीय द्रव्यों का परिवर्तन) -''' राजकोष की वस्तुओं को अन्य वस्तुओं से बदल लेना परिवर्तन कहा जाता है। यह भी कोष के अनधिकृत उपयोग का ही एक रूप है। इस प्रकार के कृत्य में संलिप्त अध्यक्ष को उपभोग-क्षय के समान ही दण्ड दिया जाना चाहिए&lt;br /&gt;
#'''अपहार (लेखा-विवरण में अनियमितता) -''' प्राप्त आय को लेखा-पुस्तकों (रजिस्टर) में अंकित न करना, नियमित व्यय को रजिस्टर में दर्शाने के उपरान्त भी उसका वास्तविक उपयोग न करना, अथवा प्राप्त निधि के सम्बन्ध में छल-कपट करना- ये तीनों प्रकार के कृत्य अपहार की श्रेणी में आते हैं। अपहार के माध्यम से कोष-क्षय करने वाले अध्यक्ष को हुई हानि से बारह गुना दण्ड देने का निर्देश दिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कोष में संचित सम्पत्तियों के प्रकार॥ '''Types of Assets Stored in the Treasury'''===&lt;br /&gt;
आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजकोष (State Treasury) में संचित सम्पदाओं (Assets) एवं मुद्राओं (Currency) के स्वरूप का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। उन्होंने एक कुशल जौहरी की भाँति विविध प्रकार के रत्नों और मूल्यवान वस्तुओं, जैसे - मोती (Pearls), मणि (Gems), हीरा (Diamonds), मूंगा (Coral), चन्दन (Sandalwood), बहुमूल्य वस्त्र (Precious Textiles), स्वर्ण एवं रजत से निर्मित आभूषण (Gold and Silver Ornaments) तथा स्वर्ण, रजत और ताम्र धातुओं से निर्मित मुद्राओं - का सूक्ष्म एवं प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया है। इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि कौटिल्य को कोष में संचित सम्पत्ति के भौतिक स्वरूप (Treasury Management) तथा उसके आर्थिक महत्व (Material Wealth Classification) का गहन ज्ञान था। उनके अनुसार राजकोष में संचित सम्पदा (Stored Wealth) मुख्यतः स्वर्ण, रजत, हीरा, मोती आदि बहुमूल्य धातुओं एवं रत्नों के रूप में विद्यमान रहती थी, जो राज्य की आर्थिक सुदृढ़ता (Economic Stability of the State) का आधार मानी जाती थी।&amp;lt;ref&amp;gt;पी०वी० काणे, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.306909/page/n102/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास] (१९६५), द्वितीय भाग-अध्याय ५, हिन्दी विभाग सूचना समिति, लखनऊ (पृ० ६६७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
कौटिल्य की कोष-व्यवस्था केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रशासनिक दर्शन है। कोष-वृद्धि, कोष-संरक्षण और कोष नियन्त्रण - ये तीनों राज्य की स्थिरता के मूल स्तम्भ हैं। आधुनिक सार्वजनिक वित्त एवं प्रशासनिक पारदर्शिता की अवधारणाओं में भी कौटिल्य के सिद्धान्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। अतः प्राचीन भारतीय कोष-व्यवस्था को भारतीय आर्थिक चिन्तन की आधारशिला कहा जा सकता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Arthashastra]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Treasury_System_(%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B7_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137544</id>
		<title>Treasury System (कोष व्यवस्था)</title>
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		<updated>2026-01-27T09:55:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: नया लेख प्रारंभ - कोष व्यवस्था&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन में राज्य की स्थिरता एवं उन्नति के लिए कोष को केन्द्रीय स्थान प्राप्त है। कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र में कोष को न केवल राज्य का आधार माना गया है, अपितु उसे दण्ड, सेना, प्रशासन और लोककल्याण की शक्ति का मूल स्रोत भी बताया गया है। प्रस्तुत लेख में कोष-संरचना, कोष-वृद्धि के उपाय, कोष-क्षय के कारण तथा कोष में संचित विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों का विश्लेषण किया गया है। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि कौटिल्य की कोष-नीति केवल राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं थी,  अपितु नैतिक प्रशासन, भ्रष्टाचार-नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा की समग्र योजना प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
राज्य संचालन का मूलाधार आर्थिक सुदृढ़ता है। प्राचीन धर्मशास्त्रकारों ने राज्य के सप्ताङ्ग सिद्धान्त में कोष को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। कौटिल्य भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि समस्त प्रशासनिक क्रियाएँ कोष पर ही आधारित होती हैं। कोष के बिना न तो सेना का संचालन सम्भव है और न ही दण्ड-व्यवस्था की प्रभावशीलता। इसीलिए राजा का प्रथम कर्तव्य कोष की रक्षा एवं वृद्धि बताया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_and_Ayurveda_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%8F%E0%A4%B5%E0%A4%82_%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6)&amp;diff=137543</id>
		<title>Dharmashastra and Ayurveda (धर्मशास्त्र एवं आयुर्वेद)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_and_Ayurveda_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%8F%E0%A4%B5%E0%A4%82_%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6)&amp;diff=137543"/>
		<updated>2026-01-21T17:05:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञानपरम्परा में आयुर्वेद और धर्मशास्त्र को पृथक-पृथक शास्त्र मानते हुए भी उनका अन्तःसंबंध अत्यन्त गहन है। आयुर्वेद जहाँ शरीर, मन और आत्मा के स्वास्थ्य की वैज्ञानिक विवेचना करता है, वहीं धर्मशास्त्र मनुष्य के आचार, व्यवहार और सामाजिक कर्तव्यों का नियमन करता है। दोनों का लक्ष्य एक ही है मानव जीवन को सुखी, संतुलित और आरोग्यपूर्ण बनाना। इस दृष्टि से धर्मशास्त्र और आयुर्वेद को जीवन-विज्ञान के पूरक के रूप में देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में वर्णित आचार-विधान, यम-नियम, शौच, संयम, सदाचार आदि केवल नैतिक अनुशासन नहीं हैं, बल्कि वे स्वास्थ्य-संरक्षण के उपाय भी हैं। धर्मशास्त्र यह मानता है कि अधर्म, असंयम और आचारहीनता से मन विकृत होता है और विकृत मन शरीर में रोग उत्पन्न करता है। इस प्रकार धर्मशास्त्र अप्रत्यक्ष रूप से आयुर्वेदिक स्वास्थ्य-सिद्धान्तों का समर्थन करता है। आयुर्वेद शरीर, मन और जीवात्मा- इन तीनों के संयोगको जीवन मानता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत्। लोकस्तिष्ठति संयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ (चरकसंहिता १/१८)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आयुर्वेद के अनुसार जीवन (आयुः) का तात्पर्य केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं, अपितु शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा के समन्वित अस्तित्व से है। सुश्रुत और चरक जैसे आचार्यों ने स्पष्ट किया है कि जब तक इन चारों का संतुलन बना रहता है, तभी व्यक्ति को वास्तविक आरोग्य की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार नहीं माना गया, बल्कि उसे मानसिक और आचारगत असंतुलन से भी जोड़ा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;कल्याण-धर्मशास्त्रांक, [https://archive.org/details/kalyan-dharma-shastra-anka/page/n158/mode/1up आयुर्वेद और धर्मशास्त्र], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १६०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== आयुर्वेद==&lt;br /&gt;
आयुर्विज्ञान आयु से संबंधित वह व्यापक विज्ञान है, जिसके अंतर्गत सम्पूर्ण सृष्टि में विद्यमान जीवन के स्वरूप, संरक्षण, सुव्यवस्था तथा उनसे जुड़े हित–अहित तत्त्वों का सम्यक् ज्ञान प्रदान किया जाता है। आयु की रक्षा एवं संवर्धन के उद्देश्य से कालान्तर में विविध उपायों का विकास हुआ, जो क्रमशः एक संगठित पद्धति के रूप में स्थापित हुए। इन पद्धतियों में आयुर्वेद को सर्वाधिक प्राचीन एवं मूलभूत स्थान प्राप्त है। वैदिक युग से ही आयुर्वेद का सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक स्वरूप ग्रंथों में स्पष्ट रूप से उपलब्ध होता है। आधुनिक काल में आयुर्वेद के साथ-साथ यूनानी, होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा, योग एवं सिद्ध चिकित्सा, एलोपैथी तथा इलेक्ट्रोपैथी जैसी विविध चिकित्सा प्रणालियाँ प्रचलन में हैं। तथापि आयुर्वेद में विशेष रूप से मानव स्वास्थ्य की रक्षा तथा दीर्घायु प्राप्ति से संबंधित सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अन्य प्राणियों के कल्याण हेतु हस्त्यायुर्वेद, अश्वायुर्वेद एवं वृक्षायुर्वेद जैसी स्वतंत्र शाखाओं का भी उल्लेख आयुर्वैदिक साहित्य में मिलता है, जो इसकी सर्वांगीण दृष्टि को रेखांकित करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;[https://ncert.nic.in/pdf/publication/otherpublications/sanskrit_vangmay.pdf संस्कृत वाङ्मय में विज्ञान का इतिहास-आयुर्विज्ञान] (2018), राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) नई दिल्ली (पृ० ६८)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य का संरक्षण तथा रोगग्रस्त व्यक्ति के रोगों का उपचार - ये दोनों ही आयुर्वेद के प्रधान उद्देश्य माने गए हैं। इन्हीं उद्देश्यों की सिद्धि के लिए दिनचर्या, ऋतुचर्या, विशिष्ट चिकित्सीय उपक्रम जैसे पंचकर्म, रसायन एवं वाजीकरण आदि का क्रमबद्ध और वैज्ञानिक प्रतिपादन किया गया है। विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद से लेकर अथर्ववेद तक अनेक स्थलों पर विभिन्न रोगों के नाम, उनके लक्षण तथा चिकित्सा-विधियों का विस्तारपूर्वक वर्णन प्राप्त होता है। इसी प्रकार रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों में आयुर्वेदिक ज्ञान के अनेक संदर्भ उपलब्ध हैं। आगे चलकर सम्राट् अशोक द्वारा आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार हेतु किए गए प्रयासों तथा चीनी यात्रियों के वृत्तान्तों से भारत में आयुर्वेद के पूर्ण विकसित स्वरूप का विवरण मिलता है। प्राचीन काल से वर्तमान समय तक आयुर्वेद के अध्ययन, अध्यापन एवं अनुसंधान को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक शिक्षण एवं शोध संस्थानों की विधिवत स्थापना की गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सुख-दुःख और मन की भूमिका==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद तथा धर्मशास्त्र - दोनों में सुख-दुःख का मूल कारण मन को माना गया है। मन यदि शुद्ध, संयमित और सात्त्विक है, तो व्यक्ति सुख और आरोग्य का अनुभव करता है; जबकि रजस और तमस से युक्त मन दुःख और रोग का कारण बनता है। धर्मशास्त्र मन की शुद्धि के लिए सदाचार, सत्य, अहिंसा और संयम पर बल देता है, वहीं आयुर्वेद मानसिक दोषों को रोग-उत्पत्ति का प्रमुख कारण मानता है। सुख-दुःख, रोग एवं आरोग्यका आधार शरीर और मन ही है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;शरीरं सत्त्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः। तथा सुखानां योगस्तु सुखानां कारणं समः॥ (चरक संहिता १/२७)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;शरीर और मन- ये दोनों ही व्याधियों के आश्रय माने गये हैं तथा सुख (आरोग्य) के आश्रय भी ये ही हैं। आहार, आचार-विचार, व्यवहारका सम, उचित प्रयोग ही सुखोंका कारण हैं, आरोग्य सच्चा सुख एवं रोग ही दुःख है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च॥ (चरक संहिता)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;रोगको हटाने या उत्पन्न न होने देनेकी विधि बतलाना आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनोंका समान उद्देश्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==त्रिदोष सिद्धान्त और नैतिक जीवन==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद का वात-पित्त-कफ सिद्धान्त केवल शारीरिक तत्त्वों तक सीमित नहीं है। इनके असंतुलन का सम्बन्ध व्यक्ति के आहार-विहार और मानसिक प्रवृत्तियों से भी है। धर्मशास्त्रों में वर्णित अति-भोग, क्रोध, लोभ और असंयम त्रिदोषों के विकार को बढ़ाते हैं। इस प्रकार नैतिक और अनुशासित जीवनशैली को दोनों शास्त्र समान रूप से आवश्यक मानते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान-परंपरा में आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दो ऐसे मूलभूत स्तम्भ हैं, जो मानव जीवन को केवल भौतिक या सामाजिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि नैतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक धरातल पर भी संतुलित करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आयुर्वेद जहाँ शरीर-मन-आत्मा के सामंजस्य को स्वास्थ्य का आधार मानता है, वहीं धर्मशास्त्र मानव कर्तव्यों, आचरण और सामाजिक उत्तरदायित्वों की सुव्यवस्थित रूपरेखा प्रस्तुत करता है। यह शोध-लेख दोनों परंपराओं के दार्शनिक, व्यावहारिक एवं नैतिक अंतर्संबंधों का विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित करता है कि आयुर्वेद और धर्मशास्त्र परस्पर पूरक प्रणालियाँ हैं, जो समग्र एवं सार्थक जीवन-दृष्टि प्रदान करती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आयुर्वेद एवं धर्मशास्त्र का समन्वय==&lt;br /&gt;
मन अस्वस्थ और शरीर स्वस्थ या शरीर स्वस्थ और मन अस्वस्थ कभी नहीं रह सकते, दोनों अन्योन्याश्रित हैं। अतः दोनोंका उपचार बतलाना आयुर्वेदका लक्ष्य है। यही कारण है कि- आहार, आचार-विचार, व्यवहार-दिनचर्यामें आयुर्वेद और धर्मशास्त्र एकमत हो जाते हैं। दोनोंका लक्ष्य मानवको सुख प्राप्त कराना है जैसा कि -&amp;lt;blockquote&amp;gt;सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः। सुखं च न विना धर्मात् तस्माद् धर्मपरो भवेत्॥ (वा० सू० २।२)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सब प्रकारके प्राणियोंकी प्रवृत्ति सुखके लिये ही होती है, सुख धर्मपालन किये बिना नहीं मिलता। अतः सुख चाहनेवालेको धर्मपरायण रहना चाहिये। अधार्मिक पुरुष सुखी नहीं रह सकता - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम्। हिंसारतश्च यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते॥ (मनु० ४। १७०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो पुरुष अधार्मिक है, जिसका झूठ बोलना ही धनागमका साधन है, जो मन-वाणी-शरीरसे दूसरोंकी हिंसा करता है या प्राणवियोग करता है, वह इस लोकमें कभी सुखी नहीं रह सकता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय बौद्धिक परंपरा की विशेषता यह है कि यहाँ ज्ञान को खंडों में नहीं, बल्कि समग्रता में देखा गया है। जीवन, समाज, स्वास्थ्य और धर्म - ये सभी पृथक विषय न होकर परस्पर संबद्ध तत्व हैं। आयुर्वेद को ‘आयुः’ अर्थात् जीवन का विज्ञान कहा गया है, जबकि धर्मशास्त्र मानव जीवन के लिए आचार-संहिता और कर्तव्यबोध का विधान प्रस्तुत करता है। दोनों का लक्ष्य मनुष्य को प्रकृति एवं ब्रह्माण्डीय व्यवस्था (ऋत) के साथ सामंजस्य में स्थापित करना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===धर्मशास्त्र की वैचारिक संरचना===&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र ग्रंथ - जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति और उनके भाष्य - मानव जीवन के नैतिक, सामाजिक और विधिक पक्षों को स्पष्ट करते हैं। धर्म यहाँ केवल धार्मिक अनुष्ठान न होकर कर्तव्य, न्याय, शील और लोक-कल्याण का व्यापक सिद्धांत है। आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनों का दार्शनिक आधार वैदिक विश्वदृष्टि है, जिसमें ब्रह्माण्ड को एक नैतिक-प्राकृतिक व्यवस्था के रूप में देखा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*आयुर्वेद में दोष-संतुलन और गुण-त्रय (सत्त्व, रजस्, तमस्) की अवधारणा&lt;br /&gt;
*धर्मशास्त्र में वर्ण-आश्रम-धर्म तथा कर्तव्य-संतुलन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोनों ही यह स्वीकार करते हैं कि असंतुलन - चाहे वह शारीरिक हो या नैतिक - दुःख और अव्यवस्था को जन्म देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*'''दिनचर्या और ऋतुचर्या -''' आयुर्वेद की दिनचर्या एवं ऋतुचर्या की संकल्पना धर्मशास्त्रीय अनुशासन से मेल खाती है। नियमित जीवन, संयम और स्वच्छता - ये सभी धर्म और स्वास्थ्य दोनों के लिए अनिवार्य माने गए हैं।&lt;br /&gt;
*'''आहार एवं आचार -''' आयुर्वेदिक आहार-नियम सत्त्वगुण की वृद्धि पर बल देते हैं। धर्मशास्त्र भी सात्त्विक भोजन को मानसिक शुद्धि और सदाचार का आधार मानता है। इस प्रकार आहार शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ नैतिक उन्नति का भी साधन बनता है।&lt;br /&gt;
*'''शौच और पवित्रता -''' धर्मशास्त्रों में वर्णित शौच-नियम केवल धार्मिक नहीं, अपितु स्वास्थ्यपरक भी है। आयुर्वेद इन्हें रोग-निवारण और मानसिक स्वच्छता से जोड़ता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चरकसंहिता में वैद्य के लिए करुणा, सत्य, संयम और निष्काम सेवा को अनिवार्य बताया गया है। वैद्य का आचरण स्वयं एक प्रकार का धर्म है। धर्मशास्त्र भी रोगियों, वृद्धों और असहायों की सेवा को पुण्यकर्म मानता है। इस प्रकार चिकित्सा केवल तकनीकी कौशल न होकर एक नैतिक उत्तरदायित्व बन जाती है। अधर्मसे मनुष्य एक बार बढ़ता है, अन्तमें समूल नष्ट हो जाता है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;अधर्मेणैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति। ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ (मनु० ४। १७४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधर्मसे मनुष्य पहले तो एक बार बढ़ता है, फिर मौज-शौक आनन्द भी करता है और अपने छोटे-मोटे शत्रुओंपर धनके बलसे विजय भी प्राप्त कर लेता है, किंतु अन्तमें वह देह, धन और संतानादिसहित समूल नष्ट हो जाता है। इसीलिये मनुजी कहते हैं-&amp;lt;blockquote&amp;gt;परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ। (मनु० ४। १७६)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो धन धर्मविरुद्ध कर्मोंसे मिलता हो, जो भोग धर्मरहित हो उन दोनोंका त्याग कर दे, क्योंकि उनका परिणाम बुरा होगा। अतः मनुस्मृति का यह उपदेश मानव जीवन के लिए एक महत्त्वपूर्ण नैतिक संदेश प्रदान करता है कि धर्म को केंद्र में रखकर ही अर्थ और काम का उपार्जन एवं उपभोग करना चाहिए। यही दृष्टिकोण व्यक्ति को स्थायी सुख, सामाजिक समरसता एवं दीर्घकालिक कल्याण की ओर अग्रसर करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मानसिक स्वास्थ्य और नैतिकता==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद मानता है कि क्रोध, लोभ और ईर्ष्या जैसे दोष मानसिक असंतुलन उत्पन्न करते हैं, जो आगे चलकर शारीरिक रोगों का कारण बनते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र इन्हीं वृत्तियों को अधर्म का मूल बताकर आत्मसंयम और सदाचार पर बल देता है। इससे स्पष्ट होता है कि मानसिक स्वास्थ्य और नैतिक जीवन परस्पर आश्रित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधुनिक युग में बढ़ते तनाव, जीवनशैली-जन्य रोग और नैतिक संकटों के समाधान हेतु आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनों अत्यंत प्रासंगिक हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*आयुर्वेद : व्यक्तिगत दोष निवारक और समग्र स्वास्थ्य-दृष्टि&lt;br /&gt;
*धर्मशास्त्र : सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक दिशा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनका समन्वय सतत विकास और संतुलित जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है। आयुर्वेद और धर्मशास्त्र भारतीय परंपरा में जीवन के दो अलग-अलग नहीं, अपितु एक-दूसरे के पूरक आयाम हैं। जहाँ आयुर्वेद स्वस्थ जीवन की विधि सिखाता है, वहीं धर्मशास्त्र उस जीवन को मूल्य और उद्देश्य प्रदान करता है। दोनों का संयुक्त अध्ययन हमें यह समझने में सहायता करता है कि सच्चा स्वास्थ्य वही है, जो शरीर, मन, समाज और आत्मा - सभी स्तरों पर संतुलन स्थापित करे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्रीय आयुर्वेदिक दृष्टि==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद के अनुसार सदाचार का नियमित अनुपालन व्यक्ति को आगन्तुक रोगों से सुरक्षित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चरकसंहिता में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है कि ईर्ष्या, शोक, भय, क्रोध, मान एवं द्वेष आदि मानसिक विकार हैं, जिनकी उत्पत्ति प्रज्ञापराध से होती है। प्रज्ञापराध का तात्पर्य बुद्धि, स्मृति एवं विवेक के अनुचित प्रयोग से है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य अपने हितकारी आचरण से विचलित हो जाता है और मानसिक तथा शारीरिक व्याधियों का शिकार बनता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;ईर्ष्याशोक भयक्रोधमानद्वेषादयश्च ये। मनोविकारास्तेऽप्युक्ताः सर्वे प्रज्ञापराधजाः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः। देशकालात्मविज्ञानं सवृत्तस्यानुवर्तनम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगन्तूनामनुत्पत्तावेष मार्गो निदर्शितः। प्राज्ञः प्रागेव तत् कुर्याद्धितं विद्याद्यदात्मनः॥ (च० सू० ७। २५-२७)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;भाषार्थ -  ईर्ष्या, शोक, भय, क्रोध, मान तथा द्वेष आदि सब मनके रोग हैं, जो प्रज्ञापराधसे उत्पन्न होते हैं। प्रज्ञापराधोंका त्याग, इन्द्रियोंका उपशम, धर्मशास्त्रोंके तथा आयुर्वेदके उपदेशोंको याद रखना, देश-काल-आत्माका विज्ञान, सवृत्तका अनुवर्तन- ये सब आगन्तुक व्याधियोंसे बचनेके उपाय हैं। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि रोग उत्पन्न होनेके पहले ही आत्महितके इन उपायोंका पालन करे, जिससे आगन्तुक रोग हों ही नहीं। सदाचारवान मानव ही शतायु प्राप्त करता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान् नरः। श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति॥ (मनु० ४। १५८)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सब शुभ लक्षणोंसे हीन पुरुष भी यदि सदाचारी हो, ईश्वर तथा धर्मशास्त्रपर श्रद्धा रखनेवाला हो, परदोष देखने-कहनेवाला न हो तो वह सौ वर्षतक जीता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आयुर्वेद में आयु-संरक्षण के धर्मशास्त्रीय उपाय'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आयुर्वेद के अनुसार आयु की रक्षा केवल औषधियों के प्रयोग से ही नहीं, अपितु जीवन-शैली, आचार एवं मानसिक संस्कारों के समुचित पालन से भी सुनिश्चित होती है। चरकसंहिता में आयु के परिपालन हेतु जिन उपायों को श्रेष्ठ भेषज के रूप में निरूपित किया गया है, वे मुख्यतः आचारात्मक एवं धर्मप्रधान हैं। मङ्गलमय, स्वास्थ्यवर्धक तथा शान्त प्रदेशों में निवास करना व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाता है और रोगोत्पत्ति की संभावनाओं को न्यून करता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम्। सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संकथा धर्मशास्त्राणां महर्षीणां जितात्मनाम्। धार्मिकैः सात्त्विकैर्नित्यं सहास्या वृद्धसम्मतैः॥ इत्येतद्धेषजं प्रोक्तमायुषः परिपालनम्॥ (च० वि० ३।८-१०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' मङ्गलमय स्वास्थ्यप्रद शान्त देशोंमें निवास करना, ब्रह्मचर्यका पालन, ब्रह्मचारियोंकी सेवा, धर्मशास्त्रोंकी कथाओंका श्रवण करना, जितात्मा महर्षियोंके चरित्रोंका श्रवण-पठन एवं मनन करना, जिन धार्मिक सात्त्विक पुरुषोंकी ज्ञानवृद्ध वयोवृद्ध धार्मिक पुरुष प्रशंसा करें, उनके साथ निरन्तर रहनेकी चेष्टा- आयुके परिपालनके ये सब उत्तम भेषज हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मचर्य का पालन तथा ब्रह्मचारियों की सेवा को आयु-संरक्षण का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है। इससे इन्द्रिय-संयम, मानसिक स्थिरता तथा जीवन-ऊर्जा का संरक्षण होता है। इसी प्रकार धर्मशास्त्रों से संबंधित कथाओं का श्रवण, जितेन्द्रिय महर्षियों के चरित्रों का पठन-मनन एवं उनसे प्रेरणा ग्रहण करना मनुष्य के आचरण को परिष्कृत करता है और सद्वृत्त की ओर प्रवृत्त करता है। आयुर्वेद यह भी प्रतिपादित करता है कि जिन धार्मिक, सात्त्विक एवं सदाचारी व्यक्तियों की प्रशंसा अनुभवी, ज्ञानवृद्ध एवं वयोवृद्ध सज्जनों द्वारा की जाती है, उनके सान्निध्य में निरंतर रहने का प्रयास करना आयु-रक्षा के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऐसे सत्संग से मन, बुद्धि एवं आचार में सात्त्विक गुणों की वृद्धि होती है, जिससे व्यक्ति दीर्घायु एवं निरोग जीवन की ओर अग्रसर होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः चरकसंहिता के अनुसार देश, आचार, ब्रह्मचर्य, सत्संग एवं धर्मशास्त्रीय चिंतन - ये सभी आयु के परिपालन हेतु सर्वोत्तम भेषज हैं। इस दृष्टि से आयुर्वेद न केवल चिकित्सा-विज्ञान है, अपितु धर्म एवं सदाचार पर आधारित एक समग्र जीवन-दर्शन भी है, जो मानव को दीर्घायु, स्वास्थ्य एवं आत्मिक कल्याण की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद और धर्मशास्त्र को अलग-अलग शास्त्र मानना उनके वास्तविक स्वरूप को सीमित करना होगा। दोनों मिलकर भारतीय जीवन-दृष्टि का निर्माण करते हैं, जहाँ स्वास्थ्य केवल रोग-रहित अवस्था नहीं, बल्कि धर्म, आचार और मानसिक संतुलन से युक्त जीवन है। आधुनिक समय में जब मानसिक तनाव और जीवनशैली जनित रोग बढ़ रहे हैं, तब आयुर्वेद-धर्मशास्त्र का यह समन्वय मानवता के लिए अत्यन्त प्रासंगिक सिद्ध होता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;यत्र हिंसास्तेयान्यथाकामं पैशुन्यं परुषानृते। सम्भिन्नालापं व्यापादमभिध्यां दृग्विपर्ययम्। पापं कर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैस्त्यजेत्॥ (चरक संहिता)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;हिंसा, चोरी, अन्यथाकाम, चुगुलखोरी, कठोर एवं अप्रियवचन, झूठी बात, दोगलापन, द्रोहचिन्तन, दूसरों की सम्पत्ति का अपहरण, शास्त्रविरुद्ध आचरण - इन दस प्रकार के दोषों को मन, वचन तथा कर्म से त्याग करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
[[Category:Ayurveda]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
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		<title>Dharmashastra and Ayurveda (धर्मशास्त्र एवं आयुर्वेद)</title>
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		<updated>2026-01-13T11:57:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञानपरम्परा में आयुर्वेद और धर्मशास्त्र को पृथक-पृथक शास्त्र मानते हुए भी उनका अन्तःसंबंध अत्यन्त गहन है। आयुर्वेद जहाँ शरीर, मन और आत्मा के स्वास्थ्य की वैज्ञानिक विवेचना करता है, वहीं धर्मशास्त्र मनुष्य के आचार, व्यवहार और सामाजिक कर्तव्यों का नियमन करता है। दोनों का लक्ष्य एक ही है मानव जीवन को सुखी, संतुलित और आरोग्यपूर्ण बनाना। इस दृष्टि से धर्मशास्त्र और आयुर्वेद को जीवन-विज्ञान के पूरक के रूप में देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में वर्णित आचार-विधान, यम-नियम, शौच, संयम, सदाचार आदि केवल नैतिक अनुशासन नहीं हैं, बल्कि वे स्वास्थ्य-संरक्षण के उपाय भी हैं। धर्मशास्त्र यह मानता है कि अधर्म, असंयम और आचारहीनता से मन विकृत होता है और विकृत मन शरीर में रोग उत्पन्न करता है। इस प्रकार धर्मशास्त्र अप्रत्यक्ष रूप से आयुर्वेदिक स्वास्थ्य-सिद्धान्तों का समर्थन करता है। आयुर्वेद शरीर, मन और जीवात्मा- इन तीनों के संयोगको जीवन मानता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत्। लोकस्तिष्ठति संयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ (चरकसंहिता १/१८)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आयुर्वेद के अनुसार जीवन (आयुः) का तात्पर्य केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं, अपितु शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा के समन्वित अस्तित्व से है। सुश्रुत और चरक जैसे आचार्यों ने स्पष्ट किया है कि जब तक इन चारों का संतुलन बना रहता है, तभी व्यक्ति को वास्तविक आरोग्य की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार नहीं माना गया, बल्कि उसे मानसिक और आचारगत असंतुलन से भी जोड़ा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;कल्याण-धर्मशास्त्रांक, [https://archive.org/details/kalyan-dharma-shastra-anka/page/n158/mode/1up आयुर्वेद और धर्मशास्त्र], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १६०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सुख-दुःख और मन की भूमिका ==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद तथा धर्मशास्त्र - दोनों में सुख-दुःख का मूल कारण मन को माना गया है। मन यदि शुद्ध, संयमित और सात्त्विक है, तो व्यक्ति सुख और आरोग्य का अनुभव करता है; जबकि रजस और तमस से युक्त मन दुःख और रोग का कारण बनता है। धर्मशास्त्र मन की शुद्धि के लिए सदाचार, सत्य, अहिंसा और संयम पर बल देता है, वहीं आयुर्वेद मानसिक दोषों को रोग-उत्पत्ति का प्रमुख कारण मानता है। सुख-दुःख, रोग एवं आरोग्यका आधार शरीर और मन ही है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;शरीरं सत्त्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः। तथा सुखानां योगस्तु सुखानां कारणं समः॥ (चरक संहिता १/२७)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;शरीर और मन- ये दोनों ही व्याधियों के आश्रय माने गये हैं तथा सुख (आरोग्य) के आश्रय भी ये ही हैं। आहार, आचार-विचार, व्यवहारका सम, उचित प्रयोग ही सुखोंका कारण हैं, आरोग्य सच्चा सुख एवं रोग ही दुःख है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च॥ (चरक संहिता)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;रोगको हटाने या उत्पन्न न होने देनेकी विधि बतलाना आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनोंका समान उद्देश्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== त्रिदोष सिद्धान्त और नैतिक जीवन ==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद का वात-पित्त-कफ सिद्धान्त केवल शारीरिक तत्त्वों तक सीमित नहीं है। इनके असंतुलन का सम्बन्ध व्यक्ति के आहार-विहार और मानसिक प्रवृत्तियों से भी है। धर्मशास्त्रों में वर्णित अति-भोग, क्रोध, लोभ और असंयम त्रिदोषों के विकार को बढ़ाते हैं। इस प्रकार नैतिक और अनुशासित जीवनशैली को दोनों शास्त्र समान रूप से आवश्यक मानते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निष्कर्ष ==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद और धर्मशास्त्र को अलग-अलग शास्त्र मानना उनके वास्तविक स्वरूप को सीमित करना होगा। दोनों मिलकर भारतीय जीवन-दृष्टि का निर्माण करते हैं, जहाँ स्वास्थ्य केवल रोग-रहित अवस्था नहीं, बल्कि धर्म, आचार और मानसिक संतुलन से युक्त जीवन है। आधुनिक समय में जब मानसिक तनाव और जीवनशैली जनित रोग बढ़ रहे हैं, तब आयुर्वेद-धर्मशास्त्र का यह समन्वय मानवता के लिए अत्यन्त प्रासंगिक सिद्ध होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
[[Category:Ayurveda]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Dharmashastra_and_Ayurveda_(%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%8F%E0%A4%B5%E0%A4%82_%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6)&amp;diff=137541</id>
		<title>Dharmashastra and Ayurveda (धर्मशास्त्र एवं आयुर्वेद)</title>
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		<updated>2026-01-13T11:06:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: नया लेख प्रारंभ - धर्मशास्त्र एवं आयुर्वेद&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञानपरम्परा में आयुर्वेद और धर्मशास्त्र को पृथक-पृथक शास्त्र मानते हुए भी उनका अन्तःसंबंध अत्यन्त गहन है। आयुर्वेद जहाँ शरीर, मन और आत्मा के स्वास्थ्य की वैज्ञानिक विवेचना करता है, वहीं धर्मशास्त्र मनुष्य के आचार, व्यवहार और सामाजिक कर्तव्यों का नियमन करता है। दोनों का लक्ष्य एक ही है मानव जीवन को सुखी, संतुलित और आरोग्यपूर्ण बनाना। इस दृष्टि से धर्मशास्त्र और आयुर्वेद को जीवन-विज्ञान के पूरक के रूप में देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में वर्णित आचार-विधान, यम-नियम, शौच, संयम, सदाचार आदि केवल नैतिक अनुशासन नहीं हैं, बल्कि वे स्वास्थ्य-संरक्षण के उपाय भी हैं। धर्मशास्त्र यह मानता है कि अधर्म, असंयम और आचारहीनता से मन विकृत होता है और विकृत मन शरीर में रोग उत्पन्न करता है। इस प्रकार धर्मशास्त्र अप्रत्यक्ष रूप से आयुर्वेदिक स्वास्थ्य-सिद्धान्तों का समर्थन करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आयुर्वेद के अनुसार जीवन (आयुः) का तात्पर्य केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं, अपितु शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा के समन्वित अस्तित्व से है। सुश्रुत और चरक जैसे आचार्यों ने स्पष्ट किया है कि जब तक इन चारों का संतुलन बना रहता है, तभी व्यक्ति को वास्तविक आरोग्य की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार नहीं माना गया, बल्कि उसे मानसिक और आचारगत असंतुलन से भी जोड़ा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;कल्याण-धर्मशास्त्रांक, [https://archive.org/details/kalyan-dharma-shastra-anka/page/n158/mode/1up आयुर्वेद और धर्मशास्त्र], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १६०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सुख-दुःख और मन की भूमिका ==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद तथा धर्मशास्त्र - दोनों में सुख-दुःख का मूल कारण मन को माना गया है। मन यदि शुद्ध, संयमित और सात्त्विक है, तो व्यक्ति सुख और आरोग्य का अनुभव करता है; जबकि रजस और तमस से युक्त मन दुःख और रोग का कारण बनता है। धर्मशास्त्र मन की शुद्धि के लिए सदाचार, सत्य, अहिंसा और संयम पर बल देता है, वहीं आयुर्वेद मानसिक दोषों को रोग-उत्पत्ति का प्रमुख कारण मानता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== त्रिदोष सिद्धान्त और नैतिक जीवन ==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद का वात-पित्त-कफ सिद्धान्त केवल शारीरिक तत्त्वों तक सीमित नहीं है। इनके असंतुलन का सम्बन्ध व्यक्ति के आहार-विहार और मानसिक प्रवृत्तियों से भी है। धर्मशास्त्रों में वर्णित अति-भोग, क्रोध, लोभ और असंयम त्रिदोषों के विकार को बढ़ाते हैं। इस प्रकार नैतिक और अनुशासित जीवनशैली को दोनों शास्त्र समान रूप से आवश्यक मानते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== निष्कर्ष ==&lt;br /&gt;
आयुर्वेद और धर्मशास्त्र को अलग-अलग शास्त्र मानना उनके वास्तविक स्वरूप को सीमित करना होगा। दोनों मिलकर भारतीय जीवन-दृष्टि का निर्माण करते हैं, जहाँ स्वास्थ्य केवल रोग-रहित अवस्था नहीं, बल्कि धर्म, आचार और मानसिक संतुलन से युक्त जीवन है। आधुनिक समय में जब मानसिक तनाव और जीवनशैली जनित रोग बढ़ रहे हैं, तब आयुर्वेद-धर्मशास्त्र का यह समन्वय मानवता के लिए अत्यन्त प्रासंगिक सिद्ध होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
[[Category:Ayurveda]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Shiva_Sankalpa_Sukta_(%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA_%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4)&amp;diff=137540</id>
		<title>Shiva Sankalpa Sukta (शिवसंकल्प सूक्त)</title>
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		<updated>2026-01-13T09:09:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्लयजुर्वेद के चौंतीसवें (३४) अध्याय के प्रारम्भिक छह मंत्रों को सामूहिक रूप से शिवसंकल्पसूक्त कहा जाता है। ये मंत्र अपनी संरचना, भाववस्तु तथा संदेश की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इस सूक्त में ‘शिवसंकल्प’ का तात्पर्य शुभ, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है, जिसे मानव अपने आचरण में धारण करता है। जैसा संकल्प मन में उत्पन्न होता है, वैसा ही आचरण विकसित होता है और उसी के अनुरूप कर्म का स्वरूप निर्धारित होता है। इस प्रकार समस्त कर्मों का मूलाधार मन को स्वीकार किया गया है। सूक्त के प्रत्येक मंत्र के अंत में ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ - अर्थात् मेरा मन शुभ विचारों से युक्त हो - इस भावना की पुनरावृत्ति की गई है। सूक्त में मन के स्वरूप, उसकी प्रवृत्तियों तथा उसके नियंत्रण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया है। आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह सूक्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें मानसिक शुद्धता को आचरण की शुद्धता का आधार माना गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० विजय शंकर पाण्डेय, [https://archive.org/details/vedicsuktasankalanadr.vijayshankarpandey/page/n154/mode/1up वैदिक सूक्त संकलन] (२००१), मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (पृ० १५१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
[[File:शरीर आत्मेन्द्रिय आदि - परिचायक चित्र .jpeg|thumb|348x348px|'''मन का रथक रूपक''']]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्लयजुर्वेद के चौतींसवें अध्याय के १ से ६ मन्त्र समूह को शिवसंकल्प सूक्त कहा जाता है। इसके मन देवता, त्रिष्टुप् छन्द और याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। मन के विषय में वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन किया है। शिवसंकल्पसूक्त के संदर्भ में ऋषि यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य को केवल शारीरिक एवं वाचिक पापों से ही नहीं, अपितु मानसिक दोषों से भी स्वयं को दूर रखना चाहिए। मन में उत्पन्न होने वाले संकल्प यदि शुभ और श्रेयस्कर हों, तभी जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे वश में रखना दुष्कर कार्य है। इसी कारण ऋषि बार-बार मन को शुभ एवं पवित्र संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० अनीता जैन, वैदिक वाग् ज्योतिः-शिव संकल्प से अनुप्रेरित वैदिक मनः प्रबन्धन (२०१६), गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार (पृ० ६०)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किसी भी कर्म के किये जाने के लिये पाँच आवश्यक अंग हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्॥ (भगवद्गीता 18.14)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE/%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%83 श्रीमद्भगवद्गीता], अध्याय- 18, श्लोक - 14।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (मन), करण (इन्द्रियाँ), चेष्टा (पाँच -प्राण) और दैव अथवा चेतन शक्ति। लेकिन ज्ञानी जानता है कि इन सबमें भी केवल अकर्ता आत्मा की उपस्थिति मात्र के कारण सभी कर्म सम्भव हो पाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक वाङ्मय में मन को समस्त क्रियाओं का मूल कारण माना गया है। शुक्ल यजुर्वेद में स्थित शिवसंकल्प सूक्त इसी तथ्य को उद्घाटित करता है कि, बिना शुभ संकल्प के न तो व्यक्तिगत जीवन में शान्ति संभव है और न ही सामाजिक सौहार्द की स्थापना। आधुनिक युग में व्याप्त अशान्ति, असहिष्णुता एवं वैमनस्य का मूल कारण दूषित मनोवृत्तियाँ हैं, जिनका समाधान शिवसंकल्प की वैदिक अवधारणा में निहित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शिवसंकल्प का तात्पर्य'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिव का अर्थ है - शुभ, कल्याणकारी तथा मंगलमय और संकल्प का अर्थ है - दृढ़ निश्चय। इस प्रकार शिवसंकल्प का अभिप्राय हुआ - ऐसा मन जो सदैव शुभ, सकारात्मक एवं परहितकारी निश्चयों में प्रवृत्त हो। सूक्त में बार-बार उच्चरित मंत्र “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” मन की इसी आदर्श स्थिति की कामना को अभिव्यक्त करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वैदिक साहित्य में सूक्तों का महत्व==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिवसंकल्पसूक्त : मनस्-तत्त्व का वैदिक एवं मनोवैज्ञानिक अध्ययन==&lt;br /&gt;
वैदिक साहित्य में मनस् को मानव अस्तित्व का मूलाधार स्वीकार किया गया है। ज्ञान, संकल्प, स्मृति, धारणा, चेतना तथा कर्म - इन सभी का केंद्र मन ही है। शुक्ल यजुर्वेद के चौंतीसवें अध्याय में स्थित शिवसंकल्पसूक्त मन के इसी दिव्य, व्यापक और नियामक स्वरूप का गहन प्रतिपादन करता है। यह सूक्त केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, अपितु मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक तथा व्यवहारिक स्तर पर भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘मनस्’ शब्द मन धातु से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है- मनन, चिन्तन तथा बोध। वेदों में मन के लिए चित्त, चेतस्, हृदय, संकल्प, आकूति, मेधा, धृति, मति, प्रज्ञा आदि अनेक पर्याय प्रयुक्त हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मन एक बहुआयामी सत्ता है, जो ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक - तीनों स्तरों पर सक्रिय रहती है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति का मूल कारण काम को बताया गया है, और यह काम मन से ही उद्भूत होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि सृष्टि-विस्तार के मूल में भी मनस्-तत्त्व ही कार्यरत है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्ल यजुर्वेद (अध्याय 34) के छः मंत्रों में मन को देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। प्रत्येक मंत्र के अंत में “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” की पुनरावृत्ति मन को शुभ, कल्याणकारी एवं संयमित बनाने की प्रार्थना है। यहाँ शिव का अर्थ केवल रुद्र या संहारक नहीं, अपितु कल्याण, मंगल और शुद्ध चेतना है। अतः शिवसंकल्प का तात्पर्य है - मन का ऐसा संकल्प जो लोककल्याण, आत्मोन्नति और मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मन की गति एवं अवस्थाएँ॥ States and Motions of the Mind'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूक्त में मन की दो अवस्थाओं 'जाग्रत और स्वप्न' का वर्णन है। मन क्षणमात्र में दूर-दूर तक गमन कर सकता है, देश-विदेश, भूत-भविष्य और दृश्य-अदृश्य लोकों का अनुभव करा सकता है। इस प्रकार मन की कोई भौतिक सीमा नहीं है। स्वप्नावस्था में भी मन ही सुख-दुःख, भय-आनन्द तथा स्मृति-कल्पना का अनुभव कराता है। इसी कारण मन को द्वैत का कारण भी कहा गया है। वैदिक साहित्य में मन को अन्तःकरण की प्रमुख वृत्ति माना गया है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि मन ही यज्ञ है, क्योंकि यज्ञ का संकल्प मन में ही उत्पन्न होता है। उपनिषदों में मन को -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ज्ञान का साधन&lt;br /&gt;
* इन्द्रियों का नियन्ता&lt;br /&gt;
* आत्मा का सहचर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाष्यकारों के अनुसार मन दो प्रकार का है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
# '''बहिर्मुख मन''' (इन्द्रिय-विषयों में रत)&lt;br /&gt;
# '''अन्तर्मुख मन''' (आत्मचिन्तन में प्रवृत्त)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिवसंकल्पसूक्त का उद्देश्य मन को बहिर्मुख से अन्तर्मुख बनाना है। शिवसंकल्पसूक्त मन के शोधन, संयमन और उन्नयन का वैदिक विधान प्रस्तुत करता है। यह सूक्त सिखाता है कि मन ही बन्धन का कारण है और मन ही मोक्ष का साधन। जब मन शुभ संकल्पों से युक्त होता है, तब व्यक्ति, समाज और समस्त सृष्टि का कल्याण सुनिश्चित होता है। अतः “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” यह मात्र प्रार्थना नहीं, अपितु एक सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शिवसंकल्पसूक्त का संक्षिप्त परिचय॥ Introduction of the Shivasankalpa Sukta'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* प्रथम मन्त्र में मन की तीव्र, सर्वव्यापक गति का निरूपण है, जो क्षणमात्र में देश, काल और विषयों का अतिक्रमण करता हुआ स्वप्न तथा जाग्रत - दोनों अवस्थाओं में अनुभव का आधार बनता है। इसी कारण मन को दिव्य चेतन सत्ता कहा गया है, जिसे योगदर्शन और वेदान्त में कल्पना एवं विकल्प का मूल स्रोत माना गया है।&lt;br /&gt;
* द्वितीय मंत्र में मन को कर्मों की प्रेरक शक्ति बताया गया है। यज्ञ, तप, अध्ययन और समस्त मानवीय क्रियाएँ मन के संकल्प से ही सम्पन्न होती हैं। मन ही श्रेय और प्रेय के मार्गों का निर्धारण करता है। शतपथ ब्राह्मण में मन को ‘पथ्यवर्ष’ अर्थात् सुखवर्षा करने वाला कहा गया है। मन कामनाओं का उद्गम है, पर वही विवेकयुक्त होकर मोक्षमार्ग का साधन भी बन सकता है।&lt;br /&gt;
* मन को अन्तर्ज्योति कहा गया है, क्योंकि वही इन्द्रियों को प्रकाशित करता है। मन के बिना न ज्ञान सम्भव है, न कर्म। शतपथ ब्राह्मण का कथन है - मन से ही मनुष्य देखता और सुनता है। तृतीय मंत्र में मन के तीन मुख्य गुण स्पष्ट होते हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
# '''प्रज्ञा (ज्ञानात्मक शक्ति)'''&lt;br /&gt;
# '''स्मृति (अनुभूत विषयों का संधारण)'''&lt;br /&gt;
# '''धारणा/धृति (स्थिरता एवं निर्णय-क्षमता)'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* चतुर्थ मंत्र में मन को भूत-भविष्य-वर्तमान - तीनों कालों का अधिष्ठाता कहा गया है। योगी और दार्शनिक मन के संयम से त्रिकालज्ञान प्राप्त करते हैं। मन को यज्ञस्वरूप, सृष्टिचक्र का नियामक और ब्रह्मतत्त्व का प्रतीक माना गया है।&lt;br /&gt;
* पंचम मंत्र में मन को समस्त वेदों एवं समस्त चेतनाओं का आधार बताया गया है। ऋग्, यजुः और साम - तीनों वेद मन में प्रतिष्ठित हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि समस्त ज्ञान-परम्परा का मूलाधार मन ही है। &lt;br /&gt;
* अन्तिम मंत्र में मन की तुलना योग्य सारथि से की गई है। उपनिषदों की रथकल्पना के अनुसार - आत्मा रथी है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथि है और मन लगाम के समान है। यदि मन संयमित हो, तो इन्द्रियरूपी अश्व सुचारु रूप से नियंत्रित रहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधुनिक मनोविज्ञान मन को कभी चेतना, कभी व्यवहार और कभी संज्ञान के रूप में परिभाषित करता है। परन्तु वैदिक दृष्टि मन को केवल व्यवहार तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे आत्मा और ब्रह्म से जोड़ती है। शिवसंकल्पसूक्त का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण आज के मानसिक प्रबंधन, व्यवहार-परिवर्तन और व्यक्तित्व-विकास के लिए अत्यन्त प्रासंगिक है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिवसंकल्पसूक्त के मंत्रों का भावात्मक अध्ययन==&lt;br /&gt;
शिवसंकल्प सूक्त शुक्ल यजुर्वेद का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूक्त है, जिसमें मन को शुभ संकल्प, शुभ निश्चय एवं कल्याणकारी विचारों से युक्त करने की प्रार्थना की गई है। प्रस्तुत लेख में शिवसंकल्प की अवधारणा को वैदिक मनोविज्ञान, सामाजिक समरसता तथा आध्यात्मिक उन्नयन के सन्दर्भ में विवेचित किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मन की शुद्धता ही व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के उत्थान का मूल आधार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====प्रथम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
मन्त्र संख्‍या एक में मन को दिव्य ज्योति के रूप में निरूपित किया गया है। इसमें कहा गया है कि मन की गति अत्यन्त तीव्र है तथा इसकी पहुँच अत्यधिक दूर तक है। मन केवल जाग्रत अवस्था में ही नहीं, अपितु स्वप्न अवस्था में भी समान रूप से दूर-दूर तक विचरण करता है। यह मन स्वयं ज्योतियों का भी ज्योति-स्वरूप और समस्त प्रकाशों को प्रकाशित करने वाला प्रकाश है। ज्ञान एवं विज्ञान से संबंधित सभी तत्त्वों को प्रकाशित करने की क्षमता इसी में निहित है। इस प्रकार मन एक ऐसा दिव्य प्रकाश है, जो चेतना (Consciousness) का मूल आधार बनता है और मानव बोध तथा अनुभूति का केन्द्रीय तत्त्व सिद्ध होता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;ओ3म् यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (शुक्लयजुर्वेद 34-1)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' जाग्रतः यत् दैवं (मनः) दूरम् उत् एति, सुप्तस्य तत् उ तथा एव एति। दूरङ्गमं ज्योतिषाम् एकः ज्योतिः मे तत् मनः शिवसंकल्पमस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्यम्''' - यन्मनो जाग्रतः पुरुषस्य दूरम् उदैति उद्गच्छति चक्षुः प्रभृतीन्यपेक्ष्य। यच्च दैवम्। देवो विज्ञानात्मा सोऽनेन गृह्यत इति दैवम्। उक्तञ्च- &amp;quot;मनसैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्&amp;quot; इति। तदु सुप्तस्य। तदः स्थाने यदो वृत्तिः। उकारः समुच्चयार्थीयः। यच्च मनः सुप्तस्य तथैव तेनैव प्रकारेण एति। यच्च दूरङ्गमम्। दूरं गच्छतीति दूरङ्गमम्। अतीतानागतवर्तमानव्यवहितं मे मनः शिवसङ्कल्पम्। सङ्कल्पः काममूलपदार्थस्य स्त्र्यादेः सुरूपताज्ञानवतः काम-प्रभृति। शान्तसङ्कल्पमस्तु भवतु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' ऋषि कहते हैं- वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो। शिव कल्याणकारी धर्म विषय सङ्कल्प जिस प्रकार का है उस प्रकार का वह मेरा मन हो। मेरा मन हमेशा धर्म में ही हो कभी भी पापी न बने। तो क्या बने जो मन जागे हुए पुरुष का दूर से भी दूर चला जाता है। चक्षु आदि वस्तुओं को ग्रहण कराता है। मन के द्वारा यह सभी कुछ देखा जाता है। और भी। यदः स्थान में उसका पर्यायवाची शब्द उकार है। और जो मन सुप्तावस्था में भी उसी प्रकार वापस आता है जिस प्रकार वह गया था। और जो दूर से भी दूरात् गच्छतीति दूरङ्गमं खश्प्रत्यय है। अतीत अनागत-वर्तमान में प्रयोग करने वाले पदार्थों का ग्राहक है। और जो मन ज्योतिप्रकाशको का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रकाशक प्रवर्तक है। श्रोत्र आदि इन्द्रियों को अपने विषय में लगाता है। आत्मा मन को प्रेरित करता है, मन इन्द्रिय से इन्द्रिय को, अर्थ से न्याय युक्त मन सम्बन्ध को उन दोनों को प्रवृत करता है। उस प्रकार का मेरा मन शान्तसङ्कल्प वाला हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====द्वितीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
मन्त्र संख्या दो में मन को मानव जीवन का प्रमुख प्रेरक तत्त्व (Driving Force) के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस मन्त्र के अनुसार मन वह आन्तरिक शक्ति (Inner Power) है, जो विद्वानों, मनीषियों तथा साधकों को यज्ञ, अध्ययन (Study), साधना (Spiritual Practice) एवं शास्त्रीय ज्ञान (Scriptural Knowledge) की ओर प्रवृत्त करता है। मन केवल विचारों का केन्द्र (Center of Thought) ही नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में स्थित एक पूज्य एवं आदरणीय तत्त्व (Revered Principle) के रूप में विद्यमान है। मन्त्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मन ही प्रेरणा (Motivation), संकल्प (Intention), तथा कर्म-प्रवृत्ति (Action Orientation) का मूल स्रोत है। इसी के माध्यम से चेतना (Consciousness) सक्रिय होती है और मानव अपने बौद्धिक (Cognitive), नैतिक (Ethical) तथा आध्यात्मिक (Spiritual) लक्ष्यों की ओर अग्रसर होता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (शुक्लयजुर्वेद 34-2)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' येन अपसः मनीषिणः धीराः यज्ञे विदथेषु कर्माणि कृण्वन्ति यत् प्रजानाम् अन्तः अपूर्व यक्षं, तत् मे मनः शिवस‌ङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' येन कर्माणि। येन मनसा सत्ता कमार्णि। अपसः। अप इति कर्म नाम। तद्धितलोपः। अपस्विनः कर्मवन्तः मनीषिणो मेधाविनः। यज्ञे कृन्ति कुर्वन्ति। विदथेषु वेदेषु यज्ञविधिविधानेषु धीरा धीमन्तः। यच्चापूर्वम्। न विद्यते पूर्वमिन्द्रियं यस्मात् तद्पूर्वम्। यद्वा-अपूर्वमनपरम्। यच्च यक्षं पूज्यम्। यच्चान्तर्मध्ये प्रजानामास्ते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या-''' मनीषियों मेधावियों को यज्ञ में जिस मन के द्वारा सत कर्म करते है, 'कृ करणे' स्वादि है। मन स्वास्थ्य के विना कार्य में प्रवृत्त करता है। तेषु सत्सु । विदथेषु सत्सु विद्यन्ते ज्ञायन्ते तानि विदधानि तेषु। विदधातु से औणादिक थप्रत्यय। यज्ञसम्बन्धिहवि आदि पदार्थों के ज्ञान में उसका यह अर्थ है। किस प्रकार के मनीषियों को। अपसः अप इति कर्मनाम (निघ० २.१.१)। कार्यों को करने की प्रवृति है जिसमे वे अपस्वन कर्मवन्तश्अस्मायामेधास्रजो विनिः ' (पा०सू० ५.२.१२१) इससे विन्प्रत्यय विन्मतोलुक्' (पा०सू० ५.३.६५) इससे इष्ठ अभाव में भी छन्द में विनो लुक्। हमेशा कर्मनिष्ठ यह अर्थ है। वैसे धीरा धीमन्तमेधा विद्यमान है जिसमे कर्मण्यण् (पा०सू० ३.२.१)। और हमारा मन सर्वोत्तम गुण कर्म स्वभाव वाला और जो मन इन्द्रिय से पूर्व उसकी रचना हुई। अथवा अपूर्व अनपर अबाह्य ऐसा कहने पर अपूर्व आत्मरूप यह अर्थ है। और जो योग यज्ञ में पूजनीय होकर के एकीभूत हो रहा हो। यजते औणादिक सन्प्रत्यय है। और जो प्राणिमात्र के हृदय में रहता है, अन्य इन्द्रिया तो बाहरी है, मनतो आन्तरिक इन्द्रिय है यह अर्थ है। वह उस स्वरूप वाला मेरा मन धर्मेष्ट होवे। तृतीय मन्त्र इस प्रकार है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तृतीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
मन्त्र संख्या तीन में मन के तीन विशिष्ट एवं आधारभूत गुणों (Fundamental Attributes of Mind) का निरूपण किया गया है। इनमें प्रथम प्रज्ञान है, जिसे जानने और समझने की क्षमता (Cognition / Knowing Faculty) के रूप में वर्णित किया गया है। द्वितीय गुण चेतस् है, जो अनुभवों और ज्ञान के स्मरण की शक्ति (Recollection / Memory Function) को अभिव्यक्त करता है। तृतीय गुण धृति है, जिसे धारणा और स्थायित्व की शक्ति (Power of Retention / Sustaining Capacity) के रूप में स्वीकार किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्र में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि मन समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में विद्यमान एक अमर ज्योति (Immortal Inner Light) है। यह चेतना (Consciousness) का सक्रिय केन्द्र (Active Core) बनकर समस्त मानसिक और शारीरिक क्रियाओं (Mental and Physical Functions) को संचालित करता है। मन के अभाव में जीव न तो विचार (Thinking) कर सकता है और न ही किसी कर्म (Action) का सम्पादन कर पाता है। इस प्रकार मन जीवन-व्यवस्था का अनिवार्य एवं केन्द्रीय तत्त्व सिद्ध होता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्जोतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्नऽऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (शुक्लयजुर्वेद 34-3)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय''' - यत् प्रज्ञानम् उत चेतः धृतिः च यत् प्रजासु अन्तः अमृतं ज्योतिः। यस्मात् ऋते किञ्चन कर्म न क्रियते, तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' यत्प्रज्ञानम्। यन्मनः प्रज्ञानम्। विशेषप्रतिपत्तिः प्रज्ञानम्। उतापि च। चेतः। सामान्यप्रतिपत्तिः चेतः। धृतिश्च। प्रसिद्धा। यन्मनोऽन्तज्योतिरमृतं च प्रजासु। यस्मान्न ऋते येन च बिना न किञ्चन कर्म क्रियते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जो मन प्रज्ञा को विशेष करके ज्ञान का अच्छी प्रकार से बोध कराता है वह प्रज्ञानम् है। 'करणाधिकरणयोश्च' (पा०सू० ३.३.११७) इससे करण में ल्युट् प्रत्यय किया। और भी जो मनस्मृति का साधक है। 'चिती संज्ञाने' इस ण्यन्तहोने से असुन्प्रत्यय हुआ। सामान्य विशेष ज्ञान का बोध कराने वाला यह अर्थ है। और जो मन धैर्य स्वरूप है। मन में ही धैर्य की उत्पति होने से मन में कार्य कारण के अभेद होने से धैर्य को धारण करता है। और जो मन प्रजाओं में, मनुष्यों में अन्तरवर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का ज्योति प्रकाशक है। कहाँ होने पर आदर के लिए पुनः कहते है। 'अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते' (निरु० १.४२) ऐसा यास्क ने कहा। और आत्मरूप होने से आमरण दरमि होने से विनाश रहित है। जिस मन के बिना मनुष्य कोई भी कार्य नहीं कर सकते है। सभी कार्यों को करने से पहले प्राणियों का मन पूर्वप्रवृत्त होता है, मन के स्वास्थ्य के विना कार्यों में प्रवृत नही होता है यह अर्थ है। अन्यारादितरर्ते (पा०सू० २.३.२९) इत्यादि से यस्माद इसका ऋत के योग में पञ्चमी। वह मेरा मन कल्याणकारी हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जो मन सामान्य और विशेषज्ञान का बोध कराता है। जो धैर्यस्वरूप विद्यमान है और जो प्राणियों के अन्तर्भाग में विद्यमान सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है। जो विनाश रहित है। जिसके बिना कोई भी कार्य नही किया जा सकता है। इस प्रकार का जो मेरा मन है वह शुभसङ्कल्प वाला हो। चतुर्थ मन्त्र इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====चतुर्थ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
मन्त्र संख्या चार में मन को त्रिकालदर्शी (Tri-temporal-perceiving Mind) के रूप में निरूपित किया गया है। इस मन्त्र के अनुसार मन की सीमा केवल वर्तमान क्षण (Present) तक ही सीमित नहीं है, अपितु भूत (Past) और भविष्य (Future) भी इसके चिंतन-क्षेत्र (Domain of Thought) में समाहित हैं। मन के माध्यम से व्यक्ति तीनों कालों का साक्षात्कार (Perception of Time) कर सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्र में यह स्पष्ट किया गया है कि मन में भूतकाल की स्मृतियों का पुनर्स्मरण (Recollection), वर्तमान की अनुभूति (Awareness of the Present) तथा भविष्य की कल्पना और योजना (Imagination and Planning) करने की क्षमता विद्यमान है। इस प्रकार मन एक ऐसा बौद्धिक एवं चेतन तत्त्व (Cognitive and Conscious Principle) है, जो त्रिकाल से सम्बन्धित विषयों पर चिन्तन (Reflection) और मनन (Contemplation) करने में सक्षम है, तथा मानव की कालबोधक चेतना (Temporal Consciousness) का आधार बनता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (शुक्लयजुर्वेद 34-4)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय-''' येन अमृतेन (मनसा) इदं भूतं भूवनं भविष्यत् सर्व परिगृहीतम्। येन सप्तहोता यज्ञः तायते तत् मे मनः शिवस‌ङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' येनेदं। येन मनसा। इदं भूतकालं भुवनं वर्तमानकालं भविष्यद् भविष्यत्कालं च। परिगृहीतम् अमृतेन सर्वम्। येन च मनसा यज्ञस्तायते तन्यते। सप्तहोता। सप्तहोतारो हि अग्निष्टोमे भवन्ति। तन्में मन इति व्याख्यातम् ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या-''' जिस मन से इसके चारो और विद्यमान वस्तुओं का ज्ञान है। यहाँ क्या हुआ। भूतकालसम्बन्धि वस्तुओं का। भुवन वर्तमान काल को कहते है। भू से क्युप्रत्यय करने पर वर्तमानकालसंबन्धि है। भविष्यत् 'लुटः सद्वा' (पा०सू० ३.३.१४) इससे शतृप्रत्यय करने पर 'तौ सत्' (पा०सू० ३.२.१२७) इसके कहने पर त्रिकालसंबद्ध वस्तुओं में मन प्रवृत होता है यह अर्थ है। श्रोत्र आदि के द्वारा तो प्रत्यक्ष ही ग्रहण करता है। यह किस प्रकार के ज्ञान को ग्रहण करता है। अमृत शाश्वत होने से। मुक्तिपर्यन्त श्रोत्र आदि का तो नाश होता है परन्तु मन तो अमर है। और जिस मन के द्वारा यज्ञ अग्निष्टोम आदि को आगे विस्तृत करते है। 'तनोतेर्यकि' (पा०सू० ६.४.४४) इससे आकार। किस प्रकार का यज्ञ। सप्तहोता सात होता के द्वारा देवो का आह्वान करते है, अर्थात होतृमैत्रवरुण आदि सात होता है। अग्निष्टोम में सात होता है। वह मेरा मन शुभसकल्प वाला हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जिससे विनाश रहित धर्म वाले संसार का भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यत्काल के सभी पदार्थ जाने जाते है। जिसके द्वारा सात होता विशिष्ट अग्निष्टोम आदि यज्ञ का सम्पादन किया जाता है। वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प वाला हो। पंचम मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पंचम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
मन्त्र संख्या पाँच में मन को समस्त ज्ञान का मूलाधार (Foundation of Knowledge) माना गया है। इस मन्त्र के अनुसार समस्त वेद, अर्थात् ज्ञान-विज्ञान की सम्पूर्ण परम्परा (Complete Spectrum of Knowledge and Science) तथा बुद्धि का समावेश मन के भीतर ही माना गया है। मन ही वह केन्द्रीय तत्त्व (Central Faculty) है, जिसके माध्यम से वैदिक ज्ञान, तर्क (Reasoning) और विवेक (Discrimination) का उद्भव होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्र में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि मन में ही चित्त-शक्ति अथवा प्रज्ञा-शक्ति (Cognitive Faculty / Power of Cognition) निहित रहती है। यही शक्ति ज्ञान के ग्रहण (Perception), विश्लेषण (Analysis) तथा आत्मसात् करने (Internalization) की प्रक्रिया को सम्भव बनाती है। इस प्रकार मन न केवल ज्ञान का आधार है, अपितु सम्पूर्ण बौद्धिक चेतना (Intellectual Consciousness) और बोध-प्रक्रिया (Process of Understanding) का मूल स्रोत सिद्ध होता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;यस्मिन्नृचः साम यजूँषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिँश्चित्तँ सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (शुक्लयजुर्वेद 34/5)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' यस्मिन् ऋचः यस्मिन् साम यजूंषि रथनाभौ अराः इव प्रतिष्ठिताः यस्मिन् प्रजानां सर्व चित्तम् ओतं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' यस्मिन् ऋचः। यस्मिन् ऋचः प्रतिष्ठिताः। यस्मिन् सामानि प्रतिष्ठितानि । यस्मिन् यंजूषि प्रतिष्ठितानि। कर्थामव ? रथनाभौ इव अराः। यस्मिन् चित्तं सञ्ज्ञानं सर्वे तस्य तस्यार्थस्य। ओतं निक्षिप्तम्। तदुसन्ततिमिव कृतम्। प्रजानाम्। तत् मे मन इति व्याख्यातम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जिस मन में ऋग्वेद प्रतिष्ठित है। जिसमे सामवेद प्रतिष्ठित है। जिसमे यजुर्वेद प्रतिष्ठित है। स्वस्थ मन में ही वेदत्रयी प्रकट होते है, इस मन में शब्द मात्र स्थिर होते है 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इति छान्दोग्य में स्वस्थ मन से ही वेदो का उच्चारण प्रतिपादित किया गया है। वहाँ दृष्टान्त है। जैसे रथ के पहियों में लकड़ी के अरा लगे होते है। जैसे अरा रथचक्र के मध्य में प्रतिष्ठत होते है, उसी प्रकार शब्दजाल मन में स्थिर रहता है। और जिसमे प्राणियों के सम्पूर्ण सभी पदार्थविषयज्ञान धागे में मणियों के समान युक्त रहता है। स्वस्थ मन में ही ज्ञान की उत्पत्ति और मन के प्रतिकूल आचरण से ही ज्ञान का अभाव होता है। वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जिसमे ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद चक्रनाभि में विद्यमान अरा के समान विद्यमान है और भी जिसमे प्राणियों के सभी पदार्थ विषयक ज्ञान है। वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प वाला हो। षष्ठम मन्त्र का भाषार्थ इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====षष्ठ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
मन्त्र संख्या छह में मन के अधिष्ठान और उसकी कार्य-क्षमता का विवेचन किया गया है। इस मन्त्र के अनुसार मन का निवास हृदय (Heart) में माना गया है, जहाँ से वह समस्त अनुभूतियों और क्रियाओं का संचालन करता है। मन की गति अत्यन्त तीव्र (Extremely Swift) बताई गई है तथा इसमें असाधारण कार्य-क्षमता (Extraordinary Functional Efficiency) निहित है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;शिखा शर्मा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/662185 यजुर्वेदे वर्णितमनोवैज्ञानिक-सिद्धान्तानामनुशीलनम्]  (2024), पी.एच.डी.शोध-प्रबंध, श्रीलालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीयसंस्कृतविश्वविद्यालय, (पृ० ३७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्र में मन की उपमा एक सुयोग्य सारथि (Skilled Charioteer) के रूप में दी गई है, जो इन्द्रियों रूपी घोड़ों (Sense Organs as Horses) को सम्यक् रूप से नियंत्रित करता है। जब मन संयमित और जागरूक (Disciplined and Conscious) होता है, तब इन्द्रियाँ भी मर्यादा में रहती हैं और कर्म (Action) सही दिशा में प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार मन नियन्त्रक तत्त्व (Regulatory Principle) बनकर मानव के मानसिक, बौद्धिक एवं नैतिक आचरण (Mental, Intellectual and Ethical Conduct) का मार्गदर्शन करता है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिनऽ इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (यजुर्वेद 34/6)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%83/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9%E0%A5%AA शुक्लयजुर्वेद], अध्याय- ३४, मन्त्र १-६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' यत् (मनः) मनुष्यान् सुषारथिः अश्वान् इव नेनीयते अभीषुभिः वाजिन इव (मनुष्यान् कर्मषु प्रेरयति) यत् हृत्प्रतिष्ठम् अजिरं जविष्ठं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वट भाष्य -''' सुषारथिः। यन्मनो मनुष्यान् नेनीयतेऽत्यर्थं नीयते। कर्थामव। सुषारथिः कल्याणसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्। यच्च मनः सुषारथिरिव। अभीषुभिः प्रग्रहैर्वाजिन इव वेजनवतोऽश्वानिव। यमयतीति शेषः। द्वे उपमे। एकत्र नयनमन्यत्र नियममित्यर्थः यच्च हत्प्रतिष्ठम्। तत्रोपलब्धेः। यच्च अजिरं जरारहितम्। यच्च जविष्ठमतिशयेन गन्तुं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जो मन जैसे सुंदर घोड़े के समान, लगाम से घोड़ो को सब और चलाता है, वैसे ही मनुष्य आदि प्राणियों को शीघ्र ही इधर उधर भ्रमण कराता है। नयतेः क्रियासमभिहारे यङ् हुआ। मन के प्रेरित करने पर ही प्राणि कार्य में प्रवृत होते है। मनुष्य ग्रहण प्राणिमात्र का उपलक्षक है। वहाँ उदाहरण है। जैसे चतुर सारथि लगाम से घोड़ो को इधर उधर अपने वश में चलाता है। रस्सियों से जैसे ले जाता है। दो उपमा है। प्रथम ले जाना और दूसरी नियमन। वैसे ही मन मनुष्यों को कार्य में प्रवृत करता है और लेकर जाता है। और जो मन हृदय में प्रतिष्ठित है। और जो मन विषय आदि में प्रेरक वा वृद्धादी अवस्था से रहित है। और जो अत्यन्त वेगवान है 'न वै वातात् किञ्चनाशीयोस्ति न मनसः किञ्चनाशीयोस्ति' इति श्रुति। वह मेरा मन मंगलमय हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जैसे कोई चतुर सारथि घोड़ो को सही चलाता है। वह जैसे चाहता है वैसे ही उनको लेकर के जाता है। इसी प्रकार मन भी प्राणियों के शरीर को चलाता है। और जो हृदय में स्थित वृद्धावस्था से रहित अत्यन्त ही वेगवान वह मेरा मन मंगलमय हो।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री राधेश्याम खेमका, [https://dn720002.ca.archive.org/0/items/vaidik-sukta-sangrah-with-translation-by-gita-press/Vaidik%20Sukta%20Sangrah%20with%20Translation%20by%20Gita%20Press_text.pdf वैदिक सूक्त-संग्रह] (२०१२), गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० २१२)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ऋग्वेद में शिवसंकल्प खिलसूक्त==&lt;br /&gt;
वैदिक साहित्य में खिल सूक्त शब्द का प्रयोग उन मन्त्रों के लिए किया जाता है, जिन्हें परिशिष्ट अथवा प्रक्षिप्त के रूप में स्वीकार किया गया है। सामान्यतः वे मन्त्र, जो मूल वेद-संहिता में सम्मिलित नहीं हैं, किन्तु किसी विशेष प्रयोजन अथवा आवश्यकता की दृष्टि से बाद में संगृहीत कर लिये गये हों, खिल कहलाते हैं। इस प्रकार खिल सूक्तों का स्वरूप मुख्य संहिता से पृथक होते हुए भी वैदिक परम्परा से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है। ऋग्वेद की शाकल शाखा से सम्बद्ध खिल सूक्तों का वैदिक साहित्य में विशिष्ट महत्व है, जो मुख्य संहिता के अतिरिक्त 'परिशिष्ट भाग' होते हुए भी अपनी प्राचीनता और विषय-वस्तु के कारण अत्यन्त मूल्यवान माने जाते हैं। प्रसिद्ध भाष्यकार नीलकण्ठ के अनुसार - &amp;lt;blockquote&amp;gt;परशाखीयं स्वशाखायामपेक्षावशात्पठ्यते तत्खिलमुच्यते। (नीलकंठ टीका)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;वेद की परशाखा से किसी विशेष अपेक्षा के कारण जो अंश ग्रहण किया जाता है, वही खिल कहलाता है। इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि खिल सूक्त किसी नवीन रचना के रूप में नहीं, अपितु वेद की ही किसी अन्य शाखा से चयनित अंश के रूप में स्वीकार किये गये हैं। ऋग्वेद की शाकल शाखा में बाष्कल शाखा से प्राप्त कुछ अतिरिक्त मन्त्र संकलित मिलते हैं। इन मन्त्रों का अधिकांश भाग ही खिल सूक्तों के अन्तर्गत आता है। इससे यह संकेत मिलता है कि खिल सूक्त ऋग्वैदिक परम्परा की आन्तरिक शाखागत विन्यास प्रक्रिया का परिणाम हैं। ऋग्वेद की शाकल शाखा से सम्बद्ध कुछ प्रमुख खिलसूक्त इस प्रकार हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*श्रीसूक्त&lt;br /&gt;
*रात्रिसूक्त&lt;br /&gt;
*मेधा सूक्त&lt;br /&gt;
*शिवसंकल्पसूक्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार खिल सूक्त न केवल ऋग्वेद की शाखागत परम्परा को समझने में सहायक हैं, अपितु वैदिक मन्त्रपरम्परा के विकास, संरक्षण और संप्रेषण की प्रक्रिया पर भी महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। इन्हीं खिलसूक्तों में शिवसंकल्पसूक्त का स्थान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह सूक्त न केवल वैदिक मनोविज्ञान का सूक्ष्म निरूपण करता है, अपितु शिव-तत्त्व की सर्वोच्चता को भी उद्घाटित करता है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहिततममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदत्र षष्ठं त्रिशतं शरीरं यज्ञस्य गुह्यं नवनाभमाद्यम्। दश पञ्च त्रिशतं यत्परं च तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये पञ्चपञ्चा दशतं शतं च सहस्रं च नियुतं न्यर्बुदं च। ते यज्ञचित्तेष्टकात्तं शरीरं तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमस परस्तात्। तस्ये योनि परिपश्यन्ति धीरास्तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येन कर्माणि प्रचरन्ति धीरा विप्रा वाचा मनसा कर्मणा च। यस्यान्वितमनु सं यन्ति प्राणिनस्तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये मनो हृदयं ये च देवा ये अन्तरीक्षे बहुदा चरन्ति। ये श्रोत्रं चक्षुषी संचरन्ति तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येन द्यौरुग्रा पृथिवी चान्तरिक्षं ये पर्वताः प्रदिशो दिशश्च। येनेदं जगद्व्याप्तं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
येनेदं सर्वं जगतो बभूवुर्ये देवा अपि महतो जातवेदाः। तदिवाग्निस्तपसो ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अचिन्तयं चाप्रमेयं च व्यक्ताव्यक्तपरः च यत्। सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं ज्ञानं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्ति विनाशथित्वा सर्वमिदं नास्ति पुनस्तथैव द्दृष्टं ध्रुवम्। अस्ति नास्ति हितं मध्यमं पदं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्ति नास्ति विपरीतो प्रवादोऽस्ति नास्ति सर्वं वा इदं गुह्यम्। अस्ति नास्ति परात्परो यत्परं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परात्परतरं यश्च तत्पराश्चैव यत्परम्। तत्परात्परतोऽज्ञेयं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१७॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परात्परतरो ब्रह्मा तत्परात्परतो हरिः। तत्परात्परतो ईश तन्मे मन शिवसंकल्पमस्तु॥१८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोभिर्जुष्टो धनेन ह्यायुषा च बलेन च। प्रजया पशुभिः पुष्कलाद्यं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥१९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रयतः प्रणवो नित्यं परमं पुरुषोत्तमम्। ओंकारं परमात्मानं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो वै वेदादिषु गायत्री सर्वव्यापिमहेश्वरात्। तद्विरुक्तं यथाद्वैश्यं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो वै वेद महादेवं परमं पुरुषोत्तमम्। यः सर्व यस्य चित्सर्व तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योऽसौ सर्वेषु वेदेषु पठते ह्यज ईश्वरः। अकायो निर्गुणोऽध्यात्मा तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैलासशिखरे रम्ये शंकरस्य शुभे गृहे। देवतास्तत्र मोदन्ति तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैलासशिखराभासा हिमवद्गिरिसंस्थिताः। नीलकण्ठं त्रिनेत्रं च तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं त्रैलोक्य स चराचरम्। उत्पातितं जगद्व्याप्तं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
य इमं शिवसंकल्पं सदा ध्यायन्ति ब्राह्मणाः। ते परं मोक्षं गमिष्यन्ति तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥२७॥ (ऋग्वेद खिलसूक्त)&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० अमलधारी सिंह, [https://www.slbsrsv.ac.in/sites/default/files/Rigvediya%20Shakha%20Samhita..._0.pdf ऋग्वेदीय शाखा-संहिताओं का समीक्षात्मक अध्ययन] (२०२३), श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली (पृ० २१९-२२१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मन का दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्त्व==&lt;br /&gt;
शिवसंकल्प सूक्त के अनुसार मन इन्द्रियों का प्रवर्तक, ज्ञान का आधार तथा समस्त क्रियाओं का प्रेरक तत्त्व है। इन्द्रियाँ तभी अपने विषयों का सम्यक् ग्रहण कर सकती हैं, जब मन संतुलित एवं नियंत्रित हो। कठोपनिषद् के रथ-दृष्टान्त द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि विवेकयुक्त बुद्धि, संयमित मन और नियंत्रित इन्द्रियाँ ही जीवन को परम लक्ष्य की ओर ले जाती हैं। इस प्रकार शिवसंकल्प, मन-नियंत्रण का वैदिक सूत्र प्रदान करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;स्वामी श्री अखंडानन्द सरस्वती - [https://ia800507.us.archive.org/29/items/shivsankalp_sukta/shivsankalp_sukta_text.pdf शिवसंकल्प-सूक्त]&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
छः मन्त्र वाले इस सूक्त के ऋषि याज्ञवल्क्य, मनो देवता, त्रिष्टुप् छन्द है। इस सूक्त में ऋषि कहते हैं की जो मन जागने वाले पुरुष का दूर जाता है, और सोने वाले मनुष्य का वही मन वैसे ही समीप आता है अर्थात् जैसा गया है वैसे ही वापस आता है। और जो दूर से जाता है, जो मन आत्म साक्षात्कार में साधन है, और जो मन प्रकाशकों का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रवर्तक है, सभी शरीर का चालक वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्पों से युक्त हो। अर्थात् मेरे मन में हमेशा धर्म ही हो कभी भी पाप नही हो। कर्मवान, बुद्धिमान, मेधावी जिस मन से कार्य करते हैं, जिससे बुद्धिमान यथाविधि यज्ञ का सम्पादन करते हैं, और जो अपूर्व, सभी इन्द्रियों से पूर्व जिसकी रचना हुई, सभी प्राणियों में विद्यमान और पूज्य वह मेरा मन शुभ सङ्कल्प से युक्त हो। जो मन प्रज्ञा को विशेष रूप से ज्ञान कराता है, और भी जो मन सामान्य ज्ञान को उत्पन्न करने वाला है, जो मन धृति धैर्य स्वरूप, जो मन अमरण धर्मी, जो मन प्रजाओं में अन्तर वर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है, जिसके बिना कोई भी कार्य पूर्ण नही किया जा सकता है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जिस मन के द्वारा यह सभी सब कुछ जाना गया है, और जिस मन से भूतकाल सम्बन्धी वस्तु, वर्तमानकाल सम्बन्धी वस्तु, और भविष्यत्काल सम्बन्धी वस्तु का ज्ञान होता है, जिस मन के द्वारा होतृमैत्रावरुण आदि सात होता युक्त अग्निष्टोमयज्ञ को विस्तृत करते है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जैसे रथ के दोनों और आरे होते है ठीक वैसे ही मन ही सभी ऋचाओं में प्रतिष्ठित होते है। साम में प्रतिष्ठित है। और यजुर्वेद में प्रतिष्ठित है। पट में जैसे ओत-प्रोतरूप से धागे विद्यमान रहते है वैसे ही जिस मन में सभी पदार्थ विषयक ज्ञान निहित है उस प्रकार का मेरा मन शुभस‌ङ्कल्पयुक्त हो। जैसे अच्छा सारथि अपने रथ के वेगयुक्त घोड़ो को इधर-उधर लेकर जाता है और जैसे उनको नियन्त्रित करता है, वैसे ही जो मन मनुष्यों को सभी कार्यों में प्रवृत्त करता है उन्हें उस कार्य में लगाता है, और जो मन हृद् देशवाशी है, और जो जरारहित, और जो उत्पन्न हुए बालकों में, युवकों में और वृद्धों में एक समान है, वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प से युक्त हो।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, शिव संकल्प का विजय (१९२२), स्वाध्याय-मंडल, औंध (पृ० ७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Yoga]]&lt;br /&gt;
[[Category:Psychology]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Shiva_Sankalpa_Sukta_(%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA_%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4)&amp;diff=137539</id>
		<title>Shiva Sankalpa Sukta (शिवसंकल्प सूक्त)</title>
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		<updated>2026-01-09T06:52:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्लयजुर्वेद के चतुस्त्रिंशत् (३४) अध्याय के प्रारम्भिक छह मंत्रों को सामूहिक रूप से शिवसंकल्पसूक्त कहा जाता है। ये मंत्र अपनी संरचना, भाववस्तु तथा संदेश की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इस सूक्त में ‘शिवसंकल्प’ का तात्पर्य शुभ, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है, जिसे मानव अपने आचरण में धारण करता है। जैसा संकल्प मन में उत्पन्न होता है, वैसा ही आचरण विकसित होता है और उसी के अनुरूप कर्म का स्वरूप निर्धारित होता है। इस प्रकार समस्त कर्मों का मूलाधार मन को स्वीकार किया गया है। सूक्त के प्रत्येक मंत्र के अंत में ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ - अर्थात् मेरा मन शुभ विचारों से युक्त हो - इस भावना की पुनरावृत्ति की गई है। सूक्त में मन के स्वरूप, उसकी प्रवृत्तियों तथा उसके नियंत्रण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया है। आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह सूक्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें मानसिक शुद्धता को आचरण की शुद्धता का आधार माना गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० विजय शंकर पाण्डेय, [https://archive.org/details/vedicsuktasankalanadr.vijayshankarpandey/page/n154/mode/1up वैदिक सूक्त संकलन] (२००१), मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (पृ० १५१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
[[File:शरीर आत्मेन्द्रिय आदि - परिचायक चित्र .jpeg|thumb|348x348px]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्लयजुर्वेद के चौतींसवें अध्याय के १ से ६ मन्त्र समूह को शिवसंकल्प सूक्त कहा जाता है। इसके मन देवता, त्रिष्टुप् छन्द और याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। मन के विषय में वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन किया है। शिवसंकल्पसूक्त के संदर्भ में ऋषि यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य को केवल शारीरिक एवं वाचिक पापों से ही नहीं, अपितु मानसिक दोषों से भी स्वयं को दूर रखना चाहिए। मन में उत्पन्न होने वाले संकल्प यदि शुभ और श्रेयस्कर हों, तभी जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे वश में रखना दुष्कर कार्य है। इसी कारण ऋषि बार-बार मन को शुभ एवं पवित्र संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० अनीता जैन, वैदिक वाग् ज्योतिः-शिव संकल्प से अनुप्रेरित वैदिक मनः प्रबन्धन (२०१६), गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार (पृ० ६०)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किसी भी कर्म के किये जाने के लिये पाँच आवश्यक अंग हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्॥ (भगवद्गीता 18.14)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE/%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%83 श्रीमद्भगवद्गीता], अध्याय- 18, श्लोक - 14।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (मन), करण (इन्द्रियाँ), चेष्टा (पाँच -प्राण) और दैव अथवा चेतन शक्ति। लेकिन ज्ञानी जानता है कि इन सबमें भी केवल अकर्ता आत्मा की उपस्थिति मात्र के कारण सभी कर्म सम्भव हो पाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक वाङ्मय में मन को समस्त क्रियाओं का मूल कारण माना गया है। शुक्ल यजुर्वेद में स्थित शिवसंकल्प सूक्त इसी तथ्य को उद्घाटित करता है कि, बिना शुभ संकल्प के न तो व्यक्तिगत जीवन में शान्ति संभव है और न ही सामाजिक सौहार्द की स्थापना। आधुनिक युग में व्याप्त अशान्ति, असहिष्णुता एवं वैमनस्य का मूल कारण दूषित मनोवृत्तियाँ हैं, जिनका समाधान शिवसंकल्प की वैदिक अवधारणा में निहित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शिवसंकल्प का तात्पर्य'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिव का अर्थ है - शुभ, कल्याणकारी तथा मंगलमय और संकल्प का अर्थ है - दृढ़ निश्चय। इस प्रकार शिवसंकल्प का अभिप्राय हुआ - ऐसा मन जो सदैव शुभ, सकारात्मक एवं परहितकारी निश्चयों में प्रवृत्त हो। सूक्त में बार-बार उच्चरित मंत्र “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” मन की इसी आदर्श स्थिति की कामना को अभिव्यक्त करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वैदिक साहित्य में सूक्तों का महत्व==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिवसंकल्पसूक्त का संक्षिप्त परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिवसंकल्पसूक्त के मंत्रों का भावात्मक अध्ययन==&lt;br /&gt;
शिवसंकल्प सूक्त शुक्ल यजुर्वेद का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूक्त है, जिसमें मन को शुभ संकल्प, शुभ निश्चय एवं कल्याणकारी विचारों से युक्त करने की प्रार्थना की गई है। प्रस्तुत लेख में शिवसंकल्प की अवधारणा को वैदिक मनोविज्ञान, सामाजिक समरसता तथा आध्यात्मिक उन्नयन के सन्दर्भ में विवेचित किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मन की शुद्धता ही व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के उत्थान का मूल आधार है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====प्रथम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;ओ3म् यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' जाग्रतः यत् दैवं (मनः) दूरम् उत् एति, सुप्तस्य तत् उ तथा एव एति। दूरङ्गमं ज्योतिषाम् एकः ज्योतिः मे तत् मनः शिवसंकल्पमस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्यम्''' - यन्मनो जाग्रतः पुरुषस्य दूरम् उदैति उद्गच्छति चक्षुः प्रभृतीन्यपेक्ष्य। यच्च दैवम्। देवो विज्ञानात्मा सोऽनेन गृह्यत इति दैवम्। उक्तञ्च- &amp;quot;मनसैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्&amp;quot; इति। तदु सुप्तस्य। तदः स्थाने यदो वृत्तिः। उकारः समुच्चयार्थीयः। यच्च मनः सुप्तस्य तथैव तेनैव प्रकारेण एति। यच्च दूरङ्गमम् । दूरं गच्छतीति दूरङ्गमम् । अतीतानागतवर्तमानव्यवहितं मे मनः शिवसङ्कल्पम्। सङ्कल्पः काममूलपदार्थस्य स्त्र्यादेः सुरूपताज्ञानवतः काम-प्रभृति। शान्तसङ्कल्पमस्तु भवतु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' ऋषि कहते हैं- वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो। शिव कल्याणकारी धर्म विषय सङ्कल्प जिस प्रकार का है उस प्रकार का वह मेरा मन हो। मेरा मन हमेशा धर्म में ही हो कभी भी पापी न बने। तो क्या बने जो मन जागे हुए पुरुष का दूर से भी दूर चला जाता है। चक्षु आदि वस्तुओं को ग्रहण कराता है। मन के द्वारा यह सभी कुछ देखा जाता है। और भी। यदः स्थान में उसका पर्यायवाची शब्द उकार है। और जो मन सुप्तावस्था में भी उसी प्रकार वापस आता है जिस प्रकार वह गया था। और जो दूर से भी दूरात् गच्छतीति दूरङ्गमं खश्प्रत्यय है। अतीत अनागत-वर्तमान में प्रयोग करने वाले पदार्थों का ग्राहक है। और जो मन ज्योतिप्रकाशको का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रकाशक प्रवर्तक है। श्रोत्र आदि इन्द्रियों को अपने विषय में लगाता है। आत्मा मन को प्रेरित करता है, मन इन्द्रिय से इन्द्रिय को, अर्थ से न्याय युक्त मन सम्बन्ध को उन दोनों को प्रवृत करता है। उस प्रकार का मेरा मन शान्तसङ्कल्प वाला हो। द्वितीय मन्त्र इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====द्वितीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' येन अपसः मनीषिणः धीराः यज्ञे विदथेषु कर्माणि कृण्वन्ति यत् प्रजानाम् अन्तः अपूर्व यक्षं, तत् मे मनः शिवस‌ङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' येन कर्माणि। येन मनसा सत्ता कमार्णि। अपसः। अप इति कर्म नाम। तद्धितलोपः। अपस्विनः कर्मवन्तः मनीषिणो मेधाविनः। यज्ञे कृन्ति कुर्वन्ति। विदथेषु वेदेषु यज्ञविधिविधानेषु धीरा धीमन्तः। यच्चापूर्वम्। न विद्यते पूर्वमिन्द्रियं यस्मात् तद्पूर्वम्। यद्वा-अपूर्वमनपरम्। यच्च यक्षं पूज्यम्। यच्चान्तर्मध्ये प्रजानामास्ते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या-''' मनीषियों मेधावियों को यज्ञ में जिस मन के द्वारा सत कर्म करते है, 'कृ करणे' स्वादि है। मन स्वास्थ्य के विना कार्य में प्रवृत्त करता है। तेषु सत्सु । विदथेषु सत्सु विद्यन्ते ज्ञायन्ते तानि विदधानि तेषु। विदधातु से औणादिक थप्रत्यय। यज्ञसम्बन्धिहवि आदि पदार्थों के ज्ञान में उसका यह अर्थ है। किस प्रकार के मनीषियों को। अपसः अप इति कर्मनाम (निघ० २.१.१)। कार्यों को करने की प्रवृति है जिसमे वे अपस्वन कर्मवन्तश्अस्मायामेधास्रजो विनिः ' (पा०सू० ५.२.१२१) इससे विन्प्रत्यय विन्मतोलुक्' (पा०सू० ५.३.६५) इससे इष्ठ अभाव में भी छन्द में विनो लुक्। हमेशा कर्मनिष्ठ यह अर्थ है। वैसे धीरा धीमन्तमेधा विद्यमान है जिसमे कर्मण्यण् (पा०सू० ३.२.१)। और हमारा मन सर्वोत्तम गुण कर्म स्वभाव वाला और जो मन इन्द्रिय से पूर्व उसकी रचना हुई। अथवा अपूर्व अनपर अबाह्य ऐसा कहने पर अपूर्व आत्मरूप यह अर्थ है। और जो योग यज्ञ में पूजनीय होकर के एकीभूत हो रहा हो। यजते औणादिक सन्प्रत्यय है। और जो प्राणिमात्र के हृदय में रहता है, अन्य इन्द्रिया तो बाहरी है, मनतो आन्तरिक इन्द्रिय है यह अर्थ है। वह उस स्वरूप वाला मेरा मन धर्मेष्ट होवे। तृतीय मन्त्र इस प्रकार है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====तृतीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्जोतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्नऽऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय''' - यत् प्रज्ञानम् उत चेतः धृतिः च यत् प्रजासु अन्तः अमृतं ज्योतिः। यस्मात् ऋते किञ्चन कर्म न क्रियते, तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' यत्प्रज्ञानम्। यन्मनः प्रज्ञानम्। विशेषप्रतिपत्तिः प्रज्ञानम्। उतापि च। चेतः। सामान्यप्रतिपत्तिः चेतः। धृतिश्च। प्रसिद्धा। यन्मनोऽन्तज्योतिरमृतं च प्रजासु। यस्मान्न ऋते येन च बिना न किञ्चन कर्म क्रियते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जो मन प्रज्ञा को विशेष करके ज्ञान का अच्छी प्रकार से बोध कराता है वह प्रज्ञानम् है। 'करणाधिकरणयोश्च' (पा०सू० ३.३.११७) इससे करण में ल्युट् प्रत्यय किया। और भी जो मनस्मृति का साधक है। 'चिती संज्ञाने' इस ण्यन्तहोने से असुन्प्रत्यय हुआ। सामान्य विशेष ज्ञान का बोध कराने वाला यह अर्थ है। और जो मन धैर्य स्वरूप है। मन में ही धैर्य की उत्पति होने से मन में कार्य कारण के अभेद होने से धैर्य को धारण करता है। और जो मन प्रजाओं में, मनुष्यों में अन्तरवर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का ज्योति प्रकाशक है। कहाँ होने पर आदर के लिए पुनः कहते है। 'अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते' (निरु० १.४२) ऐसा यास्क ने कहा। और आत्मरूप होने से आमरण दरमि होने से विनाश रहित है। जिस मन के बिना मनुष्य कोई भी कार्य नहीं कर सकते है। सभी कार्यों को करने से पहले प्राणियों का मन पूर्वप्रवृत्त होता है, मन के स्वास्थ्य के विना कार्यों में प्रवृत नही होता है यह अर्थ है। अन्यारादितरर्ते (पा०सू० २.३.२९) इत्यादि से यस्माद इसका ऋत के योग में पञ्चमी। वह मेरा मन कल्याणकारी हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जो मन सामान्य और विशेषज्ञान का बोध कराता है। जो धैर्यस्वरूप विद्यमान है। और जो प्राणियों के अन्तर्भाग में विद्यमान सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है। और जो विनाश रहित है। जिसके बिना कोई भी कार्य नही किया जा सकता है। इस प्रकार का जो मेरा मन है वह शुभसङ्कल्प वाला हो। चतुर्थ मन्त्र इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====चतुर्थ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय-''' येन अमृतेन (मनसा) इदं भूतं भूवनं भविष्यत् सर्व परिगृहीतम्। येन सप्तहोता यज्ञः तायते तत् मे मनः शिवस‌ङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' येनेदं। येन मनसा। इदं भूतकालं भुवनं वर्तमानकालं भविष्यद् भविष्यत्कालं च। परिगृहीतम् अमृतेन सर्वम्। येन च मनसा यज्ञस्तायते तन्यते। सप्तहोता। सप्तहोतारो हि अग्निष्टोमे भवन्ति। तन्में मन इति व्याख्यातम् ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या-''' जिस मन से इसके चारो और विद्यमान वस्तुओं का ज्ञान है। यहाँ क्या हुआ। भूतकालसम्बन्धि वस्तुओं का। भुवन वर्तमान काल को कहते है। भू से क्युप्रत्यय करने पर वर्तमानकालसंबन्धि है। भविष्यत् 'लुटः सद्वा' (पा०सू० ३.३.१४) इससे शतृप्रत्यय करने पर 'तौ सत्' (पा०सू० ३.२.१२७) इसके कहने पर त्रिकालसंबद्ध वस्तुओं में मन प्रवृत होता है यह अर्थ है। श्रोत्र आदि के द्वारा तो प्रत्यक्ष ही ग्रहण करता है। यह किस प्रकार के ज्ञान को ग्रहण करता है। अमृत शाश्वत होने से। मुक्तिपर्यन्त श्रोत्र आदि का तो नाश होता है परन्तु मन तो अमर है। और जिस मन के द्वारा यज्ञ अग्निष्टोम आदि को आगे विस्तृत करते है। 'तनोतेर्यकि' (पा०सू० ६.४.४४) इससे आकार। किस प्रकार का यज्ञ। सप्तहोता सात होता के द्वारा देवो का आह्वान करते है, अर्थात होतृमैत्रवरुण आदि सात होता है। अग्निष्टोम में सात होता है। वह मेरा मन शुभसकल्प वाला हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जिससे विनाश रहित धर्म वाले संसार का भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यत्काल के सभी पदार्थ जाने जाते है। जिसके द्वारा सात होता विशिष्ट अग्निष्टोम आदि यज्ञ का सम्पादन किया जाता है। वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प वाला हो। पंचम मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पंचम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;यस्मिन्नृचः साम यजूँषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिँश्चित्तँ सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' यस्मिन् ऋचः यस्मिन् साम यजूंषि रथनाभौ अराः इव प्रतिष्ठिताः यस्मिन् प्रजानां सर्व चित्तम् ओतं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' यस्मिन् ऋचः। यस्मिन् ऋचः प्रतिष्ठिताः। यस्मिन् सामानि प्रतिष्ठितानि । यस्मिन् यंजूषि प्रतिष्ठितानि। कर्थामव ? रथनाभौ इव अराः। यस्मिन् चित्तं सञ्ज्ञानं सर्वे तस्य तस्यार्थस्य। ओतं निक्षिप्तम्। तदुसन्ततिमिव कृतम्। प्रजानाम्। तत् मे मन इति व्याख्यातम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जिस मन में ऋग्वेद प्रतिष्ठित है। जिसमे सामवेद प्रतिष्ठित है। जिसमे यजुर्वेद प्रतिष्ठित है। स्वस्थ मन में ही वेदत्रयी प्रकट होते है, इस मन में शब्द मात्र स्थिर होते है 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इति छान्दोग्य में स्वस्थ मन से ही वेदो का उच्चारण प्रतिपादित किया गया है। वहाँ दृष्टान्त है। जैसे रथ के पहियों में लकड़ी के अरा लगे होते है। जैसे अरा रथचक्र के मध्य में प्रतिष्ठत होते है, उसी प्रकार शब्दजाल मन में स्थिर रहता है। और जिसमे प्राणियों के सम्पूर्ण सभी पदार्थविषयज्ञान धागे में मणियों के समान युक्त रहता है। स्वस्थ मन में ही ज्ञान की उत्पत्ति और मन के प्रतिकूल आचरण से ही ज्ञान का अभाव होता है। वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जिसमे ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद चक्रनाभि में विद्यमान अरा के समान विद्यमान है और भी जिसमे प्राणियों के सभी पदार्थ विषयक ज्ञान है। वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प वाला हो। षष्ठम मन्त्र का भाषार्थ इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====षष्ठ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिनऽ इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (यजुर्वेद 34/1-6)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%83/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9%E0%A5%AA शुक्लयजुर्वेद], अध्याय- ३४, मन्त्र १-६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' यत् (मनः) मनुष्यान् सुषारथिः अश्वान् इव नेनीयते अभीषुभिः वाजिन इव (मनुष्यान् कर्मषु प्रेरयति) यत् हृत्प्रतिष्ठम् अजिरं जविष्ठं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वट भाष्य -''' सुषारथिः। यन्मनो मनुष्यान् नेनीयतेऽत्यर्थं नीयते। कर्थामव। सुषारथिः कल्याणसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्। यच्च मनः सुषारथिरिव। अभीषुभिः प्रग्रहैर्वाजिन इव वेजनवतोऽश्वानिव। यमयतीति शेषः। द्वे उपमे। एकत्र नयनमन्यत्र नियममित्यर्थः यच्च हत्प्रतिष्ठम्। तत्रोपलब्धेः। यच्च अजिरं जरारहितम्। यच्च जविष्ठमतिशयेन गन्तुं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जो मन जैसे सुंदर घोड़े के समान, लगाम से घोड़ो को सब और चलाता है, वैसे ही मनुष्य आदि प्राणियों को शीघ्र ही इधर उधर भ्रमण कराता है। नयतेः क्रियासमभिहारे यङ् हुआ। मन के प्रेरित करने पर ही प्राणि कार्य में प्रवृत होते है। मनुष्य ग्रहण प्राणिमात्र का उपलक्षक है। वहाँ उदाहरण है। जैसे चतुर सारथि लगाम से घोड़ो को इधर उधर अपने वश में चलाता है। रस्सियों से जैसे ले जाता है। दो उपमा है। प्रथम ले जाना और दूसरी नियमन। वैसे ही मन मनुष्यों को कार्य में प्रवृत करता है और लेकर जाता है। और जो मन हृदय में प्रतिष्ठित है। और जो मन विषय आदि में प्रेरक वा वृद्धादी अवस्था से रहित है। और जो अत्यन्त वेगवान है 'न वै वातात् किञ्चनाशीयोस्ति न मनसः किञ्चनाशीयोस्ति' इति श्रुति। वह मेरा मन मंगलमय हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जैसे कोई चतुर सारथि घोड़ो को सही चलाता है। वह जैसे चाहता है वैसे ही उनको लेकर के जाता है। इसी प्रकार मन भी प्राणियों के शरीर को चलाता है। और जो हृदय में स्थित वृद्धावस्था से रहित अत्यन्त ही वेगवान वह मेरा मन मंगलमय हो।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री राधेश्याम खेमका, [https://dn720002.ca.archive.org/0/items/vaidik-sukta-sangrah-with-translation-by-gita-press/Vaidik%20Sukta%20Sangrah%20with%20Translation%20by%20Gita%20Press_text.pdf वैदिक सूक्त-संग्रह] (२०१२), गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० २१२)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मन का दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्त्व ==&lt;br /&gt;
शिवसंकल्प सूक्त के अनुसार मन इन्द्रियों का प्रवर्तक, ज्ञान का आधार तथा समस्त क्रियाओं का प्रेरक तत्त्व है। इन्द्रियाँ तभी अपने विषयों का सम्यक् ग्रहण कर सकती हैं, जब मन संतुलित एवं नियंत्रित हो। कठोपनिषद् के रथ-दृष्टान्त द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि विवेकयुक्त बुद्धि, संयमित मन और नियंत्रित इन्द्रियाँ ही जीवन को परम लक्ष्य की ओर ले जाती हैं। इस प्रकार शिवसंकल्प, मन-नियंत्रण का वैदिक सूत्र प्रदान करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;स्वामी श्री अखंडानन्द सरस्वती - [https://ia800507.us.archive.org/29/items/shivsankalp_sukta/shivsankalp_sukta_text.pdf शिवसंकल्प-सूक्त]&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
छः मन्त्र वाले इस सूक्त के ऋषि याज्ञवल्क्य, मनो देवता, त्रिष्टुप् छन्द है। इस सूक्त में ऋषि कहते हैं की जो मन जागने वाले पुरुष का दूर जाता है, और सोने वाले मनुष्य का वही मन वैसे ही समीप आता है अर्थात् जैसा गया है वैसे ही वापस आता है। और जो दूर से जाता है, जो मन आत्म साक्षात्कार में साधन है, और जो मन प्रकाशकों का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रवर्तक है, सभी शरीर का चालक वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्पों से युक्त हो। अर्थात् मेरे मन में हमेशा धर्म ही हो कभी भी पाप नही हो। कर्मवान, बुद्धिमान, मेधावी जिस मन से कार्य करते हैं, जिससे बुद्धिमान यथाविधि यज्ञ का सम्पादन करते हैं, और जो अपूर्व, सभी इन्द्रियों से पूर्व जिसकी रचना हुई, सभी प्राणियों में विद्यमान और पूज्य वह मेरा मन शुभ सङ्कल्प से युक्त हो। जो मन प्रज्ञा को विशेष रूप से ज्ञान कराता है, और भी जो मन सामान्य ज्ञान को उत्पन्न करने वाला है, जो मन धृति धैर्य स्वरूप, जो मन अमरण धर्मी, जो मन प्रजाओं में अन्तर वर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है, जिसके बिना कोई भी कार्य पूर्ण नही किया जा सकता है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जिस मन के द्वारा यह सभी सब कुछ जाना गया है, और जिस मन से भूतकाल सम्बन्धी वस्तु, वर्तमानकाल सम्बन्धी वस्तु, और भविष्यत्काल सम्बन्धी वस्तु का ज्ञान होता है, जिस मन के द्वारा होतृमैत्रावरुण आदि सात होता युक्त अग्निष्टोमयज्ञ को विस्तृत करते है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जैसे रथ के दोनों और आरे होते है ठीक वैसे ही मन ही सभी ऋचाओं में प्रतिष्ठित होते है। साम में प्रतिष्ठित है। और यजुर्वेद में प्रतिष्ठित है। पट में जैसे ओत-प्रोतरूप से धागे विद्यमान रहते है वैसे ही जिस मन में सभी पदार्थ विषयक ज्ञान निहित है उस प्रकार का मेरा मन शुभस‌ङ्कल्पयुक्त हो। जैसे अच्छा सारथि अपने रथ के वेगयुक्त घोड़ो को इधर-उधर लेकर जाता है और जैसे उनको नियन्त्रित करता है, वैसे ही जो मन मनुष्यों को सभी कार्यों में प्रवृत्त करता है उन्हें उस कार्य में लगाता है, और जो मन हृद् देशवाशी है, और जो जरारहित, और जो उत्पन्न हुए बालकों में, युवकों में और वृद्धों में एक समान है, वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प से युक्त हो।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, शिव संकल्प का विजय (१९२२), स्वाध्याय-मंडल, औंध (पृ० ७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Yoga]]&lt;br /&gt;
[[Category:Psychology]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Shiva_Sankalpa_Sukta_(%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA_%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4)&amp;diff=137538</id>
		<title>Shiva Sankalpa Sukta (शिवसंकल्प सूक्त)</title>
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		<updated>2026-01-06T11:33:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्लयजुर्वेद के चतुस्त्रिंशत् (३४) अध्याय के प्रारम्भिक छह मंत्रों को सामूहिक रूप से शिवसंकल्पसूक्त कहा जाता है। ये मंत्र अपनी संरचना, भाववस्तु तथा संदेश की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इस सूक्त में ‘शिवसंकल्प’ का तात्पर्य शुभ, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है, जिसे मानव अपने आचरण में धारण करता है। जैसा संकल्प मन में उत्पन्न होता है, वैसा ही आचरण विकसित होता है और उसी के अनुरूप कर्म का स्वरूप निर्धारित होता है। इस प्रकार समस्त कर्मों का मूलाधार मन को स्वीकार किया गया है। सूक्त के प्रत्येक मंत्र के अंत में ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ - अर्थात् मेरा मन शुभ विचारों से युक्त हो - इस भावना की पुनरावृत्ति की गई है। सूक्त में मन के स्वरूप, उसकी प्रवृत्तियों तथा उसके नियंत्रण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया है। आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह सूक्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें मानसिक शुद्धता को आचरण की शुद्धता का आधार माना गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० विजय शंकर पाण्डेय, [https://archive.org/details/vedicsuktasankalanadr.vijayshankarpandey/page/n154/mode/1up वैदिक सूक्त संकलन] (२००१), मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (पृ० १५१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
[[File:शरीर आत्मेन्द्रिय आदि - परिचायक चित्र .jpeg|thumb|348x348px]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्लयजुर्वेद के चौतींसवें अध्याय के १ से ६ मन्त्र समूह को शिवसंकल्प सूक्त कहा जाता है। इसके मन देवता, त्रिष्टुप् छन्द और याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। मन के विषय में वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन किया है। शिवसंकल्पसूक्त के संदर्भ में ऋषि यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य को केवल शारीरिक एवं वाचिक पापों से ही नहीं, अपितु मानसिक दोषों से भी स्वयं को दूर रखना चाहिए। मन में उत्पन्न होने वाले संकल्प यदि शुभ और श्रेयस्कर हों, तभी जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे वश में रखना दुष्कर कार्य है। इसी कारण ऋषि बार-बार मन को शुभ एवं पवित्र संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० अनीता जैन, वैदिक वाग् ज्योतिः-शिव संकल्प से अनुप्रेरित वैदिक मनः प्रबन्धन (२०१६), गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार (पृ० ६०)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किसी भी कर्म के किये जाने के लिये पाँच आवश्यक अंग हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्॥ (भगवद्गीता 18.14)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE/%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%83 श्रीमद्भगवद्गीता], अध्याय- 18, श्लोक - 14।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (मन), करण (इन्द्रियाँ), चेष्टा (पाँच -प्राण) और दैव अथवा चेतन शक्ति। लेकिन ज्ञानी जानता है कि इन सबमें भी केवल अकर्ता आत्मा की उपस्थिति मात्र के कारण सभी कर्म सम्भव हो पाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक वाङ्मय में मन को समस्त क्रियाओं का मूल कारण माना गया है। शुक्ल यजुर्वेद में स्थित शिवसंकल्प सूक्त इसी तथ्य को उद्घाटित करता है कि, बिना शुभ संकल्प के न तो व्यक्तिगत जीवन में शान्ति संभव है और न ही सामाजिक सौहार्द की स्थापना। आधुनिक युग में व्याप्त अशान्ति, असहिष्णुता एवं वैमनस्य का मूल कारण दूषित मनोवृत्तियाँ हैं, जिनका समाधान शिवसंकल्प की वैदिक अवधारणा में निहित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शिवसंकल्प का तात्पर्य'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिव का अर्थ है - शुभ, कल्याणकारी तथा मंगलमय और संकल्प का अर्थ है - दृढ़ निश्चय। इस प्रकार शिवसंकल्प का अभिप्राय हुआ - ऐसा मन जो सदैव शुभ, सकारात्मक एवं परहितकारी निश्चयों में प्रवृत्त हो। सूक्त में बार-बार उच्चरित मंत्र “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” मन की इसी आदर्श स्थिति की कामना को अभिव्यक्त करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वैदिक साहित्य में सूक्तों का महत्व==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिवसंकल्पसूक्त का संक्षिप्त परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिवसंकल्पसूक्त के मंत्रों का भावात्मक अध्ययन==&lt;br /&gt;
शिवसंकल्प सूक्त शुक्ल यजुर्वेद का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूक्त है, जिसमें मन को शुभ संकल्प, शुभ निश्चय एवं कल्याणकारी विचारों से युक्त करने की प्रार्थना की गई है। प्रस्तुत लेख में शिवसंकल्प की अवधारणा को वैदिक मनोविज्ञान, सामाजिक समरसता तथा आध्यात्मिक उन्नयन के सन्दर्भ में विवेचित किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मन की शुद्धता ही व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के उत्थान का मूल आधार है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====प्रथम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;ओ3म् यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' जाग्रतः यत् दैवं (मनः) दूरम् उत् एति, सुप्तस्य तत् उ तथा एव एति। दूरङ्गमं ज्योतिषाम् एकः ज्योतिः मे तत् मनः शिवसंकल्पमस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्यम्''' - यन्मनो जाग्रतः पुरुषस्य दूरम् उदैति उद्गच्छति चक्षुः प्रभृतीन्यपेक्ष्य। यच्च दैवम्। देवो विज्ञानात्मा सोऽनेन गृह्यत इति दैवम्। उक्तञ्च- &amp;quot;मनसैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्&amp;quot; इति। तदु सुप्तस्य। तदः स्थाने यदो वृत्तिः। उकारः समुच्चयार्थीयः। यच्च मनः सुप्तस्य तथैव तेनैव प्रकारेण एति। यच्च दूरङ्गमम् । दूरं गच्छतीति दूरङ्गमम् । अतीतानागतवर्तमानव्यवहितं मे मनः शिवसङ्कल्पम्। सङ्कल्पः काममूलपदार्थस्य स्त्र्यादेः सुरूपताज्ञानवतः काम-प्रभृति। शान्तसङ्कल्पमस्तु भवतु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' ऋषि कहते हैं- वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो। शिव कल्याणकारी धर्म विषय सङ्कल्प जिस प्रकार का है उस प्रकार का वह मेरा मन हो। मेरा मन हमेशा धर्म में ही हो कभी भी पापी न बने। तो क्या बने जो मन जागे हुए पुरुष का दूर से भी दूर चला जाता है। चक्षु आदि वस्तुओं को ग्रहण कराता है। मन के द्वारा यह सभी कुछ देखा जाता है। और भी। यदः स्थान में उसका पर्यायवाची शब्द उकार है। और जो मन सुप्तावस्था में भी उसी प्रकार वापस आता है जिस प्रकार वह गया था। और जो दूर से भी दूरात् गच्छतीति दूरङ्गमं खश्प्रत्यय है। अतीत अनागत-वर्तमान में प्रयोग करने वाले पदार्थों का ग्राहक है। और जो मन ज्योतिप्रकाशको का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रकाशक प्रवर्तक है। श्रोत्र आदि इन्द्रियों को अपने विषय में लगाता है। आत्मा मन को प्रेरित करता है, मन इन्द्रिय से इन्द्रिय को, अर्थ से न्याय युक्त मन सम्बन्ध को उन दोनों को प्रवृत करता है। उस प्रकार का मेरा मन शान्तसङ्कल्प वाला हो। द्वितीय मन्त्र इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====द्वितीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' येन अपसः मनीषिणः धीराः यज्ञे विदथेषु कर्माणि कृण्वन्ति यत् प्रजानाम् अन्तः अपूर्व यक्षं, तत् मे मनः शिवस‌ङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' येन कर्माणि। येन मनसा सत्ता कमार्णि। अपसः। अप इति कर्म नाम। तद्धितलोपः। अपस्विनः कर्मवन्तः मनीषिणो मेधाविनः। यज्ञे कृन्ति कुर्वन्ति। विदथेषु वेदेषु यज्ञविधिविधानेषु धीरा धीमन्तः। यच्चापूर्वम्। न विद्यते पूर्वमिन्द्रियं यस्मात् तद्पूर्वम्। यद्वा-अपूर्वमनपरम्। यच्च यक्षं पूज्यम्। यच्चान्तर्मध्ये प्रजानामास्ते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या-''' मनीषियों मेधावियों को यज्ञ में जिस मन के द्वारा सत कर्म करते है, 'कृ करणे' स्वादि है। मन स्वास्थ्य के विना कार्य में प्रवृत्त करता है। तेषु सत्सु । विदथेषु सत्सु विद्यन्ते ज्ञायन्ते तानि विदधानि तेषु। विदधातु से औणादिक थप्रत्यय। यज्ञसम्बन्धिहवि आदि पदार्थों के ज्ञान में उसका यह अर्थ है। किस प्रकार के मनीषियों को। अपसः अप इति कर्मनाम (निघ० २.१.१)। कार्यों को करने की प्रवृति है जिसमे वे अपस्वन कर्मवन्तश्अस्मायामेधास्रजो विनिः ' (पा०सू० ५.२.१२१) इससे विन्प्रत्यय विन्मतोलुक्' (पा०सू० ५.३.६५) इससे इष्ठ अभाव में भी छन्द में विनो लुक्। हमेशा कर्मनिष्ठ यह अर्थ है। वैसे धीरा धीमन्तमेधा विद्यमान है जिसमे कर्मण्यण् (पा०सू० ३.२.१)। और हमारा मन सर्वोत्तम गुण कर्म स्वभाव वाला और जो मन इन्द्रिय से पूर्व उसकी रचना हुई। अथवा अपूर्व अनपर अबाह्य ऐसा कहने पर अपूर्व आत्मरूप यह अर्थ है। और जो योग यज्ञ में पूजनीय होकर के एकीभूत हो रहा हो। यजते औणादिक सन्प्रत्यय है। और जो प्राणिमात्र के हृदय में रहता है, अन्य इन्द्रिया तो बाहरी है, मनतो आन्तरिक इन्द्रिय है यह अर्थ है। वह उस स्वरूप वाला मेरा मन धर्मेष्ट होवे। तृतीय मन्त्र इस प्रकार है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====तृतीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्जोतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्नऽऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय''' - यत् प्रज्ञानम् उत चेतः धृतिः च यत् प्रजासु अन्तः अमृतं ज्योतिः। यस्मात् ऋते किञ्चन कर्म न क्रियते, तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' यत्प्रज्ञानम्। यन्मनः प्रज्ञानम्। विशेषप्रतिपत्तिः प्रज्ञानम्। उतापि च। चेतः। सामान्यप्रतिपत्तिः चेतः। धृतिश्च। प्रसिद्धा। यन्मनोऽन्तज्योतिरमृतं च प्रजासु। यस्मान्न ऋते येन च बिना न किञ्चन कर्म क्रियते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जो मन प्रज्ञा को विशेष करके ज्ञान का अच्छी प्रकार से बोध कराता है वह प्रज्ञानम् है। 'करणाधिकरणयोश्च' (पा०सू० ३.३.११७) इससे करण में ल्युट् प्रत्यय किया। और भी जो मनस्मृति का साधक है। 'चिती संज्ञाने' इस ण्यन्तहोने से असुन्प्रत्यय हुआ। सामान्य विशेष ज्ञान का बोध कराने वाला यह अर्थ है। और जो मन धैर्य स्वरूप है। मन में ही धैर्य की उत्पति होने से मन में कार्य कारण के अभेद होने से धैर्य को धारण करता है। और जो मन प्रजाओं में, मनुष्यों में अन्तरवर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का ज्योति प्रकाशक है। कहाँ होने पर आदर के लिए पुनः कहते है। 'अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते' (निरु० १.४२) ऐसा यास्क ने कहा। और आत्मरूप होने से आमरण दरमि होने से विनाश रहित है। जिस मन के बिना मनुष्य कोई भी कार्य नहीं कर सकते है। सभी कार्यों को करने से पहले प्राणियों का मन पूर्वप्रवृत्त होता है, मन के स्वास्थ्य के विना कार्यों में प्रवृत नही होता है यह अर्थ है। अन्यारादितरर्ते (पा०सू० २.३.२९) इत्यादि से यस्माद इसका ऋत के योग में पञ्चमी। वह मेरा मन कल्याणकारी हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जो मन सामान्य और विशेषज्ञान का बोध कराता है। जो धैर्यस्वरूप विद्यमान है। और जो प्राणियों के अन्तर्भाग में विद्यमान सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है। और जो विनाश रहित है। जिसके बिना कोई भी कार्य नही किया जा सकता है। इस प्रकार का जो मेरा मन है वह शुभसङ्कल्प वाला हो। चतुर्थ मन्त्र इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====चतुर्थ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय-''' येन अमृतेन (मनसा) इदं भूतं भूवनं भविष्यत् सर्व परिगृहीतम्। येन सप्तहोता यज्ञः तायते तत् मे मनः शिवस‌ङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' येनेदं। येन मनसा। इदं भूतकालं भुवनं वर्तमानकालं भविष्यद् भविष्यत्कालं च। परिगृहीतम् अमृतेन सर्वम्। येन च मनसा यज्ञस्तायते तन्यते। सप्तहोता। सप्तहोतारो हि अग्निष्टोमे भवन्ति। तन्में मन इति व्याख्यातम् ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या-''' जिस मन से इसके चारो और विद्यमान वस्तुओं का ज्ञान है। यहाँ क्या हुआ। भूतकालसम्बन्धि वस्तुओं का। भुवन वर्तमान काल को कहते है। भू से क्युप्रत्यय करने पर वर्तमानकालसंबन्धि है। भविष्यत् 'लुटः सद्वा' (पा०सू० ३.३.१४) इससे शतृप्रत्यय करने पर 'तौ सत्' (पा०सू० ३.२.१२७) इसके कहने पर त्रिकालसंबद्ध वस्तुओं में मन प्रवृत होता है यह अर्थ है। श्रोत्र आदि के द्वारा तो प्रत्यक्ष ही ग्रहण करता है। यह किस प्रकार के ज्ञान को ग्रहण करता है। अमृत शाश्वत होने से। मुक्तिपर्यन्त श्रोत्र आदि का तो नाश होता है परन्तु मन तो अमर है। और जिस मन के द्वारा यज्ञ अग्निष्टोम आदि को आगे विस्तृत करते है। 'तनोतेर्यकि' (पा०सू० ६.४.४४) इससे आकार। किस प्रकार का यज्ञ। सप्तहोता सात होता के द्वारा देवो का आह्वान करते है, अर्थात होतृमैत्रवरुण आदि सात होता है। अग्निष्टोम में सात होता है। वह मेरा मन शुभसकल्प वाला हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जिससे विनाश रहित धर्म वाले संसार का भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यत्काल के सभी पदार्थ जाने जाते है। जिसके द्वारा सात होता विशिष्ट अग्निष्टोम आदि यज्ञ का सम्पादन किया जाता है। वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प वाला हो। पंचम मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पंचम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;यस्मिन्नृचः साम यजूँषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिँश्चित्तँ सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' यस्मिन् ऋचः यस्मिन् साम यजूंषि रथनाभौ अराः इव प्रतिष्ठिताः यस्मिन् प्रजानां सर्व चित्तम् ओतं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' यस्मिन् ऋचः। यस्मिन् ऋचः प्रतिष्ठिताः। यस्मिन् सामानि प्रतिष्ठितानि । यस्मिन् यंजूषि प्रतिष्ठितानि। कर्थामव ? रथनाभौ इव अराः। यस्मिन् चित्तं सञ्ज्ञानं सर्वे तस्य तस्यार्थस्य। ओतं निक्षिप्तम्। तदुसन्ततिमिव कृतम्। प्रजानाम्। तत् मे मन इति व्याख्यातम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जिस मन में ऋग्वेद प्रतिष्ठित है। जिसमे सामवेद प्रतिष्ठित है। जिसमे यजुर्वेद प्रतिष्ठित है। स्वस्थ मन में ही वेदत्रयी प्रकट होते है, इस मन में शब्द मात्र स्थिर होते है 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इति छान्दोग्य में स्वस्थ मन से ही वेदो का उच्चारण प्रतिपादित किया गया है। वहाँ दृष्टान्त है। जैसे रथ के पहियों में लकड़ी के अरा लगे होते है। जैसे अरा रथचक्र के मध्य में प्रतिष्ठत होते है, उसी प्रकार शब्दजाल मन में स्थिर रहता है। और जिसमे प्राणियों के सम्पूर्ण सभी पदार्थविषयज्ञान धागे में मणियों के समान युक्त रहता है। स्वस्थ मन में ही ज्ञान की उत्पत्ति और मन के प्रतिकूल आचरण से ही ज्ञान का अभाव होता है। वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जिसमे ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद चक्रनाभि में विद्यमान अरा के समान विद्यमान है और भी जिसमे प्राणियों के सभी पदार्थ विषयक ज्ञान है। वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प वाला हो। षष्ठम मन्त्र का भाषार्थ इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====षष्ठ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिनऽ इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (यजुर्वेद 34/1-6)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%83/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9%E0%A5%AA शुक्लयजुर्वेद], अध्याय- ३४, मन्त्र १-६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' यत् (मनः) मनुष्यान् सुषारथिः अश्वान् इव नेनीयते अभीषुभिः वाजिन इव (मनुष्यान् कर्मषु प्रेरयति) यत् हृत्प्रतिष्ठम् अजिरं जविष्ठं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वट भाष्य -''' सुषारथिः। यन्मनो मनुष्यान् नेनीयतेऽत्यर्थं नीयते। कर्थामव। सुषारथिः कल्याणसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्। यच्च मनः सुषारथिरिव। अभीषुभिः प्रग्रहैर्वाजिन इव वेजनवतोऽश्वानिव। यमयतीति शेषः। द्वे उपमे। एकत्र नयनमन्यत्र नियममित्यर्थः यच्च हत्प्रतिष्ठम्। तत्रोपलब्धेः। यच्च अजिरं जरारहितम्। यच्च जविष्ठमतिशयेन गन्तुं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जो मन जैसे सुंदर घोड़े के समान, लगाम से घोड़ो को सब और चलाता है, वैसे ही मनुष्य आदि प्राणियों को शीघ्र ही इधर उधर भ्रमण कराता है। नयतेः क्रियासमभिहारे यङ् हुआ। मन के प्रेरित करने पर ही प्राणि कार्य में प्रवृत होते है। मनुष्य ग्रहण प्राणिमात्र का उपलक्षक है। वहाँ उदाहरण है। जैसे चतुर सारथि लगाम से घोड़ो को इधर उधर अपने वश में चलाता है। रस्सियों से जैसे ले जाता है। दो उपमा है। प्रथम ले जाना और दूसरी नियमन। वैसे ही मन मनुष्यों को कार्य में प्रवृत करता है और लेकर जाता है। और जो मन हृदय में प्रतिष्ठित है। और जो मन विषय आदि में प्रेरक वा वृद्धादी अवस्था से रहित है। और जो अत्यन्त वेगवान है 'न वै वातात् किञ्चनाशीयोस्ति न मनसः किञ्चनाशीयोस्ति' इति श्रुति। वह मेरा मन मंगलमय हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जैसे कोई चतुर सारथि घोड़ो को सही चलाता है। वह जैसे चाहता है वैसे ही उनको लेकर के जाता है। इसी प्रकार मन भी प्राणियों के शरीर को चलाता है। और जो हृदय में स्थित वृद्धावस्था से रहित अत्यन्त ही वेगवान वह मेरा मन मंगलमय हो।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री राधेश्याम खेमका, [https://dn720002.ca.archive.org/0/items/vaidik-sukta-sangrah-with-translation-by-gita-press/Vaidik%20Sukta%20Sangrah%20with%20Translation%20by%20Gita%20Press_text.pdf वैदिक सूक्त-संग्रह] (२०१२), गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० २१२)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मन का दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्त्व ==&lt;br /&gt;
शिवसंकल्प सूक्त के अनुसार मन इन्द्रियों का प्रवर्तक, ज्ञान का आधार तथा समस्त क्रियाओं का प्रेरक तत्त्व है। इन्द्रियाँ तभी अपने विषयों का सम्यक् ग्रहण कर सकती हैं, जब मन संतुलित एवं नियंत्रित हो। कठोपनिषद् के रथ-दृष्टान्त द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि विवेकयुक्त बुद्धि, संयमित मन और नियंत्रित इन्द्रियाँ ही जीवन को परम लक्ष्य की ओर ले जाती हैं। इस प्रकार शिवसंकल्प, मन-नियंत्रण का वैदिक सूत्र प्रदान करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
छः मन्त्र वाले इस सूक्त के ऋषि याज्ञवल्क्य, मनो देवता, त्रिष्टुप् छन्द है। इस सूक्त में ऋषि कहते हैं की जो मन जागने वाले पुरुष का दूर जाता है, और सोने वाले मनुष्य का वही मन वैसे ही समीप आता है अर्थात् जैसा गया है वैसे ही वापस आता है। और जो दूर से जाता है, जो मन आत्म साक्षात्कार में साधन है, और जो मन प्रकाशकों का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रवर्तक है, सभी शरीर का चालक वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्पों से युक्त हो। अर्थात् मेरे मन में हमेशा धर्म ही हो कभी भी पाप नही हो। कर्मवान, बुद्धिमान, मेधावी जिस मन से कार्य करते हैं, जिससे बुद्धिमान यथाविधि यज्ञ का सम्पादन करते हैं, और जो अपूर्व, सभी इन्द्रियों से पूर्व जिसकी रचना हुई, सभी प्राणियों में विद्यमान और पूज्य वह मेरा मन शुभ सङ्कल्प से युक्त हो। जो मन प्रज्ञा को विशेष रूप से ज्ञान कराता है, और भी जो मन सामान्य ज्ञान को उत्पन्न करने वाला है, जो मन धृति धैर्य स्वरूप, जो मन अमरण धर्मी, जो मन प्रजाओं में अन्तर वर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है, जिसके बिना कोई भी कार्य पूर्ण नही किया जा सकता है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जिस मन के द्वारा यह सभी सब कुछ जाना गया है, और जिस मन से भूतकाल सम्बन्धी वस्तु, वर्तमानकाल सम्बन्धी वस्तु, और भविष्यत्काल सम्बन्धी वस्तु का ज्ञान होता है, जिस मन के द्वारा होतृमैत्रावरुण आदि सात होता युक्त अग्निष्टोमयज्ञ को विस्तृत करते है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जैसे रथ के दोनों और आरे होते है ठीक वैसे ही मन ही सभी ऋचाओं में प्रतिष्ठित होते है। साम में प्रतिष्ठित है। और यजुर्वेद में प्रतिष्ठित है। पट में जैसे ओत-प्रोतरूप से धागे विद्यमान रहते है वैसे ही जिस मन में सभी पदार्थ विषयक ज्ञान निहित है उस प्रकार का मेरा मन शुभस‌ङ्कल्पयुक्त हो। जैसे अच्छा सारथि अपने रथ के वेगयुक्त घोड़ो को इधर-उधर लेकर जाता है और जैसे उनको नियन्त्रित करता है, वैसे ही जो मन मनुष्यों को सभी कार्यों में प्रवृत्त करता है उन्हें उस कार्य में लगाता है, और जो मन हृद् देशवाशी है, और जो जरारहित, और जो उत्पन्न हुए बालकों में, युवकों में और वृद्धों में एक समान है, वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प से युक्त हो।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, शिव संकल्प का विजय (१९२२), स्वाध्याय-मंडल, औंध (पृ० ७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Yoga]]&lt;br /&gt;
[[Category:Psychology]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=File:%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B0_%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF_%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF_-_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%95_%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_.jpeg&amp;diff=137537</id>
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		<updated>2026-01-06T11:21:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, शिव संकल्प का विजय (१९२२), स्वाध्याय-मंडल, औंध (पृ० ७)।&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;== Summary ==&lt;br /&gt;
श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, शिव संकल्प का विजय (१९२२), स्वाध्याय-मंडल, औंध (पृ० ७)।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Shiva_Sankalpa_Sukta_(%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA_%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4)&amp;diff=137536</id>
		<title>Shiva Sankalpa Sukta (शिवसंकल्प सूक्त)</title>
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		<updated>2026-01-06T11:18:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्लयजुर्वेद के चतुस्त्रिंशत् (३४) अध्याय के प्रारम्भिक छह मंत्रों को सामूहिक रूप से शिवसंकल्पसूक्त कहा जाता है। ये मंत्र अपनी संरचना, भाववस्तु तथा संदेश की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इस सूक्त में ‘शिवसंकल्प’ का तात्पर्य शुभ, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है, जिसे मानव अपने आचरण में धारण करता है। जैसा संकल्प मन में उत्पन्न होता है, वैसा ही आचरण विकसित होता है और उसी के अनुरूप कर्म का स्वरूप निर्धारित होता है। इस प्रकार समस्त कर्मों का मूलाधार मन को स्वीकार किया गया है। सूक्त के प्रत्येक मंत्र के अंत में ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ - अर्थात् मेरा मन शुभ विचारों से युक्त हो - इस भावना की पुनरावृत्ति की गई है। सूक्त में मन के स्वरूप, उसकी प्रवृत्तियों तथा उसके नियंत्रण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया है। आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह सूक्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें मानसिक शुद्धता को आचरण की शुद्धता का आधार माना गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० विजय शंकर पाण्डेय, [https://archive.org/details/vedicsuktasankalanadr.vijayshankarpandey/page/n154/mode/1up वैदिक सूक्त संकलन] (२००१), मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (पृ० १५१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
शुक्लयजुर्वेद के चौतींसवें अध्याय के १ से ६ मन्त्र समूह को शिवसंकल्प सूक्त कहा जाता है। इसके मन देवता, त्रिष्टुप् छन्द और याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। मन के विषय में वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन किया है। शिवसंकल्पसूक्त के संदर्भ में ऋषि यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य को केवल शारीरिक एवं वाचिक पापों से ही नहीं, अपितु मानसिक दोषों से भी स्वयं को दूर रखना चाहिए। मन में उत्पन्न होने वाले संकल्प यदि शुभ और श्रेयस्कर हों, तभी जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे वश में रखना दुष्कर कार्य है। इसी कारण ऋषि बार-बार मन को शुभ एवं पवित्र संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० अनीता जैन, वैदिक वाग् ज्योतिः-शिव संकल्प से अनुप्रेरित वैदिक मनः प्रबन्धन (२०१६), गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार (पृ० ६०)।&amp;lt;/ref&amp;gt; किसी भी कर्म के किये जाने के लिये पाँच आवश्यक अंग हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्॥ (भगवद्गीता 18.14)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE/%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%83 श्रीमद्भगवद्गीता], अध्याय- 18, श्लोक - 14।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (मन), करण (इन्द्रियाँ), चेष्टा (पाँच -प्राण) और दैव अथवा चेतन शक्ति। लेकिन ज्ञानी जानता है कि इन सबमें भी केवल अकर्ता आत्मा की उपस्थिति मात्र के कारण सभी कर्म सम्भव हो पाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक वाङ्मय में मन को समस्त क्रियाओं का मूल कारण माना गया है। शुक्ल यजुर्वेद में स्थित शिवसंकल्प सूक्त इसी तथ्य को उद्घाटित करता है कि, बिना शुभ संकल्प के न तो व्यक्तिगत जीवन में शान्ति संभव है और न ही सामाजिक सौहार्द की स्थापना। आधुनिक युग में व्याप्त अशान्ति, असहिष्णुता एवं वैमनस्य का मूल कारण दूषित मनोवृत्तियाँ हैं, जिनका समाधान शिवसंकल्प की वैदिक अवधारणा में निहित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शिवसंकल्प का तात्पर्य'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिव का अर्थ है - शुभ, कल्याणकारी तथा मंगलमय और संकल्प का अर्थ है - दृढ़ निश्चय। इस प्रकार शिवसंकल्प का अभिप्राय हुआ - ऐसा मन जो सदैव शुभ, सकारात्मक एवं परहितकारी निश्चयों में प्रवृत्त हो। सूक्त में बार-बार उच्चरित मंत्र “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” मन की इसी आदर्श स्थिति की कामना को अभिव्यक्त करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वैदिक साहित्य में सूक्तों का महत्व==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिवसंकल्पसूक्त का संक्षिप्त परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिवसंकल्पसूक्त के मंत्रों का भावात्मक अध्ययन==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====प्रथम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;ओ3म् यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति। दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' जाग्रतः यत् दैवं (मनः) दूरम् उत् एति, सुप्तस्य तत् उ तथा एव एति। दूरङ्गमं ज्योतिषाम् एकः ज्योतिः मे तत् मनः शिवसंकल्पमस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्यम्''' - यन्मनो जाग्रतः पुरुषस्य दूरम् उदैति उद्गच्छति चक्षुः प्रभृतीन्यपेक्ष्य। यच्च दैवम्। देवो विज्ञानात्मा सोऽनेन गृह्यत इति दैवम्। उक्तञ्च- &amp;quot;मनसैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्&amp;quot; इति। तदु सुप्तस्य। तदः स्थाने यदो वृत्तिः। उकारः समुच्चयार्थीयः। यच्च मनः सुप्तस्य तथैव तेनैव प्रकारेण एति। यच्च दूरङ्गमम् । दूरं गच्छतीति दूरङ्गमम् । अतीतानागतवर्तमानव्यवहितं मे मनः शिवसङ्कल्पम्। सङ्कल्पः काममूलपदार्थस्य स्त्र्यादेः सुरूपताज्ञानवतः काम-प्रभृति। शान्तसङ्कल्पमस्तु भवतु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' ऋषि कहते हैं- वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो। शिव कल्याणकारी धर्म विषय सङ्कल्प जिस प्रकार का है उस प्रकार का वह मेरा मन हो। मेरा मन हमेशा धर्म में ही हो कभी भी पापी न बने। तो क्या बने जो मन जागे हुए पुरुष का दूर से भी दूर चला जाता है। चक्षु आदि वस्तुओं को ग्रहण कराता है। मन के द्वारा यह सभी कुछ देखा जाता है। और भी। यदः स्थान में उसका पर्यायवाची शब्द उकार है। और जो मन सुप्तावस्था में भी उसी प्रकार वापस आता है जिस प्रकार वह गया था। और जो दूर से भी दूरात् गच्छतीति दूरङ्गमं खश्प्रत्यय है। अतीत अनागत-वर्तमान में प्रयोग करने वाले पदार्थों का ग्राहक है। और जो मन ज्योतिप्रकाशको का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रकाशक प्रवर्तक है। श्रोत्र आदि इन्द्रियों को अपने विषय में लगाता है। आत्मा मन को प्रेरित करता है, मन इन्द्रिय से इन्द्रिय को, अर्थ से न्याय युक्त मन सम्बन्ध को उन दोनों को प्रवृत करता है। उस प्रकार का मेरा मन शान्तसङ्कल्प वाला हो। द्वितीय मन्त्र इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====द्वितीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' येन अपसः मनीषिणः धीराः यज्ञे विदथेषु कर्माणि कृण्वन्ति यत् प्रजानाम् अन्तः अपूर्व यक्षं, तत् मे मनः शिवस‌ङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' येन कर्माणि। येन मनसा सत्ता कमार्णि। अपसः। अप इति कर्म नाम। तद्धितलोपः। अपस्विनः कर्मवन्तः मनीषिणो मेधाविनः। यज्ञे कृन्ति कुर्वन्ति। विदथेषु वेदेषु यज्ञविधिविधानेषु धीरा धीमन्तः। यच्चापूर्वम्। न विद्यते पूर्वमिन्द्रियं यस्मात् तद्पूर्वम्। यद्वा-अपूर्वमनपरम्। यच्च यक्षं पूज्यम्। यच्चान्तर्मध्ये प्रजानामास्ते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या-''' मनीषियों मेधावियों को यज्ञ में जिस मन के द्वारा सत कर्म करते है, 'कृ करणे' स्वादि है। मन स्वास्थ्य के विना कार्य में प्रवृत्त करता है। तेषु सत्सु । विदथेषु सत्सु विद्यन्ते ज्ञायन्ते तानि विदधानि तेषु। विदधातु से औणादिक थप्रत्यय। यज्ञसम्बन्धिहवि आदि पदार्थों के ज्ञान में उसका यह अर्थ है। किस प्रकार के मनीषियों को। अपसः अप इति कर्मनाम (निघ० २.१.१)। कार्यों को करने की प्रवृति है जिसमे वे अपस्वन कर्मवन्तश्अस्मायामेधास्रजो विनिः ' (पा०सू० ५.२.१२१) इससे विन्प्रत्यय विन्मतोलुक्' (पा०सू० ५.३.६५) इससे इष्ठ अभाव में भी छन्द में विनो लुक्। हमेशा कर्मनिष्ठ यह अर्थ है। वैसे धीरा धीमन्तमेधा विद्यमान है जिसमे कर्मण्यण् (पा०सू० ३.२.१)। और हमारा मन सर्वोत्तम गुण कर्म स्वभाव वाला और जो मन इन्द्रिय से पूर्व उसकी रचना हुई। अथवा अपूर्व अनपर अबाह्य ऐसा कहने पर अपूर्व आत्मरूप यह अर्थ है। और जो योग यज्ञ में पूजनीय होकर के एकीभूत हो रहा हो। यजते औणादिक सन्प्रत्यय है। और जो प्राणिमात्र के हृदय में रहता है, अन्य इन्द्रिया तो बाहरी है, मनतो आन्तरिक इन्द्रिय है यह अर्थ है। वह उस स्वरूप वाला मेरा मन धर्मेष्ट होवे। तृतीय मन्त्र इस प्रकार है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====तृतीय मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्जोतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्नऽऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय''' - यत् प्रज्ञानम् उत चेतः धृतिः च यत् प्रजासु अन्तः अमृतं ज्योतिः। यस्मात् ऋते किञ्चन कर्म न क्रियते, तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' यत्प्रज्ञानम्। यन्मनः प्रज्ञानम्। विशेषप्रतिपत्तिः प्रज्ञानम्। उतापि च। चेतः। सामान्यप्रतिपत्तिः चेतः। धृतिश्च। प्रसिद्धा। यन्मनोऽन्तज्योतिरमृतं च प्रजासु। यस्मान्न ऋते येन च बिना न किञ्चन कर्म क्रियते। तन्मे मन इति व्याख्यातम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जो मन प्रज्ञा को विशेष करके ज्ञान का अच्छी प्रकार से बोध कराता है वह प्रज्ञानम् है। 'करणाधिकरणयोश्च' (पा०सू० ३.३.११७) इससे करण में ल्युट् प्रत्यय किया। और भी जो मनस्मृति का साधक है। 'चिती संज्ञाने' इस ण्यन्तहोने से असुन्प्रत्यय हुआ। सामान्य विशेष ज्ञान का बोध कराने वाला यह अर्थ है। और जो मन धैर्य स्वरूप है। मन में ही धैर्य की उत्पति होने से मन में कार्य कारण के अभेद होने से धैर्य को धारण करता है। और जो मन प्रजाओं में, मनुष्यों में अन्तरवर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का ज्योति प्रकाशक है। कहाँ होने पर आदर के लिए पुनः कहते है। 'अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते' (निरु० १.४२) ऐसा यास्क ने कहा। और आत्मरूप होने से आमरण दरमि होने से विनाश रहित है। जिस मन के बिना मनुष्य कोई भी कार्य नहीं कर सकते है। सभी कार्यों को करने से पहले प्राणियों का मन पूर्वप्रवृत्त होता है, मन के स्वास्थ्य के विना कार्यों में प्रवृत नही होता है यह अर्थ है। अन्यारादितरर्ते (पा०सू० २.३.२९) इत्यादि से यस्माद इसका ऋत के योग में पञ्चमी। वह मेरा मन कल्याणकारी हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जो मन सामान्य और विशेषज्ञान का बोध कराता है। जो धैर्यस्वरूप विद्यमान है। और जो प्राणियों के अन्तर्भाग में विद्यमान सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है। और जो विनाश रहित है। जिसके बिना कोई भी कार्य नही किया जा सकता है। इस प्रकार का जो मेरा मन है वह शुभसङ्कल्प वाला हो। चतुर्थ मन्त्र इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====चतुर्थ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय-''' येन अमृतेन (मनसा) इदं भूतं भूवनं भविष्यत् सर्व परिगृहीतम्। येन सप्तहोता यज्ञः तायते तत् मे मनः शिवस‌ङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' येनेदं। येन मनसा। इदं भूतकालं भुवनं वर्तमानकालं भविष्यद् भविष्यत्कालं च। परिगृहीतम् अमृतेन सर्वम्। येन च मनसा यज्ञस्तायते तन्यते। सप्तहोता। सप्तहोतारो हि अग्निष्टोमे भवन्ति। तन्में मन इति व्याख्यातम् ।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या-''' जिस मन से इसके चारो और विद्यमान वस्तुओं का ज्ञान है। यहाँ क्या हुआ। भूतकालसम्बन्धि वस्तुओं का। भुवन वर्तमान काल को कहते है। भू से क्युप्रत्यय करने पर वर्तमानकालसंबन्धि है। भविष्यत् 'लुटः सद्वा' (पा०सू० ३.३.१४) इससे शतृप्रत्यय करने पर 'तौ सत्' (पा०सू० ३.२.१२७) इसके कहने पर त्रिकालसंबद्ध वस्तुओं में मन प्रवृत होता है यह अर्थ है। श्रोत्र आदि के द्वारा तो प्रत्यक्ष ही ग्रहण करता है। यह किस प्रकार के ज्ञान को ग्रहण करता है। अमृत शाश्वत होने से। मुक्तिपर्यन्त श्रोत्र आदि का तो नाश होता है परन्तु मन तो अमर है। और जिस मन के द्वारा यज्ञ अग्निष्टोम आदि को आगे विस्तृत करते है। 'तनोतेर्यकि' (पा०सू० ६.४.४४) इससे आकार। किस प्रकार का यज्ञ। सप्तहोता सात होता के द्वारा देवो का आह्वान करते है, अर्थात होतृमैत्रवरुण आदि सात होता है। अग्निष्टोम में सात होता है। वह मेरा मन शुभसकल्प वाला हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जिससे विनाश रहित धर्म वाले संसार का भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यत्काल के सभी पदार्थ जाने जाते है। जिसके द्वारा सात होता विशिष्ट अग्निष्टोम आदि यज्ञ का सम्पादन किया जाता है। वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प वाला हो। पंचम मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पंचम मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;यस्मिन्नृचः साम यजूँषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिँश्चित्तँ सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' यस्मिन् ऋचः यस्मिन् साम यजूंषि रथनाभौ अराः इव प्रतिष्ठिताः यस्मिन् प्रजानां सर्व चित्तम् ओतं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वटभाष्य-''' यस्मिन् ऋचः। यस्मिन् ऋचः प्रतिष्ठिताः। यस्मिन् सामानि प्रतिष्ठितानि । यस्मिन् यंजूषि प्रतिष्ठितानि। कर्थामव ? रथनाभौ इव अराः। यस्मिन् चित्तं सञ्ज्ञानं सर्वे तस्य तस्यार्थस्य। ओतं निक्षिप्तम्। तदुसन्ततिमिव कृतम्। प्रजानाम्। तत् मे मन इति व्याख्यातम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जिस मन में ऋग्वेद प्रतिष्ठित है। जिसमे सामवेद प्रतिष्ठित है। जिसमे यजुर्वेद प्रतिष्ठित है। स्वस्थ मन में ही वेदत्रयी प्रकट होते है, इस मन में शब्द मात्र स्थिर होते है 'अन्नमयं हि सोम्य मनः' इति छान्दोग्य में स्वस्थ मन से ही वेदो का उच्चारण प्रतिपादित किया गया है। वहाँ दृष्टान्त है। जैसे रथ के पहियों में लकड़ी के अरा लगे होते है। जैसे अरा रथचक्र के मध्य में प्रतिष्ठत होते है, उसी प्रकार शब्दजाल मन में स्थिर रहता है। और जिसमे प्राणियों के सम्पूर्ण सभी पदार्थविषयज्ञान धागे में मणियों के समान युक्त रहता है। स्वस्थ मन में ही ज्ञान की उत्पत्ति और मन के प्रतिकूल आचरण से ही ज्ञान का अभाव होता है। वह मेरा मन शिवसङ्कल्प हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जिसमे ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद चक्रनाभि में विद्यमान अरा के समान विद्यमान है और भी जिसमे प्राणियों के सभी पदार्थ विषयक ज्ञान है। वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प वाला हो। षष्ठम मन्त्र का भाषार्थ इस प्रकार है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====षष्ठ मंत्र का भावार्थ एवं विवेचन====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिनऽ इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥ (यजुर्वेद 34/1-6)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A4%83/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A9%E0%A5%AA शुक्लयजुर्वेद], अध्याय- ३४, मन्त्र १-६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अन्वय -''' यत् (मनः) मनुष्यान् सुषारथिः अश्वान् इव नेनीयते अभीषुभिः वाजिन इव (मनुष्यान् कर्मषु प्रेरयति) यत् हृत्प्रतिष्ठम् अजिरं जविष्ठं तत् मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उव्वट भाष्य -''' सुषारथिः। यन्मनो मनुष्यान् नेनीयतेऽत्यर्थं नीयते। कर्थामव। सुषारथिः कल्याणसारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्। यच्च मनः सुषारथिरिव। अभीषुभिः प्रग्रहैर्वाजिन इव वेजनवतोऽश्वानिव। यमयतीति शेषः। द्वे उपमे। एकत्र नयनमन्यत्र नियममित्यर्थः यच्च हत्प्रतिष्ठम्। तत्रोपलब्धेः। यच्च अजिरं जरारहितम्। यच्च जविष्ठमतिशयेन गन्तुं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्याख्या -''' जो मन जैसे सुंदर घोड़े के समान, लगाम से घोड़ो को सब और चलाता है, वैसे ही मनुष्य आदि प्राणियों को शीघ्र ही इधर उधर भ्रमण कराता है। नयतेः क्रियासमभिहारे यङ् हुआ। मन के प्रेरित करने पर ही प्राणि कार्य में प्रवृत होते है। मनुष्य ग्रहण प्राणिमात्र का उपलक्षक है। वहाँ उदाहरण है। जैसे चतुर सारथि लगाम से घोड़ो को इधर उधर अपने वश में चलाता है। रस्सियों से जैसे ले जाता है। दो उपमा है। प्रथम ले जाना और दूसरी नियमन। वैसे ही मन मनुष्यों को कार्य में प्रवृत करता है और लेकर जाता है। और जो मन हृदय में प्रतिष्ठित है। और जो मन विषय आदि में प्रेरक वा वृद्धादी अवस्था से रहित है। और जो अत्यन्त वेगवान है 'न वै वातात् किञ्चनाशीयोस्ति न मनसः किञ्चनाशीयोस्ति' इति श्रुति। वह मेरा मन मंगलमय हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सरलार्थ-''' जैसे कोई चतुर सारथि घोड़ो को सही चलाता है। वह जैसे चाहता है वैसे ही उनको लेकर के जाता है। इसी प्रकार मन भी प्राणियों के शरीर को चलाता है। और जो हृदय में स्थित वृद्धावस्था से रहित अत्यन्त ही वेगवान वह मेरा मन मंगलमय हो।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री राधेश्याम खेमका, [https://dn720002.ca.archive.org/0/items/vaidik-sukta-sangrah-with-translation-by-gita-press/Vaidik%20Sukta%20Sangrah%20with%20Translation%20by%20Gita%20Press_text.pdf वैदिक सूक्त-संग्रह] (२०१२), गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० २१२)&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मन का दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्त्व ==&lt;br /&gt;
शिवसंकल्प सूक्त के अनुसार मन इन्द्रियों का प्रवर्तक, ज्ञान का आधार तथा समस्त क्रियाओं का प्रेरक तत्त्व है। इन्द्रियाँ तभी अपने विषयों का सम्यक् ग्रहण कर सकती हैं, जब मन संतुलित एवं नियंत्रित हो। कठोपनिषद् के रथ-दृष्टान्त द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि विवेकयुक्त बुद्धि, संयमित मन और नियंत्रित इन्द्रियाँ ही जीवन को परम लक्ष्य की ओर ले जाती हैं। इस प्रकार शिवसंकल्प, मन-नियंत्रण का वैदिक सूत्र प्रदान करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
छः मन्त्र वाले इस सूक्त के ऋषि याज्ञवल्क्य, मनो देवता, त्रिष्टुप् छन्द है। इस सूक्त में ऋषि कहते हैं की जो मन जागने वाले पुरुष का दूर जाता है, और सोने वाले मनुष्य का वही मन वैसे ही समीप आता है अर्थात् जैसा गया है वैसे ही वापस आता है। और जो दूर से जाता है, जो मन आत्म साक्षात्कार में साधन है, और जो मन प्रकाशकों का श्रोत्र आदि इन्द्रियों का एक ही ज्योति प्रवर्तक है, सभी शरीर का चालक वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्पों से युक्त हो। अर्थात् मेरे मन में हमेशा धर्म ही हो कभी भी पाप नही हो। कर्मवान, बुद्धिमान, मेधावी जिस मन से कार्य करते हैं, जिससे बुद्धिमान यथाविधि यज्ञ का सम्पादन करते हैं, और जो अपूर्व, सभी इन्द्रियों से पूर्व जिसकी रचना हुई, सभी प्राणियों में विद्यमान और पूज्य वह मेरा मन शुभ सङ्कल्प से युक्त हो। जो मन प्रज्ञा को विशेष रूप से ज्ञान कराता है, और भी जो मन सामान्य ज्ञान को उत्पन्न करने वाला है, जो मन धृति धैर्य स्वरूप, जो मन अमरण धर्मी, जो मन प्रजाओं में अन्तर वर्तमान होने से सभी इन्द्रियों का प्रकाशक है, जिसके बिना कोई भी कार्य पूर्ण नही किया जा सकता है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जिस मन के द्वारा यह सभी सब कुछ जाना गया है, और जिस मन से भूतकाल सम्बन्धी वस्तु, वर्तमानकाल सम्बन्धी वस्तु, और भविष्यत्काल सम्बन्धी वस्तु का ज्ञान होता है, जिस मन के द्वारा होतृमैत्रावरुण आदि सात होता युक्त अग्निष्टोमयज्ञ को विस्तृत करते है वह मेरा मन शुभसङ्कल्प से युक्त हो। जैसे रथ के दोनों और आरे होते है ठीक वैसे ही मन ही सभी ऋचाओं में प्रतिष्ठित होते है। साम में प्रतिष्ठित है। और यजुर्वेद में प्रतिष्ठित है। पट में जैसे ओत-प्रोतरूप से धागे विद्यमान रहते है वैसे ही जिस मन में सभी पदार्थ विषयक ज्ञान निहित है उस प्रकार का मेरा मन शुभस‌ङ्कल्पयुक्त हो। जैसे अच्छा सारथि अपने रथ के वेगयुक्त घोड़ो को इधर-उधर लेकर जाता है और जैसे उनको नियन्त्रित करता है, वैसे ही जो मन मनुष्यों को सभी कार्यों में प्रवृत्त करता है उन्हें उस कार्य में लगाता है, और जो मन हृद् देशवाशी है, और जो जरारहित, और जो उत्पन्न हुए बालकों में, युवकों में और वृद्धों में एक समान है, वह मेरा मन शुभस‌ङ्कल्प से युक्त हो।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, शिव संकल्प का विजय (१९२२), स्वाध्याय-मंडल, औंध (पृ० ७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Yoga]]&lt;br /&gt;
[[Category:Psychology]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
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		<title>Shiva Sankalpa Sukta (शिवसंकल्प सूक्त)</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: नया लेख प्रारंभ - शिवसंकल्प सूक्त&lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
शुक्लयजुर्वेद के चतुस्त्रिंशत् (४३) अध्याय के प्रारम्भिक छह मंत्रों को सामूहिक रूप से शिवसंकल्पसूक्त कहा जाता है। ये मंत्र अपनी संरचना, भाववस्तु तथा संदेश की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इस सूक्त में ‘शिवसंकल्प’ का तात्पर्य शुभ, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है, जिसे मानव अपने आचरण में धारण करता है। जैसा संकल्प मन में उत्पन्न होता है, वैसा ही आचरण विकसित होता है और उसी के अनुरूप कर्म का स्वरूप निर्धारित होता है। इस प्रकार समस्त कर्मों का मूलाधार मन को स्वीकार किया गया है। सूक्त के प्रत्येक मंत्र के अंत में ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ - अर्थात् मेरा मन शुभ विचारों से युक्त हो - इस भावना की पुनरावृत्ति की गई है। सूक्त में मन के स्वरूप, उसकी प्रवृत्तियों तथा उसके नियंत्रण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया है। आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह सूक्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें मानसिक शुद्धता को आचरण की शुद्धता का आधार माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
मन के विषय में वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन किया है। शिवसंकल्पसूक्त के संदर्भ में ऋषि यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य को केवल शारीरिक एवं वाचिक पापों से ही नहीं, अपितु मानसिक दोषों से भी स्वयं को दूर रखना चाहिए। मन में उत्पन्न होने वाले संकल्प यदि शुभ और श्रेयस्कर हों, तभी जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे वश में रखना दुष्कर कार्य है। इसी कारण ऋषि बार-बार मन को शुभ एवं पवित्र संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Yoga]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Adoption_(%E0%A4%A6%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95)&amp;diff=137531</id>
		<title>Adoption (दत्तक)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Adoption_(%E0%A4%A6%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95)&amp;diff=137531"/>
		<updated>2025-12-13T19:10:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दत्तक (संस्कृत: दत्तकः) का शब्दार्थ है- किसी परकीय बालक को विधिवत् स्वीकार कर उसे अपना पुत्र बनाना, इसे पुत्रीकरण भी कहा जाता है। वैदिक तथा धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के अनुसार दत्तक-ग्रहण की प्रक्रिया के माध्यम से परिवार एवं वंशपरंपरा की निरंतरता, पितृ-ऋण की पूर्ति, श्राद्ध-कर्म की परंपरा तथा सामाजिक दायित्वों का सतत निर्वाह सुनिश्चित किया जाता है। दत्तक संबंध मात्र भावनात्मक नहीं माना गया, अपितु दत्तक-पुत्र को औरस पुत्र के तुल्य वैध अधिकार प्रदान किए जाते थे। मनु, याज्ञवल्क्य, वसिष्ठ, बौधायन, दत्तक-मीमांसा, दत्तक-चन्द्रिका आदि प्रमुख धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में दत्तक-विधि से संबंधित विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
दत्तक का सामान्य आशय है- किसी अन्य की संतान को विधिवत् स्वीकार कर अपना बनाना। यह एक ऐसी विधि है जिसके माध्यम से संतानहीन व्यक्ति के हितों की पूर्ति होती है। दत्तक-विधान सन्तानविहीन को सन्तान-संपन्न बनाने का साधन है। जब एक व्यक्ति किसी अन्य को अपना अपत्य प्रदान करता है, तब संतान के इस आदान-प्रदान के संस्कार को दत्तक कहा जाता है। भारतीय परंपरा में संतानहीनता की समस्या का समाधान अत्यन्त प्राचीन काल से ही दत्तक के रूप में विकसित हो चुका था और इसे सदैव एक धार्मिक कृत्य के रूप में ही देखा गया। शास्त्रीय वाङ्मय में यह उल्लेख प्राप्त होता है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;शुक्रशोणितसम्भवः पुत्त्रो मातापितृनिमित्तकः। तस्य प्रदानविक्रयत्यागेषु मातापितरौ प्रभवतः॥&lt;br /&gt;
नत्वेकं पुत्त्रं दद्यात् प्रतिगृह्णीयाद्वा स हि सन्तानाय पूर्ब्बेषाम्। स्त्री पुत्त्रं न दद्यात् प्रतिगृह्णीयाद्वा अन्यत्रानुज्ञानाद्भर्त्तुः॥ (शब्द कल्पद्रुम)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;संतान उत्पन्न करने या दत्तक के रूप में संतान देने-लेने का अधिकार माता-पिता के समीचीन कर्तव्यों से संबद्ध है। शुक्र (बीज) एवं शोणित से उत्पन्न संतान अपने जन्म हेतु माता एवं पिता की ऋणी मानी गई है; अतः माता-पिता संतानहीन को स्व-संतान देने में समर्थ हैं। किन्तु जैसा कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः। पितॄणामनृणश्चैव स तस्माल्लब्धमर्हति॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय ९, श्लोक १०६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;कोई व्यक्ति अपने एकमात्र पुत्र को न तो किसी अन्य को प्रदान करे और न ही बिना उचित विचार के किसी अन्य का पुत्र स्वीकार करे, क्योंकि वंश-परंपरा को आगे बढ़ाना तथा पूर्वजों के कुल का संरक्षण करना प्रथम पुत्र का दायित्व है। शास्त्र यह भी निर्देश देते हैं कि पत्नी को पति की आज्ञा के बिना संतान को देना या स्वीकार करना उचित नहीं है। याज्ञवल्क्य स्मृति में -&amp;lt;blockquote&amp;gt;दद्यान्माता पिता वा यं स पुत्रो दत्तको भवेत्॥(याज्ञवल्क्य स्मृति २.१३०)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्य स्मृति], व्यवहाराध्याय २, दायविभाग प्रकरण, श्लोक १३०।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;मनुस्मृति में दत्तक का उल्लेख प्राप्त होता है, कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;माता पिता वा दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि।  सदृशं प्रीतिसंयुक्तं स ज्ञेयो दत्रिमः सुतः॥ (मनु स्मृति  ९.१६८)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय ९, श्लोक १६८।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ-''' आपातकाल में माता-पिता जब विधि-विधानपूर्वक तथा समान रूप से प्रसन्नचित्त होकर समान वर्ण के किसी व्यक्ति को अपना पुत्र दे दें, तो वह दत्तक (दत्रिम) पुत्र कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धर्मशास्त्र में पुत्र==&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परंपरा में परिवार की संकल्पना विवाह से आरम्भ होकर सन्तति द्वारा पूर्ण मानी गई है। विवाह का एक प्रमुख उद्देश्य सन्तानोत्पत्ति है, इसके अभाव में मनुष्य को पारिवारिक दृष्टि से अपूर्ण माना गया है। इसी कारण धर्मशास्त्रों में पुत्रप्राप्ति हेतु पुंसवन आदि संस्कारों का विधान मिलता है। शास्त्रों के अनुसार पुत्र वंशपरम्परा का संवाहक होने के साथ-साथ धार्मिक कर्तव्यों विशेषतः श्राद्धादि कर्मों का अधिकारी भी माना गया है। धर्मशास्त्रों में पुत्रों के विविध प्रकारों का उल्लेख मिलता है। यद्यपि उनकी संख्या, नाम तथा अधिकारों के विषय में स्मृतिकारों के मतों में भिन्नता दिखाई देती है, तथापि मनुस्मृति में इस विषय का सुव्यवस्थित निरूपण प्राप्त होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्रों में मनुष्य पर तीन ऋण माने गए हैं- देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण। पितृऋण की निवृत्ति श्राद्ध, तर्पण एवं वंशवृद्धि द्वारा होती है, जिसका प्रमुख साधन पुत्र है। इसी कारण मनु, याज्ञवल्क्य, नारद आदि स्मृतिकारों ने पुत्र को धार्मिक कर्तव्यों का अधिकारी स्वीकार किया है। मनुस्मृति में कहा गया है कि पुत्र पिता का प्रतिरूप होता है- वह न केवल संपत्ति का उत्तराधिकारी है, अपितु धर्म का भी वाहक है।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधकर्त्री- डॉ. प्रीति श्रीवास्तव, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/161350 स्मृति साहित्य में दायभाग विचार: एक तुलनात्मक अध्ययन] (2009), अध्याय- 5, शोधकेंद्र- एस. एन. डी. टी. महिला विश्वविद्यालय, मुंबई (पृ० १९७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुत्रों के प्रकार==&lt;br /&gt;
गौतम (२८।३०-३१), बौधायन (२।२।१४-३७), वसिष्ठ (१७।१२-१३), अर्थशास्त्र (३।७), शंख-लिखित (२८-१३२), नारद (दायभाग; व्यवहाराध्याय २०)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF/%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%83 नारद स्मृति], व्यवहारपद, अध्याय १३, श्लोक ४५।&amp;lt;/ref&amp;gt;, हारीत, मनु (९।१५८-१६०), याज्ञवल्क्य (४५-४६)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्य स्मृति], व्यवहाराध्याय, दायभागप्रकरण, अध्याय २, श्लोक १२६।&amp;lt;/ref&amp;gt;, कात्यायन, बृहस्पति, देवल, विष्णु (१५।१-३०), महाभारत (आदिपर्व १२०।३१-३४), ब्रह्मपुराण तथा यम आदि धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में पुत्रों के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख प्राप्त होता है। इन ग्रंथों में पुत्रों की संख्या, नामकरण, क्रम तथा महत्त्व को लेकर पर्याप्त मतभेद दृष्टिगोचर होता है। प्रत्येक आचार्य ने सामाजिक, धार्मिक एवं उत्तराधिकार संबंधी दृष्टि से पुत्रों की कोटि का निर्धारण अपने-अपने सिद्धांतों के अनुसार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऋग्वेदीय वचन में पुत्र को पिता की आत्मा तथा दीर्घायु का साधन कहा गया है। क्रमशः यह धारणा विकसित हुई कि पुत्र ‘पुत्’ नामक नरक से पिता का उद्धार करता है- जिसका उल्लेख मनु, महाभारत (आदिपर्व) और विष्णुधर्मसूत्र में मिलता है। प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में पुत्र का पिण्डदान से घनिष्ठ सम्बन्ध स्पष्ट नहीं है, किन्तु सूत्रों और स्मृतियों (विशेषतः मनु) में पिण्डदान द्वारा पितृकल्याण पर बल दिया गया है। मनु के अनुसार पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र पितरों को पिण्ड प्रदान कर प्रशंसा के पात्र होते हैं; पुत्र से उच्च लोक, पौत्र से अमरता और प्रपौत्र से सूर्यलोक की प्राप्ति बतायी गयी है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;पुत्रेण लोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते। अथ पुत्रस्य पौत्रैण व्रध्नस्याप्नोति विष्टपम्॥ (मनु ९।१३७)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;विष्णुधर्मसूत्र और बृहस्पति-स्मृति में बहुपुत्रकामना का आधार गया-श्राद्ध, यज्ञ, दान और लोककल्याण (तालाब, चिकित्सालय, वृक्षारोपण, मन्दिर आदि) बताया गया है; मत्स्यपुराण भी इसी परम्परा की पुष्टि करता है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तदेतदृक्श्लोकाभ्यामभ्युक्तम्। अङ्गादङ्गात् संभवसिहृदयादधिजायसे। आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम्॥ (निरुक्त ४।३)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बौधायनगृह्यपरिभाषा (१।२।५) में उद्धृत है- &amp;lt;blockquote&amp;gt;पुदिति नरकस्याख्या दुःखं च नरकं विदुः। पुदित्राणात्ततः पुत्रमिहेच्छन्ति परत्र च॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;शंख-लिखित (वि०र०, पृ० ५५५) का कहना है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;आत्मा पुत्र इति प्रोक्तः पितुर्मातुरनुग्रहात्। पुन्नाम्नस्त्रायते यस्मात्पुत्त्रस्तेनासि संज्ञितः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोपि गयां व्रजेत्। यजेत् वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्॥ (विष्णु ८५।६७)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कांक्षन्ति पितरः पुत्रान्नरकापातभोरवः । गयां यास्यति यः कश्चित्सोस्मान्सन्तारयिष्यति॥(अत्रिस्मृति-५५)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
करिष्यति वृषोत्सर्गमिष्टापूतं तथैव च। पालयिष्यति वृद्धत्वे श्रद्धं दास्यति चान्वहम्॥ (बृहस्पति, परा० मा० ११२, ५० ३०५)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;विशेषतः मनुस्मृति में पुत्र-वर्गीकरण को अपेक्षाकृत सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ बारह प्रकार के पुत्रों का उल्लेख करते हुए उनकी संख्या, श्रेणी एवं सामाजिक मान्यता पर विचार किया गया है। मनु द्वारा प्रतिपादित इस वर्गीकरण के आधार पर निर्मित निम्नलिखित तालिका पुत्रों की कोटि, उनके क्रम तथा महत्त्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है, जो अन्य स्मृतिकारों की तुलनात्मक समीक्षा हेतु एक सुदृढ़ आधार प्रदान करती है -&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० विभा, [https://ia800408.us.archive.org/34/items/DharmaShastraSahityaMeinApradhEvamDandVidhanDr.Vibha/Dharma%20Shastra%20Sahitya%20Mein%20Apradh%20Evam%20Dand%20Vidhan%20-%20Dr.%20Vibha.pdf धर्मशास्त्र साहित्य में अपराध एवं दण्ड विधान] (२००२), संस्कृत ग्रन्थागार-संस्कृत नगर, दिल्ली (पृ० १२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;पुत्रान्द्वादश यानाह नॄणां स्वायंभुवो मनुः। तेषां षड्बन्धुदायादाः षडदायादबान्धवाः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च। गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवाश्च षट्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कानीनश्च सहोढश्च क्रीतः पौनर्भवस्तथा। स्वयंदत्तश्च शौद्रश्च षडदायादबान्धवाः॥ (मनु स्मृति ९.१५८-१६०)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;स्वायम्भुव मनु ने मनुष्यों के बारह प्रकार के पुत्र बताए हैं। इन्हें दो वर्गों में बाँटा गया है- षड् बन्धु दायाद ये पुत्र कुटुम्ब से सम्बद्ध हैं और उत्तराधिकार के अधिकारी माने गए हैं, औरस (स्वाभाविक), क्षेत्रज, दत्त (दत्तक), कृत्रिम, गूढोत्पन्न, अपविद्ध और षड् दायाद-अबान्धव ये छः उत्तराधिकार के पात्र तो हैं, पर रक्त-सम्बन्ध (बन्धुता) नहीं रखते- कानीन, सहोढ, क्रीत, पौनर्भव, स्वयंदत्त, और शौद्र।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+विभिन्न प्रकार के पुत्र&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० पाण्डुरंग वामन काणे, [https://archive.org/details/GaMX_dharma-shastra-ka-itihas-part-2-of-dr.-panduranga-vamana-kane-hindi-trans-by-arj/page/n334/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास-द्वितीय भाग], उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (पृ० ८79)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
!पुत्रों के प्रकार&lt;br /&gt;
(मनु के अनुसार)&lt;br /&gt;
!गौतम&lt;br /&gt;
!बौधायन&lt;br /&gt;
!कौटिल्य&lt;br /&gt;
!वसिष्ठ&lt;br /&gt;
!हारीत&lt;br /&gt;
!शंख-लिखित&lt;br /&gt;
!याज्ञवल्क्य&lt;br /&gt;
!नारद&lt;br /&gt;
!बृहस्पति&lt;br /&gt;
!देवल&lt;br /&gt;
!विष्णु&lt;br /&gt;
!आदिपर्व&lt;br /&gt;
!यम&lt;br /&gt;
!ब्रह्मपुराण&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|1.औरस&lt;br /&gt;
|1&lt;br /&gt;
|1&lt;br /&gt;
|1&lt;br /&gt;
|1&lt;br /&gt;
|1&lt;br /&gt;
|1&lt;br /&gt;
|1&lt;br /&gt;
|1&lt;br /&gt;
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|1&lt;br /&gt;
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|2. पुत्रिकापुत्र&lt;br /&gt;
|10&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
|3&lt;br /&gt;
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|3&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
|3&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|3. क्षेत्रज&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
|3&lt;br /&gt;
|3&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
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|3&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
|3&lt;br /&gt;
|3&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
|3&lt;br /&gt;
|2&lt;br /&gt;
|3&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|4. दत्त&lt;br /&gt;
|3&lt;br /&gt;
|4&lt;br /&gt;
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|5. कृत्रिम&lt;br /&gt;
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|6. गूढोत्पन्न&lt;br /&gt;
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|7. अपविद्ध&lt;br /&gt;
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|8. कानीन&lt;br /&gt;
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|9. सहोढ़&lt;br /&gt;
|8&lt;br /&gt;
|9&lt;br /&gt;
|7&lt;br /&gt;
|7&lt;br /&gt;
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|10. क्रीत&lt;br /&gt;
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|11. पौनर्भव&lt;br /&gt;
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|12. स्वयंदत्त&lt;br /&gt;
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|13. शौद्र&lt;br /&gt;
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|}&lt;br /&gt;
'''1. औरस -''' जो पुत्र विवाह संस्कार युक्त समान वर्ण की पत्नी से उत्पन्न किया जाय तो उसे औरस पुत्र कहते हैं। यद्यपि आपस्तम्ब और बौधायन इसके लिये सवर्णा पत्नी ही आवश्यक मानते हैं। किन्तु मनुस्मृति इसका कोई बन्धन नहीं मानते हैं। औरस पुत्र की अपेक्षा अन्य पुत्रों को गौण माना गया है। मनुस्मृति के अनुसार पिता की सम्पत्ति का वास्तविक अधिकारी केवल वही है। वह गौण पुत्रों को बराबर का हिस्सा नहीं देगा, किन्तु भरण पोषण का खर्चा देगा। आशय यह है कि औरस पुत्र, अपने पिता का सच्चे रूप में अकेला ही उत्तराधिकारी होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. क्षेत्रज -''' जो पुत्र मरे हुए, नपुंसक या रोगी पति की स्त्री के द्वारा शास्त्र प्रतिपादित नियोग प्रथा से उत्पन्न होता है उसे क्षेत्रज पुत्र कहते हैं। गौण पुत्रों में क्षेत्रज का स्थान बहुत ऊँचा है। गौतम, वशिष्ठ, नारद, विष्णु और यम इसे दूसरा स्थान देते हैं। लेकिन बौधायन, कौटिल्य, याज्ञवल्क्य, देवल, महाभारत और ब्रह्मपुराण के साथ-साथ मनु तीसरा स्थान देते हैं। आपस्तम्ब ने इसका इस आधार पर निषेध किया कि क्षेत्रज पर उत्पादक का ही अधिकार है पति का नहीं। मनु इसकी घोर निन्दा करते हैं और इसको मानते हैं। क्षेत्रज पुत्र पर अधिकार के सम्बन्ध में स्मृतिकारों में बहुत विवाद हैं। आपस्तम्ब और बौधायन के अनुसार बीजी ही पुत्र का स्वामी होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. दत्तक''' - जब माता-पिता अपने सदृश (समान जातीय) किसी मनुष्य को जल से संकल्प करके प्रीतिपूर्वक अपने पुत्र को देते हैं तब उसे दत्तक पुत्र कहते हैं। गौतम और वशिष्ठ दत्तकपुत्र को आठवाँ, याज्ञवल्क्य ने सातवाँ, तथा कौटिल्य और नारद ने नवाँ स्थान दिया है। जबकि मनु ने इसे बारह पुत्रों में तीसरा स्थान देते हैं। मनु दत्तक पुत्रों को माता-पिता को कठिनाई देने वाला मानते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. कृत्रिम''' - जब गुण दोष के विचार में चतुर पुत्र के गुणों से युक्त अपने सदृश (समान-जातीय) बालक को अपना पुत्र बनाया जाय, तो कृत्रिम पुत्र कहलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''5. गूढज''' - यदि किसी परिवार के पुत्र के बारे में ज्ञान नहीं है, कि वह किसके वीर्य से उत्पन्न हुआ है, तो उसे गूढोत्पन्न मान, उसी आर्या के पति का पुत्र माना जाता है। वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य तथा कौटिल्य ने भी इसका उल्लेख किया है। यह पुत्र प्रभावित व्यभिचार वाला नहीं, किन्तु संदिग्ध पितृत्व वाला माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''6. अपविद्ध''' - जब माता-पिता या दोनों में से कोई एक अपने पुत्र छोड़ दें और कोई दूसरा ग्रहण कर ले तो वह अपविद्ध पुत्र कहलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''7. कानीन -''' कन्या अवस्था में पिता के घर उत्पन्न पुत्र कानीन पुत्र कहलाता है। मनु के साथ-साथ विष्णु, नारद तथा ब्रह्मपुराण कानीन पुत्र पर उस कन्या के साथ विवाह करने वाले का स्वामित्व स्वीकार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''8. सहोढ़ -''' बिना जाने अथवा जानकर जब गर्भवती कन्या से विवाह किया जाता है, तो उस पुत्र को सहोढ़ पुत्र कहते हैं। वह पुत्र विवाह करने वाले का होता है। सहोढ़ को पुत्रों की सुची में गूढ़ज के पश्चात् रखा गया है। क्योंकि गर्भवती कन्या के साथ विवाह लज्जास्पद माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''9. क्रीतक -''' पुत्र बनाने के लिए जिस पुत्रको माता-पिता से मूल्य देकर खरीद लिया जाता है तो वह क्रीत या क्रीतक पुत्र कहलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''10. पौनर्भव -''' जब स्त्री पति द्वारा छोड़े जाने पर अथवा विधवा होने पर अपनी इच्छा से पुनः अन्य पुरुष की भार्या बनकर जब पुत्र उत्पन्न करती है, तो वह पुनर्भव कहलाता है। विधवा विवाह को बुरा माने जाने से पुनर्भव पुत्र को औरस होते हुए भी बड़ी हीन स्थिति प्रदान की गई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''11. स्वयंदत्त -''' माता पिता से हीन अनाथ या बिना कारण माता द्वारा छोड़ा हुआ जो पुत्र स्वयं जाकर, किसी का पुत्र बनता है। तो वह उस लेने वाले का स्वयंदत्त पुत्र होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''12. पारशव -''' जिस पुत्र को ब्राह्मण कामवश शूद्र से उत्पन्न करे उसको पारशव कहते हैं। स्मृतिकारों ने ब्राह्मण के शूद्र के साथ विवाह की घोर निन्दा की है। इसी कारण पारशव या निषाद संज्ञा को 12 पुत्रों में बहुत नीचा स्थान दिया गया है। पारशव के सम्पत्ति के अधिकार को केवल कौटिल्य ने स्वीकार किया है। कौटिल्य के अनुसार पारशव को पैतृक सम्पत्ति का तीसरा हिस्सा प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पुत्री का पुत्र व दौहित्र -''' औरस पुत्र के अभाव में पिता वंश चलाने के लिए जब लड़की के लड़के को अपना पुत्र बना लेता था, तब वह पुत्री का पुत्र कहलाता है। पिता अपनी भ्रातृहीन पुत्री का विवाह करने से पहले जामाता के साथ स्पष्ट रूप से यह समझौता कर लेता है कि इससे उत्पन्न सन्तान मेरी होगी। मनु की दृष्टि में पौत्र और दोहित्र में कोई अन्तर नहीं है। 21 मनु के साथ-साथ बौधायन कौटिल्य, याज्ञवल्क्य और महाभारत में उसे औरस के बाद दूसरा स्थान देते हैं। विष्णु, वशिष्ठ, गौतम, पुत्रों की सूची में इसे बहुत बाद में रखते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार मनु ने पुत्रों के बारह प्रकारों के साथ-साथ दौहित्र व पुत्रि का पुत्र के जन्म व उनके अधिकारों की विशद विवेचना की है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दत्तक विधि की उपयोगिता॥ Usefulness of adopted method==&lt;br /&gt;
दत्तक-विधान के अंतर्गत प्रमुख विषयों में सम्मिलित हैं-पुत्रीकरण का उद्देश्य, महर्षि अत्रि द्वारा स्पष्ट किया गया है, जिसके अनुसार केवल पुत्रहीन व्यक्ति को ही सभी विधियों से पुत्र-प्रतिनिधि स्वीकार करना चाहिए, जिससे पिण्ड और उदक रूप में तर्पण का प्राप्तिकार्य सम्भव हो सके - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अपुत्रेण सुतः कार्यो यादृक् तादृक् प्रयत्नतः। पिण्डोदकक्रियाहेतोर्नामसंकीर्तनाय च॥ (दत्तकचन्द्रिका पृ०२)&amp;lt;ref&amp;gt;श्री कुबेर भट्ट, [https://archive.org/details/DkSE_dattaka-chandrika-of-shri-kubera-bhatta-with-shankari-commentary-ed-by-vinayaka-/page/n3/mode/1up दत्तकचन्द्रिका] (१९४२), आनन्दाश्रमसंस्कृतग्रन्थावलि (पृ० २)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;दत्तकचन्द्रिका ने अत्रि-वचन तथा मनु के दृष्टिकोण के आधार पर पुत्रीकरण के दो उद्देश्य निर्धारित किए हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#पिण्डोदक क्रिया की सिद्धि&lt;br /&gt;
#नाम-संकीर्तन की निरंतरता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका आशय यह है कि दत्तक का मूल लक्ष्य पिण्ड एवं उदक द्वारा धार्मिक कर्तव्य का निर्वहन और गोद लेने वाले के नाम तथा कुल की अविच्छिन्न परंपरा को बनाए रखना है। सामान्यतः पुत्रीकरण करने वाले का ध्येय धार्मिक माना जाता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;डॉ० पाण्डुरंग वामन काणे, [https://archive.org/details/GaMX_dharma-shastra-ka-itihas-part-2-of-dr.-panduranga-vamana-kane-hindi-trans-by-arj/page/n334/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास-द्वितीय भाग], उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (पृ० ८९२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितुर्गोत्रेण यः पुत्रः संस्कृतः पृथिवीपते। आचूडान्तं न पुत्रः न पुत्रतां याति चान्यतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूडोपनयसंस्कारा निजगोत्रेण वै कृताः। दत्ताद्यास्तनयास्ते स्युरन्यथा दास उच्यते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊर्ध्वं तु पञ्चमाद्वर्षान्न दत्ताद्याः सुताः नृप। गृहीत्वा पंचवर्षीयं पुत्रेष्टिं प्रथमं चरेत्॥ (दत्तक चन्द्रिका ३१-३३)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''भाषार्थ -''' चूडाकरण संस्कार बहुधा तीसरे वर्ष में किया जाता है, बच्चे के सिरपर जो शिखा या केश-गुच्छ छोडे जाते हैं वे पिता के गोत्र के प्रवर ऋषियों की संख्या पर निर्भर रहते हैं। अतः यदि ऐसा पुत्र, जो असगोत्र है, चूडाकरण के उपरान्त गोद लिया जाता है, तो उसकी स्थिति यों होगी कि उसके कुछ संस्कार एक गोत्र के साथ हुये होंगे तथा अन्य संस्कार दूसरे गोत्र से, अर्थात वह इस प्रकार दो गोत्रों का कहा जायगा। इसे दूर करने तथा गोद वाले कुल से सम्बन्ध जोडने के लिए पुत्रेष्टि संस्कार परमावश्यक है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दत्तक के रूप में पुत्र प्रदान करने वाला व्यक्ति- पुत्रीकरण में अपना पुत्र देने का प्राथमिक अधिकार पिता को प्राप्त है, और वह माता की सहमति के बिना भी यह कृत्य कर सकता है। माता बिना पति की अनुमति के अपने पुत्र को दत्तक नहीं दे सकती। जब तक पिता जीवित है और निर्णय देने में सक्षम है, तब तक माता को पुत्र-दान का अधिकार प्राप्त नहीं होता। मनु तथा याज्ञवल्क्य के अनुसार, यदि पिता का निधन हो गया हो, वह संन्यास ग्रहण कर चुका हो, अथवा निर्णय देने में अयोग्य हो, तब माता अकेले भी पुत्र को दत्तक प्रदान कर सकती है; परन्तु यदि पिता ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस कृत्य से निषेध किया हो, तो माता भी दत्तक-दान के लिए अयोग्य मानी जाती है। माता और पिता दोनों के देहांत होने की अवस्था में न तो पितामह, न विमाता, और न ही भ्राता कोई भी दत्तक रूप में नहीं दे सकते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अयं च दत्तको द्विविधः केवलो द्व्यामुष्यायणश्च। सविदं विना दत्त आद्यः। आवयोरसाविति संविदा दत्तस्त्वन्त्यः॥ (व्यवहार मयूख पृ० ११४)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केवलदत्तकः द्व्यामुष्यायणदत्तकश्च। केवलदत्तको जनकेन प्रतिग्रहीत्रर्थमेव दत्तः तस्यैव पुत्त्रः। द्व्यामुष्यायणस्तु जनकप्रति- ग्रहीतृभ्यामावयोरयमितिसंप्रतिपन्नः स उभयोरपि पुत्त्रः इति॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति-मिताक्षरा टीका)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;मिताक्षरा के अनुसार दत्तक का स्वरूप द्विविध माना गया है - केवल-दत्तक तथा द्व्यामुष्यायण-दत्तक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''केवल-दत्तक -''' वह बालक है जिसे जनक (जन्मदाता) अकेले प्रतिग्रही (दत्तक ग्रहणकर्ता) के उद्देश्य से प्रदान करता है। इस प्रकार दिया गया पुत्र केवल उसी प्रतिग्रही का कानूनी एवं धार्मिक अर्थों में पुत्र माना जाता है।&lt;br /&gt;
#'''द्व्यामुष्यायण-दत्तक''' - वह है जिसके विषय में जनक और प्रतिग्रही - दोनों की यह संयुक्त स्वीकृति होती है कि यह पुत्र हम दोनों का है। परिणामस्वरूप, ऐसा दत्तक-पुत्र दोनों पक्षों का पुत्र माना जाता है और दोनों वंशों में उसका समन्वित उत्तराधिकार स्वीकार किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
गोत्र ऋक्थे जनयितुर्न हरेद्दत्त्रिमः सुतः। गोत्रऋक्थानुगः पिण्डो व्यपैति ददतः स्वधा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितुर्गोत्रेण यः पुत्त्रः संस्कृतः पृथिवीपते। आचूडान्तं न पुत्त्रः स पुत्त्रतां याति चान्यतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूडाद्या यदि संस्कारा निजगोत्रेण वै कृताः। दत्ताद्यास्तनयास्ते स्युरन्यथा दास उच्यते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊर्द्ध्वन्तु पञ्चमाद्बर्षान्न दत्ताद्याः सुता नृप। गृहीत्वा पञ्चवर्षीयपुत्त्रेष्टिं प्रथमञ्चरेत्॥ (शब्द कल्पद्रुम)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''भाषार्थ -''' दत्तक पुत्र जन्मदाता (जनक) के गोत्र और उत्तराधिकार को नहीं लेता। पिण्ड (श्राद्ध का अधिकार) दान करने वाले के गोत्र और ऋद्धि का ही अनुकरण करता है। हे पृथ्वीपति! जो पुत्र पिता के गोत्र से संस्कार ग्रहण करता है, वह चूड़ाकरण तक तो पुत्र कहलाता है, परन्तु उसके बाद यदि अन्य (गोत्र) से संस्कार हो जाए, तो वह वास्तविक पुत्रता को प्राप्त नहीं होता। यदि चूड़ाकरण आदि संस्कार स्वयं के जन्मगोत्र में सम्पन्न किए गए हों, तो दत्तक आदि पुत्र भी उसी के पुत्र माने जाते हैं; अन्यथा वे दास (सेवक) के रूप में कहे जाते हैं। हे नरेश्वर! पाँच वर्ष से अधिक आयु के बालक को दत्तक नहीं लिया जाना चाहिए। जो पाँच वर्ष का हो, उसे ग्रहण करके पहले ‘दत्तक-पुत्रेष्टि’ नामक अनुष्ठान सम्पन्न करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
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	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Adoption_(%E0%A4%A6%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95)&amp;diff=137529</id>
		<title>Adoption (दत्तक)</title>
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		<updated>2025-12-11T19:01:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: सुधार जारी&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दत्तक (संस्कृत: दत्तकः) का शब्दार्थ है- किसी परकीय बालक को विधिवत् स्वीकार कर उसे अपना पुत्र बनाना, इसे पुत्रीकरण भी कहा जाता है। वैदिक तथा धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के अनुसार दत्तक-ग्रहण की प्रक्रिया के माध्यम से परिवार एवं वंशपरंपरा की निरंतरता, पितृ-ऋण की पूर्ति, श्राद्ध-कर्म की परंपरा तथा सामाजिक दायित्वों का सतत निर्वाह सुनिश्चित किया जाता है। दत्तक संबंध मात्र भावनात्मक नहीं माना गया, अपितु दत्तक-पुत्र को औरस पुत्र के तुल्य वैध अधिकार प्रदान किए जाते थे। मनु, याज्ञवल्क्य, वसिष्ठ, बौधायन, दत्तक-मीमांसा, दत्तक-चन्द्रिका आदि प्रमुख धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में दत्तक-विधि से संबंधित विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय॥ Introduction==&lt;br /&gt;
दत्तक का सामान्य आशय है- किसी अन्य की संतान को विधिवत् स्वीकार कर अपना बनाना। यह एक ऐसी विधि है जिसके माध्यम से संतानहीन व्यक्ति के हितों की पूर्ति होती है। दत्तक-विधान सन्तानविहीन को सन्तान-संपन्न बनाने का साधन है। जब एक व्यक्ति किसी अन्य को अपना अपत्य प्रदान करता है, तब संतान के इस आदान-प्रदान के संस्कार को दत्तक कहा जाता है। भारतीय परंपरा में संतानहीनता की समस्या का समाधान अत्यन्त प्राचीन काल से ही दत्तक के रूप में विकसित हो चुका था और इसे सदैव एक धार्मिक कृत्य के रूप में ही देखा गया। शास्त्रीय वाङ्मय में यह उल्लेख प्राप्त होता है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;शुक्रशोणितसम्भवः पुत्त्रो मातापितृनिमित्तकः। तस्य प्रदानविक्रयत्यागेषु मातापितरौ प्रभवतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नत्वेकं पुत्त्रं दद्यात् प्रतिगृह्णीयाद्वा स हि सन्तानाय पूर्ब्बेषाम्। स्त्री पुत्त्रं न दद्यात् प्रतिगृह्णीयाद्वा अन्यत्रानुज्ञानाद्भर्त्तुः॥ (शब्द कल्पद्रुम)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;संतान उत्पन्न करने या दत्तक के रूप में संतान देने-लेने का अधिकार माता-पिता के समीचीन कर्तव्यों से संबद्ध है। शुक्र (बीज) एवं शोणित से उत्पन्न संतान अपने जन्म हेतु माता एवं पिता की ऋणी मानी गई है; अतः माता-पिता संतानहीन को स्व-संतान देने में समर्थ हैं। किन्तु जैसा कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः। पितॄणामनृणश्चैव स तस्माल्लब्धमर्हति॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय ९, श्लोक १०६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;कोई व्यक्ति अपने एकमात्र पुत्र को न तो किसी अन्य को प्रदान करे और न ही बिना उचित विचार के किसी अन्य का पुत्र स्वीकार करे, क्योंकि वंश-परंपरा को आगे बढ़ाना तथा पूर्वजों के कुल का संरक्षण करना प्रथम पुत्र का दायित्व है। शास्त्र यह भी निर्देश देते हैं कि पत्नी को पति की आज्ञा के बिना संतान को देना या स्वीकार करना उचित नहीं है। याज्ञवल्क्य स्मृति में -&amp;lt;blockquote&amp;gt;दद्यान्माता पिता वा यं स पुत्रो दत्तको भवेत्॥(याज्ञवल्क्य स्मृति २.१३०)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्य स्मृति], व्यवहाराध्याय २, दायविभाग प्रकरण, श्लोक १३०।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;मनुस्मृति में दत्तक का उल्लेख प्राप्त होता है, कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;माता पिता वा दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि।  सदृशं प्रीतिसंयुक्तं स ज्ञेयो दत्रिमः सुतः॥ (मनु स्मृति  ९.१६८)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय ९, श्लोक १६८।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ-''' आपातकाल में माता-पिता जब विधि-विधानपूर्वक तथा समान रूप से प्रसन्नचित्त होकर समान वर्ण के किसी व्यक्ति को अपना पुत्र दे दें, तो वह दत्तक (दत्रिम) पुत्र कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दत्तक विधि की उपयोगिता॥ Usefulness of adopted method==&lt;br /&gt;
दत्तक-विधान के अंतर्गत प्रमुख विषयों में सम्मिलित हैं-पुत्रीकरण का उद्देश्य, महर्षि अत्रि द्वारा स्पष्ट किया गया है, जिसके अनुसार केवल पुत्रहीन व्यक्ति को ही सभी विधियों से पुत्र-प्रतिनिधि स्वीकार करना चाहिए, जिससे पिण्ड और उदक रूप में तर्पण का प्राप्तिकार्य सम्भव हो सके - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अपुत्रेण सुतः कार्यो यादृक् तादृक् प्रयत्नतः। पिण्डोदकक्रियाहेतोर्नामसंकीर्तनाय च॥ (दत्तकचन्द्रिका पृ०२)&amp;lt;ref&amp;gt;श्री कुबेर भट्ट, [https://archive.org/details/DkSE_dattaka-chandrika-of-shri-kubera-bhatta-with-shankari-commentary-ed-by-vinayaka-/page/n3/mode/1up दत्तकचन्द्रिका] (१९४२), आनन्दाश्रमसंस्कृतग्रन्थावलि (पृ० २)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;दत्तकचन्द्रिका ने अत्रि-वचन तथा मनु के दृष्टिकोण के आधार पर पुत्रीकरण के दो उद्देश्य निर्धारित किए हैं - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#पिण्डोदक क्रिया की सिद्धि&lt;br /&gt;
#नाम-संकीर्तन की निरंतरता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका आशय यह है कि दत्तक का मूल लक्ष्य पिण्ड एवं उदक द्वारा धार्मिक कर्तव्य का निर्वहन और गोद लेने वाले के नाम तथा कुल की अविच्छिन्न परंपरा को बनाए रखना है। सामान्यतः पुत्रीकरण करने वाले का ध्येय धार्मिक माना जाता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;डॉ० पाण्डुरंग वामन काणे, [https://archive.org/details/GaMX_dharma-shastra-ka-itihas-part-2-of-dr.-panduranga-vamana-kane-hindi-trans-by-arj/page/n334/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास-द्वितीय भाग], उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (पृ० ८९२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितुर्गोत्रेण यः पुत्रः संस्कृतः पृथिवीपते। आचूडान्तं न पुत्रः न पुत्रतां याति चान्यतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूडोपनयसंस्कारा निजगोत्रेण वै कृताः। दत्ताद्यास्तनयास्ते स्युरन्यथा दास उच्यते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊर्ध्वं तु पञ्चमाद्वर्षान्न दत्ताद्याः सुताः नृप। गृहीत्वा पंचवर्षीयं पुत्रेष्टिं प्रथमं चरेत्॥ (दत्तक चन्द्रिका ३१-३३)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''भाषार्थ -''' चूडाकरण संस्कार बहुधा तीसरे वर्ष में किया जाता है, बच्चे के सिरपर जो शिखा या केश-गुच्छ छोडे जाते हैं वे पिता के गोत्र के प्रवर ऋषियों की संख्या पर निर्भर रहते हैं। अतः यदि ऐसा पुत्र, जो असगोत्र है, चूडाकरण के उपरान्त गोद लिया जाता है, तो उसकी स्थिति यों होगी कि उसके कुछ संस्कार एक गोत्र के साथ हुये होंगे तथा अन्य संस्कार दूसरे गोत्र से, अर्थात वह इस प्रकार दो गोत्रों का कहा जायगा। इसे दूर करने तथा गोद वाले कुल से सम्बन्ध जोडने के लिए पुत्रेष्टि संस्कार परमावश्यक है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दत्तक के रूप में पुत्र प्रदान करने वाला व्यक्ति- पुत्रीकरण में अपना पुत्र देने का प्राथमिक अधिकार पिता को प्राप्त है, और वह माता की सहमति के बिना भी यह कृत्य कर सकता है। माता बिना पति की अनुमति के अपने पुत्र को दत्तक नहीं दे सकती। जब तक पिता जीवित है और निर्णय देने में सक्षम है, तब तक माता को पुत्र-दान का अधिकार प्राप्त नहीं होता। मनु तथा याज्ञवल्क्य के अनुसार, यदि पिता का निधन हो गया हो, वह संन्यास ग्रहण कर चुका हो, अथवा निर्णय देने में अयोग्य हो, तब माता अकेले भी पुत्र को दत्तक प्रदान कर सकती है; परन्तु यदि पिता ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस कृत्य से निषेध किया हो, तो माता भी दत्तक-दान के लिए अयोग्य मानी जाती है। माता और पिता दोनों के देहांत होने की अवस्था में न तो पितामह, न विमाता, और न ही भ्राता कोई भी दत्तक रूप में नहीं दे सकते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;अयं च दत्तको द्विविधः केवलो द्व्यामुष्यायणश्च। सविदं विना दत्त आद्यः। आवयोरसाविति संविदा दत्तस्त्वन्त्यः॥ (व्यवहार मयूख पृ० ११४)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केवलदत्तकः द्व्यामुष्यायणदत्तकश्च। केवलदत्तको जनकेन प्रतिग्रहीत्रर्थमेव दत्तः तस्यैव पुत्त्रः। द्व्यामुष्यायणस्तु जनकप्रति- ग्रहीतृभ्यामावयोरयमितिसंप्रतिपन्नः स उभयोरपि पुत्त्रः इति॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति-मिताक्षरा टीका)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;मिताक्षरा के अनुसार दत्तक का स्वरूप द्विविध माना गया है - केवल-दत्तक तथा द्व्यामुष्यायण-दत्तक।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''केवल-दत्तक -''' वह बालक है जिसे जनक (जन्मदाता) अकेले प्रतिग्रही (दत्तक ग्रहणकर्ता) के उद्देश्य से प्रदान करता है। इस प्रकार दिया गया पुत्र केवल उसी प्रतिग्रही का कानूनी एवं धार्मिक अर्थों में पुत्र माना जाता है।&lt;br /&gt;
#'''द्व्यामुष्यायण-दत्तक''' - वह है जिसके विषय में जनक और प्रतिग्रही - दोनों की यह संयुक्त स्वीकृति होती है कि यह पुत्र हम दोनों का है। परिणामस्वरूप, ऐसा दत्तक-पुत्र दोनों पक्षों का पुत्र माना जाता है और दोनों वंशों में उसका समन्वित उत्तराधिकार स्वीकार किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष॥ Conclusion==&lt;br /&gt;
गोत्र ऋक्थे जनयितुर्न हरेद्दत्त्रिमः सुतः। गोत्रऋक्थानुगः पिण्डो व्यपैति ददतः स्वधा॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितुर्गोत्रेण यः पुत्त्रः संस्कृतः पृथिवीपते। आचूडान्तं न पुत्त्रः स पुत्त्रतां याति चान्यतः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूडाद्या यदि संस्कारा निजगोत्रेण वै कृताः। दत्ताद्यास्तनयास्ते स्युरन्यथा दास उच्यते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊर्द्ध्वन्तु पञ्चमाद्बर्षान्न दत्ताद्याः सुता नृप। गृहीत्वा पञ्चवर्षीयपुत्त्रेष्टिं प्रथमञ्चरेत्॥ (शब्द कल्पद्रुम)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''भाषार्थ -''' दत्तक पुत्र जन्मदाता (जनक) के गोत्र और उत्तराधिकार को नहीं लेता। पिण्ड (श्राद्ध का अधिकार) दान करने वाले के गोत्र और ऋद्धि का ही अनुकरण करता है। हे पृथ्वीपति! जो पुत्र पिता के गोत्र से संस्कार ग्रहण करता है, वह चूड़ाकरण तक तो पुत्र कहलाता है, परन्तु उसके बाद यदि अन्य (गोत्र) से संस्कार हो जाए, तो वह वास्तविक पुत्रता को प्राप्त नहीं होता। यदि चूड़ाकरण आदि संस्कार स्वयं के जन्मगोत्र में सम्पन्न किए गए हों, तो दत्तक आदि पुत्र भी उसी के पुत्र माने जाते हैं; अन्यथा वे दास (सेवक) के रूप में कहे जाते हैं। हे नरेश्वर! पाँच वर्ष से अधिक आयु के बालक को दत्तक नहीं लिया जाना चाहिए। जो पाँच वर्ष का हो, उसे ग्रहण करके पहले ‘दत्तक-पुत्रेष्टि’ नामक अनुष्ठान सम्पन्न करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Adoption_(%E0%A4%A6%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95)&amp;diff=137527</id>
		<title>Adoption (दत्तक)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Adoption_(%E0%A4%A6%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95)&amp;diff=137527"/>
		<updated>2025-12-09T03:50:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: नया लेख प्रारंभ - दत्तक&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;दत्तक (संस्कृतः दत्तकः) का शाब्दिक अर्थ है, दूसरे की सन्तान को अपना बनाना। वैदिक एवं धर्मशास्त्रीय वचनों के अनुसार, दत्तक-ग्रहण द्वारा परिवार, वंश, पितृ-ऋण, श्राद्ध-कर्म तथा सामाजिक दायित्वों की निरंतरता सुनिश्चित होती है। दत्तक को केवल भावनात्मक संबंध नहीं माना गया, अपितु उसे माता-पिता के वास्तविक पुत्र के समान अधिकार भी प्रदान किए जाते थे। धर्मशास्त्रों- मनु, याज्ञवल्क्य, दत्तक-मीमांसा, दत्तक-चंद्रिका, वसिष्ठ, बौधायन आदि—ने दत्तक विधान के संदर्भ में विस्तृत वर्णन किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
दत्तक की विधि संतानहीन को व्यक्ति को संतानवान करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%8F%E0%A4%B5%E0%A4%82_%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95&amp;diff=137526</id>
		<title>सनातनधर्म के आचार विचार एवं वैज्ञानिक तर्क</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%8F%E0%A4%B5%E0%A4%82_%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95&amp;diff=137526"/>
		<updated>2025-12-02T20:04:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सनातन अर्थात् अनादि,शाश्वत, सत्य,नित्य,भ्रम संशय रहित धर्म का वह स्वरूप जो  परंपरा से चला आता हुआ है ।धर्म शब्द का अर्थ ही है कि जो धारण करे अथवा जिसके द्वारा यह विश्व धारण किया जा सके, क्योंकि धर्म &amp;quot;धृञ धारणे&amp;quot; धातु से बना है जिसका अर्थ है - धारयतीति धर्मः अथवा येनैतद्धार्यते स धर्मः ।&amp;lt;ref&amp;gt;सनातन धर्म का वैज्ञानिक रहस्य,श्री बाबूलाल गुप्त,१९६६(पृ०२२)।&amp;lt;/ref&amp;gt; धर्म वास्तव में संसार की स्थिति का मूल है, धर्म मूल पर ही सकल संसार वृक्ष स्थित है। धर्म से पाप नष्ट होते है तथा अन्य लोग धर्मात्मा पुरुष का अनुसरण करके कल्याण को प्राप्त होते हैं।&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
मानवके विधिबोधित क्रिया-कलापोंको आचारके नामसे सम्बोधित किया जाता है।आचार-पद्धति ही सदाचार या शिष्टाचार कहलाती है। मनीषियोंने पवित्र और सात्त्विक आचारको ही धर्मका मूल बताया है - धर्ममूलमिदं स्मृतम्। धर्मका मूल श्रुति- स्मृतिमूलक आचार ही है इतना ही नहीं, षडङ्ग-वेद ज्ञानी भी यदि आचार से हीन हो तो वेद भी उसे पवित्र नहीं बनाते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारहीनं न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्भिरङ्गैः । आचारहीनेन तु धर्मकार्यं कृतं हि सर्वं भवतीह मिथ्या ।।(वि०धर्मोत्तरपुराण)&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीविष्णुधर्मोत्तरे तृ० ख०(अध्यायाः २४६-२५०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;वैदिक सनातन परम्परा में विदित है कि यज्ञ, तप, दान आदि के द्वारा ईश्वर की उपासना वेद का परम लक्ष्य है। उपर्युक्त यज्ञादि कर्म काल पर आश्रित हैं और इस परम पवित्र कार्य के लिये काल का विधायक शास्त्र ज्योतिषशास्त्र है। वेद किसी एक विषय पर केन्द्रित रचना नहीं हैं। विविध विषय और अनेक अर्थ को द्योतित करने वाली मन्त्र राशि वेदों में समाहित है। अतः वेद चतुष्टय सर्वविद्या का मूल है। भारतीय ज्ञान परम्परा की पुष्टि वेद में निहित है। कोई भी विषय मान्य और भारतीय दृष्टि से संवलित तभी माना जायेगा जब उसका सम्बन्ध वेद चतुष्टय में कहीं न कहीं समाहित हो। वेद चतुष्टय में ज्योतिष के अनेक अंश अन्यान्य संहिताओं में दृष्टिगोचर होते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः। नित्यो धर्मः सुख दुःखे त्वनित्ये, जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः॥&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत,स्वर्गारोहणपर्व,(अ०५ श् ० ७६)।&amp;lt;/ref&amp;gt;(महा०स्वर्गा० ५/76)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् कामना से, भय से. लोभ से अथवा जीवन के लिये भी धर्म का त्याग न करे । धर्म ही नित्य है, सुख दु:ख तो अनित्य हैं। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य हैं और उसके बन्धन का हेतु अनित्य है । अतः अनित्य के लिये नित्य का परित्याग कदापि न करे । इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति धर्म का पालन करता है तो धर्म ही उसकी रक्षा करता है तथा नष्ट हुआ धर्म ही उसे मारता है अतः धर्म का पालन करना चाहिये । नारायणोपनिषद् में कहा है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा, लोके धर्मिष्ठं प्रजा उपसर्पन्ति, धर्मेण पापमपनुदति,धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितं,तस्माद्धर्म परमं वदन्ति।&amp;lt;ref&amp;gt;मन्त्रपुष्पम् स्वमीदेवरूपानन्दः,रामकृष्ण मठ,खार,मुम्बई(नारायणोपनिषद ७९)पृ० ६१।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आचार को प्रथम धर्म कहा है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारः प्रथमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च। तस्मादस्मिन्समायुक्तो नित्यं स्यादात्मनो द्विजः ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचाराल्लभते चायुराचाराल्लभते प्रजाः। आचारादन्नमक्षय्यमाचारो हन्ति पातकम् ॥&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्देवीभागवत,उत्तरखण्ड,गीताप्रेस गोरखपुर,(एकादश स्कन्ध अ० 1श्० 9/10 पृ० 654)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु-''' आचार ही प्रथम (मुख्य) धर्म है-ऐसा श्रुतियों तथा स्मृतियोंमें कहा गया है, अतएव द्विजको चाहिये कि वह अपने कल्याणके लिये इस सदाचारके पालनमें नित्य संलग्न रहे।मनुष्य आचारसे आयु प्राप्त करता है, आचारसे सत्सन्तानें प्राप्त करता है ,आचारसे अक्षय अन्न प्राप्त करता है तथा यह आचार पापको नष्ट कर देता है॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== आचार की परिभाषा ==&lt;br /&gt;
आचार की परिभाषा करते हुये ऋषि कहते हैं कि-धर्मानुकूल शारीरिक व्यापार ही सदाचार है। केवल शारीरिक व्यापार या शारीरिक चेष्टा सदाचार नहीं, वह तो अंग संचालन मात्र की क्रिया है। उससे स्थूल शारीरिक लाभ के अतिरिक्त आत्मोन्नति का सम्बन्ध नहीं। इस कारण कोरी शारीरिक क्रिया को आचार नहीं कहते । शारीरिक व्यापार या शारीरिक चेष्टा जब धर्मानुकूल अथवा किसी प्रकार धर्म को लक्ष्य करते हुये होती है तब वह सदाचार होता है और तब उससे स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीर की उन्नति और साथ ही साथ आत्मा का भी अभ्युदय साधन होता है। यह धर्मानुकूल आचरण ही सदाचार है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महर्षि वशिष्ठ लिखते हैं कि-&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारः परमोधर्मः सर्वेषामिति निश्चयः । हीनाचार परीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति ॥ &amp;lt;ref&amp;gt;अष्टादश स्मृति,श्यामसुन्दरलाल त्रिपाठी,खेमराज श्रीकृष्णदास, (वशिष्ठ स्मृति०६।१) पृ०४६२।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् यह निश्चय है कि आचार ही सबका परम धर्म है आचार भ्रष्ट मनुष्य इस लोक और परलोक दोनों में नष्ट होता है। &amp;lt;blockquote&amp;gt;आचार हीनं न पुनन्ति वेदाः यद्यप्यधीता सहषड्भिरंगैः। छन्दास्येनं मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव ताप तप्ताः।&amp;lt;ref&amp;gt;(अष्टादश स्मृति,श्यामसुन्दरलाल त्रिपाठी,खेमराज श्रीकृष्णदास, (वशिष्ठ स्मृति०६।३) पृ०४६१।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आचार हीन व्यक्ति यदि सांगोपांग वेदों का विद्वान् भी है तो वेद उसको पवित्र नहीं कर सकते और वैदिक ऋचायें भी उसे अन्तकाल में इसी प्रकार त्याग देती हैं जैसे अग्नि के ताप से तप्त घोंसले को पक्षी त्याग देते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारात् फलते धर्ममाचारात् फलते धनम् । आचाराच्छ्रियमाप्नोति आचारो हन्त्यलक्षणम्।।&amp;lt;ref&amp;gt;अष्टादश स्मृति,श्यामसुन्दरलाल त्रिपाठी,खेमराज श्रीकृष्णदास, (वशिष्ठ स्मृति०६।७) पृ०४६१।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसके अतिरिक्त दुराचारी मनुष्य लोक में निन्दित, दु:ख का भागी, रोग ग्रस्त और अल्पायु होता है। सदाचार का फल धर्म है, सदाचार का फल धन है, सदाचार से श्री की प्राप्ति होती है तथा सदाचार कुलक्षणों को नाश करता है। &amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारः परमो धर्मः आचारः परमं तपः।आचारः परमं ज्ञानं आचारात् कि न साध्यते ॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचाराद् विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्नुते।आचारेण समायुक्तः सम्पूर्णफलभाग् भवेत् ॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यः स्वाचारपरिभ्रष्टः साङ्गवेदान्तगोऽपि चेत् ।स एव पतितो ज्ञेयो सर्वकर्मबहिष्कृतः॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आचार ही सर्वोत्तम धर्म है, आचार ही सर्वोत्तम तप है, आचार ही सर्वोत्तम ज्ञान है, यदि आचारका पालन हो तो असाध्य क्या है! अर्थात कुछ भी नहीं। शास्त्रोमें आचारका ही सर्वप्रथम उपदेश ( निर्देशन ) हुआ है । धर्म भी आचारसे ही उत्पन्न है ( अर्थात् ) आचार ही धर्मका माता-पिता है और एकमात्र ईश्वर ही धर्मका स्वामी है । इस प्रकार आचार स्वयं ही परमेश्वर सिद्ध होता है। एक ब्राह्मण जो आचारसे च्युत हो गया है,वह वेदोंके फलकी प्राप्तिसे वञ्चित हो जाता है चाहे वेद-वेदाङ्गोंका पारंगत विद्वान् ही क्यो न हो किंतु जो आचारका पालन करता है वह सबका फल प्राप्त कर लेता है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== आचार के भेद ==&lt;br /&gt;
Sadachar and Durachar (write a paragraph) about them.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== Sadachar ===&lt;br /&gt;
{{Main|Brahma Muhurta - Scientific Aspects (ब्राह्ममुहूर्त का वैज्ञानिक अंश)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्राह्ममुहूर्त में जागरण : ब्राह्म मुहुर्त में उठकर धर्मार्थ का चिन्तन, कायक्लेश का निदान तथा वेदतत्त्व परमात्मा का स्मरण करना चाहिये । इस प्रकार ब्राह्म मुहूर्त में जागरण की बात लिखी है। ब्राह्ममुहूर्त प्रातःकाल  सूर्योदयसे चार घटी (ढाई घटी का एक घंटा होता है लगभग डेढ़ घंटे) पूर्व हो जाता है शास्त्र में कहा है कि-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रात्रेः पश्चिम यामस्य मुहूर्तो यस्तृतीयकः ।स ब्राह्म इति विज्ञेयो विहितः स प्रबोधने ॥&amp;lt;ref&amp;gt;धर्मशास्त्र का इतिहास,उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान,डॉ०पाण्डुरंग वामन काणे,१९९२(पृ०३३४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अनु-''' रात के पिछले पहर का जो तीसरा मुहूर्त (भाग) होता है वह ब्राह्ममुहूर्त होता है जागने के लिये यही समय उचित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वैज्ञानिक अंश तथा लाभ'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रात:काल का समय परमशान्त, सात्विक, स्वास्थ्यप्रद तथा जीवनप्रदायिनीशक्ति लिये हुये होता है। दिन भर का सारा कोलाहल रात्रि में शान्त होकर स्थिर हो जाता है तथा ब्राह्ममुहूर्त में रात्रिमूलक तमोगुण तथा उससे उत्पन्न जड़ता मिट जाती है और सतोगुण मयी चेतना का संचार होने लगता है। प्रात: जागरण से आलस्य दूर होकर शरीर में स्फूर्ति आ जाती है और मन दिन भर प्रसन्न तथा प्रफुल्लित रहता है । इस समय वातावरण परम शान्त रहता है । वृक्ष अशुद्ध वायु आत्मसात् करके शुद्ध वायु शक्तिप्रदायिनी आक्सीजन प्रदान करते हैं, तभी तो लोग प्रात:काल बाग बगीचे तथा पुष्पोद्यान में टहलने जाते हैं और प्राकृतिक सौन्दर्य का आनन्द लेते हुए दिन भर प्रसन्न रहते हैं। इस समय शीतल मन्द सुगन्धित समीर चलती है जिसमें चन्द्रमा की किरणों तथा नक्षत्रों का प्रभाव रहता है जो हमारे लिये स्वास्थ्य प्रद तथा सब प्रकार से लाभकारी है । चन्द्रकिरणों तथा नक्षत्रों के अमृतमय प्रभाव का लाभ प्रात:काल हम उठा लेते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्राह्ममुहूर्तमें ही शय्या त्याग कहा गया है इस समय सोना शास्त्रमें निषिद्ध है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;ब्राह्मे मुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी॥&amp;lt;ref&amp;gt;पं० लालबिहारी मिश्र,नित्यकर्म पूजाप्रकाश,गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० २४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;  &amp;lt;/blockquote&amp;gt;अपने निर्माण कार्यमें इस ब्राह्ममुहूर्तका उपयोग लेना हमारा एक आवश्यक कर्तव्य हो जाता है। इसके उपयोगसे हमें ऐहलौकिक-अभ्युदय एवं पारलौकिक-निःश्रेयस प्राप्त होकर सर्वाङ्गीण धर्मलाभ सम्भव हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रात: स्नान का वर्णन किया जा रहा है। इसमें वैज्ञानिक विशेषता यह है कि रात्रि भर चन्द्रामृत से जो चन्द्रमा की किरणें जल में प्रवेश करती हैं, उसके प्रभाव से जल पुष्ट हो जाता है। सूर्योदय होने पर वह सब गुण सूर्य की किरणों द्वारा आकृष्ट हो जाता है; अत: जो व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व स्नान करेगा. वही जल के अमृतमय गणों का लाभ उठा सकेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== जागरण प्रभृति नित्य विधि ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हस्तदर्शन का विज्ञान ====&lt;br /&gt;
प्रातः हाथका दर्शन शुभ हुआ करता है। कहा भी गया है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करपृष्ठे च गोविन्दः प्रभाते कर-दर्शनम्।।&amp;lt;ref&amp;gt;पं०लालबिहारी मिश्र,नित्यकर्म पूजाप्रकाश,गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस पद्यमें हाथके अग्रभागमें लक्ष्मीका, मध्यभागमें सरस्वतीका और पृष्ठभागमें गोविन्दका निवास कहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसारके सर्वस्व लक्ष्मी सरस्वती और गोविन्द जब हाथमें स्थित हैं तो हाथमें बड़ी शक्ति सिद्ध हुई । संसारमें यही तो वस्तुएँ अपेक्षित हैं, ऐसी शक्तिको धारण करनेवाले, हमारी संसार-यात्राके एकमात्र अवलम्ब एवं लक्ष्मी आदिके प्रतिनिधि हाथका प्रातःकाल दर्शन शुभकारक ही सिद्ध है क्योंकि इसी हाथसे ही तो हमें सभी कार्य करने हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केवल पुराणों में ही हाथका महत्व बताया गया हो ऐसा भी नहीं है। वेद में भी हाथका महत्व बताया गया है देखिये-&amp;lt;blockquote&amp;gt;अयं मे हस्तो भगवान अयं मे भगवत्तरः । अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शनः॥ (ऋ० १०।६०।१२)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस मन्त्रका देवता भी 'हस्त' है। इसमें हाथको भगवान का अतिशयितसामर्थ्ययुक्त और सब रोगोंका भेषजभूत (दवाईरूप) साधन-सम्पन्न स्वीकृत किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो जितनी अधिक शक्तिवाला होगा उसके हाथ में शक्ति भी उतनी ही अधिक होगी। इसलिए हम जिनकी वन्दना करके उनका आशीर्वाद चाहते हैं वे भी अपने हाथसे ही हमारे सिरको स्पर्श करके आशीर्वाद देते हैं। कई ज्यौतिष(सामुद्रिक)विद्याविशारद भी इन्हीं हाथोंमें स्थित रेखाओं को देखकर ही फलित बताते हैं । हाथमें अमृत के स्थित होनेसे गुरुजनों के द्वारा शिष्यको हाथसे मारने पर भी शिष्यों में गुण की वृद्धि ही पाई जाती है जैसा कि श्रीदयानन्द सरस्वती जी के द्वारा रचित व्यवहारभानु नामक ग्रन्थ में व्याकरण महाभाष्य का प्रमाण है- &amp;lt;blockquote&amp;gt;सामृतैः पाणिभिर्घ्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः।लालनाश्रयिणो दोषास्ताडनाश्रयिणो गुणाः।। (व्यवहारभानु) &amp;lt;ref&amp;gt;श्री दयानन्द सरस्वती,व्यवहारभानु,अजमेरनगर वैदिकयन्त्रालय,पृ० १४।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अर्थ'''-जो माता, पिता और आचार्य, सन्तान और शिष्यों का ताड़न करते हैं वे जानो अपने सन्तान और शिष्यों को अपने हाथ से अमृत पिला रहे हैं और जो सन्तानों वा शिष्यों का लाड़न करते हैं वे अपने सन्तानों और शिष्यों को विष पिला के नष्ट भ्रष्ट कर देते हैं। क्योंकि लाड़न से सन्तान और शिष्य दोषयुक्त तथा ताड़ना से गुणयुक्त होते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्तान और शिष्य लोग भी ताड़ना से प्रसन्न और लाड़न से अप्रसन्न सदा रहा करें। परन्तु माता, पिता तथा अध्यापक लोग ईर्ष्या, द्वेष से ताड़न न करें किन्तु ऊपर से भयप्रदान और भीतर से कृपादृष्टि रक्खें।इससे हाथमें हानिजनक शत्रुओंकेलिए विष भी सन्निहित है-यह भी प्रतीत होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकारके हमारे अवलम्बभूत, यजुर्वेद (बृहदारण्यकोपनिषद्) का यह कथन प्रसिद्ध है- &amp;lt;blockquote&amp;gt;सर्वेषां कर्मणार्थ हस्तौ एकायनम् । ( बृहदारण्यकोपनिषद २।४।११)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इन शब्दों में सब कर्मोंके मूल-जिसके न होनेसे हम 'निहत्थे' कहे जाते हैं-सारी रात्रिके ग्रहनक्षत्रादि के प्रभावसे तथा प्रातःकालिक वायुसे पवित्र उस हाथके दर्शनसे हमारा शुभ होना सोपपत्तिक ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रातः भूमिवन्दन ====&lt;br /&gt;
प्रातः उठते ही अपनी आश्रयभूत भूमिकी वन्दना करनी श्रेयस्कर हुआ करती है। तभी तो कहा है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जन्मभूमिको स्वर्गसे भी बढ़कर माना गया है। इसीलिए वेदने भी उसे नमस्कार करनेका आदेश दिया है&amp;lt;blockquote&amp;gt;शिला भूमिरश्मा पांसुः सा भूमिः संधृता धृता। तस्यै हिरण्यवक्षसे पृथिव्या अकरं नमः॥ (अथर्व० १२।१।२६)।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्यै(यजु०६।२२)।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;यहाँ पर दो बार पृथिवी माताकी वन्दना करके वेदने अपने भक्तोंको उसकी पूजाका आदेश दे दिया है। इसीलिए वेदानुसारी पुराणोंने भी  उसे नमस्कार करके उस पर पांव रखनेकी क्षमा चाही है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमण्डिते। विष्णु-पत्नि ! नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इससे हम भूमिके भक्त भी बने रहेंगे, विलायती भूमियोंके प्रेमी न बनेंगे।उठते ही पृथिवीपर एकदम पाँव रखना लौकिक दृष्टिसे भी ठीक नहीं, क्योंकि-सारी रात हम बिस्तर पर सोते हैं; उसमें भी शीतकालमें गर्म कपडों से अपने आपको ढककर सोते हैं। इसी कारण हमारे अन्दर उष्णता पर्याप्त होती है, विशेषकर पैरोंमें क्योंकि तब पैर प्रायः ढके रहते हैं; उस समय ठण्डे परमाणुओंसे युक्त भूमिमें एकदम ही पैर रखना ठीक नहीं; क्योंकि-गर्मी-सर्दी पांवके ही द्वारा हमारे शरीर में तत्क्षण संक्रांत होती है। अतः कुछ देर तक बिस्तर पर बैठकर निद्रा पूर्णतया दूर करके जब अधिक ऊष्मा हटकर उसका समीभाव हो जाता है, तब पांवका भूमि पर रखना ठीक होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके अतिरिक्त भूमि हमारी माता है, हम उसके पुत्र हैं, जैसे कि अथर्ववेदसंहितामें कहा है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;माता भूमिः, पुत्रो अहं पृथिव्याः (अथर्व०१२।१।१२)।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;और भूमि देवतारूप भी है। अतः उस पर पांव रखना उचित नहीं दीखता; पर अनिवार्य होनेसे कुछ समय उससे पादस्पर्शके लिए क्षमा मांगना उचित भी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== मङ्गल दर्शन एवं गुरुजनोंका अभिवादन ===&lt;br /&gt;
{{Main|Abhivadana and Namaskara (अभिवादन और नमस्कार)}}&lt;br /&gt;
प्रातः-जागरणके बाद यथासम्भव सर्वप्रथम मांगलिक वस्तुएँ (गौ, तुलसी, पीपल, गंगा, देवविग्रह आदि) जो भी उपलब्ध हों, उनका दर्शन करना चाहिये तथा घरमें मातापिता एवं गुरुजनों, अपनेसे बड़ोंको प्रणाम करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिमुखीकरणाय वादनं नामोच्चारणपूर्वकनमस्कारः अभिवादनम् । प्रणाम एवं अभिवादन मानवका सर्वोत्तम सात्त्विक संस्कार है। अपनेसे बड़ोंको प्रणाम करनेके बहुत लाभ हैं-&amp;lt;blockquote&amp;gt;अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु-''' जो व्यक्ति सुशील और विनम्र  होते हैं, बड़ों का अभिवादन व सम्मान करने वाले होते हैं तथा अपने बुजुर्गों की सेवा करने वाले होते हैं। उनकी आयु, विद्या, कीर्ति और बल इन चारों में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्रातःस्मरण ===&lt;br /&gt;
प्रातः जागरण के अनन्तर किये जाने वाले भगवत् स्मरण के साथ साथ प्रात:स्मरण का भी विधान हमारे सनातन धर्म में है।भगवद् स्मरण से तात्पर्य है त्रिदेव आदि का स्मरण तथा प्रातः स्मरण अर्थात् महापुरुष,सप्तचिरञ्जीव,सप्त पर्वत,प्रकृति आदि का स्मरण।भगवत् स्मरण के साथ महापुरुष आदि का स्मरण करने से उनके गुणों का प्रभाव हम पर पड़ता है, हमारी भावनायें ऐसी बनतीं हैं कि हम भी ऐसे ही गुणवान्, चरित्रवान् तथा आदर्शवान् बनें । उनके मंगलमय स्मरण से हमारे जीवन में भी मंगल तथा कल्याण की भावना जागृत होती है और हमें प्रेरणा मिलती है।प्रातः काल में किया हुआ भगवद् स्मरण आदि धार्मिक कार्य भी अपने तथा दूसरों का भी आकर्षण का साधन होता है। इसलिए प्रातः भगवान्को आकृष्ट करनेके लिए तथा स्वयं भी तन्मयीभावार्थ कई राग वा भजन गाये जाते हैं, जिससे हमारा भावी दैनिक कार्यक्रम भी सुन्दर और निष्पाप होता है। हम भगवत् स्तुति करके देवाधिपति भगवान के निकट उन शब्दोंको शीघ्र पहुँचा सकते हैं। भगवत् स्तुति हेतु  शयनसे उठते ही संस्कृत पद्योंकी आवश्यकता पड़ती है। पद्यकी रचना लययुक्त होनेसे तन्मयतामें विशेष साधन बन जाती है। इनमें कई इस प्रकारके भी पद्य होते हैं, जो भगवान के ध्यानके साथ ही हमें धर्म तथा अपने देशके आन्तरिक परिचय करानेवाले भी होते हैं। इससे हमें अपने देश तथा अपने धर्म के प्रति अपना उत्तरदयित्व स्मरण रहता है।अपने प्रभुको  उस सात्त्विक समयमें स्मरण करना हमें भविष्य में भी असन्मार्ग में जाने नहीं देता।अतः प्रातः जागरण के पश्चात पुण्यश्लोकों का स्मरण करना चाहिये। &lt;br /&gt;
* स्तुति वा भजन के द्वारा ईश्वर से तन्मयीभाव&lt;br /&gt;
* महापुरुषों के स्मरण से  गुणवान चरित्रवान तथा आदर्शवान बनने की प्रेरणा का प्राप्त होना&lt;br /&gt;
* धार्मिक चिन्तन से सन्मार्ग की प्रेरणा&lt;br /&gt;
* नित्य प्रातः मातृभूमि स्मरण से देश भक्ति में वृद्धि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पुण्यश्लोकोंका स्मरण ====&lt;br /&gt;
(गणेशस्मरण)&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रातः स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुसिन्दूरपूरपरिशोभितगण्डयुग्मम्। उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्डमाखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम्॥&amp;lt;ref&amp;gt;श्री राधेश्याम खेमका,जीवनचर्या अंक,गीताप्रेस गोरखपुर,२०१० (पृ०१५)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु-''' अनाथोंके बन्धु, सिन्दूरसे शोभायमान दोनों गण्डस्थल- वाले, प्रबल विघ्नका नाश करनेमें समर्थ एवं इन्द्रादि देवोंसे नमस्कृत श्रीगणेशजीका मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(विष्णुस्मरण)&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रातः स्मरामि भवभीतिमहार्तिनाशं नारायणं गरुडवाहनमब्जनाभम्। ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुंचक्रायुधं तरुणवारिजपत्रनेत्रम्॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु-''' संसारके भयरूपी महान् दुःखको नष्ट करनेवाले, ग्राहसे गजराजको मुक्त करनेवाले, चक्रधारी एवं नवीन कमलदलके समान नेत्रवाले, पद्मनाभ गरुडवाहन भगवान् श्रीनारायणका मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(शिवस्मरण)&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम्। खट्वाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशंसंसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु-'''संसारके भयको नष्ट करनेवाले, देवेश, गंगाधर, वृषभवाहन, पार्वतीपति, हाथमें खट्वांग एवं त्रिशूल लिये और संसाररूपी रोगका नाश करनेके लिये अद्वितीय औषध-स्वरूप, अभय एवं वरद मुद्रायुक्त हस्तवाले भगवान् शिवका मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(देवीस्मरण)&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रात: स्मरामि शरदिन्दुकरोज्ज्वलाभां सद्रलवन्मकरकुण्डलहारभूषाम् । दिव्यायुधोर्जितसुनीलसहस्त्रहस्तां रक्तोत्पलाभचरणां भवतीं परेशाम्॥ &amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु-'''शरत्कालीन चन्द्रमाके समान उज्ज्वल आभावाली, उत्तम रत्नोंसे जटित मकरकुण्डलों तथा हारोंसे सुशोभित, दिव्यायुधोंसे दीप्त सुन्दर नीले हजारों हाथोंवाली, लाल कमलकी आभायुक्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चरणोंवाली भगवती दुर्गादेवीका मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(सूर्यस्मरण)&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु-'''सूर्यका वह प्रशस्त रूप जिसका मण्डल ऋग्वेद, कलेवर यजुर्वेद तथा किरणें सामवेद हैं । जो सृष्टि आदिके कारण हैं, ब्रह्मा और शिवके स्वरूप हैं तथा जिनका रूप अचिन्त्य और अलक्ष्य है, प्रात:काल मैं उनका स्मरण करता हूँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इत्थं प्रभाते परमं पवित्रं पठेत् स्मरेद्वा शृणुयाच्च भक्त्या। दुःस्वप्ननाशस्त्विह सुप्रभातं भवेच्च नित्यं भगवत्प्रसादात्॥&amp;lt;ref&amp;gt;पं०लालबिहारी मिश्र,नित्यकर्म पूजाप्रकाश,गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० ७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अनु-'''इस प्रकार उपर्युक्त इन प्रात:स्मरणीय परम पवित्र श्लोकोंका जो मनुष्य भक्तिपूर्वक प्रात:काल पाठ करता है, स्मरण करता है अथवा सुनता है, भगवद्दयासे उसके दु:स्वप्नका नाश हो जाता है और उसका प्रभात मंगलमय होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्वोक्त पञ्चायतन स्मरण के साथ-साथ त्रिदेवोंके सहित नवग्रहस्मरण,ऋषिस्मरण,प्रकृतिस्मरण,सप्तचिरञ्जीव स्मरण एवं द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग आदि स्मरण भी प्रातः काल करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== दैनिक कृत्य-सूची-निर्धारण ====&lt;br /&gt;
इसी समय दिन-रातके कार्योंकी सूची तैयार कर लें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज धर्मके कौन-कौनसे कार्य करने हैं? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनके लिये क्या करना है ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शरीरमें कोई कष्ट तो नहीं है ? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि है तो उसके कारण क्या हैं और उनका प्रतीकार क्या है?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एतादृश जागरण के अनन्तर दैनिक क्रिया कलापों की सूची बद्धता प्रातः स्मरण के बाद ही बिस्तर पर निर्धारित कर लेना चाहिये जिससे हमारे नित्य के कार्य सुचारू रूप से पूर्ण हो सकें।&amp;lt;ref&amp;gt;पं०लालबिहारी मिश्र,नित्यकर्म पूजाप्रकाश,गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===अन्य श्राद्ध योग्यानि महाफलप्रदानि श्राद्ध दिवसानि===&lt;br /&gt;
==श्राद्ध के फल==&lt;br /&gt;
उत्तम संतान की प्राप्ति, आरोग्य ऐश्वर्य और आयुर्दाय का रक्षण, संतान की अभिवृद्धि, वेद अभिवृद्धि, सम्पत् प्राप्ति, श्रद्धा, बहु दान शीलत्व स्वभाव््््&lt;br /&gt;
===अशक्तस्य प्रत्यम्नायम् (श्राद्धस्पिय तर्पण, त)===&lt;br /&gt;
तिल तर्पण, गोग्रास&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अनन्तपुण्य संपादकं पञ्चाङ्गम्==&lt;br /&gt;
मास, तिथि, वार नक्षत्र और योग के संयोग से जो-जो प्रत्येक अलभ्य योग उत्पन्न होते हैं उनके आचरण के प्रभाव से अर्थ और धर्म पुरुषार्थ प्रद होते हैं। जैसे जिस किसी का भी धन अर्जन के लिये पुण्य आवश्यक होता है। प्रत्येक व्यक्ति का संकल्पपूर्ति के लिये पुण्य संपादन बहुत आवश्यक है। जिस प्रकार संसार में किसी भी कार्य की सिद्धि के लिये धन की आवश्यकता होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अथ संक्रान्ति दानम्'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== शौचाचार  ==&lt;br /&gt;
{{Main|Shoucha Achara(शौचाचार)}}शौचाचारमें सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये, क्योंकि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यका मूल शौचाचार ही है, शौचाचारका पालन न करनेपर सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं।ब्राह्ममूहूर्त में उठकर शय्यात्याग के पश्चात् तत्काल ही शौच के लिए जाना चाहिए। शौच में मुख्यतः दो भेद हैं- बाह्य शौच और आभ्यन्तर शौच।&amp;lt;blockquote&amp;gt;शौचं तु द्विविधं प्रोक्तं बाह्यमाभ्यन्तरं तथा। मृज्जलाभ्यां स्मृतं बाह्यं भावशुद्धिस्तथान्तरम् ॥ (वाधूलस्मृ०१९)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु-'''मिट्टी और जलसे होनेवाला यह शौच-कार्य बाहरी है इसकी अबाधित आवश्यकता है किंतु आभ्यन्तर शौचके बिना बाह्यशौच प्रतिष्ठित नहीं हो पाता। मनोभावको शुद्ध रखना आभ्यन्तर शौच माना जाता है। किसीके प्रति ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा आदिके भावका न होना आभ्यन्तर शौच है। श्रीव्याघ्रपादका कथन है कि-&amp;lt;blockquote&amp;gt;गंगातोयेन कृत्स्नेन मृद्धारैश्च नगोपमैः। आमृत्योश्चाचरन् शौचं भावदुष्टो न शुध्यति । (आचारेन्दु)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;यदि पहाड़-जितनी मिट्टी और गङ्गाके समस्त जलसे जीवनभर कोई बाह्य शुद्धि-कार्य करता रहे किंतु उसके पास आभ्यन्तर शौच न हो तो वह शुद्ध नहीं हो सकता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आभ्यन्तर शौच अत्यावश्यक है भगवान् सबमें विद्यमान हैं। इसलिये किसीसे द्वेष, क्रोधादि न करें सबमें भगवान्का दर्शन करते हुए सब परिस्थितियोंको भगवान्का वरदान समझते हुए सबमें मैत्रीभाव रखें। साथ ही प्रतिक्षण भगवान्का स्मरण करते हुए उनकी आज्ञा समझकर शास्त्रविहित कार्य करते रहें।&lt;br /&gt;
== दन्तधावनम् ==&lt;br /&gt;
{{Main|Dantadhavanam(दन्तधावनम्)}}&lt;br /&gt;
दन्तधावन का स्थान शौच के बाद बतलाया गया है।मुखशुद्धिके विना पूजा-पाठ मन्त्र-जप आदि सभी क्रियायें निष्फल हो जाती हैं अतः प्रतिदिन मुख-शुद्ध्यर्थ दन्तधावन अवश्य करना चाहिये ।दन्तधावन करने से दांत स्वच्छ एवं मजबूत होते हैं।मुख से दुर्गन्ध का भी नाश होता है । सनातन धर्म में दन्तधावन हेतु दातौन का प्रयोग बताया गया है ।दातौन (वृक्ष जिसकी लकड़ी दन्तधावन हेतु उपयोग में लायी जा सकती है)  का परिमाण वर्ण व्यवस्था के अनुसार बतलाया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैसे-&amp;lt;blockquote&amp;gt;द्वादशाङ्गुलक विप्रे काष्ठमाहुर्मनीषिणः। क्षत्रविट्शूद्रजातीनां नवषट्चतुरङ्गुलम्॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु'''-ब्राह्मणके लिये दातौन बारह अंगुल, क्षत्रियकी नौ अंगुल, वैश्यकी छ: अंगुल और शूद्र तथा स्त्रियोंकी चार-चार अंगुल के बराबर लम्बी होनी चाहिये ।&amp;lt;blockquote&amp;gt;कनिष्ठिकाङ्गुलिवत् स्थूलं पूर्वार्धकृतकूर्चकम्।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;दातौन की चौडाई कनिष्ठिका अंगुलि के समान मोटी हो एवं एक भाग को आगे से कूँचकर कूँची बना लेने के अनन्तर ही दन्तधावन करना होता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;खदिरश्चकरञ्जश्च कदम्वश्च वटस्तथा । तिन्तिडी वेणुपृष्ठं च आम्रनिम्बो तथैव च ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपामार्गश्च बिल्वश्च अर्कश्चौदुम्बरस्तथा । बदरीतिन्दुकास्त्वेते प्रशस्ता दन्तधावने ॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;दातौन के लिये कडवे, कसैले अथवा तीखे रसयुक्त नीम,बबूल,खैर,चिड़चिड़ा, गूलर, आदिकी दातौनें अच्छी मानी जाती हैं । &amp;lt;blockquote&amp;gt;आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च । ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥(कात्यायनस्मृ १०।४, गर्गसंहिता, विज्ञानखण्ड, अ० ७) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु-'''हे वृक्ष! मुझे आयु, बल, यश, ज्योति, सन्तान, पशु, धन, ब्रह्म (वेद), स्मृति एवं बुद्धि दो।इस प्रकार दातौन करने के पूर्व उसे उपर्युक्त मन्त्र द्वारा अभिमन्त्रित करके दातौन करने का विधान धर्मशास्त्रों में बताया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== प्रातःस्नानादि विधि ==&lt;br /&gt;
{{Main|snana vidhi(स्नान विधि)}}&lt;br /&gt;
ब्राह्म मुहूर्त में जागरण के विषय में शास्त्र का प्रमाण दिया ही जा चुका है। अब प्रात: स्नान का वर्णन किया जा रहा है। प्रातः स्नान में विशेषता यह है कि रात्रि भर चन्द्रामृत से जो चन्द्रमा की किरणें जल में प्रवेश करती हैं, उसके प्रभाव से जल पुष्ट हो जाता है। सूर्योदय होने पर वह सब गुण सूर्य की किरणों द्वारा आकृष्ट हो जाता है; अत: जो व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व स्नान करेगा. वही जल के अमृतमय कणों का लाभ उठा सकेगा।जो लोग  आलस्यवश नित्य स्नान नहीं करते उन्हें स्नान के गुण व लाभ समझ लेने चाहिये और नित्य प्रातः स्नान अवश्य करना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रातःकाल का नित्य स्नान&amp;lt;blockquote&amp;gt;गुणा दश स्नान दश स्नान परस्य मध्येरूपं च तेजश्च बलं च शौचम् ।आयुष्यमारोग्यमलोलुपत्वं दुःस्वप्तघातश्च तपश्चमेधा ॥(दक्षस्मृति २।१४)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;जो मानव स्नान में तत्पर होत है उसमें यह दश गुण विद्यमान होते है रूप,पुष्टता,बल,तेज,आरोग्य,अवस्था,दुस्वप्न का नाश,धातु की वृद्धि,तप और बुद्धि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== वस्त्रधारण विधि ===&lt;br /&gt;
ब्राह्ममुहूर्त में जागरण स्नानादि के अनन्तर वस्त्र धारण का भी मानव जीवन में घनिष्ठ सम्बन्ध है । वैदिक काल से ही शरीर ढकने हेतु वस्त्रों का उपयोग होता हुआ आ रहा है। प्रचीन काल में वृक्षों के पत्ते ,छाल, कुशादि घास एवं मृगचर्मादि का भी साधन बनाकर शरीर ढकने हेतु वस्त्ररूप में उपयोग हुआ करता था।वस्यते आच्छाद्यतेऽनेनेति वस्त्रम् -जिसके द्वारा (शरीर को) आच्छादित किया जाता है उसे वस्त्र (परिधान)कहते हैं।सनातनी परम्परा में ब्रह्मचारी,स्नातक,गृहस्थ,सन्न्यासी आदियों के लिये पृथक् पृथक् वस्त्रों का विधान किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== आसन विधि ===&lt;br /&gt;
उपासना ध्यानादि कर्मों को आसन पर बैठकर करना चाहिये। उपासना के समय इन्द्रियों को संयमित , मन को स्थिर तथा चित्त को एकाग्र करना होता है।अतः उपासना की क्रिया से एक प्रकार की विद्युत्धारा बहने लगती है, साधना की शक्ति केन्द्रित होकर घनीभूत हो जाती है, वह पृथ्वी पर बैठने से पृथ्वी में ही समा कर चली जाती है क्योंकि पथ्वी में आकर्षण शक्ति है तथा शरीर में भी पार्थिवतत्व की प्रधानता है, इसलिये आवश्यक है कि किसी आसन के ऊपर बैठकर ही उपासनादि कर्म किये जायें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आस्यते उपविश्यतेऽस्मिन् इति आसनम् -जिस में (ध्यानादि कर्मों के लिये )बैठा जा सके उसे आसन कहते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;कौशेयं कम्बलं चैव अजिनं पट्टमेव च । दारुजं तालपत्रं वा आसनं परिकल्पयेत्॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु''' - कुश, कम्बल, मृगचर्म, व्याघ्रचर्म और रेशमका आसन जपादिके लिये विहित है ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त आसनों में पूर्वोक्त आसनों की महत्ता अधिक है यथा [[Importance of kusha (कुशा का महत्त्व)|कुश आसन]] सर्वश्रेष्ठ है कुशाभाव में कम्बल अनन्तर क्रमशः आसनों का उपयोग किया जा सकता है। शास्त्रों में वर्णन किया गया है इन आसनों पर बैठकर साधना करने से आरोग्य, लक्ष्मी प्राप्ति, यश और तेज की वृद्घि होती है। साधकों की एकाग्रता भी भंग नहीं होती है अतःआसनों का उपयोग उपासना के समय इन्द्रियों को संयमित तथा मन को स्थिर और चित्त को एकाग्र करने के लिये अवश्य करना होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== भस्मादितिलक धारण विधि ===&lt;br /&gt;
सनातन धर्म में प्रायः सभी व्यक्ति भस्म तिलक या गुरुपरम्परा अनुसार चन्दन धारण करते हैं यह भी महत्वपूर्ण नियम है। गङ्गा, मृत्तिका या गोपी-चन्दनसे ऊर्ध्वपुण्ड्र, भस्मसे त्रिपुण्ड्र और श्रीखण्डचन्दनसे दोनों प्रकारका तिलक कर सकते हैं। किंतु उत्सवकी रात्रिमें सर्वाङ्गमें चन्दन लगाना चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भस्म तिलक विना सत्कर्म सफल नहीं हो पाते । तिलक बैठकर लगाना चाहिये। अपने-अपने आचारके अनुसार मिट्टी, चन्दन और भस्म-इनमें से किसीके द्वारा तिलक लगाना चाहिये। किंतु भगवान्पर चढ़ानेसे बचे हुए चन्दनको ही लगाना चाहिये बगैर भगवान को लगाये स्वयं नहीं लगाना चाहिये। अँगूठेसे नीचेसे ऊपरकी ओर ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाकर तब त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये।भस्मधारणसे तेजकी रक्षा रहती है। उससे शीत नहीं लगता, तभी तो साधु सब अङ्गों में भस्म लगाकर शीतकालकी रात्रियोंको बिता दिया करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बहुत सारे व्यक्तियों की आशङ्का होती है कि-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भस्म लगानेसे रोमकूप बन्द हो जाएंगे उस दशामें कार्बानिक गैस (विषाक्त वायु) भीतर से बाहर न जा सकेगा और ऑक्सिजन गैस (प्राणप्रद वायु) बाहरसे भीतर न जा सकेगी। तब भस्म लगानेवाला बीमार पड़ जाएगा। पर यह आशङ्का व्यर्थ है । भस्म स्वयं ऑक्सिजन वायुको खींचकर भीतर प्राप्त कराती है। और भीतरी दूषित विकारोंको बाहर कर देती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== वैज्ञानिक अंश ====&lt;br /&gt;
भस्ममें पोटास, सोडा, चूना, मैगनेशिया, लोहभस्म, एल्यूमिना, सिलकनभस्म आदि अनेक गुणकारी पदार्थ मिले हुए होते हैं। इसलिए भस्म तेजकी रक्षा करती है, रोम कूपोंको खोलती है, दुर्गन्ध वा मलको नष्ट करती है, खराब वायुको बाहर निकालती है, शुद्ध वायुको अन्दर लाती है, जठराग्नि (भूख) को बढ़ाती है, त्वचाको स्वच्छ करती है, ब्रण वा ज़ख्मको शुद्ध करती है, विष हटाती है, कृमियोंको दूर करती है; ज्वर, सर्दी, वातपित्त, शूल, रक्तविकार, बीमारी, प्लेगरोग, त्वचारोग और उदर रोगोंको नष्ट करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्गन्ध दूर करना यह भस्मका स्वाभाविक गुण है। विकृत जलमें भस्मके डालनेसे उसका दुर्गन्ध दूर होता है । भस्मसे बिच्छूका विष भी दूर होता है। भस्मसे आयु भी बढ़ती है इसका कारण यह है कि हमारी आयु हमारे तेज पर आश्रित है।जब तक तेज सुरक्षित है। तब तक तेज बढ़ता है । भस्म तेजको स्थिर करती है अतः इससे आयु बढती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आध्यात्मिक दृष्टि से तिलक धारण सात्विक भाव को उत्पन्न करता हुआ भगवद् भक्ति की ओर और भी अधिक प्रेरित करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योग-क्रिया-सम्बद्ध एक विशेष रहस्य यह है कि भृकुटी के बीच में मस्तक के नीचे 'आज्ञा' नामक एक चक्र है, उस स्थान पर चन्दन लगाने से वह चक्र शीघ्र जागृत होकर उसका भेदन हो जाता है। जो साधक की साधना में लाभदायक है। इसी प्रकार कण्ठ में चन्दन लगाने से 'विशुद्ध चक्र' का, हृदय में लगाने से 'अनाहत चक्र' का एवं नाभिस्थान में लगाने से 'मणिपूर' आदि चक्रों का जागरण एवं भेदन होता है और उनमें सहायता प्राप्त होती है। इसीलिए उक्त स्थानों में चन्दन लगाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैज्ञानिक दृष्टि से भी चन्दन लगाना स्वास्थ्य के लिये लाभदायक है। यह संक्रामक रोगों का नाशक है। इसकी सुगन्ध से दूषित कीटाणु दूर होते हैं, मन प्रसन्न रहता है तथा अन्य लोगों पर भी इसकी सुगन्ध का प्रभाव पड़ता है। चन्दन लगाने वाले व्यक्ति के मुख की कान्ति चमकती है, शोभा बढ़ती है और मुंहासे आदि का भी प्रकोप नहीं होता। शरीर के विभिन्न अंगों में लगाने के कारण दुर्गन्ध को नाश करता हुआ यह स्वास्थ्य प्रदान करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== संध्योपासन विधि ==&lt;br /&gt;
{{Main|Sandhyopasana - Scientific Aspects (सन्ध्योपासन का वैज्ञानिक अंश)}}&lt;br /&gt;
स्नान के पश्चात् सन्ध्यावन्दनादि का क्रम शास्त्रों में कहा गया है। यह उपनयन संस्कार होने के बाद द्विजों के लिये नित्य क्रिया है। इससे बड़ा लाभ है। संध्या मुख्यतः प्रातः मध्यान्ह और सायान्ह इन तीन भागों में विभाजित है। रात्रि या दिन में जो भी अज्ञानकृत पोप होता है वह सन्ध्या के द्वारा नष्ट हो जाता है तथा अन्त:करण निर्मल, शुद्ध और पवित्र हो जाता है। वैसे भी देखिये कि किसी मशीन को चलाने तथा ठीक गतिशील रखने के लिये हमें उसकी सफाई रखनी पड़ती ही है चाहे जितनी सावधानी बरती जाय अन्तःकरण में नित्य के व्यवहार से कुछ न कुछ मलिनता आती ही है, अतः सन्ध्योपासन द्वारा उसका निवारण करना परम कर्तव्य है। घर में अगर झाड़ न लगाई जाय तो कूड़ा आ ही जाता है, शरीर में प्रतिक्षण मैल वनता ही रहता है और वह इन्द्रियों द्वारा निकलता रहता है इसी प्रकार अन्त:करण का मैल सन्ध्याद्वारा दूर होता है । सन्ध्या से दीर्घ आयु, प्रज्ञा, यश, कीर्ति तथा ब्रह्मतेज की प्राप्ति होती है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनु जी कहते हैं-&amp;lt;blockquote&amp;gt;ऋषयो दीर्घ सन्ध्यत्वाद् दीर्घमायुरवाप्नुयुः। प्रज्ञां यशश्च कीतिश्च ब्रह्मवर्चसमेव च॥&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस प्रकार हमें शारीरिक शक्ति, बौद्धिकबल, ब्रह्मतेज तथा यश की प्राप्ति भी इसके द्वारा होती है। नित्य सन्ध्या करने से ध्यान द्वारा हम परमात्मा से सम्पर्क स्थापित करते हैं।  संध्या में आसन पर बैठकर प्राणायाम के द्वारा रोग और पाप का नाश होता है। कहा गया है--&amp;lt;blockquote&amp;gt;आसनेन रुजंहन्ति प्राणायामेन पातकम्। &amp;lt;/blockquote&amp;gt;इस शरीर रूपी यन्त्र में सन्ध्या द्वारा हमें, शारीरिक शुद्धि, मानसिक पवित्रता तथा बौद्धिक प्रखरता और ब्रह्मवर्चस के साथ साथ आध्यात्मिक शक्ति की प्राप्ति होती है। सन्ध्या के बाद गायत्री जप का विधान है। इससे बुद्धि को प्रेरणा मिलती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गायत्री वेदमाता है, यह बुद्धि को प्रेरणा देने वाली, तेजस्वरूप ज्ञान प्रदायिनी है। इसके जप से बड़ी शक्ति प्राप्त होती है। लौकिक सिद्धियां भी गायत्री के अनुष्ठान से प्राप्त हो जाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गायत्री के समय उपासना तो हो ही जाती है। जिस प्रकार अग्नि में पड़ने से लोहा धीरे धीरे गरम हो जाता है उसी प्रकार गायत्री के दिव्य तेज को धारण करके साधक ब्रह्मतेज से परिपूर्ण हो जाता है, उसके सारे कलुष विध्वंस हो जाते हैं। उसका चेहरा तेज से चमचमाने लगता है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें धूप में बैठे हुए व्यक्ति पर पड़ती हैं और धीरे धीरे उसकी उष्णता का प्रवेश उसमें होने लगता है उसी प्रकार गायत्री माता की ज्योतिर्मयी शक्ति और तेज साधक के शरीर, मन और बुद्धि पर पड़ता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार सन्ध्या में कर्म, उपासना, ज्ञान, प्राणायाम, जप तथा ध्यान आदि की सभी क्रियायें सम्पन्न हो जाती हैं और नित्य का विधान होने से मनुष्य उसके द्वारा सभी लाभ उठा लेता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्ध्या वन्दन की क्रिया के साथ साथ फिर सूर्य को अर्घ्य दान की बात सनातन धर्म शास्त्र में कही गयी है। उसमें भी बड़ा रहस्य है।&lt;br /&gt;
== पंचमहायज्ञ ==&lt;br /&gt;
{{Main|Panchamahayajna (पञ्चमहायज्ञ)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामान्यतः लौकिक जीवनमें स्वयंके भविष्यको हवनसे, त्रैविद्य नामक व्रतसे, ब्रह्मचर्यावस्थामें देवर्षि-पितृसँवारनेके लिये सन्ध्यावन्दनका विधान किया गया है, तर्पण आदि क्रियाओंसे, गृहस्थाश्रममें पुत्रोत्पादनसे, महायज्ञोंसे कुटुम्ब एवं परिवारकी समृद्धिके निमित्त देवपूजाकी और ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंसे यह शरीर ब्रह्मप्राप्तिके योग्य व्यवस्था की गयी है। जबकि ऋणमुक्ति एवं समृद्धिहेतु, बनाया जाता है। उत्कृष्ट संस्कार पानेके लिये, नैतिकता-सदाचार-सद्व्यवस्था इन यज्ञोंको और स्पष्ट करते हुए मनुस्मृति (३।६०)और सद्व्यवहारके लिये गृहस्थ जीवनमें पंचमहायज्ञोंका में कहा गया है अनुष्ठान-विधान अनिवार्य अंगके रूपमें निर्दिष्ट है। धर्म कर्ममय जीवनमें यह एक आवश्यक कर्तव्य है, जिसका विधान ब्राह्मण-आरण्यक-गृह्यसूत्र-धर्मसूत्र आदिमें पाया अर्थात् वेदका अध्ययन और अध्यापन करना जाता है। &amp;lt;blockquote&amp;gt;अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्। होमो दैवो बलिआँतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥ &amp;lt;/blockquote&amp;gt;पंचमहायज्ञमें विधाता, ऋषि-मुनि, पितर, जीव- ब्रह्मयज्ञ है, तर्पण करना पितृयज्ञ है, हवन करना देवयज्ञ जन्तु, समाज, मानव यहाँतक कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके प्रति है, बलिवैश्वदेव करना भूतयज्ञ है तथा अतिथियोंका अपने कर्तव्योंका पालन मुख्य उद्देश्य होता है। दूसरे अर्थमें सत्कार करना नृयज्ञ है। कहें, तो पंचमहायज्ञोंमें नैतिकता-आध्यात्मिकता-प्रगतिशीलता वैदिक कालसे ही इन पंचमहायज्ञोंके सम्पादनकी एवं सदाशयता देखनेको मिलती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यवस्था चली आयी है। ये पाँचों महायज्ञ महासत्रके समान हमारा यह पांचभौतिक शरीर पृथ्वी, जल, तेज, आकाश हैं। शतपथब्राह्मण (११।५।६।१)-में कहा गया है किऔर वायु-इन पंचभूत पदार्थों से बना है और अन्तमें इन्हींमें 'पञ्चैव महायज्ञाः । तान्येव महासत्राणि भूतयज्ञो मनुष्ययज्ञः विलीन भी हो जाता है। आकाशसे वायु, वायुसे सूर्य अर्थात् पितृयज्ञो देवयज्ञः ब्रह्मयज्ञ इति।' केवल शतपथमें ही तेज, सूर्यसे जल एवं जलसे पृथ्वी बनती है- नहीं, अपितु तैत्तिरीय आरण्यक, आश्वलायनगृह्यसूत्र, 'आकाशाज्जायते वायुः वायोरुत्पद्यते रविः। रवेरुत्पद्यते पराशरमाधवीय, बौधायनधर्मसूत्र, गौतम-गोभिलस्मृति आदि तोयं तोयादुत्पद्यते मही।' इनमेंसे एकका भी अभाव हो अनेकों प्राचीन एवं आर्षग्रन्थोंमें इन पंचमहायज्ञोंका वर्णन तो जीवन नष्ट हो जाता है। पेड़-पौधोंका भी हमारे जीवनको प्राप्त होता है, जिनके आधारपर संक्षेपमें यही कहा जा बनाने-सुधारनेमें अमिट योगदान है, यहाँतक कि कीट- सकता है कि जब अग्निमें आहुति दी जाती है तो उसे पतंग, जलचर-नभचरसे भी जीवन अनुप्राणित होता है। देवयज्ञका नाम दिया जाता है। प्रतिदिन स्वाध्याय अर्थात् इन सबका भी हमारे ऊपर ऋण है। स्वाभाविक है कि वेदकी अपनी शाखाका अध्ययन, वेदपाठ-'ब्रह्मयज्ञ' ऋण देनेवाले भी हमसे कुछ-न-कुछ अपेक्षाएँ रखते हैं। कहलाता है। जब पितरोंको स्वधा दी जाती है, उनका श्राद्ध इनके प्रति हमारा भी कुछ कर्तव्य बनता है। सारे विश्वके या पार्वण किया जाता है, जलमात्रसे भी यदि तर्पण किया प्राणी एक ही सृष्टि-जीवके द्योतक हैं, अतः सबमें आदान- जाता है, तो 'पितृयज्ञ' बन जाता है। इसी तरह अतिथियों, प्रदानका सिद्धान्त नितान्त स्थित है। इस हेतु भी हम पंचमहायज्ञ ब्राह्मणोंको भोजन कराना जहाँ 'मनुष्ययज्ञ' होता है, वहीं करनेके लिये प्रेरित हुए। जिसके पीछे भक्ति-कृतज्ञता- जीवोंको बलि दिये जानेसे भोजनका ग्रास या पिण्ड अर्पित सम्मान-प्रियस्मृति-उदारता-सहिष्णुता आदिकी भावनाएँ भी किये जानेसे 'भूतयज्ञ' कहलाता है। काम करती हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भोजन  विधि  ==&lt;br /&gt;
{{Main|Bhojana Vidhi - Dharmik Aspects (भोजन विधि -धार्मिक अंश)}}&lt;br /&gt;
{{Main|Bhojana Vidhi - Scientific Aspects (भोजन विधि का वैज्ञानिक अंश)}}&lt;br /&gt;
{{Main|Bhojana niyamas in Sanatana Dharma (सनातन धर्म में भोजन नियम)}}&lt;br /&gt;
सनातन धर्म में आचार विचार,आहार तथा व्यवहार इन चार विषयों पर बहुत महत्व दिया है इनमें आहार(भोजन)विधि के बारे में बहुत महत्व दिया गया है जिस प्रकार का अन्न खाया जाता है उसी प्रकार की बुद्धि भी बनती है।आहार सात्विक होगा, तो मन भी सात्विक होगा और जब मन सात्विक होगा तब विचार भी सात्विक होंगे और क्रमशः फिर क्रिया भी सात्विक होगी। सात्विक भोजन से शरीर स्वस्थ एवं चित्त प्रसन्न रहता है। अधिक कटु, उष्ण, तीक्ष्ण एवं रुक्ष आहार राजस कहा गया है । बासी, रसहीन, दुर्गन्धियुक्त, जूठा और अपवित्र आहार तामस कहा गया है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलारोग्य सुखप्रीति विवर्धनाः। रस्याः स्निग्धा: स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विक प्रियाः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कट्वम्ल लवणात्युष्ण तीष्ण रूक्ष विदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःख शोकामय आयुः सत्त्व प्रदाः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूँकि मनुष्यके समस्त आचार-व्यवहार, चेष्टा और कर्म शरीरके माध्यमसे ही सम्पन्न किये जाते हैं, अतः मानवशरीरको परमात्माकी अनुपम कृति मानकर उसकी स्वस्थता और सुरक्षाका विशेष ध्यान रखना चाहिये। आध्यात्मिक दृष्टिसे शरीर में अवस्थित जीव (आत्मा) इसीको अपना आश्रय बनाकर अपनी जीवनयात्रा पूर्ण करता है। कर्मयोग, भक्ति और मोक्षसाधना भी इसी शरीरके माध्यमसे सम्भव है।इसके लिये इस शरीरको स्वस्थ, नीरोग और ऊर्जावान् बनाये रखना अत्यन्त आवश्यक है।शरीरको गतिशील बनाये रखनेके लिये आहारकी आवश्यकता होती है। यह आहार स्वादके साथ शरीरके उदरकी पूर्ति मात्र के लिये नहीं अपितु उसके दीर्घायु-जीवनकी कामना और आरोग्यताके लिये किया जाता है। इसी शरीरमें ईश्वरअंशरूपी जीव भी अवस्थित है, जो वैश्वानर (जठराग्नि)रूपसे प्रत्येक प्राणीद्वारा चळ, चोष्य, लेह्य और पेय इस प्रकारसे ग्रहण किये आहारको नैवेद्य-भावसे ग्रहण करता है। इस स्थितिमें ऋषि-मुनियों, आयुर्वेदाचार्यों और मनीषियोंके समक्ष अनेक प्रश्न उपस्थित हो गये; जो सात्त्विक, पवित्र, पौष्टिक और आदर्श आहारसे सम्बन्ध रखते थे। यथा-मानवशरीरके लिये श्रेष्ठ आहार कैसा हो, किन उपकरणों (भोज्य पदार्थों)का किस मात्रा और अनुपातमें संयोग किया जाय तथा किस विधिसे संस्कारित किया (पकाया) जाय, जिससे वात, पित्त तथा कफ-ये त्रिदोष उत्पन्न न हो सकें, जठराग्नि सम रहे तथा पाचनमें सुगमता हो और इन सबके फलस्वरूप तन, मन, इन्द्रिय और आत्मा प्रसन्नताका अनुभव करे। ये ही स्वस्थ मनुष्यके लक्षण माने गये हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पुराणादि अवलोकन सायान्हकृत्य  ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== शयन विधि ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मंत्र योग ==&lt;br /&gt;
मंत्र की साधना चेतना को परिष्कृत करती है। इसमें किसी बीजाक्षर, मंत्र या वाक्य का बार-बार पुनरावर्तन किया जाता है। विधिवत् लयबद्ध पुनरावर्तन को जाप कहते हैं। इसमें ध्वनि के उच्चारण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। चित्त की सूक्ष्मतम तरंगें ध्वनि की तरंगें हैं। मंत्र की साधना से पहले अन्दर की सफाई होती है। अन्त में व्यक्ति उसी में एकाग्र हो जाता है। उसका मन स्थिर होने लगता है। वैदिक साधना पद्धति में, बौद्धों में मणि पद्मे हं, जैनों में नमस्कार महामंत्र, अर्हम् आदि ध्वनियों के उदाहरण हैं। उन ध्वनियों का उपयोग करना चाहिये जिनसे मन परमात्मा में लयहीन हो जाये।&amp;lt;blockquote&amp;gt;तस्य वाचकः प्रणवः। तज्जपस्तदर्थभावनम् ।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;पातंजल योग सूत्र के अनुसार ईश्वर का वाचक प्रणव (ओंकार) है। इसका जप करते हुये अन्त में इसके अर्थ अर्थात् परमात्म रूप हो जाना मंत्र का प्रमुख उद्देश्य है। मंत्र के जप के साथ उसके अर्थ, छन्द, ऋषि या देवता का अधिकाधिक रूप में मनन किया जाता है। तब वह शीघ्र सिद्ध होता है। मंत्र सिद्धि के द्वारा मन, मंत्र तथा आराध्य देव की पृथक्ता का बोध साधक को नहीं होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन की कामना ही यज्ञ की जननी है। ऋषि जिस कामना से देवता की जिस पदार्थ का स्वामी बनने की इच्छा से स्तुति करता है, वही उस स्तुति रूप मंत्र का देवता हो जाता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्य-पत्यमिच्छन्स्तुति प्रयुंक्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति। (निरुक्त७।१) &amp;lt;/blockquote&amp;gt;ऋषि अर्थात् द्रष्टा अपनी कामना की अभिव्यक्ति मंत्र अर्थात् मनोबल से करता है। इच्छाएँ तो हममें भी अनन्त हैं, किन्तु हमारा मन इतना बलवान नहीं है कि इन इच्छाओं को मंग्त्र बल में बदल सके। मंत्र मनन की शक्ति है हमारा मन इतना चंचल है कि एक जगह टिककर मनन ही नहीं कर सकता। अर्थात् मंत्र शक्ति की सफलता का मूल इच्छा-शक्ति की दृढता है।&amp;lt;ref&amp;gt;श्री शशांक शेखर शुल्व, यज्ञ विधानम्, सनातन पूजा विज्ञान, वाराणसीः पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग अध्याय-भूमिका, (पृ०2)। &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चारित्रिक श्रेष्ठता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानसिक एकाग्रता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभीष्ट लक्ष्य में अटूट श्रद्धा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शब्द शक्ति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:Dharmas]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
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		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Penal_System_(%E0%A4%A6%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=137525</id>
		<title>Penal System (दण्ड व्यवस्था)</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दण्ड व्यवस्था (संस्कृतः दण्डनीतिः) का स्वरूप अत्यंत सूक्ष्म, धर्म आधारित और राजकीय नीति से जुड़ा हुआ है। यह व्यवस्था धर्म, न्याय और राजधर्म पर आधारित है। अर्थशास्त्र में राजा के चार उपायों - साम, दान, दण्ड और भेद के रूप में दण्डनीति को राजनीति का प्रमुख अंग माना है। जिसका उद्देश्य राज्य की स्थिरता, समाज में नैतिकता और अनुशासन की स्थापना करना था। वेद, पुराण, स्मृतिशास्त्र, रामायण एवं महाभारत आदि में दण्ड व्यवस्था का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
प्राचीन भारतीय न्यायिक क्षेत्र में दण्ड व्यवस्था को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। तत्कालीन समाज में जीवन के क्रिया कलापों में भी दण्ड का प्रमुख योगदान है। महाभारत में दण्ड का सार्वभौम रूप प्रस्तुत हुआ है, उसमें कहा गया है कि -   &amp;lt;blockquote&amp;gt;राजदण्डभयादेके नराः पापं न कुर्वते। यमदण्डभयादेके परलोकभयादपि॥ (महाभारत)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;  &amp;lt;/blockquote&amp;gt;दण्ड प्रजा पर शासन करता एवं उसकी रक्षा करता है। जब संसार शयन करता है तब दण्ड जागता है अतः विद्वान् उसे ही धर्म मानते हैं। दण्ड के ही भय से मनुष्य कर्त्तव्य करता है, यह भय राजदण्ड मूलक हो अथवा यमदण्ड मूलक दण्डभय से ही मनुष्य पाप प्रवृत्ति क्षीण होती है।&amp;lt;ref&amp;gt;शोध कर्ता - बबिता मौर्या, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/181757 प्राचीन भारतीय दण्ड व्यवस्था का समाजशास्त्रीय अध्ययन], सन २०१२, शोधकेन्द्र- वीर बहादुर सिंह पूर्वाञ्चल विश्वविद्यालय, जौनपुर (पृ० १३)।&amp;lt;/ref&amp;gt; अरिषड् वर्ग काम, [[Krodha (क्रोधः)|क्रोध]], लोभ, मोह, मद, मात्सर्य , प्रभृति कुप्रवृत्तियों पर नियंत्रण अत्यावश्यक है। दण्ड की आवश्यकता एवं महत्ता पर प्रकाश डालते हुये वेदव्यास जी कहते हैं कि ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और [[Sannyasashrama (सन्न्यासाश्रमः)|सन्यासी]] इन चारों आश्रमों में स्थित मनुष्य दण्ड के भय से ही अपने-अपने मार्ग पर स्थिर रहते हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षकः। दण्डस्यैव भयादेते मनुष्यात् वर्त्मनि स्थिताः॥ (महाभारत)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;दण्ड व्यवस्था के विलुप्त होते ही सर्वत्र वर्णसंकरता फैलने लगती है। कर्त्तव्याकर्त्तव्य, भक्ष्याभक्ष्य, पेयापेय आदि का विचार समाप्त होने लगता है। लोग एक दूसरे ही हिंसा करने लगते हैं। बलवान निर्बल को, धनवान निर्धन को सताने लगते हैं। अतः काल रूप यह दण्ड [[Srishti (सृष्टिः)|सृष्टि]] के आदि, मध्य और अन्त में जागता रहता है। यही समस्ता प्रजाओं का पालक है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० भक्तवत्सल, [https://www.jetir.org/papers/JETIR1809891.pdf महामानवचम्पू काव्य में वर्णित दण्ड विधान की आवश्यकता], सन २०१८, जर्नल ऑफ इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज एण्ड इनोवेटिव रिसर्च (पृ० ६४७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दण्ड की उत्पत्ति==&lt;br /&gt;
दण्ड की उत्पत्ति राज्यसंस्था की उत्पत्ति के साथ हुई। [[Manusmrti (मनुस्मृतिः)|मनुस्मृति]] के सप्तम अध्याय और [[Mahabharat (महाभारत)|महाभारत]] के शांतिपर्व के ५६ अध्याय में यह कहा गया है कि मानव जाति की प्रारंभिक स्थिति अत्यंत पवित्र स्वभाव, दोषरहित कर्म, सत्वप्रकृति और और ऋतु की थी। जब न तो किसी राजा की स्थिति थी, न राज्य था, न दण्ड था, न दंडी था और सभी लोग [[Dharma (धर्मः)|धर्म]] के द्वारा ही एक दूसरे की रक्षा करते थे - &amp;lt;blockquote&amp;gt;न राज्यं न च राजासीत न दण्डो न च दाण्डिकः। स्वयमेव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम्॥ (महाभारत)&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत, शांतिपर्व, अध्याय- ६७, श्लोक- १४।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;राज्य की शक्ति के रूप में दण्ड न्यायिक क्षेत्र में प्रसारित होने लगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दण्ड के सिद्धान्त==&lt;br /&gt;
राजा की दण्डव्यवस्था से चारों वर्ण और आश्रम संरक्षित रहते हैं। संपूर्ण समाज अपने-अपने धर्म और कर्म में निरंतर प्रवृत्त होकर मर्यादा बनाए रखता है। यही दण्डविधान सामाजिक व्यवस्था का आधार है। इस दण्डव्यवस्था को निम्न प्रकारों में विभाजित किया गया है -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*प्रतिशोधात्मक दण्ड - अपराध के बदले में दण्ड देना।&lt;br /&gt;
*प्रतीकारात्मक दण्ड - अपराधी को उसके कर्म का उचित प्रतिफल देना।&lt;br /&gt;
*सुधारात्मक दण्ड - अपराधी के सुधार पर केंद्रित दण्ड।&lt;br /&gt;
*द्युत् समाह्य दण्ड - न्याय के सम्यक संतुलन हेतु दण्ड।&lt;br /&gt;
*प्रकीर्णक दण्ड - विविध स्थितियों में प्रयोग किए जाने वाले दण्ड।&lt;br /&gt;
*आदर्शात्मक दण्ड - समाज में आदर्श आचरण की स्थापना के लिए दण्ड।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनके अतिरिक्त कौटिल्य ने अर्थदण्ड (धनदण्ड), मृत्युदण्ड तथा अन्य अनेक दण्डों का भी उल्लेख किया है। दण्ड के इन प्रकारों के साथ-साथ प्रायश्चित की संकल्पना भी है, जो नैतिकता पर आधारित है। प्रायश्चित और दण्ड में मूल अंतर यह है कि प्रायश्चित पाप के लिए होता है, जबकि दण्ड अपराध के लिए। जहाँ पाप और अपराध में स्पष्ट भेद होता है, वहाँ प्रायश्चित का प्रभाव अधिक माना गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थिनी- श्रीमती संगीता मिश्रा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/180446 मौर्य काल में न्याय-व्यवस्था], सन २००६,शोधकेन्द्र- श्री गाँधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय मालटारी-आजमगढ (पृ० १३२)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दण्ड के प्रकार==&lt;br /&gt;
'''शारीरिक दण्ड'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अर्थदण्ड'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्मृतियों में दंड व्यवस्था॥ Penal system in  Smritis==&lt;br /&gt;
आचार्य कौटिल्य ने लोककल्याण के लिए [[Anvikshiki (आन्वीक्षिकी)|आन्वीक्षिकी]], त्रयी, वार्त्ता और दण्ड-नीति का उल्लेख किया है, जिसे सभी आचार्यों ने स्वीकार किया है।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधकर्ता- राजेश गर्ग, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/653260 मौर्यकालीन न्याय एवं दण्ड व्यवस्थाः एक विश्लेषणात्मक अध्ययन], सन २००४, शोधकेन्द्र- चौ० चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ (पृ० ८४)।&amp;lt;/ref&amp;gt; दण्ड की महत्ता पर प्रकाश डालते हुये मनु कहते हैं कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डः धर्मं विदुर्बुधाः॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय- ७, श्लोक- १८।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;दण्ड [[Dharma (धर्मः)|धर्म]], अर्थ और काम का रक्षक है। अतएव दण्ड को त्रिवर्ण रूप कहा गया है। दण्ड से ही धन-धान्य की रक्षा और अभिवृद्धि होती है। कितने ही अपराधी राजदण्ड के भय से अपराध नहीं करते हैं। दण्ड, उदण्ड मनुष्यों का दमन करता है। दुष्टों को दण्ड देता है। अतः दमन के कारण ही विद्वान जन इसे दण्ड कहते हैं। जैसा कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;वाचा दण्डो ब्राह्मणानां क्षत्रियाणां भुजार्पणम्। दान दण्डाः स्मृता वैश्या निर्दण्डः शूद्र उच्यते॥ (महाभारत)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D-12-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5-015 महाभारत], शान्तिपर्व, अध्याय-१५, श्लोक-११।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;[[Mahabharat (महाभारत)|महाभारत]] काल में [[Varna Dharma (वर्णधर्मः)|वर्णव्यवस्था]] अनुसार यदि ब्राह्मण अपराध करे तो वाणी से उसको अपमानित करना ही उसका दण्ड है। क्षत्रिय को भोजन मात्र के लिये वेतन देकर उससे कार्य लेना उसका दण्ड है। वैश्यों से जुर्माना के रूप में धन वसूल करना उसका दण्ड है, किन्तु शूद्र दण्ड रहित कहे गये हैं। प्राचीन भारत में दण्ड का उद्देश्य अपराध की निवृत्ति एवं समाज कल्याण था।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थी- रश्मि तिवारी, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/327696 याज्ञवल्क्यस्मृति में न्याय एवं दण्ड व्यवस्था], सन २००४, राजशास्त्र विभाग- महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी (पृ० २११)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दण्ड व्यवस्था एवं मानसिक परिष्कार==&lt;br /&gt;
प्राचीन भारतवर्ष में दण्ड-व्यवस्था का परम उद्देश्य अपराध-निवृत्ति तथा लोककल्याण की प्रतिष्ठा था। दण्ड का प्रयोजन केवल दमन न होकर अपराधी के संस्कारपरिवर्तन में निहित था। अतः दण्ड-विधान में प्रायश्चित्त का विशेष प्राधान्य प्राप्त था, जिससे अपराधी पुनः शुद्धि एवं पावनता की अवस्था को प्राप्त हो सके। धर्मशास्त्रज्ञों के मत में अपराध-निवारण के लिये बहुविध दण्ड-प्रणालियाँ प्रचलित थीं। जैसे मनुस्मृति -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;वाग्दण्डं प्रथमं कुर्याद्धिग्दण्डं तदनन्तरम्। तृतीयं धनदण्डं तु वधदण्डमतः परम्॥ (मनुस्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%85%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय- ८, श्लोक- १२९।&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;/blockquote&amp;gt;याज्ञवल्क्यस्मृति -  &amp;lt;blockquote&amp;gt;धिग्दण्डस्त्वथवाग्दण्डो धनदण्डोवधस्तथा। योज्या व्यस्ताः समस्ता व ह्यपराधवशादिमे॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्य स्मृति], आचाराध्याय, श्लोक - ३६७।&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;/blockquote&amp;gt;मनु, याज्ञवल्क्य तथा बृहस्पति ने चार प्रमुख दण्ड-विधियों का निर्देशन किया है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''वाक्-दण्ड﻿'''&lt;br /&gt;
#'''धिक्-दण्ड'''&lt;br /&gt;
#'''धन-दण्ड'''&lt;br /&gt;
#'''वध-दण्ड'''﻿&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये दण्ड अपराध की प्रकृति के अनुसार पृथक-पृथक या सम्मिलित रूप में भी प्रयोग किए जाते थे। वाक्-दण्ड और धिक्-दण्ड का प्रयोग प्रायः अपराधी के सुधार के लिए किया जाता था। वाक्-दण्ड में अपराधी को उपदेशात्मक वचनों द्वारा यह समझाया जाता था कि उसका कृत्य अनुचित है और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। धिक्-दण्ड में इससे एक कदम आगे बढ़कर अपराधी की निंदा या धिक्कार की जाती थी, जैसे – 'तुम्हें धिक्कार है', 'तुम पाप के भागी हो' या 'तुम दुष्ट आचरण करने वाले हो।' विचारशील और संवेदनशील व्यक्तियों के लिए ये दोनों प्रकार के दण्ड अपराध से निवृत्त होने हेतु पर्याप्त माने जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*मनु के अनुसार, दण्ड प्रदान करने की क्रमबद्ध प्रक्रिया में पहले वाक्-दण्ड, फिर धिक्-दण्ड, उसके पश्चात अर्थ-दण्ड और अंत में आवश्यकता पड़ने पर वध-दण्ड दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
*वृहस्पति के अनुसार गुरुजनों, पुरोहितों, आचार्यों तथा पुत्रों को शारीरिक दण्ड से मुक्त रखा गया था, उन्हें केवल वाक् या धिक्-दण्ड ही दिया जाता था।&lt;br /&gt;
*जबकि महापातक अपराधों के लिए शारीरिक या वध-दण्ड का विधान था।&lt;br /&gt;
*वाक्-दण्ड और धिक्-दण्ड प्राड्विवाक (न्यायाधीश) द्वारा तथा वध-दण्ड राज द्वारा प्रदान किया जाता था।&lt;br /&gt;
शुक्राचार्य वध दण्ड का निषेध करते हैं, उनका मत है कि यदि कोई व्यक्ति अपने धन के गर्व से अपराध करता है तो उसे धन का चौथा भाग दण्ड के रूप में लेना चाहिये। उसके बाद भी यदि अपराध करता है तो आधा धन ले लेना चाहिये - &amp;lt;blockquote&amp;gt;भार्या पुत्रश्च भगिनी शिष्यो दासः स्नुषाऽनुजः। कृतापराधास्ताड्यास्ते तनुरज्जुसुवेणुभिः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमांगे कथञ्चन। अतोऽन्यथा तु प्रहरेच्चोरवद्दण्डमर्हति॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीचकर्मकरं कुर्याद् बन्धयित्वा तु पापिनम्। मासमात्रं त्रिमासं वा षण्मासं वाऽपि वत्सरम्। यावज्जीवं तु वा कश्चिन्न कश्चिद्वधमर्हति॥ (शुक्रनीति)&amp;lt;ref&amp;gt;पं० श्री ब्रह्माशंकर मिश्र, [https://dn721605.ca.archive.org/0/items/20230223_20230223_0110/%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%20%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%20%E0%A4%9F%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4.pdf शुक्रनीति]-विद्योतिनी हिन्दीव्याख्या समेत, सन १९६८, चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, वाराणसी (पृ० १९६)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;अपनी स्त्री, पुत्र, बहन, शिष्य, सेवक, छोटा भाई या बहु अपराध करे तो उसे पतली छडी से शरीर पर, हाथ या पीठ पर पीटना चाहिये। सिर पर कभी नहीं मारना चाहिये। वेद वचन का अनुसरण करते हुये शुक्राचार्य वधदण्ड की स्वीकृति नहीं देते हैं। वध दण्ड के स्थान पर हथकडी, वेडी के साथ कैद रखना, मारना-पीटना कष्ट पहुँचाना उचित है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० पूनम कुमारी, [https://www.jetir.org/papers/JETIR1901B60.pdf शुक्राचार्य की दण्डनीति], सन २०१९, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज एंड इनोवेटिव रिसर्च (पृ० ४६१)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==व्यवहार के अठारह प्रकार==&lt;br /&gt;
मनु, याज्ञवल्क्य तथा नारद स्मृतियों में अपराध तथा दण्ड व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया गया है। धर्मशास्त्र में उन विषयों को जिनके अन्तर्गत विवाद उत्पन्न हो सकता है उन्हें अठारह शीर्षकों में रखा है -&amp;lt;ref&amp;gt;रेखा सिंह, राकेश शर्मा, [https://www.socialsciencejournal.in/assets/archives/2016/vol2issue8/2-10-32-983.pdf मनु याज्ञवल्क्य एवं नारद स्मृतियों में वर्णित दण्ड व्यवस्था], सन २०१६, इण्टरनेशनल जर्नल ऑफ ह्यूमैनिटीज एण्ड सोशल साइंस रिसर्च (पृ० १०८)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;प्रत्यहं देशदृष्टैश्च शास्त्रदृष्टैश्च हेतुभिः। अष्टादशसु मार्गेषु निबद्धानि पृथक्पृथक्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेषां आद्यं ऋणादानं निक्षेपोऽस्वामिविक्रयः। संभूय च समुत्थानं दत्तस्यानपकर्म च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेतनस्यैव चादानं संविदश्च व्यतिक्रमः। क्रयविक्रयानुशयो विवादः स्वामिपालयोः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सीमाविवादधर्मश्च पारुष्ये दण्डवाचिके। स्तेयं च साहसं चैव स्त्रीसंग्रहणं एव च॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्रीपुंधर्मो विभागश्च द्यूतं आह्वय एव च। पदान्यष्टादशैतानि व्यवहारस्थिताविह॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%85%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय- ८, श्लोक - ३-७।&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;/blockquote&amp;gt;भाषार्थ - न्याय-व्यवस्था की शरण में जाने या मुकदमों के लिए मनु ने १८ कारण गिनाये हैं। जिनके नाम हैं - ऋण और धरोहर का भुगतान न करना, बिना स्वामित्व का विक्रय करना, साझीदारों के संबंध में गडबडी हो जाना, दान दी हुई वस्तु को पुनः वापिस लेना, पारिश्रमिक का भुगतान न करना, समझौतों को भंग करना, क्रय-विक्रय की व्यवस्था का उल्लंघन करना, स्वामी तथा भृत्य के बीच विवाद पैदा होना, सीमा संबंधी अडचन का उपस्थित होना, किसी को मारना, किसी का अपमान करना, किसी की चोरी करना, हिंसा तथा व्यभिचार करना, वैयक्तिक कर्त्तव्यों को न निभाना, पैतृक सम्पत्ति के बँटवारे में मतभेद हो जाना और जुआ तथा पांसा आदि खेलना।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/koutheliy-arthshastra-hindi/Arthasastra%20Of%20Kautilya%20%26%20Chanakya%20Sutra%20Vachaspati%20Gairola%20Chowkambha/mode/1up कौटिलीय-अर्थशास्त्र-हिन्दीव्याख्यासमेत], सन १९८४, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० ५३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनु एवं अन्य स्मृतिकारों में व्यवहारपदों की संख्या एवं संज्ञा को लेकर पर्याप्त भिन्नता है। निम्नलिखित तालिका इस कथन को स्पष्ट करती है -&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० पांडुरंग वामन काणे, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.306909/page/n143/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास भाग-२], सन १९६५,  उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (पृ० ७०७)।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+व्यवहारपदों की तुलना&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० पांडुरंग वामन काणे, [https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.306909/page/n143/mode/1up धर्मशास्त्र का इतिहास भाग-२], सन १९६५,  उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (पृ० ७०७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
!क्र०सं०&lt;br /&gt;
!मनु&lt;br /&gt;
!कौटिल्य&lt;br /&gt;
!याज्ञवल्क्य&lt;br /&gt;
(मिताक्षरा)&lt;br /&gt;
! नारद&lt;br /&gt;
!बृहस्पति&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|०१&lt;br /&gt;
|ऋणादान&lt;br /&gt;
|ऋणादान&lt;br /&gt;
|ऋणादान&lt;br /&gt;
|ऋणादान&lt;br /&gt;
|कुसीद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|०२&lt;br /&gt;
|निक्षेप&lt;br /&gt;
|उपनिधि&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|निक्षेप&lt;br /&gt;
|निधि&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|०३&lt;br /&gt;
|अस्वामिविक्रय&lt;br /&gt;
|अस्वामिविक्रय&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|अस्वामिविक्रय&lt;br /&gt;
|अस्वामिविक्रय&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|०४&lt;br /&gt;
|सम्भूय-समुत्थान&lt;br /&gt;
|सम्भूय-समुत्थान&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|सम्भूय-समुत्थान&lt;br /&gt;
|सम्भूय-समुत्थान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|०५&lt;br /&gt;
|दत्तस्यानपाकर्म&lt;br /&gt;
|दत्तस्यानपाकर्म&lt;br /&gt;
|दत्ताप्रदानिक&lt;br /&gt;
|दत्ताप्रदानिक&lt;br /&gt;
|अदेयाद्य&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|०६&lt;br /&gt;
|वेतनादान&lt;br /&gt;
|कर्मकरकल्प&lt;br /&gt;
|वेतनादान&lt;br /&gt;
|वेतनस्यानपाकर्म&lt;br /&gt;
|भृत्यदान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|०७&lt;br /&gt;
|संविद्-व्यतिक्रम&lt;br /&gt;
|समयस्यानपाकर्म&lt;br /&gt;
|संविद्-व्यतिक्रम&lt;br /&gt;
|समयस्यानपाकर्म&lt;br /&gt;
|समयातिक्रम&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|०८&lt;br /&gt;
|क्रयविक्रयानशय&lt;br /&gt;
|विक्रीत-क्रीतानशय&lt;br /&gt;
|क्रीतानुशय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विक्रीयासप्रदान&lt;br /&gt;
|क्रीतानुशय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विक्रीयासप्रदान&lt;br /&gt;
|क्रयविक्रयानुशय&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| ०९&lt;br /&gt;
|स्वामिपालविवाद&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|स्वामिपालविवाद&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|१०&lt;br /&gt;
|सीमाविवाद&lt;br /&gt;
|सीमाविवाद&lt;br /&gt;
|सीमाविवाद&lt;br /&gt;
|क्षेत्रजविवाद&lt;br /&gt;
|भूवाद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|११&lt;br /&gt;
|वाक्पारुष्य&lt;br /&gt;
|वाक्पारुष्य&lt;br /&gt;
|वाक्पारुष्य&lt;br /&gt;
|वाक्पारुष्य&lt;br /&gt;
|वाक्पारुष्य&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|१२&lt;br /&gt;
|दण्डपारुष्य&lt;br /&gt;
|दण्डपारुष्य&lt;br /&gt;
|दण्डपारुष्य&lt;br /&gt;
|दण्डपारुष्य&lt;br /&gt;
|दण्डपारुष्य&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|१३&lt;br /&gt;
|स्तेय&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|स्तेय&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|स्तेय&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|१४&lt;br /&gt;
|साहस&lt;br /&gt;
|साहस&lt;br /&gt;
|साहस&lt;br /&gt;
|साहस&lt;br /&gt;
|वध&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|१५&lt;br /&gt;
|स्त्रीसंग्रहण&lt;br /&gt;
|संग्रहण&lt;br /&gt;
|स्त्री-संग्रहण&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|स्त्रीसंग्रह&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|१६&lt;br /&gt;
|स्त्रीपुंधर्म&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|स्त्रीपुंसयोग&lt;br /&gt;
|स्त्रीपुंसयोग&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| १७&lt;br /&gt;
|विभाग&lt;br /&gt;
|दायभाग&lt;br /&gt;
|दायविभाग&lt;br /&gt;
|दायभाग&lt;br /&gt;
|दायभाग&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|१८&lt;br /&gt;
|द्यूतसमाह्वय&lt;br /&gt;
|द्यूतसमाह्वय&lt;br /&gt;
|द्यूतसमाह्वय&lt;br /&gt;
|द्यूतसमाह्वय&lt;br /&gt;
|अक्षदेवन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|१९&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|प्रकीर्णक&lt;br /&gt;
|अभ्युपेत्याशुश्रूषा&lt;br /&gt;
|अभ्युपेत्याशुश्रूषा&lt;br /&gt;
|अशुश्रूषा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|२०&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
|प्रकीर्णक&lt;br /&gt;
|प्रकीर्णक&lt;br /&gt;
|प्रकीर्णक&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
परंपरा और शास्त्रों द्वारा, अष्टादश (18) व्यवहारपदों का उल्लेख है। अर्थात ये अठारह प्रकार के न्यायिक विषय (cases or legal proceedings) जिन पर राज्य में न्याय किया जाता है। ये सब पृथक-पृथक रूप से निर्धारित हैं -  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#'''ऋणदान -''' इसमें ऋण के लेने देने से उत्पन्न होने वाले विवाद आते हैं।&lt;br /&gt;
#'''निक्षेप -''' इसके अन्तर्गत अपनी वस्तु को दूसरे के पास धरोहर रखने से उत्पन्न विवाद आते हैं।&lt;br /&gt;
#'''अस्वामी विक्रय -''' अधिकार न होते हुये दूसरे की वस्तु बेच देना।&lt;br /&gt;
#'''संभूय समुत्थान -''' अनेक जनों का मिलकर साँझे में व्यवसाय करना।&lt;br /&gt;
#'''दत्तस्य अनपाकर्म -''' कोई वस्तु देकर फिर क्रोध आदि लोभ के कारण बदल जाना।&lt;br /&gt;
#'''वेतन का न देना -''' किसी से काम लेकर उसका मेहनताना न देना।&lt;br /&gt;
#'''संविद का व्यतिक्रम -''' कोई व्यवस्था किसी के साथ करके उसे पूरा न करना।&lt;br /&gt;
#'''क्रय विक्रय का अनुशय -''' किसी वस्तु के खरीदने या बेचने के बाद में असंतोष होना।&lt;br /&gt;
#'''स्वामी और पशुपालन का विवाद -''' चरवाहे की असावधानता से जानवरों की मृत्यु आदि के संबंध में।&lt;br /&gt;
#'''ग्राम आदि की सीमा का विवाद -''' मकान आदि की सीमा विवाद भी इसी में आता है।&lt;br /&gt;
#'''वाक पारूष्य -''' गाली गलौच करना पारूष्य&lt;br /&gt;
#'''दण्ड पारुष्य -''' मारपीट&lt;br /&gt;
#'''स्तेय (चोरी) -''' यह कृत्य स्वामी से छिपकर होता है।&lt;br /&gt;
#'''सहस-डकैती -''' बल पूर्वक स्वामी की उपस्थिति में धन का हरण।&lt;br /&gt;
#'''स्त्री संग्रहण -''' स्त्रियों के साथ व्यभिचार&lt;br /&gt;
#'''स्त्री पुंधर्म -''' स्त्री और पुरुष (पत्नी-पति) के आपस में विवाद।&lt;br /&gt;
#'''विभाग-दाय विभाग -''' पैतृक संपत्ति आदि का विभाजन।&lt;br /&gt;
#'''द्यूत और समाहृय -''' दोनों जुआँ के अन्तर्गत आते हैं। प्राणी रहित पदार्थों के द्वारा ताश, चौपड, जुआ, द्यूत कहलाता है। प्राणियों के द्वारा तीतर, बटेर आदि का युद्ध घुडदौड आदि समाहृय।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यवहार के इन अठारह पदों का वर्णन मनुस्मृति में किया गया है। नारद स्मृति में व्यवहार के जिन अठारह पदों का वर्णन किया गया है, वे मनुस्मृति से कुछ भिन्न हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० श्रीमती विभा, [https://ia800408.us.archive.org/34/items/DharmaShastraSahityaMeinApradhEvamDandVidhanDr.Vibha/Dharma%20Shastra%20Sahitya%20Mein%20Apradh%20Evam%20Dand%20Vidhan%20-%20Dr.%20Vibha.pdf धर्मशास्त्र साहित्य में अपराध एवं दण्ड विधान], सन २००२, संस्कृत ग्रन्थागार, दिल्ली (पृ० ३०)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== दण्ड व्यवस्था का महत्व==&lt;br /&gt;
भारतीय ज्ञान परंपरा में राजधर्म के अन्तर्गत राजा का यह कर्तव्य है कि वह धर्म का उल्लंघन करने वाले को दण्डित करें एवं धर्म का पालन करने वालों की रक्षा करें। मनु के अनुसार राजा दण्डाधिकारी है। गौतम के अनुसार दण्ड से अभिप्राय है नियंत्रित करना। भारतीय धर्म ग्रन्थों महाभारत, वेदों, पुराणों एवं उपनिषदों में दण्ड की महत्ता के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। कामन्दक नीतिसार (द्वितीय १५), शुक्रनीति (प्रथम, १४) और महाभारत (शांतिपर्व, १५-८) की परिभाषा के अनुसार अपराधों का दमन (दम) ही दण्ड अथवा नीति कहलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उपाय चतुष्टय एवं दण्ड नीति==&lt;br /&gt;
आन्वीक्षिकी, त्रयी और वार्ता, इन सभी विद्याओं की सुख-समृद्धि दण्ड पर निर्भर है। दण्ड को प्रतिपादित करने वाली नीति ही दण्डनीति कहलाती है - &amp;lt;blockquote&amp;gt;अलब्धलाभार्थाः, लब्धपरिरक्षणी, रक्षितविवर्धनी, वृद्धस्यतीर्थेषु प्रतिपादनी च॥ (अर्थशास्त्र)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;कौटिल्य के द्वारा अर्थ-शास्त्र में दण्ड-नीति के चार प्रयोजन बतलाए गए हैं -  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*अलब्ध-लाभ&lt;br /&gt;
*लब्ध-परिरक्षण&lt;br /&gt;
*रक्षित-सम्वर्धन&lt;br /&gt;
*सम्वर्धित सम्पत्ति का पात्र में समर्पण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार से उचित रूप में बताये गये दण्ड-प्रयोग करने से मूर्त्त धन-धान्यादि तथा अमूर्त्त यश की प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः। दण्ड-नीतिरिति ख्याता त्रींल्लोकानभिवर्त्तते॥ (महाभारत)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपायाः साम दानं च भेदो दण्डस्तथैव च। सम्यक्प्रयुक्ताः सिध्येयुर्दण्डस्त्वगतिका गतिः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्य स्मृति], आचाराध्याय, श्लोक- ३४६।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साम, दान, भेद और दण्ड- ये चार उपाय बताए गए हैं। जब इनका उचित समय पर और सही प्रकार से प्रयोग किया जाए, तो ये सभी उद्देश्य की सिद्धि कर देते हैं। किन्तु जब अन्य उपाय असफल हो जाएं, तब दण्ड ही शेष उपाय (अंतिम मार्ग) रह जाता है। महाभारत में युधिष्ठिर के प्रति भीष्म का कथन है कि - &amp;lt;blockquote&amp;gt;दण्ड-नीत्यां यदा राजा सम्यक्कार्त्स्येन वर्त्तते। तदा कृत-युगं नाम कालसृष्टं प्रवर्त्तते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दण्ड-नीत्यां यदा राजा त्रीनंशाननुवर्त्तते। चतुर्थमंशमुत्सृज्य तदा त्रेता प्रवर्त्तते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्धं त्यक्त्वा यदा राजा नीत्यर्धमनुवर्त्तते। ततस्तु द्वापरं नाम स कालः सम्प्रवर्त्तते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दण्ड-नीति परित्यज्य यदा कार्त्स्येन भूमिपः। प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रवर्त्तेत तदा कलिः॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा कृत-युग-स्रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च। युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम्॥ (महाभारत)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A5%8D-12-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5-069 महाभारत], शांतिपर्व, अध्याय- ६९, श्लोक- १५-१८।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलि-युग का अर्थ है - दण्ड के प्रयोग में राजा के अवधान का आधिक्य और अल्पत्व। इससे यही सार निकलता है कि राजा की कुशलता तथा अकुशलता के ऊपर ही कृत-युग तथा कलियुग निर्भर हैं, इनकी कोई निश्चित अवधि नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निष्कर्ष==&lt;br /&gt;
न्याय-कार्य मुख्यतः राजा के अधीन थे। राजा प्रारम्भिक एवं अन्तिम न्यायालय था। स्मृतियों एवं निबन्धों का कहना है कि अकेला राजा न्याय-कार्य नहीं कर सकता, उसे अन्य लोगों की सहायता से न्याय करना चाहिए। राजा अन्तिम न्यायकर्ता थे और उनके नीचे का न्यायालय उसके द्वारा नियुक्त न्यायाधीशों का न्यायालय था। बृहस्पति का कथन है कि साहस नामक मामलों के अतिरिक्त सभी प्रकार के मुकदमों का फैसला कुल, श्रेणी एवं गण कर सकते थे, किन्तु निर्णयों को कार्यान्वित करने का अधिकार राजा को ही प्राप्त था। पितामह ने तीन प्रकार के न्यायालयों की ओर संकेत किया है, किन्तु याज्ञवल्क्य एवं नारद ने दो न्यायलयों की चर्चा की है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#मुख्य न्यायाधीश का न्यायालय&lt;br /&gt;
#राजा का न्यायालय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पितामह ने लिखा है कि ग्राम में किया गया निर्णय नगर में पहुँचता है और नगर वाला निर्णय राजा के पास और राजा का निर्णय गलत है या सही, वही अन्तिम होता है। शास्त्रों में अपराध निवारण हेतु अथवा अधर्म उन्मूलन के लिये तथा धर्म की स्थापना के लिये जो उपाय उन्हैं कहीं दण्ड तथा कहीं शाप शब्द के द्वारा सम्बोधित किया जाता है। प्राचीन भारतवर्ष में दण्डव्यवस्था के प्रमुख दो रूप दृष्टिगोचर होते हैं - शपनम् इति शापः। प्रथम राजा के द्वारा दिया जाने वाला राजदण्ड तथा दूसरा ऋषि-महर्षियों, तपस्वियों द्वारा दिया जाने वाला शापदण्ड।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Achara_(%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0)&amp;diff=137524</id>
		<title>Achara (आचार)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Achara_(%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0)&amp;diff=137524"/>
		<updated>2025-12-04T12:05:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: सुधार जारी&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार (संस्कृतः आचारः) को धर्म का मूलाधार, मानव-चरित्र का दर्पण, समाज-व्यवस्था का नियामक तथा आध्यात्मिक विकास का साधन बताया गया है। स्मृतियों में यह स्पष्ट रूप से व्यक्त है कि आचार केवल किसी व्यक्ति के बाहरी कर्मों का समूह नहीं, अपितु उसके चरित्र, सद्बुद्धि, समाजबोध और आत्मानुशासन का सम्मिलित रूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
मानव के विधिबोधित क्रिया-कलापोंको आचारके नामसे सम्बोधित किया जाता है। आचार-पद्धति ही सदाचार या शिष्टाचार कहलाती है। मनीषियोंने पवित्र और सात्त्विक आचारको ही धर्मका मूल बताया है - धर्ममूलमिदं स्मृतम्। धर्मका मूल श्रुति- स्मृतिमूलक आचार ही है इतना ही नहीं, षडङ्ग-वेद ज्ञानी भी यदि आचार से हीन हो तो वेद भी उसे पवित्र नहीं बनाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार मानवता का पोषक, रक्षक और सुख का परम आधार है। पुराणों में कहा गया है कि यदि कोई मनुष्य वेदों का ज्ञान रखता हो, विभिन्न शास्त्रों को जानता हो, फिर भी यदि उसके जीवन में आचार का सम्यक् पालन नहीं है, तो वेद या शास्त्रों का ज्ञान उसे पूर्ण फल नहीं दे सकता। प्राचीन ऋषियों और परम्पराओं ने मनुष्य के आचरण के लिए अनेक विधियाँ निश्चित की हैं, और यह विशेष रूप से बताया गया है कि मनुष्य को किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार वह मार्ग है जो मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध करता है। कोई भी वस्तु उसके लिए अमंगलकारी नहीं बनती और न ही कोई बाधा उत्पन्न होती है। जो व्यक्ति आचार का पालन करता है, उसे स्वाभाविक रूप से सत्य-ज्ञान प्राप्त होता है। महर्षियों और धर्मग्रंथों ने आचार को धर्म का मूल अंग माना है और संत-महात्माओं ने भी सदैव यही कहा है कि आचार ही मनुष्य का वास्तविक श्रृंगार है। पुराणों के अनुसार आचार का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। जैसे - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदय से पूर्व जागरण, प्रातः स्नान, संध्या, तप, वेद-स्वाध्याय, देव-सेवा, गो-सेवा, अतिथि-सत्कार, मृदु-वाणी, गुरु-सेवा, सत्य-पालन, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, दान, करुणा, विनम्रता, धर्मपालन इत्यादि - ये सभी सदाचार के अंग माने गए हैं। आचार को प्रथम धर्म कहा है -&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारः प्रथमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च। तस्मादस्मिन्समायुक्तो नित्यं स्यादात्मनो द्विजः॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचाराल्लभते चायुराचाराल्लभते प्रजाः। आचारादन्नमक्षय्यमाचारो हन्ति पातकम्॥ (देवी भागवत ११.१.९/१०)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A7/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A6%E0%A5%A7 देवी भागवत], स्कन्ध- ११, अध्याय- १, श्लोक- ९/१०।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनुवाद -''' आचार ही प्रथम (मुख्य) धर्म है-ऐसा श्रुतियों तथा स्मृतियोंमें कहा गया है, अतएव द्विजको चाहिये कि वह अपने कल्याणके लिये इस सदाचारके पालनमें नित्य संलग्न रहे। मनुष्य आचार से आयु प्राप्त करता है, आचारसे सत्सन्तानें प्राप्त करता है ,आचारसे अक्षय अन्न प्राप्त करता है तथा यह आचार पापको नष्ट कर देता है। धर्मशास्त्र परंपरा में वेद और स्मृतियों के साथ-साथ सामाजिक आचार को भी धर्म के विषय में प्रमाण माना जाता है। भारतीय चिन्तन धारा ने जाति, कुल, ग्राम, देश आदि के अपने आचार व रीति रिवाजों को धर्म माना है। यह व्यवस्था धर्मशास्त्र को जीवन्तता प्रदान करती है। मनु ने धर्म के निम्नलिखित स्रोत बताये हैं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम्॥ (मनु स्मृति २.१२ )&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय- २, श्लोक- १२।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद, स्मृति, सदाचार तथा स्वयं का प्रिय - ये धर्म के चार स्रोत हैं। यदि अपने कार्य अकार्य के विषय में जानना हो तो इनसे जाना जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा॥ Definition==&lt;br /&gt;
भारतीय आचार-शास्त्र में उचित आचरण को आचार तथा अनुचित आचरण को अनाचार कहा गया है। वृहत्त् संस्कृताभिधान वाचस्पत्य के अनुसार ‘आचार’ की व्युत्पत्ति का विवेचन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि आचार को दो रूपों सदाचार एवं दुराचार में वर्गीकृत किया जाता है - &amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - मासुमा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/455720 वैदिक परम्परा में आचार मीमांसा एक अध्ययन], सन २०२२, शोधकेन्द्र - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचरणै अनुष्ठाने स च अनुष्ठान निवृत्त्यात्मक भावाभावरूपः। तत्र सदाचारः वेदस्मृत्यादि विहित तत्र नित्य निषिद्धश्च कदाचार इति भेदात् द्विविधः वाचस्पत्यम्। (व्यवहार प्रकाश)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;शिष्ट व्यक्तियों द्वारा अनुमोदित एवं बहुमान्य रीति-रिवाजों को आचार कहते हैं। स्मृति या विधि सम्बन्धी संस्कृत ग्रन्थों में आचार का महत्व भली भाँति दर्शाया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:3&amp;quot;&amp;gt;डॉ० राजबली पाण्डेय, [https://dn790006.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.540544/2015.540544.Hindu-Dharm.pdf हिन्दू धर्मकोश] (१९८८), उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (पृ० ७४)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आचार का स्वरूप॥ Achara ka Svaroop ==&lt;br /&gt;
आचार के संबंध में ऋषि कहते हैं कि - धर्मानुकूल शारीरिक व्यापार ही सदाचार है। केवल शारीरिक व्यापार या शारीरिक चेष्टा सदाचार नहीं, वह तो अंग संचालन मात्र की क्रिया है। उससे स्थूल शारीरिक लाभ के अतिरिक्त आत्मोन्नति का सम्बन्ध नहीं। इस कारण मात्र शारीरिक क्रिया को आचार नहीं कहते। शारीरिक व्यापार या शारीरिक चेष्टा जब धर्मानुकूल अथवा किसी प्रकार धर्म को लक्ष्य करते हुये होती है तब वह सदाचार होता है और तब उससे स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीर की उन्नति और साथ ही साथ आत्मा का भी अभ्युदय साधन होता है। यह धर्मानुकूल आचरण ही सदाचार है। महर्षि वसिष्ठ लिखते हैं कि-&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारः परमोधर्मः सर्वेषामिति निश्चयः। हीनाचार परीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति॥ (वसिष्ठ संहिता)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE वसिष्ठ संहिता], अध्याय ६, श्लोक १।&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् यह निश्चय है कि आचार ही सबका परम धर्म है आचार भ्रष्ट मनुष्य इस लोक और परलोक दोनों में नष्ट होता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारहीनं न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्‌भिरङ्‌गैः। छन्दांस्येनं मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः॥ (देवी भागवत ११.२.१)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot;&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A7/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A6%E0%A5%A8 देवी भागवत], स्कन्ध ११, अध्याय २, श्लोक १।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आचार हीन व्यक्ति यदि सांगोपांग वेदों का विद्वान् भी है तो वेद उसको पवित्र नहीं कर सकते और वैदिक ऋचायें भी उसे अन्तकाल में इसी प्रकार त्याग देती हैं जैसे अग्नि के ताप से तप्त घोंसले को पक्षी त्याग देते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारात्फलते धर्ममाचारात्फलते धनम्। आचाराच्छ्रियमाप्नोति आचारो हन्त्यलक्षणम्॥ (वसिष्ठ संहिता)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:2&amp;quot; /&amp;gt;  &amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसके अतिरिक्त दुराचारी मनुष्य लोक में निन्दित, दु:ख का भागी, रोग ग्रस्त और अल्पायु होता है। सदाचार का फल धर्म है, सदाचार का फल धन है, सदाचार से श्री की प्राप्ति होती है तथा सदाचार कुलक्षणों को नाश करता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारः परमो धर्मः आचारः परमं तपः। आचारः परमं ज्ञानं आचारात् किं न साध्यते॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचाराद् विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्नुते। आचारेण समायुक्तः सम्पूर्णफलभाग् भवेत्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यः स्वाचारपरिभ्रष्टः साङ्गवेदान्तगोऽपि चेत्। स एव पतितो ज्ञेयो सर्वकर्मबहिष्कृतः॥ (वसिष्ठ संहिता)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE वसिष्ठ संहिता], अध्याय ६, श्लोक ४/५।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आचार ही सर्वोत्तम धर्म है, आचार ही सर्वोत्तम तप है, आचार ही सर्वोत्तम ज्ञान है, यदि आचारका पालन हो तो असाध्य क्या है! अर्थात कुछ भी नहीं। शास्त्रोमें आचारका ही सर्वप्रथम उपदेश ( निर्देशन ) हुआ है । धर्म भी आचारसे ही उत्पन्न है ( अर्थात् ) आचार ही धर्मका माता-पिता है और एकमात्र ईश्वर ही धर्मका स्वामी है । इस प्रकार आचार स्वयं ही परमेश्वर सिद्ध होता है। एक ब्राह्मण जो आचारसे च्युत हो गया है,वह वेदोंके फलकी प्राप्तिसे वञ्चित हो जाता है चाहे वेद-वेदाङ्गोंका पारंगत विद्वान् ही क्यो न हो किंतु जो आचारका पालन करता है वह सबका फल प्राप्त कर लेता है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आचार के प्रकार॥ Types of Achara==&lt;br /&gt;
मनु स्मृति में आचार के विषय में कहा गया है कि आचार, आत्म अनुभूतिजन्य एक प्रकार की विधि है एवं सभी को इसका पालन अवश्य करना चाहिए। धर्म के स्रोतों में श्रुति और स्मृति के पश्चात आचार का तीसरा स्थान है। कुछ विद्वान तो उसको प्रथम स्थान देते हैं, क्योंकि उनके विचार में धर्म आचार से ही उत्पन्न होता है - आचारप्रभवो धर्म। इस प्रकार के लोकसंग्राहक धर्म को तीन भागों में बाँटा गया है - आचार, व्यवहार और [[Prayaschitta (प्रायश्चित्त)|प्रायश्चित्त]]। याज्ञवल्क्यस्मृति का प्रकरण-विभाजन इन्हीं तीन रूपों में है। याज्ञवल्क्य जी ने आचार के अन्तर्गत निम्नलिखित विषय सम्मिलित किये हैं - संस्कार, चारित्रिक नियम, विवाह एवं कर्त्तव्य, वर्ण एवं आश्रम व्यवस्था, आहार सेवन विधि, श्राद्ध आदि।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:3&amp;quot; /&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===सदाचार===&lt;br /&gt;
सदाचार आध्यात्मिकता के विकास के लिए किया जाने वाला आचरण है, सदाचार के अन्तर्गत सेवा, शालीनता, अहिंसा, सादा जीवन उच्च विचार जैसी श्रेष्ठ भावों को सम्मिलित किया जा सकता है। यदि संयम प्राण ऊर्जा का संग्रहण करता है तो प्राण ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन सदाचार द्वारा ही हो सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सदाचार यह दो शब्दों के योग से बना है - सत् एवं आचार अर्थात उत्तम कार्यशैली, शुद्ध आचरण एवं दोषरहित पवित्र कार्यों के सम्पादन को ही सदाचार कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार सज्जनों के आचार का नाम सदाचार है - सतां सज्जनानामाचारः-सदाचारः, शास्त्र सम्मत सज्जनों के आचरण का नाम सदाचार है।&amp;lt;ref&amp;gt;शोधार्थी - किरण कुमारी, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/655106 भारतीय दर्शन में सदाचारः एक दार्शनिक विश्लेषण] (२०२५), ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा (पृ० ३)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संयम व सदाचार को लेकर साइकोन्यूरो इम्यूनोलॉजी के क्षेत्र में वैज्ञानिक डा० आर० डेविडसन और पी० एरिकसन का प्रयोग है, जिसमें २०० व्यक्ति जो संयम व सदाचार का पालन करते हुए अध्यात्म के प्रति आस्थावान् थे तथा २०० ऐसे व्यक्ति जो भोग्विलास तथा अस्त-व्यस्त जीवन-यापन कर रहे थे। अध्ययन पश्चात वैज्ञानिकों ने देखा कि जो संयम व सदाचार युक्त जीवनयापन करते हैं, वे कम बीमार हुए एवं मानसिक स्थिरता उनके अन्दर ज्यादा थी। इसके विपरीत जिन व्यक्तियों ने इसे पालन नहीं किया वे शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः वैज्ञानिक प्रमाणों द्वारा भी ज्ञात होता है कि संयम व सदाचार व्यक्ति के जीवन में आवश्यक है।&amp;lt;ref&amp;gt;डॉ० जितेन्द्र शर्मा, [https://ijcrt.org/papers/IJPUB1304104.pdf आध्यात्मिक जीवनशैली के तत्त्व-संयम व सदाचार], सन २०१६, इण्टरनेशनल जर्नल ऑफ क्रिएटिव रिसर्च ठॉट्स (पृ० २)।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===दुराचार===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आचार की दार्शनिक संरचना॥ Philosophical Structure of Achara ==&lt;br /&gt;
आचार से आशय उस श्रेष्ठ आचरण से है जिसे व्यक्ति अपने जीवन में अपनाता है। यह धर्म, नैतिकता और सामाजिक दृष्टि से ऐसा आचरण है जिसे सभी लोग अनुसरण योग्य मानते हैं। आचार का निर्धारण समाज की समष्टि-हित भावना को ध्यान में रखकर किया जाता है; इसलिए यह सदैव शोभनीय और लोक-हितकारी होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार को ही लोकाचार, शिष्टाचार तथा सदाचार जैसे नामों से भी अभिहित किया जाता है। यह सामान्यतः व्यक्ति के चरित्र, उसके आचरण, उसकी योग्यता और उसकी शील-संपन्नता का परिचायक होता है। आचार मनुष्य के व्यवहार का वह रूप है जो समाज में उसके व्यक्तित्व को आदर और प्रतिष्ठा प्रदान करता है। अखंड रूप से देखें तो आचार वही होता है, जिससे स्वयं व्यक्ति और समाज - दोनों का हित साधित होता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृतियों के अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी देश या समुदाय के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो उसे वहाँ की परम्पराओं, आचारों, सामाजिक व्यवहार तथा कुल-सम्बन्धी मर्यादाओं का उसी प्रकार पालन करना चाहिए - &amp;lt;blockquote&amp;gt;यस्मिन्देशे य आचारो व्यवहारः कुलस्थितिः । तथैव परिपाल्योऽसौ यदा वशं उपागतः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति १.३४३)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्य स्मृति], आचाराध्याय, श्लोक 343।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' जिस स्थान में जिस प्रकार का आचार-विचार और सामाजिक आचरण प्रचलित हो, वहाँ पहुँचकर व्यक्ति को वही मर्यादाएँ अपनानी चाहिए, जैसे शरीर पर वस्त्र बदलने पर उसके अनुसार रूप-रंग और उपयुक्तता का ध्यान रखा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्मृतियों में आचार॥ Achara in Smritis==&lt;br /&gt;
आचारात्प्राप्यते श्रैष्ठ्यमाचारात्कर्म लभ्यते। कर्मणो जायते ज्ञानमिति वाक्यं मनोः स्मृतम्॥ (देवी भागवत ११.१.१३)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot;&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A7/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A6%E0%A5%A7 देवी भागवत], स्कन्ध ११, अध्याय १, श्लोक १३।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सदाचार के पालन से मनुष्य को श्रेष्ठता, सम्मान और उच्च स्थिति प्राप्त होती है। आचार ही कर्म का आधार बनता है, क्योंकि बिना उचित आचरण के धर्मयुक्त कर्म संभव नहीं है। मनुस्मृति का यह सिद्धांत है कि जब कर्म शुद्ध, संयत और विधिपूर्वक किए जाते हैं, तब उनसे यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होती है। अतः आचार → कर्म → ज्ञान — यह मानव विकास की क्रमिक और अनिवार्य शृंखला है। सच्चा ज्ञान उसी को प्राप्त होता है जो पहले आचार को दृढ़ करता है और फिर उसी के अनुरूप कर्म का अनुष्ठान करता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;सर्वधर्मवरिष्ठोऽयमाचारः परमं तपः।  तदेव ज्ञानमुद्दिष्टं तेन सर्वं प्रसाध्यते॥ (देवी भागवत ११.१.१४)&amp;lt;ref name=&amp;quot;:1&amp;quot; /&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;सभी धर्मों में आचार को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, क्योंकि यह स्वयं में एक महान तप है। नियम, शुचिता, संयम और सतत अनुशासन - ये सब मिलकर आचार को तपस्वी-गुण प्रदान करते हैं। यही आचार वास्तविक ज्ञान का लक्ष्य है, क्योंकि आचार से उत्पन्न पवित्रता और एकाग्रता के द्वारा जीवन के सभी कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं। मनुष्य के प्रयासों की सिद्धि और आंतरिक उन्नति का मूल आधार आचार ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृतियों में आचार के तीन विभाग किये गये हैं - देशाचार, जात्याचार और कुलाचार।&lt;br /&gt;
#'''देशाचार -''' देश-विशेष में जो आचार प्रचलित होते थे उनको देशाचार कहते थे जैसे दक्षिण में मातुल कन्या से विवाह।&lt;br /&gt;
#'''जाति आचार -''' जाति-विशेष में जो आचार प्रचलित होते थे उन्हें जात्याचार कहा जाता है जैसे - कुछ जातियों में सगोत्र विवाह होना।&lt;br /&gt;
#'''कुलाचार -''' इसी प्रकार कुल-विशेष में प्रचलित आचार को कुलाचार कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र में इस बात का राजा को आदेश दिया गया है कि वह आचारों को मान्यता प्रदान करे, ऐसा न करने से प्रजा क्षुब्ध होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आह्निक एवं आचार॥ Ahnika and Achara==&lt;br /&gt;
आचारविहीन व्यक्ति, चाहे उसने वेदों का तथा उनके छहों अंगों का गहन अध्ययन ही क्यों न किया हो, वेद उसके लिए शुद्धिकारक नहीं होते। यदि आचार नहीं है, तो सभी धार्मिक कर्म मिथ्या और निष्फल हो जाते हैं। वास्तविक धर्म का आरम्भ आचार से ही होता है - यही प्रथम धर्म है, जैसा कि श्रुति और स्मृति सिरोभाग दोनों में कहा गया है। इसलिए प्रत्येक द्विज को सदाचारयुक्त आचरण को अपने जीवन में धारण करना चाहिए - &amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारहीनं न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्भिरङ्गैः। आचारहीनेन तु धर्मकार्यं कृतं हि सर्वं भवतीह मिथ्या॥ (विष्णुधर्मोत्तर पुराण)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A5%81%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%83_%E0%A5%A9/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%83_%E0%A5%A8%E0%A5%AA%E0%A5%AC-%E0%A5%A8%E0%A5%AB%E0%A5%A6 विष्णुधर्मोत्तर पुराण], खण्ड ३, अध्याय २५०, श्लोक ५।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः। आचाराद्धनमक्षय्यं आचारो हन्त्यलक्षणम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः। दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च॥ (मनु स्मृति ४.१५७)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%9A%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय ४, श्लोक १५६/१५७।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' सदाचार से मनुष्य को दीर्घायु प्राप्त होती है, वही उसे अपनी इच्छा के अनुसार उत्तम संतान देता है। सदाचार के कारण ऐसा धन मिलता है जो स्थिर और टिकाऊ होता है, तथा सदाचार ही सभी प्रकार के दोष, अशुभ लक्षण और अनिष्ट संकेतों को नष्ट कर देता है। इसके विपरीत जो मनुष्य दुराचारी होता है, वह इस संसार में सबके द्वारा निन्दित और तिरस्कृत माना जाता है। वह निरन्तर दुःखों का भागी होता है, रोगों से ग्रस्त रहता है और उसका जीवन सामान्यतः अल्पायु तथा कष्टमय हो जाता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारात्प्राप्यते स्वर्ग आचारात्प्राप्यते सुखम्। आचारात्माप्यते मोक्ष भाचाराकिं न लभ्यते॥ (नारद पुराण)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D-_%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AA नारद पुराण], पूर्वार्द्ध/अध्याय ४, श्लोक २७।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः। आचाराद्धनं अक्षय्यं आचारो हन्त्यलक्षणम्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः। दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च॥ (वासिष्ठ धर्मशास्त्र ४.१५७)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D वासिष्ठ धर्मशास्त्रम्], अध्याय ६, श्लोक ६।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आचार आयुकी वृद्धि करता है, आचारसे इच्छित संतानकी प्राप्ति होती है, वह शाश्वत एवं असीम धन देता है और दोष-दुर्लक्षणोंको भी दूर कर देता है। जो आचारसे भ्रष्ट हो गया है, वह चाहे सभी अङ्गों सहित वेद-वेदान्तका पारगामी क्यों न हो, उसे पतित तथा सभी कर्मोंसे बहिष्कृत समझना चाहिये। वर्तमान के समय में आचरण के पालन में बाधा करने वाले निम्नकारण हैं -&lt;br /&gt;
*विधि को न जानना&lt;br /&gt;
*विधि पर अश्रद्धा&lt;br /&gt;
*विजातीय अनुकरण की अत्यन्त अधिकता&lt;br /&gt;
*स्वेछाचारी होने की प्रबलता&lt;br /&gt;
*स्वाभाविक आलस्य आदि की अधिकता ही समाज में आचार को न्यूनता की ओर प्रेरित करने में अग्रसर है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शास्त्रोक्त विधि का प्रतिपालन ही सदाचार कहा जाता था -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संक्षेपमें हमारे श्रुति-स्मृतिमूलक संस्कार देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और आत्माका मलापनयन (परिशुद्धि) कर उनमें अतिशयाधान करते हुए किञ्चित् हीन अङ्ग की पूर्ति कर उन्हें विमल कर देते हैं। संस्कारोंकी उपेक्षा करनेसे समाजमें उच्छृङ्खलता (अराजकता)की वृद्धि हो जाती है जिसका दुष्परिणाम सर्वगोचर एवं सर्वविदित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमानमें मनुष्यकी बढ़ती हुई भोगवादी कुप्रवृत्तिके कारण आचार-विचार का उत्तरोत्तर ह्रास हो रहा है एवं स्वेच्छाचारकी कुत्सित मनोवृत्ति भी उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है, जिसका दुष्परिणाम संसार के समस्त प्राणियों को भोगना पड़ रहा है। ऐसी भयावह परिस्थितिमें मानव के लिये स्वस्थ दिशा बोध प्रदान करनेके लिये आचार-विचार का ज्ञान और उसके अनुसार आचरण करना यह पथ-प्रदर्शक होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Achara_(%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0)&amp;diff=137521</id>
		<title>Achara (आचार)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Achara_(%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0)&amp;diff=137521"/>
		<updated>2025-12-02T11:37:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार (संस्कृतः आचारः) को धर्म का मूलाधार, मानव-चरित्र का दर्पण, समाज-व्यवस्था का नियामक तथा आध्यात्मिक विकास का साधन बताया गया है। स्मृतियों में यह स्पष्ट रूप से व्यक्त है कि आचार केवल किसी व्यक्ति के बाहरी कर्मों का समूह नहीं, अपितु उसके चरित्र, सद्बुद्धि, समाजबोध और आत्मानुशासन का सम्मिलित रूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
आचार मानवता का पोषक, रक्षक और सुख का परम आधार है। पुराणों में कहा गया है कि यदि कोई मनुष्य वेदों का ज्ञान रखता हो, विभिन्न शास्त्रों को जानता हो, फिर भी यदि उसके जीवन में आचार का सम्यक् पालन नहीं है, तो वेद या शास्त्रों का ज्ञान उसे पूर्ण फल नहीं दे सकता। प्राचीन ऋषियों और परम्पराओं ने मनुष्य के आचरण के लिए अनेक विधियाँ निश्चित की हैं, और यह विशेष रूप से बताया गया है कि मनुष्य को किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार वह मार्ग है जो मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध करता है। कोई भी वस्तु उसके लिए अमंगलकारी नहीं बनती और न ही कोई बाधा उत्पन्न होती है। जो व्यक्ति आचार का पालन करता है, उसे स्वाभाविक रूप से सत्य-ज्ञान प्राप्त होता है। महर्षियों और धर्मग्रंथों ने आचार को धर्म का मूल अंग माना है और संत-महात्माओं ने भी सदैव यही कहा है कि आचार ही मनुष्य का वास्तविक श्रृंगार है। पुराणों के अनुसार आचार का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। जैसे - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदय से पूर्व जागरण, प्रातः स्नान, संध्या, तप, वेद-स्वाध्याय, देव-सेवा, गो-सेवा, अतिथि-सत्कार, मृदु-वाणी, गुरु-सेवा, सत्य-पालन, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, दान, करुणा, विनम्रता, धर्मपालन इत्यादि - ये सभी सदाचार के अंग माने गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार को प्रथम धर्म कहा है-&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारः प्रथमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च। तस्मादस्मिन्समायुक्तो नित्यं स्यादात्मनो द्विजः॥ आचाराल्लभते चायुराचाराल्लभते प्रजाः। आचारादन्नमक्षय्यमाचारो हन्ति पातकम्॥ (देवी भागवत ११.९/१०)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83_%E0%A5%A7%E0%A5%A7/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%A6%E0%A5%A7 देवी भागवत], स्कन्ध- ११, अध्याय- १, श्लोक- ९/१०।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''अनु-''' आचार ही प्रथम (मुख्य) धर्म है-ऐसा श्रुतियों तथा स्मृतियोंमें कहा गया है, अतएव द्विजको चाहिये कि वह अपने कल्याणके लिये इस सदाचारके पालनमें नित्य संलग्न रहे।मनुष्य आचारसे आयु प्राप्त करता है, आचारसे सत्सन्तानें प्राप्त करता है ,आचारसे अक्षय अन्न प्राप्त करता है तथा यह आचार पापको नष्ट कर देता है॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र परंपरा में वेद और स्मृतियों के साथ-साथ सामाजिक आचार को भी धर्म के विषय में प्रमाण माना जाता है। भारतीय चिन्तन धारा ने जाति, कुल, ग्राम, देश आदि के अपने आचार व रीति रिवाजों को धर्म माना है। यह व्यवस्था धर्मशास्त्र को जीवन्तता प्रदान करती है। मनु ने धर्म के निम्नलिखित स्रोत बताये हैं -&amp;lt;blockquote&amp;gt;वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम्॥ (मनु स्मृति २.१२ )&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय- २, श्लोक- १२।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद, स्मृति, सदाचार तथा स्वयं का प्रिय - ये धर्म के चार स्रोत हैं। यदि अपने कार्य अकार्य के विषय में जानना हो तो इनसे जाना जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिभाषा॥ Definition==&lt;br /&gt;
भारतीय आचार-शास्त्र में उचित आचरण को आचार तथा अनुचित आचरण को अनाचार कहा गया है। वृहत्त् संस्कृताभिधान वाचस्पत्य के अनुसार ‘आचार’ की व्युत्पत्ति का विवेचन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि आचार को दो रूपों सदाचार एवं दुराचार में वर्गीकृत किया जाता है - &amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - मासुमा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/455720 वैदिक परम्परा में आचार मीमांसा एक अध्ययन], सन २०२२, शोधकेन्द्र - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचरणै अनुष्ठाने स च अनुष्ठान निवृत्त्यात्मक भावाभावरूपः। तत्र सदाचारः वेदस्मृत्यादि विहित तत्र नित्य निषिद्धश्च कदाचार इति भेदात् द्विविधः वाचस्पत्यम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आचार का स्वरूप ==&lt;br /&gt;
आचार के संबंध में ऋषि कहते हैं कि - धर्मानुकूल शारीरिक व्यापार ही सदाचार है। केवल शारीरिक व्यापार या शारीरिक चेष्टा सदाचार नहीं, वह तो अंग संचालन मात्र की क्रिया है। उससे स्थूल शारीरिक लाभ के अतिरिक्त आत्मोन्नति का सम्बन्ध नहीं। इस कारण मात्र शारीरिक क्रिया को आचार नहीं कहते। शारीरिक व्यापार या शारीरिक चेष्टा जब धर्मानुकूल अथवा किसी प्रकार धर्म को लक्ष्य करते हुये होती है तब वह सदाचार होता है और तब उससे स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीर की उन्नति और साथ ही साथ आत्मा का भी अभ्युदय साधन होता है। यह धर्मानुकूल आचरण ही सदाचार है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महर्षि वशिष्ठ लिखते हैं कि-&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारः परमोधर्मः सर्वेषामिति निश्चयः । हीनाचार परीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति ॥ &amp;lt;/blockquote&amp;gt;अर्थात् यह निश्चय है कि आचार ही सबका परम धर्म है आचार भ्रष्ट मनुष्य इस लोक और परलोक दोनों में नष्ट होता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचार हीनं न पुनन्ति वेदाः यद्यप्यधीता सहषड्भिरंगैः। छन्दास्येनं मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव ताप तप्ताः।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आचार हीन व्यक्ति यदि सांगोपांग वेदों का विद्वान् भी है तो वेद उसको पवित्र नहीं कर सकते और वैदिक ऋचायें भी उसे अन्तकाल में इसी प्रकार त्याग देती हैं जैसे अग्नि के ताप से तप्त घोंसले को पक्षी त्याग देते हैं।&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारात् फलते धर्ममाचारात् फलते धनम् । आचाराच्छ्रियमाप्नोति आचारो हन्त्यलक्षणम्।।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;इसके अतिरिक्त दुराचारी मनुष्य लोक में निन्दित, दु:ख का भागी, रोग ग्रस्त और अल्पायु होता है। सदाचार का फल धर्म है, सदाचार का फल धन है, सदाचार से श्री की प्राप्ति होती है तथा सदाचार कुलक्षणों को नाश करता है।&amp;lt;blockquote&amp;gt;आचारः परमो धर्मः आचारः परमं तपः।आचारः परमं ज्ञानं आचारात् कि न साध्यते ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचाराद् विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्नुते।आचारेण समायुक्तः सम्पूर्णफलभाग् भवेत् ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यः स्वाचारपरिभ्रष्टः साङ्गवेदान्तगोऽपि चेत् ।स एव पतितो ज्ञेयो सर्वकर्मबहिष्कृतः॥ (वसिष्ठ धर्मसूत्र)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;आचार ही सर्वोत्तम धर्म है, आचार ही सर्वोत्तम तप है, आचार ही सर्वोत्तम ज्ञान है, यदि आचारका पालन हो तो असाध्य क्या है! अर्थात कुछ भी नहीं। शास्त्रोमें आचारका ही सर्वप्रथम उपदेश ( निर्देशन ) हुआ है । धर्म भी आचारसे ही उत्पन्न है ( अर्थात् ) आचार ही धर्मका माता-पिता है और एकमात्र ईश्वर ही धर्मका स्वामी है । इस प्रकार आचार स्वयं ही परमेश्वर सिद्ध होता है। एक ब्राह्मण जो आचारसे च्युत हो गया है,वह वेदोंके फलकी प्राप्तिसे वञ्चित हो जाता है चाहे वेद-वेदाङ्गोंका पारंगत विद्वान् ही क्यो न हो किंतु जो आचारका पालन करता है वह सबका फल प्राप्त कर लेता है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आचार की दार्शनिक संरचना॥ Philosophical Structure of Achara==&lt;br /&gt;
आचार से आशय उस श्रेष्ठ आचरण से है जिसे व्यक्ति अपने जीवन में अपनाता है। यह धर्म, नैतिकता और सामाजिक दृष्टि से ऐसा आचरण है जिसे सभी लोग अनुसरण योग्य मानते हैं। आचार का निर्धारण समाज की समष्टि-हित भावना को ध्यान में रखकर किया जाता है; इसलिए यह सदैव शोभनीय और लोक-हितकारी होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार को ही लोकाचार, शिष्टाचार तथा सदाचार जैसे नामों से भी अभिहित किया जाता है। यह सामान्यतः व्यक्ति के चरित्र, उसके आचरण, उसकी योग्यता और उसकी शील-संपन्नता का परिचायक होता है। आचार मनुष्य के व्यवहार का वह रूप है जो समाज में उसके व्यक्तित्व को आदर और प्रतिष्ठा प्रदान करता है। अखंड रूप से देखें तो आचार वही होता है, जिससे स्वयं व्यक्ति और समाज - दोनों का हित साधित होता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृतियों के अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी देश या समुदाय के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो उसे वहाँ की परम्पराओं, आचारों, सामाजिक व्यवहार तथा कुल-सम्बन्धी मर्यादाओं का उसी प्रकार पालन करना चाहिए - &amp;lt;blockquote&amp;gt;यस्मिन्देशे य आचारो व्यवहारः कुलस्थितिः । तथैव परिपाल्योऽसौ यदा वशं उपागतः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति १.३४३)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्य स्मृति], आचाराध्याय, श्लोक 343।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' जिस स्थान में जिस प्रकार का आचार-विचार और सामाजिक आचरण प्रचलित हो, वहाँ पहुँचकर व्यक्ति को वही मर्यादाएँ अपनानी चाहिए, जैसे शरीर पर वस्त्र बदलने पर उसके अनुसार रूप-रंग और उपयुक्तता का ध्यान रखा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्मृतियों में आचार॥ Achara in Smritis==&lt;br /&gt;
आचारात् प्राप्यते श्रैष्ठ्यम्, आचारात् कर्म लभ्यते।  कर्मणो जायते ज्ञानम् – इति वाक्यं मनोः स्मृतम्॥ 13॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सदाचार के पालन से मनुष्य को श्रेष्ठता, सम्मान और उच्च स्थिति प्राप्त होती है। आचार ही कर्म का आधार बनता है, क्योंकि बिना उचित आचरण के धर्मयुक्त कर्म संभव नहीं है। मनुस्मृति का यह सिद्धांत है कि जब कर्म शुद्ध, संयत और विधिपूर्वक किए जाते हैं, तब उनसे यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होती है। अतः आचार → कर्म → ज्ञान — यह मानव विकास की क्रमिक और अनिवार्य शृंखला है। सच्चा ज्ञान उसी को प्राप्त होता है जो पहले आचार को दृढ़ करता है और फिर उसी के अनुरूप कर्म का अनुष्ठान करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वधर्मवरिष्ठोऽयमाचारः परमं तपः।  तदेव ज्ञानमुद्दिष्टं तेन सर्वं प्रसाध्यते॥ 14॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सभी धर्मों में आचार को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, क्योंकि यह स्वयं में एक महान तप है। नियम, शुचिता, संयम और सतत अनुशासन—ये सब मिलकर आचार को तपस्वी-गुण प्रदान करते हैं। यही आचार वास्तविक ज्ञान का लक्ष्य है, क्योंकि आचार से उत्पन्न पवित्रता और एकाग्रता के द्वारा जीवन के सभी कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होते हैं। मनुष्य के प्रयासों की सिद्धि और आंतरिक उन्नति का मूल आधार आचार ही है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृतियों में आचार के तीन विभाग किये गये हैं - देशाचार, जात्याचार और कुलाचार।&lt;br /&gt;
#'''देशाचार -''' देश-विशेष में जो आचार प्रचलित होते थे उनको देशाचार कहते थे जैसे दक्षिण में मातुल कन्या से विवाह।&lt;br /&gt;
#'''जाति आचार -''' जाति-विशेष में जो आचार प्रचलित होते थे उन्हें जात्याचार कहा जाता है जैसे - कुछ जातियों में सगोत्र विवाह होना।&lt;br /&gt;
#'''कुलाचार -''' इसी प्रकार कुल-विशेष में प्रचलित आचार को कुलाचार कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र में इस बात का राजा को आदेश दिया गया है कि वह आचारों को मान्यता प्रदान करे, ऐसा न करने से प्रजा क्षुब्ध होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आह्निक एवं आचार==&lt;br /&gt;
वर्तमान के समय में आचरण के पालन में बाधा करने वाले निम्नकारण हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* विधि को न जानना&lt;br /&gt;
* विधि पर अश्रद्धा&lt;br /&gt;
* विजातीय अनुकरण की अत्यन्त अधिकता&lt;br /&gt;
* स्वेछाचारी होने की प्रबलता&lt;br /&gt;
* स्वाभाविक आलस्य आदि की अधिकता ही समाज में आचार को न्यूनता की ओर प्रेरित करने में अग्रसर है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शास्त्रोक्त विधि का प्रतिपालन ही सदाचार कहा जाता था-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संक्षेपमें हमारे श्रुति-स्मृतिमूलक संस्कार देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और आत्माका मलापनयन(परिशुद्धि) कर उनमें अतिशयाधान करते हुए किञ्चित् हीन अङ्ग की पूर्ति कर उन्हें विमल कर देते हैं। संस्कारोंकी उपेक्षा करनेसे समाजमें उच्छृङ्खलता(अराजकता)की वृद्धि हो जाती है जिसका दुष्परिणाम सर्वगोचर एवं सर्वविदित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमानमें मनुष्यकी बढ़ती हुई भोगवादी कुप्रवृत्तिके कारण आचार-विचार का उत्तरोत्तर ह्रास हो रहा है एवं स्वेच्छाचारकी कुत्सित मनोवृत्ति भी उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है, जिसका दुष्परिणाम संसार के समस्त प्राणियों को भोगना पड़ रहा है। ऐसी भयावह परिस्थितिमें मानव के लिये स्वस्थ दिशा बोध प्रदान करनेके लिये आचार-विचार का ज्ञान और उसके अनुसार आचरण करना यह पथ-प्रदर्शक होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उद्धरण॥ References ==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Achara_(%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0)&amp;diff=137517</id>
		<title>Achara (आचार)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Achara_(%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0)&amp;diff=137517"/>
		<updated>2025-12-02T03:18:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार (संस्कृतः आचारः) को धर्म का मूलाधार, मानव-चरित्र का दर्पण, समाज-व्यवस्था का नियामक तथा आध्यात्मिक विकास का साधन बताया गया है। स्मृतियों में यह स्पष्ट रूप से व्यक्त है कि आचार केवल किसी व्यक्ति के बाहरी कर्मों का समूह नहीं, अपितु उसके चरित्र, सद्बुद्धि, समाजबोध और आत्मानुशासन का सम्मिलित रूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
आचार मानवता का पोषक, रक्षक और सुख का परम आधार है। पुराणों में कहा गया है कि यदि कोई मनुष्य वेदों का ज्ञान रखता हो, विभिन्न शास्त्रों को जानता हो, फिर भी यदि उसके जीवन में आचार का सम्यक् पालन नहीं है, तो वेद या शास्त्रों का ज्ञान उसे पूर्ण फल नहीं दे सकता। प्राचीन ऋषियों और परम्पराओं ने मनुष्य के आचरण के लिए अनेक विधियाँ निश्चित की हैं, और यह विशेष रूप से बताया गया है कि मनुष्य को किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार वह मार्ग है जो मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध करता है। कोई भी वस्तु उसके लिए अमंगलकारी नहीं बनती और न ही कोई बाधा उत्पन्न होती है। जो व्यक्ति आचार का पालन करता है, उसे स्वाभाविक रूप से सत्य-ज्ञान प्राप्त होता है। महर्षियों और धर्मग्रंथों ने आचार को धर्म का मूल अंग माना है और संत-महात्माओं ने भी सदैव यही कहा है कि आचार ही मनुष्य का वास्तविक श्रृंगार है। पुराणों के अनुसार आचार का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। जैसे - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदय से पूर्व जागरण, प्रातः स्नान, संध्या, तप, वेद-स्वाध्याय, देव-सेवा, गो-सेवा, अतिथि-सत्कार, मृदु-वाणी, गुरु-सेवा, सत्य-पालन, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, दान, करुणा, विनम्रता, धर्मपालन इत्यादि - ये सभी सदाचार के अंग माने गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र परंपरा में वेद और स्मृतियों के साथ-साथ सामाजिक आचार को भी धर्म के विषय में प्रमाण माना जाता है। भारतीय चिन्तन धारा ने जाति, कुल, ग्राम, देश आदि के अपने आचार व रीति रिवाजों को धर्म माना है। यह व्यवस्था धर्मशास्त्र को जीवन्तता प्रदान करती है। मनु ने धर्म के निम्नलिखित स्रोत बताये हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम्॥ (मनु स्मृति २.१२ )&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय- २, श्लोक- १२।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद, स्मृति, सदाचार तथा स्वयं का प्रिय - ये धर्म के चार स्रोत हैं। यदि अपने कार्य अकार्य के विषय में जानना हो तो इनसे जाना जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आचार की दार्शनिक संरचना॥ Philosophical Structure of Achara==&lt;br /&gt;
आचार से आशय उस श्रेष्ठ आचरण से है जिसे व्यक्ति अपने जीवन में अपनाता है। यह धर्म, नैतिकता और सामाजिक दृष्टि से ऐसा आचरण है जिसे सभी लोग अनुसरण योग्य मानते हैं। आचार का निर्धारण समाज की समष्टि-हित भावना को ध्यान में रखकर किया जाता है; इसलिए यह सदैव शोभनीय और लोक-हितकारी होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार को ही लोकाचार, शिष्टाचार तथा सदाचार जैसे नामों से भी अभिहित किया जाता है। यह सामान्यतः व्यक्ति के चरित्र, उसके आचरण, उसकी योग्यता और उसकी शील-संपन्नता का परिचायक होता है। आचार मनुष्य के व्यवहार का वह रूप है जो समाज में उसके व्यक्तित्व को आदर और प्रतिष्ठा प्रदान करता है। अखंड रूप से देखें तो आचार वही होता है, जिससे स्वयं व्यक्ति और समाज - दोनों का हित साधित होता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृतियों के अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी देश या समुदाय के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो उसे वहाँ की परम्पराओं, आचारों, सामाजिक व्यवहार तथा कुल-सम्बन्धी मर्यादाओं का उसी प्रकार पालन करना चाहिए - &amp;lt;blockquote&amp;gt;यस्मिन्देशे य आचारो व्यवहारः कुलस्थितिः । तथैव परिपाल्योऽसौ यदा वशं उपागतः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति १.३४३)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्य स्मृति], आचाराध्याय, श्लोक 343।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' जिस स्थान में जिस प्रकार का आचार-विचार और सामाजिक आचरण प्रचलित हो, वहाँ पहुँचकर व्यक्ति को वही मर्यादाएँ अपनानी चाहिए, जैसे शरीर पर वस्त्र बदलने पर उसके अनुसार रूप-रंग और उपयुक्तता का ध्यान रखा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा॥ Definition==&lt;br /&gt;
भारतीय आचार-शास्त्र में उचित आचरण को आचार तथा अनुचित आचरण को अनाचार कहा गया है। वृहत्त् संस्कृताभिधान वाचस्पत्य के अनुसार ‘आचार’ की व्युत्पत्ति का विवेचन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि आचार को दो रूपों सदाचार एवं कदाचार में वर्गीकृत किया जाता है - &amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - मासुमा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/455720 वैदिक परम्परा में आचार मीमांसा एक अध्ययन], सन २०२२, शोधकेन्द्र - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचरणै अनुष्ठाने स च अनुष्ठान निवृत्त्यात्मक भावाभावरूपः। तत्र सदाचारः वेदस्मृत्यादि विहित तत्र नित्य निषिद्धश्च कदाचार इति भेदात् द्विविधः वाचस्पत्यम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्मृति ग्रन्थों में आचार॥ Achara in Smriti Granthas==&lt;br /&gt;
स्मृतियों में आचार के तीन विभाग किये गये हैं - देशाचार, जात्याचार और कुलाचार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
# '''देशाचार -''' देश-विशेष में जो आचार प्रचलित होते थे उनको देशाचार कहते थे जैसे दक्षिण में मातुल कन्या से विवाह।&lt;br /&gt;
# '''जाति आचार -''' जाति-विशेष में जो आचार प्रचलित होते थे उन्हें जात्याचार कहा जाता है जैसे - कुछ जातियों में सगोत्र विवाह होना।&lt;br /&gt;
# '''कुलाचार -''' इसी प्रकार कुल-विशेष में प्रचलित आचार को कुलाचार कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र में इस बात का राजा को आदेश दिया गया है कि वह आचारों को मान्यता प्रदान करे, ऐसा न करने से प्रजा क्षुब्ध होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''नैतिक आचार॥ Naitika Achara'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सामाजिक आचार॥ Samajika Achara'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पारिवारिक आचार॥ Parivarika Achara'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण॥ References==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Achara_(%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0)&amp;diff=137512</id>
		<title>Achara (आचार)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dharmawiki.org/index.php?title=Achara_(%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0)&amp;diff=137512"/>
		<updated>2025-12-01T10:04:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार (संस्कृतः आचारः) को धर्म का मूलाधार, मानव-चरित्र का दर्पण, समाज-व्यवस्था का नियामक तथा आध्यात्मिक विकास का साधन बताया गया है। स्मृतियों में यह स्पष्ट रूप से व्यक्त है कि आचार केवल किसी व्यक्ति के बाहरी कर्मों का समूह नहीं, अपितु उसके चरित्र, सद्बुद्धि, समाजबोध और आत्मानुशासन का सम्मिलित रूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
आचार मानवता का पोषक, रक्षक और सुख का परम आधार है। पुराणों में कहा गया है कि यदि कोई मनुष्य वेदों का ज्ञान रखता हो, विभिन्न शास्त्रों को जानता हो, फिर भी यदि उसके जीवन में आचार का सम्यक् पालन नहीं है, तो वेद या शास्त्रों का ज्ञान उसे पूर्ण फल नहीं दे सकता। प्राचीन ऋषियों और परम्पराओं ने मनुष्य के आचरण के लिए अनेक विधियाँ निश्चित की हैं, और यह विशेष रूप से बताया गया है कि मनुष्य को किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार वह मार्ग है जो मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध करता है। कोई भी वस्तु उसके लिए अमंगलकारी नहीं बनती और न ही कोई बाधा उत्पन्न होती है। जो व्यक्ति आचार का पालन करता है, उसे स्वाभाविक रूप से सत्य-ज्ञान प्राप्त होता है। महर्षियों और धर्मग्रंथों ने आचार को धर्म का मूल अंग माना है और संत-महात्माओं ने भी सदैव यही कहा है कि आचार ही मनुष्य का वास्तविक श्रृंगार है। पुराणों के अनुसार आचार का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। जैसे - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदय से पूर्व जागरण, प्रातः स्नान, संध्या, तप, वेद-स्वाध्याय, देव-सेवा, गो-सेवा, अतिथि-सत्कार, मृदु-वाणी, गुरु-सेवा, सत्य-पालन, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, दान, करुणा, विनम्रता, धर्मपालन इत्यादि - ये सभी सदाचार के अंग माने गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र परंपरा में वेद और स्मृतियों के साथ-साथ सामाजिक आचार को भी धर्म के विषय में प्रमाण माना जाता है। भारतीय चिन्तन धारा ने जाति, कुल, ग्राम, देश आदि के अपने आचार व रीति रिवाजों को धर्म माना है। यह व्यवस्था धर्मशास्त्र को जीवन्तता प्रदान करती है। मनु ने धर्म के निम्नलिखित स्रोत बताये हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम्॥ (मनु स्मृति २.१२ )&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय- २, श्लोक- १२।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद, स्मृति, सदाचार तथा स्वयं का प्रिय - ये धर्म के चार स्रोत हैं। यदि अपने कार्य अकार्य के विषय में जानना हो तो इनसे जाना जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आचार की दार्शनिक संरचना॥ Philosophical Structure of Achara==&lt;br /&gt;
आचार से आशय उस श्रेष्ठ आचरण से है जिसे व्यक्ति अपने जीवन में अपनाता है। यह धर्म, नैतिकता और सामाजिक दृष्टि से ऐसा आचरण है जिसे सभी लोग अनुसरण योग्य मानते हैं। आचार का निर्धारण समाज की समष्टि-हित भावना को ध्यान में रखकर किया जाता है; इसलिए यह सदैव शोभनीय और लोक-हितकारी होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार को ही लोकाचार, शिष्टाचार तथा सदाचार जैसे नामों से भी अभिहित किया जाता है। यह सामान्यतः व्यक्ति के चरित्र, उसके आचरण, उसकी योग्यता और उसकी शील-संपन्नता का परिचायक होता है। आचार मनुष्य के व्यवहार का वह रूप है जो समाज में उसके व्यक्तित्व को आदर और प्रतिष्ठा प्रदान करता है। अखंड रूप से देखें तो आचार वही होता है, जिससे स्वयं व्यक्ति और समाज - दोनों का हित साधित होता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृतियों के अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी देश या समुदाय के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो उसे वहाँ की परम्पराओं, आचारों, सामाजिक व्यवहार तथा कुल-सम्बन्धी मर्यादाओं का उसी प्रकार पालन करना चाहिए - &amp;lt;blockquote&amp;gt;यस्मिन्देशे य आचारो व्यवहारः कुलस्थितिः । तथैव परिपाल्योऽसौ यदा वशं उपागतः॥ (याज्ञवल्क्य स्मृति १.३४३)&amp;lt;ref&amp;gt;[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D याज्ञवल्क्य स्मृति], आचाराध्याय, श्लोक 343।&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' जिस स्थान में जिस प्रकार का आचार-विचार और सामाजिक आचरण प्रचलित हो, वहाँ पहुँचकर व्यक्ति को वही मर्यादाएँ अपनानी चाहिए, जैसे शरीर पर वस्त्र बदलने पर उसके अनुसार रूप-रंग और उपयुक्तता का ध्यान रखा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा==&lt;br /&gt;
भारतीय आचार-शास्त्र में उचित आचरण को आचार तथा अनुचित आचरण को अनाचार कहा गया है। वृहत्त् संस्कृताभिधान वाचस्पत्य के अनुसार ‘आचार’ की व्युत्पत्ति का विवेचन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि आचार को दो रूपों सदाचार एवं कदाचार में वर्गीकृत किया जाता है - &amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - मासुमा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/455720 वैदिक परम्परा में आचार मीमांसा एक अध्ययन], सन २०२२, शोधकेन्द्र - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचरणै अनुष्ठाने स च अनुष्ठान निवृत्त्यात्मक भावाभावरूपः। तत्र सदाचारः वेदस्मृत्यादि विहित तत्र नित्य निषिद्धश्च कदाचार इति भेदात् द्विविधः वाचस्पत्यम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== स्मृति ग्रन्थों में आचार ==&lt;br /&gt;
'''नैतिक आचार'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सामाजिक आचार'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पारिवारिक आचार'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dharmawiki.org/index.php?title=Achara_(%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0)&amp;diff=137511</id>
		<title>Achara (आचार)</title>
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		<updated>2025-11-29T22:51:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;AnuragV: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{ToBeEdited}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार (संस्कृतः आचारः) को धर्म का मूलाधार, मानव-चरित्र का दर्पण, समाज-व्यवस्था का नियामक तथा आध्यात्मिक विकास का साधन बताया गया है। स्मृतियों में यह स्पष्ट रूप से व्यक्त है कि आचार केवल किसी व्यक्ति के बाहरी कर्मों का समूह नहीं, अपितु उसके चरित्र, सद्बुद्धि, समाजबोध और आत्मानुशासन का सम्मिलित रूप है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय॥ Introduction ==&lt;br /&gt;
आचार मानवता का पोषक, रक्षक और सुख का परम आधार है। पुराणों में कहा गया है कि यदि कोई मनुष्य वेदों का ज्ञान रखता हो, विभिन्न शास्त्रों को जानता हो, फिर भी यदि उसके जीवन में आचार का सम्यक् पालन नहीं है, तो वेद या शास्त्रों का ज्ञान उसे पूर्ण फल नहीं दे सकता। प्राचीन ऋषियों और परम्पराओं ने मनुष्य के आचरण के लिए अनेक विधियाँ निश्चित की हैं, और यह विशेष रूप से बताया गया है कि मनुष्य को किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार वह मार्ग है जो मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध करता है। कोई भी वस्तु उसके लिए अमंगलकारी नहीं बनती और न ही कोई बाधा उत्पन्न होती है। जो व्यक्ति आचार का पालन करता है, उसे स्वाभाविक रूप से सत्य-ज्ञान प्राप्त होता है। महर्षियों और धर्मग्रंथों ने आचार को धर्म का मूल अंग माना है और संत-महात्माओं ने भी सदैव यही कहा है कि आचार ही मनुष्य का वास्तविक श्रृंगार है। पुराणों के अनुसार आचार का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। जैसे - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्योदय से पूर्व जागरण, प्रातः स्नान, संध्या, तप, वेद-स्वाध्याय, देव-सेवा, गो-सेवा, अतिथि-सत्कार, मृदु-वाणी, गुरु-सेवा, सत्य-पालन, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, दान, करुणा, विनम्रता, धर्मपालन इत्यादि - ये सभी सदाचार के अंग माने गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्मशास्त्र परंपरा में वेद और स्मृतियों के साथ-साथ सामाजिक आचार को भी धर्म के विषय में प्रमाण माना जाता है। भारतीय चिन्तन धारा ने जाति, कुल, ग्राम, देश आदि के अपने आचार व रीति रिवाजों को धर्म माना है। यह व्यवस्था धर्मशास्त्र को जीवन्तता प्रदान करती है। मनु ने धर्म के निम्नलिखित स्रोत बताये हैं - &amp;lt;blockquote&amp;gt;वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम्॥ (मनु स्मृति)&amp;lt;/blockquote&amp;gt;'''भाषार्थ -''' वेद, स्मृति, सदाचार तथा स्वयं का प्रिय - ये धर्म के चार स्रोत हैं। यदि अपने कार्य अकार्य के विषय में जानना हो तो इनसे जाना जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आचार की दार्शनिक संरचना॥ Philosophical Structure of Achara==&lt;br /&gt;
आचार से आशय उस श्रेष्ठ आचरण से है जिसे व्यक्ति अपने जीवन में अपनाता है। यह धर्म, नैतिकता और सामाजिक दृष्टि से ऐसा आचरण है जिसे सभी लोग अनुसरण योग्य मानते हैं। आचार का निर्धारण समाज की समष्टि-हित भावना को ध्यान में रखकर किया जाता है; इसलिए यह सदैव शोभनीय और लोक-हितकारी होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचार को ही लोकाचार, शिष्टाचार तथा सदाचार जैसे नामों से भी अभिहित किया जाता है। यह सामान्यतः व्यक्ति के चरित्र, उसके आचरण, उसकी योग्यता और उसकी शील-संपन्नता का परिचायक होता है। आचार मनुष्य के व्यवहार का वह रूप है जो समाज में उसके व्यक्तित्व को आदर और प्रतिष्ठा प्रदान करता है। अखंड रूप से देखें तो आचार वही होता है, जिससे स्वयं व्यक्ति और समाज - दोनों का हित साधित होता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मृतियों के अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी देश या समुदाय के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो उसे वहाँ की परम्पराओं, आचारों, सामाजिक व्यवहार तथा कुल-सम्बन्धी मर्यादाओं का उसी प्रकार पालन करना चाहिए। जैसे कहा गया है - &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''‘यत्रस्नेहेऽपि य आचारो व्यवहारः कुलस्थितिः।'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''तत्रैव परिवर्त्योऽसौ यथा वपुषि वाससु॥’'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थात् जिस स्थान में जिस प्रकार का आचार-विचार और सामाजिक आचरण प्रचलित हो, वहाँ पहुँचकर व्यक्ति को वही मर्यादाएँ अपनानी चाहिए, जैसे शरीर पर वस्त्र बदलने पर उसके अनुसार रूप-रंग और उपयुक्तता का ध्यान रखा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिभाषा==&lt;br /&gt;
भारतीय आचार-शास्त्र में उचित आचरण को आचार तथा अनुचित आचरण को अनाचार कहा गया है। वृहत्त् संस्कृताभिधान वाचस्पत्य के अनुसार ‘आचार’ की व्युत्पत्ति का विवेचन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि आचार को दो रूपों सदाचार एवं कदाचार में वर्गीकृत किया जाता है - &amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;शोध छात्रा - मासुमा, [https://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/455720 वैदिक परम्परा में आचार मीमांसा एक अध्ययन], सन २०२२, शोधकेन्द्र - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (पृ० १७)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचरणै अनुष्ठाने स च अनुष्ठान निवृत्त्यात्मक भावाभावरूपः। तत्र सदाचारः वेदस्मृत्यादि विहित तत्र नित्य निषिद्धश्च कदाचार इति भेदात् द्विविधः वाचस्पत्यम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उद्धरण==&lt;br /&gt;
[[Category:Hindi Articles]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिंदी भाषा के लेख]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;references /&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>AnuragV</name></author>
	</entry>
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